शनिवार, 25 मार्च 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 25 March 2023

◆ हम अकेले चलें। सूर्य-चंद्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हो। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे-सुने अनुसार नहीं, वरन् स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें।

◆ सफलता के बारे में हमारा विश्वास अधूरा नहीं होना चाहिए। उसमें कहीं दरार या छिद्र नहीं होने चाहिए। सफलता के बारे में तिल मात्र भी संदेह हो तो समझना चाहिए कि प्रयत्न में शिथिलता है। शिथिलता होने से सफलता दूर चली जाएगी। जब तक किसी कार्य में हम अपनी समस्त शक्तियाँ लगा नहीं पाते, मन एकाग्र नहीं करते, तब तक वह कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। जितना कठिन कार्य है उसके लिए उतने ही दृढ़ विश्वास एवं निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता होती है।

◆ मनुष्य के पास बोलने की शक्ति है। यदि वह समय, परिस्थिति एवं श्रेष्ठता का ध्यान रखते हुए बोलता है तो वह वाणी के सहारे दुनिया में बहुत कुछ कर सकता है, किन्तु वाणी की शक्ति को ध्यान में रखे बिना अनर्गल, व्यर्थ की बकवास और बिना सोच-विचार कर बोलना उसका दुरुपयोग है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अपने आपको पहचानिये।

दूसरों की बुराइयाँ सभी देखते हैं परन्तु अपनी ओर देखने का अभ्यास बहुत कम लोगों को होता है। सुप्रसिद्ध विचारक इमर्सन का कथन है- ‘बहुत कम लोग मृत्यु से पूर्व अपने आपको पहिचान पाते हैं’ बहुत कम व्यक्ति अपने जीवन में सभी शक्तियों को प्रकट करते हैं; बाकी तो उन्हें साथ लिए ही मर जाते हैं। हममें से अनेकों तो ईश्वर के सन्देश को संसार में दिये बिना ही यहाँ से चले जाते हैं’।

वस्तुतः तथ्य तो यह है कि हमारे अन्दर असंख्य गुप्त शक्तियाँ सोई पड़ी हैं परन्तु हमें उन योग्यताओं तथा क्षमताओं का पता ही नहीं और न ही उन्हें जानने का प्रयास करते हैं। यह ठीक है कि बाहर की अनेकों वस्तुएं जानकर हम ज्ञानवान् कहलाएँ, परन्तु यह भी कम आवश्यक नहीं कि हम अपने आपको पहचानना भी सीखें। जो अपनी और देखने का अभ्यास डालता है, वही महान् बनता है। ऐसा व्यक्ति कठिनाइयों तथा बाधाओं पर विजय पाकर सतत् उन्नति करता रहता है।

महापुरुषों का जीवन इस बात का साक्षी है कि वे सतत् आत्म-निरीक्षण करते रहें तथा अपनी भूलों से सदैव शिक्षाएँ ग्रहण करते रहें। यदि आप भी महान् बनना चाहते हैं तो दूसरों को तुच्छ समझने की, उनमें छिद्रान्वेषण करने की दृष्टि का परित्याग कर दीजिए। दूसरों को तुच्छ समझने वाला मनुष्यत्व खो देता है। अन्यों की गलतियाँ खोजने की अपेक्षा अपनी त्रुटियाँ खोजिए और उन्हें दूर कीजिए। अपनी शक्तियों को पहचानिए और उनका सदुपयोग कीजिए।

ईश्वर ने अनेकों दिव्य शक्तियाँ देकर आपको संसार में भेजा है, उनका सदुपयोग कीजिए। पेट और प्रजनन जैसे क्षुद्र कार्यों में उन्हें व्यर्थ न होने दीजिए। आप जो भी कार्य कर रहे हैं उनसे हजारों गुना अधिक कार्य करने की सामर्थ्य आपके अन्दर है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि अपना महत्व समझे, शक्तियों को पहिचाने तथा समय का सदुपयोग करें। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है, उसे व्यर्थ न जाने दें।

जो कार्य करने की इच्छा रखते हैं, उसे आज से ही प्रारम्भ कर दीजिए। अपनी समस्त शक्तियाँ उसमें एकाकार। वह क्षण आपके जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण होगा जब आपको यह अनुभव होगा कि संसार को आपकी आवश्यकता है। आपके अन्दर एक और व्यक्तित्व समाहित है जो आपके बाहरी व्यक्तित्व से कहीं अधिक महान है। जिस क्षण व्यक्ति अपनी महानता की झलक पा लेता है; वह मानव से महामानवत्व की ओर अग्रसर हो जाता है।

हो सकता है कि किन्हीं कठिनाइयों या बाधाओं के कारण आपका व्यक्तित्व पूरी तरह से विकसित न हो सकता हो। परन्तु आपत्तियाँ आने पर घबराएं मत। जिस प्रकार से अग्नि में तप कर सोना निखर जाता है, और भी अधिक चमकने लगता है, उसी प्रकार बाधाएँ और कठिनाईयाँ मनुष्य को खरा कुन्दन बना देती है। कई पादप ऐसे होते हैं, जब तक उन्हें मसला न जाए सुगन्धि नहीं देते। उसी प्रकार कुछ व्यक्ति भी ऐसे होते हैं, जब तक वे विपत्तियों से आक्रान्त न किये जायें, उनकी योग्यताओं की सुगन्धि फैल ही नहीं पाती। अतएव आत्म-निरीक्षण के द्वारा अपनी योग्यताओं को पहचानिये। किसी भी प्रतिभा का अंकुर आपको अपने अन्दर दिखलाई पड़े उसको पुष्पित पल्लवित होने का अवसर दीजिये। कौन जाने एक दिन आप संसार के महान कलाकार बन जायें, विश्वप्रसिद्ध लेखक बन जायें, दार्शनिक या राजनीतिज्ञ बन जायें। चलिये और सतत् बढ़ते रहिए।

जो स्वयं को जान लेता है, वही साक्षात् परमेश्वर को जान सकता है। वही व्यक्ति ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा कर सकता है तथा उसके संदेशों को जनसाधारण तक पहुँचा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 32 

