रविवार, 5 मार्च 2023

👉 आत्म-मैत्री की स्थापना

आत्म-मैत्री का भाव स्थापित करने के लिये मनुष्य को पुनः शिक्षा की आवश्यकता होती है। पहले तो अपनी महानता का भाव छोड़ना पड़ता है। समाज में बड़े कहे जाने की इच्छा सरलता से नष्ट नहीं होती। बहुत से व्यक्ति बड़े ही विनीत और नम्र बनते हैं। वे अपने आपको सब की पदधूल कहते हैं। ऐसे व्यक्ति बड़े अभिमानी होते हैं और उनका नम्र बनने का दिखावा ढोंग मात्र होता है। दूसरे को इस प्रकार अपने वश में किया जाता है और उसके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित किया जाता है। सच्चे मन से महत्वाकाँक्षा का त्याग वही करता है जो सब प्रकार की असाधारणता अपने जीवन से निकाल डालता है।

जो व्यक्ति अपने आपको सामान्य व्यक्ति मानने लगता है वह नैतिकता में नीचे दिखाई देने वाले व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता है। वह उनकी भूलों को क्षम्य समझता है। वह जब बाहरी जगत् में प्रकाशित अनेक भावों को क्षम्य मानने लगता है तो वह अपने दलित भावों को भी उदार दृष्टि से देखने लगता है। दूसरों के दोषों से घृणा का भाव हट जाने से अपने दोषों से भी घृणा का भाव हट जाता है। फिर उसके मन के भीतर के दलित भाव चेतना के समक्ष आने लगते हैं, और जैसे-जैसे उसका बाहरी जगत से साम्य स्थापित होता जाता है, उसके आन्तरिक मन से भी साम्य स्थापित हो जाता है। वह अपने भीतरी मन से मित्रता स्थापित करने में समर्थ होता है।

आंतरिक समता अथवा एकत्व और बाह्य समता एक दूसरे के सापेक्ष हैं, मनुष्य अपने आपको सुधार कर अपना समाज से सम्बन्ध सुधार सकता है और समाज से सम्बन्ध सुधारने से अपने आप से सम्बन्ध सुधार सकता है। वास्तव में वाह्य और आन्तरिक जगत एक ही पदार्थ के दो रूप हैं। मन और संसार एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जैसा मनुष्य का मन होता है उसका संसार भी वैसा ही होता है।

हमारी नादानी ही हमें अपना तथा संसार का शत्रु बनाती है और विचार की कुशलता दोनों प्रकार की कहानियों का अन्त कर देती है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 12

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👉 कौन क्या कहता है?

लोग क्या कहते हैं? इसके आधार पर किसी कार्य की भलाई-बुराई का निर्णय नहीं किया जा सकता। क्योंकि कई बार लोग अच्छे कार्यों की बुराई करते हैं और बुरों की भलाई। कारण भले बुरे की वास्तविक पहिचान हर किसी को नहीं होती। हम जो काम करें, उसके लिए यह न देखें कि कौन क्या कहता है? वरन् यह सोचें कि हमारी आत्मा इसके लिये क्या कहती है। यदि आत्मा गवाही दे कि हम जो कार्य कर रहे हैं उत्तम है और हमारी बुद्धि निस्वार्थ है, तो बिना किसी की परवाह किये हुए हमें अपने कार्य में प्रवृत्त रहना चाहिए।

यदि शुभ मार्ग में बाधाएं आती हों और लोग विरोध करते हों तो घबराये मत और न ऐसा सोचिए कि हमारे साथ कोई नहीं, हम अकेले हैं। शुभ कार्य करने वाला कभी अकेला नहीं है। अदृश्य लोक में महान पुरुषों की प्रबल शक्तियाँ विचरण करती रहती हैं, वे हमें उत्तम पथ दिखती हैं, तथा हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ती हैं और इतना साहस भर देती हैं कि एक बड़ी सेना का बल उसके सामने तुच्छ है। चोर घर के लोगों के खाँस देने से ही डर कर भाग जाता है, किन्तु धर्मात्मा मनुष्य मृत्यु के सामने भी छाती खोल कर अड़ा रहता है। सत्यनिष्ठ की पीठ पर परमेश्वर है। धर्मात्मा मनुष्य किसी भी प्रकार न तो अकेला है और न निर्बल। क्योंकि अनन्त शक्ति का भण्डार तो उसके हृदय में भरा पड़ा है।

