शुक्रवार, 15 मई 2026

👉 चिन्तन कम ही कीजिए।

क्या आप अत्याधिक चिन्तनशील प्रकृति के हैं? सारे दिन अपनी बाबत कुछ न कुछ गंभीरता से सोचा ही करते हैं? कल हमारे व्यापार में हानि होगी या लाभ, बाजार के भाव ऊँचे जायेंगे, या नीचे गिरेंगे। अमुक ने हमारा रुपया उधार ले रखा है, वह वापस करेगा भी या हड़प लेगा? दिनों दिन बाजार में महंगाई उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। कल का खर्च कैसे चलेगा? कन्या बड़ी होती जा रही है। उसके लिये योग्य समृद्ध और शिक्षित वर का कैसे प्रबन्ध होगा? हमारा पुत्र पढ़ता कम है। सारा समय खेलने में व्यतीत करता है। परीक्षा में कैसे उत्तीर्ण होगा? हमारी नौकरी लगी रहेगी, या छूट जायगी? हमारा स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, कैसे सुधरेगा? हमें जल्दी ही लम्बी यात्रा पर जाना है। मार्ग की कठिनाइयाँ कैसे हल होंगी? ऐसी ही किसी समस्या को लेकर आप दिन-रात चिन्तन करते रहते हैं।

आप अपने मस्तिष्क को सारे दिन विशेषतः रात में किसी भी चिन्तन की क्रिया में डाल देते हैं। जैसे गाड़ी का पहिया किसी लीक में पड़ कर आगे निरन्तर उसी दिशा में बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मस्तिष्क को चिन्तन की किसी भी समस्या में उसको लगा देने से वह उसी में फँसा रहता है। वह खुद रुकता नहीं बल्कि चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।

आधुनिक मनोविज्ञान वेत्ताओं की नई खोज यह है कि अधिक बौद्धिक चिन्तन मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक है। जो जितना अधिक मानसिक चिन्तन करता है, उसका शरीर उतना ही क्षीण होता जाता है। भूख नष्ट हो जाती है। भोजन में कोई भी रुचि नहीं रह जाती। रक्तचाप, व्रण, हृदय रोग, सिर दर्द आदि उभर उठते हैं। चिन्तनशील व्यक्ति प्रायः भयभीत से, शंकालु से और भविष्य के लिए चिन्तित रहते हैं। गुप्त मन में बैठा हुआ उनका भय ही उन्हें खाया करता है।

आप बौद्धिक चिन्तन या मानसिक श्रम करने वालों के स्वास्थ्य को देखिए। वे पहले दुबले रहते हैं तो भी शरीर पर माँस नहीं बढ़ता। उनकी हड़ियाँ ही हड्डियाँ चमका करती हैं। मेरे एक मित्र हैं जो लेखन का काम करते हैं। एक दिन मेरे पास आये। बोले रात में नींद नहीं आती। फल यह होता है कि सारे दिन थकान बनी रहती है। हाथ पाँव टूटते से रहते हैं। नेत्रों में नींद छाई रहती है और सर भारी रहता है। डॉक्टर को दिखाया तो न बुखार है, न इन्फ्यूलेन्जा, न और कोई शारीरिक विकार पर थकान बनी रहती है। दिमाग में सारे दिन रात एक अजीब प्रकार का तनाव बना रहता है।

हमने उन्हें बताया कि इस मानसिक व्यग्रता का मुख्य कारण सतत चिन्तन है। अधिक बौद्धिक चिन्तन से स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। उसी की प्रतिक्रिया इनके शरीर पर दिखाई देती है। इन्होंने अपने मस्तिष्क को आराम नहीं दिया वरन् लगातार चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप अपने को मानसिक दृष्टि से थका हुआ पाने लगे।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये (अंतिम भाग)

