सोमवार, 19 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७)

पराम्बा के प्रति परमप्रेमरूपा है भक्ति

देवर्षि के शब्दों ने न केवल उनकी बल्कि सभी सप्तऋषियों की स्मृतियों को कुरेद दिया। आखिर वे भी तो पार्वती के प्रेममय स्वरूप के साक्षी थे। महर्षि अंगिरा ने उन पुरानी स्मृतियों के सूत्रों को सुलझाते हुए कहा- ‘‘यह सच है देवर्षि! हम सबमें सबसे पहले आप ने ही उन्हें माँ के रूप में पहचाना था और उनको शिवप्रेम के महातप में तपने की सलाह दी थी और फिर चली थी उनकी कठिन कठोर और दारुण तपश्चर्या। गंगाद्वार (हरिद्वार) का विल्व वन, विल्वकेश्वर मंदिर आज भी उन जगदम्बा के उस महातप का साक्षी है।’’
    
महर्षि अंगिरा के कथन से सहमति व्यक्त करते हुए देवर्षि ने कहा- ‘‘महर्षिगणों! यह सच सभी को, आज के प्रत्येक मानव को समझना होगा कि तप की आग के बिना प्रेम शुद्ध नहीं होता है। जहाँ तप नहीं है वहाँ प्रेम पनप नहीं सकता। वहाँ तो प्रेम के नाम पर वासनाएँ ही नर्तन करती हैं। जिसे प्रेम का अनुभव करना है, प्रेम का स्वाद चखना है उसे तप करना चाहिए। प्रेममयी माँ ने यही किया।’’ ‘‘हाँ, देवर्षि!’’ महामुनि वेदशिरा कहने लगे, ‘‘मैं भी साक्षी था माँ के उस तप का।’’
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गँवाए॥
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किये कठिन कछु दिन उपबासा॥
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भवउ अपरना॥
    
देवर्षि नारद आगे बोले- ‘‘तप में माँ ऐसी रमीं कि देह की सुध-बुध भूल गयीं। दैहिक कामनाएँ विसर्जित होती गयीं और अन्तर की भक्ति प्रगाढ़ होती गयी। उस समय साक्षात् सघन सौदामिनी की भाँति प्रचण्ड तेजस्विता थी माँ की।’’ नारद के इन स्वरों में साम्य बिठाते हुए महामुनि वेदशिरा बोले- ‘‘देवर्षि! उन्हीं दिनों देवाधिदेव भगवान महादेव ने काम-दहन किया था। उसे देवराज ने उन परमेश्वर की समाधि में व्याघात डालने के लिए भेजा था। बेचारा काम सर्वथा निष्काम परमेश्वर को सकाम करने चला था। शिव के तृतीय नेत्र की ज्वाला में जलकर राख हो गया। उसके बाद सप्तऋषिगण माँ की परीक्षा लेने के लिए गये थे।’’
    
इस प्रसंग के स्मरण से सप्तर्षियों के मन में भावों के कई उतार-चढ़ाव आये। उनमें से एक ने इस प्राचीन कथा के सूत्र को पकड़ते हुए कहा- ‘‘हम सबने माँ पार्वती को जाकर काम-दहन का संवाद सुनाते हुए कहा था कि जब काम ही नहीं बचा तो विवाह का क्या प्रयोजन और तब उन प्रेममयी ने लगभग फटकारते हुए कहा था-
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म बन बानी॥
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥
    
हे ऋषियों! तुम्हारे ज्ञान के अनुसार भगवान शिव ने अब काम को जलाया है। अभी तक तो सकाम ही थे। पर मेरे ज्ञान के अनुसार भगवान शिव सदा से ही योगी हैं। यदि मैंने ऐसे शिव की मन, कर्म, वाणी से भक्ति की  है तो हे मुनिश्वरों! करुणामय भगवान हमारा प्रण अवश्य पूर्ण करेंगे।

महर्षि वेदशिरा सप्त ऋषियों के कथन को आगे बढ़ाते हुए बोले- ‘‘यही हुआ। माँ का प्रण पूरा हुआ। क्योंकि उनकी भक्ति प्रेममयी थी। जिसे उन्होंने तप के साँचे में ढाला था। जिसमें किसी भी कामना की कालिख नहीं थी। जो सभी साँसारिक भावों के भद्देपन से अछूती थी। इस भक्ति के प्रभाव से माँ का अंतस् भगवान शिव से एकाकार हुआ था।’’

ऋषि के इस प्रसंग का सब भावभरा स्मरण कर ही रहे थे कि हिमालय के उस दिव्य परिसर में एक अलौकिक आध्यात्मिक छटा छा गयी। सभी ने सिर उठा कर देखा, यह माँ जगदम्बा का प्राकट्य हुआ। अष्टभुजा भवानी, माँ सिंहवाहिनी की ज्योतिर्मयी छवि हिमालय के आकाश में प्रकाशित हो रही थी। सभी के मुख से स्वतः ही उच्चारित हो उठा-
या देवि सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै! नमस्तस्यै!! नमस्तस्यै नमो नमः!!!

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८

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