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👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

🔴 नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है। 

🔵 जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। माला में यों १०८ दाने होते हैं पर ८ अशुद्ध उच्चारण अथवा भूल- चूक का हिसाब छोड़ कर गणना १०० की ही की जाती है। इसलिये प्रतिदिन २७ माला का क्रम रखा जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है। 

🔴 आजकल हर बात में नकलीपन की भरमार है। मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं। अच्छा यह है कि उसमें छल- कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रूद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से मिल सकती हैं। गायत्री तप मे तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उसमें भी लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ का धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर सह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है। 

🔵 एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय किएक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। 

🔴 अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः ६ बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थातृ ४ बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् ९ बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिए। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो २ (१/२) -३ घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से १ घण्टा पहले से लेकर २ घण्टे बाद तक अर्थात् ५ से ८ तक के तीन घण्टों में सवेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः ९ बजे बाद और रात्रि को ८ के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। यह अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना पड़ता है।

👉 अपने चरित्र का निर्माण करो

जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि तुम उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय तुम्हें ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे तुम्हारा न तो चरित्र ऊंचा उठेगा और न तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार बार जो आत्म हत्या कर रहे हो आखिर उससे तुमने किस लाभ का अन्दाजा लगाया है?

शान्ति और तृप्ति, आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्ति होती हैं। जो मन में है वही वाणी और कर्म में होने पर जैसी शान्ति मिलती है उसका एक अंश भी मन वाणी और कर्म में अन्तर रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता। बल्कि ऐसा व्यक्ति घुट-घुट कर मरता है और दिन रात अशान्ति के ही चक्कर में पड़ा रहता है।

घुट-घुट कर लाख वर्ष जीने की अपेक्षा उस एक दिन का जीना अधिक श्रेयस्कर है जिसमें शान्ति है, तृप्ति है। परन्तु भय का भूत मनुष्य को न जिन्दा ही रहने देता है और न मरने ही देता है। भय की उत्पत्ति का कारण आशक्ति है, मोह है। शरीर का मोह, धन का मोह आदमी को कहीं का नहीं रहने देता, शरीर का चाहे जितना मोह करो उसे किसी न किसी दिन मिट्टी में मिलना ही है, अमर हो ही नहीं सकता तब फिर उसे आत्मोन्नति के साधन के लिए उपयोग में न लाकर जो लोग उसका भार ढोकर चलते रहना पसन्द करते हैं, पसन्द करते ही नहीं बल्कि चलते रहते हैं वे आत्मा को अन्धेरे की ओर ही गिराते हैं। धन और शरीर ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, जीवन का लक्ष्य तो है आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति। इसलिए शरीर और धन का जो लोग इसके लिए उपयोग नहीं करते वे प्राप्त साधनों का दुरुपयोग न करके अपने भावी जीवन में किसी महान संकट के लिए निमन्त्रण देते हैं।

जीवन और अच्छे जीवन के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए अपने आपकी खोज खबर रखता रहे। आत्म निरीक्षण करता रहे और फिर चतुर जर्राह की तरह जहाँ जहाँ आत्मोन्नति की बाधक शक्तियाँ और वृत्तियाँ काम कर रही हों। उनकी चीरफाड़ करता और उन्हें हटाता रहे। आत्म निरीक्षण और आत्म शुद्धि की वृत्ति को स्वभाव में बिना लाये कभी भी किसी व्यक्ति का चरित्र महान नहीं हुआ है। बल्कि चरित्र निर्माण के ये दोनों ही महान साधन हैं।

मानव स्वभावतः कमजोर नहीं है पर आस-पास का वातावरण उसे कमजोर बना देता है। सामाजिक परिस्थितियाँ-कायदे कानून मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकते हैं और सामाजिक प्राणि होने के कारण मनुष्य समाज द्वारा परित्यक्त किये जाने के भय से आतंकित रहता है, इसलिए अन्दर गन्दगी बढ़ती रहती है। लेकिन जिसे अपने लक्ष्य का ज्ञान रहता है और अटूट श्रद्धा के साथ लक्ष्य पर पहुँचने की दृढ़ता को कायम रखता है उसे समाज के दुर्विधानों की बेड़ियां जकड़े नहीं रहती। वह इन्हें तोड़ता फोड़ता आगे बढ़ता है और स्वयं अपना ही उद्धार नहीं करता बल्कि समाज का भी पुनस्संस्कार कर डालता है। ऐसा व्यक्ति महान होता है।

ज्ञान को आचरण में बदल कर मनुष्य महान बनता है। इस महानता का सबसे बड़ा गुण है अभयदान । इसलिए जो चरित्रवान होते हैं वे निर्भीक होते हैं। वे आत्मा को अजर अमर मानते हैं और दुःख सुख को मानसिक विकार। जिन्हें आत्मा की प्राप्ति नहीं होती वे ही इन विकारों में फँसे रहते हैं इसलिए सम्पन्न होने पर भी सुखी नहीं रहते। लेकिन जिन्होंने विकारों के तत्व को समझ लिया है और जिन्हें आत्मा की पूर्णता का परिचय मिल गया है। ऐसे आत्माराम पुरुष सिर्फ अपने को ही नहीं तारते बल्कि वे संसार के तरण तारण हो जाते हैं।

चरित्र, मानव-आत्मा को पूर्ण विकसित करता है इसलिए आरंभ में भले ही किन्हीं कठिनाइयों का सामना करना पड़े परन्तु अन्त में वे कठिनाइयाँ ही जीवन को उज्ज्वल करने वाली दिखने लगती हैं। इन कठिनाइयों को पार कर मानव तपःपूत हो जाता है। आत्मा निखर उठती है। तब अभाव नाम के किसी भी तत्व का उसके लिए कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इसलिए चरित्र की ही उपासना करनी चाहिए और चरित्रवान बनने का ही संकल्प । इस अकेले को लिया तो सब कुछ पा लिया समझो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3 

