सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

👉 सच्ची सरकार

कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है। आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं। शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।

भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जीकी कृपा। अगर कोई अच्छा मूल्य मिला, तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।

पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले, तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना। घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे। पर बच्चे अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।

बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है। तेरा परिवार बसता रहे। ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।
दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।

भक्त नामदेव जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था।
और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।

दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे। फिर पत्नि की कही बात, कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है। दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।

अब दाम तो क्या, थान भी दान जा चुका था। भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है, तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा। और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए।

अब भगवान कहां रुकने वाले थे।
भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।

अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।
नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?
नामदेव का घर यही है ना?
भगवान जी ने पूछा।

अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये
भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञयासा हैl

भगवान बोले दरवाजा खोलिये
लेकिन आप कौन?

भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी? जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक, वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl

ये राशन का सामान रखवा लो। पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया। फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ, कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई।
इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है? मुझे नहीं लगता। पत्नी ने पूछा।

भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है।
जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया।
और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है।
जगह और बताओ।
सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।

शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।

समान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं। बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे। वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़। कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते। उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।

भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे, पर सामान आना लगातार जारी था।

आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना।
हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकी वो अभी तक घर नहीं आए हैं।

भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं।
अब परिजन नामदेव जी को देखने गये

सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे, जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।

इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे। अगर थान अच्छे भाव बिक गया था, तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?

भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए। फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया, कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।

पत्नि ने कहा सच्ची सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था। पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया। उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।

भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले-! वो सरकार है ही ऐसी। जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं। उसकी देना कभी भी खत्म नहीं होता।

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़ेगे। विचारों की उप-योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। वह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू-मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969

👉 भक्तिगाथा (भाग ७४)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

ये क्षण बड़े शीतल व सुखद थे। ये अनुभूतियाँ कई क्षणों तक सभी को घेरे रहीं, तभी उस सघन आध्यात्मिक वातावरण में एक प्रखर तेजस्विता ने आकार ग्रहण किया। यह आकृति परम तेजस्वी व प्रखर तपस्वी ऋषि दुर्वासा की थी। ऋषि दुर्वासा अपने प्रचण्ड तप व असाध्य साधन के लिए विख्यात थे। उन्होंने योग एवं तंत्र की अनगिनत दुष्कर साधनाएँ सम्पन्न की थीं। विविध विद्याएँ अपने सभी सुफल के साथ उनके सामने करबद्ध खड़ी रहती थीं। इन महान ऋषि ने केवल दुर्व खाकर हजारों वर्ष तप किया था। दीर्घ अवधि तक इस दुर्व (दूब)+असन (भोजन) के कारण ही उनका नाम दुर्वासा हो गया था। उनकी चमत्कारिक शक्तियों व विकट तप की ही भाँति उनका क्रोध भी लोकविख्यात था परन्तु उनका क्रोध सदा ही किसी न किसी भाँति लोककल्याणकारी था।

ऐसे ऋषि दुर्वासा का आगमन, सुखद किन्तु आश्चर्यजनक था। वे महारूद्र के रौद्रतेज की साकार रौद्र मूर्ति थे। उनके आगमन से कुछ को प्रसन्नता हुई तो कुछ को आश्चर्य। परन्तु सुखी सभी थे क्योंकि सभी को यह लग रहा था कि महर्षि के आगमन से भक्तिगाथा में एक नयी कथा पिरोयी जाएगी। ऋषियों ने महर्षि का स्वागत किया। देवों, गन्धर्वों, सिद्धों व चारणों ने उन्हें भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया। महर्षि दुर्वासा ने विहंसते हुए सभी का अभिवादन स्वीकार किया। उन्हें इस तरह हंसते हुए देखकर सभी को आश्वस्ति मिली। सभी को आश्वस्ति पाते देखकर महर्षि भी पुलकित हुए। उन्होंने सभी से कहा कि ‘‘मैंने अपने जीवन में अनगिनत साधनाएँ की हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि अब तो मैंने साधनाओं एवं सिद्धियों की गणना करना ही छोड़ दिया है। विद्याओं के विविध प्रकार और उनके सुफल मेरे लिए अर्थहीन हो गए हैं। इन सबसे मुझे किंचित मात्र भी शान्ति नहीं मिली।

यह परम शान्ति तो भक्ति में है। जिसकी वजह से वत्स अम्बरीश का इतने युगों बाद नामश्रवण भी भावों को भिगो देता है। जहाँ भक्ति है, वहाँ स्वयं भगवान हैं, और जहाँ भगवान हैं, वहाँ पराजय और अशुभ टिक ही नहीं सकते। इसलिए भक्ति ही श्रेष्ठतम साधन मार्ग है।’’ महर्षि दुर्वासा के ये अनुभूतिवाक्य सभी को प्रीतिपूर्ण लगे। उन सबने देवर्षि की ओर देखा। देवर्षि ने पुलकित मन से महर्षि दुर्वासा की ओर देखते हुए अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-

‘तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः’॥ ३३॥
इसलिए संसार बन्धन से मुक्त होने की इच्छा रखने वालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिए।

देवर्षि के इन वचनों को सुनकर ऋषिश्रेष्ठ दुर्वासा कह उठे- ‘‘नारद के ये वचन त्रिकालसत्य हैं, त्रिवारसत्य हैं, और सच यही है कि यही सर्वकालिक सत्य है। मेरी स्वयं की अनुभूति भी यही कहती है।’’ फिर थोड़ा रुककर वह बोले- ‘‘सम्भव है कि आपने यह कथा सुन रखी हो परन्तु फिर भी मैं इसे कहना चाहता हूँ।’’ ‘‘अवश्य कहें-महर्षि!’’ सभी ने लगभग एक स्वर से कहा। केवल ऋषि अत्रि मुस्करा दिए। ऋषि दुर्वासा ने पिता की इस मुस्कान पर दोनो हाथ जोड़ लिए और कहना प्रारम्भ किया- ‘‘अभी आपने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के मुख से भक्त अम्बरीश का भक्तिप्रसंग सुना है। मैं भी आज उनकी भक्ति की सराहना करना चाहता हूँ। इस कथा को घटित हुए युगों बीत गए परन्तु मेरे अन्तःकरण में वे सभी दृश्य अभी भी जीवन्त हैं।

उस दिन भी एकादशी व्रत के परायण का उत्सव था। ठीक वैसा ही आयोजन, वैसा ही समारोह-सम्भार, जिसकी कथा आप सभी ने थोड़ी ही देर पहले सुनी है। बस अन्तर था तो इतना, कि वत्स अम्बरीश ने एक दिन पूर्व मुझे आमंत्रित किया था परन्तु मैं परायण उत्सव पर निश्चित मुहूर्त्त से काफी विलम्ब से पहुँचा। अम्बरीश जब तक प्रतीक्षा कर सकते थे, उन्होंने की। परन्तु बाद में ऋषियों के निर्देश से उन्होंने परायण कर लिया। हालांकि, इसके लिए उन्होंने मुझसे क्षमायाचना भी की। परन्तु मैं उस दिन अहंता से ग्रसित था। सो मैंने क्रोधवश क्रूर करालकृत्या का प्रयोग अम्बरीश पर कर दिया। वहाँ उपस्थित ऋषियों के पास इसकी कोई काट न थी। सभी असहाय से खड़े इसे देखते रहे। और क्रूर करालकृत्या अम्बरीश को जलाने लगी।

उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर देखा और इन महान ऋषि के संकेत को समझकर आर्त स्वर से पुकारा- रक्षा करो नारायण! करूणा करो हे भक्तवत्सल!! अम्बरीश की इस आर्त पुकार ने जैसे सप्तलोक और चौदह भुवनों को बेध दिया और फिर पलक झपकते ही जैसे सहस्रों-सहस्र सूर्य आकाश में उदित हो गए। यह नारायण के सुदर्शन चक्र का प्राकट्य था, जिसने क्षणार्ध में उस कृत्या को भस्मीभूत कर दिया। फिर वह सुदर्शन वेगपूर्ण हो मुझे दण्डित करने के लिए दौड़ा। मैं भी भयभीत होकर भागा- पहले पिताश्री अत्रि एवं माताश्री अनुसूइया के पास गया। इन्होंने मुझे परामर्श दिया कि पुत्र तुम अम्बरीश की शरण में जाओ। अन्यत्र तुम्हें कहीं भी शरण न मिलेगी। पर मुझ अभिमानी को यह बात समझ में न आयी। सो ऋषियों के पास से त्रिदेवों के पास गया। ब्रह्मा, शिव और अन्त में नारायण के पास। परन्तु वहाँ भी वही कहा गया- कि तुम अम्बरीश के अपराधी हो उन्हीं की शरण में जाओ। आखिर थक हार कर मैं अम्बरीश के पास आया। परन्तु यह क्या, उन्होंने तो मेरे पाँव पकड़ लिए, और कहा आप पर नारायण की अवश्य कृपा होगी। उनके इस स्वरों के साथ ही सुदर्शन तिरोहित हो गया। परन्तु उस दिन मुझे यह बोध अवश्य हो गया कि भक्ति से श्रेष्ठ अन्य कोई साधन नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३६

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

👉 सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों? (अन्तिम भाग)

खुली, धूप, ताजी हवा और अंग संचालन के आवश्यक शारीरिक परिश्रम का अभाव साधन सम्पन्न लोगों की थकान का मुख्य कारण है। इसके लिये बाहर से बहुत आकर्षक लगने वाले दफ्तर वास्तव में बहुत ही खतरनाक हैं। वातानुकूलित करने जरा-सी गर्मी में पंखों की तेज चाल- कूलर- खश के पर्दे, बर्फ मिला पानी- जाड़े में हीटर- गरम चाय- ऊनी कपड़ों का कसाव देखने में बड़े आदमी होने का चिह्न लगाते हैं और तात्कालिक सुविधा भी देते हैं पर इनका परिणाम अन्ततः बहुत बुरा होता है। त्वचा अपनी सहन शक्ति खो बैठती है। अवयवों में प्रतिकूलता से लड़ने की क्षमता घट जाती है। फलस्वरूप ऋतु प्रभाव को सहन न कर पाने से आये दिन जुकाम, खाँसी, लू लगना, ताप, सिर दर्द, अनिद्रा, अपच जैसी शिकायतें समाने खड़ी रहती हैं। सूर्य की किरणें और स्वच्छ हवा में जो प्रचुर परिमाण में जीवन तत्व भरे पड़े हैं उनसे वञ्चित रहा जाय तो उसकी पूर्ति ‘विटामिन, मिनिरल और प्रोटीन’ भरे खाद्य पदार्थों की प्रचुर मात्रा भी नहीं कर सकती। साधन सम्पन्न लोग ही तात्कालिक सुविधा देखते हैं और दूरगामी क्षति को भूल जाते हैं। फलतः वह आरामतलबी का रवैया बहुत भारी पड़ता है और थकान तथा उससे उत्पन्न अनेक विग्रहों का सामना करना पड़ता है।

