रविवार, 4 सितंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Sep 2016


🔴 समय एक ईश्वरीय चक्र है, जिसे परिश्रम के बैंक में भुनाने से नकद संपत्ति मिल जाती है। कर्म परायणता सौभाग्य की कुञ्जी है। जिसके हाथ में यह कुञ्जी होगी, वह अपने आपको सौभाग्यशाली बना लेगा। परमात्मा के भण्डार में सब कुछ भरा हुआ है, पर व्यक्ति के प्रयत्न के आधार पर ही उस भण्डार में से दिया जाता है। अपनी पात्रता से अधिक कोई एक रत्ती भर भी अधिक नहीं पा सकता।

🔵 विवाहोन्माद हिन्दू समाज के रोगग्रस्त शरीर में  सबसे भयंकर गलित कुष्ट है। धन और चरित्र की बर्बादी का यह सबसे विषम और सबसे भयावह छिद्र है। उसे न रोका गया तो शिक्षा, व्यवसाय, आहार, विज्ञान आदि के आधार पर जो कुछ भी प्राप्त किया जा रहा है वह सब इसी छिद्र से होकर धूलि में टपक जाएगा। हर कोई जानता है कि अपने समाज में विवाह बाहर से धूमधाम और भीतर से शोक-संताप से भरे हुए होते हैं। हमें आगे बढ़कर इस अविवेक भरी असुरता से जूझना पड़ेगा। यह कदम अनिवार्य है।

🔴 हमारा मन जब ईमानदारी को छोड़कर बेईमानी की तरफ चलने लगे तो समझना चाहिए कि अब हमारा सर्वनाश निकट आने वाला है। बेईमानी से पैसा मिल सकता है, पर देखो उससे सावधान रहना। उस पैसे को छूना मत, क्योंकि वह आग की तरह चमकीला तो है, पर छूने पर जलाये बिना रह नहीं सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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