बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५०)

इस जन्म में भी प्राप्य है—असम्प्रज्ञात समाधि

बस इसके लिए श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि एवं प्रज्ञा को अपने में जगाना होगा। ध्यान रहे, यह जागरण क्रम से होता है। जो श्रद्धावान् है, वही अगले क्रम में वीर्यवान् होगा। वीर्यवान्, स्मृतिवान् बनेगा। और स्मृतिवान् क्रमिक रूप से समाधि के सत्य को जानेगा और प्रज्ञा को उपलब्ध होगा। योग जीवन का, साधना जीवन का सबसे पहला तत्त्व श्रद्धा है। श्रद्धा शब्द से प्रत्येक अध्यात्म प्रेमी परिचित हैं। श्रद्धा के बारे में पर्याप्त कहा-सुना एवं पढ़ा-लिखा जाता है। लेकिन यह शब्दोच्चार भर पर्याप्त नहीं है। जरूरत कुछ ज्यादा की है। श्रद्धा का सत्य एवं मर्म जब तक जिन्दगी में नहीं उतरता, तब तक बात नहीं बनेगी। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे- श्रद्धा अस्तित्व के गहनतम क्षेत्र कारण शरीर में जन्मती एवं पनपती है। श्रद्धा के तरंगित होने पर समूचा अस्तित्व तरंगित होता है। जिसके प्रति श्रद्धा है- उसके प्रति समूचा व्यक्तित्व, अपना सारा अस्तित्व अपने आप ही उमड़ने लगता है। सार रूप में श्रद्धा का प्रारम्भ समग्र समर्पण का प्रारम्भ है। इसकी चरम परिणति में साधक का अस्तित्व स्वयं ही साध्य में विलीन हो जाता है। साधना के प्रति श्रद्धा का जन्म होते ही वीर्य अर्थात् साहसिक प्रयत्न प्रारम्भ हो जाते हैं। श्रद्धा हुई इसकी पहचान भी यही है। निष्क्रिय, निठल्ली एवं निकम्मी भावनाओं को कभी भी श्रद्धा का नाम नहीं दिया जा सकता।
    
यदा-कदा यह भी देखा जाता है कि श्रद्धा के नाम पर लोग अपने आलस्य को प्रश्रय देते हैं, पर यथार्थ स्थिति इसके विपरीत है। श्रद्धा व्यक्ति में चरम साहस को जन्म देती है। युगऋषि गुरुदेव के शब्दों में यह चरम साहस ही वीर्य है। गुरुदेव के अनुसार साधना के सन्दर्भ में वीर्य का सच्चा अर्थ यही है। जो परम साहसी नहीं है, वह साधक नहीं हो सकता। रक्त की बूँद तक, प्राण के अन्तिम कण तक, जीवन के अन्तिम क्षण तक जो साहस करते हैं, वही सच्चे साधक होने का गौरव हासिल करते हैं। ऐसे प्रयत्न से ही स्मृति का जागरण होता है। मालूम पड़ता है, अहसास जगता है कि मैं कौन हूँ। पहले यह स्मृति धुंधली हल्की होती है। परन्तु साधक के साहसिक प्रयत्न ज्यों-त्यों सघन होते जाते हैं, त्यों-त्यों स्पष्ट रीति से स्मृति जगने लगती है।
    
ध्यान रहे, स्मृति का अर्थ याददाश्त तक सिमटा नहीं है। स्मृति का अर्थ तो होश जगना है। स्वयं अपने बारे में सार्थक अहसास होना है। अस्तित्व की गहराइयों में अपने सच्चे स्वरूप की झलक मिलना है। यह झलक साधना को प्रगाढ़ करती है। साधक के प्रयत्नों में और भी तीव्रता एवं त्वरा पैदा होती है। स्मृति की झलकियों में जब मन तदाकार होने लगता है, तब समाधि प्रस्फुटित होती है। यह भावदशा है, जब साधक अपनी साधना में पूरी तरह डूब जाता है। साधक, साधना एवं साध्य तीनों आपस में घुल-मिल जाते हैं। यही से जीवन रूपान्तरित होना शुरू होता है। अन्तरतम में बदलाव के स्वर फूटते हैं। समाधि में साधक की चेतना समग्र, सम्पूर्ण एवं प्रकाशित होती है और इसी बिन्दु पर प्रज्ञा प्रकट होती है। बोध के स्वर जन्म लेते हैं। सत्य समझ में आता है। जन्म-जन्मान्तर के बन्धन खुलते हैं। वासना-तृष्णा-अहंता तीनों ही ग्रन्थियाँ खुलने लगती है। बड़ी ही अपूर्व अवस्था है यह। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

👉 परदोष दर्शन भी एक बड़ा पाप है

गाँव के बीच शिव मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वेश्या का मकान था। वेश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वेश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती।

बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती।

उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा “पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आये और वेश्या को विष्णु दूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो मुझे विष्णु दूत लेने आये हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है भजन किया है, जानते नहीं हो।”

यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया। भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिन्दा,छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है। संसार में पाप बहुत है, पर पुण्य भी क्या कम हैं। हम अपनी भावनाऐं पाप, घृणा और निन्दा में डुबाये रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें?

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1962  

👉 आवेश और अधीरता

जरा सी प्रतिकूलता को सहन न कर सकने वाले आवेशग्रस्त, उत्तेजित, अधीर और उतावले मनुष्य सदा गलत सोचते और गलत काम करते हैं। उत्तेजना एक प्रकार का दिमागी बुखार है। जिस प्रकार बुखार आने पर देह का सारा कार्यक्रम लड़खड़ा जाता है उसी प्रकार आवेश आने पर मस्तिष्क की विचारणा एवं निर्णय में कोई व्यक्ति सही निर्णय नहीं कर सकता। आवेशग्रस्त मनुष्य प्रायः न करने योग्य ऐसे काम कर डालते हैं जिनके लिए पीछे सदा पश्चाताप ही करते रहना पड़ता हैं। आत्महत्याऐं प्रायः इन्हीं परिस्थितियों में होती हैं। कहनी अनकहनी कह बैठते हैं। मारपीट, गाली-गलौज, लड़ाई-झगड़े, कत्ल आदि के दुखद कार्य भी उत्तेजना के वातावरण में ही बन पड़ते हैं। अधीरता भी एक प्रकार का आवेश ही है। बहुत जल्दी मनमानी सफलता अत्यन्त सरलतापूर्वक मिल जाने के सपने बाल बुद्धि के लोग देखा करते हैं वे यह नहीं सोचते कि महत्वपूर्ण सफलताऐं तब मिला करती हैं जबकि व्यक्ति श्रमशीलता, पुरुषार्थ, साहस, धैर्य एवं सद्गुणों की अग्नि परीक्षा में गुजर कर अपने आपको उसके उपयुक्त सिद्ध कर देता है। जल्दीबाजी में बनता कुछ नहीं, बिगड़ता बहुत कुछ है। इसलिए धैर्य को सन्तुलन और शान्ति को एक श्रेष्ठ मानवीय गुण माना गया है। कठिनाइयों से हर किसी को पाला पड़ता है, विघ्नों से रहित कोई काम नहीं। तुर्त−फुर्त सफलता किसे मिली है, किसके सब साथी सज्जन और सद्गुणी होते हैं?