हम किसी की परवाह क्यों करें? यदि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर आरुढ़ हैं, यदि हमारा आत्मा पवित्र है, तो हमें निर्भयतापूर्वक अपने पथ पर आगे बढ़ते जाना चाहिए और इस बात की ओर कुछ चिन्ता न करनी चाहिए कि कौन क्या कहता है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 23

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शुक्रवार, 3 मार्च 2023

👉 कठिनाइयों का अन्त कैसे हो?

जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असन्तुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है।

महानता के भाव से प्रेरित कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी पर भौतिक विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है और कोई नैतिक। नैतिक विजय में वह अपने शत्रु को मित्र बनाने में भी समर्थ न होता परन्तु संसार में उसको पद पर से गिराने में समर्थ होता है। इस प्रकार जितने लोगों को वह नैतिक दृष्टि से संसार में नीचा सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वे सब उसके शत्रु बन जाते हैं। इन शत्रुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है परन्तु शत्रुओं की संख्या बढ़ती हुई देखकर उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह समझता है कि उसके उच्चादर्श का समाज द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही है।

जब तक इन शत्रुओं से लड़ने को वह अपने आप में सामर्थ्य पाता है, वह कुछ न कुछ रचनात्मक काम में लगा रहता है। इस प्रकार वह संसार का कल्याण करने में समर्थ होता है। पर जब अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की उसकी आशा निराशा में बदल जाती है तो वह विक्षिप्त अथवा निराश पापी मनोवृत्ति का हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

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👉 व्यक्तित्व की स्थापना

महानता का भाव स्वयं एक आत्महीनता की ग्रन्थि का परिणाम है। जब किसी प्रकार के आचरण से मनुष्य को आत्मग्लानि हो जाती है तो वह उस वासना का दमन करता है, जो आत्मग्लानि का कारण बनती है। दमन होने के कारण मनुष्य में दो प्रकार का व्यक्तित्व स्थापित हो जाता है। एक तरफ वह चेतन मन में महान नैतिक व्यक्ति बन जाता है और दूसरी ओर उसके अचेतन मन में अवरोधित भावनाओं की प्रबलता हो जाती है। जितना ही अनैतिक वासना का दमन होता है वह और भी प्रबल होती है और जितना ही वह प्रबल होती है उतनी नैतिक भावना को प्रबल होना पड़ता है। इस तरह नैतिकता की असाधारण प्रबलता व्यक्ति के अचेतन मन में विरुद्ध भावना की प्रबलता दर्शाती है। जो प्राकृतिक वासना सामान्य रहती है और व्यक्ति के जीवन के विकास के लिये शक्ति प्रदान कर सकती है, वह दलित होने पर विशेष रूप से दुष्ट और हानिकारक बन जाता है। इस प्रकार महत्वाकाँक्षा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको ही अपना शत्रु बना लेता है। यदि वह अकेला छूट जाये तो वह अपना समय आत्म-भर्त्सना में ही व्यतीत करेगा। वह किसी न किसी काम के लिये अपने आपको कोसता रहेगा।

पर इस प्रकार की मनोवृत्ति अधिक स्थायी नहीं होती। इसके स्थायी होने से विक्षिप्तता आ जाती है। अतएव वह अपनी आन्तरिक स्थिति को भूला देता है और अपने शत्रुओं को अपने से बाहर खोज निकालता है, अर्थात् उसके आत्म शत्रुता के भाव बाहरी किसी व्यक्ति के ऊपर आरोपित हो जाते हैं और वह अपने शत्रुओं को अपने भीतर न देखकर अपने बाहर देखने लगता है। इस तरह मनुष्य का मन अपने आपको भुलावा देता है।

