शुक्रवार, 31 मार्च 2017

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 2)

🔵 क्या नौ दिन काफी मात्र नहीं हैं? नहीं- नौ दिन काफी नहीं हैं। यह अभ्यास है सारे जीवन को कैसा जिया जाना चाहिए, उसका। आप इस शिविर में आकर और कुछ सीख पाए कि नहीं पर एक बात अवश्य नोट करके जाना। क्या? वह है अध्यात्म की परिभाषा- अध्यात्म अर्थात् “साइंस ऑफ सोल”। अपने आपको सुधारने की विधा, अपने आपको सँभालने की विधा, अपने आपको समुन्नत करने की विधा। आपने तो यह समझा है कि अध्यात्म अर्थात् देवता को जाल में फँसाने की विधा, देवता की जेब काटने की विधा। आपने यही समझ रखा है न। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आप जो सोचते हैं बिल्कुल गलत है। जब तक बेवकूफी से भरी बेकार की बातें आप अपने दिमाग में जड़ जमाए बैठे रहेंगे, झख ही झख मारते रहेंगे।

🔴 खाली हाथ मारे-मारे फिरेंगे। आप देवता को समझते क्या हैं? देवता को कबूतर समझ रखा है जो दाना फला दिया और चुपके-चुपके कबूतर आने लगे। बहेलिया रास्ते में छिपकर बैठ गया, झटका दिया और कबूतर रूपी देवता फँस गया। दाना फेंककर, नैवेद्य फेंककर, धूपबत्ती फेंककर बहेलिये के तरीके से फँसाना चाहते हैं, उसका कचूमर निकालना चाहते हैं? इसी का नाम भजन है? तपश्चर्या, साधना क्या इसी को कहते हैं? योगाभ्यास सिद्धान्त यही है? मैं आपसे ही पूछता हूँ, जरा बताइए तो सही।

🔵 आप देवियों को क्या समझते हैं? हम तो मछली समझते हैं । आटे की गोली बनाकर फेंकी व बगुले की तरह झट से उसे निगल लिया । धन्य हैं आप। आपके बराबर दयालु कोई नहीं हो सकता । मछली को पकड़ा तो कहा कि बहनजी आइए जरा। आपको सिंहासन पर बैठाएँगे आपकी आरती उतारेंगे और आपका जुलूस निकालेंगे। ऐसी ऐसी बाते करते हैं और जीवन भर इसी प्रवंचना में उलझे रहते हैं। देवियाँ कौन हैं? मछलियाँ । देवता कौन हैं? कबूतर। आप कौन हैं? बहेलिया । यही धन्धा है। चुप । बहेलिये का मछली मार का धन्धा करता है कहता है हम भजन करते हैं हम देवी के भक्त हैं । हम आस्तिक हैं। चुप, खबरदार। कभी मत कहना ऐसी बात। इसी को भजन कहते हैं तो हम यह कहेंगे कि यह भजन नहीं हों सकता आप ध्यान रखिएगा। आप अपने ख्यालातों को सही कीजिए अपने विचारों को सही कीजिए, अपने सोचने के तरीके को बदलिए यह हम आपको कहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1992 पृष्ठ 55

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...