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/September.3

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गुरुवार, 23 मार्च 2023

👉 हम तुच्छ नहीं, गौरवास्पद जीवन जियें

हाड़-माँस का पुतला दुर्बलकाय मानव प्राणी शारीरिक दृष्टि से तुच्छ और नगण्य है। मामूली जीव-जन्तु, पशु-पक्षी जिस तरह का निसर्ग जीवन जीते हैं उसी तरह जिन्दगी की लाश नर-पशु भी ढोते रहते हैं। इस तरह की जिन्दगी जीने से किसी का जीवनोद्देश्य पूरा नहीं होता।

‘विचार’ ही वह शक्ति है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुख-सुविधाएं उपार्जित करने में समर्थ बनाया। विचार का यह प्रथम चमत्कार है। इससे अगला चमत्कार तब प्रारम्भ होता है जब वह विचारणा की महान् शक्ति, जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और उपयोग करने की सही जानकारी प्राप्त करने में प्रवृत्त होता है। इसी मार्ग एवं प्रयास का नाम तत्व-ज्ञान, दर्शन एवं अध्यात्म है। विचार-शक्ति का मूल्य और महत्व जिसे विदित हो गया वह अपनी इस ईश्वर प्रदत्त दिव्य विभूति को परम लक्ष्य की प्राप्ति में प्रयुक्त करता है। फलस्वरूप उसका सारा जीवन क्रम ही बदल जाता है, उसका प्रत्येक क्रिया-कलाप उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से ओत-प्रोत बनता चला जाता है।

यही मानव जीवन का गौरव तथा आनन्द है। विचारशीलता का अवलम्बन लेकर जीने में ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है। रोटी के लिये मरते-खपते रहना मनुष्य का नहीं तुच्छ जीवन-जन्तुओं का कार्य है। अच्छा हो हम अपनी-अपनी विचार शक्ति और जिन्दगी का मूल्य समझें और वह गतिविधियाँ अपनायें जो अपने स्तर और गौरव के उपयुक्त हैं।

✍🏻 ~ सन्त वास्वानी
📖 अखण्ड ज्योति 1968 फरवरी पृष्ठ 1

✍🏻 ~ सन्त वास्वानी
📖 अखण्ड ज्योति 1968 फरवरी पृष्ठ 1

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मंगलवार, 21 मार्च 2023

👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि विधान

🔷 नवरात्रि साधना को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार−विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।

🔶 जप संख्या के बारे में विधान यह है कि 9 दिनों में 24 हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। चूँकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से 45 मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। वस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।

🔷 आज कल हर बात में नकलीपन की भरमार है मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं अच्छा यह कि उस में छल कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रुद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से असली मिल सकती है। गायत्री तप में तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उससे भी सस्ती लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ कर धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर यह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है।

🔶 एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारण तथा एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में 27 मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती हैं। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं, तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः 6 बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थात् 4 बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् 9 बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिएं। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो 2॥−3 घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से 1 घण्टा पहले से लेकर 2 घण्टे बाद तक अर्थात् 5 से 8 तक के तीन घण्टों में सबेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः 9 बजे के बाद और रात्रि को 8 के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। पर अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करना पड़ता है।

🔷 उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। आरम्भ में सोहम और अन्त में खेचरी मुद्रा का नियम इसमें भी निवाहना पड़ता है। अन्तर इतना ही पड़ता है कि नित्य आधा घण्टा जप करना पड़ता था, वह अब बढ़ कर प्रायः ढाई−तीन घण्टे हो जाता है। जप के साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जायगा। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् नहीं 27 मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।

🔶 अगरबत्ती के स्थान पर यदि इन दिनों जप के तीन घण्टे घृतदीप जलाया जा सके तो अधिक उत्तम है। धृत का शुद्ध होना आवश्यक है। मिलावट के प्रचलित अन्धेर में यदि शुद्धता पर पूर्ण विश्वास हो तो ही बाहर से लिया जाय अन्यथा दूध लेकर अपने घर पर भी निकालना चाहिए। तीन घण्टे नित्य नौ दिन दीपक जले तो उसमें प्रायः दो ढाई सौ ग्राम घी लग जाता है। इतने घी का प्रबंध बने तो दीपक की बात सोचनी चाहिए अन्यथा अगरबत्ती, धूपबत्ती आदि से काम चलाना चाहिए। इनमें भी शुद्धता का ध्यान रखा जाय। सम्भव हो तो यह वस्तुएँ भी घर पर बना ली जाएं।

🔷 नवरात्रि अनुष्ठान नर−नारी कर सकते हैं। इसमें समय, स्थान एवं संख्या की नियमितता रखी जाती है इसलिए उस सतर्कता और अनुशासन के कारण शक्ति भी अधिक उत्पन्न होती है। किसी भी कार्य में ढील−पोल शिथिलता अनियमितता और अस्त−व्यस्तता बरती जाय उसी में उसी अनुपात से सफलता संदिग्ध होती चली जायगी। उपासना के सम्बन्ध में भी यह तथ्य काम करता है। उदास मन से ज्यों−त्यों− जब, तब वह बेगार भुगत दी जाय तो उसके सत्परिणाम भी स्वल्प ही होंगे, पर यदि उसमें चुस्ती, फुर्ती की व्यवस्था और तत्परता बरती जायगी तो लाभ कई गुना दिखाई पड़ेगा। अनुष्ठान में सामान्य जप की प्रक्रिया को अधिक कठोर और अधिक क्रमबद्ध कर दिया जाता है अस्तु उसकी सुखद प्रतिक्रिया भी अत्यधिक होती है।

