गुरुवार, 16 मई 2019

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 4)

परिवार निर्माणः-

(१) परिवार को अपनी विशिष्टताओं को उभारने अभ्यास करने एवं परिपुष्ट बनाने की प्रयोगशाला, पाठशाला समझे। इस उद्यान मे सत्प्रवृत्तियों के पौधे लगाये। हर सदस्य को स्वावलम्बी सुसंस्कारी एवं समाजनिष्ठ बनाने का भरसक प्रयत्न करें। इसके लिए सर्वप्रथम ढालने वाले साँचे की तरह आदर्शवान बने ताकि स्वयं कथनी और करनी की एकता का प्रभाव पड़े। स्मरण रहे सांचे के अनुसार ही खिलौने ढलते हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व में सर्वप्रथम है संचालक का आदर्शवादी ढांचे में ढलना। दूसरा है माली की तरह हरे पौधे का शालीनता के क्षेत्र में विकसित करना।

(२) परिवार की संख्या न बढ़ायें। अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। इसमें जननी का स्वास्थ्य, सन्तान का भविष्य, गृहपति का अर्थ सन्तुलन एवं समाज में दारिद्र्य, असन्तोष बढ़ता है। दूसरों के बच्चे को अपना मानकर उनके परिपालन से वात्सल्य कहीं अधिक अच्छी तरह निभ सकता है। लड़की- लड़कों में भेद न करें। पिछली पीढ़ी और वर्तमान के साथियों के प्रति कर्तृत्व पालन तभी हो सकता है, जब नये प्रजनन को रोकें। अन्यथा प्यार और धन प्रस्तुत परिजनों का ऋण चुकाने में लगने की अपेक्षा उनके लिए बहने लगेगा, जिनका अभी अस्तित्व तक नहीं है। इसलिए उस सम्बन्ध में संयम बरतें और कड़ाई रखें।

(३) संयम और सज्जनता एक तथ्य के दो नाम हैं। परिवार में ऐसी परम्परायें प्रचलित करें जिसमें इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का अभ्यास आरम्भ से ही करते रहने का अवसर मिले। घर में चटोरेपन का माहौल न बनाया जाये। भोजन सात्विक बने और नियत समय पर सीमित मात्रा में खाने का ही अभ्यास बने। कामुकता को उत्तेजना न मिले, सभी की दिनचर्या निर्धारित रहे। समय के साथ काम और मनोयोग जुड़ा रहे। किसी को आलस्य- प्रमाद की आदत न पड़ने दी जाय और न कोई आवारागर्दी अपनाये व कुसंग में फिरे। फैशन और जेवर को बचकाना, उपहासास्पद माना जाय, केश विन्यास और अश्लील, उत्तेजक पोशाक कोई न पहनें और न जेवर आभूषणों से लदें। नाक, कान छेदने और उनके चित्र- विचित्र लटकन लटकाने का पिछड़ेपन का प्रतीत फैशन कोई महिला न अपनाये।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 17)

PRARABDHA KARMAS
(Karmas done with strong emotional involvement):

Mental karmas, which are voluntarily, deliberately performed under strong emotional stimuli, are known as Prarabdha Karmas. Being motivated by intense emotions, such karmas produce powerful samskars. Reactions of violent acts like murder, robbery, betrayal, felony or immoral passionate acts like adultery are very strongly felt by the inner conscience. Its innate spiritual purity is ever eager to get rid of this extraneous deleterious impurity at the earliest opportunity.

It has already been mentioned that our inner conscience keeps a constant watch over each of our karmas and determines greater or lesser punishment for each offence according to the nature of the act. A mental chastisement for a mental offence is however not possible without the help of other means. For giving an appropriate punishment, the inner conscience waits for a suitable environment in the subtle world (Sukshma Lok in spiritual parlance, where the divine system correlates samskars and creates environment for justice).

Occasionally this process is spread over a long time. For instance, for redemption of a mental sin of treachery, the sinner is required to be punished by grief. Chitragupta evaluates the grade of treachery to decide the degree of sorrow required for atonement. For punishing a murderer, the divine system will associate the soul of the sinner with the soul of an individual who, according to its own karmas, can inflict the same degree of pain and grief on the sinner, which latter has caused to the aggrieved person. For instance, Chitragupta may plan birth of a son or daughter in the family of the sinner, who (the new born) is destined to die at a young age according to its own past karmas. The inner conscience of the killer will wait for grief-producing event when the son/daughter meets death by disease or accident. In this way, for samskars carried over to next life, divine justice creates an environment for punishment equivalent to the sin.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 30

बुधवार, 15 मई 2019

👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 3)

(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।

(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।

कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकांक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटायें पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 16)

SANCHIT KARMAS (Involuntary Mental Karmas):

Being extremely feeble, the samskars produced by Sanchit Karmas may remain in a dormant state in the psyche for thousands of years through successive births. These samskars generally remain inactive, but if a suitable stimulant is provided to them by deliberate, strong, conscious repetition of similar deeds, these, too become active. In the company of strong healthy horses,a lame horse too begins to trot.

With good soil and adequate rains even rotten seeds germinate. Association with identical samskars makes the week samskars gain strength, whereas if the past samskars repeatedly come in contact with the opposite type of samskars, the former are completely wiped out. If for a long duration evil samskars face a long continuous inflow of good samskars, the latter destroy them totally. As a matter of fact, the good as well as bad Sanchit Samskars bear fruit in favorable environments and are destroyed when confronted with an adverse milieu. Pilgrimages and rituals recommended in religious practices are meant to wipe out the weak, evil samskars accumulated as Sanchit Karmas.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 29

👉 आलसी का भविष्य आज का सद्चिंतन


👉 विजय और पराजय का रहस्य प्रेरणादायक प्रसंग


मंगलवार, 14 मई 2019

👉 Today Thought Gurudev Ki Asha


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pehle Patrta Viksit Karo


👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 2)

प्रज्ञा साधकों के लिए उपरोक्त तीन क्षेत्र के लिए इस प्रकार हैः-

व्यक्तित्व का विकास

(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य काम- काजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।

(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।

(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 13 मई 2019

👉 आज का सद्चिंतन Today Thought 13 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Pakshpaat Nahi Kare 13 May 2019


👉 जीवन साधना के त्रिविध पंचशील (भाग 1)

साधना चाहे घर पर की जाय अथवा एकान्तवास में रहकर, मनःस्थिति का परिष्कार उसका प्रधान लक्ष्य होना चाहिए। साधना का अर्थ यह नहीं कि अपने को नितान्त एकाकी अनुभव कर वर्तमान तथा भावी जीवन को नहीं, मुक्ति- मोक्ष को, परलोक को लक्ष्य मानकर चला जाय। साधना विधि में चिन्तन क्या है, आने वाले समय को साधक कैसा बनाने और परिष्कृत करने का संकल्प लेकर जाना चाहता है, इसे प्रमुख माना गया है। व्यक्ति, परिवार और समाज इन तीनों ही क्षेत्रों में बँटे जीवन सोपान को व्यक्ति किस प्रकार परिमार्जित करेंगे, उसकी रूपरेखा क्या होगी, इस निर्धारण में कौन कितना खरा उतरा इसी पर साधना की सफलता निर्भर है।