म्यूनिख (जर्मनी) की वावेरियन एकेडमी आफ लेवर एण्ड सोशल येडीशन संस्था की शोधों का निष्कर्ष यह है कि कठोर शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों की अपेक्षा दफ्तरों की बाबूगीरी स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक खतरनाक है।

स्वास्थ्य परीक्षण- तुलनात्मक अध्ययन आँकड़ों के निष्कर्ष और शरीर रचना तथ्यों को सामने रखकर शोध कार्य करने वाली इस संस्था के प्रमुख अधिकारी श्री एरिफ हाफमैन का कथन है कि कुर्सियों पर बैठे रहकर दिन गुजारना अन्य दृष्टियों से उपयोगी हो सकता है पर स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वथा हानिकारक है। इससे माँस पेशियों के ऊतकों एवं रक्त वाहिनियों को मिली हुई स्थिति में रहना पड़ता है, वे समुचित श्रम के अभाव में शिथिल होती चली जाती है फलतः उनमें थकान और दर्द की शिकायत उत्पन्न होती है। रक्त के नये उभार में, उठती उम्र में यह हानि उतनी अधिक प्रतीत नहीं होती पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे वैसे आन्तरिक थकान के लक्षण बाहर प्रकट होने लगते हैं और उन्हें कई बुरी बिमारियों के रूप में देखा जा सकता है। कमर का दर्द (लेवैगो), कूल्हे का दर्द (साइटिका) गर्दन मुड़ने में कंधा उचकाने में दर्द, शिरा स्फीति (वेरी कजोवेन्स), बवासीर, स्थायी कब्ज, आँतों के जख्म, दमा जैसी बीमारियों के मूल में माँस पेशियों और रक्त वाहिनियों की निर्बलता ही होती है, जो अंग सञ्चालन, खुली धूप और स्वच्छ हवा के अभाव में पैदा होती है। इन उभारों को पूर्व रूप की थकान समझा जा सकता है।

बिजली की तेज रोशनी में लगातार रहना, आँखों पर ही नहीं आन्तरिक अवयवों पर भी परोक्ष रूप से बुरा प्रभाव डालता है। आँखें एक सीमा तक ही प्रकाश की मात्रा को ग्रहण करने के हिसाब से बनी हैं। प्रकृति ने रात्रि के अन्धकार को आँखों की सुविधा के हिसाब से ही बनाया है। प्रातः सायं भी मन्द प्रकाश रहता है। उसमें तेजी सिर्फ मध्याह्न काल को ही आती है। सो भी लोग उससे टोप, छाया, छाता, मकान आदि के सहारे बचाव कर लेते हैं। आंखें सिर्फ देखने के ही काम नहीं आतीं वे प्रकाश की अति प्रबल शक्ति को भी उचित मात्रा में शरीर में भेजने की अनुचित मात्रा को रोकने का काम करती हैं। यह तभी सम्भव है जब उन पर प्रकाश का उचित दबाव रहे पर यदि दिन रात उन्हें तेज रोशनी में काम करना पड़े तो देखने की शक्ति में विकार उत्पन्न होना तो छोटी बात है। बड़ी हानि यह है कि प्रकाश की अनुचित मात्रा देह में भीतर जाकर ऐसी दुर्बलता पैदा करती है जिससे थकान ही नहीं कई अन्य प्रकार की तत्सम्बन्धित बीमारियाँ भी पैदा होती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972

👉 भक्तिगाथा (भाग ७३)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

देवर्षि के सूत्र सत्य में अपने शब्दप्रसूनों को पिरोते हुए ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले- ‘‘सचमुच ही राजपरितोष तो राजा के सानिध्य में रहकर ही जाना जा सकता है। यह तब और भी सुखकर एवं प्रीतिकर होता है, जब राजा हमारे वत्स अम्बरीश की भाँति, तपस्वी, ब्राह्मणों एवं साधुओं को साक्षात साकार नारायण के रूप में पूज्य मानता हो। और रही बात भोजन की तो इसका स्वाद एवं सुख, चर्चा-चिन्तन में नहीं, इसे ग्रहण करने में है।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का यह कथन कुछ इतना मधुर व लयपूर्ण था कि उनकी शब्दावली, एक नवीन दृश्यावली को साकार कर रही थी। एकबारगी सभी के अन्तर्भावों में भुवनमोहिनी अयोध्या, सरयू का तट, उस पावन नदी का नीर, उसमें मचलती लहरें और उन लहरों में अठखेलियाँ करती सूर्य रश्मियाँ और अवधवासियों पर, समस्त भक्तों और सन्तों पर अपनी स्वर्णिम कृपा बरसाते सूर्यदेव प्रकट हो उठे थे।

ये बड़े ही गहन समाधि के क्षण-पल थे। इन क्षणों में, इन पलों में हिमवान के आंगन में बैठे हुए सभी ने अयोध्या का सुखद अतीत निहारा। उन्होंने देखा कि राजर्षि अम्बरीश किस तरह तपोधन महर्षि विद्रुम एवं उनके शिष्य शील व सुभूति का सत्कार-सम्मान कर रहे हैं। किस तरह वह उन्हें बार-बार आग्रहपूर्वक भोजन ग्रहण करा रहे हैं। सबने यह भी देखा कि राजपरितोष एवं क्षुधाशान्ति के ये सुखद पल सरयू के तीर पर ही समाप्त न हुए बल्कि महाराज उन्हें आग्रहपूर्वक राजभवन में ले गए। भव्य राजप्रासाद में महारानी सहित सभी राजसेवकों व राजसेविकाओं ने इनका सम्मोहक सम्मान किया। आरती के थाल सजे, वन्दनवार टंगे, मंगलगीतों का गायन हुआ। इतने पर भी महाराज ने विराम न लिया, वह इन्हें आग्रहपूर्वक राजसभा में ले गए। जहाँ स्वागत-सम्मान के इस समारोह ने अपना चरम देखा।

राजर्षि अम्बरीश की भावनाओं में भीगे ऋषि विद्रुम इसे तितीक्षा के रूप में सहन करते रहे। परन्तु एक पल ऐसा भी आया जब उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर सांकेतिक दृष्टि से देखा। अन्तर्ज्ञानी ब्रह्मर्षि परम तपस्वी का संकेत समझ गए। उन्होंने अम्बरीश को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘पुत्र! अब ऋषिश्रेष्ठ को तपोवन जाने की अनुमति दो क्योंकि ऋषिवर इस समय तुम्हारे भावों के वश में हैं। इसी वजह से वह तुम्हारे प्रत्येक आग्रह एवं अनुरोध को स्वीकार करते जा रहे हैं। परन्तु यह उनकी और उनके शिष्यों की प्रकृति के विपरीत है। उनकी प्रकृति के लिए तो तपोवन की कठोरता व दुष्कर-दुधर्ष साधनाएँ ही सहज हैं। इसलिए उन्हें अब तपोवन जाने दो वत्स!’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महाराज अम्बरीश के  लिए ही नहीं बल्कि उनके समस्त कुल के आराध्य थे। उनका प्रत्येक वचन उन्हें सर्वथा शिरोधार्य था। इसलिए उन्होंने भीगे नयनों से, विगलित मन से ऋषि विद्रुम व शील एवं सुभूति को विदा दी। अतीत के इस अनूठे दृश्य को सभी ने अपने अन्तर्भावों में निहारा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३५

बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

👉 ऐसा यज्ञ करो

महाभारत की समाप्ति के उपरान्त पांडवों ने एक महान यज्ञ किया। कहते हैं कि वैसा यज्ञ उस जमाने में और किसी ने नहीं किया था। गरीब लोगों को उदारतापूर्वक इतना दान उस यज्ञ में दिया गया था कि उनके घर सोने से भर गये। वैसी दानवीरता को देख कर सबने दांतों तले उंगली दबाई।

इस यज्ञ की चर्चा देश-देशान्तरों में फैली हुई थी। यहां तक कि पशु-पक्षी भी उसे सुने बिना न रहे। एक नेवले ने जब इस प्रकार के यज्ञ का समाचार सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। क्योंकि एक छोटे से यज्ञ के उच्छिष्ट अन्न से छू जाने के कारण उसका आधा शरीर सोने का हो गया था। इस छोटे यज्ञ में जूठन के जरा से कण ही मिले थे जिनसे वह आधा ही शरीर स्पर्श कर सका था। तब से उसकी बड़ी अभिलाषा थी कि किसी प्रकार उसका शेष आधा शरीर भी सोने का हो जावे। वह जहां यज्ञ की खबर सुनता वहीं दौड़ा जाता और यज्ञ की जो वस्तुएं इधर-उधर पड़ी मिलतीं उनमें लोटता, किन्तु उसका कुछ भी प्रभाव न होता। इस बार इतने बड़े यज्ञ की चर्चा सुनकर नेवले को बड़ी प्रसन्नता हुई और वह अविलम्ब उसकी जूठन में लोटने के लिये उत्साहपूर्वक चल दिया।

कई दिन की कठिन यात्रा तय करके नेवला यज्ञस्थल पर पहुंचा और वहां की कीच, जूठन, यज्ञस्थली आदि में बड़ी व्याकुलता के साथ लोटता फिरा। एक बार नहीं कई-कई बार वह उन स्थानों पर लोटा और बार-बार आंखें फाड़ कर शरीर की परीक्षा की कि देखें मैं सोने का हुआ या नहीं। परन्तु बहुत करने पर भी कुछ फल न हुआ। तब वह एक स्थान पर बैठ कर सिर धुनधुन कर पछताने लगा।

नेवले के इस आचरण को देखकर लोग उसके पास इकट्ठे हो गये और इसका कारण पूछने लगे। उसने बड़े दुःख के साथ उत्तर दिया कि इस यज्ञ की प्रशंसा सुनकर मैं दूर देश से बड़ा कष्ट उठा कर यहां तक आया था, पर मालूम होता है कि यहां यज्ञ हुआ ही नहीं। यदि यज्ञ हुआ होता तो मेरा आधा अंग भी सोने का क्यों न हो जाता? लोगों की उत्सुकता बढ़ी, उन्होंने नेवले से कहा आपका शरीर सोने का होने और यज्ञ से उसका संबंध होने का क्या रहस्य है कृपया विस्तारपूर्वक बताइये।

नेवले ने कहा—सुनिए! एक छोटे से ग्राम में एक गरीब ब्राह्मण अपने परिवार सहित रहता था। परिवार में कुल चार व्यक्ति थे। (1) ब्राह्मण (2) उसकी स्त्री (3) बेटा (4) बेटे की स्त्री। ब्राह्मण अध्यापन कार्य करता था। बालकों को पढ़ाने से उसे जो कुछ थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती थी, उसी से परिवार का पेट पालन करता था। एक बार लगातार तीन वर्ष तक मेह न बरसा जिससे बड़ा भारी अकाल पड़ गया। लोग भूख के मारे प्राण त्यागने लगे। ऐसी दशा में वह ब्राह्मण परिवार भी बड़ा कष्ट सहन करने लगा। कई दिन बाद आधे पेट भोजन की व्यवस्था बड़ी कठिनाई से हो पाती। वे बेचारे सब के सब सूखकर कांटा होने लगे। एक बार कई दिन उपवास करने के बाद कहीं से थोड़ा-सा जौ का आटा मिला। उसकी चार रोटी बनीं। चारों प्राणी एक-एक रोटी बांट कर अपनी थालियों में रख कर खाने को बैठने ही जाते थे कि इतने में दरवाजे पर एक अतिथि आकर खड़ा हो गया।

