बुधवार, 24 अगस्त 2022

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 4)

🔴  समुद्र में पहुँचे भगवान्

इस बार भगवान् वहाँ से भागकर समुद्र में जा पहुँचे। और कहा कि देखें अब यहाँ मनुष्य कहाँ से आ जायेंगे? द्वारिका के पास बेट द्वारिका नाम की एक जगह है, बस भगवान् वहाँ जा पहुँचे। वह चारों ओर से समुद्र से घिरा हुआ पड़ा था। चारों ओर समुद्र था और बीच में एक टापू था। बस, भगवान् जी वहाँ बैठ गये और वहीं रहने लगे। उन्होंने कहा कि देखें अब हमारे पास मनुष्य कहाँ से आ जायेगा? अब वह हमको खामख्वाह तंग नहीं करेगा। एक बार उनका मन आया कि अपने घर चलना चाहिए लक्ष्मी जी के पास, पर यह अपना वीक प्वाइंट था, क्योंकि लक्ष्मी जी से यह कह करके आये थे कि हम मनुष्यों के पास रहेंगे। और लक्ष्मी जी ने कह दिया था कि आपको वहाँ नहीं जाना चाहिए। मनुष्य बड़े निकम्मे हो गये हैं और अपने ही धंधे में फँस गये हैं। वे अपने जीवन के लक्ष्य को भूल गये हैं। वे आपकी बात सुनेंगे नहीं। एक बार उन्होंने फिर सोचा कि चलो लक्ष्मी जी के पास चलें, मनुष्यों को छोड़ दें। फिर उन्होंने कहा कि भाई! यह तो बड़े शर्म की बात है और उनके सामने नाक नीची करने से क्या फायदा? यहीं रहना चाहिए। भगवान् जी बेट द्वारिका में रहने लगे।

🔵 पशोपेश में भगवान्

मित्रो! लोगों को जब यह पता चला कि भगवान् जी द्वारिका में निवास करते हैं, तो उन्होंने नावें बना लीं, बोट बना लिए और भाग- भागकर वहीं जा पहुँचे। भगवान् ने कहा- ‘‘अब क्या करना चाहिए? पहाड़ पर वे छोड़ने वाले नहीं, जमीन पर वे छोड़ने वाले नहीं। समुद्र में भागकर आये तो भी इनसे पिण्ड नहीं छूटा। अब क्या करना चाहिए।’’ भगवान् जी बहुत दुःखी हो रहे थे, परेशान हो रहे थे और उनकी आँखों से बहुत आँसू आ रहे थे। उन्होंने कहा- ‘‘भाइयो! घर जाते हैं तो ठिकाना नहीं और इनके पास रहते हैं, तो ठिकाना नहीं। अब क्या करना चाहिए? अपनी कोई जगह बनानी चाहिए, जहाँ हम पृथ्वी पर भी बने रहें और लक्ष्मी जी के सामने बेइज्जती भी न हो। हम जमीन पर भी बने रहें और जो अच्छे मनुष्य हमको पाना चाहें, तो आसानी से पा भी सकें। ऐसी जगह भी न चुनी जाय कि कोई अच्छा मनुष्य चाहता हो कि हमको भगवान् मिल जायँ और हम उसे मिल न सकें। ऐसी जगह कहाँ तलाश करें।’’

🔴 विवेक का हो जागरण, तो हो कल्याण

इससे पूर्व के अंक में आप पढ़ चुके हैं कि साहस और विवेक, पात्रता संवर्धन तथा आत्म चिन्तन, जिसने इन चार पर गंभीरता पूर्वक ध्यान दिया, उसका जीवन बदलता चला गया। जिसने इनकी उपेक्षा की, वह पिछड़ता चला गया। हम गहराई तक प्रवेश करें और ढूँढ़ें अनन्त शक्ति एवं शान्ति के स्रोत को। इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव ने एक रोचक कथानक सुनाया है जिसका आधा हिस्सा आप पढ़ चुके हैं। भगवान् ज्ञान बाँटने धरती पर आए पर मनोकामनाओं की लिस्ट लिए आदमी उनसे आशीर्वाद माँगने लगा। घबराए वे पहाड़ पर पहुँचे, मनुष्य वहाँ भी चला गया। क्षुद्र मनुष्य समुद्र में भी पहुँच गया, जब उसे पता चला कि अब भगवान् का डेरा वहाँ है। असमंजस में पड़े भगवान् को अब एक ही सहारा था। इस कथानक का व इस व्याख्यान का भी, अब उत्तरार्द्ध आगे पढ़ें।

🔵 देवर्षि से भेंट

मित्रो! भगवान् जी ऐसी एकांत जगह तलाश करने के लिए सिर खुजला रहे थे, जहाँ कोई पहुँच न सके। इतनी देर में वीणा बजाते हुए कहीं से नारद जी आ गये। उन्होंने कहा कि महाराज जी! आज आपको क्या हुआ? कोई जुकाम, बुखार हो गया है क्या? भगवान् जी ने कहा- ‘‘नहीं नारद जी! जुकाम- बुखार तो कुछ नहीं हुआ।’’ फिर क्या हुआ? कोई लड़ाई- झगड़ा हुआ? नहीं, कोई लड़ाई- झगड़ा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि लड़ाई- झगड़ा भी नहीं हुआ, तो फिर किस्सा क्या है? आप दुःखी क्यों बैठे हुए हैं? भगवान् ने कहा कि हम लोगों के पास आये थे और उन्हें कल्याण का रास्ता बताना चाहते थे। उन्हें सुख और शान्ति का मार्ग बताना चाहते थे। उनको स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द देना चाहते थे और उनको महामानव बनाना चाहते थे। हम उनको यह बताना चाहते थे कि इन्सान भगवान् का बेटा है और भगवान् के तरीके से उसको दुनिया में शान से रहना चाहिए। भगवान् के पास जो आनन्द है, उसका पूरा- पूरा लाभ उठाना चाहिए।

🔴 सही स्थान की तलाश

भगवान् ने कहा ‘‘नारद जी! हम इनको यही सिखाने के लिए आये थे, लेकिन ये मनुष्य बड़े निकम्मे हैं और बड़े स्वार्थी हैं। ये केवल छोटी- छोटी चीजों के लिए ख्वाहिश करते हैं और बड़ी- बड़ी चीजों के लिए इनका मन नहीं है। मैं इनके पास नहीं रहूँगा। भाग जाऊँगा और इनसे दूर रहूँगा; लेकिन मैं अपने घर नहीं जाना चाहता। नारद जी! मैं ऐसी जगह तलाश करना चाहता हूँ, जहाँ मैं बना भी रहूँ, पृथ्वी पर भी रहूँ और मेरा मनुष्यों से सम्बन्ध भी बना रहे। लेकिन मैं दिखाई भी न पड़ूँ। ऐसी जगह मुझे चाहिए, जो दिखाई न पड़े, समुद्र में गया, तो वहाँ भी लोगों ने पकड़ लिया, यहाँ भी लोगों ने पकड़ लिया। पहाड़ पर गया, तो वहाँ भी लोगों ने पकड़ लिया और जमीन पर था, तो वहाँ भी मुझे पकड़ लिया। अब अगर तुम्हारे दिमाग में हो, तो ऐसी जगह बताओ- जहाँ मैं आराम से छिपा बैठा रहूँ और कोई आदमी चाहे, तो आसानी से वह मुझ तक पहुँच सके। ऐसा भी न हो जाये कि चाहने वाला कोई आदमी पहुँच भी न सके और ऐसा भी न हो कि लोग मुझे आसानी से पकड़ लें और तंग करने लगें। ऐसा स्थान बता दीजिए।’’