🔶 प्रयत्न यह होना चाहिए कि पूरे नौ दिन यह विशेष जप संख्या ठीक प्रकार कार्यान्वित होती रहे। उसमें व्यवधान कम से कम पड़े। फिर भी कुछ आकस्मिक एवं अनिवार्य कारण ऐसे आ सकते हैं जिसमें व्यवस्था बिगड़ जाय और उपासना अधूरी छोड़नी पड़े। ऐसी दशा में यह किया जाना चाहिए कि बीच में जितने दिन बन्द रखना पड़े उसकी पूर्ति आगे चलकर कर ली जाय इस व्यवधान की क्षति पूर्ति के लिए एक दिन उपासना अधिक की जाय जैसे चार दिन अनुष्ठान चलाने के बाद किसी आकस्मिक कार्यवश बाहर जाना पड़ा। तब शेष पाँच दिन उस कार्य से वापस लौटने पर पूरे करने चाहिए। इसमें एक दिन व्यवधान का अधिक बढ़ा देना चाहिए अर्थात् पाँच दिन की अपेक्षा छह दिन में उस अनुष्ठान को पूर्ण माना जाय। स्त्रियों का मासिक धर्म यदि बीच में आ जाय तो चार दिन या शुद्ध न होने पर अधिक दिन तक रोका जाय और उसकी पूर्ति शुद्ध होने के बाद करनी जाय। एक दिन अधिक करना इस दशा में भी आवश्यक है।

🔷 अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं। शेष तीन ऐसे हैं जो यथा स्थिति एवं यथा सम्भव किये जा सकते हैं। इन पाँचों नियमों का पालन करना पंच तप कहलाता है, इनके पालन से अनुष्ठान की शक्ति असाधारण रूप से बढ़ जाती है।

🔶 इन दो दिन ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। शरीर और मन में अनुष्ठान के कारण जो विशेष उभार आते हैं उनके कारण कामुकता की प्रवृत्ति उभरती है। इसे रोका न जाय तो दूध में उफान आने पर उसके पात्र से बाहर निकल जाने के कारण घाटा ही पड़ेगा। अस्तु मनःस्थिति इस सम्बन्ध में मजबूत बना लेनी चाहिए। अच्छा तो यह है कि रात्रि को विपरीत लिंग के साथ न सोया जाय। दिनचर्या में ऐसी व्यस्तता और ऐसी परिस्थिति रखी जाय जिससे न शारीरिक और न मानसिक कामुकता उभरने का अवसर आये। यदि मनोविकार उभरें भी तो हठपूर्वक उनका दमन करना चाहिए और वैसी परिस्थिति नहीं आने दी जाय। यदि वह नियम न सधा, ब्रह्मचर्य अखंडित हुआ तो वह अनुष्ठान ही अधूरा माना जाय। करना हो तो फिर नये सिरे से किया जाय। यहाँ यह स्पष्ट है कि स्वप्नदोष पर अपना कुछ नियन्त्रण न होने से उसका कोई दोष नहीं माना जाता। उसके प्रायश्चित्य में दस माला अधिक जप कर लेना चाहिए।

🔷 दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास। जिनके लिए सम्भव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। ऐसे उपवासों में पेट पर दबाव घट जाने से प्रायः दस्त साफ नहीं हो पाता और पेट भारी रहने लगता है इसके लिए एनीमा अथवा त्रिफला−ईसबगोल की भूसी−कैस्टोफीन जैसे कोई हलके विरेचन लिए जा सकते हैं।

🔶 महंगाई अथवा दूसरे कारणों से जिनके लिए वह सम्भव न हो वे शाकाहार−छाछ आदि पर रह सकते हैं। अच्छा तो यही हैं कि एक बार भोजन और बीच−बीच में कुछ पेय पदार्थ ले लिए जायँ, पर वैसा न बन पड़े तो दो बार भी शाकाहार, दही आदि लिया जा सकता है।

🔷 जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शकर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएँ न लेकर दो ही वस्तुएँ ली जाएं। जैसे−रोटी, दाल। रोटी−शाक, चावल−दाल, दलिया, दही आदि। खाद्य−पदार्थों की संख्या थाली में दो से अधिक नहीं दिखाई पड़नी चाहिए। यह अन्नाहार एक बार अथवा स्थिति के अनुरूप दो बार भी लिया जा सकता है। पेय पदार्थ कई बार लेने की छूट है। पर वे भी नमक, शक्कर रहित होने चाहिएं।

🔶 जिनसे उपवास और ब्रह्मचर्य न बन पड़े वे अपनी जप संख्या नवरात्रि में बढ़ा सकते हैं इसका भी अतिरिक्त लाभ है, पर इन दो अनिवार्य नियमों का पालन न कर सकने के कारण उसे अनुष्ठान की संज्ञा न दी जा सकेगी और अनुशासन साधना जितने सत्परिणाम की अपेक्षा भी नहीं रहेगी। फिर भी जितना कुछ विशेष साधन−नियम पालन इस नवरात्रि पर्व पर बन पड़े उत्तम ही है।

🔷 तीन सामान्य नियम हैं 
[1] कोमल शैया का त्याग 
[2] अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना 
[3] हिंसा द्रव्यों का त्याग। इन नौ दिनों में भूमि या तख्त पर सोना तप तितीक्षा के कष्ट साध्य जीवन की एक प्रक्रिया है। इसका बन पड़ना कुछ विशेष कठिन नहीं है। चारपाई या पलंग छोड़कर जमीन पर या तख्त पर बिस्तर लगाकर सो जाना थोड़ा असुविधाजनक भले ही लगे, पर सोने का प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है।

🔶 कपड़े धोना, हजामत बनाना, तेल मालिश, जूता, पालिश, जैसे छोटे−बड़े अनेक शारीरिक कार्यों के लिए दूसरों की सेवा लेनी पड़ती है। अच्छा हो कि यह सब कार्य भी जितने सम्भव हों अपने हाथ किये जायं। बाजार का बना कोई खाद्य पदार्थ न लिया जाय। अन्नाहार पर रहना है तो वह अपने हाथ का अथवा पत्नी, माता जैसे सीधे शरीर सम्बन्धियों के हाथ का ही बना लेना चाहिए नौकर की सहायता इसमें जितनी कम ली जाय उतना उत्तम है। रिक्शे, ताँगे की अपेक्षा यदि साइकिल, स्कूटर, बस, रेल आदि की सवारी से काम चल सके तो अच्छा है। कपड़े अपने हाथ से धोना− हजामत अपने हाथ बनाना कुछ बहुत कठिन नहीं है। प्रयत्न यही होना चाहिए कि जहाँ तक हो सके अपनी शरीर सेवा अपने हाथों ही सम्पन्न की जाय।

