मंगलवार, 16 अगस्त 2022

👉 निन्दक का बुरा क्यों मानें?

यदि कोई हमारे दोष बताता है तो उसका यह उत्तर नहीं है कि वह दोष उस बताने वाले में भी हैं या अन्य लोगों में भी है। ऐसा उत्तर देने का अर्थ है उसके दोष बताने का बुरा मानना, उलाहना देना और विरोध करना। यह आत्म शुद्धि का मार्ग नहीं है। बताने वाला यदि सदोषं है या अन्य लोग भी उस दोष में ग्रस्त हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भी उस दोष को अपनाये रहना चाहिए।

दीपक द्वारा फैलाये हुए प्रकाश का क्या इसीलिए बहिष्कार किया जाना उचित है कि वह अपने नीचे अंधकार क्यों छिपाये हुए हैं ? ठीक है, यदि दीपक अपने नीचे का अंधकार भी दूर कर सका होता तो उसे सर्वांगपूर्ण कहा जाता। पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके फैलाये हुए प्रकाश का लाभ उठाने से हम वंचित रहें इसका कोई कारण नहीं है। यह भी कोई कारण नहीं है कि दीपक सब जगह का अँधेरा दूर क्यों नहीं करता। यदि वह सुयोग से हमारे घर में जल रहा है तो इसे सौभाग्य ही मानना चाहिए।

दोष बताने वाला यदि स्वयं निर्दोष रहा होता तो उसकी महानता असाधारण होती, पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके इस उपकार को हमें मानना ही चाहिए कि उसने हमारे दोष बताये और उनकी हानि समझने एवं छोड़ने के लिए हमें उकसाया। ऐसा उपकार यदि कड़ुवे शब्दों में किया गया है तो भी इससे रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। गिलोय कड़वी होती है पर उसके अन्य गुण मूल्यवान होने के कारण उसे त्याज्य नहीं माना जाता। हमारे दोष यदि कड़ुवे शब्दों में-निंदा या आक्षेप के रूप में बताये हैं तो भी उचित यही है कि उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए, और उस निंदा में जितना भी अंश सच हो उस बुराई को छोड़ने का प्रयत्न किया जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961 Page 32

सोमवार, 15 अगस्त 2022

👉 सच्चा परोपकार

परोपकार और पुण्य के नाम पर मनुष्य कुछ धार्मिक कर्मकाण्ड, थोड़ा सा दान या कोई ऐसा काम करते हैं जिसे बहुत से लोग देखें और प्रशंसा करें। कई ऐसे आदमी जिनका नित्य का कार्यक्रम लोगों का गला काटना, झूठ, फरेब, दगाबाजी, बेईमानी से भरा होता है, अनीतिपूर्वक प्रचुर धन कमाते हैं और उसमें से एक छोटा सा हिस्सा दान पुण्य में खर्च करके धर्मात्मा की पदवी भी हथिया लेते हैं।

तात्विक दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि ऐसा धर्म संचय वास्तविक धर्म संचय नहीं है। यह तो प्रतिष्ठा बढ़ाने और वाहवाही लूटने का एक सस्ता सा नुस्खा है। वास्तविक धर्म का अस्तित्व अन्तरात्मा की पवित्रता से संबंधित है। जिसके मन में सच्चे धर्म का एक अंकुर भी जमा है वह सबसे पहला काम ‘अपने आचरण को सुधारने’ का करेगा। अपने कर्त्तव्य और जिम्मेदारी को भली भाँति पहचानेगा और उसे ठीक रीति से निबाहने का प्रयत्न करेगा।