जो व्यक्ति जितना ही अपने आप से घृणा करता है, वह अपने आपका शत्रु है। वह बाहर भी घृणा करने के लिये उपयुक्त पात्र लेता है और ठीक शत्रु की खोज कर लेता है। वह उन्हीं दोषों को उनमें पाता है जो स्वयं उसके अचेतन मन में वर्तमान हैं और जिनके कारण वह अपने आप से घृणा करता है। बहुत से लोग किसी व्यक्ति से घृणा नहीं करते वरन् उनके कुछ दोषों से घृणा करते हैं। यदि इन दोषों को देखा जाय तो वे वही निकलेंगे जो स्वयं उसके मन में हैं और जिनको नष्ट करने की वह असफल चेष्टा कर चुका है। जो व्यक्ति अपने आपको जीतने में असफल रहता है वह अपने से बाहर किसी व्यक्ति को अथवा उसकी बुराइयों को जीतने का प्रयत्न करता है। उसकी असाधारणता ही उसकी असफलता का प्रमाण है। जब मनुष्य अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है तो उसके जीवन में सहज भाव आ जाता है। वह बाहर से साधारण व्यक्ति हो जाता है।

जब तक मनुष्य अपने आपका शत्रु बना हुआ है, वह चाहे जितना ही सब का मित्र बनने का प्रयत्न क्यों न करे अथवा अपने शत्रुओं को विनाश करने की चेष्टा क्यों न करे, शत्रुओं को पा ही लेगा। उसकी इच्छा के प्रतिकूल संसार में लोग उसके शत्रु बन जायेंगे। उसका सारा जीवन इन्हीं शत्रुओं से लड़ने में व्यतीत होगा। उसे बाहरी चिन्ताऐं सताती रहेंगी। जब मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति में बाहरी शत्रु नहीं भी रहता तो उसे काल्पनिक शत्रु अथवा उसके विचार से ही उसे भय होने लगता है। कोई भी अवाँछनीय विचार मन में घुस जाता है और फिर निकालने से नहीं निकलता। इतना ही नहीं जितना ही उसे निकालने का प्रयत्न किया जाता है वह और भी प्रबल हो जाता है। ये बाहरी शत्रु अथवा बाध्य-विचार आन्तरिक दलित भावनाओं के, जिन्हें व्यक्ति ने अपना शत्रु बना रखा है, प्रतीक मात्र हैं। इस प्रकार की स्थिति का अन्त करने के लिये आत्म मैत्री का भाव स्थापित करना आवश्यक है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 11

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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

👉 मित्रता क्यों की जाती है?

क्या कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य से इस कारण मित्रता करता हैं कि वह पारस्परिक प्रत्युपकारों से वह लाभ प्राप्त करे जो अकेला रह कर नहीं कर सकता? या मित्रता का बन्धन किसी प्राकृतिक ऐसे उदार नियम से संबंधित हैं जिसके द्वारा एक मनुष्य हृदय दूसरे के हृदय के साथ अधिकाँश में उदारता और निस्वार्थता की भावना के साथ जा जुड़ता हैं?

उपरोक्त प्रश्नों की मीमाँसा करते हुए हमें यह जानना चाहिए कि मित्रता के बन्धन का प्रधान और वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक हेतु प्रेम हैं। कभी कभी यह प्रेम वास्तविक न होकर कृत्रिम भी हुआ करता हैं परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि मित्रता का भवन केवल स्वार्थ की ही आधार शिला पर स्थिर हैं।
सच्ची मित्रता में एक प्रकार की ऐसी स्वाभाविक सत्यता हैं जो कृत्रिम और बनावटी स्नेह में कदापि नहीं पाई जा सकती। मेरा तो इसी लिए ऐसा विश्वास हैं कि मित्रता की उत्पत्ति मनुष्य की दरिद्रता पर न होकर किसी हार्दिक और विशेष प्रकार के स्वाभाविक विचार पर निर्भर हैं जिसके द्वारा एक समान मन वाले दो व्यक्ति परस्पर स्वयमेव संबंधित हो जाते हैं।

यह पुनीत आध्यात्मिक स्नेह भावना पशुओं में भी देखी जाती हैं। मातायें क्या अपने बच्चों से किसी प्रकार का बदला चाहने की आशा से प्रेम करती हैं? बेचारे पशु जिनको न तो अपनी दीनता का ज्ञान हैं, न उन्नति की आकाँक्षा हैं और न किसी सुनहरे भविष्य का प्रलोभन हैं भला वे अपने बच्चों से किस प्रत्युपकार की आशा करते होंगे? सच तो यह हैं कि प्रेम करना जीव का एक आत्मिक गुण हैं। यह गुण मनुष्य में अधिक मात्रा में प्रकट होता हैं इसलिए वह मित्रता की ओर आकर्षित होता है।