🔵 आज तक वहीं पर हैं भगवान्

नारद जी ने कहा- ‘‘वाह! भगवन्! आपको इतना भी नहीं मालूम? इतनी बढ़िया जगह है, मैं अभी आपको बताता हूँ। भगवान् जी को नारद जी ने जगह बता दी और भगवान् जी उस दिन के बाद से आज तक उसी जगह पर विराजमान हैं। न वहाँ से हटे, न वहाँ से चले, बिलकुल वहीं बैठे रहते हैं। जमीन पर रहते हैं और वहाँ आसानी से आदमी पहुँच सकता है और जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। भगवान् से वार्तालाप कर सकता है और भगवान् के पास रहने का बहुत फायदा उठा सकता है। तब से लेकर अब तक भगवान् वहीं बैठे हुए हैं। आप पूछना चाहेंगे गुरु जी! हमें भी बता दीजिये। बता दूँ आपको? नहीं, आप किसी से कहना मत। कहेंगे तो नहीं किसी से? कह देंगे, तो नहीं बताऊँगा। कहना मत। नहीं तो सबको मालूम पड़ जायेगा। वे सब वहीं पहुँच जायेंगे और भगवान् जी बहुत नाराज होंगे। वे कहेंगे कि हमने तो अपने को छिपाकर ऐसी जगह रखा था, जहाँ नारद जी ने हमसे कहा था, उन्होंने कहा था कि कोई आदमी आप तक नहीं आएगा। लोग दुनिया में चक्कर काटते रहेंगे और कोई आप तक पहुँच ही नहीं सकेगा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Aug 2022

🔸 बातें बनाना बड़ा सरल है, दूसरों को उपदेश देने में बहुतेरे कुशल होते हैं, किन्तु वास्तविक तथ्य तो यह है कि जो बात अंतरात्मा को लगे उसे कार्य रूप में परिणत कर प्रत्यक्ष किया जाय। कर्म ही संसार में मुख्य तत्त्व है। सफलता के लिए यदि कोई आवश्यक चीज है तो वह कठोर कर्म ही है। बातें बनाना तो शेखचिल्लियों-ढपोरशंखों का काम है। असली मनुष्य वही है जो बात कम करता है, किन्तु काम बहुत अधिक करता है।

◼️ हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा-थोड़ा करके मर रहा है। इस दीपक का तेल शनैः-शनैः चूकता चला जा रहा है। भविष्य की ओर हम चल रहे हैं और वर्तमान को भूत की गोदी में पटकते जाते हैं। यह सब देखते हुए भी हम नहीं सोचते कि क्या वर्तमान का कोई सदुपयोग हो सकता है? जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है वह भविष्य के गर्भ में है। वर्तमान हमारे हाथ में है। हम चाहें तो उसका सदुपयोग करके इस नश्वर जीवन में से कुछ अनश्वर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

🔹 सच्ची कमाई है उत्तम से उत्तम सद्गुणों का संग्रह। संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी सद्गुण से संपन्न है, परन्तु आत्म गौरव का गुण मनुष्यों के लिए प्रभु की सबसे बड़ी देन है। इस गुण से विभूषित प्रत्येक प्राणी को संसार के समस्त जीवों को अपनी आत्मा की भाँति ही देखना चाहिए। सदैव उसकी ऐसी धारणा रहे कि उसके मन, वचन एवं कर्म किसी से भी जगत् के किसी जीव को क्लेश न हो। ऐसी प्रकृति वाला अंत में परब्रह्म को पाता है।

🔸 चाहे किसी भी धर्म को न मानना, परन्तु मनुष्य बनकर रहना बहुत अच्छा है। मूढ़ धर्म को मानना अच्छा नहीं है। मूढ़ धर्म का अर्थ है-धर्म का सत्य, सुंदर और शिव रूप नष्ट करके अथवा धर्म में से मनुष्यता निकालकर उसे मिथ्याचार, पशुता और क्रूरता से जोड़ देना। आजकल वास्तविक धर्म का स्थान इसी मूढ़ धर्म ने ले लिया है और निस्संदेह यह घृणा करने के योग्य है।

🔹 जब कभी आपको क्रोध आवे तो मन ही मन कहिए-दूसरों से गलती हो ही जाती है, मुझे दूसरों की गलतियों पर कु्रद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे गलती करते हैं तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी बड़ी गलती कर उसका प्रतिशोध लूँ। मैं शुभ संकल्प वाला साधक हूँ। शुभ संकल्प के फलित होने के लिए उद्विग्न मन होना उचित नहीं। हम सहिष्णु बनेंगे। दूसरे स्वयं अपनी गलती का अनुभव करेंगे।

◼️ जब भाइयों-भाइयों, मित्रों-मित्रों में भी सभी बातें समान नहीं होती तो साधारण मनुष्यों में तो सदा विचारों का मेल खाते जाना असंभव ही है। यदि विवाद में सफल होना चाहते हो तो विवाद निष्कर्ष के लिए करो, केवल बकवास के लिए नहीं। यदि अपनी बात की सच्चाई में तुम्हें विश्वास हो तो उस पर अड़े मत रहो। दूसरों को उसे समझाने का प्रयत्न करो। अपने पक्ष को स्थापित करना चाहते हो तो युक्तियों से काम लो, अपने अभिमान  के कारण उसे थोपने का प्रयत्न न करो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 23 अगस्त 2022

👉 प्रेम का वास्तविक स्वरूप

निश्चय ही प्रेम और आनंद का उद्गम आत्मा के अंदर है। उसे परमात्मा के साथ जोड़ने से ही अपरिमित और स्थायी आनंद प्राप्त हो सकता है। सांसारिक नाशवान वस्तुओं के कंधे पर यदि आत्मीयता का बोझ रखा जाए तो उन नाशवान वस्तुओं में परिवर्तन होने पर या नाश होने पर सहारा टूट जाता है और उसके कंधे पर जो बोझ रखा था, वह सहसा नीचे गिर पड़ता है, फलस्वरूप बड़ी चोट लगती है और हम बहुत समय तक तिलमिलाते रहते हैं। धन-नाश पर, प्रियजन की मृत्यु पर, अपयश होने पर कितने ही व्यक्ति दहाड़े मार कर रोते-बिलखते और जीवन को नष्ट करते हुए देखे जाते हैं।  

बालू पर महल बनाकर उसे अजर-अमर रखने का स्वप्न देखने वालों की जो दुर्दशा होती है, वही इन हाहाकार करते हुए प्रेमियों की होती है। भौतिक पदार्थ नाशवान् हैं, इसलिए उनसे प्रेम जोड़ना एक बड़ा अधूरा और लॅगड़ा-लूला सहारा है, जो कभी भी टूटकर गिर सकता है और गिरने पर प्रेमी को हृदयविदारक आघात पहुँचा सकता है। प्रेम का गुण तो आनंदमय है।

प्रेम का आध्यात्मिक स्वरूप यह है कि आत्मा का आधार परमात्मा को बनाया जाए। चैतन्य और अजर-अमर आत्मा का अवलंबन सच्चिदानंद परमात्मा ही हो सकता है। इसलिए जड़ पदार्थों से, भौतिक वस्तुओं से, चित्त हटाकर परमात्मा में लगाया जाए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-जुलाई 1945

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Aug 2022

🔹 समय एक ईश्वरीय चक्र है, जिसे परिश्रम के बैंक में भुनाने से नकद संपत्ति मिल जाती है। कर्म परायणता सौभाग्य की कुञ्जी है। जिसके हाथ में यह कुञ्जी होगी, वह अपने आपको सौभाग्यशाली बना लेगा। परमात्मा के भण्डार में सब कुछ भरा हुआ है, पर व्यक्ति के प्रयत्न के आधार पर ही उस भण्डार में से दिया जाता है। अपनी पात्रता से अधिक कोई एक रत्ती भर भी अधिक नहीं पा सकता।

◼️ विवाहोन्माद हिन्दू समाज के रोगग्रस्त शरीर में  सबसे भयंकर गलित कुष्ट है। धन और चरित्र की बर्बादी का यह सबसे विषम और सबसे भयावह छिद्र है। उसे न रोका गया तो शिक्षा, व्यवसाय, आहार, विज्ञान आदि के आधार पर जो कुछ भी प्राप्त किया जा रहा है वह सब इसी छिद्र से होकर धूलि में टपक जाएगा। हर कोई जानता है कि अपने समाज में विवाह बाहर से धूमधाम और भीतर से शोक-संताप से भरे हुए होते हैं। हमें आगे बढ़कर इस अविवेक भरी असुरता से जूझना पड़ेगा। यह कदम अनिवार्य है।

🔸 हमारा मन जब ईमानदारी को छोड़कर बेईमानी की तरफ चलने लगे तो समझना चाहिए कि अब हमारा सर्वनाश निकट आने वाला है। बेईमानी से पैसा मिल सकता है, पर देखो उससे सावधान रहना। उस पैसे को छूना मत, क्योंकि वह आग की तरह चमकीला तो है, पर छूने पर जलाये बिना रह नहीं सकता।