बहुधा नये कामों का आरम्भ करते समय एक किस्म का संकोच होने लगता है। कारण वही है- अशुभ आशंका। उस स्थिति में अशुभ आशंकाओं को अपने मन से झटक कर विचार किया जाना चाहिए। सफलता और असफलता दोनों ही सम्भावनाएँ खुली हुई हैं। फिर क्या जरूरी है कि असफल ही होना पड़ेगा। मन में आशा का यह अंकुर जमा लिया जाए तो असफलता भी पराजित नहीं कर पाती। उस स्थिति में भी व्यक्ति को यह सन्तोष रहता है कि असफलता कोई नये अनुभव दे गई है। इन अनुभवों से लाभ उठाते हुए आशावादी व्यक्ति दुबारा प्रयत्न करता रहता है और तब तक प्रयत्न करता रहता है, जब तक कि सफलता हस्तगत नहीं हो जाती।

असफलताओं और दुःखदाई घटनाओं को स्मृति पटल पर बार-बार लाने की अपेक्षा ऐसी घटनाओं का स्मरण करना चाहिए जो अपने आपके प्रति आस्था और विश्वास को जगाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सफलता के और असफलता के दोनों ही अवसर आते हैं, दोनों तरह की परिस्थितियाँ आती हैं जो अच्छी और बुरी होती है। सुख-दुःख के क्षण सभी के जीवन में आते हैं। असफलताओं, कठिनाइयों और कष्टों को याद रखने तथा याद करने की अपेक्षा सफलताओं और सुखद क्षणों को याद करना आशा तथा उत्साह का जनक होता है। ये स्मृतियाँ व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं और जो व्यक्ति अपने आप में विश्वास रखता है, हर कठिनाई को सामना करने के लिए प्रस्तुत रहता है उसके लिए कैसा भय और कैसी निराशा?

भविष्य के प्रति आशंका, भय को आमंत्रण मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं को कुँद बना देते हैं। अस्तु, जिन्हें जीवन में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा है उन्हें चाहिए कि वे अशुभ चिन्तन, भविष्य के प्रति आशंकित रहने और व्यर्थ के भयों को पालने की आदत से छुटकारा प्राप्त करें।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 May 2026


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गुरुवार, 14 मई 2026

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 2)

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों की विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाए अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है तो इसमें किसी और का दोष नहीं है, दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिन्तन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिन्तन को ही अपनाया।

अशुभ चिन्तन चुनने के पीछे भी कारण है। विगत के कटु अनुभवों, असफलताओं और कठिनाइयों से पीड़ित मन वर्तमान में भी लौट-लौटकर उन्हीं स्मृतियों को दोहराता रहता है और जाने-अनजाने अशुभ कल्पनायें करता रहता है। यह कल्पनाएँ ही व्यक्ति में भय उत्पन्न करती हैं। जबकि स्मरण के लिए अतीत के सुखद अनुभव, सफलताएँ और अनुकूलताएँ भी हैं। यदि उन्हें याद किया जाता रहे तो भविष्य के प्रति आशंकित होने के स्थान पर सुखद सम्भावनाओं से आशान्वित भी हुआ जा सकता है।

भय और मनोबल, अशुभ और शुभ चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है? इसके लिए मन की उस दुर्बलता को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसे आत्मविश्वास का अभाव कहा जाता है।

प्रथम तो अशुभ चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है। अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी। कहने का आशय यह कि किसी भी व्यक्ति के मन में उसकी इच्छा और अनुमति के विपरीत भय प्रवेश कर ही नहीं सकता। तो भीरुता को अपने स्वभाव से हटाने के लिए पहली बात तो यह आवश्यक है कि भय को अपने मनःक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( अंतिम भाग )