जिसके आचरण और स्वभाव हमारे समान ही हों अथवा किसी ऐसे मनुष्य को जिसका अन्तःकरण ईमानदारी और नेकी से परिपूर्ण हो, किसी ऐसे मनुष्य को देखते ही हमारा मन उसकी ओर आकर्षित हो जाता हैं। सच तो यह हैं कि मनुष्य के अन्तःकरण पर प्रभाव डालने वाला नेकी के समान और कोई दूसरा पदार्थ नहीं हैं। धर्म का प्रभाव यहाँ तक प्रत्यक्ष हैं कि जिन व्यक्तियों का नाम हमको केवल इतिहासों से ही ज्ञात हैं और उनको गुजरे चिर काल व्यतीत हो गया उनके धार्मिक गुणों से भी हम ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनके सुख में सुखी और दुख में दुखी होने लगते हैं।

मित्रता जैसे उदार बन्धन के लिए ऐसा विचार करना कि उसकी उत्पत्ति केवल दीनता पर ही हैं अर्थात् एक मनुष्य दूसरे से मित्रता केवल इसीलिए करता हैं कि वह उससे कुछ लाभ उठाने और अपनी अपूर्णता को उसकी सहायता से पूर्ण करें, मित्रता को अत्यन्त ही तुच्छ और घृणित समझना हैं। यदि यह बात सत्य होती तो वे ही लोग मित्रता जोड़ने में अग्रसर होते जिनमें अधिक अवगुण और अभाव हों परन्तु ऐसे उदाहरण कहीं दिखाई नहीं पड़ते। इनके विपरीत यह देखा गया हैं कि जो व्यक्ति आत्मनिर्भर हैं, सुयोग्य हैं, गुणवान हैं, वे ही दूसरों के साथ प्रेम व्यवहार करने को अधिक प्रवृत्त होते हैं। वे ही अधिकतर उत्तम मित्र सिद्ध होते हैं।

सच तो यह हैं कि परोपकार अपने उत्तम कार्यों का व्यापार करने से घृणा करता हैं और उदार चरित्र व्यक्ति अपनी स्वाभाविक उदारता का आचरण करने दूसरों को सुख पहुँचाने में आनन्द मानते हैं वे बदला पाने के लिए अच्छा व्यवहार नहीं करते। मेरा निश्चित विश्वास हैं कि सच्ची मित्रता लाभ प्राप्त करने की व्यापार बुद्धि से नहीं जुड़ती, वरन् इसलिए जुड़ती हैं कि मित्रभाव के निस्वार्थ बर्ताव से एक प्रकार का जो आध्यात्मिक सुख मिलता हैं वह प्राप्त हो।

✍🏻 दार्शनिक सिसरो
📖 अखण्ड-ज्योति मई 1944 पृष्ठ 10

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👉 निजी प्रयत्न का फल

आध्यात्मिक शास्त्र का यह एक अटल सिद्धान्त है कि जो अपने को जैसा मानता है, उसका बाह्य आचरण भी वैसा ही बनने लगता है। बीज से पौधा उगता है और विचारों से आचरण का निर्माण होता है। जो अपने को दीन, दास, दुखी, दासता मानता है वह वैसा ही बना रहेगा। हमारे देश में दीनता, दद्रिता, दुख, दरिद्रता के विचार फैले और भारतभूमि ठीक वैसी ही बन गई। अपने निवास लोक को जब हम ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ कहते थे तब यह दैव लोक थी, जब ‘भव सागर’ कहने लगे तो वह बद्ध कारागार के रूप में हमारे मौजूद है।

यदि आप अपने को नीच पतित मानते हैं तो विश्वास रखिये आप वैसे ही बने रहेंगे कोई भी आपको ऊँचा या पवित्र न बना सकेगा, किन्तु जिस दिन आपके अन्दर से आत्मगौरव की आध्यात्मिक महत्ता की हुँकार उठने लगेगी उसी दिन से आपका जीवन दूसरे ही ढांचे में ढलना शुरू हो जायेगा संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उनमें उनके निजी प्रयत्न का ही श्रेय अधिक है। हम मानते कि दूसरों की सहायता से भी उन्नति होती है पर यह सहायता उन्हें ही प्राप्त होती है। जो अपने सहायता खुद करते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/September/v1.9

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सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

👉 सेवाव्रती साधुओं! आओ!!

हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज की सेवा के व्रती लाखों साधु संन्यासी, भारतवर्ष के ग्रामों, कस्बों और नगरों में स्वतन्त्रता से विचरते हैं। हिन्दू जाति के इस घोर संकट के समय उनका क्या कर्तव्य है? इस विषय पर कुछ लिखना अनुचित न होगा। क्योंकि जो प्रभाव हिन्दू जनता पर इन विरक्तों का पड़ता है, वह और किसी का नहीं पड़ सकता। अविद्या अन्धकार में सोई हुई हिन्दू जनता को यह महात्मा लोग बहुत शीघ्र जगा सकते हैं। उनका सिंहनाद हिन्दू सन्तान में नई जान फूँक सकता है। छोटे से छोटे कस्बे में सन्त महात्माओं के मठ बने हुए है, जहाँ से हिन्दू संगठन का काम बड़ी आसानी से हो सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि साधु सन्त हिन्दू संगठन के उद्देश्य को भली प्रकार जाने।

हिन्दू जनता आज कैसी दीनावस्था में है, उस पर विधर्मी गुण्डे कैसा संगठित प्रहार कर रहे हैं, यह सब देखकर कौन ऐसा साधु संन्यासी होगा, जिसका हृदय न फटता हो। हिन्दू गृहस्थ सदा श्रद्धा और प्रेम से साधुओं की सेवा करते है, देवियाँ बड़ी भक्ति भाव से विरक्तों की पूजा करती हैं, आज उन विरक्तों को हिन्दू गृहस्थों के प्रति अपना अपना कर्तव्य पालने का समय आ गया है। प्रत्येक साधु को दण्ड और कमण्डलु उठाकर, हिन्दू संगठन के काम में लग जाना चाहिए। ग्राम ग्राम और कस्बे कस्बे में घूम कर अज्ञानी जनता को चैतन्य करना चाहिए, और उसे स्वार्थी लोगों के हथकंडों से बचाना चाहिए। कोई नगर, कोई कस्बा, हिन्दू संगठन से, संघ से खाली न रहे। बड़ी शान्ति से गृहस्थों को समझा बुझाकर ऐसे विचार फैलावें, कि जिससे हिन्दू फौलादी दीवार की तरह संगठित हो जावें, और कोई उन्हें सता न सके।

जो साधु महात्मा देश जाति और धर्म की सेवा करना चाहते हैं, वे अब कमर कस कर तैयार हो जायं और संगठन के बिगुल को हाथ में लेकर नगर नगर में इसे बजाते हुए घूमें। आज बैठने का समय नहीं, जिससे जो कुछ हो सकता है उसे उतना काम करना ही चाहिए। हिन्दू संगठन की इस जागृति के काल में जो साधु महात्मा इस महाप्रतापी हिन्दू जाति की सेवा करेगा उसका नाम भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जायगा।

यदि हम अपन भगवे कपड़े को सार्थक करना चाहते हैं तो हमें हिन्दू संगठन का कठिन व्रत लेना होगा। स्थान स्थान पर व्यायामशालायें खुलवा कर, हिन्दू बच्चों में क्षात्र धर्म का तेज भरना होगा। उनको उन्नत मार्ग दिखलाना होगा, लाखों साधु आज इस धर्मक्षेत्र में आकर अपने जीवन को पवित्र बना सकते हैं। धर्म की सेना में आज ऐसे लाखों विरक्तों की आवश्यकता है। इसलिए आइए हम साधुओं का जबर्दस्त संगठन कर हिन्दू जाति की सेवा में लग जायें इसी में हमारा कल्याण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-३७-पेज-१२.३७

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रविवार, 26 फ़रवरी 2023

👉 खरे बनिए! चापलूसी से दूर रहिए!