हर समझदार आदमी को सहनशीलता, धैर्य और समझौते का मार्ग अपनाना पड़ता है। जो प्राप्त है उसमें प्रसन्नता अनुभव करते हुए अधिक के लिए प्रयत्नशील रहना बुद्धिमानी की बात है पर यह परले सिरे की मूर्खता है कि अपनी कल्पना के अनुरूप सब कुछ न मिल जाने पर मनुष्य खिन्न, दुखी और असंतुष्ट ही बना रहे। सबकी सब इच्छाऐं कभी पूरी नहीं हो सकती। अधूरे में भी जो सन्तोष कर सकता है उसी को इस संसार में थोड़ी सी प्रसन्नता उपलब्ध हो सकती है। अन्यथा असंतोष और तृष्णा की आग में जल मरने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं हैं। अधीर, असंतोष और महत्वाकाँक्षी मनुष्य जितने दुखी देखे जाते हैं उतनी जलन, दर्द और पीड़ा से पीड़ित घायल और बीमारों को भी नहीं होती। सन्तोष का मरहम लगाकर कोई भी व्यक्ति इस जलन से छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४९)

इस जन्म में भी प्राप्य है—असम्प्रज्ञात समाधि


अन्तर्यात्रा के प्रयोगों को पूरे यत्न एवं गहराई के साथ अपनाने वाले साधकों के न केवल बाह्य जीवन में, बल्कि आन्तरिक जीवन में परिष्कार इस कदर होता है कि दूर संवेदन, पूर्वाभास जैसे तथ्य उनकी जिन्दगी का सहज हिस्सा बन जाते। बोध की सूक्ष्मता इस कदर बढ़ती है कि उनकी साधना के समय होने वाले अन्तदर्शन में दिव्य लोकों का वैभव सहज झलकने लगता है। यहाँ तक कि अध्यात्म जगत् की विभूतियों के रूप में लोक विख्यात महर्षियों के संकेत एवं संदेश स्वयमेव प्राप्त होने लगते हैं।
    
इस पथ पर चल रहे साधक अपने व्यावहारिक जीवन में पारस्परिक सामञ्जस्य, सम्बन्धों में सजल संवेदनाओं का विकास, कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता में अचरज करने जैसी प्रगति अनुभव करते हैं। तब और अब में आकाश-पाताल जैसा अन्तर दिखाई पड़ने लगता है। सच्चाई यही है कि योग साधना व्यक्ति का सम्पूर्ण व समग्र विकास करती है। व्यक्तित्व के सभी आयामों को परिष्कृत कर उनकी अचरज भरी शक्तियों को निखारती है। आन्तरिक जीवन एवं बाह्य जीवन का कायापलट कर देने वाला चमत्कार इससे सहज सम्भव होता है।
    
साधक चाहे तो क्या नहीं कर सकता। ऐसा नहीं कि जिन्होंने अपने पिछले जन्म में विदेह या प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त कर ली, उन्हीं को यह असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध होगी। सम्भावनाएँ उनके लिए भी हैं, जिन्होंने अभी इसी जन्म में, अपनी साधना का प्रारम्भ किया हैं, उनके लिए भी सम्भावनाओं के द्वार खुले हैं। पर किस तरह? इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि कहते हैं-
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्॥ १/२०॥
शब्दार्थ-इतरेषाम् = दूसरे साधकों का (योग)। श्रद्धावीर्य स्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वकः = श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक सिद्ध होता है।
अर्थात् दूसरे जो असम्प्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं, वे श्रद्धा, वीर्य (प्रयत्न), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के द्वारा उपलब्ध होते हैं।
    
यह सूत्र महर्षि पतंजलि के सभी सूत्रों से कहीं अधिक मूल्यवान् है। हालाँकि दूसरों सूत्रों में भी गहरी चर्चा है, गहन चिन्तन है। इन सूत्रों में साधना के, साध्य के एवं सिद्धि के अनेकों रहस्य खुलते हैं, लेकिन इस पर भी जो बात इस सूत्र में है, वह कहीं और नहीं है, क्योंकि इस सूत्र में अपने जीवन की चरम सम्भावनाओं को साकार करने वाला सहज मार्ग बता दिया गया है। बुद्धत्व को प्रकट करने की सम्पूर्ण प्रक्रिया इस एक सूत्र में ही समझा दी गई है। बड़ी ही स्पष्ट रीति से महर्षि पतंजलि कहते हैं कि तुम भी, हाँ और कोई नहीं तुम ही, जो इन क्षणों में इस सूत्र की व्याख्या को पढ़ रहे हो इस सूत्र को पकड़कर बुद्ध बन सकते हो, पतंजलि बन सकते हो, युगऋषि आचार्य श्री के जीवन के सार को अनुभव कर सकते हो।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 The supremacy of wisdom in the Yug Nirman solemn pledge

In Yug Nirman Sat-sankalpa* (the solemn pledge for ushering in the new era of bright future for all), there is an ardent call for making wisdom excel everywhere. We should learn to make use of our wisdom to rationalize each and every thing. We should do only what is right and worth doing and adopt only that which is worth adopting. If a question crops up in our mind about what people might think or say about our out of the ordinary actions or conduct, we should recall that there are two types of people—those who are sensible and those who are senseless

The voice of a few sensible people is as powerful as that of the hordes of senseless people. There has always been dearth of sensible people in this world. There may be a very few lions compared to flocks of jackals living in a forest. However, the roar of only one lion stands out a mile among the yells and yaps of thousands of jackals. In the same way, if only a few of sensible people happen to firmly resolve to take some prudent initiatives, they can make widely prevalent badness crumble to pieces in the same way as the sunrise makes the early morning mist disappear. This need to be done and must be done to steer the capabilities and resources of the mankind into desirable positive direction.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- 66 (5.12)

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

👉 पाप का भागी कौन—पाप किसने किया

एक ब्राह्मण ने बगीचा लगाया। उसे बड़े मनोयोगपूर्वक सम्हालता, पेड़ लगाता, पानी देता। एक दिन गाय चरती हुई बाग में आ गई और लगाये हुए कुछ पेड़ चरने लगी। ब्राह्मण का ध्यान उस ओर गया तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने एक लठ्ठ लेकर उसे जोर से मारा। कोई चोट उस गाय पर इतने जोर से पड़ी कि वह वहीं मर गई। गाय को मरा जानकर ब्राह्मण बड़ा पछताया। कोई देख न ले इससे गाय को घसीट के पास ही बाग के बाहर डाल दिया। किन्तु पाप तो मनुष्य की आत्मा को कोंचता रहता है न। उसे सन्तोष नहीं हुआ और गौहत्या के पाप की चिन्ता ब्राह्मण पर सवार हो गई।

बचपन में कुछ संस्कृत ब्राह्मण ने पढ़ी थी। उसी समय एक श्लोक उसमें पढ़ा जिसका आशय था कि हाथ इन्द्र की शक्ति प्रेरणा से काम करते हैं, अमुक अंग अमुक देवता से। अब तो उसने सोचा कि हाथ सारे काम इन्द्र शक्ति से करता है तो इन हाथों ने गाय को मारा है इसलिए इन्द्र ही गौहत्या का पापी है मैं नहीं?