कल्प साधना में भी इसी तथ्य को प्रधानता दी गयी है। एक प्रकार से यह व्यक्ति का समग्र काया कल्प है, जिसमें उसका वर्तमान वैयक्तिक जीवन, पारिवारिक गठबंधन तथा समाज सम्पर्क तीनों ही प्रभावित होते हैं। कल्प साधकों को यही निर्देश दिया जाता है कि उनके शान्तिकुञ्ज वास की अवधि में उनकी मनःस्थिति एकान्त सेवी, अन्तर्मुखी, वैरागी जैसी होनी चाहिए। त्रिवेणी तट की बालुका में माघ मास की कल्प साधन फूस की झोपड़ी में सम्पन्न करते हैं। घर परिवार से मन हटाकर उस अवधि में मन को भगवद् समर्पण में रखते हैं। श्रद्धा पूर्वक नियमित साधना में संलग्न रहने और दिनचर्या के नियमित अनुशासन पालने के अतिरिक्त एक ही चिन्तन में निरत रहना चाहिये, कि काया कल्प जैसी मनःस्थिति लेकर कषाय- कल्मषों की कीचड़ धोकर वापस लौटना है। इसके लिए भावी जीवन को उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा निर्धारित करने का ताना- बाना बुनते रहना चाहिये।

व्यक्ति, परिवार और समाज के त्रिविध क्षेत्रों में जीवन बंटा हुआ हैं, इन तीनों को ही अधिकाधिक परिष्कृत करना इन दिनों लक्ष्य रखना चाहिये। इस सन्दर्भ में त्रिविध पंचशीलों के कुछ परामर्श क्रम प्रस्तुत हैं। भगवान बुद्ध ने हर क्षेत्र के लिए पंचशील निर्धारित किये थे।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 11 मई 2019

भक्ति के तीन पथ Bhakti Ke Teen Path | डॉ चिन्मय पंड्या



Title

👉 हीरों का हार

मित्रो ! हमारा मन है कि हमारे पास दस हजार ऐसे व्यक्ति हों, जिनकी हम #माला पहनें, जो हमारे साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलें। हमारी व उनकी एक आवाज हो, एक दिशा हो तथा लगातार मिलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। उन्हें किसी बात का डर या भय न हो। इस वर्ष हमारी इच्छा दस हजार हीरे का हार पहनने की है। जब हमारा जुलूस निकले, तो जनता यह समझे कि यह बहुत मालदार आदमी है, बहुत शानदार आदमी है, वजनदार आदमी है।

यहाँ दस हजार हीरों से मेरा मतलब है कि दस हजार ऐसे साथी हो जाएँ, जो नियमित रूप से हमारे कार्य अर्थात् मिशन के लिए समयदान दे सकें। #पैसे की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमारे हाथ-पाँव मजबूत हो जाएँ। हाथ-पाँव से हमारा मतलब आपसे है। आप हमारे चलते-फिरते हाड़-माँस के #शक्तिपीठ बन जाएँ। हमने जो उम्मीद शक्तिपीठों से लगाई थी, वह आप स्वयं पूरा करना शुरू कर दें। हमें ज्ञानरथ के लिए नौकर नहीं चाहिए। हमें इसके लिए आपका समयदान चाहिए। विवेकानंद, गाँधी, विनोबा का काम स्वयं उन्होंने किया। इसी तरह यह काम आपको करने होंगे। आपके पास चौबीस घंटे हैं। आठ घंटे काम के लिए, सात घंटे सोने के लिए, पाँच घंटे नित्य काम के लिए रख लें, तो भी आपके पास चार घंटे बचते हैं। आपको नियमित रूप से चार घंटे नित्य मिशन के लिए, समाज के लिए, भगवान् के लिए देना चाहिए।

प. पू. गुरुदेव द्वारा १९८५ में श्रावणी की
पूर्व संध्या पर दिये प्रवचन में से

👉 आज का सद्चिंतन 11 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 May 2019


👉 आत्मवत् सर्व भूतेषु:-

महामुनि मेतार्य ने कृच्छ चांद्रायण तप विधिवत सम्पन्न किया। अनुष्ठान काल में सम्पूर्ण एक मास केवल आँवला के फलों पर ही निर्वाह किया, इससे उनके शरीर में दुर्बलता तो थी किन्तु तपश्चर्या से अर्जित प्राण शक्ति और आँवले के कल्प के कारण उनके सम्पूर्ण शरीर में तेजोवलय स्पष्ट झलक रहा था।

अनुष्ठान समाप्त कर वे राजगृह की ओर चल पड़े। नियमानुसार वे दिन में एक बार किसी सद्गृहस्थ के घर भोजन ग्रहण कर लोक-कल्याण के कार्यों में जुटे रहते थे। उनकी लोक कल्याणकारी वृति देख कर मगध का हर नागरिक उनके आतिथ्य को अपना परम सौभाग्य मानता था।

आज वे राजगृह के स्वर्णकार के द्वार पर खड़े थे। स्वर्णकार कोई आभूषण बनाने के लिये स्वर्ण के छोटे-छोटे गोल, दाने बना कर ढेर करता जा रहा था। द्वार पर खड़े मेतार्य को देखा तो उसका हाथ वही रुक गया “ अतिथि देवोभव “ कहकर उसने मुनि मेतार्य का हार्दिक स्वागत किया। उनकी भिक्षा का प्रबन्ध करने के लिए जैसे ही वह अन्दर गया वृक्ष पर बैठे पक्षी उतर कर वहाँ आ गये जहाँ स्वर्णकार सोने के दाने गढ़ रहा था।

उन्होंने इन दानों को अन्न समझा सो जब तक स्वर्णकार वापस लौटे सारे दाने चुग डाले और उड़कर डाली में जा बैठे।

स्वर्णकार बाहर आया और सोने के बिखरे दानों को गायब पाया तो उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। उसने देख द्वार पर मुनि मेतार्य चुपचाप बैठे है आतिथ्य भूल गया-पूछा- “आचार्य प्रवर यहाँ कोई आया तो नहीं|”

“नहीं तात! मेरे सिवाय और तो कोई नहीं आया|” मेतार्य ने सहज ही उत्तर दिया।

इस पर स्वर्णकार को क्रोध और भी बढ़ गया उसने निश्चय कर लिया मेतार्य ने ही वह स्वर्ण चुरा लिया और अब यहाँ ढोंग करके बैठा है।

मेतार्य से उसने पूछा- “स्वर्णकण तुमने चुराये हैं?”