गृहस्थ का धर्म हैं कि अतिथि का उचित सत्कार करे। ब्राह्मण ने अतिथि से कहा—पधारिए भगवन्! भोजन कीजिये। ऐसा कहते हुए उसने अपनी थाली अतिथि के आगे रख दी। अतिथि ने उसे दो-चार ग्रास में खा लिया और कहा—भले आदमी, मैं दस दिन का भूखा हूं, इस एक रोटी से तो कुछ नहीं हुआ उलटी भूख और अधिक बढ़ गई। अतिथि के वचन सुनकर ब्राह्मण पत्नी ने अपनी थाली उसके आगे रखदी और भोजन करने का निवेदन किया। अतिथि ने वह भोजन भी खा लिया, पर उसकी भूख न बुझी। तब ब्राह्मण पुत्र ने अपना भाग उसे दिया। इस पर भी उसे संतोष न हुआ तो पुत्र वधू ने अपनी रोटी उसे दे दी। चारों की रोटी खाकर अतिथि की भूख बुझी और वह प्रसन्न होता हुआ चलता बना।
उसी रात को भूख की पीड़ा से व्यथित होकर वह परिवार मर गया। मैं उसी परिवार की झोंपड़ी के निकट रहता था। नित्य की भांति बिल से बाहर निकला तो उस अतिथि सत्कार से बची हुई कुछ जूठन के कण उधर पड़े हुए थे। वे मेरे जितने शरीर से छुए उतना ही सोने का हो गया। मेरी माता ने बताया कि किसी महान् यज्ञ के कण लग जाने से शरीर सोने का हो जाता है। इसी आशा से मैं यहां आया था कि पाण्डवों का यह यज्ञ उस ब्राह्मण के यज्ञ के समान तो हुआ होगा, पर यहां के यज्ञ का वैसा प्रभाव देखा तो अपने परिश्रम के व्यर्थ जाने का मुझे दुख हो रहा है।

कथा बतलाती है कि दान, धर्म या यज्ञ का महत्व उसके बड़े परिमाण पर नहीं, वरन् करने वाले की भावना पर निर्भर है। एक धनी का अहंकारपूर्वक लाखों रुपया दान करना एक गरीब के त्यागपूर्वक एक मुट्ठी भर अन्न देने की समता नहीं कर सकता। प्रभु के दरबार में चांदी सोने के टुकड़ों का नहीं, वरन् पवित्र भावनाओं का मूल्य है।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 धर्मपुराणों की सत्कथाएं

👉 सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों? (भाग १)

लोग समझते हैं कि थकान अधिक काम करने से आती है अथवा कम पौष्टिक भोजन मिलने से। यह दो बातें भी ठीक हो सकती हैं पर यह नहीं समझना चाहिए कि शक्ति की कमी- शिथिलता- थकान और उदासी के यही दो कारण हैं।

अनेक साधन सम्पन्न व्यक्ति-अमीर अफसर- या ऐसी स्थिति में होते हैं जिनके पास काम भी उतना नहीं होता और अच्छी खुराक प्राप्त करने में भी कोई असुविधा नहीं होती। फिर भी वे बुरी तरह थके रहते हैं। अपने अन्दर जीवनी शक्ति अथवा क्रिया शक्ति की कमी अनुभव करते हैं और जो करना चाहते हैं- कर सकते हैं- उसमें अपने को असमर्थ अनुभव करते हैं।

दूसरी ओर सामान्य स्तर के अथवा गरीब लोग-गई गुजरी स्थिति में रहने के कारण सुविधा सम्पन्न जीवन नहीं जी पाते। गुजारे के लिये कठोर काम करने पड़ते हैं। अधिक समय तब भी और अधिक दबाव डालने वाले भी । साथ ही गरीबी के कारण उन्हें बहुमूल्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भी नहीं मिल पाते। इतने पर भी वे बिना थके हँसी-खुशी का जीवन जीते हैं- तरोताजा रहते हैं और अपनी स्फूर्ति में कमी पड़ती नहीं देखते।

इससे स्पष्ट है कि काम की अधिकता या खुराक के स्तर की कमी ही थकान का मात्र कारण नहीं है वरन् कुछ दूसरी बातें भी हैं जो आराम और पुष्टि की प्रचुरता रहते हुए भी थकान उत्पन्न करती हैं और दुर्बलता बनाये रहती हैं।

अमेरिका इन दिनों संसार का सबसे अधिक साधन सम्पन्न देश है। वहाँ के लोग कंजूस भी नहीं होते। जो कमाते हैं उसे खर्च करने और हंसी खुशी का जीवन जीने के आदी हैं। ऐश आराम के साधन वहाँ बहुत हैं। सवारी के लिये कार, वातानुकूलित कमरे, शरीर का श्रम घटाने के लिए कारखाने में तथा घर में हर प्रयोजन के लिए बिजली से चलने वाले यन्त्रों की वहाँ भरमार है। श्रम और समय को बचाने के लिए आर्थिक उन्नति और वैज्ञानिक प्रगति का पूरा-पूरा उपयोग किया जाता है। आहार की भी वहाँ क्या कमी है।

विटामिन, मिनिरल, प्रोटीन और दूसरे पौष्टिक तत्वों को भोजन में मिलाने का वहाँ आम रिवाज है। फलों के रस की बोतलें लोग पानी की तरह पीते रहते हैं। थकान से बचने और स्फूर्ति बनाये रहने पर ही विलासी जीवन जिया जा सकता है सो इसके लिये प्रख्यात दोनों कारणों पर वहाँ बहुत ध्यान दिया जाता है। श्रम सुविधा और खाद्य पौष्टिकता में कोई कुछ कमी नहीं रहने देता।

फिर भी वहाँ बुरा हाल है डाक्टरों के पास आधे मरीज ‘थकान’ रोग का इलाज कराने वाले होते हैं। इसके लिए प्रख्यात दवा “एम्फेटैमीन स्टीमुलैन्टस्” प्रयोग की जाती है। यह औषधि स्वल्प मात्रा में ली जाती है तो भी डाक्टरों के परिषद ने चिकित्सा प्रयोजन में हर साल काम ली जाने वाली इस दवा की मात्रा साड़े तीन हजार टन घोषित की है। एक टन-सत्ताईस मन के बराबर होता है। हिन्दुस्तानी हिसाब से यह 3500&27=94500 मन अर्थात् लगभग 1260000 किलो हुई। उस औषधि के निर्माताओं का रिपोर्ट अलग है। उत्पादकों और विक्रेताओं को हिसाब देखने से प्रतीत होता है कि डाक्टरों के परामर्श से इसका जितना सेवन होता है उसकी अपेक्षा तीन गुनी मात्रा लोग खुद ही बिना किसी की सलाह से अपने अनुभव के आधार पर स्वयं ही खरीदते खाते रहते हैं। इस प्रकार इसकी असली खपत चार गुनी मानी जानी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972

👉 भक्तिगाथा (भाग ७२)

महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने अपने प्रिय शिष्य को यूँ पुलकित होकर आते हुए देखा तो उन्होंने समझ लिया, कि आज उनके प्रिय अम्बरीश को उनका मनचाहा मिल गया है। उन्होंने सभी ऋषिगणों के साथ भगवान नारायण की अर्चना की। एकादशी के पारायण का यह महोत्सव सरयू नदी के किनारे हो रहा था। भगवान सूर्यदेव का बिम्ब नदी के जल में कुछ इस तरह से पड़ रहा था, जैसे कि सूर्यनारायण अयोध्यावासियों पर कृपालु होकर स्वयं सरयू में उतर आए हों। भगवान नारायण के नाम के मधुर संकीर्तन के साथ यह पारायण उत्सव सचमुच ही मोहक था। दूर-दूर से आए तपस्वी भक्त, साधक, सिद्ध जनों का सम्मिलन अयोध्या के नगर जनों के लिए परम सौभाग्य की बात थी। उन्हें गर्व था अपने प्रजापालक, न्यायप्रिय नरेश पर, जिन्होंने उनको संरक्षण एवं संसाधन के साथ सुसंस्कार भी दिए थे। उन्होंने अपने इन प्रियजनों को साधनों के अर्जन के साथ साधना के अर्जन की भी शिक्षा दी थी।

भावों की इसी पुलकन-सिहरन के साथ सभी भक्ति की लहरों में भीग रहे थे। इन्हीं भीगी भावनाओं के साथ महाराज अम्बरीश सबको लेकर वहाँ पहुँचे- जहाँ भोजन की व्यवस्था की गयी थी। उन्होंने ऋषि विद्रुम एवं ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ को एक विशिष्ट आसन पर बिठाया। पास में ही उन्होंने अन्य ऋषियों-महर्षियों के साथ ऋषि विद्रुम के शिष्य शील एवं सुभूति को आसन दिया। राजकर्मचारी सभी अभ्यागतों के स्वागत में लगे थे। परन्तु इन ऋषि-तपस्वियों की सेवा महाराज स्वयं ही कर रहे थे। ऐसा करते हुए उनके हर्ष-उत्साह के अतिरेक का पारावार न था। वह सब कुछ बड़े मनोयोग से कर रहे थे। यह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पल था, जिसे हर कोई अपने नयनों में कैद कर लेना चाहता था।

सुखद एवं सुखप्रद राजपरितोष एवं क्षुधा की शान्ति, दोनों का अनुभव सभी को एक साथ हो रहा था। सुस्वादु भोजन का प्रथम ग्रास मुख में लेते समय ऋषि विद्रुम के शिष्यों शील एवं सुभूति को अचानक कुछ याद आ गया। वे दोनों एक दूसरे को देखते हुए मुस्कराए। उनकी इस मुस्कराहट को ऋषि विद्रुम के साथ महर्षि वशिष्ठ ने भी देखा। अपने इन शिष्यों को यूँ मुस्कराते हुए देख महातपस्वी विद्रुम के होठों पर हल्का सा स्मित उभरा। ऋषिश्रेष्ठ वशिष्ठ को भी इस कौतुक का रहस्य जानने की जिज्ञासा हो आयी। पर वह बोले कुछ नहीं, बस मौन ही भोजन करते रहे। भोजन के पश्चात् आचमन आदि करके उन्होंने विद्रुम से उनके स्मित का कारण जानना चाहा। उत्तर में वह प्रसन्न होकर बोले- ‘‘इस हँसी और स्मित में ही तो मेरे आगमन का कारण छुपा है।’’ ऐसा कहते हुए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ को काफी दिन पुरानी एक घटना सुनायी।