मनुष्य की बुद्धि की कैसी विचित्रता है जब मन जैसा चाहता है वैसे ही हाँककर बुद्धि से अपने अनुकूल विचार का निर्णय करा लेता है। अपने पाप कर्मों पर भी मिथ्या विचार करके अनुकूल निर्णय की चासनी चढ़ाकर कुछ समय के लिए कुनैन जैसे कडुए पाप से सन्तोष पा लेता है।

कुछ दिनों बाद गौहत्या का पाप आकर ब्राह्मण से बोला—मैं गौहत्या का पाप हूँ तुम्हारा विनाश करने आया हूँ।

ब्राह्मण ने कहा—गौहत्या मैंने नहीं की, इन्द्र ने की है। पाप बेचारा इन्द्र के पास गया और वैसा ही कहा। इन्द्र अचम्भे में पड़ गये। सोच विचारकर कहा—‛अभी मैं आता हूँ।’ और वे उस ब्राह्मण के बाग के पास में बूढ़े ब्राह्मण का वेश बनाकर गये और तरह−तरह की बातें कहते करते हुए जोर−जोर से बाग और उसके लगाने वाले की प्रशंसा करने लगा। प्रशंसा सुनकर ब्राह्मण भी वहाँ आ गया और अपने बाग लगाने के काम और गुणों का बखान करने लगा। “देखो मैंने ही यह बाग लगाया है। अपने हाथों पेड़ लगाये हैं, अपने हाथों से सींचता हूँ। सब काम बाग का अपने हाथों से करता हूँ। इस प्रकार बातें करते−करते इन्द्र ब्राह्मण को उस तरफ ले गये जहाँ गाय मरी पड़ी थी। अचानक उसे देखते इन्द्र ने कहा। यह गाय कैसे मर गई। “ब्राह्मण बोला—इन्द्र ने इसे मारा है।”

इन्द्र अपने निज स्वरूप में प्रकट हुआ और बोला—‟जिसके हाथों ने यह बाग लगाया है, ये पेड़ लगाये हैं, जो अपने हाथों से इसे सींचता है उसके हाथों ने यह गाय मारी है इन्द्र ने नहीं। यह तुम्हारा पाप लो।” यह कहकर इन्द्र चले गये। गौ हत्या का पाप विकराल रूप में ब्राह्मण के सामने आ खड़ा हुआ।

भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे किन्तु अन्त में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता है। पाप जिसने किया है उसी को भोगना पड़ता, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य की भूल है कि वह तरह−तरह की युक्तियों से, पाप से बचना चाहता है। अतः जो किया उसका आरोप दूसरे पर न करते हुए स्वयं को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए।


👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४८)

विदेह एवं प्रकृतिलय पाते हैं—अद्भुत अनुदान

प्रकृतिलय की अवस्था और भी उत्कृष्ट है। प्रकृतिलय योगी का देह से नाता टूटने के साथ प्रकृति के साथ भी तादात्म्य नहीं रहता। ऐसे योग साधकों के लिए न तो देह का कुछ महत्त्व और न ही संसार का। इनके लिए न कोई अभिव्यक्ति और न ही संसार है। ऐसे योगी बस एक बार जन्म लेते हैं। उनके इस जन्म का कारण बस इतना होता है कि उन्हें अपने वचन पूरे करने हैं, बहुत सारे कर्म गिरा देने हैं। सारा पिछला बेबाक करना है। वे तो बस देते हैं, माँगते नहीं-चुकाते हैं। प्रकृतिलय योगियों की कोई भी चाहत नहीं होती। उन्हें भला चाहत कैसे हो सकती है? वे तो बस अपने दिये हुए वचनों को निभाने आते हैं। अपने किन्हीं कर्म बीजों को नष्ट करने के लिए देह धारण करते हैं।
     
परम पूज्य गुरुदेव ऐसे महान् योगियों में महर्षि रमण का नाम लेते हैं। गुरुदेव के अनुसार महर्षि को बचपन से ही प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त हुई। देह से उनका तादात्म्य तो जैसे था ही नहीं। किशोरावस्था के लगभग जब उन्हें मृत्यु का अनुभव हुआ, तब तो उनकी दशा नितान्त भिन्न हो गयी। ऐसी भावदशा उन्हें उपलब्ध हुई कि न तो दैहिक तादात्म्य रहा और न ही प्रकृति तथा संसार का कोई नाता बचा। सत्तरह वर्ष की अवस्था में ही वह तिरुवलामल्लाई तप के लिए आ गये। उनके तप का प्रारम्भ इस जिज्ञासा से हुआ कि मैं कौन हूँ? क्यों देह नहीं हूँ, प्रकृति भी नहीं हूँ, यह सत्य उन्हें सदा से प्रत्यक्ष था। अब तो बस यात्रा को आगे बढ़ाना था। सो उन्होंने प्रयत्नपूर्वक यात्रा आगे बढ़ाई। सहज ही आत्मबोध हुआ, साथ ही कर्मबीज भी समयानुसार नष्ट होते गये। महर्षि रमण के तप के प्रभाव से समूचा देश भी प्रभावित एवं प्रकाशित हुआ।
    
विदेह एवं प्रकृतिलय अवस्था प्राप्त महायोगियों का जीवन कई अर्थों में विलक्षण व अद्भुत होता है। इस सम्बन्ध में भगवान् बुद्ध के जीवन की एक घटना बड़ी ही भाव भरी है। निर्वाण के अनुभव के बाद भी भगवान् तथागत मौन थे। मगध सम्राट् के साथ अन्य कई राज्यों के नरेश उनसे प्रार्थना कर चुके थे कि वे कुछ बोलने की कृपा करें। निर्वाण के परम अनुभव के बारे में बतायें। परन्तु भगवान् हर बार यह कहकर टाल जाते कि अभी ठीक समय नहीं आया। एक दिन अचानक तथागत ने घोषणा की कि वह पंचशाल गाँव में अपना पहला प्रवचन करेंगे। सम्राटों के आग्रह को अस्वीकार कर एक सामान्य गाँव में प्रवचन। और इस गाँव में वैसे भी कुछ ही झोपड़ियाँ थी। तथागत की घोषणा से गाँव के लोग तो जैसे उद्वेलित हो गये।
    
हर्ष एवं आश्चर्य से उद्वेलित-उत्तेजित गाँव के लोगों के बीच भगवान् बुद्ध प्रवचन हेतु पहुँच गये। सभी तैयारियाँ जैसे-तैसे पूरी की गयी। परन्तु भगवान् को जैसे अभी भी किसी की प्रतीक्षा थी। तभी एक हरिजन युवती आयी और बुद्ध ने प्रवचन प्रारम्भ किया। प्रवचन की समाप्ति के बाद लोग पूछने लगे-क्या आप इसी युवती का इन्तजार कर रहे थे? बुद्ध मुस्कराये और बोले-हाँ, मुझे इसी की प्रतीक्षा थी। मैंने इसे पिछले जन्मों की यात्रा में वचन दिया था कि महाबोधि का प्रथम अनुभव मैं सर्वप्रथम इसे बताऊँगा। बस वह वचन पूरा करना था। सो आज पूरा हुआ। ‘असम्प्रज्ञात को उपलब्ध’ व्यक्ति इसी भावदशा में जीता है, यह भावदशा जन्मान्तर की साधना के अलावा प्रयत्नपूर्वक भी इस जीवन में पायी जा सकती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 दो परस्पर विरोधी मार्ग

गुबरीले कीड़े का और भौंरे का उदाहरण स्पष्ट है। गंदा कीड़ा केवल गंदगी, गोबर और विष्ठा की तलाश में बगीचा ढूँढ़ डालता है और अपनी अभीष्ट वस्तु ढूँढ़कर ही चैन लेता है। इसके विपरीत भौंरा फूलों पर ही दृष्टि रखता है। उन्हीं पर बैठता है और सुगंधि का आनन्द लाभ करता है। उसे पता भी नहीं चलता कि इस बाग में कहीं गोबर पड़ा हुआ है भी या नहीं। बगीचे में गोबर भी पड़ा रहता है और फूल भी होते हैं पर गंदा कीड़ा अपनी मनोवृत्ति के अनुरूप चीज ढूँढ़कर अपने आपको उस गंदगी से गंदा करता है और दूसरों की दृष्टि में घृणित भी बनता है। भौंरे की मनोवृत्ति उस गन्दे कीड़े से भिन्न होती है इसलिए उसे गुलाब के सुगन्धित पुष्पों का रस भी मिलता है और कवियों द्वारा प्रशंसा का अधिकारी भी बनता है। हम में से कुछ लोग गन्दे गुबरीले कीड़े का उदाहरण बनते हैं और कुछ भौंरों के पद चिह्नों पर चलते है। इन दोनों मार्गों में से हम भी अपने लिए कोई एक मार्ग चुन सकते हैं और उसी के अनुरूप घृणित एवं उत्कृष्ट परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। छिद्रान्वेषण गन्दे गुबरीले कीड़े की मनोवृत्ति है और गुण ग्राहकता सुरुचिपूर्ण भौंरे की, जो अपने को पसंद लगे उसे आसानी से स्वभाव का अंग बना सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४७)