इस पर वे कुछ न बोले। अब तो स्वर्णकार को और भी विश्वास हो गया कि मेतार्य ही वास्तविक चोर हैं सो उसने अन्य कुटुम्बियों को भी बुला लिया और उनकी अच्छी मरम्मत की। जितनी बार पूछा जाता- ‘तुमने स्वर्ण चुराया है|’ मेतार्य चुप रहते- कुछ भी न बोलते इससे उनका संदेह और बढ़ जाता।

अन्त में निश्चय किया गया कि मेतार्य के मस्तक पर गोले चमड़े की पट्टी बाँध कर चिल-चिलाती धूप में पटक दिया जाये। यही किया गया उनके मत्थे पर चमड़े की गीली पट्टी बाँध दी गई और धूप में कर दिया गया। जैसे जैसे पट्टी सूखती गई महर्षि का सिर कसता गया। शरीर पहले ही दुर्बल हो रहा था। पीड़ा सहन न हो सकी। वे चक्कर खाकर गिर पड़े। दिन उन्होंने प्राणान्तक पीड़ा में बिताया।

साँझ हो चली। वृक्ष पर बैठे पक्षियों ने बीट की तो वह दाने नीचे गिरे। किसी ने देखा तो कहा- “अरे सोने के दाने तो पक्षियों ने चुन लिये महर्षि को क्यों कष्ट दे रहे हो।“ स्वर्णकार हक्का बक्का रह गया।

उसने दौड़कर महर्षि के माथे की पट्टी खोली उन्हें जल पिलाया और दुःखी स्वर में पूछा- “महामहिम! आपने बता दिया होता कि स्वर्ण दाने पक्षियों ने चुगे हैं तो आपकी यह दुर्दशा क्यों होती?”

महर्षि मुस्कराये और बोले- “वैसा करने से जो दंड मैंने भुगता उससे भी कठोर दंड इन अज्ञानी पक्षियों को भुगतना पड़ता।“

महर्षि की इस महा दयालुता पर सबको रोमाँच हो आया। स्वर्णकार बोला- “जो प्राणिमात्र में अपनी तरह अपनी ही आत्मा को देखता है वही सच्चा साधु है।“

📖 अखण्ड ज्योति, मार्च-1971

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 15)

PASSIVE ACQUIESCENCE BEFORE EVIL ACTS IS ALSO SINFUL

It is seen that in a society the affluent and powerful exploiters suffer much less from natural disasters than the submissive, under – privileged masses. The brunt of excessive rains or droughts is mainly borne by the poor farmers. The laws of divine justice regard tolerance of a sin as a greater offence than its committal. There is a saying that “the father of a tyrant is a coward”. Cowardice and timidity tend to invite suppression and oppression from some quarter or the other. Big powerful fish is always on the prowl for the timid small fish. The latter may manage to escape from one but some other big fish will devour it.

Laws of divine justice consider cowardice, weakness and ignorance as grave sins. It is not surprising that these invite harsher punishments. Natural disasters should be taken as stealthy acts of divine grace. These are frequently manifested by the invisible Supreme Justice for removal of corruption from the society. Natural calamities are not aberrations of nature. Instead, these are reactions of out-of-tune actions of living beings themselves. It is like the process of refining in the blast furnace. Through such
loud warnings, God mercifully tells us again and again to work for eradicating sins from the society. In the next chapter we shall discuss how and when divine justice gives rewards and punishments for the various types of good and evil karmas.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 27

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 May 2019

★ ये शिला देख रहे हैं आप ये वही शिला है जो आप मंदिरों में पाते हैं, जिसके समक्ष आप शीश झुकाते हैं, हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं, विनती करते हैं। अब सोचिये ये शिला बनती किससे है, पाषाण के एक खण्ड से, बिल्कुल साधारण सा पाषाण का खण्ड। यदि यही पाषाण का खण्ड आपको कहीं और मिल जाए तो आप क्या करोगे? ठोकर मार दोगे?? वो पाषाण आपके लिए अधिक महत्व नहीं रखता। अब यही मनुष्य के साथ भी होता है। अब या तो आप सम्मान पा सकते हैं या ठोकर खा सकते हैं, प्रयत्न आपका होगा। यदि आप अपने भीतर अच्छे विचार जगाएँ, शुभ कर्म करें, कठिनाइयों का, संकटों का सामना करें, सदाचार के मार्ग पर चलें तो आपको सम्मान अवश्य प्राप्त होगा अन्यथा विफलता का मार्ग तो आपके पास है ही।

◆ कहते हैं यदि भाग्य साथ न हो, यदि भाग्य ही खराब हो, नदी का पानी भी खारा बन जाता है। ये बात अनुचित है। हर बात के लिए, हर समस्या के लिए, भाग्य दोषी नहीं हो सकता। कई बार हमारी असावधानी भी होती है। सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। हम आने वाले समय के लिए सावधान नहीं रहते और जब अचानक संकट हमारे समक्ष आ जाता है, तो स्वयं को संभाल नहीं पाते, क्योंकि हम सज्ज नहीं रहते? उस परिस्थिति में हम हार जाते हैं? सावधानी अत्यंत आवश्यक है, जब आप किसी अंजान राह पर निकलते हैं, तो सर्वप्रथम अपना एक पैर अपनी धरा पर जमाए रखना और दूसरे पैर से आने वाली भूमि का आकलन करना जरूरी है। ये समस्या है ऐसा मानना सावधानी का अंत है। आने वाले भविष्य का आकलन करना क्योंकि कुछ भी कर लो आप आने वाली परिस्थिति को तो देख नहीं सकते। यदि भविष्य में आपके संकट ही लिखा है तो आने वाले संकट का सामना करने के लिए आप सावधानी की ढाल का तो उपयोग कर सकते हैं।

◇ विषपान करने के बाद भी महादेव देवों के देव महादेव कहलाते हैं? वहीं दूसरी ओर अमृतपान करने के पश्चात भी राहू और केतू असुर ही कहलाते हैं? क्यों?? इसका कारण है भाव। आपके कर्मों के पीछे जो आपका भाव है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये संसार किसी व्यक्ति को वहीं से तो जानता है, कर्मों के पीछे उसके भाव से। यदि कोई परोपकार करे और उसके पीछे भाव स्वार्थ का हो, तो वो परोपकारी मनुष्य अपने आप अपना महत्व खो देता है। यदि आपके कर्म के पीछे भाव उचित हो तो श्राप भी वरदान में परिवर्तित हो सकता है। यदि आपके कर्म का भाव अनुचित हो तो वरदान को श्राप का रूप लेने में अधिक समय नहीं लगता। ये सारा खेल है कर्मों का और भावों का।

शुक्रवार, 10 मई 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Divine law expects man to abide by time-tested moral codes of conduct and also make maximum possible endeavor to prevent others from violating them. If some country or community or race does not make an effort to prevent or dissuade others from committing wrong deeds, in spite of being in a position to do so; or does not promote morality and ethics despite having the means to do so, the former too has to suffer its consequences. Such collective sins of inactivity or indifference invite combined punishment
from divine justice.