उन्होंने कहा कि काफी समय पूर्व जब वे अपने शिष्यों को भक्ति-भक्त एवं भगवान का स्वरूप-सत्य समझा रहे थे, तो उन्होंने प्रसंगवश कहा था कि भक्ति का स्वाद ऐसा है जिसे कहकर नहीं, बल्कि अनुभव करके ही जाना जा सकता है। यदि लौकिक सत्यों से इसकी तुलना की जाय तो यह राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति की भांति है। जिसे चर्चा करके नहीं बल्कि स्वयं अनुभव करके जाना जा सकता है। यहाँ पर अपने शिष्यों को मैं इसी सत्य का अनुभव कराने आया था। उनकी उस हँसी में उनकी प्रगाढ़ अनुभूति की प्रसन्नता छलक रही थी। उन्होंने यहाँ आकर भक्ति का स्वाद जाना, अनुभव किया भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की भक्ति को। साथ ही इस भक्ति एवं भक्त में उन्होंने भगवान् की अनुभूति पायी। इस अनुभूति के साथ उन्होंने राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति को भी एक साथ अनुभव किया। अपने शिष्यों को यही अनुभव देने के लिए ही मैं यहाँ आया था। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के इस संस्मरण ने न केवल महर्षि विद्रुम के अयोध्या आगमन के रहस्य की कथा कही, बल्कि उन्हें देवर्षि को नए सूत्र के लिए प्रेरित किया और देवर्षि कह उठे-
‘न तेन राजपरितोषः क्षुधा शान्तिर्वा’॥ ३२॥

सचमुच ही मात्र जान लेने से न तो राजा की प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३३

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७१)

महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव

महातपस्वी विद्रुम के अयोध्या आगमन का रहस्य कोई यदि सही ढंग से जानता था तो वह थे स्वयं महातापस विद्रुम, जबकि वे तो अन्तर्लीन-आत्ममग्न दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि वे स्वयं में खोए हों। इस सम्पूर्ण समारम्भ-सम्भार में कोई आकर्षण न था, फिर भी वहाँ पर आए थे, क्यों? यह एक प्रश्नचिह्न था। महाराज अम्बरीश के स्वागत-शिष्टाचार में भी वह सर्वथा स्थितप्रज्ञ दिखे। हाँ! ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से अवश्य वह पूरी आत्मीयता से मिले। इस अवसर पर उनके होठों पर मुस्कराहट और आँखों में एक विशेष चमक दिखी। हालांकि, यह कुछ ही क्षणों के लिए था, फिर वे स्वयं में अन्तर्लीन-भावलीन होने लगे। महर्षि विद्रुम के साथ दो नवयुवक भी थे, जिनके मुख पर साधना का तेज था, तप की प्रभा थी। उनकी आँखों में एक पवित्र दैवी भाव की लहरें उमड़ रही थीं। सम्भवतः वे महर्षि विद्रुम के शिष्य-सेवक थे। उनके मुखमण्डल पर उमड़ते भावों की प्रभा कुछ यही कह रही थी।

शील एवं सुभूति, महर्षि विद्रुम ने उन दोनों का यही परिचय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को दिया था। विद्रुम के संकेत से इन दोनों ने वशिष्ठ को प्रणाम किया। प्रणाम करते समय इन दोनों का शील-विनय एवं भावमयता सराहनीय थी। प्रणाम के अनन्तर जब इन्होंने शीश ऊपर उठाया, तो इनके नेत्र भीगे हुए थे। पूछने पर उन्होंने केवल इतना कहा कि ‘‘महाभागवत महाराज अम्बरीश के कुलगुरु से हम दोनों भी भक्ति का सूत्र-सत्य सीखने के लिए आए हैं।’’ इनकी ऐसी भावनाएँ निहार कर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ बस केवल इतना ही कह सके- ‘‘अवश्य वत्स! क्यों नहीं, तुम सुयोग्य हो, सत्पात्र हो, तुम्हारी इस विनयशीलता के कारण ही तुम्हें महर्षि विद्रुम का संग प्राप्त हुआ है। यह संग-सान्निध्य देवों के लिए भी दुर्लभ है वत्स! इसके प्रभाव से तुम सब कुछ जान सकोगे, सीख सकोगे।’’

वशिष्ठ से अपने मनोरथ पूर्ण होने का आशीष लेकर वे पुनः अपने गुरु महर्षि विद्रुम के पास आ गए। अभी भी वह सबसे अलग सर्वथा वीतराग भाव से बैठे हुए थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उन्हें देखते हुए पुनः महाराज अम्बरीश को कुछ संकेत किया। इस संकेत को समझकर महाराज अम्बरीश ऋषि विद्रुम के पास पहुँचकर बोले- ‘‘हे देव! एकादशी के परायण का मुहूर्त हो आया है। आइए हम सब भगवान् नारायण की अर्चना करते हुए व्रत का पारायण करें।’’ नारायण का नाम सुनते ही महर्षि विद्रुम के हृदय में भावों का ज्वार उमड़ आया। उनके उठने में बालकों जैसी चपलता एवं त्वरा दिखी। भावों से भीगे मन से उठते हुए वह बस केवल इतना ही कह सके, ‘‘अवश्य पुत्र। इसीलिए तो हम यहाँ आए हैं, ताकि तुम्हारे जैसे परम भक्त के साथ भगवान नारायण की अर्चना कर सकें, भगवद्भक्ति के सूत्रों का सत्य जान सकें।’’

महर्षि विद्रुम के ये वाक्य, उनके द्वारा किया गया पुत्र सम्बोधन सुनकर अयोध्या नरेश अम्बरीश को ऐसा लगा, जैसे कि उन्हें आज जीवन भर की सम्पूर्ण एकादशियों का सुफल, आज एक पल में मिल गया हो। वह पुलकित, गद्गद एवं भाव विह्वल हो गए। उन्होंने भीगे मन एवं गीले नयनों के साथ ऋषि विद्रुम के पाँव पकड़ लिये। महर्षि ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और बोले- ‘‘पुत्र! तुम सब भाँति योग्य हो। अभी तक मैं तुमसे न मिल सका, इसके पीछे भी सम्भवतः भगवान् नारायण का कोई विधान है।’’ महर्षि का यह सुकोमल व्यवहार अम्बरीश को अपने जन्म भर के पुण्यों का सुफल लगा। वह अपने अन्तर्भावों में कुछ इतना डूब गए कि कुछ कह न सके। बस महर्षि विद्रुम और उनके शिष्यों को साथ लेकर उस ओर चल पड़े, जिधर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ खड़े थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३१

सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७०)

भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा

भक्त और भगवान् के सान्निध्य की बात महर्षि वसिष्ठ को बहुत भायी और वे प्रसन्न मन से अयोध्या के राजकुल के पुरोहित हो गए। इसी कुल में भक्त श्रेष्ठ अम्बरीश का जन्म हुआ और वे अयोध्या के अधिपति हुए। विशाल साम्राज्य के चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी उनकी भक्ति में तनिक सी भी न्यूनता नहीं आयी। सम्राट अम्बरीश नियमित एकादशी का व्रत करते थे, भगवन्नाम जप में उनकी अटूट निष्ठा थी। वह हमेशा ही विराट् यज्ञों का आयोजन कर यज्ञपति भगवान् विष्णु का यजन-पूजन करते थे। महर्षि वसिष्ठ ने बहुत ही पुलकित मन से आज अपने यजमान एवं प्रिय शिष्य महाराज अम्बरीश का स्मरण किया और कहने लगे- अयोध्या के साम्राज्य में एकादशी सदा ही अद्भुत रही है। परन्तु जब अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे, तब एकादशी की विशिष्टता कुछ अधिक ही विशिष्ट थी। महाराज बड़े ही दिव्य एंव भव्य ढंग से एकादशी का परायण करते थे।

उनके इस परायण में वह और उनका राजपरिवार ही नहीं, बल्कि अयोध्या का प्रत्येक परिवार भागीदार होता था। जहाँ तक कि एकादशी व्रत की बात है तो यह व्रत तो उन दिनों महाराज के विशाल साम्राज्य का प्रत्येक नागरिक करता था, भले ही उसके ईष्ट आराध्य देव कोई भी क्यों न हो। यह एकादशी का व्रत तो अयोध्या के साम्राज्यवासियों का अपने महाराज की भक्ति के प्रति सजल श्रद्धा थी। और इस श्रद्धा से अयोध्या के जन-जन का मन अभिभूत था। उस दिन भी महाराज एकादशी के व्रत का पारायण कर रहे थे। सदा ही की भांति अयोध्यावासी इसमें भागीदार थे। आमंत्रित ऋषिगण भी विपुल संख्या में थे। राजकर्मचारी आगन्तुक साधु-तपस्वियों का भावपूर्ण सत्कार कर रहे थे।

इन आगन्तुक तपस्वियों में ऋषि विदू्रम भी थे। इनके तप की चर्चा उन दिनों सम्पूर्ण अयोध्या राज्य में होती रहती थी। विद्रूम का कठोर तप आश्चर्यजनक था। उनके इस अलौकिक तप की कथा धरती के मानव ही नहीं देवलोक के देवी-देवता भी करते थे। सामान्यतया तपस्वी श्रेष्ठ कहीं भी न आने-जाने के लिए विख्यात् थे। आज उनका यहाँ आना सर्वथा विस्मयकारी था। जो अपने सम्पूर्ण जीवन राजगृह एवं भोजन आदि से दूर रहा हो, उसका इस तरह राजगृह में आना एवं भोजन की पंक्ति में बैठना सर्वथा विस्मयकारी था। चकित तो स्वयं सम्राट अम्बरीश थी थे। उन्हें भी विद्रूम का आना कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इसके पहले कितने ही अवसरों पर सम्राट विद्रूम की कुटिया में गए थे। परन्तु उन्होंने तो उनसे मिलने से ही इन्कार कर दिया था। उन्हें आमंत्रित करके राजभवन बुलाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।

कई बार सम्राट अम्बरीश ने इस की चर्चा ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से की थी। कई बार तो इस चर्चा को करते हुए सम्राट व्यथित हो जाते थे। वह कहते- गुरुदेव! मुझे इस धरती के सभी महर्षियों, साधु-तपस्वियों का आशीर्वाद मिल चुका है। परन्तु न जाने क्यों मैं महातपस्वी विद्रूम की कृपा से अभी तक वंचित हूँ। अवश्य ही मेरी भगवद्भक्ति में कहीं कोई खोट है, तभी अपने तप से सर्वलोकों को प्रकाशित करने वाले महर्षि विद्रूम मुझसे मिलना तक नहीं पसन्द करते। जब-जब महाराज अम्बरीश ने विद्रूम की चर्चा की, उनसे न मिल पाने की अपनी व्यथा कही, वसिष्ठ ने उन्हें सान्त्वना प्रदान की, उनको समझाया और कहा- पुत्र! विद्रूम तपस्वी हैं पर निष्करूण नहीं। एक न एक दिन किसी न किसी अवसर पर वह तुम्हारे पास अवश्य आएँगे। तुम इस सत्य को सुनिश्चित रूप से जान लो कि वे कहीं भी हों, अपने तप की किन्हीं भी प्रक्रियाओं में क्यों न लीन हों, पर तुम्हारे हृदय से वह देर तक अपरिचित नहीं रह सकते। तुम्हें उनकी कृपा अवश्य मिलेगी। पर कब और किस अवसर पर? इसका उत्तर तो या तो वह स्वयं दे सकते हैं, अथवा उनकी रचना करने वाला विधाता। वही तपस्वी विद्रूम आज महाराज के राजभवन में एकादशी परायण के भोजन के अवसर पर पधारे थे। हालांकि उनके इस आगमन का प्रयोजन अभी तक रहस्यमय था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२९