🔷 तीसरा नियम है हिंसा द्रव्यों का त्याग। इन दिनों 99 प्रतिशत चमड़ा पशुओं की हत्या करके ही प्राप्त किया जाता हैं। वे पशु माँस के लिए ही नहीं चमड़े की दृष्टि से भी मारे जाते हैं। माँस और चमड़े का उपयोग देखने में भिन्न लगता है, पर परिणाम की दृष्टि से दोनों ही हिंसा के आधार हैं। इसमें हत्या करने वाले की तरह उपयोग करने वाले को भी पाप लगता है। अस्तु चमड़े के जूते सदा के लिए छोड़ सकें तो उत्तम है अन्यथा अनुष्ठान, काल में तो उनका परित्याग करके रबड़, प्लास्टिक कपड़े आदि के जूते चप्पलों से काम चलाना चाहिए।

🔶 माँस, अण्डा जैसे हिंसा द्रव्यों का इन दिनों निरोध ही रहता है। आज−कल एलोपैथी दवाएँ भी ऐसी अनेक है जिनमें जीवित प्राणियों का सत मिलाया जाता है। इनसे बचना चाहिए। रेशम, कस्तूरी, मृगचर्म आदि प्रायः पूजा प्रयोजनों में उपयोग किया जाता है, ये पदार्थ हिंसा से प्राप्त होने के कारण अग्राह्य ही माने जाने चाहिए। शहद यदि वैज्ञानिक विधि से निकाला गया है तो ठीक अन्यथा अण्डे बच्चे निचोड़ डालने और छत्ता तोड़ फेंकने की पुरानी पद्धति से प्राप्त किया गया शहद भी त्याग समझा जाना चाहिए।

🔷 न केवल जप उपासना के लिए ही समय की पाबन्दी रहे वरन् इन दिनों पूरी दिनचर्या ही नियमबद्ध रहे। सोने, खाने नहाने आदि सभी कृत्यों में यथासम्भव अधिक से अधिक समय निर्धारण और उसका पक्का पालन करना आवश्यक समझा जाय। अनुशासित शरीर और मन की अपनी विशेषता होती है और उससे शक्ति उत्पादन से लेकर सफलता की दिशा में द्रुत गति से बढ़ने का लाभ मिलता है। अनुष्ठानों की सफलता में भी यही तथ्य काम करता है।

🔶 अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोषों पर कठोर दृष्टि रखी जाय और अवाँछनीय उभारों को निरस्त करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील रहा जाय। असत्य भाषण, क्रोध, छल, कटुवचन अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे अवाँछनीय आचरणों से बचा जाना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसी दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। जिनसे बन पड़े वे अवकाश लेकर ऐसे वातावरण में रह सकते हैं जहाँ इस प्रकार की अवाँछनीयताओं का असर ही न आय। जिनके लिए ऐसा सम्भव नहीं, वे सामान्य जीवन यापन करते हुए अधिक से अधिक सदाचरण अपनाने के लिए सचेष्ट बने रहें।

🔷 नौ दिन की साधना पूरी हो जाने पर दसवें दिन अनुष्ठान की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिए इन दिनों 
(1) हवन 
(2) ब्रह्मदान 
(3) कन्याभोज के तीन उपचार पूरे करने चाहिएं।

🔶 संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। उन मन्त्रों को एवं विधानों को बताने वाली पुस्तिका गायत्री तपोभूमि मथुरा से मिलती है। पुराने उपासकों में से अधिकाँश उस कृत्य से परिचित हैं। अपनी जानकारी न हो तो किसी पुराने गायत्री उपासक की सहायता से 240 आहुतियों का हवन किया जा सकता है। जहाँ वैसे साधन न हों वहाँ घी और शकर मिलाकर गायत्री मन्त्र से उसकी आहुतियाँ दी जा सकती हैं। मिट्टी की छोटी चबूतरी बना कर पतली समिधाओं में अग्नि उच्चारण कर सकने वाले घर के अन्य लोगों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। यदि चार व्यक्ति मिल कर हवन करें तो मिलकर 60 बार आहुति देने से ही 240 आहुतियाँ हो जायेंगी। जितने आहुति देने वाले हों उसी हिसाब से यह निर्धारण करना चाहिए। 240 से कम आहुतियाँ नहीं होनी चाहिएं, अधिक हो जाए तो ठीक है। जिनके लिए इतना भी सम्भव न हो वे शाँति−कुँज को लिख देंगे तो उनकी 240 आहुतियाँ यहाँ की यज्ञशाला में विधिवत् कर दी जायेंगी।

🔷 गायत्री आद्य शक्ति−मातृ शक्ति है। उसका प्रतिनिधित्व कन्या करती है। अस्तु अन्तिम दिन कम से कम एक और अधिक जितनी सुविधा हो कन्याओं को भोजन कराना चाहिए।

🔶 ब्रह्मदान में सत्साहित्य का वितरण आता है। जन−मानस का परिष्कार करने वाला सस्ता प्रचार साहित्य युग−निर्माण योजना मथुरा और शांति−कुंज हरिद्वार से मिलता है अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ पैसा इसे मँगाने और विचारशील लोगों में उसे वितरण करने का प्रयत्न करना चाहिए। लागत से कम मूल्य में बेचना भी वितरण के समान ही श्रेष्ठ है।

🔷 दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन−प्रेरक पोस्टरों का चिपकाया जाना जैसे प्रेरणाप्रद कृत्य ब्रह्मदान की संज्ञा में ही गिने जाते हैं।

🔶 अनुष्ठान करने वाले इसकी सूचना हरिद्वार भेज देंगे तो उनकी साधना का संरक्षण एवं परिमार्जन भी वहाँ से किया जाता रहेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1976 पृष्ठ 60