विदेह एवं प्रकृतिलय पाते हैं—अद्भुत अनुदान

श्रद्धा अनूठी सेतु है। हृदय में यह प्रगाढ़ हो, तो देश एवं काल की दूरियाँ भी सिमट जाती हैं। लोक-लोकान्तर के सत्य पलक झपकते ही भाव चक्षुओं के सामने आ विराजते हैं। दिव्य लोकों में तपोलीन ऋषि सत्तायें भी हृदयाकाश में प्रत्यक्ष होकर मार्गदर्शन देती हैं। यह उद्गार मात्र एक काल्पनिक विचार भर नहीं, एक जीवन्त अनुभूति है। महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म सहचर्य भी यह अनुभव करा सकती है, जिसके बाद अन्तर्यात्रा का यह पथ आनंद से कट जाता है।
    
साधकों को योगानंद का अनुभव करा रहे महर्षि पतंजलि अब बताते हैं कि असम्प्रज्ञात समाधि किसे उपलब्ध होती है? वे कहते हैं-
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १/१९॥
शब्दार्थ - विदेहप्रकृतिलयानाम् = विदेह एवं प्रकृतिलय योगियों का (उपर्युक्त योग); भवप्रत्ययः = भव प्रत्यय (जन्म होने से ही सहज प्राप्त) कहलाता है।
    
अर्थात्  विदेहियों और प्रकृतिलयों को असम्प्रज्ञात समाधि सहज ही उपलब्ध होती है। क्योंकि अपने पिछले जन्म में उन्होंने अपने शरीरों के साथ तादात्म्य बनाना समाप्त कर दिया था। वे फिर से जन्म लेते हैं, क्योंकि इच्छा के बीज बने रहते हैं।
    
विदेह एवं प्रकृतिलय बड़े ही सौन्दर्यपूर्ण शब्द हैं। इनमें आध्यात्मिक भावों का अवर्णनीय सौन्दर्य समाया है। इनमें से विदेह का अर्थ है-जो जान लेता है कि अब वह देह नहीं है। यह अनूठी स्थिति उसे असम्प्रज्ञात समाधि के बाद ही उपलब्ध होती है। असम्प्रज्ञात समाधि की विभूतियाँ तो उसे पिछले जन्म में ही प्राप्त हो चुकी। इस जन्म में तो वह प्रारम्भ से ही असम्प्रज्ञात का वैभव धारण किये हुए जन्मता है। उसे जीवन की शुरुआत से ही इस सत्य का सम्पूर्ण बोध होता है कि वह देह नहीं है। देह तो उसने सिर्फ इसलिए धारण की है कि पिछले कर्मों का हिसाब-किताब बराबर करना है। पिछले कर्म बीजों को नष्ट करना है। कर्मों का सारा खाता बराबर करना है। ऐसे विदेह योगियों का जन्म तो बस समाप्त हो रहे हिसाबों से बना होता है। हजारों जन्म, अनगिन सम्बन्ध, बहुत सारे उलझाव और वादे, हर चीज को समाप्त करना है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४६)

जिससे निर्बीज हो जाएं सारे कर्म संस्कार

परम पूज्य गुरुदेव इस भाव सत्य को अपने वचनों में कुछ यूँ प्रकट करते थे। वह कहते थे कि निष्काम कर्म करते हुए मन शुद्ध हो जाता है। विचार और भावनायें धुल जाती हैं, तो सम्प्रज्ञात समाधि की झलक मिलती है। लेकिन इस शुद्धतम अवस्था में भी मन तो बना ही रहता है, लेकिन यह जब मन ही विलीन हो जाता है, तो समझो कि असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध हो गयी। पहली अवस्था में काँटे हट जाते हैं, छट जाते हैं, तो दूसरी अवस्था में फूल भी गायब हो जाते हैं।
    
असम्प्रज्ञात समाधि की यह भाव दशा बड़ी अजब-गजब है। साधारण तौर पर सामान्य मनुष्य तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकता। मनोलय, मनोनाश की कल्पना करना, इसमें निहित सच्चाई की अनुभूति करना अतिदुर्लभ है, क्योंकि साधारण तौर पर तो सारी की सारी जिन्दगी मन के चक्कर काटते, मन की उलझनों में उलझते बीतती है। एक विचार, एक कल्पना से पीछा नहीं छूटता कि दूसरी आ धमकती है। यही सिलसिला चलता रहता है। अनवरत-निरन्तर यही प्रक्रिया गतिशील रहती है। हाँ, यह जरूर होता है कि कभी अच्छी कल्पनायें, अच्छे विचार उपजते हैं, तो कभी बुरे विचार और बुरी कल्पनायें सताती हैं।
    
पहली समाधि की दशा जिसे सम्प्रज्ञात कहते हैं, उसमें बुराई गिर जाती है। मन की सारी अशुद्धता तिरोहित हो जाती है। दूसरी अवस्था में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में अच्छाई भी गिर जाती है। यहाँ तक कि अच्छाई या शुद्ध अवस्था को धारण करने वाला मन भी समाप्त हो जाता है। मन की यह समाप्ति प्रकारान्तर से देह बोध की समाप्ति है। इस अवस्था में देह के पृथक होने का अहसास होता है। अभी हम कितना ही कहते रहें कि मैं अलग और मेरी देह अलग। परन्तु यह बात होती निरी सैद्धान्तिक है। अनुभूति के धरातल पर इसकी कोई कीमत नहीं है। जब तक मन रहता है, तब तक हम सदा देह से चिपके रहते हैं। देह की चाहतें, देह के सुख-दुःख हमें लुभाते या परेशान करते रहते हैं।
    
लेकिन मन के गिरने के बाद, असम्प्रज्ञात दशा में देह और दैहिक व्यवहार का संचालन मन की गहरी परत में, चित्त में दबे हुए अप्रकट संस्कार करते हैं। अतीत के कर्मबीज, विगत जन्मों का प्रारब्ध-बस इसी के द्वारा जीवन की सारी गतिविधियाँ चलती रहती हैं। ध्यान रहे, इस असम्प्रज्ञात भाव दशा में नये कर्म बीज नहीं इकट्ठे होते, क्योंकि इनको इकट्ठा करने वाला मन ही जब नहीं रहा, तो फिर ये किस तरह इकट्ठा होंगे। अब तो बस जो कुछ अतीत का लेन-देन है, उसी का समाप्त होना बाकी रह जाता है। कुछ भी नये  की कोई गुंजाइश या उम्मीद नहीं रहती है।
    
इस सत्य को हम इस तरह भी अनुभव कर सकते हैं कि हम असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा वृक्ष तो मिटा देते हैं। यहाँ तक कि उसकी जड़ें भी खोद देते हैं। फिर भी जो बीज धरती पर पड़े रह गये हैं, वे तो अभी फूटेंगे। ज्यों-ज्यों उनका मौसम आयेगा, वे अंकुरित होते चलेंगे। असम्प्रज्ञात समाधि के बावजूद जीवन और मरण का चक्र तो बना ही रहता है। हाँ, यह जरूर है कि जीवन की गुणवत्ता भिन्न होती है। लेकिन जन्म तो लेना ही पड़ेगा, क्योंकि बीज अभी जले नहीं है। जो व्यक्त था, वह तो कट चुका, परन्तु जो अव्यक्त है, वह तो अभी भी बाकी है। असम्प्रज्ञात समाधि सबीज समाधि है। इन बीजों के कारण योग साधक का जन्म होता है, जो अद्भुत होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

👉 एक विश्वास

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा  दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई.