🔹 यदि हम वास्तव में कोई उत्तम कार्य करना चाहते हैं, तो समय का रोना न रोते रहें।  हमारी परिस्थिति, दुनिया की उलझनें तो यों ही चलती रहेंगी और हम सोते-सोते ही पूर्ण आयु समाप्त कर डालेंगे। समय अति अल्प है और हमें कार्य अत्यधिक करना है। वायुवेग से हमारा अमूल्य जीवन कम हो रहा है। समय का अपव्यय जितना रोक सकें, रोकें अवश्य।

◼️ सत्य की कसौटी यह नहीं है कि उसे बहुत, बूढ़े और धनी लोग ही कहते हों। सत्य हमेशा उचित, आवश्यक, न्याययुक्त तथ्यों से एवं ईमानदारी से भरा हुआ होता है। थोड़ी संख्या में, कम उम्र के, गरीब आदमी भी यदि ऐसी बात को कहते हैं तो वह मान्य है। अकेली आपकी आत्मा ही यदि सत्य की पुकार करती है तो वह पुकार लाखों मूर्खों की बक-बक से अधिक मूल्यवान् है।

🔸 अनीति से धन कमाना बुरा है, संपूर्ण शक्तियों को धन उपार्जन में ही लगाये रहना बुरा है, धन का अतिशय मोह, अहंकार, लालच बुरा है, धन के नशे में उचित-अनुचित का विचार छोड़ देना बुरा है, परन्तु यह किसी भी प्रकार बुरा नहीं है कि जीवन निर्वाह की उचित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ईमानदारी और परिश्रमशीलता के साथ धन उपार्जन किया जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 3)

🔴 भगवान् आए धरती पर

इसी उद्देश्य से भगवान् पृथ्वी पर आने की तैयारियाँ करने लगे। लक्ष्मी जी ने कहा ‘अरे! आप तो बेकार परेशान हो रहे हैं। मनुष्य तो आपके काम का रहा नहीं। मनुष्य बड़ा चालाक हो गया है और मनुष्य बहुत छोटा हो गया है, बड़ा संकीर्ण हो गया है। उसके पास जाने से आपको कोई फायदा नहीं।’ भगवान् ने कहा- ‘‘नहीं, मनुष्य तो हमारा बच्चा है। हम तो जायेंगे और मनुष्य के पास रहेंगे और उसको रास्ता बतायेंगे और कर्तव्य बताएँगे।’’ भगवान् जी बैकुण्ठलोक से रवाना हो गये और पृथ्वी पर आये। पृथ्वी पर निवास करने लगे। लोगों से कहा- ‘‘मनुष्यो! हमने तुमको बनाया है और एक काम के लिए बनाया है। उस काम के लिए हम आपको शिक्षा देंगे और आपके दुःखों को दूर करेंगे। शान्ति के लिए आगे बढ़ाएँगे।’’ भगवान् ने मनुष्यों से यह बात कही। मनुष्य आये और भगवान् के पास घूमने लगे, चक्कर काटने लगे। भगवान् उनको ज्ञान की बातें बताने लगे, शिक्षा की बात बताने लगे। आत्मकल्याण की बात बताने लगे। परोपकार की बात बताने लगे। सेवा की बात बताने लगे। लेकिन मनुष्यों ने उसको सुनने से इंकार कर दिया।

🔵 मनोकामनाओं की लिस्ट

मनुष्यों ने कहा- ‘‘भगवान् जी! इन बातों की हमको जरूरत नहीं है।’’ तो फिर किस बात की जरूरत है? उन्होंने कहा कि महाराज जी! आप तो बतायें कि हमको खाँसी आ जाती है। हमको बुखार आ जाता है। आप हमारा बुखार अच्छा कर दीजिए। किसी ने कहा कि महाराज जी! हमारे ऊपर मुकदमा चल रहा है और आप मुकदमा ठीक करा दीजिए। किसी ने कहा कि महाराज जी! हमारा ब्याह नहीं हुआ है और हमारी इतनी उमर हो गयी और हमको अच्छी से अच्छी लड़की नहीं मिलती। किसी ने कहा कि महाराज जी! हमारी कन्या बाईस साल की हो गयी है। हम उसके लिए लड़का ढूँढ़ते हैं, मिलता नहीं। लोग ज्यादा से ज्यादा दहेज माँगते हैं। किसी ने कहा कि महाराज जी! हमारा ये काम करा दीजिये, वो काम करा दीजिये। भगवान् ने कहा- ‘‘लोगो! यह तुम्हारा काम है। हमारा काम नहीं है’’ लोगों ने कहा कि महाराज जी! यही आपके काम हैं और आप ही यह काम किया कीजिए।

🔴 भगवान् को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि हम ज्ञान देने के लिए आये थे, मनुष्य जीवन का उद्देश्य बताने के लिए आये थे और शान्ति देने के लिए आये थे और आगे बढ़ाने के लिए आये थे। और ये कमबख्त ऐसे बेवकूफ हैं कि अपने दैनिक जीवन की जो छोटी- मोटी सी आवश्यकताएँ हैं, समस्याएँ हैं, जिनको कि आदमी अपनी अकल को सही रख करके आसानी से पूरी कर सकता है, समस्याएँ हल कर सकता है, उसको हमसे माँगता है। ये आदमी बड़े खराब हैं। भगवान् नाराज हो गये और उन्होंने अपना बिस्तर उठाया, अपना सामान उठाया, अटैची उठायी और चलने लगे।

🔵 पहाड़ पर प्रभु। वहाँ भी पहुँचा मानव

भगवान् जी को गुस्सा आया, तो उन्होंने विचार किया कि ऐसी जगह चलना चाहिए जहाँ कोई पहुँच न सके। सो वे पहाड़ के ऊपर चले गये। वे कैलाश पर्वत पर रहने लगे। लोगों ने कहा कि भगवान् जी को तलाश करना चाहिए और वहाँ चलना चाहिये और अपनी दिक्कतें बतानी चाहिए और वहीं से आशीर्वाद लाना चाहिए। भगवान् जी कैलाश पर्वत पर मानसरोवर के पास बैठे हुए थे। बस, लोगों ने रास्ता ढूँढ़ा। कौन सा रास्ता है? नैनीताल के पास से जाता है, अल्मोड़ा के पास से जाता है। तिब्बत तक का रास्ता ढूँढ़ते हुए पहाड़ों पर होते हुए कैलाश पर्वत तक वे जा पहुँचे। भगवान् ने कहा कि धक्के खाकर के मनुष्य मेरे पास आ गया, चलो अच्छा हुआ।

भगवान् ने कहा- ‘‘बच्चों! तुम्हारे पास सारी शक्तियाँ हैं और सारी सुविधाएँ है, जो मैंने तुम्हारे भीतर दबाकर रख दी हैं। तुमको उन्हें अपने भीतर तलाश करना चाहिए और तुमको अपना जीवन अच्छा बनाना चाहिए। जैसे ही तुम अपना जीवन अच्छा बनाओगे, सारी ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ, सारे सुख और सारी सुविधाएँ अनायास ही आती हुई चली आयेंगी।’’ लोगों ने कहा कि महाराज जी! यह तो बड़े झगड़े का काम है और बहुत झंझट का काम है। हम अपने आपको कैसे सिद्ध करेंगे और कैसे मन को नियंत्रित करेंगे? और कैसे इन्द्रियों का निग्रह करेंगे? सेवा के लिए हम मन कहाँ से लायेंगे और ऐसे कैसे करेंगे? यह हमसे नहीं हो सकता और हम नहीं करेंगे। भगवान् ने कहा- ‘फिर क्या करोगे?’ हम तो महाराज जी! बस आपका आशीर्वाद माँगेंगे और अपना फायदा करायेंगे आपसे।

🔴 क्षुद्र और क्षुद्रतम हम

भगवान् जी को फिर गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि हम इसीलिए तो भाग करके यहाँ आये थे। हमने तुमको सारी विद्याएँ दे दीं, मजबूत कलाइयाँ दे दीं, अक्ल दे दी, सब काम कर दिया और इस लायक बना दिया कि अपने इस शरीर की जरूरतों को स्वयं पूरा कर लिया करो। और तुम हो कि शरीर की जरूरतों को भी पूरा कराने के लिए हमारे पास चले आते हो। यह बड़ी खराब बात है। हम तो तुम्हारी आत्मा को बढ़ायेंगे। लोगों ने कहा कि आत्मा को बढ़ाने की जरूरत नहीं है। हम तो आपसे अपने शरीर की चीजों को माँगेंगे। भगवान् जी को फिर नाराजगी हुई और वे फिर वहाँ से भाग खड़े हुए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 6)

