मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।
सच्ची उद्देश्य-सिद्धि न्याय पूर्ण तरीकों से ही हो सकती है। तभी वह स्थायी भी होती है। न्याय-संगत साधनों के प्रयोग से मनुष्य को न केवल साध्य की ही प्राप्ति होती है बल्कि उसे साधनकाल में अनेकों अन्य वस्तुओं की भी प्राप्ति हो जाती है जिनका कि मूल्य कभी-कभी उद्देश्य से भी कई गुना अधिक होता है। जो व्यक्ति न्यायपूर्ण तरीकों से धनी बनना चाहता है वह धन पाने के अतिरिक्त अध्यवसाय, मितव्ययिता आदि सद्गुण भी प्राप्त कर लेता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास होना चाहता है वह न केवल बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ ही प्राप्त करता है बल्कि ठोस ज्ञान भी प्राप्त करता है। वह एतर्द्थ ब्रह्मचर्य-धारण करना सीखता है, पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है एवं अपने चित्त को विषय-विलासों से विरत रखता है। विद्याभ्यास और ब्रह्मचर्य के ही मिस से वह चित्त-संयम अथवा योग साधन में प्रवृत्त होता है जिसका कि मूल्य परीक्षा पास कर उपाधियाँ पाने और नौकरी पाने से कम नहीं।
जिस वस्तु को हम न्यायपूर्ण तरीकों से कमाते हैं उसकी रक्षा की योग्यता को हम अपने वंशजों को भी दे जाते हैं। यदि हम अन्यायपूर्ण तरीकों से कोई धन-राशि संचित करते हैं तो हममें उसको प्राप्ति के लिए जितने अध्यवसाय और आत्म-संयम की मात्रा होना चाहिए वह न होगी और फिर हमारी संतान में भी इन गुणों के होने की कम सम्भावना है। यदि हमारी संतान में आत्म-संयम का गुण न होगा तो वह उस धनराशि का दुरुपयोग कर उसे नष्ट कर डालेगी। इस तरह हम देखते हैं कि जिसमें किसी वस्तु के न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती उसमें तथा उसकी संतान में उसकी रक्षा करने की भी सामर्थ्य नहीं रहती। यही कारण है कि हम बहुधा लक्षाधीशों के पुत्रों को अपने जीवन काल में कंगाल होते देखते हैं और भ्रमवश यह समझते हैं कि लक्ष्मी अकारण ही चंचल है।
अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 25
सच्ची उद्देश्य-सिद्धि न्याय पूर्ण तरीकों से ही हो सकती है। तभी वह स्थायी भी होती है। न्याय-संगत साधनों के प्रयोग से मनुष्य को न केवल साध्य की ही प्राप्ति होती है बल्कि उसे साधनकाल में अनेकों अन्य वस्तुओं की भी प्राप्ति हो जाती है जिनका कि मूल्य कभी-कभी उद्देश्य से भी कई गुना अधिक होता है। जो व्यक्ति न्यायपूर्ण तरीकों से धनी बनना चाहता है वह धन पाने के अतिरिक्त अध्यवसाय, मितव्ययिता आदि सद्गुण भी प्राप्त कर लेता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास होना चाहता है वह न केवल बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ ही प्राप्त करता है बल्कि ठोस ज्ञान भी प्राप्त करता है। वह एतर्द्थ ब्रह्मचर्य-धारण करना सीखता है, पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है एवं अपने चित्त को विषय-विलासों से विरत रखता है। विद्याभ्यास और ब्रह्मचर्य के ही मिस से वह चित्त-संयम अथवा योग साधन में प्रवृत्त होता है जिसका कि मूल्य परीक्षा पास कर उपाधियाँ पाने और नौकरी पाने से कम नहीं।
जिस वस्तु को हम न्यायपूर्ण तरीकों से कमाते हैं उसकी रक्षा की योग्यता को हम अपने वंशजों को भी दे जाते हैं। यदि हम अन्यायपूर्ण तरीकों से कोई धन-राशि संचित करते हैं तो हममें उसको प्राप्ति के लिए जितने अध्यवसाय और आत्म-संयम की मात्रा होना चाहिए वह न होगी और फिर हमारी संतान में भी इन गुणों के होने की कम सम्भावना है। यदि हमारी संतान में आत्म-संयम का गुण न होगा तो वह उस धनराशि का दुरुपयोग कर उसे नष्ट कर डालेगी। इस तरह हम देखते हैं कि जिसमें किसी वस्तु के न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती उसमें तथा उसकी संतान में उसकी रक्षा करने की भी सामर्थ्य नहीं रहती। यही कारण है कि हम बहुधा लक्षाधीशों के पुत्रों को अपने जीवन काल में कंगाल होते देखते हैं और भ्रमवश यह समझते हैं कि लक्ष्मी अकारण ही चंचल है।
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