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैं ने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था :

आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम.
आप का, अमर.

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए.

एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनयविनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता. मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नजारा देखता रहा. पहली नजर में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी, लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी. वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता, फिर वही निराशा.

मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जा कर खड़ा हो गया. वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था. मुझे देख कर उस में फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उस ने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं. मैं ने उस लड़के को ध्यान से देखा. साफसुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण. ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था. पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं फिर भी मैं ने जैसे किसी सम्मोहन से बंध कर उस से पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’

‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’

‘अरे, कुछ तुम ने सोचा तो होगा.’

‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश हो कर बोला.

‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुजार रहा हूं.

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला.

‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’ मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया.

अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था. जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उस के चेहरे पर उड़ेल दी हो. मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ. मैं ने अपना एक हाथ उस के कंधे पर रखा और उस से सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते, क्या बात है. साफसाफ बताओ कि क्या जरूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा. शायद काफी समय निराशा का उतारचढ़ाव अब उस के बरदाश्त के बाहर था.
‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं. मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं. मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है. अब उस में प्रवेश के लिए मुझे पैसे की जरूरत है. कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,’ लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंगरेजी में कहा.

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ मैं ने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा?

‘अमर विश्वास.’

‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो. कितना पैसा चाहिए?’

‘5 हजार,’ अब की बार उस के स्वर में दीनता थी.

‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैं ने थोड़ा हंस कर पूछा.

‘सर, आप ने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं. आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं. मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिस ने इतना पूछा. अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आप को किसी होटल में कपप्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,’ उस के स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी.

उस के स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उस के लिए सहयोग की भावना तैरने लगी. मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था, जबकि दिल में उस की बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था. आखिर में दिल जीत गया. मैं ने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन को मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था, उसे पकड़ा दिए. वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी माने रखते थे, लेकिन न जाने किस मोह ने मुझ से वह पैसे निकलवा लिए.

‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसीलिए कर रहा हूं. तुम से 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी. सोचूंगा उस के लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’ मैं ने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

अमर हतप्रभ था. शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था. उस की आंखों में आंसू तैर आए. उस ने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं.

‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं?’

‘कोई जरूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो. यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना.’
वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैं ने उस का कंधा थपथपाया, कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी.

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था, जिस में अनिश्चितता ही ज्यादा थी. कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा. अत: मैं ने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया.

दिन गुजरते गए. अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी. मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई. एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उस के पते पर फिर भेज दूं. भावनाएं जीतीं और मैं ने अपनी मूर्खता फिर दोहराई.

दिन हवा होते गए. उस का संक्षिप्त सा पत्र आता जिस में 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए, जिसे वह अपनी बहन बोलता था. मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता. मैं ने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उस के पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं, न कभी वह मेरे घर आया. कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा. एक दिन उस का पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है. छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला.

मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ, बिना उस पत्र की सचाई जाने. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा. वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था. मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था. अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी. एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है. शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक?

मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया. मैं ने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया.

शादी की गहमागहमी चल रही थी. मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में. एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी. एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिस की गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले.

मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है. उस ने आ कर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए.

‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला.

मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी. मैं ने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया. उस का बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था. मिनी अब भी संशय में थी. अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार ले कर आया था. मिनी को उस ने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया. मिनी भाई पा कर बड़ी खुश थी.

अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा. उस ने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया. उस के भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए.
इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उस को विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं. हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया और उसी के साथसाथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था.

मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान नहीं हमारा विश्वास ही है.

👉 गुण ग्राहकता ही श्रेष्ठ है

जिनको दूसरों के गुण देखने की आदत है वे बुरे लोगों में भी चतुरता, मुस्तैदी, पुरुषार्थ, साहस आदि गुणों को देखते हैं और उनकी विशेषताओं की प्रशंसा करते हैं। यह ठीक है कि बुराइयों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए, उन्हें रोका जाना चाहिए। पर यह भी ठीक है कि किसी को निन्दा करके या चिढ़ाने से नहीं सुधारा जा सकता। उन परिस्थितियों, समस्याओं और मनोवृत्तियों को सुधारने के लिए प्रयत्न करना होगा जिनके कारण बुराई उत्पन्न होती है। आमतौर से मनुष्य उससे प्रभावित रहता है जो उसकी किसी न किसी अंश में प्रशंसा करता है और उसमें जो थोड़ी बहुत अच्छाई है उसका आदर करता है। मनुष्य अपने विरोधी की नहीं प्रशंसक की बात मान सकता है और यदि सुधार संभव है तो उसी के द्वारा संभव है जिसके प्रति उसके मन में सद्भावना जमीं हुई है। 

यह सद्भावना जमाये रहने में वे ही सफल हो सकते हैं जो सद्भावनायुक्त, गुणग्राही एवं प्रशंसक हैं। इस विशेषता के कारण मनुष्य अजात शत्रु हो जाता है, जो अपने बुरे स्वभाव के कारण शत्रुता करना चाहते हैं वे भी देर तक कर नहीं पाते। सज्जनता के सामने उन्हें एक दिन परास्त ही होना पड़ता है। ऐसे अगणित उदाहरण आये दिन आँखों के सामने उपस्थित होते रहते हैं जिनमें सज्जनता के हथियार से दुर्जनों को परास्त ही नहीं किया गया वरन् उनका हृदय परिवर्तन करके सज्जनता का अनुयायी भी बना लिया गया। शत्रुओं की संख्या घटाने और मित्रों की संख्या बढ़ाने का सबसे उत्तम तरीका यह है कि हम दूसरों की अच्छाइयाँ ढूँढ़ना और उनकी प्रशंसा करना सीखें। इससे दूसरों पर तो अच्छा प्रभाव पड़ता ही है अपना मन भी प्रसन्नता अनुभव करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४५)

जिससे निर्बीज हो जाएं सारे कर्म संस्कार

अन्तर्यात्रा का विज्ञान अन्तर्जगत के नंदनवन में प्रवेश करने के इच्छुक योग साधकों के लिए नेह भरा निमंत्रण है। इसमें उनके लिए आह्वान है, जो अन्तर्यात्रा करने के लिए उत्सुक हैं, जिज्ञासु हैं। जिनमें महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव की योग अनुभूतियों का साझीदार बनने की निष्कपट चाहत है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में उठ रही पुकार उनके लिए है, जो अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक बनना चाहते हैं। अगर ऐसा कुछ आप में है, तो इसे सुनिश्चित सत्य मानें कि महर्षि पतंञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव आपकी अंगुली थामकर आपको कदम दर कदम इस अन्तर्यात्रा पथ पर आपको आगे बढ़ायेंगे। बस, आपको केवल उठकर खड़़ा होना होगा। इसके लिए इस योग कथा की प्रत्येक पंक्ति के प्रत्येक शब्द पर गहनता से मनन करना होगा। 
    
महर्षि बता चुके हैं कि कर्म संस्कारों के निर्बीज होने की संभावना चित्त की असम्प्रज्ञात भावदशा में सम्भव बन पड़ती है। असम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि का कथन है-
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥ १/१८॥
    