 
👉 पहाड़ पर प्रभु। वहाँ भी पहुँचा मानव


🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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रविवार, 21 अगस्त 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Aug 2022

■ विचार आपसे कहते हैं-हमें मन के जेलखाने में ही घोटकर मत मारिए, वरन् शरीर के कार्यों द्वारा जगत् में आने दीजिए। मनुष्य उत्तम लेखक, योग्य वक्ता, उच्च कलाविद् एवं वह जो भी चाहे सरलतापूर्वक बन सकता है, लेकिन एक शर्त पर, वह शर्त है कि वह अपने शुभ संकल्पों को क्रियाशील कर दे। उन्हें दैनिक जीवन में कर दिखावे। जो कुछ सोचता-विचारता है, उसे परिश्रम द्वारा, प्रयत्न द्वारा, अपनी सामर्थ्य द्वारा साक्ष्य का रूप प्रदान करे। शुद्ध विचारों की उपयोगिता तभी प्रकट होगी, जब अंतःकरण के चित्रों को शरीर के कार्यों द्वारा क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया जाएगा।

◆ क्षमा न करना और प्रतिशोध लेने की इच्छा रखना दुःख और कष्टों के आधार हैं। जो व्यक्ति इन बुराइयों से बचने की अपेक्षा उन्हें अपने हृदय में पालते-बढ़ाते रहते हैं वे जीवन के सुख और आनंद से वंचित रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक प्रकाश का लाभ नहीं ले पाते। जिसके हृदय में क्षमा नहीं, उसका हृदय कठोर हो जाता है। उसे दूसरों के प्रेम, मेलजोल, प्रतिष्ठा एवं आत्म-संतोष से वंचित रहना पड़ता है।

■ स्वर्ग और नरक मनुष्य के आगे-पीछे रहते हैं और सदा साथ-साथ चलते हैं। आगे स्वर्ग है, पीछे नरक। जब मनुष्य आगे की ओर अर्थात् उच्चता, महानता और श्रेष्ठता के प्रकाश-पूर्ण सत्पथ पर चलता है तो उसका हर एक कदम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करता हुआ  पड़ता है। इसके विपरीत जब मनुष्य पीठ पीछे की ओर नीचता के, पाप के, मलीनता के निकृष्ट एवं अंधकार के गर्त में फिसलता है, तो उसका हर एक कदम भयंकर नरक में धँसता जाता है।

■ कष्ट और कठिनाई का व्यवधान उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहता है। ऐसी एक भी सफलता नहीं है जो कठिनाइयों से संघर्ष किये बिना ही प्राप्त हो जाती है। जीवन के महत्त्वपूर्ण मार्ग विघ्न-बाधाओं से सदा ही भरे रहते हैं। यदि परमात्मा ने सफलता का कठिनाई के साथ गठबंधन न किया होता, उसे सर्वसुलभ बना दिया होता तो मनुष्य जाति का वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता। तब सरलता से मिली हुई सफल्ता बिलकुल नीरस एवं उपेक्षणीय हो जाती। जो वस्तु जितनी कठिनता से जितना खर्च करके मिलती है, वह उतनी ही आनंददायक होती है।

◆ आकस्मिक विपत्ति का सिर पर आ पड़ना मनुष्य के लिए सचमुच बड़ा दुःखदायी है। इससे उसकी बड़ी हानि होती है, किन्तु उस विपत्ति की हानि से अनेकों गुनी हानि करने  वाला एक और कारण है, वह है-विपत्ति की घबराहट। विपत्ति कही जाने वाली मूल घटना चाहे वह कैसी ही बड़ी क्यों न हो, किसी का अत्यधिक अनिष्ट नहीं कर सकती, परन्तु विपत्ति की घबराहट ऐसी दुष्टा, पिशाचिनी है कि वह जिसके पीछे पड़ती है उसके गले से खून की प्यासी जोंक की तरह चिपक जाती है और जब तक उस मनुष्य को पूर्णतया निःसत्व नहीं कर देती, तब उस उसका पीछा नहीं छोड़ती।

■ सफलता का मार्ग खतरों का मार्ग है। जिसमें खतरों से लड़ने का साहस और संघर्ष में पड़ने का चाव हो, उसे ही सिद्धि के पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए। जो खतरों से डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने से भय लगता है, कठोर परिश्रम करना जिन्हें नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करनी चाहिए। अदम्य उत्साह, अटूट साहस, अविचल धैर्य, निरन्तर परिश्रम और खतरों से लड़ने वाला पुरुषार्थ ही किसी का  जीवन सफल बना सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 2)

🔴 घड़ा पक्का होना चाहिए

कच्चा घड़ा लेकर वह व्यक्ति कुएँ पर गया। रस्सी बाँधी और रस्सी बाँधकर के उसको कुएँ में डुबोया। खींचते- खींचते घड़े का बहुत सारा हिस्सा, कोना टूट- फूट गया। किसी तरीके से थोड़ा- बहुत पानी लेकर वह घड़ा ऊपर आया। घड़े को उसने सिर पर रखा, हाथ पर रखा। सुकरात के पास उसे लेकर जब तक वह पहुँचा, मिट्टी का वह घड़ा बिखर गया। उसने सुकरात से कहा कि- भगवन्! जो घड़ा आपने मुझे पानी भरने के लिए दिया था वह रास्ते में ही बिखर गया। उन्होंने कहा- ‘ठीक यही फिलॉसफी भगवान् का प्यार प्राप्त करने और भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करने की है।’ कच्चा घड़ा अपने भीतर पानी को धारण नहीं कर सका। उसके लिए जरूरत इस बात की पड़ती है कि घड़ा पक्का हो। अगर हमारे पास पक्का घड़ा है, तो पानी भर जायेगा, ठंडा रहेगा, बेतकल्लुफ खड़ा रहेगा और पानी हमको मिल जायेगा। अगर घड़ा कच्चा है, तो पानी बिखर जायेगा। सुकरात ने यह बात उस व्यक्ति से कही।

🔵 संव्याप्त भ्रान्तियाँ 

मित्रो! भगवान् को अपने भीतर धारण करने के लिए पक्का अर्थात् चरित्रवान, पक्का अर्थात् त्यागी, पक्का अर्थात् निष्ठावान्, पक्का अर्थात् व्यक्तित्व से सम्पन्न व्यक्ति होना चाहिए। यही हैं भगवान् की पूजा- उपासना के माध्यम। लेकिन क्या किया जाय? लोगों ने पिछले दिनों हमको गलत बातें बता दीं, गलत नियम सिखा दिये कि पूजा- उपासना के खेल जैसे कर्मकाण्ड भगवान् का प्यार प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं और हमारे जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करा सकते हैं। हमको अपने जीवन को सुधारने की आवश्यकता नहीं है। हमको अपने आपको महान बनाने की आवश्यकता नहीं है। हम केवल थोड़े से कर्मकाण्ड कर लिया करें, तो हमको शान्ति मिल जायेगी और हमको भगवान् का अनुग्रह मिल जायेगा। इस अज्ञान और भ्रम ने हमारा रास्ता भटका दिया और हम एक मंजिल पर चल सकते थे, थोड़ी दूर तक पहुँच सकते थे, उससे महरूम और वंचित रह गये।

🔵 तीर्थ स्नान से मिलेगी मन की शान्ति? 