Earthquakes, deluge, drought, famine, world wars are consequences of collective sins of humanity, in which karmas for vested interests were given priority and welfare of the rest of the humanity was ignored. Examples are - spread of AIDS, drug abuse and alcoholism, disintegration of families, juvenile delinquency, terrorism, environmental pollution etc. The developed countries are suffering consequences of their smug indifference towards the welfare of the underprivileged masses elsewhere.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 26

👉 आज का सद्चिंतन 10 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 May 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 May 2019

★ समस्त शुभ-अशुभ, सुख-दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान-पतन के मुख्य कारक विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिए, उनको मंगल मूलक बनाइए, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिए और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुँचा देंगे। इसके विपरीत यदि आपने विचारों को स्वतंत्र छोड़ दिया, उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिए तैयार रहना चाहिए। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।

◆ आज हमारे समाज में काम का फल जल्दी से जल्दी पाने की प्रवृत्ति हो गई है। लोग खेत को बिना जोते ही-बिना बोए या सींचे ही शान्ति और सफलता रूपी फसल काटने को तैयार बैठे हैं। जब कारण ही नहीं तो कार्य कैसे हो? और जब कार्य नहीं तो उसका फल कैसे हो सकता है? शून्य से कुछ भी पाने की आशा नहीं की जा सकती है। हमारा मन एक उपजाऊ खेत है, जिससे जो वस्तु चाहो सीधे रास्ते से पैदा कर सकते हो। उसका उचित चिंतन कीजिए । जैसा बोयेंगे-वैसा ही काटेंगे।

◇ आत्मोन्नति का अर्थ है-पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर आना। पशुत्व क्या है- मनोविकारों के ऊपर तनिक भी शासन न कर पाना, जब जैसा मनोविकार आया, उसे ज्यों का त्यों प्रकट कर दिया, काम क्षुधा, भूख, प्यास आदि वासनाएँ जैसे ही उत्पन्न  हुईं कि तुरन्त उनकी पूर्ति कर ली गई, यह  पशुत्व की स्थिति है। जब इन वासनाओं पर संयम आना प्रारंभ होता है और मानवता के उच्चतम गुण-प्रेम, सहानुभूति, करुणा, दया, सहायता, संगठन, सहयोग, समष्टि के लिए व्यक्ति में त्याग इत्यादि भावनाओं का उदय होता है, तो मनुष्य मनुष्यत्व के स्तर पर निवास करता है।

👉 The secret of happiness

Everyone has their own way of life. They live according to their choice and wisdom. They live according to their sacraments and don’t care much about the way they are living is justified. They just do whatever they like. According to them whatever they feel is right, whether it is right or wrong.

Example- Is it OK to drink alcohol? You will say, no this is not right.
Then why do lot of people drink. The answer is clear; they feel it is justified, hence they drink.  Drinking is not right but because they like it so they use to drink.
This is the way, the whole world is doing according to their own choice and liking. This is what happening all around.
But this is not the fact. The fact is something else. The fact is, if you violate Divine laws, then you will definitely get penalised.
Whether you wish or not, you will have to follow the Divine laws. This is the law of Divine that always give happiness to others, never hurt. Therefore, as far as possible, always do good deeds for others; it is for your own welfare. Avoid any sort of iniquities. Be blessed of God's grace. Do good deeds, be happy, and let others be happy. Take control of your wrong desires and try to eliminate completely. Only then will you will be blissed, otherwise no chance of any well-being.

गुरुवार, 9 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 May 2019

★ भाग्य और भविष्य परमात्मा की जबर्दस्त शक्तियाँ हैं। मनुष्य की शक्ति इनके आगे छोटी है, पर वह अपने विवेक से यह निर्णय अवश्य ले सकता है कि उसका जन्म किसलिए हुआ है और वह ईश्वरीय विधान में किस हद तक सहायक हो सकता है। यदि वह इसके लिए तैयार हो सके तो इसी जीवन में अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त कर सकता है।

◆ अच्छाई के विकास में चिन्ता, दुःख और भय भी हमारे सामने आयें तो भी उनके सुखप्रद परिणाम की आशा से हमें उस प्रक्रिया को बंद नहीं कर देना चाहिए। सरल, शुद्ध और सहन करने योग्य दुःखों ने सदैव आत्मा को बलवान् ही बनाया है-उसे ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की अनुभूति ही कराई है। यदि ये दुःख,चिन्ता,भय,आदि अवरोध प्रेम, दया, कृतज्ञता और विश्वास का अंत करते हों तब हमें एक वीर योद्धा की भाँति उनका सामना भी करना चाहिए।

◇ सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके छल, कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा।

★ हर मनुष्य के जीवन में अवसर आता है, किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी अवसर से यह आशा करना मृग मरीचिका के तुल्य है कि वह आपका द्वार दुबारा खटखटायेगा। बुद्धिमान् लोग अवसर को आगे से आलिंगन करते हैं, घेरते हैं और पकड़ते हैं, क्योंकि इसके दुम नहीं होती जो आगे बढ़ जाने पर पकड़ी जा सके।

◆ हमें यह भ्रम निकाल ही देना चाहिए कि बेईमानी कुछ कमा सकती है। वह शराब की तरह उत्तेजना मात्र है, जिससे ठगने वाला और ठगा जाने वाला बुद्धिभ्रम में ग्रस्त हो जाते हैं। नशा उतरने पर नशेबाज की जो खस्ता हालत होती है वही पोल खुलने पर बेईमानी की होती है। उसका न कारोबार रहता है, न कोई ग्राहक, सहयोगी। अतएव हमें इस कंटकाकीर्ण पगडण्डी पर चलने की अपेक्षा ईमानदारी के राजमार्ग पर ही चलना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2019


बुधवार, 8 मई 2019

👉 विश्वास की दौलत

सऊदी अरब में बुखारी नामक एक विद्वान रहते थे। वह अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर थे। एक बार वह समुद्री जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने सफर के खर्च के लिए एक हजार दीनार अपनी पोटली में बांध कर रख लिए। यात्रा के दौरान बुखारी की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। बुखारी उन्हें ज्ञान की बातें बताते।

एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं। एक दिन बातों-बातों में बुखारी ने उसे दीनार की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया। उसने उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई। एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मार गया। मेरा एक हजार दीनार चोरी हो गया।’ वह रोने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब बुखारी की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, ‘अरे साहब, आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।’ यह सुन कर बुखारी बोले, ‘नहीं, जिसके दीनार चोरी हुए है उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।’ बुखारी की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिनों के बाद उसी यात्री ने उदास मन से बुखारी से पूछा, ‘आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?’ बुखारी ने मुस्करा कर कहा, ‘उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों? क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं- एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता। मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।

👉 बोझ

एक महात्मा ने पूछा कि सबसे ज्यादा बोझ कौन सा जीव उठा कर घुमता है ?........
किसी ने कहा गधा तो किसी ने बैल तो किसी ने ऊंट अलग अलग प्राणीयो के नाम बताए।
लेकिन महात्मा किसी के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।