परोपकार करने से पहले हमें अपने मनुष्योचित कर्त्तव्य और उत्तरदायित्त्व को उचित रीति से निबाहने की बात सोचनी चाहिए। भलमनसाहत, का मनुष्यता का, ईमानदारी का, बर्ताव करना और अपने वचन का ठीक तरह से पालन करना एक बहुत ही ऊंचे दर्जे का परोपकार है। एक पैसा या पाई किसी भिखमंगा की झोली में फेंक देने से या किसी को भोजन वस्त्र बाँट देने मात्र से कोई आदमी धर्म की भूमिका में प्रवेश नहीं कर सकता। सच्चा परोपकारी तो वह कहा जायेगा जो स्वयं मानवोचित कर्त्तव्य धर्म का पालन करता है और ऐसा ही करने के लिए दूसरों को भी प्रेरणा देता है।

अखण्ड ज्योति 1945 फरवरी पृष्ठ 13

👉 सबसे बड़ी सेवा

🔵 दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।

🔴 जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।

🔵 अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।

🔴 मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे।

🌹 ~महात्मा बुद्ध
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

रविवार, 14 अगस्त 2022

👉 जीवन की महत्ता समझें और उसका सदुपयोग करें

🔵 मनुष्य-जीवन नगण्य सी- ऐसी तुच्छ वस्तु नहीं है, जिसे हलकी दृष्टि से देखा जाय और हलके कार्यों में खर्च कर दिया जाय। यह निरन्तर प्रगति और निरन्तर तप का परिणाम है। उसके मूल्य और महत्व को समझा जाना चाहिए, यह सोचा जाना चाहिए कि इस सुअवसर का लाभ किस प्रकार उठाया जाय। ऐसे अवसर जो बार-बार हाथ नहीं आते, उपेक्षा और उपहास में गँवाने नहीं चाहिए। वरन् सतर्कतापूर्वक यह चेष्टा करनी चाहिए कि उसका समुचित सदुपयोग हो और परिपूर्ण लाभ मिले।

🔴 मनुष्य-जीवन इसलिए है कि उसे पाकर जीवात्मा अपनी महान् उत्कृष्टता को विकसित करने पर निर्भर अलौकिक शान्ति और सन्तोष का आनन्द लाभ करे। आन्तरिक उत्कृष्टता सत्कार्यों के निरन्तर अभ्यास पर निर्भर है। पढ़ते-सुनते या सोचते-विचारते रहने में आत्म-कल्याण की हलकी जानकारी तो प्राप्त होती है, पर उससे जीवन-क्रम में किसी महानता का अवतरण होने की आशा नहीं की जा सकती।

🔵 श्रेष्ठ कार्यों की श्रृंखला का दिनचर्या में अविच्छिन्न सम्बन्ध होना ही केवल मात्र वह उपाय है, जिससे मनुष्य ऊँचा उठता है और सफल जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ होता है। उचित है कि हम इस दृष्टि बिन्दु को विकसित करें और इस सुअवसर का परिपूर्ण लाभ उठावें जो हमें मनुष्य-जीवन के रूप में आज उपलब्ध है।

🌹 ~सन्त वास्वानी
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

👉 मूल-स्रोत का सम्बल

🔵 एक बीज डाला जाता है, तब वृक्ष खड़ा होता है। बीज सारे वृक्ष का मूल है। मनुष्य-जीवन का भी एक वैसा ही मूल है, चाहे उसे परमात्मा कहें, ब्रह्म या चेतना-शक्ति। जीवन के मूल-स्रोत से बिछुड़ जाने के कारण ही मनुष्य शाँति और जीवन की पवित्रता से अलग पड़ जाता है। मृत्यु के भय और जड़त्व के शून्य में निर्वासित हो जाता है।

🔴 मनुष्य अपने आपको जीवन मूल-स्रोत के साथ संयुक्त कर देता है तो वह विशाल प्रजा के सुख-दुःख के साथ एक तन हो जाता है। समष्टि में डूब कर व्यक्तिगत अहंता, स्वार्थ, संग्रह, हिंसा, छल की क्षुद्रताओं से बच जाता है। स्रोत के साथ एकात्म हो जाने पर मृत्यु, शून्यता और एकाकीपन का भय तिरोहित होता है।