पुण्य परमार्थ के अवसर अथवा भावना को टालने वाले जीवन में भारी भूल करते हैं। परमार्थ अथवा परोपकार की भावना अथवा अवसर का उदय होना किन्हीं पूर्व पुण्यों का उदय ही समझना चाहिए। अन्यथा इस प्रपंच एवं प्रवंचनापूर्ण संसार में, इसके दूषित वातावरण में ऐसे अवसर और ऐसी कल्याणकारी भावनाएं सुलभ ही कहाँ होती हैं। यदि आये हुए उत्साह को कार्यान्वित न करके आगे के लिये टाल दिया गया तो कोई ठीक नहीं कि वह भावना फिर उठे या न उठे, वह अवसर फिर आये न आये। इस नश्वर संसार में जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं। आज है कल नहीं भी रह सकता। तब तो पुण्य परमार्थ का एक अवसर भाग्यवश आया था उसके भी लाभ से वंचित रहना पड़ेगा! परमार्थ अथवा पुण्य-कार्य में तत्परता करने का महत्व समझने के लिए महाभारत का यह उपाख्यान बड़ा उपयोगी तथा शिक्षाप्रद है।

एक बार एक भिक्षुक ने महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख उपस्थित होकर कुछ याचना की। महाराज युधिष्ठिर उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे। निदान उन्होंने उससे दूसरे दिन आने को कह दिया। भिक्षुक चला गया!

उस अवसर पर भीम वहीं उपस्थित थे! भिखारी के चले जाने पर वे उठे और हर्ष सूचक दुन्दुभी बजाने लगे उसका संकेत स्वर सुनकर नगर में खुशी के बाजे बजने लगे। युधिष्ठिर ने सुना और भीम से पूछा। भीम यह हर्ष सूचक वाद्य सहसा क्यों बज उठे। भीम ने उत्तर दिया-वह इसलिए कि हमारे महाराज युधिष्ठिर ने काल को जीत लिया है!

भीम की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर बड़े चकित हुए। बोले- “भीम यह तुम क्या कह रहे हो-मैंने काल को जीत लिया है। क्या कोई मनुष्य काल पर भी अधिकार कर सकता है।” भीम ने कहा क्यों नहीं महाराज-यदि आपने काल को न जीत लिया होता तो क्या उस भिक्षुक को कल के लिये कह कर वापस कर देते। ज्यादा तो नहीं कल के लिए तो आपने काल को अपने वश में कर ही लिया है।” महाराज युधिष्ठिर भीम का आशय समझ गये। उन्होंने अपनी भूल पर लज्जित होते हुए तुरन्त ही भिखारी को बुलाया और दान देकर कहा-भीम तुम ठीक कहते हो। पुण्य परमार्थ का कोई अवसर टालना नहीं चाहिए। क्योंकि अगले क्षण यह रहे न रहे! क्या ठिकाना।

अस्तु, पुण्य परमार्थ के बिना मनुष्य का कल्याण नहीं और जब तक उसे जीवन का अनिवार्य अंग नहीं बना लिया जावेगा उसका बन पड़ना सम्भव नहीं होगा! साथ ही उसके करने में न तो विलम्ब करना चाहिए और न प्रमाद! मानव जीवन की सार्थकता और आत्मा का कल्याण इसी में है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 May 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2026



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बुधवार, 13 मई 2026

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 1)

अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।

इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

इसके उत्तर में जिन्न ने कहा कि “तुम्हीं ने मुझे बुलाया है और तुम्हीं ने मुझे डराने के लिए जिम्मेदार किया है। इसके लिए तुम्हीं जिम्मेदार हो, क्योंकि तुम्हीं ने मुझे उत्पन्न किया है।” जापान के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते हुए बताते हैं कि यह जिन्न लोगों के बुलाने पर अब भी आता है तथा उन्हें तरह-तरह से परेशान करता है। इस जिन्न का नाम भय है। कुल मिलाकर यह कि भय अपने ही मन की उपज है। कौन यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि व्यापार में घाटा हो सकता है, परीक्षा में फेल हुआ जा सकता है, नौकरी में अधिकारी नाराज हो सकते हैं, काम धन्धा चौपट हो सकता है। बिना किसी के कहने पर व्यक्ति स्वयं ही तो इस तरह की बातें सोचता है। अन्यथा क्या यह नहीं सोचा जा सकता कि व्यापार में पहले की अपेक्षा अधिक लाभ होगा, नौकरी में तरक्की हो सकती है, परीक्षा में पहले की अपेक्षा अच्छे नम्बरों से पास हुआ जा सकता है। व्यक्ति इस तरह का शुभ और आशाप्रद चिन्तन क्यों नहीं करता, क्यों वह अशुभ ही अशुभ सोचता है?