शब्दार्थ- विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः= विराम-प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और संस्कारशेषः= जिसमें चित्त का स्परूप ‘संस्कार’ मात्र ही शेष रहता है, वह योग, अन्यः -अन्य है।
अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है और मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है। 
    
सम्प्रज्ञात समाधि का पहला चरण पूरा करने के बाद ही योग साधक को असम्प्रज्ञात अवस्था सुलभ होती है। पहला चरण है—शुद्धता का और दूसरा चरण है- विलीनता का। हालाँकि ये दोनों ही क्रियायें मन की ऊपरी सतह पर ही सम्पन्न होती हैं। भीतरी सतह यानि कि अचेतन मन में पूर्व जन्मों के संस्कार जस के तस बने रहते हैं। इनका नाश अभी भी नहीं होता है। हालाँकि ये अप्रकट रहते हैं। फिर भी इनकी उपस्थिति बरकरार रहती है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

👉 कर्म करो तभी मिलेगा

कौरवों की राज सभा लगी हुई है। एक ओर कौने में पाण्डव भी बैठे हैं। दुर्योधन की आज्ञा पाकर दुःशासन उठता है और द्रौपदी को घसीटता हुआ राज सभा में ला रहा है। आज दुष्टों के हाथ उस अबला की लाज लूटी जाने वाली है। उसे सभा में नंग किया जायेगा। वचनबद्ध पाण्डव सिर नीचा किए बैठे हैं।

द्रौपदी अपने साथ होने वाले अपमान से दुःखी हो उठी। उधर सामने दुष्ट दुःशासन आ खड़ा हुआ। द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी राजों महाराजों, पितामहों को रक्षा के लिए पुकारा, किन्तु दुर्योधन के भय से और उसका नमक खाकर जीने वाले कैसे उठ सकते थे। द्रौपदी ने भगवान को पुकारा अन्तर्यामी घट−घटवासी कृष्ण दौड़े आये कि आज भक्त पर भीर पड़ी है। द्रौपदी को दर्शन दिया और पूछा किसी को वस्त्र दिया हो तो याद करो? द्रौपदी को एक बात याद आई और बोली—‟भगवान् एक बार पानी भरने गई थी तो तपस्या करते हुए ऋषि की लँगोटी नदी में बह गई, तब उसे धोती में से आधी फाड़कर दी थी। कृष्ण भगवान ने कहा—द्रौपदी अब चिन्ता मत करो। तुम्हारी रक्षा हो जायगी और जितनी साड़ी दुःशासन खींचता गया उतनी ही बढ़ती गई। दुःशासन हारकर बैठ गया, किन्तु साड़ी का ओर छोर ही नहीं आया।

यदि मनुष्य का स्वयं का कुछ किया हुआ न हो तो स्वयं विधाता भी उसकी सहायता नहीं कर सकता। क्योंकि सृष्टि का विधान अटल है। जिस प्रकार विधान बनाने वाले विधायकों को स्वयं उसका पालन करना पड़ता है वैसे ही ईश्वरीय अवतार महापुरुष स्वयं भगवान भी अपने बनाये विधानों का उल्लंघन नहीं कर सकते। इससे तो उनका सृष्टि संचालन ही अस्त−व्यस्त हो जायेगा।

इस सम्बन्ध में उन लोगों को सचेत होकर अपना कर्म करना चाहिए जो सोचते हैं कि भगवान सब कर देंगे और स्वयं हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। जीवन में जो कुछ मिलता है अपने पूर्व या वर्तमान कर्मों के फल के अनुसार। बैंक बैलेन्स में यदि रकम नहीं हो तो खातेदार को खाली हाथ लौटना पड़ता है। मनुष्य के कर्मों के खाते में यदि जमा में कुछ नहीं हो तो कुछ नहीं मिलने का। कर्म की पूँजी जब इकट्ठी करेंगे तभी कुछ मिलना सम्भव है। भगवान और देवता क्या करेंगे?

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४४)

जब वैराग्य से धुल जाए मन
    
जबकि वितर्क की भूमि विधेयात्मक है। एक तरह से वितर्क ‘आर्ट ऑफ पॉजिटिव थिंकिंग’ है। विधेयात्मक चिन्तन की कला है। यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला तत्त्व है। जो व्यक्ति आन्तरिक शान्ति पाना चाहता है, उसे वितर्क को अपनाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति ज्यादा प्रकाशमय पक्ष की ओर देखता है। वह फूलों को महत्त्व देता है, काँटों को भूल जाता है। उसके लिए अपने आप ही शुभ और सुन्दर के द्वार खुलते हैं।
    
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि जो व्यक्ति हमेशा पॉजिटिव सोचता है, तो समझो उसका अध्यात्म राज्य में प्रवेश निश्चित है। उसने समाधि के द्वार पर अपना पहला कदम रख दिया। उनका कहना था-विधेयात्मक सोच से विचारणा उदय होती है। विचारणा का अर्थ है-सुव्यवस्थित विचार। इसे विचारों की समग्रता भी कह सकते हैं। गुरुदेव का कहना था कि विचार और विचारशीलता में भारी फर्क है। विचार तो यूँ ही उठते-गिरते रहते हैं, बनते-बिगड़ते रहते हैं। जबकि विचारशीलता अपने अस्तित्व की आन्तरिक गुणवत्ता है। विचारशीलता का अर्थ है-सजग एवं जागरूक बने रहना। यह विचारशीलता सम्प्रज्ञात समाधि की दूसरी भावदशा है। यहाँ चिन्तन की नवीन कोपलें फूटती हैं। चेतना का अँधियारा समाप्त होता है।
    
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि वितर्क यानि की सम्यक् तर्क ले जाता है विचारणा की ओर और विचारणा ले जाती है आनन्द की ओर। इस आनन्द की अनुभूति में अपनी अन्तर्चेतना की पहली झलक मिलती है। सम्प्रज्ञात समाधि की यह ऐसी अवस्था है, जैसे बादल हट गए और हमने क्षण भर के लिए सही चाँद को देख लिया। फिर से बादल घिर आते हैं। इसे कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जैसे हम हिमालय यात्रा पर गए और वहाँ चहुँओर धुंध छायी हुई है। यकायक धुंध हटी और हिमालय के उच्चतम शिखर की शुभ्र धवल ज्योतिर्मय झलक मिल गयी। सच कहें, तो यथार्थ में यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला स्वाद है।
    
आनन्द की यह भावदशा ले जाती है विशुद्ध अंतस् सत्ता की अवस्था में। यह विशुद्ध अंतस् सत्ता ही अस्मिता है। अन्तस् सत्ता का अशुद्ध प्रकटीकरण अहंकार के रूप में होता है। अहंकार में तुलना होती है। यह किसी से ज्यादा होने का सुख हो उठता है। किसी का विरोध करने में, उससे जीवन में इसे बड़ा आनन्द आता है। अहंकार जीवन का नकारात्मक दृष्टिकोण है। जबकि अस्मिता विधेयात्मक दृष्टिकोण की अनुभूति है। इस अनुभूति में अपने स्वरूप की झलक मिलती है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अस्मिता मैं का सम्यक् बोध है, जबकि अहंकार मैं का गलत बोध है। ध्यान की प्रगाढ़ता में अस्मिता की बड़ी सम्मोहक झलक मिलती है। ऐसा लगता है, जैसा सागर के बीच बूँद- जो अपने होने का अहसास तो कर पाती है, परन्तु अलगाव की अनुभूति नहीं कर पाती।

इस तरह सम्प्रज्ञात समाधि में सम्यक् तर्क, सम्यक् विचारणा, आनन्द की अवस्था और ‘हूँ’ पन की या अस्मिता का अनुभव समाया है। इस समाधि की भावदशा में चेतना अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। परन्तु यहाँ अभी कर्मों के संस्कारों के बीज बने रहते हैं। इन्हें निर्बीज करने के लिए समाधि के अगले चरण में प्रवेश आवश्यक है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Prepare Yourself to Receive God's Grace

Someone had left two tubs out in the open. One was facing up, the other was facing down. Rains came and filled the tub with its face up. The other one, facing down remained totally empty. The empty tub was furious. He cursed the other tub as well as the rain. The rain told him, "Don't be upset. I am not prejudiced. I provide water everywhere. The fault is entirely yours. If you turn your face up, I will fill you with water as well."  