🔵 वृक्ष का गुण है चारों ओर फैलना। हम भी फैलें। घर, परिवार, समाज, देश और विश्व के साथ प्रेम करें, स्नेह करें, आदर और सद्भाव भरें। किसी की छाया की आवश्यकता होती है, उसे छाया दें, सहारे की आवश्यकता होती है, उसे सहारा दें। अपनी व्यष्टि को विश्व-आत्मा के साथ घुलाने के लिये जितना फैल सकते हों, हमें फैलना चाहिये। वह हमारे जीवन का धर्म है। समष्टि में अपने को विसर्जित कर देना ही जीवन की सार्थकता है।

🔴 किन्तु जब हम फैलें तब भी अपने मूल-स्रोत को न भूलें, नहीं तो फिर उसी जड़ता और भय में खो जायेंगे, जिससे निकलने के लिये ही मनुष्य जीवन का आविर्भाव हुआ है।

🌹 ~रोम्यां रोल
🌹 अखण्ड ज्योति 1968 मई पृष्ठ 1

रविवार, 7 अगस्त 2022

👉 आन्तरिक सामर्थ्य ही साथ देगी

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी। भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।

✍🏻 सुभाषचन्द्र बोस
📖 अखण्ड ज्योति 1969 मई पृष्ठ 1

शनिवार, 6 अगस्त 2022

👉 व्यक्तित्व का परिष्कार

मित्रो ! सर्वत्र पात्रता के हिसाब से मिलता है। बर्तन आपके पास है तो उसी बर्तन के हिसाब से आप जो चीज लेना चाहें तो ले भी सकते हैं। खुले में रखें तो पानी उसके भीतर भरा रह सकता है। दूध देने वाले के पास जाएँगे तो जितना बड़ा बर्तन है उतना ही ज्यादा दूध देगा। ज्यादा लेंगे तो वह फैल जाएगा और फिर वह आपके किसी काम नहीं आएगा। इसलिए पात्रता को अध्यात्म में सबसे ज्यादा महत्त्व दिया गया है।

जो आदमी अध्यात्म का प्रयोग करते हैं, वे अपने व्यक्तिगत जीवन में अपनी पात्रता का विकास कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं-यह बात बहुत जरूरी है। आदमी का व्यक्तित्व अगर सही नहीं है तो यह सब बातें गलत हैं। कपड़े को रंगने से पहले धोना होगा। धोएँ नहीं और मैले कपड़े पर रंग लगाना चाहें तो रंग कैसे चढ़ेगा? रंग आएगा ही नहीं, गलत-सलत हो जाएगा।

इसी प्रकार से अगर आप धातुओं को गरम नहीं करेंगे तो उससे जेवर नहीं बना सकते। हार नहीं बना सकते। क्यों? इसलिए कि आपने सोने को गरम नहीं किया है। गरम करने से आप इन्कार करते हैं। फिर बताइए जेवर किस तरीके से बनेगा? इसलिए गरम करना आवश्यक है। जो आदमी साधना के बारे में दिलचस्पी रखते हैं या उससे कुछ लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहला जो कदम उठाना पड़ेगा, वह है अपने व्यक्तित्व का परिष्कार।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गुरुवर की धरोहर-1/57

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

👉 निःस्वार्थ प्रेम

यथार्थ ईश्वर भक्त या भगवत् प्रेमी अकेला ही लाखों योद्धाओं की शक्ति रखता है। वह किसी पार्थिव सहायता का मुखापेक्षी नहीं रहता। वह तो केवल उस सर्व-शक्तिमान विश्व-नियामक परमेश्वर की कृपा का ही भिखारी होता है, उस महाशक्ति के प्रभाव सो ही वह प्रेम एवं विरह रहित होकर अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण करता है। कोई भी दुःख उसे अभिभूत एवं प्रलोभन उसे विपन्न नहीं कर सकता।

