बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 6 Oct 2016

🔴 परमार्थ मार्ग पर चलने वालों की आमतौर से दुनियादार लोग हँसी उड़ाते हैं, किन्तु जो कुमार्ग पर चल रहे हैं, उन्हें सहन करते रहते हैं। ऐसे अविवेकी लोगों के उपहास अथवा समर्थन का कोई मूल्य नहीं। मूल्य विवेक और सत्य का है। अध्यात्मवादी को केवल विवेक और सत्य का समर्थन करने का इतना साहस होना चाहिए कि औंधी बुद्धि के अविवेकी दुनिया वालों की परवाह न करता हुआ अपनी मंजिल पर साहसपूर्ण कदम बढ़ाता रह सके।

🔵 बहुधा देखा जाता है कि जो जितना अधिक चिंतित और अशान्त रहता है वह और अधिक विपत्ति में फँसता है। इसके विपरीत जो शान्त चित्त, संतुलित मन और स्थिर बुद्धि से कठिनाइयों का  सामना करता है, वे उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं पातीं। विपत्ति आने पर मनुष्य अपनी जितनी शक्ति को उद्विग्न और अशान्त रहकर नष्ट कर देता है, उसका एक अंश भी यदि वह शाान्त चित्त रहकर कष्टों को दूर करने में व्यय करे तो शीघ्र ही मुक्त हो सकता है।

🔴 विरोध करना लोगों का आज स्वभाव बन गया है। यहाँ पर क्या अच्छे कार्य और क्या बुरे, विरोध सबका ही किया जाता है, बल्कि वास्तव में  देखा जाय तो पता चलेगा कि बुराई से अधिक भलाई को विरोध का सामना करना पड़ता है। इसका कारण यह नहीं है कि भलाई भी बुराई की तरह ही विरोध की पात्र है, बल्कि समाज की दुष्प्रवृत्तियाँ अपने अस्तित्व के प्रति खतरा देखकर भड़क उठती हैं और विरोध के रूप में सामने आ जाती हैं। चूँकि सत्प्रवृत्तियाँ विरोध भाव से शून्य होती हैं, इसलिए वे बुराई का विरोध करने से पूर्व सुधार का प्रयत्न करती हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...