The tub got the point and accepted his mistake. Telling this story to his disciples a monk said, "Just like rains, God's grace is showering down everywhere. We must prepare ourselves to receive it by performing Upasana. Worship is not begging for alms, it is about preparing oneself to receive the grace of God.

📖 From Pragya Puran

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

👉 एक अच्छा मनुष्य बनाइएगा

मैं बिस्तर पर से उठा,अचानक छाती में दर्द होने लगा मुझे... हार्ट की तकलीफ तो नहीं है. ..? ऐसे विचारों के साथ. ..मैं आगे वाले बैठक के कमरे में गया...मैंने नज़र की...कि मेरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था...

मैंने ... पत्नी को देखकर कहा...काव्या थोड़ा छाती में रोज से आज ज़्यादा दु:ख रहा है...डाक्टर को बताकर आता हूँ . ..
हां, मगर संभलकर जाना...काम हो तो फोन करना  मोबाइल में देखते देखते ही काव्या बोली...

मैं... एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पहुँचा ... पसीना,मुझे बहुत आ रहा था...एक्टिवा स्टार्ट नहीं हो रहा था...
ऐसे वक्त्त... हमारे घर का काम करने वाला ध्रुव सायकल लेकर आया... सायकल को ताला मारते ही उसे मैंने मेरे सामने खड़ा देखा...
क्यों साब? एक्टिवा चालू नहीं हो रहा है...मैंने कहा नहीं...

आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती साब... इतना पसीना क्यों आया है ? 

साब... स्कूटर को किक इस हालत में नहीं मारते....मैं किक मारके चालू कर देता हूँ ...ध्रुव ने एक ही किक मारकर एक्टिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा..साब अकेले जा रहे हो 

मैंने कहा... हां 
ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते...चलिए मेरे पीछे बैठ जाइए...मैंने कहा तुम्हें एक्टिवा चलाना आता है? साब... गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता  छोड़कर बैठ जाओ...

पास ही एक अस्पताल में हम पहुँचे, ध्रुव दौड़कर अंदर गया, और व्हील चेयर लेकर बाहर आया...
साब... अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ..

ध्रुव के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रही...मैं समझ गया था... फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे..कि अब तक क्यों नहीं आया? ध्रुव ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि... आज नहीँ आ सकता....

ध्रुव डाक्टर के जैसे ही व्यवहार कर रहा था...उसे बगैर पूछे मालूम हो गया था कि, साब को हार्ट की तकलीफ हो रही है... लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU कि तरफ लेकर गया....

डाक्टरों की टीम तो तैयार ही थी... मेरी तकलीफ सुनकर... सब टेस्ट शीघ्र ही किये... डाक्टर ने कहा, आप समय पर पहुँच गए हो....इस में भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया...वह आपके लिए बहुत फायदेमंद रहा...

अब... कोई भी प्रकार की राह देखना... वह आपके लिए हानिकारक होगी...इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे...इस फार्म पर आप के स्वजन के हस्ताक्षर की ज़रूरत है...डाक्टर ने ध्रुव को सामने देखा...

मैंने कहा, बेटे, दस्तखत करने आते है? साब इतनी बड़ी जवाबदारी मुझ पर न रखो...

बेटे... तुम्हारी कोई जवाबदारी नहीं है... तुम्हारे साथ भले ही लहू का संबंध नहीं है... फिर भी बगैर कहे तुमने तुम्हारी जवाबदारी पूरी की, वह जवाबदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी...एक और जवाबदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे लिखकर सही करके लिख दूंगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जवाबदारी मेरी है, ध्रुव ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर  किये हैं, बस अब. ..

और हां, घर फोन लगा कर खबर कर दो...

बस, उसी समय मेरे सामने, मेरी पत्नी काव्या का मोबाइल ध्रुव के मोबाइल पर आया.वह शांति से काव्या को सुनने लगा...

थोड़ी देर के बाद ध्रुव बोला, मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल दो, मगर अभी अस्पताल ऑपरेशन शुरु होने के पहले पहुँच जाओ। हां मैडम, मैं साब को अस्पताल लेकर आया हूँ। डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है, और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है...

मैंने कहा, बेटा घर से फोन था...?

हाँ साब.
मैंने मन में सोचा, काव्या तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही है, और किस को निकालने की बात कर रही हो? आँखों में आंसू के साथ ध्रुव के कंधे पर हाथ रख कर, मैं बोला, बेटा चिंता नहीं करते।।

मैं एक संस्था में सेवाएं देता हूं, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है।
तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है...बेटा. ..पगार मिलेगा, इसलिए चिंता ना करना।

ऑपरेशन बाद, मैं होश में आया... मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था, मैं आँखों में आंसू के साथ बोला, ध्रुव कहाँ है?

काव्या बोली-: वो अभी ही छुट्टी लेकर गांव गया, कहता था, उसके पिताजी हार्ट अटैक में गुज़र गऐ है... 15 दिन के बाद फिर से आयेगा।

अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे में उसका बाप दिखता होगा...

हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया!

पूरा परिवार हाथ जोड़कर, मूक नतमस्तक माफी मांग रहा था...

एक मोबाइल की लत (व्यसन)...अपने व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाता है... वह परिवार देख रहा था....यही नहीं मोबाइल आज घर घर कलह का कारण भी बन गया है बहू छोटी-छोटी बाते तत्काल अपने मां-बाप को बताती है और मां की सलाह पर ससुराल पक्ष के लोगो से व्यवहार करती है परिणामस्वरूप वह बीस बीस साल भी ससुराल पक्ष के लोगो से अपनापा जोड़ नहीं पाती।

डाक्टर ने आकर कहा, सब से पहले यह बताइए ध्रुव भाई आप के क्या लगते?

मैंने कहा डाक्टर साहब, कुछ संबंधों के नाम या गहराई तक न जाएं तो ही बेहतर होगा उससे संबंध की गरिमा बनी रहेगी।

बस मैं इतना ही कहूंगा कि, वो आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था!

पिन्टू बोला :- हमको माफ करो पप्पा... जो फर्ज़ हमारा था, वह ध्रुव ने पूरा किया, वह हमारे लिए शर्मजनक है, अब से ऐसी भूल भविष्य में कभी भी नहीं होगी. ..

बेटा, जवाबदारी और नसीहत (सलाह) लोगों को देने के लिए ही होती है...
जब लेने की घड़ी आये, तब लोग ऊपर नीचे (या बग़ल झाकते है) हो जातें है।

अब रही मोबाइल की बात...

बेटे, एक निर्जीव खिलोने ने, जीवित खिलोने को गुलाम कर दिया है, समय आ गया है, कि उसका मर्यादित उपयोग करना है।

नहीं तो.... परिवार, समाज और राष्ट्र को उसके गंभीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना पड़ेगा।
बेटे और बेटियों को बड़ा अधिकारी या व्यापारी बंनाने की जगह एक अच्छा मनुष्य बनाइएगा।

👉 A TRUE PRAYER

Our prayers should be worthy of us as children of The Divine. We must pray the Almighty to arouse our indwelling love, wisdom and strength, which would support and guide steps in all phases of the revolving wheel of circumstances. We, as sparks of Divine Light, ought to pray for illuminating our inner self with the subliminal glow of divinity so that no storm of hardship or turbulence of ups and downs of life could ever quaver the flame of our faith in the divine origin of our souls.