उस भगवद्-भक्त का हृदय किसी निष्फल भाव अथवा किसी विपक्ष चेष्टा से कातर नहीं होता है। इसी प्रकार आरम्भ किये हुए किसी कार्य में वह असफल भी नहीं होता। अतः हे हमारे विरही दीन-हृदय जिससे प्रेम किया है, उस प्रेमी का एक बार परिचय तो दो! अपने उस ईश्वर के लिए तुमने कौन सा कर्तव्य पूर्ण किया है, और किस प्रलोभन के संग्राम में विजय प्राप्त की है, सो तो बताओ। एक बार उसकी महिमा की दीप्ति उज्ज्वल बनाने के लिए किस शत्रु को पराजित किया है, एवं कौन सा दुख सहन कर किस रूप में कीर्ति स्थापित की है, उसका भी तो हिसाब दो। अरे, तुम्हारे मुख का प्रेम केवल शब्द मात्र ही है। तभी तो तुम साधारण से दुःख या तुच्छ से द्वन्द्व अथवा स्वल्प मात्र परिश्रम से शान्त जो जाते हो।

तुम आक्षेप करते हो कि तुम्हारी शक्ति किसी प्रतिकूलता के सम्मुख ठहर नहीं सकती। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकती। भला, जो प्रेम जीवन की प्रबल शक्ति नहीं होता, उसे मिथ्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है।

✍🏻 योगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969 पृष्ठ 1

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

👉 महात्मा महान आत्मा वाला पुरुष

प्रेम और समता मनुष्य को ज्ञान देता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर भी है और वह अखिल जगत की आत्मा का ही भाग है। समता की यह अनुभूति मानव की आत्मा में उमड़ कर ही कला, विज्ञान, साहित्य

और श्रेष्ठ रचना द्वारा संसार में सद्गुण, सद्विचार तथा सद्प्रेरणा देने में सहायक होती है। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में सहायक होती हैं। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ त्याग, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में प्यार-प्रेम, परोपकार और सद्व्यवहार का प्रसार करती हैं। महान आत्माओं ने प्रेम के मार्ग में अनेक कष्ट, शारीरिक-यंत्रणाएं सहकर, यही नहीं मृत्यु तक का भी स्वागत कर मनुष्य के सच्चे स्वरूप को समझा और आदर्श जीवन व्यतीत करके मानवता के परम सत्य की पुष्टि की। इसीलिए हम उन्हें महात्मा अर्थात् महान आत्मा वाला महापुरुष कहकर संबोधित करते हैं।

हमारी आत्मा जब संकीर्णता का वरण करती है तो निज की विशेषता खो देती है। इसकी विशेषता, समत्व में ही है। हम विश्व से समभाव होकर ही अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कर सकेंगे और तभी हमें वास्तविक आनन्दानुभूति होगी। हम भययुक्त और संघर्ष की विषम स्थितियों में तभी तक रहते हैं जब तक कि प्रकृति के व्यापक-समत्व के सिद्धाँत को नहीं समझ पाते और तभी तक हमें सारा संसार पराया जान पड़ता है। अपने और पराये तथा अपने अन्तःकरण और विश्व की व्याख्या के बीच जो सहज समता है उसे अनुभव कर इसी एक मंगलमय सूत्र के द्वारा जीवन को धन्य बनाता है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर
अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 1

बुधवार, 3 अगस्त 2022

👉 आत्म विश्वास का शास्त्र

जीवन संग्राम का सबसे बड़ा शस्त्र आत्मविश्वास है। जिसे अपने ऊपर-अपने संकल्प बल और पुरुषार्थ के ऊपर भरोसा है वही सफलता के लिये अन्य साधनों को जुटा सकता है। आत्म संयम भी उसी के लिये सम्भव है जिसे अपने ऊपर भरोसा है। जिसने अपने गौरव को भुला दिया, जिसे अपने में कोई शक्ति दिखाई नहीं पड़ती जिसे अपने में केवल दीनता, अयोग्यता, एवं दुर्बलता ही दिखाई पड़ती है। ह किस बलबूते पर आगे बढ़ सकेगा? और कैसे इस संघर्ष भरी दुनियाँ में अपना अस्तित्व यम रख सकेगा। बहती धार में जिसके पैर उखड़ गया, उसे पानी बहा ले जाता है पर जो अपना हर कदम मजबूती से रखता है वह धीरे-धीरे तेज धार को भी पार कर लेता है।