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (अन्तिम भाग)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

इस दुर्गति में पड़े रहने से आज का समय किसी प्रकार कट भी सकता है, पर भविष्य तो अन्धकार से ही भरा रहेगा। विवेक की एक किरण भी कभी चमक सके तो उसकी प्रतिक्रिया परिवर्तन के लिये तड़पन उठने के रूप में ही होगी। प्रस्तुत दुर्दशा की विडम्बना और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का तुलनात्मक विवेचन करने पर निश्चित रूप से यही उमंग उभरेगी कि परिवर्तन के लिये साहस जुटाया जाय। इसी उभार के द्वारा अध्यात्म जीवन में प्रवेश और साधना प्रयोजनों का अवलम्बन आरम्भ होता है।

परिवर्तन का प्रथम चरण है, बन्धनों का शिथिल करना। आकर्षणों के अवरोधों से विमुख होना। आसक्ति को वैराग्य की मनःस्थिति में बदलना। इसके लिये कई तरह के संयम परक उपायों का अवलम्बन करना पड़ता है। साधना रुचि परिवर्तन की प्रवृत्ति को उकसाने से आरम्भ होती है। इस संदर्भ में महर्षि पातंजलि का कथन है।
बन्धकारण शैथिल्यात्प्राचार सम्वेदनस्य ।

चित्तस्य पर शरीरावेशः ।।
—योग दर्शन 3-38
बन्धनों के कारण डीले हो जाने पर चित्त की सीमा, परिधि और सम्वेदना व्यापक हो जाती है।
मोक्षस्य नहि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ।।
—शिव गीता 13।32
अर्थात्—मोक्ष किसी स्थान विशेष में निवास करने की स्थिति नहीं है। न उसके लिये किसी अन्य नगर या लोक में जाना पड़ता है। हृदय के अज्ञानांधकार का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है।

मोक्ष में परमात्मा की प्राप्ति होती है। अथवा परमात्मा की प्राप्ति ही मोक्ष है। यह मोक्ष क्या है? भव बन्धनों से मुक्ति। भव-बन्धन क्या हैं? वासना, तृष्णा और अहंता के—काम, लोभ और क्रोध के नागपाश। इनसे बंध हुआ प्राणी ही माया ग्रसित कहलाता है। यही नारकीय दुर्दशा का दल-दल है। इससे उबरते ही आत्मज्ञान का आलोक और आत्म-दर्शन का आनन्द मिलता है। इस स्थिति में पहुंचा हुआ व्यक्ति परमात्मा का सच्चा सान्निध्य प्राप्त करता है और ज्ञान तथा सामर्थ्य में उसी के समतुल्य बन जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है—

ये पुरुषे ब्रह्मविदुः तेविदुः परमेष्ठितम् ।
अर्थात्—जो आत्मा को जान लेता है, उसी के लिये परमात्मा का जान लेना भी सम्भव है। ऋग्वेद में आत्मज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान कहा गया है। ग्रन्थों के पढ़ने से जानकारियां बढ़ती हैं, आत्मानुभूति से अपने आपे को और परमतत्व को जाना जाता है। श्रद्धा-विहीन शब्दचर्चा का ऊहापोह करते रहने से तो आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। एक ऋचा है—यः तद् न वेदकिम् ऋचा करिष्यति।’’

जो उस आत्मा तत्व को नहीं जान पाया वह मन्त्र, बात या विवेचन करते रहने भर से क्या पा सकेगा? उपनिषद् का कथन है—‘‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’’ अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही बन जाता है।

यह स्थिति जीवन और जगत के पीछे छिपी हुई कारण सत्ता को देखने तथा उसे समझने, बोध प्राप्त करने के लिये साधना स्तर के प्रयासों से ही सम्भव है। भारतीय मनीषियों ने इसीलिये तत्व दर्शन को ही बन्धन मुक्ति का उपाय बताया है यह दृष्टि अपने मन, बुद्धि चित्त और अहंकार के परिष्कार पूर्वक ही विकसित की जा सकती है। योग तप, ब्रह्मविद्या, साधना, उपासना, अभ्यास, मनन, चिन्तन और ध्यान निदिध्यासन द्वारा चित्त वृत्ति को इतना निर्मल परिष्कृत बनाया जाता है कि यह तत्व दृष्टि विकसित की जा सके।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ११०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६९)

भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा

ब्रह्मर्षि क्रतु के मुख से भीलकुमार कणप्प की भक्तिगाथा सुनकर सभी के अन्तःकरण भावों से भीग गए। भक्ति स्वयं ही साधना और सिद्धि को अपने में समाविष्ट कर लेती है। यहाँ तक कि इसमें भक्ति की साधना करने वाले साधक का अस्तित्त्व भी समा जाता है। अन्य साधना विधियों को अपनाकर इनकी साधना करते हुए साधक यदा-कदा थकान, बेचैनी की अनुभूति करने लगता है। यदि इनके प्रयोग सुदीर्घकाल तक करने पडें़ तो साधना के फल की आकांक्षा भी साधक को विचलित करती है। परन्तु भक्ति की साधना में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तो अपने ईष्ट-आराध्य की भक्ति करते हुए भक्त का मन पल-पल पुलकित और हर्षित होता रहता है। उसे तो बस हर क्षण यही लगता रहता है और क्या, और कितना, और कैसे, अपने प्रभु को दे डालूँ? कुछ पाना है, ऐसी चाहत तो कभी भी भक्त के मन-अन्तःकरण में अंकुरित ही नहीं होती। इन विचार कणों में सभी के मन देर तक सिक्त होते रहे।

समय का तो किसी को होश ही न रहा। चेत तो तब आया जब देवर्षि नारद ने अपनी वीणा की मधुर झंकृति की ही भांति एक सूत्र सत्य का उच्चारण करते हुए कहा-
‘राजगृैहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्’॥ ३१॥

राजगृह और भोजनादि में ऐसा ही देखा जाता है। भक्ति को स्वयं ही फलरूपा कहने के बाद देवर्षि के मुख से भक्ति की तुलना राजगृह एवं भोजन आदि से करने पर महर्षि वसिष्ठ के अधरों पर हलका सा स्मित झलक आया। ऐसा लगा वह कुछ पलों के लिए अपनी ही किन्हीं स्मृतियों में खो गए। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वसिष्ठ की यह भावभंगिमा वहाँ किसी से छिपी न रही। इसे औरों के साथ स्वयं देवर्षि ने भी देखा और उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से भावपूर्ण निवेदन करते हुए कहा- ‘‘इस सूत्र की तत्त्वकथा आप ही कहें भगवन्!’’ उत्तर में एक मधुर हास्य के साथ वसिष्ठ बोले- ‘‘देवर्षि! आपके मुख से राजगृह एवं भोजन की बात सुनकर मेरे मन मे कुछ पुरानी स्मृतियाँ उभर आयीं।’’

ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ के इस कथन ने सभी की जिज्ञासा व उत्सुकता को शतगुणित कर दिया। अब तो देवर्षि के साथ अन्य सबने भी अनुरोध किया, ‘‘अपनी पावन स्मृतियों से हम सबको भी पवित्र करें महर्षि!’’ उत्तर में महर्षि कुछ और कहते तभी हिमप्रपात एवं हिम पक्षियों की ध्वनियों ने वातावरण में एक अद्भुत संगीत घोल दिया। ऐसा लगा कि इस नयी भक्तिगाथा के श्रवण के पूर्व स्वयं प्रकृति ने मंगलाचरण पढ़ा हो। इस शुभ मंगल ध्वनि के साथ मौन हो रहे महर्षि मुखरित हुए और बोले- ‘‘मेरी यह स्मृतियाँ उन दिनों की हैं, जब भक्त प्रवर अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे। महाराज अम्बरीश की भक्ति एवं उनके व्यक्तित्व के विविध शीलगुणों की अनेकों अनोखी कथाएँ पुराणकारों ने कही हैं, इन सभी कथा प्रसंगों में महाराज अम्बरीश की भावपूर्ण भक्ति झलकती है। परन्तु जिस स्मृति कथा को मैं सुना रहा हूँ, उसे किसी भी पुराण ने नहीं कहा। यह सर्वथा अछूता कथा प्रसंग है।

हिमवान के आंगन में बैठे सभी महर्षिगण, देवता, सिद्ध, चारण एवं गन्धर्वों को यह तथ्य सुविदित था कि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सुदीर्घ काल तक अयोध्या के राजपुरोहित रहे हैं। उन्होंने युगों तक अयोध्या के राजघराने का पौरोहित्य कार्य किया है। ऋषियों के मध्य इसकी भी सदा चर्चा रही है- यह कार्य उन्हें स्वयं ब्रह्मा जी ने सौंपा था। इस चर्चा में यह तथ्य भी सुविदित रहा है कि परम वीतरागी महर्षि वसिष्ठ जब अयोध्या के राजपुरोहित नहीं बनना चाहते थे, तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा था- पुत्र! यह सामान्य राजकुल नहीं है। इस कुल में अनेकों श्रेष्ठ महामानव जन्म लेंगे। अनेक भगवद्भक्तों को इस कुल में जन्म मिलेगा। उनकी भक्ति की शक्ति से अन्ततः स्वयं भगवान मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में इस कुल में अवतरित होंगे। तुम्हें इन सभी के पुरोहित होने का, इन्हें मार्गदर्शन देने का सुअवसर मिलेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२७

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ७०)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

लालची मक्खी और चींटी की आसक्ति, आतुरता उसे विपत्ति के बन्धनों में जकड़ देती है और प्राण संकट उपस्थित करती है। चासनी को आतुरतापूर्वक निगल जाने के लोभ में यह अबोध प्राणी उस पर बेतरह टूट पड़ते हैं और अपने पंख, पैर उसी में फंसा कर जान गंवाते हैं। मछली के आटे की गोली निगलने और पक्षी के जाल में जा फंसने के पीछे भी वह आतुर अशक्ति ही कारण होती है, जिसके कारण आगा-पीछा सोचने की विवेक बुद्धि को काम कर सकने का अवसर ही नहीं मिलता।