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/February/v1.60


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सोमवार, 20 मार्च 2023

👉 सेवा करना इनसे सीखो

क्या तुम सच्चे सेवक बनना चाहते हो? सच्ची समाज सेवा करने की इच्छा मन में है? तो आओ, आज हम कुछ ऐसे सच्चे सेवकों का परिचय आपसे करायें, जो हमारे लिए मार्ग दर्शक हो सकते है। संध्या समय पश्चिम आकाश में अस्त होने वाले सूर्य को देखो। बारह बारह घंटों तक पृथ्वी को प्रकाश देने के पश्चात् भी वह निश्चित होकर विश्राम लेने जाना नहीं चाहते हैं। मैं चला जाऊँगा फिर सृष्टि को प्रकाश कौन देगा? उसे अन्धकार से कौन उभारेगा? इस चिन्ता में देखो उनका मुख मंडल म्लान हो गया है। सच्चे सेवक की सेवा की भूख कभी शांत नहीं होती।

चन्द्र के पास स्वयं का प्रकाश नहीं है। फिर भी वह दूसरे का तेज उधार लेकर अपने को आलोकित करता है। सच्चे सेवक को साधन का अभाव कभी नहीं खटकता।

हमारी शक्ति बहुत थोड़ी है, इसलिए हमसे क्या सेवा हो सकेगी। क्या तुम ऐसा सोचते हो? नहीं, नहीं, ऐसा कभी मत सोचो। आकाश के तारों की ओर देखो। ब्रह्माण्ड की तुलना में कितने अल्प हैं, फिर भी यथाशक्ति सेवा करने- भूमण्डल को प्रकाशित करने - लाखों की संख्या में प्रकट होते है और अमावस्या की अँधेरी रात में अनेकों का पथ -प्रदर्शन करते हैं।

थक कर, ऊब कर सेवा क्षेत्र का त्याग करने का विचार कर रहे हो? तुम्हारे सामने बहने वाली इस सरिता को देखो। उद्गम से सागर तक संगम होने तक कभी मार्ग में वह रुकती है? ‘सतत कार्यशीलता’ यही उसका मूल मंत्र है। मार्ग में आने वाले विघ्नों से वह डरती नहीं तो तुम क्यों साधारण संकटों एवं अवरोधों से घबराते हो? वह नदी कभी ऊँच-नीच का भाव जानती ही नहीं। मनुष्य मात्र ही नहीं, पशु-पक्षी या वनस्पति सबकी निरपेक्ष सेवा करना ही वह अपना धर्म समझती है। सेवक के लिए कौन ऊँच और कौन नीच?

इन अज्ञानी लोगों की क्या सेवा करें? इनका सुधरना असम्भव है ऐसा मत सोचो। देखो कीचड़ में यह कैसा सुन्दर कमल खिला है? तुम भी अज्ञान के कीचड़ में कमल के समान खिलकर कीचड़ की सुरभि पैदा करो, सच्चे सेवक की यही कसौटी है।

✍🏻 ~स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1969 अप्रैल पृष्ठ 1

✍🏻 ~स्वामी विवेकानन्द
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शनिवार, 18 मार्च 2023

👉 शिष्ट और शालीन बनें

शिक्षित, सम्पन्न और सम्मानित होने के बावजूद भी कई बार व्यक्ति के सम्बन्ध में गलत धारणाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और यह समझा जाने लगता है कि योग्य होते हुए भी अमुक व्यक्ति के व्यक्तित्व में कमियाँ हैं। इसका कारण यह है कि शिक्षित और सम्पन्न होते हुए भी व्यक्ति के आचरण से, उसके व्यवहार से कहीं न कहीं ऐसी फूहड़ता टपकती है जो उसे सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी अशिष्ट कहलवाने लगती है। विश्व स्तर पर एक बड़ी संख्या में लोग सम्पन्न और शिक्षित भले ही हों, किन्तु उनके व्यवहार में यदि शिष्टता और शालीनता नहीं है, तो उनका लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी विभूतियों की चर्चा सुनकर लोग भले ही प्रभावित हो जायें, परन्तु उनके सम्पर्क में आने पर अशिष्ट आचरण की छाप उस प्रभाव को धूमिल कर देती है।
  
इसलिए शिक्षा, सम्पन्नता और प्रतिष्ठा की दृष्टि से कोई व्यक्ति ऊँचा हो और उसे हर्ष के अवसर पर हर्ष, शोक के अवसर पर शोक की बातें करना न आये, तो लोग उसका मुँह देखा सम्मान भले ही करें, परन्तु मन में उसके प्रति कोई अच्छी धारणाएँ नहीं रख सकेंगे। शिष्टाचार और लोक-व्यवहार का यही अर्थ कि हमें समयानुकूल आचरण तथा बड़े छोटों से उचित बर्ताव करना आये। यह गुण किसी विद्यालय में प्रवेश लेकर अर्जित नहीं किया जा सकता। इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए सम्पर्क और पारस्परिक व्यवहार का अध्ययन तथा क्रियात्मक अभ्यास ही किया जाना चाहिए। अधिकांश व्यक्ति यह नहीं जानते कि किस अवसर पर, कैसे व्यक्ति से, कैसा व्यवहार करना चाहिए? कहाँ, किस प्रकार उठना-बैठना चाहिए और किस प्रकार चलना-रुकना चाहिए। यदि खुशी के अवसर पर शोक और शोक के समय हर्ष की बातें की जाएँ, या बच्चों के सामने दर्शन और वैराग्य तथा वृद्धजनों की उपस्थिति में बालोचित या युवजनोचित्त शरारतें, हास्य विनोद भरी बातें की जायें अथवा गर्मी में चुस्त, गर्म, भडक़ीले वस्त्र और शीत ऋतु में हल्के कपड़े पहने जायें, तो देखने सुनने वालों के मन में आदर नहीं, उपेक्षा और तिरस्कार की भावनाएँ ही आयेंगी।
  
कोई भी क्षेत्र क्यों न हों? हम घर में हों या बाहर कार्यालय में। दुकान पर और मित्रों-परिचितों के बीच हों अथवा अजनबियों के बीच।  हर पल व्यवहार करते समय शिष्टाचार ही जीवन का वह दर्पण है जिसमें हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप दिखाई देता है। इसके द्वारा मनुष्य का समाज से प्रथम परिचय होता है। यह न हो तो व्यक्ति समाज में रहते हुए भी समाज से कटा-कटा सा रहेगा और किसी प्रकार आधा-अधुरा जीवन जीने के लिए बाध्य होगा। जीवन साधना के साधक व उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को यह शोभा नहीं देता। उसे जीवन में पूर्णता लानी ही चाहिए। अस्तु, शिष्टाचार को भी जीवन में समुचित स्थान देना ही चाहिए।
 