मित्रो! एक बार ऐसा हुआ- एक था मल्लाह। बहुत दुःखी बैठा हुआ था और कह रहा था कि मेरे मन में बड़ी अशांति है और मुझे बड़ा दुःख है। अब मुझे भगवान् की तरफ चलना चाहिए और भगवान् से शान्ति प्राप्ति करके लानी चाहिए। क्या किया जाय? क्या न किया जाय? उसके जी में आया कि तीर्थयात्रा के लिए चलना चाहिए और भगवान् के दर्शन करना चाहिए। उसकी स्त्री केशिका ने कहा कि पतिदेव! तीर्थयात्रा जाने से आपको शान्ति नहीं मिलेगी। शान्ति तो अपने भीतर भरी हुई पड़ी है। जब तक हम अपने भीतर के कपाट नहीं खोलेंगे, जब तक अपनी अंतरंग शान्ति के द्वार नहीं खोलेंगे, तब तक किस तरीके से आपको शान्ति मिल सकती है? बाहर शान्ति है कहाँ? जिसको तलाश करने के लिए आप जा रहे हैं? उसने कहना नहीं माना। उसने कहा कि मैं तो तीर्थयात्रा के लिए जाऊँगा और वहाँ से शान्ति लेकर के आऊँगा। मैं तो गंगा स्नान करूँगा और मैं तो जगन्नाथपुरी जाऊँगा और वहाँ से शान्ति ले करके आऊँगा। स्त्री ने मना किया, लेकिन उसका पति बड़ा दुःखी था और खिन्न था और उसको बहुत जल्दी भगवान् की कृपा प्राप्त करने की इच्छा थी।

🔴 पत्नी ने दी शिक्षा

वह तीर्थयात्रा की तैयारियाँ करने लगा। उसकी स्त्री केशिका भी साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। उसने एक रूमाल में चार बैंगन बाँधकर रख दिए और जहाँ- जहाँ पतिदेव ने तीर्थयात्रा की, वहाँ- वहाँ वह स्वयं भी नहायी और पानी में बैंगनों को भी स्नान कराया। जहाँ- जहाँ दर्शन के लिए पतिदेव गये, वहाँ स्वयं भी दर्शन किया और उन चार बैंगनों को भी दर्शन कराया। सारे के सारे तीर्थ यात्रा करने के बाद उसका पति भी आ गया और केशिका भी आ गयी। जब घर आकर के बैठे, तब क्या हुआ कि उसने अपने पति के लिए भोजन बनाया। और वे चार बैंगन जो थे, जो कि सारे के सारे तीर्थों की यात्रा कर चुके थे और सब नदियों में स्नान कर चुके थे, उन बैंगनों की उसने साग बनाया। साग बनाकर पतिदेव की थाली में परोसकर रख दिया, तो पतिदेव को बड़ी दुर्गन्ध आयी।

पतिदेव ने कहा- अरे भागवान्! तूने यह क्या रख दिया? बदबू के मारे मेरी नाक सड़ी जा रही है और मुझे उल्टी होने वाली है। पत्नी ने कहा कि ये वह बैंगन हैं, जो चारों धाम की यात्रा करके आये हैं। ये वह बैगन हैं, जो भगवान् के जितने भी सारे तीर्थ हैं, उनके दर्शन करके आये हैं। इनमें तो सुगंध होनी चाहिए थी? इनमें तो स्वाद होना चाहिए था? उसने कहा- परन्तु इनमें न तो सुगंध है और न स्वाद है, तो मैं किस तरीके से मान लूँ? पत्नी ने कहा कि जब ये बैंगन सुगंध न प्राप्त कर सके, खुशबू प्राप्त न कर सके और स्वाद न प्राप्त कर सके, तो फिर यह तीर्थयात्रा आपको शान्ति दे पायेंगे क्या? भगवान् के दर्शन, कर्मकाण्ड आपको शान्ति दे पायेंगे क्या? मल्लाह के हृदय कपाट खुल गये और उसने अपने भीतर भगवान् को तलाश करना शुरू कर दिया और उसको शान्ति मिली।

🔵 गहराई में प्रवेश करें

मित्रो! भगवान्, जिसके आधार पर यह सारा विश्व टिका हुआ है और मानव की सारी उन्नति उसके कृपा कटाक्ष के ऊपर अवलम्बित है, उसको हमको तलाश करना चाहिए और प्राप्त करना चाहिए। मेरे जीवन का सारे का सारा समय इसी काम में समाप्त हो गया और मेरी साठ साल की जिन्दगी सिर्फ इसी काम में समाप्त हो गयी। भगवान् कहाँ है? और भगवान् को किस तरीके से प्राप्त किया जाये? हमको इसके बारे में थोड़ी गहराई तक जाना पड़ेगा, जैसे कि मुझे मेरे गुरुजी ने गहराई में धकेलने की कोशिश की। मैं चाहता हूँ कि आपको भी गहराई तक धकेल दूँ, ताकि आप वास्तविकता को समझ सकें।

मित्रो! एक बार ऐसा हुआ कि भगवान् जी की इच्छा हुई कि मेरा प्यारा मनुष्य इस पृथ्वी पर निवास करता है और उसके पास मैं चलूँ, उसके पास रहूँ और उसकी खोज- खबर लिया करूँ, उसको शिक्षा दिया करूँ। मैंने बड़ी उम्मीदों और तमन्नाओं से उसको बनाया था। मैं उसको रास्ता बताऊँगा, उसको उसके कर्तव्य बताऊँगा और उसको यह बताऊँगा कि मनुष्य का जीवन कितना महान है और मनुष्य के जीवन से क्या किया जा सकता है? भगवान् जो कार्य स्वयं करता है, उसको मानव भी स्वयं कर सकता है, मैं जा करके ऐसा शिक्षण मनुष्य को दूँगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 Aug 2022

■ संसार की सारी सफलताओं का मूलमंत्र है-प्रबल इच्छा शक्ति। इसी के बल पर विद्या, सम्पत्ति और साधनों का उपार्जन होता है। यही वह आधार है जिस पर आध्यात्मिक तपस्याएँ और साधनाएँ निर्भर रहती हैं। यही वह दिव्य संबल है, जिसे पाकर संसार में खाली हाथ आया मनुष्य वैभवशाली  बनकर संसार को चकित कर देता है। यही वह मोहक और वशीकरण मंत्र है, जिसके बल पर एक अकेला पुरुष कोटि-कोटि जनगण को अपना अनुयायी बना लेता है।

□ हमारा प्रत्येक विचार हमारे पथ में काँटे या पुष्प बिखेरता है। हम जैसा चाहें अपने विचारों की शक्ति द्वारा बन सकते हैं। कोई भी विस्फोटक पदार्थ मनुष्य के प्रचण्ड विचारों से बढ़कर शक्ति नहीं रखता। कोई भी संबंधी, देवी, देवता हमारी इतनी सहायता नहीं कर सकता, जितने हमारे विचार। विचारों द्वारा ही हम शक्ति का केन्द्र मन से निकालते हैं और अपने सबसे बड़े मित्र बन सकते है। अतः जब तक हम अपने विचारों को निम्न, निकृष्ट, खोटी वस्तुओं से हटाकर ऊँचे विषयों में नहीं लगाते, तब तक हमारे विचार परमात्मा की निःसीम शक्ति में सामंजस्य प्राप्त नहीं करते।

◆ हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम शुभ विचारों को क्रियात्मक स्वरूप प्रदान नहीं करते। उनको जीवन व्यतीत करने का मौका नहीं देते। पुस्तकों में वर्णित स्वर्ण सूत्रों को कार्य रूप में परिवर्तित करने के लिए प्रयत्नशील नहीं होते। उनके अनुसार जीवन को नहीं मोड़ते। शिक्षाओं पर दत्तचित्त, एकाग्र, दृढ़तापूर्वक अमल नहीं करते। शास्त्रीय विधियों का पूर्ण दिल लगाकर अभ्यास नहीं करते, अपने आचरण को उनके अनुसार नहीं बनाते। केवल पढ़कर या जानकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। यही बुजदिली आलस्य, कर्महीनता हमें अग्रसर नहीं होने देती।

◇ आलस्य और दुर्भाग्य एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो आलसी है वह न श्रम का महत्त्व समझता है, न समय का मूल्य। ऐसे मनुष्य को कोई सफलता नहीं मिल सकती। सौभाग्य का पुरस्कार उनके लिए सुरक्षित है, जो उसका मूल्य चुकाने के लिए तत्पर हैं। यह मूल्य कठोर श्रम के रूप में चुकाया जाता है। समय ही भगवान् की दी हुई सम्पदा है। हमारी हर श्वास बड़ी मूल्यवान है। यदि प्रस्तुत क्षणों का ठीक तरह उपयोग करते रहा जाय, तो बूँद-बूँद से घट भरने की तरह अगणित सफलताएँ और समृद्धियाँ अनायास ही इकट्ठी होने लगेंगी।

■ आलसी का भविष्य अंधकारपूर्ण है। जिसे श्रम करने में रुचि नहीं, जो मेहनत से डरता है, आरामतलबी जिसे पसंद है, जो समय को ज्यों-त्यों करके अस्त-व्यस्त करता रहता है, समझना चाहिए दुर्भाग्य इसके पीछे लग गया। यह कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकना तो दूर, यदि संयोगवश उत्तराधिकार में कुछ मिल गया है तो उसे भी स्थिर न रख सकेगा। कहते हैं-लक्ष्मी आलसी के घर नहीं रहती। सुना जाता है कि दारिद्र्य वहाँ घोंसला बनाता है, जहाँ आलस्य की सघनता छाई रहती है।

□ आराम की जिन्दगी बिताना केवल निर्जीव, निरुद्देश्य और निकम्मे लोगों को रुचिकर हो सकता है। वे ही उसे सौभाग्य गिन सकते हैं। प्रगतिशील, महत्त्वाकांक्षी लोगों की दृष्टि में तो यह एक मानसिक रुग्णता है, जिसके कारण व्यक्ति का भाग्य, भविष्य, बल और वर्चस्व निरन्तर घटता ही जाता है। अपने देश का दुर्भाग्य श्रम के प्रति उपेक्षा करने की दुष्प्रवृत्ति के साथ आरंभ हुआ है और वह तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि हम प्रगतिशील लोगों की तरह परिश्रम के प्रति प्रगाढ़ आस्था उत्पन्न न करेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔴 मन की साधना कैसे करें?

