शनिवार, 25 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)

भक्ति और ज्ञान में विरोध कैसा?
    
महान भक्त एवं परम ज्ञानी ऋषि श्वेताक्ष के साधना जीवन की एक और भी विशेषता थी- उन्होंने ज्ञान और भक्ति में परस्पर अभेद का अनुभव किया था। वह कहते थे कि सभी विचारधाराएँ, विविध सरिताओं की भांति हैं, जो कहीं न कहीं परस्पर मिलती हैं। भले ही यह मिलन, सरिता का सरिता में हो अथवा फिर सरिता का सागर में। ज्ञान हो या भक्ति, इसके विविध पथों या मतों में परस्पर विरोध सम्भव नहीं। विरोध वही करते हैं जो अनुभव से रीते हैं, जो केवल तर्कों एवं विचारों तक सीमित हैं। यही वजह थी कि ऋषि श्वेताक्ष जब मुखर होते थे, तो सभी मतों एवं पथों का, ज्ञान एवं भक्ति की विविध धाराओं का स्वाभाविक संगम हो जाता था। उनका यह अनूठापन सभी को बहुत भाता था।
    
देवर्षि के वह परम प्रिय थे। उन्हें सर्वप्रथम मार्गदर्शन उन्हीं से मिला था। उन दिनों वह विन्ध्याचल में तप कर रहे थे। विन्ध्याचल के वनप्रान्त में एकाकी-निराहार रहकर भगवती की आराधना कर रहे इस बालक के प्रेम ने माँ को द्रवित कर दिया। उन्होंने ही देवर्षि से कहा- विन्ध्य के भीषण महाअरण्य में निराहार रहकर तप कर रहे इस पाँच साल के बालक को तुम्हारी आवश्यकता है। जगदम्बा के आदेश को शिरोधार्य करके वह उनसे मिले थे। इस प्रथम भेंट में देवर्षि को बीते युगों की याद ताजा हो आयी। जब वह कभी धु्रव-प्रह्लाद से मिले थे, श्वेताक्ष भी उन्हें उन्हीं का प्रतिरूप एवं समरूप मिले। देवर्षि के मार्गदर्शन ने उन्हें भावमय अन्तर्विवेक दिया। फिर क्या था श्वेताक्ष की प्रगाढ़ पुकार से जगन्माता ने उन्हें अपने आंचल की छांव में ले लिया। भगवान् दक्षिणामूर्ति महेश्वर के मुख से उन्हें शास्त्रों का अनुभव पूर्णज्ञान हुआ। आज वही श्वेताक्ष भक्ति की इस महासभा में थे और देवर्षि को निहारे जा रहे थे। सम्भवतः कुछ कहने को उत्सुक थे।
    
उनकी विचार उर्मियों ने देवर्षि के अन्तस को स्पर्श किया। उनकी चेतना किंचित बहिर्मुख हुई। अन्तरिक्ष को निहारती उनकी आँखों ने श्वेताक्ष की ओर देखा और वह थोड़े मुस्कराए, फिर बोले, ‘‘कुछ कहना चाहते हो पुत्र?’’ उत्तर में श्वेताक्ष कुछ बोल न सके, बस विनम्र भाव से सप्तर्षिमण्डल के परमर्षियों की ओर देखते रहे। इन महिमामय महर्षियों ने उनकी भावमुद्रा परख ली। वह समझ गए कि श्वेताक्ष को अपनी बात कहने में संकोच हो रहा है, सम्भवतः यह उनकी विनम्रता के कारण था। ऐसे में ब्रह्मर्षि वसिष्ठ, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र सहित सभी सप्तर्षियों ने कहा- ‘‘पुत्र! देवर्षि नारद की ही भांति हम सभी को तुम प्रिय हो। अतः जो कहना चाहते हो, निःसंकोच कहो।’’
    
देवर्षि सहित सभी सप्तर्षियों व महर्षियों से आश्वस्ति पाकर श्वेताक्ष विनम्र स्वर में बोले- ‘‘आप सभी के समक्ष मैं बालक हूँ, मेरा अनुभव भी थोड़ा है। फिर भी जो भी अनुभव है, वह यही कहता है कि भक्ति और ज्ञान विलग नहीं रह सकते। वह अन्तःकरण में साथ ही साथ प्रकट होते हैं और इनका विकास भी साथ-साथ ही होता है।’’ श्वेताक्ष के इस कथन ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के ध्यान को आकर्षित किया। वह बोले- ‘‘पुत्र! तुम अपने कथन का विस्तार करो।’’ उत्तर में श्वेताक्ष ने कहा- ‘‘भगवन! हृदय में प्राथमिक आध्यात्मिक जिज्ञासा के साथ भाव एवं विवेक का उदय प्रायः एक साथ ही होता है। फिर साधक की साधना के अनुसार जब उसका चित्त शुद्ध होता है, तब उसी के अनुरूप भक्ति एवं ज्ञान भी परिपक्व होते जाते हैं।
    
जब तक चित्त अशुद्ध है, तब तक न तो यथार्थ ज्ञान का उदय होता है और न यथार्थ भक्ति का। ज्ञान के नाम पर केवल शब्द, विचार एवं तर्कों का केवल आडम्बर होता है और भाव के नाम पर केवल आवेग उभरते हैं। अनुभवहीनजन इन्हें ही ज्ञान एवं भक्ति मानकर सन्तोष कर लेते हैं। यही नहीं, वे अपनी अज्ञानता के कारण भक्ति एवं ज्ञान में भेद भी करते हैं। जबकि यथार्थ स्थिति में भेद तो विचार, तर्क एवं आवेगपूर्ण भावों में होता है। ऐसी स्थिति में इनमें परस्पर का सम्बन्ध होता भी नहीं।
    
परन्तु जब साधक अपनी साधना की डगर में चलते हुए चित्तशुद्धि की दिशा में बढ़ता है, तो उसमें स्वाभाविक ही शुद्ध भाव अंकुरित होते हैं और साथ ही उदय होती है समाधिजा प्रज्ञा। ये दोनों ही साधक को चित्तशुद्धि के प्रसाद के रूप में मिलती हैं। जैसे-जैसे चित्तशुद्धि परिपक्व एवं प्रगाढ़ होती है, वैसे-वैसे इनका विकास भी होता है- शिवज्ञान बनकर। जिस तरह शिव एवं शक्ति, भव एवं भवानी अभेद हैं, ठीक उसी तरह से भक्ति एवं ज्ञान में भी भेद नहीं है। क्योंकि दोनों ही एक साथ शुद्ध चित्त से प्रकट होते हैं।’’
    
ऋषि श्वेताक्ष की बातें सभी को प्रिय लगी। सभी को उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता का अनुभव हुआ। देवर्षि ने पुलकित होकर उन्हें गले से लगाया और सिर पर हाथ फेरा। श्वेताक्ष भी देवर्षि का यह स्नेह पाकर धन्य हो गए। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘पुत्र! तुम्हारे बारे में सुना तो बहुत था, परन्तु आज देखा भी। सचमुच ही तुम सब अवस्थाओं में, भेद में अभेद को अनुभव करते हो। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय में अभेद का एक जैसा अनुभव होने से ही ये बातें कही जा सकती हैं।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन के उत्तर में श्वेताक्ष केवल इतना कह सके, ‘‘आपके आशीष से मैं अनुग्रहीत हुआ भगवन्!’’ इसके बाद उन्होंने चुप्पी साध ली। सम्भवतः उन्हें एक नये सूत्र सत्य की प्रतीक्षा थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२१

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