बुधवार, 25 सितंबर 2019

👉 शरीर नहीं चेतना के सम्बन्धी चाहिए-

अब हम युग निर्माण परिवार का प्रारम्भिक सदस्य उन्हें मानेंगे जिनमें मिशन की विचारधारा के प्रति आस्था उत्पन्न हो गई है, जो उसका मूल्य महत्व समझते हैं, उसके लिए जिनके मन में उत्सुकता एवं आतुरता रहती है। जिनमें यह उत्सुकता उत्पन्न न हुई हो उनका हमसे व्यक्तिगत सम्बन्ध परिचय भर माना जा सकता है, मिशन के साथ उन्हें सम्बन्ध नहीं माना जायेगा।

यहाँ इन दो बातों का अन्तर स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए कि हमारा व्यक्तिगत परिचय एक बात है और मिशन के साथ सम्बन्ध दूसरी। व्यक्तिगत परिचय को शरीरगत संपर्क कहा जा सकता है और मिशन के प्रति घनिष्ठता को हमारे प्राणों के साथ लिपटना। शरीर संबंधी तो नाते रिश्तेदारों से लेकर भवन निर्माण, प्रेस, खरीद फरोख्त आदि के सिलसिले में हमारे संपर्क में आने वाले ढेरों व्यक्ति हैं। वे भी अपने संपर्क का गौरव अनुभव करते हैं। किन्तु हमारे अन्तःकरण का हमारी आकांक्षाओं एवं प्रवृत्तियों का न तो उन्हें परिचय ही है और न उस नाते, सम्बन्ध सहयोग ही है। उसी श्रेणी में उन्हें भी गिना जायेगा जिन्होंने कभी गुरु दीक्षा अथवा भेंट वार्तालाप के नाते सामयिक संपर्क बनाया था। इस बहिरंग शरीरगत संपर्क को भी झुठलाया नहीं जा सकता। उनके स्नेह, सद्भाव के लिए हमारे मन में स्वभावतः जीवन भर कृतज्ञता एवं आभार के भाव बने रहेंगे। किन्तु जो हमारे अन्तःकरण को भी छू सके हैं, छू सकते हैं, उनकी तलाश हमें सदा से रही है, रहेगी भी।

यदि किसी को हमारा वास्तविक परिचय प्राप्त करना हो तो नवयुग के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में ही हमारे समूचे जीवन का-समूचे व्यक्तिगत का मूल्यांकन करना चाहिए। हमारे रोम रोम में चेतना के रूप में बसा हुआ भगवान यह रास रचाए हुए हैं। पन्द्रह वर्ष की आयु में अपना जीवन जिस भगवान-जिस सद्गुरु को समर्पित किया था, वह शरीर सत्ता नहीं, वरन् युग चेतना की ज्वलन्त ज्वाला ही कही जा सकती है। उसके प्रभाव से हम जो कुछ भी सोचते और करते हैं उसे असंदिग्ध रूप से भजन कहा जा सकता है। यह भजन मानवी आदर्शों को पुनर्जीवित करने का विविध प्रयोगों के रूप में समझा जा सकता है। हमारी दैनिक उपासना भी इसी का एक अंग है। उसके माध्यम से हम अपनी सामर्थ्य पर-अन्तरात्मा पर प्रखरता की धार रखते हैं, इसलिए उसे साधना भर कहा जायेगा। साध्य तो वह भगवान है, जिसकी झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म, सूक्ष्म शरीर में सद्ज्ञान एवं कारण शरीर में सद्भाव के रूप में भासित होती है। एक वाक्य में कहना हो तो हमारा प्राण स्पंदन और मिशन, एक ही कहा जा सकता है। इस तथ्य के आधार पर जिनकी मिशन की विचारधारा के प्रति जितनी निष्ठा और तत्परता है, उन्हें हम अपने प्राण जीवन का उतना ही घना सम्बन्धी मानते हैं। भले ही वे व्यक्तिगत रूप से हमारे शरीरगत संपर्क में कभी न आये हों, हमारी आशा भरी दृष्टि उन्हीं पर जा टिकती है।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर हम युग निर्माण परिवार का पुनर्गठन कर रहे हैं। हम हर माह आत्ममंथन से जो कुछ उपार्जित करते हैं, उसे भाव भरे नवनीत की तरह स्वजनों को बाँटते हैं। यह वितरण नियमित रूप से मिशन की पत्रिकाओं के माध्यम से किया जाता है। जिन्हें यह रुचिकर लगता है, जो उत्सुकतापूर्वक उसकी प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें हम अपने सुख दुःख-दर्द सम्वेदना का साथी-सहभागी मानते हैं। आज वह चेतना जहाँ उत्सुकता के रूप में है, वहाँ कल तत्परता भी उत्पन्न होकर रहेगी, ऐसी आशा करना निरर्थक नहीं-तथ्यपूर्ण है। आज जो हमारी सम्वेदनाओं में सम्मिलित हैं कल वे हमारे कदम से कदम और कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने का भी साहस करेंगे, इस आशा का दीपक हम मरण के दिन तक सँजोये ही रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५१

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