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 3)

समयाभाव का बहाना भी इसी तरह का थोथा बहाना मात्र है और कुछ नहीं। एक दिन के चौबीस घंटों और गुजर गये जीवन की लम्बी अवधि में ऐसी कौन सी व्यस्तता रही हो सकती है जिसके कारण थोड़ा सा पुण्य परमार्थ, कोई छोटा सा सत्कर्म करने का भी समय न मिल सका। खाने, पीने, सोने, जागने, मनोरंजन करने और व्यापार व्यवसाय के बीच से क्या थोड़ा सा भी समय नहीं निकाला जा सकता जो कि किसी सत्कर्म में लगाया जा सके।

माना, व्यापार व्यवसाय के व्यस्त समय में कटौती नहीं कि जा सकती। ऐसा करने से सम्भव है कि किसी हानि का सामना करना पड़ जाये। तथापि विश्राम एवं मनोरंजन के समय में से तो कुछ समय ऐसा निकाला जा सकता है तो पुण्य परमार्थ के कर्म में लगाया जा सके! गद्दी पर बैठे बैठे दान किया जा सकता है। रास्ता चलते-चलते किसी की सहायता की जा सकती है। किसी समय थोड़ा सा समय देकर कुछ ऐसे विद्यार्थियों की परीक्षा ली जा सकती है जो सहायता के पात्र हों और उसी समय से उनको छात्रवृत्ति देकर एक साल तक परोपकार के उस कार्य को चलाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त मनोरंजन के उपायों में परमार्थ परक गतिविधियाँ और कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं। बहुत बार जहाँ सैर सपाटे के लिए यात्राओं पर जाया जा सकता है, वन-विहार और जल विहार के लिये प्रस्थान किया जा सकता है तो एक बार किसी दीन-हीन और पिछड़ी बस्ती की और भी जाया जा सकता है। उनकी आवश्यकताएँ और दुःख दर्द का पता लगाया और सहायता की जा सकती है। जहाँ सौ बार संगीत सुना जा सकता है वहाँ एक बार दुखियों की पुकार भी सुनी जा सकती है। जिस प्रकार उस पर खर्च किया जा सकता है, उसी प्रकार उन गरीबों पर भी किया जा सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परोपकार की भावना सच्ची हो और कुछ करने का उत्साह हो तो समय का प्रभाव आड़े नहीं आ सकता! हजारों ऐसे परोपकार के कार्य हो सकते हैं जो घूमते-चलते और बैठते-उठते किए जा सकते हैं।

अवसर न मिलने की बात भी व्यर्थ है। इसमें भी कोई तथ्य नहीं है। कोई आवश्यक नहीं कि परोपकार के लिए कोई बड़ी योजना बनाई जाये और खास तौर से उसका प्रबंध किया जाये। परमार्थ कोई बड़ा यत्न करने अथवा विश्वविद्यालय खड़ा करने में ही नहीं है और न गरीबों की बस्ती का पुनः-निर्माण करने मात्र में ही है। कहीं भी चल रहे इन आयोजनों में योगदान करने से भी परमार्थ का प्रयोजन पूरा हो जाता है। किसी के आयोजित यज्ञ में कुछ दे देने और किसी संस्था के निर्माण में सहयोग करने में भी उतना ही बड़ा पुण्य है जितना कि स्वयं उसका आयोजन करना! जिस प्रकार खड़े-खड़े व्यावसायिक सौदे कर लिए जाते हैं बैठे-बैठे, बड़े-बड़े कारोबार चला लिए जाते हैं, वैसे ही चलते-चलते किसी जन-निर्माण में चुपके से अपना अंश-दान भी लिखाया जा सकता है। बिना कहे साधन सामग्री भी भेजी जा सकती है। ऐसे कार्यों के लिए किसी अवसर की तलाश करना, किसी तीर्थ यात्रा की प्रतीक्षा करते रहना एक बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। श्रद्धापूर्वक अच्छे और निष्काम मन से किया हुआ एक छोटा सहयोग भी परमार्थ के बड़े आयोजन की तरह ही पुण्य प्रतापी होता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 May 2026