महात्मा ने हंसकर कहा - गधे, बैल और ऊट के ऊपर हम एक मंजिल तक बोझ रखकर उतार देते हैं लेकिन, इंसान अपने मन के ऊपर मरते दम तक विचारों का बोझ लेकर घूमता है किसी ने बुरा किया है उसे न भूलने का बोझ, आने वाले कल का बोझ, अपने किये पापों का बोझ इस तरह कई प्रकार के बोझ लेकर इंसान जीता है।

जिस दिन इस बोझ को इंसान उतार देगा तब सही मायने मे जीवन जीना सीख जाएगा।

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Of late, science has begun to appreciate the impact of lop-sided human activities on pervasive global life-sustaining elements of nature. Indiscriminate use of chloroflouro carbons by some developing countries is damaging the global atmosphere for entire humankind by producing the greenhouse effect. Reckless deforestation in certain parts of the world is creating worldwide ecological imbalances. Such examples illustrate that basic elements of nature are globally interdependent and local changes in them have universal implications. The following observations bring out this eternal truth.

“Pran”- the universal life force, is one of the vital elements of nature, which is an integral constituent of all animate beings. The entire human race is inter-connected with this allpervasive element. Each spark of life in the individual animate being, which is known as “Atma” in spiritual parlance, is part of the omnipresence of THAT universal life force. The science of spirituality maintains that karmas and samskars of all living beings are mutually interactive. In social milieu these reactions are quite prominent. A criminal brings shame to his parents and family as well.

The latter too suffer disgrace since disregarding their responsibilities by not performing the right karmas; they did not exert enough influence to make the person a good citizen. The responsibility for spiritual development of the child (a virtuous karma) lies with the parents and other adults of the family. Hence, though in the material world only the offender receives the punishment from the law enforcers and the society, the souls of the parents and other family
members too have to suffer partially for this dereliction of duty, which the divine jurisprudence considers as a sin. When the neighbor's house is on fire, you cannot remain a silent spectator, since soon you may also become a victim. If in spite of being capable of preventing, one looks on at acts of theft, burglary, rape, murder etc. indifferently, the society would look down upon such a person contemptuously and the law would also not spare him. The laws of divine justice too follow a similar norm.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 25

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 May 2019

★ ये है तलवार कुछ भी काट दे इतनी है धार, शत्रु का विनाश करने में सक्षम, दूसरी ओर है ये ढाल किसी भी प्रहार को सहपाने में सक्षम, शत्रु से रक्षा की ढाल, रक्षा की दीवार है। इन दोनों के कार्य भिन्न हैं, इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, लेकिन इन दोनों के मूल एक ही हैं। दोनों बने हैं लोहे से। लोहे के खण्ड से बनी है ये तलवार, लोहे के खण्ड से बनी है ये ढाल। तलवार का मंतव्य है प्रहार, और ढाल का मंतव्य है बचाव। अन्तर किसका है? अन्तर है केवल सोच का। ये सोच ही है जो सच बनकर सामने आती है, संसाधन कभी भी व्यक्ति को सुखी नहीं करते, किन्तु सोच व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती है। या तो आप इन संसाधनों का प्रयोग नाश करने के लिये करो, या इन संसाधनों का प्रयोग उद्धार करने के करो। चयन आपका है।

◆ इस वृक्ष को देख रहे हैं आप कितना अडिग, दिनभर धूप में खड़ा रहता है, धूप में बैठने वाले को छाया देने के लिए। अब जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे इस वृक्ष की टहनियों पर पत्तों के साथ-साथ फूल खिलने लगते हैं। ये फूल बाद में फल बन जाते हैं। अब समय के साथ-साथ जब ऋतु बदलता है, तो ये फल तोड़े जाते हैं। कुछ फल गिर जाते हैं। पतझर आने पर इस पेड़ के पत्ते तक इसका साथ छोड़ देते हैं। किन्तु ये वृक्ष अडिग रहता है। नये फलों के आने का इंतजार करता रहता है। न फलों के आने का उत्सव मनाता है, न पतझड़ के आने का शोक और हम इस वृक्ष की पूजा करते हैं। क्योंकि ये वृक्ष अपने स्थान पर अडिग रहता है। इसी प्रकार सुख और दुःख हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। सुख और दुःख हमेशा रहेंगे, इसलिये न कभी सुख के आने पर अभिमान से भर जाएँ, न कभी दुःख के आने पर शोक मनाएँ। क्योंकि सुख और दुःख जीवनरूपी वृक्ष के फल हैं, ये आते रहेंगे-जाते रहेंगे लेकिन सुख और दुःख में व्यक्ति अडिग होगा, वही पूजनीय होगा।

◇ हीरा। हमारे लिए अत्यंत प्रिय, अत्यंत चमकदार, हीरे की चमक तो सभी जानते हैं। किन्तु ये चमक आती कैसे है? किसी दूसरे हीरे से इस हीरे को तराशा गया है। तब जाके ये संभव हो पाया है। कितनी अच्छी बात है। स्वयं से स्वयं को तराशो और स्वयं को ही और बेहतर बना दो। अब सोचिये क्या कीचड़ से कीचड़ को साफ किया जा सकता है? नहीं। उसके लिये आपको आवश्यकता होगी शुद्ध-निर्मल जल की। इसी प्रकार अच्छाई से अच्छाई को, और भी सुन्दर बनाया जा सकता है, किन्तु बुराई से बुराई को सुधारा नहीं जा सकता। सर्वप्रथम अपने मन को पावन करें, अपने मन को शुद्ध करें और फिर देखें इस दृष्टि से संसार को। ये संसार अपने आप शुद्ध लगने लगेगा। यदि किसी में आप विकार देखो तो शुभ कर्म करके उसका विकार दूर करो, उसकी सहायता करो। ना कि उसके विकार देख के स्वयं के मन में विकार लाओ। क्योंकि आप हीरे हो, किसी और हीरे को तराशने में उसकी सहायता करो। अच्छा लगेगा।

सोमवार, 6 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 May 2019

★ धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्म काण्ड के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौदान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है? यदि होता तो योग यज्ञ और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता।

◆ भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन-दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका सिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए उसे हजार ढोंग रचने पड़ते हैं और लाख तरह की मूढ़ताएँ फैलानी पड़ती हैं। यह भार जनमानस को विकृत बनाने की दृष्टि से और भी अधिक भयावह है। हर विचारशील का कर्त्तव्य है कि भिक्षा व्यवसाय को  निरुत्साहित करे। $कुपात्रों को वाणी मात्र से भी उत्साह न दें।

◇ यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई  जितनी जल्दी बढ़ती है, उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है, साथ ही कर्त्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक फैलती है और अंत में सिकुड़कर स्वयं बुराई करने वाले के सिर पर आकर पड़ती है।

