मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

आत्म-विश्वास जगाओ रे (kavita)

अरे! ईश के अंश, आत्म-विश्वास जगाओ रे।
होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥1॥

दीन, हीन बनकर, क्यों अपना साहस खोते हो।
 क्यों अशक्ति, अज्ञान, अभावों को ही रोते हो॥

जगा आत्म-विश्वास, दैन्य को दूर भगाओ रे।
होकर राजकुमार न तुम कंगाल कहाओ रे॥2॥

आत्म-बोध के बिना, सिंह-शावक सियार होता।
आत्म-बोध होने पर, वानर सिंधु पार होता॥

आत्म-शक्ति के धनी, न कायरता दिखलाओ रे।
 होकर राजकुमार तुम कंगाल कहाओ रे॥3॥

जिसके बल पर नैपोलियन, आल्पस से टकराया।
जिसके बल पर ही प्रताप से, अकबर घबराया॥

उसके बल पर अपनी बिगड़ी बात बनाओ रे।
होकर राजकुमार तुम कंगाल कहाओ रे॥4॥

सेनापति के बिना, न सेना लड़ने पाती है।
सेनापति का आत्म-समर्पण, हार कहाती है॥

गिरा आत्मबल, जीती बाजी हार न जाओ रे।
होकर राजकुमार तुम कंगाल कहारे रे॥5॥

आज मनुजता, अनगिन साधन की अधिकारी है।
बिना आत्म-विश्वास, मनुजता किन्तु भिखारी है॥

अरे! आत्मबल की पारस मणि तनिक छुआओ रे।
होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥6॥

अडिग आत्म-विश्वास, मनुज का रूप निखरेगा।
उसका संबल मनुज, धरा पर स्वर्ग उतारेगा॥

इसके बल पर जो भी चाहो, कर दिखलाओ रे।
होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥7॥

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Dec 2018

हम जियें, हँसी-खुशी और आनंदपूर्वक जियें-यह ठीक भी है और इसका हमें अधिकार भी है। तथापि हमें अपनी हँसी-खुशी में दूसरों को भी भाग देना चाहिए। हम तो आमोद-प्रमोद और आनंद-मंगल मनाते चलें और हमारे आसपास का समाज दुःख के आँसुओं से भीगता रहे, तो हमारी हँसी-खुशी एक सामाजिक अपराध है।

समाज का ऋण हर एक पर है। उसे चुकाना ही चाहिए। इस ऋण से उऋण हुए बिना कोई व्यक्ति जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। हमें अपनी विचार पद्धति में सामूहिकता के लिए, सामाजिकता के लिए समन्वय और सहिष्णुता के लिए समुचित स्थान रखना चाहिए। इसी में अपनी भलाई है और इसी में समस्त मानव जाति का कल्याण सन्निहित है।

इन दिनों अगणित संकटों और झंझटों का सामना करना पड़ रहा है। उनका निमित्त कारण अपना भटकाव ही है, जिसे कोई चाहे तो अनर्थ आचरण भी कह सकता है। गलती करने वाले पर ही यह दायित्व भी लद जाता है कि वही सुधारे भी। उलटी चाल चलने वाले को अपनी रीति-नीति सुधारने के अतिरिक्त और कोई चारा है नहीं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 December 2018


ईश्वर है या नहीं?

नास्तिकवाद का कथन यह है कि-”इस संसार में ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं, क्योंकि उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष उपकरणों से सिद्ध नहीं होता।” अनीश्वरवादियों की मान्यता है कि जो कुछ प्रत्यक्ष है, जो कुछ विज्ञान सम्मत है केवल वही सत्य है। चूंकि वैज्ञानिक आधार पर ईश्वर की सत्ता का प्रमाण नहीं मिलता इसलिये उसे क्यों मानें?
इस प्रतिपादन पर विचार करते हुए हमें यह सोचना होगा कि अब तक जितना वैज्ञानिक विकास हुआ है क्या वह पूर्ण है? क्या उसने सृष्टि के समस्त रहस्यों का पता लगा लिया है? यदि विज्ञान को पूर्णता प्राप्त हो गई होती तो शोधकार्यों में दिन-रात माथापच्ची करने की वैज्ञानिकों को क्या आवश्यकता रह गई होती? 

सच बात यह है कि विज्ञान का अभी अत्यल्प विकास हुआ है। उसे अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। कुछ समय पहले तक भाप, बिजली, पेट्रोल, एटम, ईथर आदि की शक्तियों को कौन जानता था, पर जैसे-जैसे विज्ञान में प्रौढ़ता आती गई, यह शक्तियाँ खोज निकाली गई। यह जड़ जगत् की खोज है। चेतन जगत् सम्बन्धी खोज तो अभी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। बाह्य मन और अंतर्मन की गति-विधियों को शोध से ही अभी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं हैं। यदि हम अधीर न हों तो आगे चलकर जब चेतन जगत् के मूल-तत्वों पर विचार कर सकने की क्षमता मिलेगी तो आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व भी प्रमाणित होगा। ईश्वर अप्रमाणित नहीं है।

 हमारे साधन ही स्वल्प है जिनके आधार पर अभी उस तत्व का प्रत्यक्षीकरण सम्भव नहीं हो पा रहा है।
पचास वर्ष पूर्व जब साम्यवादी विचारधारा का जन्म हुआ था तब वैज्ञानिक विकास बहुत स्वल्प मात्रा में हो पाया था। उन दिनों सृष्टि के अन्तराल में काम करने वाली चेतन सत्ता का प्रमाण पा सकना अविकसित विज्ञान के लिए कठिन था। पर अब तो बादल बहुत कुछ साफ हो गये हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मनीषियों के लिए चेतन सत्ता का प्रतिपादन कुछ कठिन नहीं रहा है। आधुनिक विज्ञान वेत्ता ऐसी संभावना प्रकट करने लगे है कि निकट भविष्य में ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक आधार पर भी प्रमाणित हो सकेगा। जो आधार विज्ञान को अभी प्राप्त हो सके हैं वे अपनी अपूर्णता के कारण आज ईश्वर का प्रतिपादन कर सकने में समर्थ भले ही न हों पर उसकी सम्भावना से इनकार कर सकना उनके लिए भी संभव नहीं है। 

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्डसन ने लिखा है-”विश्व की अगणित समस्याएँ तथा मानव की मानसिक प्रक्रियाएं वैज्ञानिक साधनों, गणित तथा यन्त्रों के आधार पर हल नहीं होतीं। भौतिक विज्ञान से बाहर भी एक अत्यन्त विशाल दुरूह अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के लिए कोई दूसरा साधन प्रयुक्त करना पड़ेगा। भले ही उसे अध्यात्म कहा जाय या कुछ और।” 

वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है- “इस विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी सम्भावना है जो ज्ञान और इच्छायुक्त हो। विज्ञान की वर्तमान इस मान्यता को बदलने के लिए हमें जल्दी ही बाध्य होना पड़ेगा कि-” विश्व की गतिविधि अनियंत्रित और अनिश्चित रूप से स्वयमेव चल रही है।” 