जो बात आपको सच्ची प्रतीत होती है उसे बिना किसी हिचकिचाहट के खुली जबान से कहिए अपने अन्तःकरण को कुचल कर बनावटी बातें करना, किसी के दबाव में आकर निजी विचारों को छिपाते हुए हाँ में हाँ मिलाना आपके गौरव के विपरीत है। इस प्रकार की कमजोरियाँ प्रकट करती हैं कि यह व्यक्ति आत्मिक दृष्टि से बिलकुल ही निर्बल है, डर के मारे स्पष्ट विचार तक प्रकट करने में डरता है। ऐसे कायर व्यक्ति किसी प्रकार अपना स्वार्थ साधन तो कर सकते हैं पर किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमा सकते।

स्मरण रखिए प्रतिष्ठा की वृद्धि सच्चाई और ईमानदारी द्वारा होती है। आप खरे विचार प्रकट करते हैं, जो बात मन में है उसे ही कह देते हैं तो भले ही कुछ देर के लिए कोई नाराज हो जावे पर क्रोध उतरने पर वह इतना तो अवश्य अनुभव करेगा कि यह व्यक्ति खरा है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा है। विरोधी होते हुए भी वह मन ही मन आदर करेगा।

आप किसी भी लोभ-लालच के लिए अपनी आत्म स्वतंत्रता मत बेचीए, किसी भी फायदे के बदले आत्म गौरव का गला मत कटने दीजिए। चापलूसी और कायरता से यदि कुछ लाभ होता हो तो भी उसे त्याग कर कष्ट में रहना स्वीकार कर लीजिए, क्योंकि इससे आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी, आत्म गौरव को प्रोत्साहन मिलेगा। स्मरण रखिए आत्म गौरव के साथ जीने में ही जिन्दगी का सच्चा आनन्द है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1943 पृष्ठ 1

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👉 आत्मसम्मान धन है।

आत्मसम्मान को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने के लिए प्राण प्रण से चेष्टा करते रहिए क्योंकि यह बहुमूल्य सम्पत्ति है। पैसे की तरह यह आँख से दिखाई नहीं पड़ता और पास रखने के लिए तिजोरी की जरूरत नहीं पड़ती तो भी स्पष्टतः यह धन है। हम ऐसे व्यापारियों को जानते हैं जिनके पास अपनी एक पाई न होने पर भी दूसरों से उधार लेकर बड़े-बड़े लम्बे चौड़े व्यापार कर डालते हैं क्योंकि उनका बाजार में सम्मान है, ईमानदारी की प्रतिष्ठा है।

हम ऐसे नौकरों को जानते हैं जिन्हें मालिक अपने सगे बेटे की तरह प्राण से प्यारा रखते हैं और उनके लिए प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से इतना पैसा खर्च कर देते हैं जो उनके निर्धारित वेतन से अनेक गुना होता है कारण यह कि नौकर के सद्गुणों के कारण मालिक के मन में उसका सम्मान घर कर लेता है। गुरुओं के वचन मानकर श्रद्धालु शिष्य अपना सर्वस्व देने के लिए तत्पर हो जाते हैं, अपनी जीवन दिशा बदल देते हैं, प्यारी से प्यारी वस्तु का त्याग कर देते हैं, राजमहल छोड़कर बिखारी बन जाते हैं, ऐसा इसलिए होता है कि शिष्य के मन में गुरु के प्रति अगाध सम्मान होता है, गुरु का आत्म सम्मान शिष्य को अपना वशवर्ती बना लेता है।

अदालत में किसी एक ही गवाह की गवाही विपक्षी सौ गवाहों की बात को रद्द कर देती है कारण यह है कि उस गवाह की प्रतिष्ठा न्यायाधीश को प्रभावित कर देती है। आत्म सम्मान ऊंची कोटि का धन है जिसके द्वारा ऐसे महत्वपूर्ण लाभ हो सकते हैं जो कितना ही पैसा खर्च होने पर नहीं हो सकते थे।


आत्मसम्मान धन है। बाजार में वह पूँजी की तरह निश्चित फल देने वाला है, समाज में पूजा कराने वाला है, आत्मा को पौष्टिक भोजन देने वाला है हम कहते हैं कि- हे आध्यात्मवाद का आश्रय लेने वाले शूरवीर साधकों, आत्मसम्मान सम्पादित करो और प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति सितम्बर 1943 पृष्ठ 6

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शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