■ दुष्ट विचार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। पाप का विचार, चोरी, कपट, ईर्ष्या, निराशा का विचार हमारा सर्वनाश कर सकता है। ईश्वर का एक मानसिक चित्र अंतःकरण में तैयार कर लें और सत्य, प्रेम, न्याय से अपना हृदय नित्य विकसित करते रहें। स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता और शान्ति के विचार हमारे दोस्त  हैं। ये हमें सिखाएँगे कि जीवन पूर्ण सुखमय है तथा उसके अनुभवों से झगड़ना मूर्खता में शामिल है।

शनिवार, 4 मई 2019

👉 सच्चे मित्र

कोई भी व्यक्ति संसार में अकेला नहीं जी सकता, क्योंकि वह अल्पशक्तिमान् है। इसलिए अपने सारे काम स्वयं नहीं कर सकता। एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है। और सब लोग, सब की सहायता करते नहीं। सहायता लेने देने के लिए एक आपसी संबंध होता है, जिसे मित्रता कहते हैं। मित्र का अर्थ होता है, स्नेह करने वाला. यह स्नेह संबंध चाहे मां बेटी में हो, चाहे पिता पुत्र में हो, चाहे पति-पत्नी में हो, चाहे दो दोस्तों में हो,  इन सब में जो स्नेह का संबंध है, वही मित्रता है।

मित्र ऐसा बनाएं, जो एक दूसरे के कष्ट को समझे, और हृदय से उस की समस्याओं को दूर करने का पूरा प्रयत्न करे।

संसार में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे, जिनमें इस प्रकार की मित्रता देखी जाती है। उदाहरण के लिए यदि बेटा बीमार हो जाए, तो माता-पिता को नींद नहीं आती। दिन-रात उसकी सेवा करते हैं। और पूरी शक्ति लगाकर वैद्य डॉक्टरों की सहायता से उसे स्वस्थ बना देते हैं । ऐसे ही यदि माता पिता को कष्ट हो, यदि वे रोगी या वृद्ध हो जाएँ, तो बच्चों को भी वैसी ही सेवा करनी चाहिए, जैसी माता पिता अपने बच्चों की करते हैं। बस इसी संबंध का नाम सच्ची मित्रता है। अन्यथा बहुत से लोग मित्रता का केवल दिखावा करते हैं। सच्ची मित्रता, सच्चा स्नेह उनमें नहीं होता। ऐसे नकली मित्रों से और नकली रिश्तेदारों से सावधान रहें।

सब लोगों को पहचानें। जो हृदय से सेवा करते हैं, सच्चे मित्र हैं, उनके साथ ही जीवन जीने में, जीवन का सच्चा आनंद है।

शुक्रवार, 3 मई 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2019

👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2019


👉 प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता

कोई व्यक्ति जीवनभर प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़ते रहने की जिद करे और अगले बड़े स्कूल में जाने के लिए तैयार न हो तो "उसे बाल बुद्धि ही कहा जाएगा।" "प्रेम" का प्रशिक्षण घर-परिवार में हो या किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रारम्भ हो, उसकी स्वाभाविकता समझ में आती है, पर जब कोई उतने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जाएगा, "आगे न बढ़ेगा तो रुके हुए पानी की तरह सड़न पैदा हुए बिना न रहेगी।'

जो "प्यार" सीमा बद्ध होकर रह जाता है, उसे "मोह" कहते हैं, "मोह" में पक्षपात जुड़ जाता है, औचित्य का ध्यान नहीं रहता। प्रिय पात्र की त्रुटियों का परिमार्जन करने की इच्छा नहीं होती वरन "उन्हें भी प्रिय मानकर समर्थन किया जाने लगता है।" इससे "प्रेम" की महत्ता ही नष्ट हो जाती है।

"प्रेम" गंगाजल है, जिसे जहाँ छिड़का जाए, वहीं पवित्रता पैदा करे," पर यदि वह गंदे नाले में गिरकर अपनी पवित्रता खो दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

"प्रेम" लगाव का पात्र नहीं है और न पक्षपात के अथवा हर प्रकार के समर्थन-सहयोग का। "उसमें आदर्शो की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है।" "आदर्श विहीन प्यार को "मोह" कहेंगे।" "मोह" अपने प्रिय पात्र के अनुचित कार्यों का भी समर्थन करने लगता है, तब उसकी ऊँचा उठने की क्षमता नष्ट हो जाती है "मोह" को "प्रेम" की विकृति ही कह सकते हैं," इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1972 पृष्ठ 3

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 13)

PHYSICAL SUFFERINGS (Daihik Dukhas):

The cause of congenital deficiencies and genetic diseases is misutilisation of the corresponding organs in the previous life–cycles. After death, the soul discards the physical body but carries forward the astral body (Sookchma Shareer) to the next life. In the succeeding birth, the new body is shaped by this astral body. The astral body carries with it nuclei (seeds) of samskars of earlier physical existence to the next reincarnation. The corresponding components of physical organs, which are immorally used in the previous life, lose their vitality in the astral body but manifest as malfunctioning of those organs in the physical body of the next birth. Thus it is possible for a sexually indulgent person to be born with congenital impotence or with imperfections in sexual organs in the next life (Note that Roman Catholic Church defines indulgence as “a partial remission of the temporal punishment that is still due for sin after absolution). Giving exemplary punishment for over- indulgence in this manner, the divine justice also provides the being an excellent opportunity for self-upliftment.

The temporary period of non-function or malfunctions of the affected faculty serves the purpose of caution as well as rejuvenation for the next life. That is to say whichever organ of the body is recklessly misused for sense gratification is deemed to be engaged in a physical sin. In the next life that organ is either found missing or appears as a congenital defect. Thus congenital physical
deformities or diseases are for remission of sins. (ref. Absolution –Roman Catholic Theory.) The compulsive rest rejuvenates the organ of the body and also relieves the burden of sin from the mind through repentance. When a mental sin is intermixed with a physical sin and it has not been neutralized in the present life by punishment by the state, society or by atonement, it is also carried over to the next life.