विज्ञानवेत्ता डॉ. मोर्डेल ने लिखा है- “विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में ईश्वर का जैसा चित्रण किया गया है, वैसा तो विज्ञान नहीं मानता। पर ऐसी सम्भावना, अवश्य है कि अणु-जगत् के पीछे कोई चेतन शक्ति काम कर रही है। अणु-शक्ति के पीछे उसे चलाने वाली एक प्रेरणा शक्ति का अस्तित्व प्रतीत होता है। इस सम्भावना के सत्य सिद्ध होने से ईश्वर का अस्तित्व भी प्रमाणित हो सकता है। 

विख्यात विज्ञानी इंग्लोड का कथन है कि -”जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही है उसका वास्तविक स्वरूप समझने में अभी हम असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में हमारी वर्तमान मान्यताएँ अधूरी, अप्रामाणिक और असन्तोषजनक हैं। अचेतन अणुओं के अमुक प्रकार मिश्रण से चेतन प्राणियों में काम करने वाली चेतना उत्पन्न हो जाती है, यह मान्यता संदेहास्पद ही रहेगी।” 

विज्ञान अब धीरे-धीरे ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचता जा रहा है। जॉन स्टुअर्ट मिल का कथन सच्चाई के बहुत निकट है कि -”विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है।” कान्ट, मिल, हेल्स, होल्ट्ज, लाँग, हक्सले, काम्टे आदि वैज्ञानिकों ने ईश्वर की असिद्धि के बारे में जो कुछ लिखा है वह अब बहुत पुराना हो गया उनकी वे युक्तियाँ जिनके आधार पर ईश्वर का खण्डन किया जाया करता था, अब असामयिक होती जा रही हैं। डॉ. फ्लिन्ट ने अपनी पुस्तक ‘थीइज्म’ में इन युक्तियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण में ही खण्डन करके रख दिया है। 

भौतिक विज्ञान का विकास आज आशाजनक मात्रा में हो चुका है। यदि विज्ञान की यह मान्यता सत्य होती कि - “अमुक प्रकार के अणुओं के अमुक मात्रा में मिलने से चेतना उत्पन्न होती है” तो उसे प्रयोगशालाओं में प्रमाणित किया गया होता, कोई कृत्रिम चेतन प्राणी अवश्य पैदा कर लिया गया होता, अथवा मृत शरीरों को जीवित कर लिया गया होता। यदि वस्तुतः अणुओं के सम्मिश्रण पर ही चेतना का आधार रहा होता तो मृत्यु पर नियंत्रण करना मनुष्य के वश से बाहर की बात न होती। शरीरों में अमुक प्रकार के अणुओं का प्रवेश कर देना तो विज्ञान के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यदि नया शरीर न भी बन सके तो जीवित शरीरों को मरने से बचा सकना तो अणु विशेषज्ञों के लिए सरल होना ही चाहिए था? 

विज्ञान का क्रमिक विकास हो रहा है, उसे अपनी मान्यताओं को समय-समय पर बदलना पड़ता है। कुछ दिन पहले तक वैज्ञानिक लोग पृथ्वी की आयु केवल सात लाख सात वर्ष मानते थे और जिसके अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ वर्ष मानी गई है। अब रेडियम धातु तथा यूरेनियम नामक पदार्थ के आधार पर जो शोध हुई है, उससे पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष सिद्ध हो रही है और वैज्ञानिकों को अपनी पूर्व मान्यताओं को बदलना पड़ रहा है। 

विज्ञान ने सृष्टि के कुछ क्रियाकलापों का पता लगाया है। क्या हो रहा है इसकी कुछ जानकारी उन्हें मिली है। पर कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है, यह रहस्य अभी भी अज्ञात बना हुआ है। प्रकृति के कुछ परमाणुओं के मिलने से प्रोटोप्लाज्म-जीवन तत्व बनता ही है, पर इस बनने के पीछे कौन नियम काम करते है इसका पता नहीं चल पा रहा है। इस असमर्थता की खोज को यह कहकर आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता कि--इस संसार में चेतन सत्ता कुछ नहीं है। 

जार्ज डार्विन ने कहा है - “जीवन की पहेली आज भी उतनी ही रहस्यमय है जितनी पहले कभी थी।” प्रोफेसर जे.ए. टामसन ने लिखा है -”हमें यह नहीं मालूम कि मनुष्य कहाँ से आया, कैसे आया, और क्यों आया। इसके प्रमाण हमें उपलब्ध नहीं होते और न यह आशा ही है कि विज्ञान इस सम्बन्ध में किसी निश्चयात्मक परिणाम पर पहुँच सकेगा।”
“आन दी नेचर आफ दी फिजीकल वर्ल्ड” नामक ग्रन्थ में वैज्ञानिक एडिंगटन ने लिखा है -”हम इस भौतिक जगत् से परे की किसी सत्ता के बारे में ठीक तरह कुछ जान नहीं पाये हैं। पर इतना अवश्य है कि इस जगत् से बाहर भी कोई अज्ञात सत्ता कुछ रहस्यमय कार्य करती रहती है।” 

विज्ञानवादी इतना कह सकते है कि जो स्वल्प साधन अभी उन्हें प्राप्त है उनके आधार पर ईश्वर की सत्ता का परिचय वे प्राप्त नहीं कर सके पर इतना तो उन्हें भी स्वीकार करना पड़ता है कि जितना जाना जा सकता है, उससे असंख्य गुना रहस्य अभी छिपा पड़ा हैं। उसी रहस्य में एक ईश्वर की सत्ता भी है। नवीनतम वैज्ञानिक उसकी सम्भावना स्वीकार करते है। वह दिन भी दूर नहीं जब उन्हें उस रहस्य के उद्घाटन का अवसर भी मिलेगा। अध्यात्म भी विज्ञान का ही अंग है और उसके आधार पर आत्मा-परमात्मा तथा अन्य अनेकों अज्ञात शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर सकना भी सम्भव होगा।

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Dec 2018

 मनुष्यों पर ऋषियों का भी ऋण है। ऋषि का अर्थ है-वेद। वेद अर्थात् ज्ञान। आज तक जो हमारा विकास हुआ है, उसका श्रेय ज्ञान को है-ऋषियों को है। जिस तरह हम ज्ञान दूसरों से ग्रहण कर विकसित हुए हैं, उसी तरह अपने ज्ञान का लाभ औरों को भी देना चाहिए। यह हर विचारशील व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह समाज के विकास में अपने ज्ञान का जितना अंशदान कर सकता हो, अवश्य करे। 

बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, युद्ध आदि दैवी प्रकोपों को मानव जाति के सामूहिक पापों का परिणाम माना गया है। निर्दोष व्यक्ति भी गेहूँ के साथ घुन की तरह पिसते हैं। वस्तुतः वे भी निर्दोष नहीं होते। सामूहिक दोषों को हटाने का प्रयत्न न करना, उनकी ओर उपेक्षा दृष्टि रखना भी एक पाप है। इस दृष्टि से निर्दोष दीखने वाले व्यक्ति भी दोषी सिद्ध होते हैं और उन्हें सामूहिक दण्ड का भागी बनना पड़ता है।
 