शिष्टता मनुष्य के मानसिक विकास का भी परिचायक है। कहा जा चुका है कि कोई व्यक्ति कितना ही शिक्षित हो, किन्तु उसे शिष्टï और शालीन व्यवहार न करना आये, तो उसे अप्रतिष्ठा ही मिलेगी, क्योंकि पुस्तकीय ज्ञान अर्जित कर लेने से तो ही बौद्धिक विकास नहीं हो जाता। अलमारी में ढेरों पुस्तकें रखी होती हैं और पुस्तकों में ज्ञान संचित रहती हैं। इससे आलमारी ज्ञानी और विद्वान तो नहीं कही जाती। वह पुस्तकीय ज्ञान केवल मस्तिष्क में आया मस्तिष्क की तुलना आलमारी से ही की जायेगी। उस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से विकसित है। मानसिक विकास अनिवार्य रूप से आचरण में भी प्रतिफलित होता है। व्यवहार की शिष्टïता और आचरण में शालीनता ही मानसिक विकास की परिचायक है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 पाँच अमानतें, जो ईश्वरीय प्रयोजनों में ही लगाई जाएँ

गीता में भगवान ने विभूति योग का वर्णन करते हुए बताया है कि जहाँ कहीं विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं, वहाँ मेरा विशेष अंश देखा, समझा जाना चाहिए। सर्व साधारण को जो विशेषताएँ, विभूतियाँ नहीं मिली हैं और वे यदि कुछ ही लोगों को मिलती हैं, तो यही माना जायेगा कि यह विशुद्ध अमानत है और उन्हें अपने परम प्रिय उद्यान को सुरम्य, सुविकसित बनाने के लिए ही दिया है। यदि विशेष अनुदान को अपने पूर्व कृत पुण्यों के कारण उपलब्ध प्रारब्ध माना जाए, तो भी उसका प्रयोजन यही है कि हर जन्म में उस प्रक्रिया को अधिकाधिक प्रखर किया जाय और अधिक पुण्य करते हुए, अधिक उत्तम प्रतिफल प्राप्त करते हुए उस प्रगति चक्र को तीव्र किया जाय और जीवन लक्ष्य तक जल्दी से जल्दी पहुँचा जाए।

यह सन्देश हर विभूतिवान व्यक्ति तक पहुँचाना युग निर्माण योजना का महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। आग लगने पर फायर ब्रिगेड यूनिटों से अधिकाधिक तत्परता से काम करने की आशा की जाती है। यदि वे उपेक्षा बरतें तो उनकी भर्त्सना भी कठोरतापूर्वक की जाती है। जहाँ विभूतियाँ संग्रहीत हैं, वहाँ युग की पुकार पहुँचाई जा रही है कि उन विभूतियों के अधिकाधिक मात्रा में लोक-मंगल के लिए समर्पित करने का ठीक यही समय है। कहना न होगा कि भावनात्मक नवनिर्माण से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ सत्प्रयोजन हो नहीं सकता।

ईश्वर प्रदत्त यह पाँच विभूतियाँ हैं। भावना, विद्या, प्रतिभा, सम्पत्ति और कला। यह जहाँ भी हैं, जिनके पास भी हैं, उसे अनुभव करना चाहिए कि भगवान की कुछ अतिरिक्त कलाएँ, अतिरिक्त अनुकम्पाएँ उसे उपलब्ध हैं। इसमें उसे अपना सौभाग्य और भगवान का विशेष अनुग्रह मानना चाहिए कि जो सर्वसाधारण को नहीं मिला वह उन्हें विशेष अमानत और विशेष अनुग्रह के रूप में मिला है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.30

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शुक्रवार, 17 मार्च 2023

👉 चरित्रवान चाहिये।

थियोडर पारकर कहा करते थे कि सुकरात की कीमत दक्षिण कोरोलिना की रियासतों से बहुत अधिक है। यदि तुम सोच सकते हो तो बिना मूसा के मिश्र की, बिना डेनियल के बेबोलीन की और डेमास्थनीज, फीडीयस, सुकरात या प्लेटो रहित ऐथेन्स की कल्पना करो वे वीरान दिखाई पड़ेंगे। ईसा के दो सौ वर्ष पूर्व कारथेज क्या था? बिना सीजर, सिसरो और मारकस आरेलियर के रोम क्या था? नेपोलियन, ह्यूगो, और हाईसिन्थ बिना पैरिस क्या है? वर्क, ग्लैडस्टन, पिट मिल्टन और सेक्सपियर बिना इंग्लैंड क्या है? बिना राम, बुद्ध दयानन्द और गाँधी के भारत में क्या बचता है?

हावेज कहता है- ‘चरित्रबल एक शक्ति है एक प्रतिभा है। वह मित्र और सहायक उत्पन्न कर सकती है और सुख सम्पत्ति का सच्चा मार्ग खोल सकती है’। संसार को ऐसे व्यक्तियों की बड़ी आवश्यकता है जिनमें ईमानदारी कूट-कूट कर भरी हो, जो पैसे के लिये अपनी बुद्धि न बेचे, जो सत्य के लिए स्वर्ग के सुख को ठोकर मार दें और जो धर्म के लिये मृत्यु के मुख में अपनी गरदन डाल दें। वालटेयर कहता है- पैसे से कोई बड़ा नहीं बनता, महापुरुष वह है जिसका आचरण श्रेष्ठ है। एक नीतिकार का मत है- मनुष्य का महत्व उसकी विद्या, बुद्धि ताकत या सम्पत्ति में नहीं है, उसका बड़प्पन ईमानदारी और परोपकार में है। एक तत्वज्ञ का कथन है- जिसने अपने मस्तक पर कलंक का टीका नहीं लगाया और जिसकी गरदन किसी के सामने शर्म से नहीं झुकती वही सच्चा बहादुर है।’