“Oh Lord! Bless us with strength, courage and wisdom so that we could meet adversities as opportunities to refine our qualities and strengthen our potentials. The roadblocks of obstacles and challenges of the path should serve as harbingers of a brighter tomorrow.” –– Such would be an ideal prayer to elevate the level of our optimism and enthusiasm and would protect us from becoming disheartened, weak or cowardly.

We have to become intrepid warriors of Light and not perplexed fugitives in the battlefield of life.  Prayer is less about asking for things we are attached to than it is about our relinquishing our attachments – thus taking us beyond fear. When we pray, we don’t change the world; we change ourselves. We move away from BEGGING to LETTING – “IN THIS MOMENT I AM HERE, OH DIVINE MASTER, USE ME. LET THY WILL BE DONE THROUGH ME.”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 समाज−सुधार का आधार

व्यक्तियों के समूह का नाम ही तो समाज है। हम सब अपने आपको सुधारें तो समाज का सुधार हुआ ही रखा है। कुछ मूढ़ताऐं, अन्ध−परम्पराएँ, अनैतिकताऐं, संकीर्णताऐं, हमारे सामूहिक जीवन में प्रवेश पा गई हैं। दुर्बल मन से सोचने पर वे बड़ी कठिन बड़ी दुस्तर, बड़ी गहरी जमी हुई दीखती हैं, पर वस्तुतः वे कागज के बने रावण की तरह डरावनी दीखते हुए भी भीतर ही भीतर खोखली हैं। हर विचारशील उनसे घृणा करता है। पर अपने को एकाकी अनुभव करके आस−पास घिरे लोगों की भावुकता से डर कर कुछ कर नहीं पाता। कठिनाई इतनी सी है। इसे कुछ ही थोड़े से विवेकशील लोग, यदि संगठित होकर उठ खड़े हों और जमकर विरोध करने लगें तो उन कुरीतियों को मामूली से संघर्ष के बाद चकनाचूर कर सकते हैं, तोड़−मरोड़ कर फेंक सकते हैं। गोवा की जनता ने जिस प्रकार भारतीय फौजों का स्वागत किया वैसा ही स्वागत इन कुरीतियों से सताई हुई जनता उनका करे जो इन अन्ध परम्पराओं को तोड़−मरोड़ कर रख देने के लिए कटिबद्ध सैनिकों की तरह मार्च करते हुए आगे बढ़ेंगे।

हत्यारा दहेज कागज के रावण की तरह बड़ा वीभत्स−नृशंस एवं डरावना लगता है। हर कोई भीतर ही भीतर उससे घृणा करता है, पर पास जाने से डरता है। कुछ साहसी लोग उसमें पलीता लगाने को दौड़ पड़ें तो उसका जड़ मूल से उन्मूलन होने में देर न लगेगी। दास−प्रथा, देवदासी प्रथा, वेश्या नृत्य, बहु−विवाह, जन्मते ही कन्यावध, भूत पूजा, पशुबलि आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ किसी समय बड़ी प्रबल लगती थीं, अब देखते−देखते उनका नाम निशान मिटता चला जा रहा है। आज जो कुरीतियाँ, अनैतिकताऐं एवं संकीर्णताऐं मजबूती से जड़ जमाये दीखती हैं विवेकशीलों के संगठित प्रतिरोध के सामने देर तक न ठहर सकेंगी। बालू की दीवार की तरह वे एक ही धक्के में भरभरा का गिर पड़ेंगी। विचारों की क्रान्ति का एक ही तूफान इस तिनकों के ढेर को उड़ाकर बात की बात में छितरा देगा। जिस नये समाज की रचना आज स्वप्न सी लगती है, विचारशीलता के जाग्रत होते ही वह मूर्तिमान होकर सामने खड़ी दीखेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४३)

जब वैराग्य से धुल जाए मन

अन्तर्यात्रा का विज्ञान- महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक प्रयोगों का निष्कर्ष है। परम पूज्य गुरुदेव ने बार-बार अपने इस जीवन सत्य को दुहराया है कि अध्यात्म एक सम्पूर्ण विज्ञान है। हाँ, यह अन्तर्जगत् का विज्ञान है, जबकि प्रचलित विज्ञान की अन्य शाखा-प्रशाखाएँ बाह्य जगत् की हैं। उनके एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करनी होगी। दरअसल यह कठिन कार्य है। क्योंकि उनकी शब्दावली तर्क की, विवेचना की, विज्ञान की है, पर उनका संकेत परमात्मा की ओर है, महाभाव की ओर, प्रभु प्रेम के अहोभाव की ओर है। 
     
वैराग्य ऐसा ही शब्द है। कुछ लोगों ने इसका अर्थ जिम्मेदारियों से भाग कर निठल्लेपन से जिंदगी बिताना बना लिया है। पर वास्तव में देखा जाए तो इसका महत्व अनंत है। इसकी  अति दुर्लभ अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि की ओर ले जाती है। यह सम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान  में महर्षि कहते हैं-
वितर्कविचारानंदास्मितारूपानुगमात्सम्प्रज्ञातः॥ १/१७॥

शब्दार्थ- वितर्क विचारानन्दास्मितारूपानुगमात्= वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता- इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (चित्तवृत्ति का समाधान), सम्प्रज्ञातः=सम्प्रज्ञात समाधि है।
अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है, जो वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता के भाव से संयुक्त होती है।
    
दरअसल यह वैराग्य से धुले हुए निर्मल चित्त की सहज परिणति है। इस स्थिति में मन पूरी तरह से सूक्ष्म और शुद्ध हो जाता है। यह इतना शुद्ध एवं सूक्ष्म हो जाता है कि उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं रहती चिपकने की। हालाँकि यह समाधि का पहला चरण है। इसके अगले चरण में तो मन ही नहीं रहता। अ-मन की अवस्था है वह। लेकिन यह जो पहला चरण है, वह भी पुलकन और आनन्द से ओत-प्रोत है। ज्यादातर साधक तो यहीं ठहर जाते हैं। उन्हें आगे बढ़ने की सुध ही नहीं रहती। इस पहले चरण में भी चार भाव दशाएँ हैं।
    
पहली भावदशा है—वितर्क की। यह तर्क का एक खास रूप है। यूँ तर्क साधारण तौर पर तीन रूपों में प्रकट होता है। इनमें से पहली अवस्था है कुतर्क की। यह तर्क की निषेधात्मक स्थिति है। कुतर्क में जीने वालों की नजर हमेशा ही जिन्दगी के अँधेरे पहलुओं पर होती है। उदाहरण के लिए गुलाब के पौधे में सुन्दर फूल होते हैं, लेकिन चुभने वाले काँटे भी होते हैं। कुतर्क वाला व्यक्ति काँटों की गिनती करेगा और अन्ततः यह नतीजा निकालेगा कि वास्तविक सच्चाई तो कांटे ही हैं, यह गुलाब तो निरा भ्रम है। फिर है तर्क-यानि की गोल-गोल चक्करों वाली भुलभुलैया। तर्क में प्रवीण व्यक्ति कितना ही तर्क करे, पर पहुँचेगा कहीं नहीं। वह यूँ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में भटकता हुआ ऊर्जा गँवाएगा। बिना ध्येय का विचार तर्क कहलाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...