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मंगलवार, 12 मई 2026

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार वे अधिकतर दो प्रकार से करते हैं। या तो वे अवसर और परिस्थिति न होने का बहाना करते हैं अथवा परमार्थ प्रवृत्ति को आगे के लिये टालते रहते हैं। बहुत से लोग यह सोचते और कहते रहते हैं कि क्या करें, हमारे पास धन ही नहीं है। हम पुण्य परमार्थ कर भी कैसे सकते हैं? उसके लिये तो धन की आवश्यकता होती है। जो थोड़ी बहुत आय है उसमें परिवार का ही खर्च पूरा नहीं होता। अपने भविष्य के लिये ही जब कुछ नहीं बच पाता तो परोपकार अथवा पुण्य परमार्थ में कहाँ से बचाया और लगाया जा सकता है।

बहुतों के पास जब धन का बहाना नहीं होता तो समय के अभाव का बहाना ले बैठते हैं। सफाई देते हुए कहा करते हैं- कुछ सत्कर्म और परमार्थ करने की इच्छा तो होती है। उसके लिये, भगवान ने कुछ खर्च कर सकने की समता भी दी है। लेकिन क्या बतायें समय का बड़ा अभाव रहता है। घर-बार, कारोबार और जीवन के अन्य कामों की इतनी बहुतायत है कि एक मिनट का भी समय नहीं मिलता। किस समय तो परोपकार किया जाये और किस समय परमार्थ।

किन्तु सच्ची बात यह है कि इस प्रकार की मजबूरी बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। धन का बहाना लेने वालों को सोचना चाहिए कि जब दुनिया की सारी जरूरतों के लिए पैसे का प्रबन्ध हो जाता है तो क्या पुण्य परमार्थ के लिये इतना बड़ा अकाल पड़ जाता है कि कोई छोटा-मोटा सत्कर्म भी नहीं कर सकते। सीमित आय में भी जब दुनियादारी का कोई आकस्मिक व्यय आ पड़ता है तो उन्हीं सीमित साधनों में से उसका भी प्रबन्ध हो जाता है। तब क्या कारण है कि पुण्य परमार्थ के लिये थोड़ा सा भी पैसा खर्च नहीं किया जा सकता। यदि मन में सच्ची भावना हो और परमार्थ को अनिवार्य कार्यों की तरह अपरिहार्य समझा जाये तो उसके लिए भी सौ रास्ते निकल सकते हैं। कमी पैसे की नहीं कमी वास्तव में सच्ची भावना की होती है।

पुण्य परमार्थ पैसे के आधार पर ही होता हो, पैसे के बिना हो ही न सकता हो, ऐसी भी कोई बात-नहीं है। पुण्य परमार्थ के ऐसे हजारों काम हैं जो पैसे के बिना भी हो सकते हैं। परमार्थ तो तन-मन-धन तीनों प्रकार से हो सकता है। परमार्थ का आशय-दान देना, सदावर्त खोलना, गोशाला, धर्मशाला, कुँआ अथवा मंदिर बनवाना ही तो नहीं है। दीन दुखियों के प्रति दया, करुणा और सहानुभूति की भावना रखना। रोगियों, अपाहिजों और आपत्तिग्रस्तों की सेवा करना, अन्धों को राह दिखलाना और खोये हुए को घर पहुँचा देना भी तो पुण्य परमार्थ के ही अंतर्गत आता है। इसके लिए न धन की आवश्यकता है और सम्पत्ति की। यह सत्कर्म बिना धन के थोड़े शारीरिक श्रम द्वारा भी किए जा सकते हैं। धन का बहाना-बहाना मात्र ही है। इसके पीछे न तो कोई तथ्य है और न सत्य!