 समाज में हो रही बुराइयों को रोकने के लिए ईश्वर ने सामूहिक जिम्मेदारी हर व्यक्ति को सौंपी है। उसका कर्त्तव्य है कि अनीति जहाँ कहीं भी हो रही है, उसे रोके, घटाने का प्रयत्न करे, विरोध करे, असहयोग बरते। जो भी तरीका उसको अनुकूल जँचे उसे अपनाये, पर कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि उस बुराई में अपना सहयोग प्रत्यक्ष और परोक्ष किसी भी रूप में न हो।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कायर नहीं कहाऊँगा (Kavita)

भारत माँ का सुत हूँ मैं तो, निज कर्तव्य निभाऊँगा,
चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥

इस जीवन के दीर्घ पथों पर जब चौराहें आते हैं।
लक्ष्य हीन नर मार्ग भ्रमित हो भटक भटक मर जाते हैं॥

भ्राँति दूर कर पथ शूलों को फूल समझ मुसकाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें कायर नहीं कहाऊँगा॥

चौराहे पर सही दिशा ले जो आगे बढ़ जाते हैं।
हर उलझन को सुलझा कर वे अविरत बढ़ते जाते हैं॥

जीवन के सब संघर्षों में नित ही भिड़ता जाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें निज कर्तव्य निभाऊँगा॥

भरतपुत्र हूँ शेर खिलाता हुलसित होकर आँगन में।
सीने पर हूँ खड्ग झेलता पुलकित होकर के मन में॥

भारत माँ के चरणों में निज जीवन सुमन चढ़ाऊँगा॥
चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥

ज्वलित ज्योति उर देश प्रेम की, भरित शौर्य सुषमा तनमें।
बल पौरुष पीयूष छलकता नव चेतन मय यौवन में॥

दानवता के दलन हेतु शिव प्रलयंकर बन जाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें निज कर्तव्य निभाऊँगा॥

मैं न भार हूँ भारत भू पर, हार सुशोभित जननी का।
देता हार सदा दुश्मन को, मातृ भाल का जय टीका॥

नवलसृजन पथ से भारत को श्रेय शिखर पहुँचाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥

पहले अपनी सेवा और सहायता करो

इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। शास्त्रों में नाना प्रकार के धर्म अनुष्ठानों का सविस्तार विधि विधान है और उनके सुविस्तृत महात्म्यों का वर्णन है। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति आत्म संतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है।

पर इन सबसे बढ़ कर भी एक पुण्य परमार्थ है और वह है-आत्म निर्माण। अपने दुर्गुणों को, कुविचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, डाह, क्षोभ, चिन्ता, भय एवं वासनाओं को विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा यज्ञ है जिसकी तुलना सशस्त्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती।

अपने अज्ञान को दूर करके मन मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता, को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्म निर्माण करे तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं के पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा सहायता करना इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना इतना बड़ा धर्म कार्य है जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य परमार्थ से नहीं हो सकती।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 December 2018

👉 आज का सद्चिंतन 10 December 2018


रविवार, 9 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 Dec 2018


संसार के अन्य समाजों की बात तो नहीं कही जा सकती, पर अपने भारतीय समाज की यह पद्धति कभी नहीं रही कि दूसरों के कष्ट-क्लेशों की उपेक्षा करके आनंद मनाया जाये। आनंद जीव की सहज प्रवृत्ति है। यह सुर दुर्लभ मानव शरीर  मिला ही अनंत आनंद को पाने और मनाने के लिए है, फिर भी एकाकी आनंद मनाने का निषेध भी है। दूसरों के साथ मिलकर ही आनंद का उपभोग वास्तविक उपभोग है। अन्यथा वह एक अन्याय है, अनुचित है और चोरी है।

 संसार के इतिहास में ऐसे असंख्य व्यक्ति भरे पड़े हैं, जिनको जीवन में विद्यालय के दर्शन न हो सके, किन्तु स्वाध्याय के बल पर विश्व के विशेष विद्वान् व्यक्ति बने हैं। साथ ही ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है, जिनकी जिंदगी का अच्छा खासा भाग विद्यालयों एवं विश्व-विद्यालयों में बीता, किन्तु आलस्य और प्रमाद के कारण उनकी एकत्रित योग्यता भी उन्हें छोड़कर चली गई और वे अपनी तपस्या का कोई लाभ नहीं उठा पाये।

 सफलता की अपेक्षा नीति श्रेष्ठ है। अपने आपको नीति पर चलाते हुए यदि असफलता भी मिलती है तो वह गौरव की बात है और यदि अनीतिपूर्वक इन्द्रासन भी प्राप्त होता है तो वह गर्हित ही है। सफलता न मिलने से भौतिक जीवन के उत्कर्ष में कुछ बाधा पड़ सकती है, किन्तु उससे समाज का जो हित होगा, उससे जो आत्म गौरव तथा आत्म संतोष मिलेगा, वह कुछ कम मूल्यवान नहीं है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 December 2018


शनिवार, 8 दिसंबर 2018

👉 जीवन एक समझौता है।

जीवन एक समझौता है, सिर उठाकर चलने में सिर कटने का खतरा है। जो पेड़ अकड़े खड़े रहते हैं वे ही आँधी से उखड़ते देखे गये हैं। बेंत की बेल जो सदा झुकी रहती है हर आँधी तूफान से बच जाती है। धरती पर उगी हुई घास को देखो वह आँधी से टकराती नहीं वरन हवा चलने पर उसी दिशा में मुझ जाती है जिधर को हवा का रुख होता है। इस परिस्थिति का परखने वाली घास का कोई आँधी तूफान कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

नवकर चलो। मत कहो कि हमीं सही है और हमारी बात सब को माननी चाहिए। मत समझो कि तुम्हीं सबसे श्रेष्ठ निर्दोष और बुद्धिमान हो। दूसरे लोग भी अपने दृष्टिकोण के अनुसार सही हो सकते है और हो सकता है जिन परिस्थितियों में वे रहे है उनमें उनके लिए वैसा ही सोचना, बनना, करना भी स्वाभाविक हो। इसलिए दूसरों को समझने की कोशिश करो। उनके दृष्टि कोण की, उनकी परिस्थितियों की भिन्नता को स्वीकार करो।

इस दुनियाँ का सारा कारोबार एक दूसरे को समझने और सहन करने की नींव पर ठहरा हुआ है। समझौता ही जीवन का प्रधान आधार है। यदि तुम अड़ियल और जिद्दी बनकर अपने ही मत की श्रेष्ठता प्रतिपादन करते रहोगे तो कुछ ही दिन में अपने को अकेला पड़ा हुआ और असफलता के गर्त में गिरता हुआ पाओगे।

✍🏻 ~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 23

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Dec 2018

मानवता का ही दूसरा नाम-भारतीय धर्म, भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति है। हमारे पूर्वज मनुष्यता के उपासक रहे हैं। उन्होंने साध्य की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता की कभी भी उपेक्षा नहीं की है। वरन् इस बात पर जोर दिया है कि हमारी आवश्यकताएँ तथा इच्छाएँ भले ही अपूर्ण रह जावें, परन्तु उनकी प्राप्ति का मार्ग न्यायोचित एवं धर्मानुकूल ही होना चाहिए।  अधर्म एवं अन्याय से प्राप्त होने वाले सुख एवं वैभव की यहाँ सदा निन्दा ही की जाती रही ह्रै।