देवियो, भाइयो! मैंने आपको शरीर की साधना के दो माध्यम बताए हैं- आहार और विहार। वैसे ही मन की साधना के भी दो माध्यम हैं- एक का नाम है- विवेक और दूसरे का नाम है- साहस। साहस और विवेक- इनकी जितनी मात्रा हम अपने भीतर इकट्ठी करते हुए चले जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन विभूतियों से- समृद्धियों से, ऋद्धियों से और सिद्धियों से भरता हुआ चला जाता है। मित्रो! इस सम्बन्ध में मैं आपको इतिहास की बात बताना चाहता हूँ, कुछ घटनाएँ सुनाना चाहता हूँ।

🔵 विवेकवान् की रीति−नीति

समर्थ गुरु रामदास के ब्याह की तैयारियाँ चल रही थीं। बुआ ने कहा कि उनका ब्याह तो जरूर होना चाहिए। अम्मा ने कहा- ‘‘मेरे बेटे का ब्याह नहीं होगा, तो काम कैसे चलेगा?’’ ढोलक बजायी जा रही थी और हल्दी चढ़ाई जा रही थी। घोड़ी चढ़ाने के लिए बारात निकाली और बारात वहाँ जा पहुँची बेटी वालों के यहाँ। बेटी वालों के यहाँ मंडप सजाया गया। समर्थ गुरु रामदास व्याह करने के लिए वहाँ जा पहुँचे। एक पुरोहित ने कहा कि महाराज! यहाँ ब्याह करने पर एक आवाज लगाई जाती है। उन्होंने कहा- ‘‘लड़का लड़की सावधान’’! लड़के ने कहा कि पल भर की देरी है, लेकिन सावधान क्यों कहा गया? अरे! जीवन के मोल का यही अंत? चार छोकरी- चार छोकरे और एक पंडित-  नौ ग्रह, नौ की दुहाई, नौ तरह की बीमारियाँ। मर जायेगा। अरे अभागे! दो तरीके से मारा जायेगा। इसीलिए भगवान् चिल्ला रहा है- सावधान! सावधान! अरे, दोनों तरफ की दिशाएँ क्या देख रहा है? एक तरफ चल और समर्थ गुरु रामदास ये भागे, वो भागे। लोगों ने बाजा बजाना बन्द कर दिया। वह गया, सो गया। बुआ ने कहा- बेवकूफ, अम्मा ने कहा पागल, बाप ने कहा- सिरफिरा, रिश्तेदारों ने कहा कि उल्लू है। सबने जाने क्या- क्या कहा। दुनिया वाले क्या- क्या कहते हैं, लेकिन विवेकवानों की विचार करने की शैली अलग होती है। वे अपना रास्ता अलग बनाते हैं और अपने रास्ते पर आप चला करते हैं।

🔴 पात्रता की अनिवार्यता

मित्रो! जो विवेकवान् लोग अपने रास्ते पर चले हैं, वे संसार के इतिहास में उज्ज्वल तारे की तरह टिमटिमाते रहे हैं और टिमटिमाते रहेंगे। यह परम्पराएँ पहले भी चलीं थीं और आगे भी चलती रहेंगी। मैंने आपको मन की, मस्तिष्क की, सूक्ष्म शरीर की उपासना के साथ साधना करने की विधि पहले भी बताई थी और विवेकशीलता को उसका एक अंग बताया था। एक दूसरा अंग है, पात्रता का विकास, व्यक्तित्व का विकास। इसके अभाव में सारी साधना, उपासना निष्फल चली जाती है।

एक बड़े सम्भ्रान्त व्यक्ति ने सुन रखा था कि संसार में सबसे बड़ा लाभदायक काम भगवान् का प्यार प्राप्त करना है। भगवान् सारी दुनिया का स्वामी है, मालिक है। सारी संपदाएँ और सारी सुविधाएँ उसके एक इशारे पर चलती रहती हैं। मनुष्य को भी जिन सुविधाओं की आवश्यकता है, जिन लाभों की जरूरत है, जिन वस्तुओं की जरूरत है, वह भगवान् के एक कृपांश के ऊपर, भगवान् के एक इशारे के ऊपर, इशारे की एक किरण के ऊपर टिके हुए हैं। भगवान् अगर हमसे नाराज हो जाये, तो हमारा अच्छा भला शरीर देखते ही देखते बरबाद हो जाये। गठिया आदि लग जाये, लकवा आदि हो जाये। हमारा सारा खाना- पीना भी बट्टे खाते में चला जाये। हमारी पढ़ाई- लिखाई सब बेकार चली जाये। सोलह वर्ष तक पढ़ाई की। एम.ए. की पढ़ाई की और डिवीजन खराब हो जाये, थर्ड डिवीजन पास हो जाये और नौकरी के लिए जगह न मिले। चपरासी के लिए मारा- मारा फिरना पड़े, तब? भगवान् की एक कृपा का कण यदि हमारे विरुद्ध हो जाये, तो हमारा सब कुछ चौपट हो जायेगा।

🔵 कैसे मिले भगवान् का प्यार

उस व्यक्ति को मालूम था कि भगवान् का प्यार पाना और भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करना मनुष्य के लिए जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। उस लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने समय के सबसे बड़े उदार संत और भगवान् के सबसे बड़े भक्त सुकरात के पास वह व्यक्ति गया और कहने लगा कि भगवन्! मुझे ऐसा उपाय बताइये, जिससे मैं भगवान् की कृपा प्राप्त कर सकूँ और भगवान् का साक्षात्कार कर सकूँ। भगवान् तक पहुँच सकूँ। सुकरात चुप हो गये। उन्होंने कहा कि फिर कभी देखा जायेगा। कई दिनों बाद वह व्यक्ति फिर आया। उसने कहा- ‘‘भगवन्! आपने भगवान् को देखा है और भगवान् का प्यार पाया है। क्या आप मुझे भी प्राप्त करा सकेंगे?’’ क्या भगवान् का अनुग्रह मेरे ऊपर न होगा? सुकरात ने कहा- ‘अच्छा तुम कल आना और मेरी एक सेवा करना, फिर मैं तुम्हें उसका मार्गदर्शन करूँगा।’ दूसरे दिन वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुँचा। सुकरात ने मिट्टी का कच्चा वाला एक घड़ा पहले से ही मँगाकर रखा था। वह पकाया नहीं गया था, वरन् मिट्टी का बना हुआ कच्चा था। सुकरात ने कहा- ‘ बच्चे जाओ मेरे लिए एक घड़ा पानी लाओ और मैं उससे स्नान कर लूँ, पानी पी लूँ, पीछे मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा।’

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मंगलवार, 16 अगस्त 2022

👉 निन्दक का बुरा क्यों मानें?