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 अट्ठाईस बरस बाद

उस समय दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। अमेरिका और जापान की सेनाएँ मोर्चों पर आमने-सामने डटी हुई थीं। जापान की सरकार ने अपने एक छोटे से टापू गुआम को बचाने के लिए 13 हजार सैनिक तैनात कर दिये थे और अमेरिका जल्दी से जल्दी इस टापू पर अपना अधिकार देखना चाहता था क्योंकि गुआम सैनिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण था। यहाँ से दुश्मन पर सीधे वार किया जा सकता था।

गुआम पर कब्जा बनाये रखने और उस पर अधिकार करने के लिए दोनों देशों की सेनाएं घमासान लड़ाई लड़ रही थीं। जब जापानी सैनिकों के हारने का मौका आया तो उन्होंने आत्म-समर्पण करने के स्थान पर लड़ते-लड़ते मर जाना श्रेयस्कर समझा। संख्या और साधन बल में अधिक शक्तिशाली होने के कारण अमेरिकी सैनिकों को जल्दी विजय मिल गई और गुआम का पतन हो गया। सैकड़ों जापानी सैनिक निर्णायक युद्ध की अन्तिम घड़ियों तक लड़ते रहने के बाद, कुछ बस न चलता देख जंगलों में भाग गये क्योंकि सामने रहते हुए उन्हें हथियार डालने पड़ते, समर्पण करना पड़ता, पर उन्हें यह किसी कीमत पर स्वीकार नहीं था।

सन् 1973 में इन्हीं सैनिकों में से सैनिक सार्जेण्ट शियोर्चा योकोई वापस लौटा, जिसे जापान ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया। योकोई अट्ठाईस वर्षों तक जंगल की खाक छानता हुआ, पेड़-पौधों को अपना साथी मानते हुए, प्रगति की दौड़ दौड़ रही दुनिया से बेखबर सभ्य संसार में लौटा था। उसके इस वनवास की कहानी बहुत ही रोमाँचकारी है। योकोई को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? और उसने इन सबको किस सहजता से स्वीकार किया। उसके मूल में है- आत्म सम्मान और राष्ट्रीय गौरव की अक्षुण्ण बनाये रखने की भावना। ‘टूट’ जायेंगे पर झुकेंगे नहीं, यह निष्ठा।

अट्ठाईस वर्षों तक जंगल में रहते हुए योकोई को यह पता ही नहीं चला कि दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो गया है। इस सम्बन्ध में वह क्या सोचता था? पत्रकारी ने योकोई से यह प्रश्न किया तो उसने बताया, मैंने यह सीखा था कि जीतेजी बन्दी बनने की अपेक्षा मर जाना अच्छा है। गुआम की लड़ाई में आसन्न पराजय को देखते हुए सैकड़ों सैनिकों के साथ में भी जंगल में भाग गया। मेरे साथ आठ सैनिक और थे। हमें लगा कि सबका एक साथ रहना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए हम टोलियों में बँट गये। मेरी टोली में दो सैनिक और थे। हम तीनों टोलोफोफोखिर किले की आरे चले गये। यहीं पर हमें पता चला कि जापान हार गया है। अब तो नगर में जाने की सम्भावना और भी समाप्त हो गई।

अट्ठाईस वर्षों तक योकोई ने आदिम जीवन बिताया। उसके पास केवल एक कैंची थी, जिससे वह पेड़ों की शाखाएँ काटता और उनका उपयोग भोजन पकाने तथा छाया करने के लिए करता। कपड़े सीने के लिए उसने अपने बढ़े हुए नाखूनों का सुई के रूप में इस्तेमाल किया। रहने के लिए उसने जमीन में गुफा खोद ली और वह बिछौने के लिए पेड़ों की पत्तियों का उपयोग करता। भोजन के काम जंगली फल काम आते।