👉 छात्र जीवन निर्माण करें

सबसे पहले मानव जीवन प्राप्त करने वाला प्राणी अपने पूर्व जन्म के कर्मानुसार अपनी माँ के गर्भ से संसार में आता है। प्रारम्भ से प्राप्त माँ बाप के सहयोग से बाल्यावस्था का प्रथम चरण व्यतीत करके द्वितीय चरण में शिक्षकों के सहयोग में भेजा जाता है और वहीं से उसका जीवन निर्माण शुरू होता है। शिक्षा के साथ साथ वह वहाँ शासन में रहना तथा शासन करना भी सीखता है और शिक्षकों के अनुकूल आचरणों का समावेश भी उसमें पूर्ण रूप से हो जाता है। यही कारण है कि आज का भारत उत्थान की तरफ न जाकर पतनोन्मुख हो रहा है। क्योंकि प्रायः आज का शिक्षकवर्ग भारतीय संस्कृति के विपरीत है। कुम्भकार अवा में पकाने से पहले घड़े जैसी मीनाकारी करता है वही अन्त तक रहती है। इसी तरह बाल्यावस्था में जैसी शिक्षा दीक्षा में बालक रहता है वैसा ही जीवन का निर्माण होता है।

इसलिये बालकों के अभिभावकों को विशेष तौर से सोचना चाहिये कि आधुनिक शिक्षकों के ऊपर ही सारा भार बालकों को सौंपकर निश्चिन्त न हो जावें—अपितु उनके अलावा रहन सहन सदाचार आदि के विषय में—पूर्ण रूप से सतर्क रहें क्योंकि महापुरुषों की यथार्थ उक्ति है कि जिसका प्रातः नष्ट हो गया, उसका सम्पूर्ण दिन खत्म हो गया और जिसकी बाल्यावस्था बिगड़ गई उसका जीवन समाप्त हो गया। जिसका आचरण चला गया उसका सर्वस्व नष्ट हो गया। यह प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों के पूर्व संस्कार कमजोर हैं, उन्हीं पर सहवास और संगति का प्रबल प्रभाव पड़ता है। हमारे प्रातः स्मरणीय स्वामी विवेकानन्द और स्वामी रामतीर्थ ने पाश्चात्य संस्कृति से संतप्त शिक्षणालयों में शिक्षा प्राप्त करके भी अपने वास्तविक अध्यात्म प्रकाश से सारे जगत को प्रकाशित किया।

इस प्रकार अच्छे अभिभावक तथा शिक्षकों के सहवास में रहकर संसार संग्राम में विजयी होने के अनुकूल गुणों को ग्रहण करके गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने अथवा नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहकर सन्त विनोबा की भाँति लोक सेवा में संलग्न हो जावें। समय की प्रति मिनट को अमूल्य समझकर स्वास्थ्य के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए और ईश्वर की उपासना के बल पर विघ्नों को पराजित कर वर्तमान को सुधारते हुए भूत−भविष्यत् का पूरा ध्यान रखते हुए—सच्ची जनसेवा में जुट जावें, अपने संकट कालीन तथा सफल जनक अनुभव संसार को बताते हुए आगे बढ़ें और शास्त्र की मर्यादानुकूल गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने वाले लोग तो सबसे पहले सात्विक गुरु की खोज करें।

इस समय में वास्तविक सन्तों का अभाव सा है किन्तु सच्ची लगन वालों को अवश्य निधि मिलती है। प्रयत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो सच्छात्रों के वचनानुसार अपने जीवन को बनावें। ब्रह्मचर्य का पालन करता हुआ लोकोपकार के लिये जीवन निर्मित करे। फैशनपरस्ती की मूर्खता से दूर रहकर वास्तविक सौंदर्य की कुञ्जी ब्रह्मचर्य तथा सदाचार का पालन करे। अपने जीवन से लोगों को शिक्षा देता हुआ, समय के सच्चे रहस्य को समझकर चलना शुरू करे। नवयुवक विद्यार्थी अपना निर्माण इस तरह करके लोगों को सत्प्रेरणा देना शुरू करें तो थोड़े ही समय में भारत का भाग्य चमकने लगे।

📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 24


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👉 आप में कितना आत्म विश्वास है?