हमें परमात्मा ने उतनी ही शक्ति दी है जितना कि किसी अन्य मनुष्य को। जिस मंजिल को दूसरे पार कर चुके हैं उसे हम क्यों पार नहीं कर सकते? फौज के प्रत्येक सैनिक को एक सी बन्दूक दी जाती है। निशाना लगाना हर सिपाही की अपनी सूझबूझ और योग्यता का काम है। सभी व्यक्ति अनन्त सामर्थ्य लेकर इस भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं। प्रश्न केवल पहचानने, भरोसा करने और उसके सदुपयोग का है। जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है वे अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सदुपयोग करके कठिन से कठिन मंजिल को पार कर सकते हैं।

दुनियाँ को चलाने और सुधारने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है। पर अपने लिए जो कर्तव्य सामने आते हैं उन्हें पूरा करने में सच्चे मन से लगना और उन्हें बढ़िया ढंग से करके दिखाना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनियाँ के संचालन और सुधार में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण योग दे सकते है। अधूरे और भद्दे काम करना अपने आप को कलंकित करना है। परमात्मा ने हमारी रचना अपूर्ण नहीं सर्वांग और उच्चकोटि की सामग्री से की है। उसने हमें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर हमीं अपने गौरव को मलीन क्यों न होने दें। हमें जैसा अच्छा बनाया गया है उसी के अनुरूप हमारे काम भी गौरवपूर्ण होने चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 मई Page 19

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

👉 उदारता और कठोरता।

दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार केवल वे कर सकते है जो अपने प्रति कठोर होते है। जो अपने साथ रियायत चाहते है उन्हें दूसरों के साथ कठोर बनना पड़ता है। तराजू का एक पलड़ा ही झुक सकता है और वह भी तब, जब दूसरा ऊपर उठता है। यदि मनुष्य अपने लिए अधिक सुविधायें चाहेगा तो स्वभावतः उसे दूसरों की उपेक्षा करनी पड़ेगी दूसरों के प्रति जितनी अधिक ममता और करुणा होगी उतनी ही अपनी जरूरतें घटाकर, अपनी सुविधाएँ हटा कर उन्हें जरूरतमन्दों के लिए लगाने का भाव जागेगा उदार हृदय व्यक्ति अन्ततः बिल्कुल खाली हाथ और निरन्तर सेवा परायण हो जाता है। इसलिए उसकी महानता है।

जब तक आक्रमण की, प्रतिहिंसा की, बदला लेने की या किसी को चोट पहुँचाकर सन्तुष्ट होने की इच्छा जीवित है तब तक हमारे अन्दर असुरता एवं दुष्टता विद्यमान है यह मानना होगा। जब इस दिशा में उत्पन्न होने वाला उत्साह उपेक्षा में बदलने लगे तो समझना चाहिये वह दुष्टता शांत होती जाती है। जब दूसरों की भूलों के प्रति क्षमा का, दूसरों के प्रति करुणा का, और दूसरों के अभावों के प्रति सहानुभूति का भाव उदय होने लगे तो समझना चाहिए कि मानवता विकसित हो रही है। यह विकास इस सीमा तक पहुँच जाय कि हानि पहुँचाने और शत्रुता रखने वालों को भी सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो समझना चाहिए कि साधुता प्रकट होने लगी।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 18

