शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६७)

भक्ति और ज्ञान में विरोध कैसा?

इन मौन के क्षणों में देवर्षि मुखर हुए। उन्होंने बड़े ही मधुर स्वरों में अपना नया सूत्रोच्चार किया-
‘अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये’॥२९॥

किन्हीं दूसरे आचार्यों का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक दूसरे के आश्रित हैं। देवर्षि के इस सूत्र ने सभी को चिन्तन के एक नए आयाम की झलक दिखाई। ऋषिगण-देवगण, गन्धर्व, सिद्ध सभी विचार करने लगे। उनकी चिन्तन चेतना विचार वीथियों में भ्रमण करने लगी। भक्ति का क्षेत्र भाव है, जबकि ज्ञान विचारों की प्रखरता से सम्बन्धित है। कैसे सम्बन्धित हैं ये दोनों? यह सत्य और तत्त्व कहीं स्पष्ट नहीं हो रहा था। प्रायः सभी को देवर्षि के वचनों की प्रतीक्षा थी, परन्तु वह अभी कहीं खोए थे। उनका मुख शान्त था, अधरों पर मधुर स्मित रेखा थी, परन्तु नेत्रों से अपूर्व ज्योत्सना बिखर रही थी। न तो वह कुछ कह रहे थे और न दूसरा कोई उन्हें टोक रहा था।
    
तभी ऋषियों की पंक्ति में बैठे अपेक्षाकृत युवा ऋषि श्वेताक्ष ने देवर्षि की ओर देखा। उनके मुख पर प्रकाश का वलय था। तरूण होते हुए भी वह अपनी तप साधना, योग विभूतियों, विचारों की प्रखरता व भावप्रवण भक्ति के लिए ऋषियों-महर्षियों के बीच सुपरिचित एवं सुचर्चित थे। हिमालय उनका अपना घर था। कभी-कभी वे विनोद के स्वर में कहा करते थे कि हिमवान का आंगन मेरा ननिहाल है। आखिर यह मेरी माँ का मायका जो है। पर्वतसुता पार्वती- माता जगदम्बा के प्रति उनकी भक्ति अवर्णनीय थी। माँ का स्मरण उनकी प्रत्येक आती-जाती श्वास में रमा था। उनके रोम-रोम में भगवती की भावचेतना विराजती थी।
    
इस अनूठी भक्ति के साथ उनकी ज्ञाननिष्ठा भी अद्भुत थी। भगवती के भाव भरे आग्रह के कारण भगवान भोलेनाथ ने उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकारा था। जिसके सद्गुरु स्वयं जगदीश्वर हों, उसके ज्ञान की प्रखरता का वर्णन भला कौन कर सकता है। उनके ज्ञान के इस अक्षयकोष में शब्द नहीं, अनुभव संचित थे। वह कहा करते थे कि कोरे विचारों के विश्लेषण एवं तर्कों के संजाल से ज्ञान को अभिव्यक्त तो किया जा सकता है पर इनके आधार पर ज्ञान का अर्जन सम्भव नहीं। ज्ञान तो समाधिजा प्रज्ञा का परिणाम है। समाधि के इन विभिन्न स्तरों पर जो प्रज्ञा विकसित होती है, उसी की प्रदीप्ति में ज्ञान का प्राकट्य होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११९

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...