 झूठ किसी भी तरह, किसी भी बहाने से, किसी भी कारण क्यों न बोला जाय, आखिर वह झूठ ही है और उससे व्यक्ति तथा समाज का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। झूठ के दुष्परिणाम व्यक्ति और समाज दोनों को ही भुगतने पड़ते हैं। जिस समाज में झूठ का बोलबाला जितना अधिक होगा, वह उतना ही पतित और अविकसित होता जाएगा।

स्वाध्यायशील व्यक्ति अपनी आत्मा का सफल चिकित्सक होता है। स्वाध्याय से उपार्जित ज्ञान द्वारा वह अपनी आत्मिक व्याधियों को जान लेता है और उनका निदान निर्धारित कर लेता है। निदान खोज लेने पर व्याधियों का उपचार तो सहज ही में हो जाता है। मानसिक एकाग्रता की उपलब्धि उसे इस मार्ग में सहायक बनकर बढ़ाया करती है, जिससे उसका जीवन उच्छृंखलताओं एवं अवांछनीयताओं से मुक्त होकर महान् एवं सुखी बन जाता ह्रै।

👉अपने ऊपर विश्वास कीजिए

विश्वास कीजिये कि वर्तमान निम्न स्थिति को बदल देने की सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। आप जो सोचते हैं, विचारते हैं, जिन बातों को प्राप्त करने की योजनाएँ बनाते हैं, वे आन्तरिक शक्तियों के विकास से अवश्य प्राप्त कर सकते हैं। 

विश्वास कीजिए कि जो कुछ महत्ता, सफलता, उत्तमता, प्रसिद्ध, समृद्धि अन्य व्यक्तियों ने प्राप्त की है, वह आप भी अपनी आन्तरिक शक्तियों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। आपमें वे सभी उत्तमोत्तम तत्व वर्तमान हैं, जिनसे उन्नति होती है। न जाने कब, किस समय, किस अवसर किस परिस्थिति में आपके जीवन का आन्तरिक द्वार खुल जाय और आप सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच जायं। 

विश्वास कीजिये कि आपमें अद्भुत आन्तरिक शक्तियाँ निवास करती हैं। अज्ञानवश आप की अज्ञात, विचित्र, और रहस्यमय शक्तियों के भंडार को नहीं खोलते। आप जिस मनोबल आत्मबल या निश्चयबल का करिश्मा देखते हैं, वह कोई जादू नहीं, वरन् आपके द्वारा सम्पन्न होने वाला एक दैवी नियम है। सब में से असाधारण एवं चमत्कारिक शक्तियाँ समान रूप से व्याप्त हैं। संसार के अगणित व्यक्तियों ने जो महान् कार्य किये हैं, वे आप भी कर सकते हैं।


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन 8 December 2018


शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

👉 Character Speaks for Itself

If someone wishes to convey everyday information or some news, or to teach mathematics or geography or any other subject for that matter, they can simply do it by speaking, explaining or writing. On the other hand, if he/she wishes to shape or transform someone's character, then the only effective way to accomplish it would be to set an example of their own for others to emulate.

People with captivating character inspire others through their powerful manners, approaches and practices and thus enthuse them to follow their shining example. We can witness this truth in the life history of any great personality throughout the world. They practiced what they wished to preach. Their words in action worked like a charm in influencing others. Gautama Buddha, Gandhi, Harish Chandra, etc. made their life a shining example. Their illustrious life  served as a template or mould for several others who started casting their life in the mould of their role model.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP & KARYAKRAM -Vangmay 66 Page 1.27

👉 चरित्र से जो बोला जाएगा

किसी को बाहरी जानकारी देनी हो, सामाचार सुनाना हो, गणित, भूगोल पढ़ाना हो तो यह कार्य वाणी मात्र से भी हो सकता है, लिखकर भी किया जा सकता है और वह प्रयोजन आसानी से पूरा हो सकता है। पर यदि चरित्र निर्माण या व्यक्तित्व का परिवर्तन करना है तो फिर उसके सामने आदर्श उपस्थित करना ही प्रभावशाली उपाय रह जाता है।

प्रभावशाली व्यक्तित्व अपनी प्रखर कार्यपद्धति से अनुप्राणित करके दूसरों को अपना अनुयायी बनाते हैं । संसार के समस्त महामानवों का यही इतिहास है। उन्हें दूसरों से जो कहना था, कराना था, वह उन्होंने पहले स्वयं किया।

उसी कर्तृत्व का प्रभाव पड़ा। बुद्ध, गाँधी, हरिश्चन्द्र आदि ने अपने को एक साँचा बनाया, तब कहीं दूसरे खिलौने, दूसरे व्यक्तित्व उसमें ढलने शुरू हुए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ-1.27

हम बदलेंगे युग यूग बदलेगा हम सुधरेंगे युग सुधरेगा

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Dec 2018

संसार में जितने भी प्राणी रहते हैं सभी में कुछ गुण और कुछ दोष रहते हैं। सर्वथा निर्दोष तो परमात्मा ही माना जाता है। शेष सभी में कुछ अंश भलाई है कुछ बुराई। किसी में गुणों का आधिक्य है किसी में बुराइयों का बाहुल्य, जिसे एकदम अवगुणों का अवतार माना जाता है। कंस महा क्रूर शासक था, रावण का अत्याचार जगत् विख्यात है किन्तु दोनों ही पराक्रमी, पुरुषार्थी और साहसी थे। सिकन्दर दूरदर्शी था। हिटलर विचारवान था, चंगेज खाँ में और कुछ नहीं संगठन शक्ति थी। बुरे से बुरे व्यक्तियों में भी प्रेरणा और प्रसन्नता देने वाला कोई न कोई गुण अवश्य होता है। जिस प्रकार संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से अच्छा नहीं, न पूर्णतः बुरा। संसार में पूर्ण कोई नहीं।
 
बुराई करनी हो, निन्दा करनी हो तो अपने ही बहुत से गुण खराब होंगे, कई बुरी आदतें पड़ गई होगी उनकी की जानी चाहिये पर गुणवान बनने का, सफलता प्राप्त करने का और प्रसन्नता की मात्रा बढ़ाने की- इच्छा हो तो हमारे विचार गुणों मे, कल्याण करने वाले, दृश्यों, संदर्भों और व्यक्तियों पर केन्द्रित रहना चाहिये। ऐसे व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति हमारी विचारधारा केन्द्रित रहेगी तो गुण ग्राहकता हमारा स्वभाव बन जायेगा। हृदय शुद्ध और मन बलवान होता चला जाएगा। अच्छे गुणों और कार्यों का चिन्तन करना आत्म-विकास के लिये हितकर ही होता है। अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं।  
                                             
मनुष्य को चाहिये कि वह सदा ही किसी न किसी भले काम, भले व्यक्ति और भलाई के गुण का चिन्तन किया करे इससे उसके अन्तःकरण से अपने आप भलाई की शक्ति जन्मती है। उसे प्रेरणा और पुलक प्रदान करती है। इस तरह निरन्तर पुलकित रहने का जिसका स्वभाव बन जाता है संसार में उसके लिए न तो कुछ अमंगल रह जाता है और न अहितकर। यह केवल अपने मन को गुण ग्रहण करने की दिशा में लगा देने का चमत्कार मात्र है।

✍🏻 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 7 December 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 December 2018


भगवान की कृपा या अकृपा

एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा-”मैंने हनुमान जी की मनौती मानी थी कि यदि मुकदमा जीत जाऊँ तो रोज उनके आगे दिया जलाया करूंगा। मैं जीत गया और तभी से यह दिया जलाने का कम चल रहा है।

मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।

मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।

मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?