👉 दृष्टिकोण का अन्तर

बाहर की परिस्थितियों में अपने अपने दृष्टिकोण के कारण भिन्न भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती है। एक भिखारी को देखकर किसी के मन में दया उपजती है और उसकी यथाशक्ति सहायता करता है। किन्तु दूसरा उसे निकम्मा और आलसी मानकर घृणा करता है। सहायता करना उसके निकम्मेपन को बढ़ाने वाला मानकर अनुचित समझता है। कोई दूसरा उसे दे रहा हो तो उसे भी रोकता है। यह भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ भिन्न दृष्टिकोणों के कारण ही है। बुद्धि बेचारी तो खरीदे हुए गुलाम की तरह है, उसे भावनाओं की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है। भाग्य के की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है।

 भाग्य के सताये हुए भिक्षुक की सहायता करना सहृदय और मानवता की पुकार है, इस आदर्श के पक्ष में बुद्धि के द्वारा बहुत कुछ कहा जा सकता है। इसी प्रकार निकम्मे लोगों की गति विधियों पर अंकुश लगाने के लिए उन्हें अपनी गतिविधियाँ छोड़ने के लिए बाध्य करने के पक्ष में भी बहुत कुछ मसाला बुद्धि के पास निकल आयेगा। अन्तिम निर्णय कैसे हो, दोनों से कौन सा पक्ष सही है, इसका निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है। वह भिखारी वस्तुतः भीख माँगने के लिए मजबूर था या निकम्मा था? दूसरा निर्णय क्षण भर में उसकी शक्ल देखने मात्र से नहीं हो सकता। इसके लिए उनकी परिस्थितियों को समझने के लिए गहराई तक जाना होगा और बहुत खोज बीन करनी पड़ेगी। इतना अवकाश न होने पर वास्तविकता तक पहुँचना कठिन है।

वास्तविकता के समुचित जानकर न होते हुए भी एक भिखारी के सम्बन्ध में दो मनुष्यों ने दो अलग अलग प्रकार के जो निष्कर्ष निकाले और अलग अलग प्रकार के व्यवहार किये उसमें उनकी मान्यता और भावना ही प्रधान कारण थी। आमतौर से होता यही है कि अपने दृष्टिकोण के अनुसार ही संसार के पदार्थों की, परिस्थितियों की तथा व्यक्तियों की परख की जाती है और उसी के आधार पर उन्हें भला या बुरा माना जाता है। यों हर वस्तु में गुण और अवगुण, भलाई और बुराई, उपयोगिता और अनुपयोगिता को न्यूनाधिक मात्रा मौजूद है और उसका विश्लेषण तार्किक बुद्धि से हो भी सकता है, पर आम तौर से दूसरों के विषय में जो अभिमत प्रकट किए जाते है उनमें अपना दृष्टिकोण ही प्रधान कारण होता है। उसी के आधार पर हम दूसरों को भला या बुरा समझते है और तदनुसार ही घृणा, उपेक्षा, सहानुभूति या प्रेम का व्यवहार करते है।

🌹 अखण्ड ज्योति 1961 मई पृष्ठ 24

बुधवार, 27 जुलाई 2022

👉 धर्म प्रसार का प्रमुख आधार

प्राचीन काल के जिन महापुरुषों की छाप हमारे हृदय पर लगी हुई है, उसका कारण उनकी विद्या, प्रतिभा, वाणी या चातुरी नहीं वरन् उनका आदर्श जीवन निर्मल चरित्र, उज्ज्वल लक्ष्य एवं तप त्याग ही है। चरित्रहीन व्यक्ति प्रचार द्वारा क्षणिक भावावेश तो उत्पन्न कर सकते हैं, पर उसका प्रभाव कभी भी स्थायी नहीं हो सकता।

धर्म प्रचार के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन को आदर्श बना कर दूसरों के सामने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें। काम ही सबसे बड़ा प्रचार है। श्रेष्ठ काम करके ही हम दूसरों को श्रेष्ठ बनने के लिए सच्ची और ठोस शिक्षा दे सकते हैं। उपदेशकों की नहीं अब उन आदर्शवादियों की आवश्यकता है जो धर्म कर्तव्यों को अपने जीवन में ओत-प्रोत करते हुए कुछ जनता का व्यावहारिक मार्ग दर्शन कर सकें।