समय की जानकारी तो कैसे रखता? परन्तु महीने और वर्ष की गणना तो वह रखता ही था। पूर्णिमा का चाँद देखकर वह पेड़ के तने पर एक निशान बना देता। वह गुफा से बाहर बहुत कम निकलता था। प्रायः रात को ही वह बाहर भोजन की तलाश में आता था। कभी कभार बाहर आना उसे पुनः सभ्य संसार में ले आया।

एक बार टोलोफोको नहीं के किनारे घूम रहा था कि जो मछुआरों ने उसे देख लिया और सन्देह होने के कारण वे उसे पकड़ कर ले आये तथा पुलिस को सौंप दिया। वहाँ पूछताछ करने पर पता चला कि वह जापान की शाही सेना की 38 वीं इन्फैक्ट्री रेजीमेंट का सिपाही है। जापान की सरकार ने उसे करीब 350 सेन वेतन और सहायता के रूप में काफी रकम देने की घोषणा की है।

📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 12 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 May 2026


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सोमवार, 11 मई 2026

👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच का भाव नहीं रखना चाहिये। आत्म-निर्भरता तो जीवनोत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करती है। परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने का अद्भुत गुण मनुष्य में है। इसलिये अपने प्रत्येक कार्य की पूरी शक्ति से करना चाहिये। प्रत्येक कार्य ईश्वर का है, अतः उसे आत्म समर्पित भाव से करना चाहिये। कार्य में सद्भावना का प्रभाव उज्ज्वल चरित्र निर्माण के विकास के लिये होता है। कार्य करने का सौंदर्य, रुचिकर ढंग सफलता की निशानी है। कार्य की श्रेष्ठता में जीवन की श्रेष्ठता निहित है।

श्री रूजवैल्ट ने संकल्प किया था कि मैं ख्याति के खतरे में नहीं पड़ूंगा। हजारों प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी अडिग बने रहे। लिंकन ने वकील से जब झूठे पक्ष की ओर से वकालत करने को कहा, तब वह बोला- ‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकता, जूरी से वार्तालाप के बीच मेरा मन मुझे धिक्कारेगा कि लिंकन तुम झूठे हो, झूठे हो।’’

नैथन स्ट्रांस से फर्म की सफलता का रहस्य पूछा गया, तो वह बोले- ‘‘यह परिणाम केवल ग्राहक के प्रति बरती गयी मेरी ईमानदारी है। मुझसे ग्राहक कभी अप्रसन्न होकर नहीं गया।’’ महानता के गुण अन्तःकरण में समावेश हो जाने पर सफलताएं कदम चूमती हैं।

आत्म-विश्वास और परिश्रम के बल पर जीवन को सार्थकता प्रदान की जा सकती है। भाग्य का निर्माणक मनुष्य स्वयं है। ईश्वर निर्णयकर्ता और नियामक है। मनुष्य परिश्रम से चाहे तो अपने भाग्य की रेखाओं को बना सकता है- परिवर्तित कर सकता है। हैनरी स्ल्यूस्टर कहता है कि- ‘‘जिसे हम भाग्य की कृपा समझते हैं, वह और कुछ नहीं। वास्तव में हमारी सूझ-बूझ और कठिन परिश्रम का फल है।” विश्वास रखें परिश्रम और आत्म-विश्वास एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। दोनों मिलकर के ही लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो पाते हैं। संकल्प करें-बाधाओं को हमेशा हँस-हँस स्वीकार करना है। डर कर मार्ग से हटाना नहीं है। लक्ष्य विहीन नहीं होना है। हमेशा गतिमान रहना है-गतिहीन नहीं होना है।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की लोकप्रियता और सफलता का कारण परिस्थितियों से समझौता है। विकट विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लेकिन वह अपने विश्वास को प्रबल बनाते गये। आखिर वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिये गये।