यदि कोई हमारे दोष बताता है तो उसका यह उत्तर नहीं है कि वह दोष उस बताने वाले में भी हैं या अन्य लोगों में भी है। ऐसा उत्तर देने का अर्थ है उसके दोष बताने का बुरा मानना, उलाहना देना और विरोध करना। यह आत्म शुद्धि का मार्ग नहीं है। बताने वाला यदि सदोषं है या अन्य लोग भी उस दोष में ग्रस्त हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भी उस दोष को अपनाये रहना चाहिए।

दीपक द्वारा फैलाये हुए प्रकाश का क्या इसीलिए बहिष्कार किया जाना उचित है कि वह अपने नीचे अंधकार क्यों छिपाये हुए हैं ? ठीक है, यदि दीपक अपने नीचे का अंधकार भी दूर कर सका होता तो उसे सर्वांगपूर्ण कहा जाता। पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके फैलाये हुए प्रकाश का लाभ उठाने से हम वंचित रहें इसका कोई कारण नहीं है। यह भी कोई कारण नहीं है कि दीपक सब जगह का अँधेरा दूर क्यों नहीं करता। यदि वह सुयोग से हमारे घर में जल रहा है तो इसे सौभाग्य ही मानना चाहिए।

दोष बताने वाला यदि स्वयं निर्दोष रहा होता तो उसकी महानता असाधारण होती, पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके इस उपकार को हमें मानना ही चाहिए कि उसने हमारे दोष बताये और उनकी हानि समझने एवं छोड़ने के लिए हमें उकसाया। ऐसा उपकार यदि कड़ुवे शब्दों में किया गया है तो भी इससे रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। गिलोय कड़वी होती है पर उसके अन्य गुण मूल्यवान होने के कारण उसे त्याज्य नहीं माना जाता। हमारे दोष यदि कड़ुवे शब्दों में-निंदा या आक्षेप के रूप में बताये हैं तो भी उचित यही है कि उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए, और उस निंदा में जितना भी अंश सच हो उस बुराई को छोड़ने का प्रयत्न किया जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961 Page 32

सोमवार, 15 अगस्त 2022

👉 सच्चा परोपकार

परोपकार और पुण्य के नाम पर मनुष्य कुछ धार्मिक कर्मकाण्ड, थोड़ा सा दान या कोई ऐसा काम करते हैं जिसे बहुत से लोग देखें और प्रशंसा करें। कई ऐसे आदमी जिनका नित्य का कार्यक्रम लोगों का गला काटना, झूठ, फरेब, दगाबाजी, बेईमानी से भरा होता है, अनीतिपूर्वक प्रचुर धन कमाते हैं और उसमें से एक छोटा सा हिस्सा दान पुण्य में खर्च करके धर्मात्मा की पदवी भी हथिया लेते हैं।

तात्विक दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि ऐसा धर्म संचय वास्तविक धर्म संचय नहीं है। यह तो प्रतिष्ठा बढ़ाने और वाहवाही लूटने का एक सस्ता सा नुस्खा है। वास्तविक धर्म का अस्तित्व अन्तरात्मा की पवित्रता से संबंधित है। जिसके मन में सच्चे धर्म का एक अंकुर भी जमा है वह सबसे पहला काम ‘अपने आचरण को सुधारने’ का करेगा। अपने कर्त्तव्य और जिम्मेदारी को भली भाँति पहचानेगा और उसे ठीक रीति से निबाहने का प्रयत्न करेगा।

परोपकार करने से पहले हमें अपने मनुष्योचित कर्त्तव्य और उत्तरदायित्त्व को उचित रीति से निबाहने की बात सोचनी चाहिए। भलमनसाहत, का मनुष्यता का, ईमानदारी का, बर्ताव करना और अपने वचन का ठीक तरह से पालन करना एक बहुत ही ऊंचे दर्जे का परोपकार है। एक पैसा या पाई किसी भिखमंगा की झोली में फेंक देने से या किसी को भोजन वस्त्र बाँट देने मात्र से कोई आदमी धर्म की भूमिका में प्रवेश नहीं कर सकता। सच्चा परोपकारी तो वह कहा जायेगा जो स्वयं मानवोचित कर्त्तव्य धर्म का पालन करता है और ऐसा ही करने के लिए दूसरों को भी प्रेरणा देता है।

अखण्ड ज्योति 1945 फरवरी पृष्ठ 13

👉 सबसे बड़ी सेवा

🔵 दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।

🔴 जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।

🔵 अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।

🔴 मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे।

🌹 ~महात्मा बुद्ध
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

रविवार, 14 अगस्त 2022

👉 जीवन की महत्ता समझें और उसका सदुपयोग करें

🔵 मनुष्य-जीवन नगण्य सी- ऐसी तुच्छ वस्तु नहीं है, जिसे हलकी दृष्टि से देखा जाय और हलके कार्यों में खर्च कर दिया जाय। यह निरन्तर प्रगति और निरन्तर तप का परिणाम है। उसके मूल्य और महत्व को समझा जाना चाहिए, यह सोचा जाना चाहिए कि इस सुअवसर का लाभ किस प्रकार उठाया जाय। ऐसे अवसर जो बार-बार हाथ नहीं आते, उपेक्षा और उपहास में गँवाने नहीं चाहिए। वरन् सतर्कतापूर्वक यह चेष्टा करनी चाहिए कि उसका समुचित सदुपयोग हो और परिपूर्ण लाभ मिले।

🔴 मनुष्य-जीवन इसलिए है कि उसे पाकर जीवात्मा अपनी महान् उत्कृष्टता को विकसित करने पर निर्भर अलौकिक शान्ति और सन्तोष का आनन्द लाभ करे। आन्तरिक उत्कृष्टता सत्कार्यों के निरन्तर अभ्यास पर निर्भर है। पढ़ते-सुनते या सोचते-विचारते रहने में आत्म-कल्याण की हलकी जानकारी तो प्राप्त होती है, पर उससे जीवन-क्रम में किसी महानता का अवतरण होने की आशा नहीं की जा सकती।

🔵 श्रेष्ठ कार्यों की श्रृंखला का दिनचर्या में अविच्छिन्न सम्बन्ध होना ही केवल मात्र वह उपाय है, जिससे मनुष्य ऊँचा उठता है और सफल जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ होता है। उचित है कि हम इस दृष्टि बिन्दु को विकसित करें और इस सुअवसर का परिपूर्ण लाभ उठावें जो हमें मनुष्य-जीवन के रूप में आज उपलब्ध है।

🌹 ~सन्त वास्वानी
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

👉 मूल-स्रोत का सम्बल

🔵 एक बीज डाला जाता है, तब वृक्ष खड़ा होता है। बीज सारे वृक्ष का मूल है। मनुष्य-जीवन का भी एक वैसा ही मूल है, चाहे उसे परमात्मा कहें, ब्रह्म या चेतना-शक्ति। जीवन के मूल-स्रोत से बिछुड़ जाने के कारण ही मनुष्य शाँति और जीवन की पवित्रता से अलग पड़ जाता है। मृत्यु के भय और जड़त्व के शून्य में निर्वासित हो जाता है।

🔴 मनुष्य अपने आपको जीवन मूल-स्रोत के साथ संयुक्त कर देता है तो वह विशाल प्रजा के सुख-दुःख के साथ एक तन हो जाता है। समष्टि में डूब कर व्यक्तिगत अहंता, स्वार्थ, संग्रह, हिंसा, छल की क्षुद्रताओं से बच जाता है। स्रोत के साथ एकात्म हो जाने पर मृत्यु, शून्यता और एकाकीपन का भय तिरोहित होता है।

🔵 वृक्ष का गुण है चारों ओर फैलना। हम भी फैलें। घर, परिवार, समाज, देश और विश्व के साथ प्रेम करें, स्नेह करें, आदर और सद्भाव भरें। किसी की छाया की आवश्यकता होती है, उसे छाया दें, सहारे की आवश्यकता होती है, उसे सहारा दें। अपनी व्यष्टि को विश्व-आत्मा के साथ घुलाने के लिये जितना फैल सकते हों, हमें फैलना चाहिये। वह हमारे जीवन का धर्म है। समष्टि में अपने को विसर्जित कर देना ही जीवन की सार्थकता है।

🔴 किन्तु जब हम फैलें तब भी अपने मूल-स्रोत को न भूलें, नहीं तो फिर उसी जड़ता और भय में खो जायेंगे, जिससे निकलने के लिये ही मनुष्य जीवन का आविर्भाव हुआ है।

🌹 ~रोम्यां रोल
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 मई पृष्ठ 1

रविवार, 7 अगस्त 2022

👉 आन्तरिक सामर्थ्य ही साथ देगी

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी। भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।