हम आज जहाँ हैं वहीं से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें। पूर्णता की ओर चलने की यात्रा आरम्भ करें। दोषों को ढूँढ़ें और उन्हें सुधारें। गुणों का महत्व समझें और उन्हें अपनायें। इस प्रकार आन्तरिक पवित्रता में जितनी कुछ अभिवृद्धि हो सकेगी उतने का भी दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। सन्मार्ग की दिशा में चलने के लिए उठाया हुआ प्रत्येक कदम अपने लिए ही नहीं, समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर होता है।

लोकमान्य तिलक
अखण्ड ज्योति मई 1964 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

👉 मनुष्य का व्यक्तित्व

जो व्यक्ति वास्तव में अपने से प्रेम नहीं करते वे ही मन, वचन तथा कर्म से बुरा काम करके अपने लिए पतन का पथ प्रशस्त करते हैं। किन्तु ऐसे व्यक्ति मुँह से यही कहते हैं कि “मैं अपने को प्यार करता हूँ।” इसके विपरीत ऐसा व्यक्ति जो कहता है कि “मैं अपने को प्यार नहीं करता” बुरे कर्मों से बच कर मन, वचन तथा कर्म से शुभ कर्त्तव्यों में संलग्न रहते हैं भोग, विलास, प्रमाद जैसी प्रवृत्तियों से दूर रहते हैं, वे ही वास्तव में अपने आप से प्रेम करने वाले माने जा सकते हैं। इसलिए यह निश्चय रूप से समझ लो कि जो आदमी अपनी आत्मा को प्यार करता है वह सदैव उसे दुराचरण से दूर रखेगा, क्योंकि बुरा काम करने वाला कभी भी आनन्द नहीं पा सकता।

जिस समय मौत आ घेरती है, मनुष्य उसके पंजे में बेबस होकर फँस जाता है तो उस समय वह किस चीज को अपनी कह सकता है? वह कौन सी चीज है जिसे वह अपने साथ ले जा सकता है और जो छाया की तरह कभी उसका साथ नहीं छोड़ती? जो काम वह करता है, चाहे वे भले हों या बुरे, उन्हीं को वह अपने साथ ले जा सकता है, उन्हीं को वह अपना कह सकता है और वे ही छाया की तरह उसके साथ रहते है। इसलिए हर एक मनुष्य को उचित है कि वह अच्छे कार्य करके भविष्य के सुख के लिए एक खजाना इकट्ठा कर ले।

भगवान बुद्ध
अखण्ड ज्योति जुलाई 1963 पृष्ठ 1

सोमवार, 18 जुलाई 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 July 2022

हँसना एक दैवी गुण है। हँसाना एक उत्कृष्ट स्तर का उपकार है। मुस्कराता हुआ चेहरा भले ही काला-कुरूप क्यों न हो, सदा अति सुंदर लगेगा। प्रसन्नता एक आदत है, जो कुछ समय के निरन्तर अभ्यास से अपने अंदर उत्पन्न की जा सकती है। अपनी सुविधाओं को देखें और प्रसन्न रहें। शुभ और प्रिय देखें। उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करें, सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का चिंतन करें । यदि हम हँसता और हँसाता जीवन जी सकें, तो समझना चाहिए कि हमने सच्चे कलाकार  जैसी मंगलमयी सफलता एवं उल्लास भरी उपलब्धि प्राप्त कर ली।

योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है। उसमें संग्रहीत कुसंस्कारों का शमन करना पड़ता है। स्वभाव का अंग बनी हुई दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में जुटना होता है। भौतिक लिप्साओं की ललक शान्त करनी पड़ती है। चिंतन को उत्कृष्टता में रस लेने के लिए सहमत किया जाता है। आत्मा और परमात्मा के बीच की खाई पाटनी होती है। यह सारे कार्य अंतःपरिशोधन और आत्म परिष्कार से संबंधित हैं। इसलिए योग साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है।