दे प्रभो! वरदान ऐसा (kavita)

दे प्रभा! वरदान ऐसा,दे विभो वरदान ऐसा।
भूल जाऊँ भेद सब, अपना पराया मान वैसा॥

मुक्त होऊँ बंधनों से मोह माया पाश टूटे|
स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष आदिक दुर्गुणों का संग छूटे॥

प्रेम मानस में भरा हो, हो हृदय में शान्ति छाई।
देखता होऊँ जिधर मैं, दे उधर तू ही दिखाई॥

नष्ट हो सब भिन्नता, फिर बैर और विरोध कैसा।
दे प्रभो! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा॥

ज्ञान के आलोक से उज्ज्वल बने यह चित्त मेरा।
लुप्त हो अज्ञान का, अविचार का छाया अंधेरा॥

हो प्रभो, परमार्थ के शुभ कार्य में रुचि नित्य मेरी।
दीन दुखियों की कुटी में ही मिले अनुभूति तेरी॥

दूसरों के दुःख को समझूँ सदा मैं आप जैसा।
दे प्रभो! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा॥

हो अभय, अविवेक तज, शुचि सत्य पथगामी बनूँ मैं।
आपदाओं से भला क्या, काल से भी ना डरूं मैं॥

सत्य को ही धर्म मानूं, सत्य को ही साधना मैं।
सत्य के ही रूप में तेरी करूं आराधना मैं॥

भूल जाऊँ भेद सब अपना पराया मान तैसा।
दे प्रभो! वरदान ऐसा, दे विभो! वरदान ऐसा॥

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Dec 2018


कहते हैं कि शनिश्चर और राहू की दशा सबसे खराब होती है और जब वे आती हैं तो बर्बाद कर देती हैं। इस कथन में कितनी सचाई है यह कहना कठिन है, पर यह नितान्त सत्य है कि आलस्य को शनिश्चर और प्रमाद को-समय की बर्बादी को-राहू माना जाय तो इनकी छाया पड़ने मात्र से मनुष्य की बर्बादी का पूरा-पूरा सरंजाम बन जाता है।

दुःख और कठिनाइयेां में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। इसलिए उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दें, ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे।

निराशा वह मानवीय दुर्गुण है, जो बुद्धि को भ्रमित कर देती है। मानसिक शक्तियों को लुंज-पुंज कर देती है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना संभव ही कहाँ होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है, न आगे संभव है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यही माया है (Kahani)

एक दिन नारद ने भगवान से पूछा- “माया कैसी है?” भगवान मुस्करा दिये और बोले- “किसी दिन प्रत्यक्ष दिखा देंगे।"

अवसर मिलने पर भगवान नारद को साथ लेकर मृत्युलोक को चल दिये। रास्ते में एक लम्बा रेगिस्तान पड़ा। भगवान ने कहा- “नारद! बहुत जोर की प्यास लगी है। कहीं से थोड़ा पानी लाओ।”

नारद कमंडल लेकर चल दिये। थोड़ा आगे चलने पर नींद आ गई और एक खजूर के झुरमुट में सो गये। पानी लाने की याद ही न रही।

सोते ही एक मीठा सपना देखा किसी वनवासी के दरवाजे पर पहुँचे हैं। द्वार खटखटाया तो एक सुन्दर युवती निकली। नारद को सुहावनी लगी सो घर में चले गये और इधर उधर की वार्ता में निमग्न हो गये। नारद ने अपना परिचय दिया और भील कन्या से विवाह का प्रस्ताव किया। उसका परिवार सहमत हो गया और तुरन्त साज सामान इकट्ठा करके विवाह कर दिया। नारद सुन्दर पत्नी के साथ बड़े आनन्दपूर्वक दिन बिताने लगे। कुछ ही दिनों में क्रमशः उनके तीन पुत्र भी हो गये।

एक दिन भयंकर वर्षा हुई झोंपड़ी के पास रहने वाली नदी में बाढ़ आ गई। नारद अपने परिवार को लेकर बचने के लिए भागे। पीठ और कंधे पर लदे हुए तीनों बच्चे उस भयंकर बाढ़ में बह गये। यहाँ तक कि पत्नी का हाथ पकड़ने पर भी वह रुक न सकी और उसी बाढ़ में बह गई जिसमें उसके बच्चे बह गये थे।

नारद किनारे पर निकले तो आए पर सारा परिवार गँवा बैठने पर फूट-फूट कर रोने लगे। सोने और सपने में एक घण्टा बीत चुका था। उनके मुख से रुदन की आवाज अब भी निकल रही थी। पर झुरमुट में औंधे मुँह ही उनींदे पड़े हुए थे।

भगवान सब समझ रहे थे। वे नारद को ढूँढ़ते हुए खजूर के झुरमुट में पहुँचे उन्हें सोते से जगाया। आँसू पोंछे और रुदन रुकवाया। नारद हड़बड़ा कर बैठ गये।

भगवान ने पूछा- ‘‘हमारे लिए पानी लाने गये थे सो क्या हुआ?” नारद ने सपने में परिवार बसने और बाढ़ में बहने के दृश्य में समय चला जाने के कारण क्षमा माँगी।

भगवान ने कहा- ‘‘देखा नारद! यही माया है।”

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 December 2018

👉 आज का सद्चिंतन 6 December 2018


बुधवार, 5 दिसंबर 2018

जीवन की सबसे बड़ी सिख

एक समय की बात है, एक जंगल में सेब का एक बड़ा पेड़ था. एक बच्चा रोज उस पेड़ पर खेलने आया करता था. वह कभी पेड़ की डाली से लटकता, कभी फल तोड़ता, कभी उछल कूद करता था, सेब का पेड़ भी उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता था.कई साल इस तरह बीत गये. अचानक एक दिन बच्चा कहीं चला गया और फिर लौट के नहीं आया, पेड़ ने उसका काफ़ी इंतज़ार किया पर वह नहीं आया. अब तो पेड़ उदास हो गया था.

काफ़ी साल बाद वह बच्चा फिर से पेड़के पास आया पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था. पेड़ उसे देखकर काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा.