शरीर के साथ जीव का अत्यधिक तादात्म्य बन जाना ही आसक्ति एवं माया है। होना यह चाहिए कि आत्मा और शरीर के साथ स्वामी सेवक का—शिल्पी उपकरण का भाव बना रहे। जीव समझता रहे कि मेरी स्वतन्त्र सत्ता है। शरीर के वाहन, साधन, प्रकृति यात्रा की सुविधा भर के लिए मिले हैं। साधन की सुरक्षा उचित है। किन्तु शिल्पी अपने को—अपने सृजन प्रयोजन को भूल कर—उपकरणों में खिलवाड़ करते रहने में सारी सुधि-बुद्धि खोकर तल्लीन बन जाया तो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण हो होगी। तीनों शरीर तीन बन्धनों में बंधते हैं। स्थूल शरीर इन्द्रिय लिप्सा में, वासना में। सूक्ष्म शरीर (मस्तिष्क) सम्बन्धियों तथा सम्पदा के व्यामोह में। कारण शरीर-अहंता के आतंक फैलाने वाले उद्धत प्रदर्शनों में। इस प्रकार तीनों शरीर—तीन बन्धनों में बंधते हैं और आत्मा उन्हीं में तन्मय रहने की स्थिति में स्वयं ही भव बंधनों में बंध जाता है। यह लिप्सा लालसायें इतनी मादक होती है कि जीव उन्हें छोड़कर अपने स्वरूप एवं लक्ष्य को ही विस्मृति के गर्त में फेंक देता है। वेणुनाद पर मोहित होने वाले मृग वधिक के हाथों पड़ते हैं। पराग लोलुप भ्रमर-कमल में कैद होकर दम घुटने का कष्ट सहता है। दीपक की चमक से आकर्षित पतंगे की जो दुर्गति होती है व सर्वविदित है। लगभग ऐसी ही स्थिति व्यामोह ग्रसित जीव की भी होती है। उसे इस बात की न तो इच्छा उठती है और न फुरसत होती है कि अपने स्वरूप और लक्ष्य को पहचाने। उत्कर्ष के लिए आवश्यक संकल्प शक्ति जगाई जा सकती तो इस महान प्रयोजन के लिये मिली हुई विशिष्ट क्षमताओं को भी खोजा जगाया जा सकता था। किन्तु उसके लिये प्रयत्न कौन करे? क्यों करे? जब विषयानन्द की ललक ही मदिरा की तरह नस-नस पर छाई हुई है तो ब्रह्मानन्द की बात कौन सोचे? क्यों सोचे?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)

भगवान को भावनाएँ अर्पित करने वाला कहलाता है भक्त
    
इस अनुभूति के साथ उन्होंने ब्रह्मर्षि क्रतु से बड़े विनम्र स्वर में कहा- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! इस सूत्र का अनुभव कथन आप स्वयं अपने मुख से कहें।’’ नारद के इस आग्रह को क्रतु अस्वीकार न कर सके और बोले- ‘‘भक्ति एक ऐसा तत्त्व है, जो कहने वाले को और सुनने वाले को, दोनों ही को कृतार्थ करता है। जो इसे कहता है अथवा जो इसे सुनता है, दोनों ही इसके रस से स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मेरी इस प्रकरण में विशेषज्ञता नहीं है। परन्तु हाँ, मुझे ऐसे ही एक भक्त का सान्निध्य मिला है। यदि आप सभी की अनुमति हो तो मैं उस अनपढ़ भील की कथा अवश्य सुना सकता हूँ।’’ क्रतु के इन वचनों ने सभी के भावों को विभोर करके उनके अन्तर्मन को हर्षित किया। सभी ने एक स्वर में अनुरोध किया कि महर्षि उस भील भक्त की कथा कहें।
    
अनुरोध के इन स्वरों के साथ महर्षि के अन्तःसरोवर में भावउर्मियाँ थिरक उठीं। उनमे मन में स्मृति की कई रेखाएँ उभर आयीं और उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘उसका नाम कणप्प था। जाति का भील था वह, उसका कबीला विन्ध्यांचल के जंगल में रहता था। अपने कबीले के सरदार का इकलौता पुत्र था वह। कृष्ण वर्ण की बलिष्ठ काया, मुख पर एक ऊर्जा बसा सात्त्विक आकर्षण। उसके उज्ज्वल नेत्रों से सदा ही एक सात्त्विक प्रकाश झरता रहता था। भीलकुमार होते हुए भी उसका रहन-सहन, खान-पान सतोगुणी था। अन्य भीलकुमारों की तरह वह मांसाहारी न था। हालांकि, उसकी कर्मठता एवं बलिष्ठता की कोई भी तुलना न थी। बलवान होने पर भी वह अहंकारी न था। सेवा परायणता उसमें कूट-कूट कर भरी थी। कबीले के कामों एवं पिता की सहायता से उसे जो भी समय मिलता वह उस समय का उपयोग, वनवासी साधु-तपस्वियों की सेवा में करता।
    
इस सेवापरायणता का ही सुफल उसे भक्ति के रूप में मिला था। विन्ध्यांचल के वन में रहने वाले एक तपस्वी साधु ने प्रसन्न होकर उसे पञ्चाक्षर मंत्र प्रदान किया था। ‘ॐ नमः शिवाय’ के उपदेश के साथ उन्होंने उसे भगवान सदाशिव की लीलाकथाएँ सुनाते हुए कहा- पुत्र! भावों की गहराई में डूबकर अपने आराध्य का स्मरण और उन्हीं को अपना सर्वस्व समर्पण ही भक्ति है। जो अपने स्मरण व समर्पण की साधना में जितनी प्रगाढ़ता, प्रखरता एवं परिपक्वता लाता है उसमें भक्ति उतनी ही तीव्रता से प्रकट होती है। इस भक्ति के साधन से कुछ भी असम्भव नहीं है। हाँ! इतना अवश्य ध्यान रखना कि अनन्यता भक्त का अनिवार्य गुण है। जो अपने ईष्ट में अनन्य भाव से डूबा रहता है, वह जीवन के तत्त्व और सत्य को पा जाता है। उसके लिए लोक में कुछ भी असम्भव नहीं है। हालांकि भक्ति अपना फल स्वयं ही है।
    
इन वनवासी साधु वेदव्रत की बात कणप्प को भा गयी। उसने भगवान् शिव के नाम-रूप-गुण एवं उनकी लीलाओं में अपने मन-अन्तःकरण को भिगोना प्रारम्भ कर दिया। वह प्रातः से उठकर सायं तक जो भी करता, केवल अपने प्रभु के लिए करता। कर्त्तव्य संसार के लिए, भावनाएँ भगवान् के लिए। यह उसके जीवन का महामंत्र बन गया। प्रातः सायं वन में जाकर सरिता के किनारे वट वृक्ष की छाया में वह पार्थिव पूजन करता। स्मरण व समर्पण की साधना उसके रोम-रोम में बसने लगी। उसे साधु वेदव्रत का यह कथन हमेशा याद रहता, जो उन्होंने उसे शिव नाम देते हुए कहा था- पुत्र! भक्त वह है जो अपनी भावनाएँ केवल भगवान को देता है। अपनी साधन सम्पत्ति तुम भले ही किसी को दे दो, परन्तु भावनाओं में अन्य किसी की हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए। जिसकी भावनाओं में किसी की भी हिस्सेदारी है, वह कभी भी भक्त नहीं हो सकता। उससे भक्ति की साधना सम्भव नहीं।
    
सरल हृदय भीलकुमार कणप्प को यह बात दिल में लग गयी। उसकी मेधा भले ही प्रखर न थी, परन्तु भाव पवित्र थे। सो शीघ्र ही वह भावों के समर्पण की कला सीख गया। इस भाव अर्पण की निपुणता ने उसके लिए अपने आप ही भावसमाधि के द्वार खोल दिए। भावसमाधि में वह अपने आराध्य के साथ एकाकार होने लगा। भगवान् सदाशिव उसके मन मन्दिर में प्रकट होने लगे। उसकी भक्ति प्रबल होती गयी और भगवान अपने इस अनूठे भक्त के लिए विकल होते गए। एक दिन जब वह निशाकाल में अपने भगवान् के ध्यान में डूबा था- तो भोलेनाथ अपने प्रिय भक्त के सम्मुख प्रकट हो गए। शूलपाणि प्रभु का रूप अनोखा था। परन्तु भक्त कणप्प तो अपनी भक्ति में खोया था। भगवान ने स्वयं उसके शीष पर हाथ रखकर चेताया और कहा- पुत्र! मांगो तुम क्या चाहते हो। अपने भगवान को सम्मुख पाकर कणप्प के आँखों से आँसू बह निकले- बड़ी मुश्किल से वह बोल सका- भक्ति का वरदान दे भगवान! जीवन और परिस्थितियों का स्वरूप जो भी हो, पर मैं भक्ति में डूबा रहूँ। भोलेनाथ ने एवम्वस्तु कहकर उसे आशीष दिया। भक्त और भगवान दोनों ही अनुभव कर रहे थे कि भक्ति स्वयं ही फलरूपा है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२४

बुधवार, 29 सितंबर 2021

👉 अपना दीपक स्वयं बनें: -

एक गांव मे अंधे पति-पत्नी रहते थे । इनके यहाँ एक सुन्दर बेटा पैदा हुआ जो अंधा नही था।

एक बार पत्नी रोटी बना रही थी उस समय बिल्ली रसोई मे घूस कर बनाई रोटियां खा गई।

बिल्ली की रसोई मे आने की रोज की आदत बन गई इस कारण दोनों को कई दिनों तक भूखा सोना पङा।

एक दिन किसी प्रकार से मालूम पङा कि रोटियां बिल्ली खा जाती है।

अब पत्नी जब रोटी बनाती उस समय पति दरवाजे के पास बांस का फटका लेकर जमीन पर पटकता।
इससे बिल्ली का आना बंद हो गया।

जब लङका बङा हुआ ओर शादी हुई।  बहु जब पहली बार रोटी बना रही थी तो उसका पति बांस का फटका लेकर बैठ गया औऱ फट फट करने लगा।

कई  दिन बीत जाने के बाद पत्नी ने उससे पुछा की तुम रोज रसोई के दरवाजे पर बैठ कर बांस का फटका क्यों पीटते हो?

पति ने जवाब दिया कि
ये हमारे घर की परम्परा है इस मैं रोज ऐसा कर रहा हुँ।

माँ बाप अंधे थे बिल्ली को देख नही पाते उनकी मजबूरी थी इसलिये फटका लगाते थे। बेटा तो आँख का अंधा नही था पर अकल का अंधा था। इसलिये वह भी ऐसा करता जैसा माँ बाप करते थे।

ऐसी ही दशा आज के समाज की है। पहले शिक्षा का अभाव था इसलिए पाखंड वादी लोग जिनका स्वयं का भला हो रहा था उनके पाखंड वादी मूल्यों को माना औऱ अपनाया। जिनके पिछे किसी प्रकार का लौजिक  नही है। लेकिन आज के पढे लिखे हम वही पाखंडता भरी परम्पराओं व रूढी वादिता के वशीभूत हो कर जीवन जी रहे हैं।

इसलिये सबसे पहले समझौ,जानो ओर तब मानो तो समाज मे परिवर्तन होगा ।

"अपना दीपक स्वयं बनें"

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६९)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

अधिकांश क्षमता तो भव बन्धनों में ही पड़ी जकड़ी रहती है। भ्ज्ञव बन्धन क्या है? व्यामोह ही भव बन्धन है। भव बन्धनों में पड़ा हुआ प्राणी कराहता रहता है और हाथ पैर बंधे होने के कारण प्रगति पथ पर बढ़ सकने में असमर्थ रहता है। व्यामोह का माया कहते हैं।माया का अर्थ है नशे जैसी खुमारी जिसमें एक विशेष प्रकार की मस्ती होती है। साथ ही अपनी मूल स्थिति की विस्मृति भी जुड़ी रहती है। संक्षेप में विस्मृति और मस्ती के समन्वय को नशे की पिनक कहा जा सकता है, चेतना की इसी विचित्र स्थिति को माया, मूढ़ता, अविद्या, भव बन्धन आदि नामों से पुकारा जाता है।