बुराई को लेकर सक्रिय रहने वाले व्यक्ति के भी सुधरने की आशा की जा सकती है, किन्तु आदर्शों, सिद्धान्तों को बघारने वाले, उपदेश देने वाले अकर्मण्य-आलसी लोगों के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (अंतिम भाग)

संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं। मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है।

वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

समाप्त
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (भाग 2)

हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।

बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा। 

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14 

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (भाग 1)

हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन को कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिए बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।

जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आपके विष में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिनको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निराकरण का पहला उपाय है।

जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करने लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मानहानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता है वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।

हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 13

👉 मनुष्य तुच्छता को छोड़े और महान बने

भारत माता चाहती हैं कि उसके पुत्रों की नस-नस में एक नवीन शक्ति का विद्युत सञ्चार हो। लोग साहसी बनें। कायरता से घृणा करें। संकीर्णता और स्वार्थपरता कायरता के चिह्न हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए जो कष्ट उठाने पड़ते हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक शिरोधार्य करना ही साहस और वीरता है। कायर घड़ी-घड़ी मरते रहते हैं पर वीर पुरुष केवल एक ही बार मरते हैं और वह भी शानदार परंपरा स्थापित करते हुए।

मनुष्य तभी तक मनुष्य है जब तक वह पशु प्रवृत्ति से ऊपर उठने के लिए संघर्ष करता रहता है। संसार पर विजय प्राप्त करना गौरव-पूर्ण है पर अपनी दुर्बलताओं ही को जीत लेना सब से बड़ी विजय है। साहित्य, विज्ञान और कला-कौशल में निष्णात होना अच्छी बात है पर मनुष्य जीवन की समस्याओं वासनाओं, भावनाओं और आकाँक्षाओं को समझना और उनके नियन्त्रण करने की विधि जानना सब से बड़ी बात है। आज की सब से बड़ी आवश्यकता है कि लोग साहसी बनें। संकीर्णता, स्वार्थपरता और तुच्छता से घृणा करें और महान बनने के लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ाते चलें।

स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति जून 1963 पृष्ठ 1

👉 सच्चा आनन्द प्राप्त करने का मार्ग

कर्म करना—कर्तव्य धर्म का पालन मनुष्य का धर्म है। इसको छोड़ने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। पर काम करते समय आत्म-भाव को न भुलाना चाहिए और इसके लिए प्रतिदिन नियमपूर्वक ध्यान करना भी जरूरी है। इस प्रकार के ध्यान से आत्मिक विचारधारा दूसरे कार्य करते समय भी बहती रहेगी।

इससे दुनिया को मनुष्यों एवं घटनाओं को तुम दूसरी ही दृष्टि से देखने लगोगे। इससे स्वार्थ भी छूट जायगा और दुनिया के बन्धन भी कष्ट नहीं देंगे। सच्चा आनन्द प्राप्त करने का यही मार्ग है। संसार में कोई जाने या अनजाने आनन्द प्राप्त करने की ही चेष्टा कर रहे हैं। कोई शराब पीकर उस आनन्द का भागी बनना चाहता है और कोई उत्तम मार्ग का अवलम्बन करके उसे प्राप्त करता है। आनन्द ही मनुष्यों का सच्चा और सहज स्वभाव है।

सभी लोग ऐसा निर्मल सुख चाहते हैं जिसमें किसी दुःख का पुट न हो। सभी ऐसे ही आनन्द की खोज में हैं। पर यह केवल उन्हीं को मिल सकता है जो कर्म और ज्ञान का—लौकिकता और आध्यात्म का उचित सामञ्जस्य करने में सक्षम होते हैं।

महर्षि रमण
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1963 पृष्ठ 1

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...