🔶 हर परिस्थिति, हर घटना, हर वस्तु के लिए कुछ बातें अनुकूल हैं तो कुछ प्रतिकूल पड़ती हैं। उनका विशेष प्रभाव अनुकूलों पर ही होता है, प्रतिकूलों पर या तो वह प्रभाव होता ही नहीं, होता भी है तो बहुत कम। आग का विशेष प्रभाव सूखी लकड़ी पर जितना होता है उतना गीली पर नहीं, पानी को जितना रेतीली जमीन सोखती है उतना पथरीली जमीन नहीं, बीमारी का आक्रमण जितना अशुद्ध रक्त वालों पर होता है उतना शुद्ध रक्त वालों पर नहीं, रंग जितना साफ कपड़े पर चढ़ता है, उतना गंदे पर नहीं, इसी प्रकार बुरी परिस्थितियों, बुरे तत्वों और बुरे व्यक्तियों का प्रभाव भी हलके दर्जे की मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है। ऊंची और सुसंस्कृत मनोभूमि के लोग उससे बहुत कम ही प्रभावित होते हैं।
🔷 कुमार्ग पर ले जाने वाली अनेकों बुराइयाँ जगह-जगह मौजूद हैं और वे अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिये भी सक्रिय रहती हैं। अनेकों व्यक्ति उनके चंगुल में फंसते हैं और अपने आपको उस रंग में इतना रंग लेते हैं कि फिर इस जाल से निकल सकना कठिन हो जाता है। जुए बाजी के, शराब खोरी के, सिनेमाबाजी के, व्यभिचार के, आवारागर्दी के, शैतानी के अड्डे हर जगह पाये जाते हैं, उनके जाल में अनेक लोग रोज ही फंसते हैं और अपना समय, स्वास्थ्य, धन लोक परलोक सभी कुछ गंवा कर छूँछ हो जाते हैं। इससे उन बुराइयों की शक्ति और सफलता का अन्दाज सहज ही लगाया जा सकता है। पर यह प्रभाव एक खास तरह की उथली मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है, वे ही इनके चंगुल में फंसते और बर्बाद होते हैं।
🔶 ठगों के जाल में अनेक लोग फंस जाते हैं और उनके द्वारा बहुत ही हानि उठाते हैं पर उन समस्त लोगों में अधिकतर ऐसी मनोवृत्ति के लोग होते हैं जो बहुत सस्ते में, बहुत सा लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। जिन्हें अपनी योग्यता एवं श्रम के आधार पर परिश्रम की कमाई पर संतोष है जो केवल नीतिपूर्वक उचित तरीके से जितना प्राप्त हो सकता है उससे काम चलाते हैं और प्रसन्न रहते हैं उन्हें कोई ठग नहीं ठग सकता। यों ठगी के अनेकों तरीके हैं पर उनमें सिद्धान्त एक ही काम करता है कि ठग लोग यह सोचते हैं कि शिकार में लालच पर्याप्त है कि नहीं, वह योग्यता और श्रम की बात को भुलाकर जैसे बने वैसे अधिक लाभ प्राप्त करने का इच्छुक है कि नहीं? यदि है तो ठग समझ लेते हैं कि यह हमारा पक्का शिकार है। इसे ठगा जा सकता है। नोट दूना कराने, ताँबे से सोना बनाने, जमीन में से गढ़ा धन निकालने कोई बड़ा लाभ करा देने आदि के प्रलोभन देकर लोगों को लालायित करते हैं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔷 कुमार्ग पर ले जाने वाली अनेकों बुराइयाँ जगह-जगह मौजूद हैं और वे अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिये भी सक्रिय रहती हैं। अनेकों व्यक्ति उनके चंगुल में फंसते हैं और अपने आपको उस रंग में इतना रंग लेते हैं कि फिर इस जाल से निकल सकना कठिन हो जाता है। जुए बाजी के, शराब खोरी के, सिनेमाबाजी के, व्यभिचार के, आवारागर्दी के, शैतानी के अड्डे हर जगह पाये जाते हैं, उनके जाल में अनेक लोग रोज ही फंसते हैं और अपना समय, स्वास्थ्य, धन लोक परलोक सभी कुछ गंवा कर छूँछ हो जाते हैं। इससे उन बुराइयों की शक्ति और सफलता का अन्दाज सहज ही लगाया जा सकता है। पर यह प्रभाव एक खास तरह की उथली मनोभूमि के लोगों पर ही पड़ता है, वे ही इनके चंगुल में फंसते और बर्बाद होते हैं।
🔶 ठगों के जाल में अनेक लोग फंस जाते हैं और उनके द्वारा बहुत ही हानि उठाते हैं पर उन समस्त लोगों में अधिकतर ऐसी मनोवृत्ति के लोग होते हैं जो बहुत सस्ते में, बहुत सा लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। जिन्हें अपनी योग्यता एवं श्रम के आधार पर परिश्रम की कमाई पर संतोष है जो केवल नीतिपूर्वक उचित तरीके से जितना प्राप्त हो सकता है उससे काम चलाते हैं और प्रसन्न रहते हैं उन्हें कोई ठग नहीं ठग सकता। यों ठगी के अनेकों तरीके हैं पर उनमें सिद्धान्त एक ही काम करता है कि ठग लोग यह सोचते हैं कि शिकार में लालच पर्याप्त है कि नहीं, वह योग्यता और श्रम की बात को भुलाकर जैसे बने वैसे अधिक लाभ प्राप्त करने का इच्छुक है कि नहीं? यदि है तो ठग समझ लेते हैं कि यह हमारा पक्का शिकार है। इसे ठगा जा सकता है। नोट दूना कराने, ताँबे से सोना बनाने, जमीन में से गढ़ा धन निकालने कोई बड़ा लाभ करा देने आदि के प्रलोभन देकर लोगों को लालायित करते हैं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य












