चौदहवें लुई ने अपने मंत्री कालवर्ट से पूछा हमारा देश इतना बड़ा है और धन जन की हमारे पास कमी नहीं है फिर भी एक छोटे से देश हालेण्ड को हम क्यों नहीं जीत सके? मंत्री ने उत्तर दिया- श्रीमान, किसी देश की महानता उसकी लम्बाई, चौड़ाई पर नहीं, वरन वहाँ के निवासियों के चरित्र पर निर्भर है।

जब टर्की ने कोसूथ को इस शर्त पर अपने यहाँ आश्रय देना स्वीकार किया कि वह इस्लाम धर्म स्वीकार कर ले। तो उस बहादुर ने कहा- “मृत्यु और शर्म का जीवन इन दोनों में से मैं पहली को पसंद करूंगा। ईश्वर की इच्छा पूरी होने दो। मैं मरने को तैयार हूँ। मेरे यह हाथ खाली हैं परन्तु इन पर कलंक की कालिमा नहीं पुती है।” चाहे मनुष्य अशिक्षित हो, अयोग्य हो, गरीब हो या हीन कुल का हो फिर भी यदि उसमें सचाई और ईमानदारी है तो वह अपने लिये उच्च स्थान प्राप्त करेगा।

इमरसन कहते हैं- ‘चोरी करने से किसी के महल खड़े नहीं होते, दान करने से कोई दरिद्री नहीं होता। इसी प्रकार सत्य बोलने वाला न तो दुःखी रहता है और न ईमानदार भूखों मर जाता है।’ महान पुरुषों के चरित्र में यह एक विशेषता होती है कि वे चारों ओर से तूफान उठने और आघात पड़ने पर जरा भी विचलित नहीं होते वरन् ब्रज के समान सुदृढ़ बने रहते हैं। लिंकन वकील था। गरीबी से गुजर करता था। पर उसने कभी झूठे मुकदमे की पैरवी नहीं की।

मिश्र का प्राचीन कालीन एक राजा लिखता है- ‘मैंने किसी बालक या स्त्री को कष्ट नहीं दिया। किसी किसान के साथ असदव्यवहार नहीं किया। मेरे राज्य में विधवा को यह मालूम नहीं होता था कि वह अनाथ हो गई है।’ कितने आश्चर्य की बात है कि लोग इस बात को नहीं जानते कि दुनिया को उनकी योग्यता की अपेक्षा चरित्र अधिक पसंद है। उच्च आचरण के कारण ही लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति बना था।

क्या ईसा मर गया? शिव, दधीचि या हरिश्चन्द्र का अस्तित्व मिट गया? क्या वाशिंगटन और अब्राहम लिंकन नहीं रहे? क्या बन्दा बैरागी और वीर हकीकत दुनिया में नहीं हैं? रोज हजारों आदमी मरते हैं उन्हें कोई जानता तक नहीं, किन्तु श्रेष्ठ आचरण मनुष्य का सुनहला स्मारक खड़ा कर देता है जो युगों तक चमकता रहता है। ऐश्वर्य भोगी राजाओं की अपेक्षा, जंगल-जंगल खाक छानते फिरने वाले राणा प्रताप अधिक सुखी हैं। बैरिस्टर गाँधी की अपेक्षा साधु गाँधी का महत्व अधिक है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 13

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गुरुवार, 16 मार्च 2023

👉 पतन नहीं उत्थान का मार्ग अपनायें

पालतू पशुओं के बंधन में बँधकर रहना पड़ता है, पर मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि स्वतन्त्र जीवन जियें और इच्छित परिस्थितियों का वरण करें। उत्थान और पतन के परस्पर विरोधी दो मार्गों में से हम जिसको भी चाहें अपना सकते हैं। पतन के गर्त में गिरने की छूट है। यहाँ तक कि आत्महत्या पर उतारू व्यक्ति को  भी बलपूर्वक बहुत दिन तक रोके नहीं रखा जा सकता।

यही बात उत्थान के सम्बन्ध में भी है। वह जितना चाहे उतना ऊँ चा उठ सकता है। पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करते, लम्बी दूरी पार करते, सृष्टि के सैन्दर्य का दर्शन करते हैं। पतंग भी हवा के सहारे आकाश चूमती है। आँधी के सम्पर्क में धूलिकण और तिनके तक ऊँची उड़ानें भरते हैं। फिर मनुष्य को उत्कर्ष की दिशाधारा अपनाने से कौन रोक सकता है?

आश्चर्य है कि लोग अपनी क्षमता और बुद्धिमत्ता का उपयोग पतन के गर्त में गिरने लिए करते हैं। यह तो अनायास भी हो सकता है। ढेला फेंकने पर नीचे गिरता है और बहाया हुआ पानी नीचे की दिशा में बहाव पकड़ लेता है।

दूरदर्शिता इसमें है कि ऊँचा उठने की बात सोची और वैसी योजना बनाई जाय। जिनके कदम इस दिशा में बढ़ते हैं, वे नर पशु न रहकर महामानव बनते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्मदेव को साधें

परोक्ष देवता अगणित हैं और उनकी साधना उपासना के हमात्म्य तथा विधा भी बहुतेरे; किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही- इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को अघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।

इस बुद्धिवादी युग में देव मान्यता के सम्बन्ध में सन्देह भी प्रकट किया जाता है। यहाँ तक कि अविश्वास एवं उपहास भरी चर्चायें भी होती हैं। ऐसी दशा में हमें सार्वजनीन  ऐसे देवता का आश्रय लेना चाहिए,जो साम्प्रदायिक अन्धविश्वासों से ऊपर उठा एवं सर्वमान्य हो। साथ ही जिसके अनुग्रह और वरदान के सम्बन्ध में भी अँगुली न उठे।

ऐसे देवता एक और हैं और वह हैं- आत्मदेव। अपना सुसंस्कृत आपा एवं परिष्कृत व्यक्तित्व। इसका आश्रय रहने पर कोई न अभावग्रस्त रह सकता है और न निराशतिरस्कृत॥
अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्टसाध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से रहते हूए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्म विकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...