ऐसी विडम्बना में किस कारण प्राणी बंधता, फंसता है? इस प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए आत्म दृष्टाओं ने विषयवती वृत्ति को इसका दोषी बताया है। विषयवती वृत्ति की प्रबलता को बन्धन का मूल कारण बताते हुये महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन के कुछ सूत्रों में वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला है।

विषयवती वा प्रवृत्तित्पत्रा मनसः स्थिति निबंधिनि ।
—यो. द. 1-35
सत्व पुरुषायोरत्यन्ता संकीर्णयोः प्रत्यया विशेषो भोगः । परार्धात्स्वार्थ संयतात्पुरुषा ज्ञानम् ।
—यो. द. 3-35
ततः प्रतिम श्रावण वेदनादर्शी स्वाद वार्ता जायन्ते ।
—यो. द. 3-36
उपरोक्त सूत्रीं में यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि शारीरिक विषय विकारों में आसक्ति बढ़ जाने से जीव अपनी मूल स्थिति को भूल जाता है और उन रसास्वादनों में निमग्न होकर भव बन्धनों में बंधता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)

भगवान को भावनाएँ अर्पित करने वाला कहलाता है भक्त

प्रतीक्षा के क्षणों में क्रमिक वृद्धि होती गयी। ऋषियों, देवों, सिद्धों, गन्धर्वों का समुदाय अपने मन, अन्तःकरण को भक्ति के भावप्रवाह में भिगोता रहा। बड़ा रसमय अनुभव हो रहा था सभी को। भक्ति, भक्त एवं भगवान की भावचर्चा जहाँ कहीं भी, जिस रूप में भी, जिस किसी के द्वारा भी होती है, वहाँ स्वयं ही भावों का अमृत प्रवाह उमगने लगता है। वहाँ अपने आप ही मन, अन्तःकरण शान्ति सुधा रस का अनुभव करने लगते हैं। तृप्ति, तुष्टि और शान्ति का जैसा अनुभव यहाँ होता है, वैसा और कहीं भी, किसी को भी नहीं होता। भावों का सरोवर ही एक ऐसा सरोवर है, जहाँ पर सभी का जी करता है कि डूबते रहें और डूबे ही रहें। हिमालय के सुपावन सान्निध्य में कुछ ऐसा ही सब अनुभव कर रहे थे। नीरवता और निःस्तब्धता अपनी परिभाषा को परिभाषित कर रही थी। काल बीत तो रहा था, परन्तु उसका ज्ञान किसी को नहीं था। सभी उसके प्रति निरपेक्ष, तटस्थ थे, परन्तु स्वयं काल भला कब किसी की ओर से निरपेक्ष रहा करता है।

उस सदा सजग, सचेष्ट एवं सक्रिय रहने वाले काल ने ब्रह्मर्षि क्रतु की भावसमाधि को भंग किया। ऋषियों में श्रेष्ठ क्रतु, बाह्य जगत् की ओर उन्मुख हुए। तभी एक हिमपक्षी ने सुरीली ध्वनि से निस्तब्धता-नीरवता में अपना स्वर घोला। इस स्वर में कुछ ऐसा था जैसे कि वह हिमपक्षी भी अगले सूत्र की जिज्ञासा को उजागर कर रहा हो। महर्षि क्रतु का ध्यान उस ओर गया। वह कुछ पलों तक मौन रहे, फिर उन्होंने देवर्षि नारद की ओर देखा। देवर्षि ने महर्षि क्रतु के नेत्रों में उनके अभिप्राय को पढ़ लिया। वह समझ गए कि वीतराग महर्षि अगले सूत्र के उच्चारण का संकेत कर रहे हैं। वैसे भी अब तक सभी के मन, भावों के अगम प्रवाह से बाहर आ चुके हैं। उन सबको अगले सूत्र के प्रकट होने की त्वरा थी।

इन शुभ क्षणों को पहचान कर देवर्षि ने अपनी संगीतमयी स्वर लहरियों के साथ उच्चारित किया-  
‘स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः’॥ ३०॥

ब्रह्मकुमारों (सनत्कुमारादि) के मत से भक्ति स्वयं फलरूपा है। इस सूत्र का उच्चारण करके देवर्षि पुनः मौन हो गए। उन्हें इस तरह शान्त देखकर ब्रह्मर्षि क्रतु ने कहा- ‘‘निःसन्देह देवर्षि! ब्रह्मकुमारों का कथन सत्य है। भक्ति में साधना, साधन एवं सिद्धि तीनों ही अन्तर्लीन हैं। जो भक्ति करते हैं- उन्हें किसी अन्य तत्त्व एवं सत्य की आवश्यकता नहीं रहती। वह भक्ति में सब कुछ पा लेते हैं।’’ क्रतु के इस कथन पर सप्तर्षियों ने अपनी सहमति जतायी। अन्य ऋषियों एवं देवगणों ने भी प्रसन्नता जाहिर की। हालांकि, अब भी सबको इस सूत्र के सत्य को विस्तार से जानने का मन था। उत्सुकता थी कि ब्रह्मकुमारों के मत का और देवर्षि के कथन का रहस्यार्थ जानें। भक्ति का सत्य एवं भक्त की गाथा सुनें। सभी के इन मनोभावों को देवर्षि ने अपने मन में अनुभव किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२३

मंगलवार, 28 सितंबर 2021

👉 😇स्वमूल्यांकन - अंतिम बार कब किया था?

अपनी कमजोरियों की लास्ट टाइम लिस्ट कब बनाई थी, और कमजोरी को अपनी ताकत बनाने की चेकलिस्ट लास्ट कब चेक की थी?

अपनी ताकतों (strength) की अंतिम बार लिस्ट कब बनाई थी? क्या वो ताकत अभी भी है या नहीं।

पढ़ने की आदत अभी है या अभ्यास छूट गया?

स्वयं पर कितना नियंत्रण कर पाते हैं? पहले ज्यादा कर पाते थे या अब?

अपनी पूरी दिनचर्या पर कड़ी नज़र कब रखी थी अंतिम बार?

अपने विचारों पर पूरे दिन अंतिम बार कब नज़र रखी थी, किस प्रकार के विचार मन मष्तिष्क में सबसे ज्यादा आते है? क्या ये हमें पता है? किस प्रकार की आदतें और संस्कार रोज बन रहे हैं? किस प्रकार हमारे चरित्र का निर्माण हो रहा है? क्या हमें पता है?

किसी अप्रिय विचार को दूर करने के लिए क्या शसक्त विचारों की फ़ौज, ज्ञान के हथियार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है या नहीं।

स्वयं विचार करें और ईश्वर और स्वयं को जवाब दें।

शनिवार, 25 सितंबर 2021

👉 पीहर या ससुराल

तीज का त्यौहार आने वाला था। तुलसी जी की दोनों बहुओं के पीहर से तीज का सामान भर भर के उनके भाइयों द्वारा पहुंचा दिया गया था। छोटी बहू मीरा का यह शादी के बाद पहला त्यौहार था। चूँकि मीरा के माता पिता का बचपन में ही देहांत हो जाने के कारण, उसके चाचा चाची ने ही उसे पाला था इसलिए और हमेशा हॉस्टल में रहने के कारण उसे यह सब रीति-रिवाजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। पढ़ने में होशियार मीरा को कॉलेज के तुरंत बाद जॉब मिल गई। आकाश और वो दोनों एक ही कंपनी में थे। जहां दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया और घरवालों ने भी बिना किसी आपत्ति के दोनों की शादी करवा दी। आज जब मीरा ने देखा कि उसकी जेठानियों के पीहर से शगुन में ढ़ेर सारा सुहाग का सामान, साड़ियां, मेहंदी, मिठाईयां इत्यादि आया है तो उसे अपना कद बहुत छोटा लगने लगा। पीहर के नाम पर उसके चाचा चाची का घर तो था, परंतु उन्होंने मीरा के पिता के पैसों से बचपन में ही हॉस्टल में एडमिशन करवा कर अपनी जिम्मेदारी निभा ली थी और अब शादी करवा कर उसकी इतिश्री कर ली थी। आखिर उसका शगुन का सामान कौन लाएगा, ये सोच सोचकर मीरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। जेठानियों को हंसी ठहाका करते देख उसे लगता शायद दोनों मिलकर उसका ही मजाक उड़ा रही हैं। आज उसे पहली बार मां बाप की सबसे ज्यादा कमी खल रही थी।
 
अगले दिन मीरा की सास तुलसी जी ने उसे आवाज लगाते हुए कहा, "मीरा बहू, जल्दी से नीचे आ जाओ, देखो तुम्हारे पीहर से तीज का शगुन आया है।" यह सुनकर मीरा भागी भागी नीचे उतरकर आँगन में आई और बोली, "चाचा चाची आए हैं क्या मम्मी जी? कहां हैं? मुझे बताया भी नहीं कि वे लोग आने वाले हैं!"मीरा एक सांस में बोलती चली गई। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके चाचा चाची भी कभी आ सकते हैं। तभी तुलसी जी बोलींं, "अरे नहीं, तुम्हारे चाचा चाची नहीं आए बल्कि भाई और भाभियां सब कुछ लेकर आए हैं।"  मीरा चौंंककर बोली, "पर मम्मी जी मेरे तो कोई भाई नहीं हैं फिर...??"

"ड्रॉइंग रूम में जाकर देखो, वो लोग तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं"। तुलसी जी ने फिर आँखे चमकाते हुए कहा। मीरा कशमकश में उलझी धीरे धीरे कदम बढ़ाती हुई, ड्रॉइंग रूम में घुसी तो देखा उसके दोनों जेठ जेठानी वहां पर सारे सामान के साथ बैठे हुए थे। पीछे-पीछे तुलसी जी भी आ गईंं और बोलींं, "भई तुम्हारे पीहर वाले आए हैं, खातिरदारी नहीं करोगी क्या?" मीरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो कभी सास को देखती तो कभी बाकी सभी लोगों को। उसके मासूम चेहरे को देख कर सबकी हंसी छूट पड़ी।
तुलसी जी बोलींं, "कल जब तुम्हारी जेठानियों के पीहर से शगुन आया था तो हम सबने ही तुम्हारी आंखों में वह नमी देख ली थी। जिसमें माता पिता के ना होने का गहरा दुःख समाया था। पीहर की महत्ता हम औरतों से ज्यादा कौन समझ सकता है भला! इसलिए हम सबने तभी तय कर लिया था कि आज हम सब एक नया रिश्ता कायम करेंगे और तुम्हें तुम्हारे पीहर का सुख जरूर देंगे। "मीरा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिन रिश्तोंं से उसे कल तक मजाक बनने का डर सता रहा था। उन्हीं रिश्तों ने आज उसे एक नई सोच अपनाकर उसका पीहर लौटा दिया था। मीरा की आंखों से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे।।

समाज में एक नई सोच को जन्म देने वाले उसके ससुराल वालों ने मीरा का कद बहुत ऊंचा कर दिया था। साथ ही साथ अपनी बहू के ससुराल को ही अपना पीहर बनाकर समाज में उनका कद बहुत ऊंचा उठ चूका था।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६८)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

विकासवाद के सिद्धान्त के समर्थक यह कहते हैं कि अपने सुविधापूर्ण जीवन के लिए इच्छा ने उन जीवों के शरीर संस्थानों में अन्तर किया और यह अन्तर स्पष्ट होते-होते एक जीव से दूसरी किस्म का उसी से मिलता हुआ जीव विकसित होता गया। थोड़ी देर के लिये यह बात मान लें और मनुष्य शरीर को इस कसौटी पर कसें तो भी बात विकासवाद के विपरीत ही बैठेगी। मनुष्य कब से पक्षियों को देखकर आकाश में स्वतन्त्र उड़ने को लालायित है किन्तु उसके शरीर में कहीं कोई पंख उगा क्या, समुद्र में तैरते जहाज देखकर हर किसी का मन करने लगता है कि हम भी गोता लगायें और मछलियों की तरह कहीं से कहीं जाकर घूम आयें, पर वह डूबने से बच पायेगा क्या?

