बड़ा गहरा है—प्राण व मन का नाता
जो योग साधना के मर्म को जानते हैं, उन्हें मालूम है कि प्राण प्रवाह को शुद्ध किये बिना साधना में सफलता सम्भव नहीं है। तपस्वी के तप, भक्त की भक्ति और योगी के योग से सबसे पहले प्राण निर्मल होते हैं। ऐसा होने पर ही इनकी साधना आगे बढ़ती है। प्राणों का मल वासना है। वर्तमान स्थिति में प्राण वासना से गंदले और धुँधले हैं। वासना के आवेग इन्हें प्रेरित, प्रवर्तित, परिवर्तित और उद्वेलित करते हैं। वासना इन्हें जिधर मोड़ती है, प्राण उधर ही मुड़ जाती है। साधना जीवन का यह ऐसा विकट सत्य है, जिसे प्रत्येक साधक अपनी साधना में कभी न कभी अनुभव करता है। जो साधक सावधान और जागरूक होते हैं, वे अपनी साधना के प्रारम्भ में ही इस समस्या का हल ढूँढ लेते हैं। जो इस सावधानी से चूक जाते हैं, उन्हें आगे चलकर भटकाव व पतन के महाव्यूह में फँसना पड़ता है।
महर्षि पतंजलि योग साधना के सभी रहस्यों के गहरे ज्ञानी हैं। इसीलिए वे अपने योग सूत्रों में साधकों व साधना की सभी उलझनों को एक-एक करके सुलझाते हैं। व्यवहार के परिमार्जन से संस्कारों के परिमार्जन की प्रक्रिया सुझाने के साथ महर्षि बताते हैं कि मंजिल तक पहुँचने के लिए राहें और भी हैं। महर्षि पतंजलि अध्यात्म विज्ञान के महान् वैज्ञानिक हैं और वे अपनी वैज्ञानिक अभिवृत्ति के अनुरूप नयी प्रक्रियाएँ व नयी तकनीकें विकसित करते हैं। इस नये सूत्र में उनकी एक नयी तकनीक का प्रस्तुतीकरण है-
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥ १/३४॥
शब्दार्थ- वा= अथवा, प्राणस्य = प्राणवायु को, प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् = बारम्बार बाहर निकालने व रोकने के अभ्यास से भी चित्त निर्मल होता है।
अर्थात् बारी-बारी से श्वास बाहर छोड़ने और रोकने से भी मन शान्त होता है।
महर्षि अपने इस सूत्र में बड़ी अद्भुत बात कहते हैं-वे बताते हैं कि प्राण व मन का जोड़ गहरा है। कहीं गहरे में प्राणों में मन घुला हुआ है, ठीक इसी तरह से प्राण भी मन में घुले हुए हैं। श्वास और विचार गहरे में एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। जब हमारे विचारों की गुणवत्ता में परिवर्तन आता है, तो श्वास भी परिवर्तित हो जाती है। विचारों में क्रोध का उद्वेलन हो या कामुकता का ज्वार उठे, तो श्वास की लय बदले बिना नहीं रहती। इसी तरह यदि विचारों में गहरी शान्ति, समरसता व सामंजस्य हो तो श्वास की लय भी सुरीली हो जाती है। इस सत्य व सिद्धान्त के आधार पर ही हठयोग में प्राणायाम का सम्पूर्ण विधान रचा गया है। हठयोग कहता है कि प्राण को यदि साध लिया जाय, तो मन अपने आप ही सध जायेगा। महर्षि अपने सूत्रों व प्रयोगों में हठयोग की जटिलता तो नहीं बताते, परन्तु प्राणशोधन की आवश्यकता अवश्य बताते हैं। वे कहते हैं कि यदि श्वास के आवागमन को लयबद्ध किया जाय, तो चित्त भी लयबद्ध हो जायेगा।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

