‘अखंड ज्योति’ के पाठक अच्छी तरह जानते होंगे कि जीवन में सब प्रकार की सफलताएं आत्म विश्वास पर निर्भर हैं। जिसमें आत्म विश्वास जितना कम होगा वह सफलता से उतना ही पिछड़ा होगा। इसलिए अपने आत्म विश्वास के संबंध में जानकारी रखना आवश्यक है।

नीचे एक सरल गणित दिया जाता है जिससे पाठक यह जान सकें कि हम में कितना आत्म विश्वास हैं। जो 20 प्रश्न नीचे दिये गये हैं उनमें से हर एक को क्रमश अपने सामने रखिए हर प्रश्न के संबंध में अपनी स्थिति को अच्छी तरह सोचिये और उसका उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में एक कागज पर लिख लीजिए।

जितने प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ आया हो उनकी संख्या को 5 से गुणा कर दीजिए। यही संख्या आपके आत्म विश्वास के नम्बर हैं। पूरा आत्म विश्वास 100 नंबर का होता है। यदि आपको 50 नंबर भी मिल जायं तो समझिये कि पास हो गये। आप में काम चलाने लायक आत्म विश्वास है।

यदि अधिक नंबर मिले तो उतनी ही अधिक योग्यता समझिये। यदि 50 से भी कम नंबर मिलें तो समझिये कि आपका आत्म विश्वास अभी बहुत कम है। उसे बढ़ाये बिना जीवन संग्राम में विजय प्राप्त नहीं की जा सकती।

🔷 प्रश्न
(1) क्या आप किसी संस्था, दल या जनसमूह के मुखिया या पदाधिकारी रहते हैं?
(2) क्या आपके मालिक, सहयोगी बड़े-बूढ़े आपके काम से संतुष्ट और प्रसन्न रहते हैं।
(3) क्या आपने किन्हीं प्रतियोगिताओं में इनाम पाया है।
(4) क्या आप गलतियों को स्वीकार कर लेते हैं? और उन्हें आइंदा न करने का निश्चय एवं पश्चाताप करते हैं?
(5) जो बात आपको पसंद नहीं उसे निर्भयता पूर्वक लोगों के सामने रख देते हैं?
(6) क्या आप लोगों से अपना अधिक परिचय बढ़ाने का प्रयत्न करते रहते हैं?
(7) आपको शरीर और वस्त्र बिल्कुल स्वच्छ रखने की आदत है?
(8) क्या आप बड़े आदमियों से बिना झिझके मिलते हैं? और उन से आवश्यक विषयों पर बिना संकोच के पूरी बात चीत करते हैं?
(9) दूसरों को गलत मार्ग पर जाते हुए देख कर क्या आप उनको समझाते हैं? और अनुचित कार्यवाही को रोकने का प्रयत्न करते हैं?
(10) सवालों का जवाब देना आपको रुचिकर लगता है?
(11) क्या आपको दूसरों से प्रश्न पूछने में आनंद आता है?
(12) क्या आप अपने स्वभाव और कामों के ऊपर गर्व और आत्म संतोष रखते हैं?
(13) क्या आप सुन्दर भविष्य की कल्पना रखते हुए हैं? और अपने को भाग्यशाली समझते हैं?
(14) आपको किन्हीं विषयों में विशेष रुचि हैं?
(15) पढ़ना और खेलना आपके प्रिय विषय हैं?
(16) क्या शत्रुओं की उपेक्षा आपके मित्र अधिक हैं?
(17) उत्सवों, प्रीतिभोजों, सम्मेलनों में आपको अधिकतर निमंत्रित किया जाता है?
(18) कठिनाई पड़ने पर आप घबरा तो नहीं जाते ? साहसपूर्वक उनका मुकाबला कर लेते हैं न?
(19) विरोधी विचार वालों के साथ शाँतिपूर्वक विवाद करते रहते हैं?
(20) आपने अपने जीवन का कोई लक्ष नियत कर लिया है? और उस पर निश्चित भाव से आगे बढ़ते रहते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 16

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👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (अन्तिम भाग)

🔶 बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा।
संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं।

🔷 मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है। वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

🔶 किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14

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👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (भाग 2)

🔷 हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

🔶 हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

🔷 अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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