यह प्रश्न अब उन लोगों को भी विपरीत दिशा में सोचने और परमात्म-सत्ता के अस्तित्व में होने की बात मानने को विवश करते हैं जो कभी इस सिद्धान्त के समर्थक रहे हैं। राबर्ट ए मिल्लीकान का कथन है—विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में ही वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा पैदा करती है आम के बीज से इमली पैदा करने की शक्ति प्रकृति में नहीं है। इस तरह के बीज और ऊपर वर्णित विलक्षण रचनायें पैदा करने वाली सत्ता एकमात्र परमात्मा ही हो सकता है। वही अपने आप में एक परिपूर्ण सत्ता है और वही विभिन्न इच्छाओं, अनुभूतियों, गुण तथा धर्म वाली परिपूर्ण रचनायें सृजन करता है।

क्रमिक विकास को नहीं भारतीय दर्शन पूर्णता-पूर्णता की उत्पत्ति मानता है। श्रुति कहती है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते ।।

अर्थात्—पूर्ण परम ब्रह्म परमात्मा से पूर्ण जगत—पूर्ण मानव की उत्पत्ति हुई। पूर्ण से पूर्ण निकाल देने से पूर्ण ही शेष रहता है।

नदी का एक किनारा समुद्र से जुड़ा रहता है और दूसरा किनारा उससे दूर होता है। दूर होते हुए भी नदी समुद्र से अलग नहीं। नदी को जल समुद्र द्वारा प्राप्त होता है और पुनः समुद्र में मिल जाता है। जगत उस पूर्ण ब्रह्म से अलग नहीं। मनुष्य उसी पूर्ण ब्रह्म से उत्पन्न हुआ इसलिये अपने में स्वयं पूर्ण है यदि इस पूर्णता का भान नहीं होता, यदि मनुष्य कष्ट और दुःखों से त्राण नहीं पाता तो इसका एकमात्र कारण उसका अज्ञान और अहंकार में पड़े रहना ही हो सकता है। इतने पर भी पूर्णता हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा है और वह नैसर्गिक रूप से हर किसी में विद्यमान रहती है।

क्षुद्रता की परिधि को तोड़कर पूर्णता प्राप्त कर लेना हर किस के लिये सम्भव है। मनुष्य की चेतन सत्ता में वह क्षमता मौजूद है, जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का उपयोग कर देवोपम जीवन जी सकता है। यह क्षमता उसने खो दी है। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर का लाभ उस क्षमता से उठा सकना सम्भव होता है। यह उस प्रचण्ड क्षमता का एक स्वरूप अंश मात्र है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)

भक्ति और ज्ञान में विरोध कैसा?
    
महान भक्त एवं परम ज्ञानी ऋषि श्वेताक्ष के साधना जीवन की एक और भी विशेषता थी- उन्होंने ज्ञान और भक्ति में परस्पर अभेद का अनुभव किया था। वह कहते थे कि सभी विचारधाराएँ, विविध सरिताओं की भांति हैं, जो कहीं न कहीं परस्पर मिलती हैं। भले ही यह मिलन, सरिता का सरिता में हो अथवा फिर सरिता का सागर में। ज्ञान हो या भक्ति, इसके विविध पथों या मतों में परस्पर विरोध सम्भव नहीं। विरोध वही करते हैं जो अनुभव से रीते हैं, जो केवल तर्कों एवं विचारों तक सीमित हैं। यही वजह थी कि ऋषि श्वेताक्ष जब मुखर होते थे, तो सभी मतों एवं पथों का, ज्ञान एवं भक्ति की विविध धाराओं का स्वाभाविक संगम हो जाता था। उनका यह अनूठापन सभी को बहुत भाता था।
    
देवर्षि के वह परम प्रिय थे। उन्हें सर्वप्रथम मार्गदर्शन उन्हीं से मिला था। उन दिनों वह विन्ध्याचल में तप कर रहे थे। विन्ध्याचल के वनप्रान्त में एकाकी-निराहार रहकर भगवती की आराधना कर रहे इस बालक के प्रेम ने माँ को द्रवित कर दिया। उन्होंने ही देवर्षि से कहा- विन्ध्य के भीषण महाअरण्य में निराहार रहकर तप कर रहे इस पाँच साल के बालक को तुम्हारी आवश्यकता है। जगदम्बा के आदेश को शिरोधार्य करके वह उनसे मिले थे। इस प्रथम भेंट में देवर्षि को बीते युगों की याद ताजा हो आयी। जब वह कभी धु्रव-प्रह्लाद से मिले थे, श्वेताक्ष भी उन्हें उन्हीं का प्रतिरूप एवं समरूप मिले। देवर्षि के मार्गदर्शन ने उन्हें भावमय अन्तर्विवेक दिया। फिर क्या था श्वेताक्ष की प्रगाढ़ पुकार से जगन्माता ने उन्हें अपने आंचल की छांव में ले लिया। भगवान् दक्षिणामूर्ति महेश्वर के मुख से उन्हें शास्त्रों का अनुभव पूर्णज्ञान हुआ। आज वही श्वेताक्ष भक्ति की इस महासभा में थे और देवर्षि को निहारे जा रहे थे। सम्भवतः कुछ कहने को उत्सुक थे।
    
उनकी विचार उर्मियों ने देवर्षि के अन्तस को स्पर्श किया। उनकी चेतना किंचित बहिर्मुख हुई। अन्तरिक्ष को निहारती उनकी आँखों ने श्वेताक्ष की ओर देखा और वह थोड़े मुस्कराए, फिर बोले, ‘‘कुछ कहना चाहते हो पुत्र?’’ उत्तर में श्वेताक्ष कुछ बोल न सके, बस विनम्र भाव से सप्तर्षिमण्डल के परमर्षियों की ओर देखते रहे। इन महिमामय महर्षियों ने उनकी भावमुद्रा परख ली। वह समझ गए कि श्वेताक्ष को अपनी बात कहने में संकोच हो रहा है, सम्भवतः यह उनकी विनम्रता के कारण था। ऐसे में ब्रह्मर्षि वसिष्ठ, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र सहित सभी सप्तर्षियों ने कहा- ‘‘पुत्र! देवर्षि नारद की ही भांति हम सभी को तुम प्रिय हो। अतः जो कहना चाहते हो, निःसंकोच कहो।’’
    
देवर्षि सहित सभी सप्तर्षियों व महर्षियों से आश्वस्ति पाकर श्वेताक्ष विनम्र स्वर में बोले- ‘‘आप सभी के समक्ष मैं बालक हूँ, मेरा अनुभव भी थोड़ा है। फिर भी जो भी अनुभव है, वह यही कहता है कि भक्ति और ज्ञान विलग नहीं रह सकते। वह अन्तःकरण में साथ ही साथ प्रकट होते हैं और इनका विकास भी साथ-साथ ही होता है।’’ श्वेताक्ष के इस कथन ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के ध्यान को आकर्षित किया। वह बोले- ‘‘पुत्र! तुम अपने कथन का विस्तार करो।’’ उत्तर में श्वेताक्ष ने कहा- ‘‘भगवन! हृदय में प्राथमिक आध्यात्मिक जिज्ञासा के साथ भाव एवं विवेक का उदय प्रायः एक साथ ही होता है। फिर साधक की साधना के अनुसार जब उसका चित्त शुद्ध होता है, तब उसी के अनुरूप भक्ति एवं ज्ञान भी परिपक्व होते जाते हैं।
    
जब तक चित्त अशुद्ध है, तब तक न तो यथार्थ ज्ञान का उदय होता है और न यथार्थ भक्ति का। ज्ञान के नाम पर केवल शब्द, विचार एवं तर्कों का केवल आडम्बर होता है और भाव के नाम पर केवल आवेग उभरते हैं। अनुभवहीनजन इन्हें ही ज्ञान एवं भक्ति मानकर सन्तोष कर लेते हैं। यही नहीं, वे अपनी अज्ञानता के कारण भक्ति एवं ज्ञान में भेद भी करते हैं। जबकि यथार्थ स्थिति में भेद तो विचार, तर्क एवं आवेगपूर्ण भावों में होता है। ऐसी स्थिति में इनमें परस्पर का सम्बन्ध होता भी नहीं।
    
परन्तु जब साधक अपनी साधना की डगर में चलते हुए चित्तशुद्धि की दिशा में बढ़ता है, तो उसमें स्वाभाविक ही शुद्ध भाव अंकुरित होते हैं और साथ ही उदय होती है समाधिजा प्रज्ञा। ये दोनों ही साधक को चित्तशुद्धि के प्रसाद के रूप में मिलती हैं। जैसे-जैसे चित्तशुद्धि परिपक्व एवं प्रगाढ़ होती है, वैसे-वैसे इनका विकास भी होता है- शिवज्ञान बनकर। जिस तरह शिव एवं शक्ति, भव एवं भवानी अभेद हैं, ठीक उसी तरह से भक्ति एवं ज्ञान में भी भेद नहीं है। क्योंकि दोनों ही एक साथ शुद्ध चित्त से प्रकट होते हैं।’’
    
ऋषि श्वेताक्ष की बातें सभी को प्रिय लगी। सभी को उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता का अनुभव हुआ। देवर्षि ने पुलकित होकर उन्हें गले से लगाया और सिर पर हाथ फेरा। श्वेताक्ष भी देवर्षि का यह स्नेह पाकर धन्य हो गए। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘पुत्र! तुम्हारे बारे में सुना तो बहुत था, परन्तु आज देखा भी। सचमुच ही तुम सब अवस्थाओं में, भेद में अभेद को अनुभव करते हो। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय में अभेद का एक जैसा अनुभव होने से ही ये बातें कही जा सकती हैं।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन के उत्तर में श्वेताक्ष केवल इतना कह सके, ‘‘आपके आशीष से मैं अनुग्रहीत हुआ भगवन्!’’ इसके बाद उन्होंने चुप्पी साध ली। सम्भवतः उन्हें एक नये सूत्र सत्य की प्रतीक्षा थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२१

👉 परलोक कहाँ है? (अंतिम भाग)

जो क्रोधी है उसे दूसरों की ओर से क्रोध पूर्ण व्यवहार अपने ऊपर होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। जो अनुदार है उसके साथ में अन्य व्यक्तियों को अनुदारत...