However, if the sin is basically physical with little  or no input of mental sin (deliberate intention), the biological system immediately takes care of it. For instance man gets intoxicated and deranged on taking drugs, falls sick because of dietary irregularities or dies on consuming the poison. This is a physical punishment for a physical sin. The body cleans itself of the small physical sins speedily and these are neutralized in this very life. On the other hand, as mentioned earlier, serious physical vices, which are also associated with mental stimuli, are carried over by the astral body for being worked out in the next life.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 May 2019

★ आज मित्रता की आड़ लेकर शत्रुता बरतने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसे चतुरता, कुशलता समझा जाता है और इस प्रयास में सफल व्यक्ति आत्म-श्लाघा भी बहुत करते हैं। साथी को मित्रता के जाल में फँसाकर उसकी बेखबरी का-भोलेपन का अनुचित लाभ उठा लेना यही आज तथाकथित चतुर लोगों की नीति बनती जा रही है। ऐसी दशा में मित्र और शत्रु की कसौटी को हर घड़ी साथ रखने की आवश्यकता है।

◆ जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो, उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की-सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है, उसी के लिए यह संभव है कि कम आमदनी से संतोषपूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है-उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक संभव हो घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं, उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा।

◇ सफलता का पथ निश्चय ही बड़ा कठिन और दुर्गम होता है। उसको सरल और प्रशस्त बनाने में मनुष्य की इच्छा शक्ति  का बड़ा उपयोग है। इच्छा शक्ति की दृढ़ता और प्रबलता मनुष्य को पराक्रमी, पुरुषार्थी और धीर-गंभीर बना देती है। प्रबल इच्छा शक्ति वाला जिस काम में हाथ डालता है, उसे तब तक नहीं छोड़ता जब तक पूरा नहीं कर लेता। वह बाधाओं, विरोधों से साहसपूर्वक लड़ता हुआ बढ़ता रहता है। उन्नति और सफलता का इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है।

■ किसी का सम्मान करने का अर्थ है- बदले में उसका सम्मान पाना। दूसरे कम कीमत में सम्मान पाने की बात बन ही नहीं सकती। सादगी से रहा जाय, शालीनता बरती जाये और दूसरों को संतुष्ट रखकर उन  पर अपना प्रभाव छोड़ने की कला सीखी जाये, इससे बढ़कर अपने आपको बड़ा बनाने-ऊँचा उठाने का कोई श्रेष्ठ उपाय है ही नहीं।

★ विचार एक शक्ति है, विशुद्ध विद्युत् शक्ति। जो इस पर समुचित नियंत्रण कर ठीक दिशा में संचालन कर सकता है वह बिजली की भाँति इससे बड़े-बड़े काम ले सकता है, किन्तु जो इसको ठीक से अनुशासित नहीं कर सकता, वह उलटा इसका शिकार बन जाता है, अपनी ही शक्ति से स्वयं नष्ट हो जाता है, अपनी  ही आग में जलकर भस्म हो जाता है। इसीलिए मनीषियों ने नियंत्रित विचारों को मनुष्य का मित्र और अनियंत्रित विचारों को उसका शत्रु बतलाया है।

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

अंतःकरण के धन को ढ़ूंढो | Look for the Treasure Within Yourself

👉 आज का सद्चिंतन 29 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 April 2019


👉 सकारात्मक सोच की शक्ति!

हम हमेशा एक कहावत सुनते हैं, जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं. ये कहावत पूरी तरह से सही हैं, क्योकि हमारा Mind एक वक्त में एक ही विचार कर सकता हैं Negative या Positive!

आप लोग हमेशा सुनते होंगे, हमें positive सोच रखनी चाहिए negative नहीं. क्या है ये positive और negative विचार?

दुनिया में हो रही घटनाओं को देखने का हम सभी का अपना अलग अलग नजरिया होता है। कुछ लोग इसे negative रूप में देखते हैं, अर्थात हमेशा कुछ न कुछ कमी निकालते रहते हैं जब कि कुछ लोग उसी घटना को positive रूप में देखते हैं और उसमे ये खोजते है कि इसमें क्या अच्छाई है, और उसी अच्छाई से सिख लेकर नित अपना जीवन सफल बनाते चले जाते हैं। वास्तव में हमारे जीवन में जो होता हैं अच्छे के लिए होता है। हमें कुछ समय के लिए उस घटना से दुःख जरुर होता है लेकिन बाद में यही पता चलता है कि ये हमारे लिए अच्छा ही हुआ।

आइये पढ़ते हैं एक कहानी >>>

एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था। एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये।

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो। फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है।

शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है। इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए। फिर दूसरे शिष्य से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा।

इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए। गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बडाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है। नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं।

उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ”जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकृति का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का।

अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दुखों को देखकर और दुखी होते चले जाएँ ये इससे सिख लेकर अपने जीवन को एक नयी दिशा में ले जाएँ। प्रकृति का ये नियम है कि आप जितना संघर्ष करोगे आपके सफलता का प्रतिशत उतना ही अधिक होगा। इसलिए संघर्ष करना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिसा इससे भागे नहीं बल्क़ि इसे अपना दोस्त बना लें।

आप जब चाहे Negative Thinking को Positive Thinking में बदल सकते हैं। यदि आप Positive Thinking को पुरे निश्चय के साथ कई बार दोहराए की मुझे इस काम से डर नहीं लगता या कोई आशंका नहीं हैं मैं इसे बहुत अच्छे से पूरा करुगा या मेरा ये काम अवश्य सिद्ध होगा, तो आप निश्चत ही अपने काम में सफल हो जाऐगे।

अंत में कोई परिस्थिति कितनी भी बुरी क्यों न हो हमें उसे सकरात्मक नजरिये से देखना चाहिए क्योंकि ये हमारे जीवन को सफल बना सकता है, हमें इसकी power को अनदेखा नहीं करनी चाहिए।

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 12)

MENTAL SUFFERINGS (Daivik–Dukhas):

All types of sorrows, mental suffering, are results of ‘Mental Sins’. Worry, anxiety, anger, humiliation, animosity, separation from a beloved one, fear, grief, etc. are signs of divine justice for mental sins. Mental sins are those willful karmas (deliberate acts) of mind, which are carried out under the influence of strong negative emotional stimuli. We may call mental sins as corrupt functions of mind like jealousy, perfidy, deception, annoyance, cruelty, etc., which pollute the environment around the inner psyche.Mental sins do not provide any physical gratification. Like a smoke-filled room, an environment created by pollutants of mind suffocates the soul. The soul, being a portion of the omnipresent Divinity, is intrinsically pure. It does not permit accumulation of sinful thoughts around itself and is always eager to push out of pollutants in someway or the other, in the same manner, as the body expels the harmful food. The soul is meticulously careful about its purity. The moment it finds the mental sins polluting its environment, it feels uncomfortable and immediately reacts to discard the pollutants. Though our external conscious mind is hardly aware, the inner, subtle mind is always seeking the opportunities to throw off this burden. Sometime, somehow, from somewhere, it involves man in situations, which neutralize the samskars created by mental sins through such reactions as humiliation, failure, disrepute, etc.

Death of a beloved person, loss in business and property, public-defamation, poverty etc. are also mental agonies. Such situations bringout the inner pain to the surface and the aggrieved person weeps, wails and is reminded of the futility of worldly attachments and impermanency of material things. Situations creating acute unhappiness bring out a greater awareness of the need for righteous living. Man is motivated to refrain from committing sinful deeds in future and follow an upright path in life. While attending funerals, people are reminded of the urgency of living a purposeful life. When suffering from financial loss man seeks God’s help. On being defeated and becoming unsuccessful, vanity is deflated. When the intoxication is over, the drunk begins to talk sense.