परिश्रम और सफलता की आशा करते हुए हमें लक्ष्य प्राप्ति के बीच आने वाले दुष्परिणामों को भी सामान्य करने का साहस करना चाहिये। “सर्वश्रेष्ठ के लिये प्रयत्न कीजिये मगर निकृष्टतम के लिये तैयार रहिये।” अँग्रेजी की यह कहावत बड़ी सार्थक है। हैनरी फोर्ड से एक व्यक्ति ने उनकी सफलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने कहा, “सफलता का सबसे पहला रहस्य है, हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना।’’

किसी को दोषी बताकर अपने को और निराश न करें। परिस्थितियों से समझौता करें और उन्हें अनुकूल बनायें। कुछ रास्ते बन्द हो जाने पर भी कुछ खुले रहते हैं। ऐसा नहीं है कि सारे रास्ते ही बन्द हो जायें। जब आप नयापन खोजेंगे तो आशा की नई किरण फूटने लगेगी। जीवन में प्रतिद्वन्द्व न जगायें, किसी से घृणा न करें, प्रेमपूर्ण व्यवहार रखें। हर्बर्ट स्वूप लिखता है, ‘सफलता का रहस्य तो मैं नहीं बता सकता, मगर असफलताओं का रहस्य जरूर बता सकता हूँ। वह है हर किसी को खुश करने की कोशिश।’ जीवन को आवश्यक कार्यों में व्यक्त रखें और अनावश्यक कार्यों में उलझकर व्यस्त रहने का रोना न रोये। आशावादी बनकर अपने जीवन और जन-जीवन की प्रेरणा श्रोत बनें।

📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 1)

जिस प्रकार प्रकाश के अभाव को अन्धकार स्थानापन्न करता है, दया भाव का अभाव क्रूरता से स्थानापन्न होता है, उसी प्रकार पुण्य-परमार्थ के अभाव को पाप प्रवृत्तियाँ स्थानापन्न करती है।

जो मनुष्य पुण्य प्रवृत्तियों में निरत नहीं होता उससे पाप कर्मों की सम्भावना बनी रह सकती है। मनुष्य इन दो स्थितियों में से एक को ही प्राप्त कर सकता है। मध्य स्थिति या तो बड़ों के लिये सम्भव है अथवा जीवन मुक्त योगी के लिये। सामान्य मनुष्य न जड़ होता है और न जीवन मुक्त योगी। अस्तु आवश्यक है कि पाप से बचे रहने के लिये वह किसी न किसी परमार्थ कार्य में लगा रहे।

जो सत्पुरुष अपने अन्तःकरण में परमार्थ बुद्धि का विकास कर लेते हैं, जो परिष्कृत और उदार दृष्टिकोण से जीवन की सार्थकता पर विचार करते हैं, और जो अपनी आत्मा में आध्यात्मिक स्फूर्ति की स्थापना कर लेते हैं, उन्हें अपनी प्रवृत्तियों से भय नहीं रहता कि वे उसे पाप मार्ग पर ढकेल सकती है। मानव की सहज प्रवृत्तियाँ परमार्थ बुद्धि की अनुगामिनी बन जाती हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य और आरोग्य के लिये जिस प्रकार खाना-पीना, सोना-जागना, हँसना, खेलना और व्यायाम करना आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक मंगल के लिये, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिये परमार्थ कार्य करते रहना बहुत जरूरी है। दिनचर्या में परमार्थ को स्थान दिये बिना आत्मा का निर्मल और निष्कलंक रहना सम्भव नहीं। यदि आत्मा कलुषित एवं कलंकित है, तो शरीर कितना ही स्वस्थ, सुन्दर और शक्ति सम्पन्न क्यों न हो, मनुष्य अपूर्णता के दोष से बचा नहीं रह सकता। मनुष्य का स्वरूप पूर्ण तभी होता है जब शरीर के साथ आत्मा और बाह्य के साथ अन्तर भी स्वस्थ तथा सुन्दर हो। यह वाँछित स्थिति तभी सम्भव है, जब मनुष्य नित्यकर्मों की भाँति परमार्थ को भी जीवन क्रम का एक अभिन्न अंग बनाए।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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