✍🏻 सुभाषचन्द्र बोस
📖 अखण्ड ज्योति 1969 मई पृष्ठ 1

शनिवार, 6 अगस्त 2022

👉 व्यक्तित्व का परिष्कार

मित्रो ! सर्वत्र पात्रता के हिसाब से मिलता है। बर्तन आपके पास है तो उसी बर्तन के हिसाब से आप जो चीज लेना चाहें तो ले भी सकते हैं। खुले में रखें तो पानी उसके भीतर भरा रह सकता है। दूध देने वाले के पास जाएँगे तो जितना बड़ा बर्तन है उतना ही ज्यादा दूध देगा। ज्यादा लेंगे तो वह फैल जाएगा और फिर वह आपके किसी काम नहीं आएगा। इसलिए पात्रता को अध्यात्म में सबसे ज्यादा महत्त्व दिया गया है।

जो आदमी अध्यात्म का प्रयोग करते हैं, वे अपने व्यक्तिगत जीवन में अपनी पात्रता का विकास कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं-यह बात बहुत जरूरी है। आदमी का व्यक्तित्व अगर सही नहीं है तो यह सब बातें गलत हैं। कपड़े को रंगने से पहले धोना होगा। धोएँ नहीं और मैले कपड़े पर रंग लगाना चाहें तो रंग कैसे चढ़ेगा? रंग आएगा ही नहीं, गलत-सलत हो जाएगा।

इसी प्रकार से अगर आप धातुओं को गरम नहीं करेंगे तो उससे जेवर नहीं बना सकते। हार नहीं बना सकते। क्यों? इसलिए कि आपने सोने को गरम नहीं किया है। गरम करने से आप इन्कार करते हैं। फिर बताइए जेवर किस तरीके से बनेगा? इसलिए गरम करना आवश्यक है। जो आदमी साधना के बारे में दिलचस्पी रखते हैं या उससे कुछ लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहला जो कदम उठाना पड़ेगा, वह है अपने व्यक्तित्व का परिष्कार।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गुरुवर की धरोहर-1/57

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

👉 निःस्वार्थ प्रेम

यथार्थ ईश्वर भक्त या भगवत् प्रेमी अकेला ही लाखों योद्धाओं की शक्ति रखता है। वह किसी पार्थिव सहायता का मुखापेक्षी नहीं रहता। वह तो केवल उस सर्व-शक्तिमान विश्व-नियामक परमेश्वर की कृपा का ही भिखारी होता है, उस महाशक्ति के प्रभाव सो ही वह प्रेम एवं विरह रहित होकर अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण करता है। कोई भी दुःख उसे अभिभूत एवं प्रलोभन उसे विपन्न नहीं कर सकता।

उस भगवद्-भक्त का हृदय किसी निष्फल भाव अथवा किसी विपक्ष चेष्टा से कातर नहीं होता है। इसी प्रकार आरम्भ किये हुए किसी कार्य में वह असफल भी नहीं होता। अतः हे हमारे विरही दीन-हृदय जिससे प्रेम किया है, उस प्रेमी का एक बार परिचय तो दो! अपने उस ईश्वर के लिए तुमने कौन सा कर्तव्य पूर्ण किया है, और किस प्रलोभन के संग्राम में विजय प्राप्त की है, सो तो बताओ। एक बार उसकी महिमा की दीप्ति उज्ज्वल बनाने के लिए किस शत्रु को पराजित किया है, एवं कौन सा दुख सहन कर किस रूप में कीर्ति स्थापित की है, उसका भी तो हिसाब दो। अरे, तुम्हारे मुख का प्रेम केवल शब्द मात्र ही है। तभी तो तुम साधारण से दुःख या तुच्छ से द्वन्द्व अथवा स्वल्प मात्र परिश्रम से शान्त जो जाते हो।

तुम आक्षेप करते हो कि तुम्हारी शक्ति किसी प्रतिकूलता के सम्मुख ठहर नहीं सकती। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकती। भला, जो प्रेम जीवन की प्रबल शक्ति नहीं होता, उसे मिथ्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है।

✍🏻 योगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969 पृष्ठ 1

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

👉 महात्मा महान आत्मा वाला पुरुष

प्रेम और समता मनुष्य को ज्ञान देता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर भी है और वह अखिल जगत की आत्मा का ही भाग है। समता की यह अनुभूति मानव की आत्मा में उमड़ कर ही कला, विज्ञान, साहित्य

और श्रेष्ठ रचना द्वारा संसार में सद्गुण, सद्विचार तथा सद्प्रेरणा देने में सहायक होती है। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में सहायक होती हैं। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ त्याग, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में प्यार-प्रेम, परोपकार और सद्व्यवहार का प्रसार करती हैं। महान आत्माओं ने प्रेम के मार्ग में अनेक कष्ट, शारीरिक-यंत्रणाएं सहकर, यही नहीं मृत्यु तक का भी स्वागत कर मनुष्य के सच्चे स्वरूप को समझा और आदर्श जीवन व्यतीत करके मानवता के परम सत्य की पुष्टि की। इसीलिए हम उन्हें महात्मा अर्थात् महान आत्मा वाला महापुरुष कहकर संबोधित करते हैं।

हमारी आत्मा जब संकीर्णता का वरण करती है तो निज की विशेषता खो देती है। इसकी विशेषता, समत्व में ही है। हम विश्व से समभाव होकर ही अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कर सकेंगे और तभी हमें वास्तविक आनन्दानुभूति होगी। हम भययुक्त और संघर्ष की विषम स्थितियों में तभी तक रहते हैं जब तक कि प्रकृति के व्यापक-समत्व के सिद्धाँत को नहीं समझ पाते और तभी तक हमें सारा संसार पराया जान पड़ता है। अपने और पराये तथा अपने अन्तःकरण और विश्व की व्याख्या के बीच जो सहज समता है उसे अनुभव कर इसी एक मंगलमय सूत्र के द्वारा जीवन को धन्य बनाता है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर
अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 1

बुधवार, 3 अगस्त 2022

👉 आत्म विश्वास का शास्त्र

जीवन संग्राम का सबसे बड़ा शस्त्र आत्मविश्वास है। जिसे अपने ऊपर-अपने संकल्प बल और पुरुषार्थ के ऊपर भरोसा है वही सफलता के लिये अन्य साधनों को जुटा सकता है। आत्म संयम भी उसी के लिये सम्भव है जिसे अपने ऊपर भरोसा है। जिसने अपने गौरव को भुला दिया, जिसे अपने में कोई शक्ति दिखाई नहीं पड़ती जिसे अपने में केवल दीनता, अयोग्यता, एवं दुर्बलता ही दिखाई पड़ती है। ह किस बलबूते पर आगे बढ़ सकेगा? और कैसे इस संघर्ष भरी दुनियाँ में अपना अस्तित्व यम रख सकेगा। बहती धार में जिसके पैर उखड़ गया, उसे पानी बहा ले जाता है पर जो अपना हर कदम मजबूती से रखता है वह धीरे-धीरे तेज धार को भी पार कर लेता है।

हमें परमात्मा ने उतनी ही शक्ति दी है जितना कि किसी अन्य मनुष्य को। जिस मंजिल को दूसरे पार कर चुके हैं उसे हम क्यों पार नहीं कर सकते? फौज के प्रत्येक सैनिक को एक सी बन्दूक दी जाती है। निशाना लगाना हर सिपाही की अपनी सूझबूझ और योग्यता का काम है। सभी व्यक्ति अनन्त सामर्थ्य लेकर इस भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं। प्रश्न केवल पहचानने, भरोसा करने और उसके सदुपयोग का है। जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है वे अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सदुपयोग करके कठिन से कठिन मंजिल को पार कर सकते हैं।

दुनियाँ को चलाने और सुधारने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है। पर अपने लिए जो कर्तव्य सामने आते हैं उन्हें पूरा करने में सच्चे मन से लगना और उन्हें बढ़िया ढंग से करके दिखाना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनियाँ के संचालन और सुधार में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण योग दे सकते है। अधूरे और भद्दे काम करना अपने आप को कलंकित करना है। परमात्मा ने हमारी रचना अपूर्ण नहीं सर्वांग और उच्चकोटि की सामग्री से की है। उसने हमें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर हमीं अपने गौरव को मलीन क्यों न होने दें। हमें जैसा अच्छा बनाया गया है उसी के अनुरूप हमारे काम भी गौरवपूर्ण होने चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 मई Page 19

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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