पर बच्चा उदास होते हुए बोला कि अब वह बड़ा हो गया है अब वह उसके साथ नहीं खेल सकता. बच्चा बोला की, “अब मुझे खिलोने से खेलना अच्छा लगता है, पर मेरे पास खिलोने खरीदने के लिए पैसे नहीं है”
पेड़ बोला, “उदास ना हो तुम मेरे फल (सेब) तोड़ लो और उन्हें बेच कर खिलोने खरीद लो. बच्चा खुशी खुशी फल (सेब) तोड़के ले गया लेकिन वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं आया. पेड़ बहुत दुखी हुआ.

अचानक बहुत दिनों बाद बच्चा जो अब जवान हो गया था वापस आया, पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा.
पर लड़के ने कहा कि, “वह पेड़ के साथ नहीं खेल सकता अब मुझे कुछ पैसे चाहिए क्यूंकी मुझे अपने बच्चों के लिए घर बनाना है.”
पेड़ बोला, “मेरी शाखाएँ बहुत मजबूत हैं तुम इन्हें काट कर ले जाओ और अपना घर बना लो. अब लड़के ने खुशी-खुशी सारी शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला गया. 

उस समय पेड़ उसे देखकर बहोत खुश हुआ लेकिन वह फिर कभी वापस नहीं आया. और फिर से वह पेड़ अकेला और उदास हो गया था.

अंत में वह काफी दिनों बाद थका हुआ वहा आया.
तभी पेड़ उदास होते हुए बोला की, “अब मेरे पास ना फल हैं और ना ही लकड़ी अब में तुम्हारी मदद भी नहीं कर सकता.

बूढ़ा बोला की, “अब उसे कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक जगह चाहिए जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम से गुजार सके.” पेड़ ने उसे अपनी जड़ो मे पनाह दी और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा.

यही कहानी आज हम सब की भी है. मित्रों इसी पेड़ की तरह हमारे माता-पिता भी होते हैं, जब हम छोटे होते हैं तो उनके साथ खेलकर बड़े होते हैं और बड़े होकर उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं और तभी वापस आते हैं जब हमें कोई ज़रूरत होती है. धीरे-धीरे ऐसे ही जीवन बीत जाता है. हमें पेड़ रूपी माता-पिता की सेवा करनी चाहिए ना की सिर्फ़ उनसे फ़ायदा लेना चाहिए.

इस कहानी में हमें दिखाई देता है की उस पेड़ के लिए वह बच्चा बहुत महत्वपूर्ण था, और वह बच्चा बार-बार जरुरत के अनुसार उस सेब के पेड़ का उपयोग करता था, ये सब जानते हुए भी की वह उसका केवल उपयोग ही कर रहा है. इसी तरह आज-कल हम भी हमारे माता-पिता का जरुरत के अनुसार उपयोग करते है. 

और बड़े होने पर उन्हें भूल जाते है. हमें हमेशा हमारे माता-पिता की सेवा करनी चाहिये, उनका सम्मान करना चाहिये. और हमेशा, भले ही हम कितने भी व्यस्त क्यू ना हो उनके लिए थोडा समय तो भी निकलते रहना चाहिये.

👉 सत्य पथ तुमको बुलाता है (Kavita)


प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की।
कल्पना चीखती है, छटपटाती है मधुर फल की॥ 

हृदय का रक्त करे दान यह मन्दिर गढ़ा हमने, 
अनेकों शीश हँस-हँस कर दिये इस पर चढ़ा हमने, 

गिरा गौरव युगों से था किया फिर से खड़ा हमने, 
कठिनता से किया था प्राप्त अमृत का घड़ा हमने, 

सुधा का घट हमारे पास तक आ ही नहीं पाया- कि होने लग गई वर्षा प्रतीक्षा पर हलाहल की।

प्रतिष्ठा पा गई है मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

जहाँ देखो- वही पद के लिये पागल पिपासा है,
 घृणा, छल, द्वेष, हिंसा का भयंकरतम कुहासा है, 

इन्हीं सबको समझ हमने लिया आधार जीवन का,
 न यह देखा कि है कितना बड़ा संसार जीवन का, 

सुयश सौंदर्य मैला हो रहा है मान-सरवर का- उगलने लग गये है हंस के दल राशि कजल की।

 प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥ 

चलो! लौटो कुपथ से- सत्य पथ तुमको बुलाता है, 
कुपथ देता नहीं कुछ- स्त्रोत जीवन के सुखाता हे, 

समय की घोषणा सुनकर जो अपना पथ बदलते है- वही उत्कर्ष के तरु फूलते हैं और फलते हैं, 

फंसा है संकटों में राष्ट्र देखो! आँख मत मूँदो,
 चिरन्तन सत्य के सिर पर न लाठी मारिये छल की। 
प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 December 2018


मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

👉 दुनियां क्या कहेगी...

एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया।

पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं तो तीन-चार पनिहारिनें पानी के लिए आईं तो एक पनिहारिन ने कहा- "आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...
पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।"

पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली... उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया... दूसरी बोली,"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई.. अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?

तब तीसरी पनिहारिन बोली,"बाबा! यह तो पनघट है, यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"

लेकिन एक चौथी पनिहारिन ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी- "साधु, क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।" सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना...

आप ऊपर देखकर चलोगे तो कहेंगे... "अभिमानी हो गए।"
नीचे देखकर चलोगे तो कहेंगे... "बस किसी के सामने देखते ही नहीं।"
आंखे बंद कर दोगे तो कहेंगे कि... "ध्यान का नाटक कर रहा है।"
चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि... "निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।"

और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि... "किया हुआ भोगना ही पड़ता है।"

ईश्वर को राजी करना आसान है, लेकिन संसार को राजी करना असंभव है।
दुनिया क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो आप अपना ध्यान नहीं लगा पाओगे...

👉 आज का सद्चिंतन 4 December 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 December 2018


👉 The Roots of Fulfillment

Most thinkers, philosophers of the world opine that self-evolution is a natural desire, and tendency of every living being. In fact this is what lies behind one’s quest for progress and joy… All efforts, all competitions and struggles for worldly possessions, sensual pleasures, ego-satisfaction emanate from this rootcause in the deepest depth, though we don’t realize it because of our extrovert attitude and illusions of letting the worldly substances and circumstances as the keys to a treasure of joy.

One earns money with hard work and keeps saving it to get more and more. Why? Because, he ‘feels’ it like a source of joy. But the same fellow might spend his savings in gorgeous arrangements of his child’s marriage? Why? Because that might give him a ‘feeling’ of greater pleasure of making his child happy or gaining prestige in the society or what not…! A dacoit risks his life in bringing huge wealth in loot, but what does he do of it? He might just throw it in drinking liquor; because for him that might appear to be a greater source of pleasure than saving the money or using it some other ways. If the savings are consumed in religious alms or treatment of a disease, one does not feel as bad as one would, if the same amount was lost due to burglary.

So what we see common in all these examples and perhaps in every action of our life is that one opts for what he or she feels or thinks as more satisfying, although this satisfaction or joy might be just circumstan tial, illusory and short-lived. Deeper thinking would indicate that the root of this quest for joy or fulfillment lies beneath the sublime core of eternal quest of the self for ascent, for betterment, for unbounded evolution… Then we would then attempt for the absolute unalloyed bliss, ultimate fulfillment.