The only purpose of mental distress is to cleanse the mind of garbage of mental pollutants such as jealously, ingratitude, selfishness, cruelty, heartlessness cunning, hypocrisy and egoism. Through suffering, the intelligent divine mechanism ensures removal of samskars created by Prarabdha Karmas (discussed later). Pain and anguish spring forth to wash out the deleterious samskars generated by Prarabdha Karmas. Apparently, sins like theft, burglary, robbery, adultery, kidnapping and violence are committed physically, but since these are basically outer manifestation of mental stimuli such acts fall in the category of mental sins.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 20

रविवार, 28 अप्रैल 2019

👉 आज का सद्चिंतन 28 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 April 2019


👉 प्यार और भरोसे

एक सरल चित्र है, लेकिन बहुत ही गहरे अर्थ के साथ।

आदमी को पता नहीं है कि नीचे सांप है और महिला को नहीं पता है कि आदमी भी किसी पत्थर से दबा हुआ है।

महिला सोचती है: "मैं गिरने वाली हूँ! और मैं नहीं चढ़ सकती क्योंकि साँप मुझे काटने वाला है।"

आदमी थोड़ा अधिक ताक़त का उपयोग करके मुझे ऊपर क्यों नहीं खींच सकता है! "

आदमी सोचता है: "मैं बहुत दर्द में हूँ! फिर भी मैं अभी भी आपको उतना ही खींच रहा हूँ जितना मैं कर सकते हूँ!सामने वाला खुद कोशिश क्यों नहीं करता और थोड़ा कठिन चढ़ाई को पार कर लेता?"

नैतिकता: आप उस दबाव को देख नहीं सकते जो सामने वाला झेल रहा है, और ठीक उसी तरह सामने वाला भी उस दर्द को नहीं देख सकता जिसमें आप हैं।

यह जीवन है, भले ही यह काम, परिवार, भावनाओं, दोस्तों, परिवार के साथ हो, आपको एक-दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, अलग-अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल बिठाना चाहिए।

हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं इसीलिए कम से कम हम जब सभी अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक दूसरे को प्यार, स्नेह और साथ रहने की खुशी का एहसास दें, जीवन की इस यात्रा को लड़ने की बजाय प्यार और भरोसे से आसानी से पार किया जा सकता है। 🙏🙏

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 11)

THE THREE TYPES OF AGONIES AND THEIR CAUSATION

Sudden happenings of good fortune and misfortune are part of life and there is no escape from them. Saintpoet Soordas has rightly stated that the effects of actions (Karmas) cannot be avoided even with the best of guidance from an enlightened and experienced person. In spite of having Maharshi Vashishtha as his Guru, Sri Ram had to undergo the agony of the death of his father, abduction of his wife, Sita, and subsequently her forced banishment to rishi Valmiki’s Ashram. It would not be proper to assume that misfortunes are punishments given by an angry God to chastite an erring person. The Epic Ramayana says that each individual is himself personally responsible for his happiness and miseries (“Kahu na kowoo dukha-sukhkar data| Nij nij karm bhog sab bhrata||”). All beings reap the fruits of their own karmas. They rejoice or wail, weep and suffer because of their own doings. With each living being, God has provided an unerring and intelligent mechanism, which determines fruits of his actions. Like a fish swimming in the water of a snake moving on sand, we leave behind footprints of our own karmas. These impressions are known as “samskars” in spiratual parlance. Evil deeds generate distressful samskars, which in course of time sprout as sufferings, like self-growing thorny bushes.

Now we shall discuss the three categories of karmas, their characteristics and consequences.

Happiness and peace is the natural state of mind. Man is instinctively inclined to act for welfare of self and others, which naturally results in peace and joy. He suffers only when he is mentally disturbed. He dreads mental turbulence, sorrow and grief. Hence it would be useful to discuss about the causes of unhappiness. As the medical science has two independent streams, one for promotion of health and another for treatment of diseases, there are two branches of spiritual effects – one for promoting happiness and the other for unhappiness. Righteous living is essential for inner peace and happiness just as nutritional food is for health. In therapy it is necessary to first have a diagnosis and then look for treatment. The same holds true for unhappiness. By discarding the karmas, which produce bad Samskars, we can get rid of the resultant suffering and pain.

Let us now discuss the three types of sufferings in detail. As mentioned earlier, misfortunes influence a person by creating three types of adverse reactions: (1) Mental suffering, (2) Physical pain and (3) Distress caused by natural disasters. In spiritual parlance these are known as “Daivik”, “Daihik” and “Bhautik”- Dukhas.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 20

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

👉 आज का सद्चिंतन 27 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 April 2019


👉 बुलंद हौसले

एक कक्षा में शिक्षक छात्रों को बता रहे थे कि अपने जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करो। वे सभी से पूछ रहे थे कि उनके जीवन का क्या लक्ष्य है? सभी विद्यार्थी उन्हें बता रहे थे कि वह क्या बनना चाहते हैं। तभी एक छात्रा ने कहा, 'मैं बड़ी होकर धाविका बनकर, ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूं, नए रेकॉर्ड बनाना चाहती हूं।' उसकी बात सुनते ही कक्षा के सभी बच्चे खिलखिला उठे। शिक्षक भी उस लड़की पर व्यंग्य करते हुए बोले, 'पहले अपने पैरों की ओर तो देखो। तुम ठीक से चल भी नहीं सकती हो।'

वह बच्ची शिक्षक के समक्ष कुछ नहीं बोल सकी और सारी कक्षा की हंसी उसके कानों में गूंजती रही। अगले दिन कक्षा में मास्टर जी आए तो दृढ़ संयमित स्वरों में उस लड़की ने कहा, 'ठीक है, आज मैं अपाहिज हूं। चल-फिर नहीं सकती, लेकिन मास्टर जी, याद रखिए कि मन में पक्का इरादा हो तो क्या नहीं हो सकता। आज मेरे अपंग होने पर सब हंस रहे हैं, लेकिन यही अपंग लड़की एक दिन हवा में उड़कर दिखाएगी।'

उसकी बात सुनकर उसके साथियों ने फिर उसकी खिल्ली उड़ाई। लेकिन उस अपाहिज लड़की ने उस दिन के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह प्रतिदिन चलने का अभ्यास करने लगी। कुछ ही दिनों में वह अच्छी तरह चलने लगी और धीरे-धीरे दौड़ने भी लगी। उसकी इस कामयाबी ने उसके हौसले और भी बुलंद कर दिए। देखते ही देखते कुछ दिनों में वह एक अच्छी धावक बन गई। ओलिंपिक में उसने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया और एक साथ तीन स्वर्ण पदक जीतकर सबको चकित कर दिया। हवा से बात करने वाली वह अपंग लड़की थी अमेरिका के टेनेसी राज्य की ओलिंपिक धाविक विल्मा गोल्डीन रुडाल्फ, जिसने अपने पक्के इरादे के बलबूते पर न केवल सफलता हासिल की अपितु दुनियाभर में अपना नाम किया।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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