📖 Akhand Jyoti, June 1940

👉 आत्मिक तृप्ति का आधार

संसार के प्रमुख दार्शनिकों का मत है कि जीव की स्वाभाविक इच्छा और अभिलाषा आत्मिक उन्नति की है। भौतिक सुविधाओं को लोग इकट्ठा करते हैं, इंद्रियों के विषय भोगते हैं, पर बारीक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि ये सब कार्य भी आत्मिक तृप्ति के लिए किये जाते हैं। यह दूसरी बात है कि धुँधली दृष्टि होने के कारण लोग नकल को ही असल समझ बैठें। आपने बड़े परिश्रम से धन इकट्ठा किया है, किंतु विवाह में उसे बड़ी उदारता के साथ खर्च कर देते हैं।

उस दिन एक पैसे के लिए प्राण दिये करते थे, आज आप अशर्फियाँ क्यों लुटा रहे हैं? इसलिए कि आज आप धन संचित रखने की अपेक्षा उसे खर्च कर डालने में अधिक सुख का अनुभव करते हैं। डाकू जिस धन को जान हथेली पर रखकर लाया थ, उसे मदिरा पीने में इस तरह क्यों उड़ा रहा है? इसलिए कि वह मदिरा पीने के आनंद को धन जोड़ने की अपेक्षा अधिक महत्त्व देता है।

बीमारी में, धर्म-कार्यों में, या अन्य बातों में काफी पैसा खर्च हो जाता है, किन्तु मनुष्य कुछ भी रंज नहीं करता। यही पैसा यदि चोरी में चला गया होता तो उसे बड़ा दु:ख होता। इन उदाहरणों में आप देखते हैं कि जिनका अमूल्य जीवन धन-संचय में खर्च हुआ जा रहा है, वे अपने उस जीवनरस को भी एक समय बड़ी लापरवाही के साथ उड़ा देते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि उन खर्चीले कामों में आदमी अधिक आनंद का अनुभव करता है।

📖 अखण्ड ज्योति- जून 1940

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

👉 एक वेश्या ने कराया था विवेकानंद को संन्यासी होने का अहसास

स्वामी जी ने शिकागो की धर्म संसद में भाषण देकर दुनिया को ये एहसास कराया कि भारत विश्व गुरु है। अमेरिका जाने से पहले स्वामी विवेकानंद जयपुर के एक महाराजा के महल में रुके थे। महाराजा राजा विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का भक्त था। विवेकानंद के स्वागत के लिए राजा ने एक भव्य आयोजन किया। इसमें वेश्याओं को भी बुलाया गया। शायद राजा यह भूल गया कि वेश्याओं के जरिए एक संन्यासी का स्वागत करना ठीक नहीं है। विवेकानंद उस वक्त अपरिपक्‍व थे। वे अभी पूरे संन्‍यासी नहीं बने थे। वह अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो अपना कमरा बंद कर लिया। जब महाराजा को गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने विवेकानंद से माफी मांगी।

महाराजा ने कहा कि उन्होंने वेश्या को इसके पैसे दे दिए हैं, लेकिन ये देश की सबसे बड़ी वेश्या है, अगर इसे ऐसे चले जाने को कहेंगे तो उसका अपमान होगा। आप कृपा करके बाहर आएं। विवेकानंद कमरे से बाहर आने में डर रहे थे। इतने में वेश्या ने गाना गाना शुरू किया, फिर उसने एक सन्यासी गीत गाया। गीत बहुत सुंदर था। गीत का अर्थ था- ''मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही, यह मालूम मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?''

विवेकानंद ने अपने कमरे इस गीत को सुना, वेश्‍या रोते हुए गा रही थी। उन्होंने उसकी स्थिति का अनुभव किया और सोचा कि वो क्या कर रहे हैं। विवेकानंद से रहा नहीं गया और उन्होंने कमरे का गेट खोल दिया। विवेकानंद एक वेश्या से पराजित हो गए। वो बाहर आकर बैठ गए। फिर उन्होंने डायरी में लिखा, ''ईश्‍वर से एक नया प्रकाश मिला है मुझे। डरा हुआ था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी मेरे भीतर। इसीलिए डर गया मैं। किंतु उस औरत ने मुझे पूरी तरह हरा दिया। मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा।'' उस रात उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ''अब मैं उस औरत के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था और कोई डर नहीं होता।''

सीख- इस घटना से विवेकानंद को तटस्थ रहने का ज्ञान मिला, आपका मन दुर्बल और निसहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण पहले से तय मत करो।

👉 आज का सद्चिंतन 3 December 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 December 2018


👉 Quest for Joy

Man wanders all the time, throughout his life, in search of joy, blissful peace, but remains dismayed and astray…. Acquisition of hoards of wealth, worldly comforts, good health, delicious food, palatial house, vehicles, servants, gorgeous cloths, beauty, beloved family, faithful friends, supporters all around, powers, prestige, name and fame, security…., and what not he looks for? People who lack in any of these strive for their possession; those, who already have, try to possess more with new passions…

This scenario is like that of the tale of the swan (flamingo), which is hunting for the pearl since Ages, but finds nothing but a drop of dew… Why? Because, it did not really search for the pearl; did not even turn his face in the direction of the grand Ocean “Mansarovar” where the pearl is hidden in the depths… It did not gather the courage and strength to fly so long… Short-sighted intellect and pleasure-hungry mind advised it – “what is the guarantee that you will find that unseen “Mansarovar”; and who knows whether there will really be any pearl and you would trace it” so it satisfied itself with the shining drops of dew; licked it and thought it has quenched the thirst…; it flew for sometime and the thirst recurred with greater intensity.

The cycle continued… This is what happens with most of us who keep searching for ‘immortal’ joy in the mirage of perishable world, keep accumulating more of what gives only a momentary pleasure but keeps us away from the sight of real bliss…

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

👉 आनंद की खोज

आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान, दरवाजे-दरवाजे पर टकराता फिरता है। बहुत-सा रुपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, सुस्वाद भोजन करे, सुंदर वस्त्र पहने, बढ़िया मकान और सवारियाँ हों, नौकर-चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, बंधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हों, समाज में प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो। ये चीजें आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें ये चीजें उपलब्ध नहीं होतीं, वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जिनके पास हैं, वे उससे अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं।

इन सब तस्वीरों में आनंद की खोज करते-करते चिरकाल बीत गया, पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती! उसकी तो खोज ही नहीं की, मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया, लंबी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी। मन ने कहा-जरा इसे और देख लूँ। आँखों से न दीख पड़ने वाले मानसरोवर में मोती मिल ही जाएंगे, इसकी क्या गारंटी है। फिर ओस चाटी और फड़फड़ाया, फिर यही पहिया चलता रहता है। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परंतु ओस की बूंदें ठहरीं, वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूल में समा गईं।
यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है, फिर भी नाशवान चीजों का नाश होता ही है।

📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1940

रविवार, 2 दिसंबर 2018

👉 मां की शिक्षा

बात उन दिनों की है जब अमेरिका में दास प्रथा चरम पर थी। एक धनाढ्य ने बेंगर नामक दास को खरीदा। बेंगर न केवल परिश्रमी था बल्कि गुणवान भी था। वह धनी व्यक्ति बेंगर से पूर्ण रूपेण संतुष्ट था और उस पर विश्वास भी किया करता था।

एक दिन वह बेंगर को लेकर दासमंडी गया, जहां लोगों का जानवरों की भांति कारोबार होता था। उस धनी ने एक और दास खरीदने की इच्छा जाहिर की तो बेंगर ने एक बूढ़े की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मालिक! उस बूढ़े को खरीद लीजिए।’

बेंगर के साथ उस बूढ़े को खरीदकर धनी घर चला गया। बूढ़े के साथ बेंगर बहुत खुश था। वह उसकी भलीभांति सेवा किया करता था।

एक दिन उस धनी ने बेंगर को उस बूढ़े की सेवा करते देखा तो इसका कारण पूछा। बेंगर ने बताया, ‘मालिक! बूढ़ा मेरा कुछ भी नहीं लगता बल्कि यह मेरा सबसे बड़ा शत्रु है। इसी ने मुझे बचपन में गुलाम के रूप में बेच डाला था। बाद में यह खुद भी पकड़ा गया और दास बन गया। उस दिन मैंने इस बूढ़े को दासमंडी में पहचान लिया था। मैं इसकी सेवा इसलिए करता हूं कि मेरी मां ने मुझे शिक्षा दी थी कि शत्रु यदि निर्वस्त्र हो तो उसे वस्त्र दो, भूखा हो तो रोटी हो, प्यासा हो तो पानी पिलाओ। इसलिए मैं इसकी सेवा करता हूं।’

इतना सुनकर वह धनाढ्य व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने उसी दिन से बेंगर को स्वतंत्र कर दिया।

👉 आज का सद्चिंतन 2 December 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 December 2018

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

👉 प्रेम और कृतज्ञता

निस्वार्थ भाव से, बदला न पाने की इच्छा से और अहसान न जताने के विचार से जो उपकार दूसरों के साथ किया जाता है उसके फल की समता और तीनों लोग मिलकर भी नहीं कर सकते। बदला पाने की इच्छा रहित जो भलाई की गई है, वह समुद्र की तरह महान है। कोई मनुष्य किसी आवश्यकता से व्याकुल हो रहा है, उस समय उसकी मदद करना कितना महत्वपूर्ण है, इसे उस व्याकुल मनुष्य का हृदय ही जानता है। जरूरतमंदों को एक राई के बराबर मदद देना उससे बढ़ कर है कि बिना जरूरत वाले के पल्ले में एक पहाड़ बाँध दिया जावे। किसी को कष्ट में से उबारना, जन्म जन्मान्तरों के लिए अपना पथ निर्माण करना है।

जिसने तुम्हारे साथ भलाई की है उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करो। सहायता का मूल्य वस्तु के मूल्य से मत नापो, वरन् उसका महत्व अपनी आवश्यकता को देखते हुए नापो कि उस समय यदि वह मदद तुम्हें न मिलती तो तुम्हारा क्या हाल होता। उनका अहसान मत भूलो जिन्होंने मुसीबत के समय तुम्हारी मदद की थी। उपकार को भूल जाना नीचता हैं पर उन्हें क्या कहें जो भलाई के बदले बुराई करते है? वे मनुष्य बड़े अभागे हैं जो उपकारों का बदला अपकार से देते हैं। संसार के समस्त पापियों का तो उद्धार होगा पर कृतघ्न का कभी कल्याण न हो सकेगा।

धरती माता से उस दिन मनुष्यों का बोझ न उठाया जा सकेगा जिस दिन कि सब लोग अपनी श्रेष्ठता को छोड़ कर नीच बन जावेंगे। आदमी की चमड़ी में क्या खूबसूरती है? सुन्दर तो उसके कर्म हैं। सत्यप्रियता, निष्कपटता, श्रेष्ठ आचरण, सद् व्यवहार और उदारता यही पाँच स्तम्भ हैं जिनके ऊपर श्रेष्ठ आचरण का भवन खड़ा किया जाता है।

✍🏻 ऋषि तिरुवल्लुवर
📖 अखण्ड ज्योति जून 1942 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/June/v1.7

👉 पीपल के पेड़ पर

पीपल के पेड़ पर एक बेताल रहता था। लालच देकर लोगों को अपने पास बुलाता और अनाचार के मार्ग पर लगाता और अन्ततः उन्हें मार डालता, यही उसकी नीति थी। अब कितने ही मर गये तो उसका नाम सात स्वर्ण मुद्रा वाला बेताल नाम पड़ गया। जिन्हें पता था, वे सावधान रहते और उस रास्ते न जाते।

एक अनजान नाई उस रास्ते निकला। बेताल ने पेड़ पर बैठे पूछा− सात घड़े सोना लोगे।’ नाई का पहले तो आने का मन नहीं हुआ, फिर सोचा मुफ्त में इतना धन मिल रहा है तो क्यों छोड़ा जाय? उसने कह दिया। आप कृपा पूर्वक दे ही रहे हैं तो ले लूँगा।

बेताल ने कहा− ‘घर चले जाइए। आँगन में स्वर्ण मुद्राओं से भरे सात घड़े मिल जायेंगे। नाई तेजी से चला और रास्ता जल्दी ही पार करके घर जा पहुँचा। आँगन में सात घड़े रखे मिले। छः भरे और सातवाँ आधा खाली।

नाई ने दरवाजा बन्द करके घर के लोगों को सारा वृतान्त सुनाया। सभी बहुत प्रसन्न थे। फूले नहीं समाये। विचार हुआ कि इस सोने का क्या किया जाय? तर्क−वितर्क क बाद सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आधे घड़े को भरने के लिए अधिक प्रयत्न कर लिया जाय। सातों पूरे हो जाने पर आगे की बात सोचेंगे।

परिवार के सभी लोग दुर्बल, चिन्तित, व्यग्र और कुकर्मरत रहने लगे। चेहरे कुरूप हो गये और शरीर जर्जर। लगता था एक−एक करके मृत्यु के मुँह में चले जायेंगे। सातवाँ घड़ा भरने की फिक्र में सभी सूखकर काँटा हुए जा रहे थे।

जिस राजा के यहाँ नाई नौकरी करता था उसके कान तक सूचना पहुंची। उसने नाई परिवार−को बुलाकर कहा। मूर्खों! उन सात घड़ों को ले जाकर चुपचाप उस श्मशान में रख आओ। अन्यथा उन घड़ों के रहते तुममें से एक भी जीवित न बचेगा। इस कुचक्र में कितने ही अपनी जान गँवा बैठे हैं। नाई परिवार ने सीख मानी। घड़े पीपल के पेड़ के नीचे रखकर लौट आये। फिर पहले की तरह नीतिपूर्वक की गई कमाई पर निश्चिन्तता से गुजारा करने लगे और उस प्राणघातक कुचक्र से छूटकर शान्ति से दिन बिताने लगे।

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