गुरुवार, 11 जून 2020

👉 समय की आवश्यकता "संघ शक्ति": -

कई मोर्चे खुले पर सब जगह हार देवताओं की हुई! असुर उनके एक-एक कर सभी दुर्ग जीतते चले गये, देवताओं का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया! पराजित देवता प्रजापति ब्रह्मा के पास पहुँचे! पराजय के कारण और उनसे असुरों पर विजय का उपाय पूछा! पराजय के कारण और विजय की नई योजनाओं पर कुछ देर तक विचार करने के बाद ब्रह्मा जी बोले-

देवताओं! तुम सभी दिव्य गुणों वाले हो, त्यागी और तपस्वी भी कम नहीं हो, शक्ति और साहस का तुम में अभाव भी नहीं है किन्तु एक बहुत बड़ी कमी तुम में भी है संगठन का अभाव! तुम्हारी शक्तियाँ बिखरी होने के कारण अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पातीं जब कि पापी और दुर्गुणी होकर भी केवल संगठित होने के कारण थोड़े से असुरों की शक्ति में वह बल आ जाता है कि वे तुम सब को जब चाहते परास्त करके रख देते हैं!

फिर ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं से शक्ति का थोड़ा अंश लेकर दुर्गा का अवतरण किया।

यह इस रहस्य का उद्घाटन करता है की देवताओं ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश देकर एक संघ शक्ति का निर्माण किया, दुर्गा उस संस्था एवं संगठन  का प्रतीक है जिसमें श्रेष्ठ व्यक्तियों की शक्तियाँ संघ-बद्ध होकर काम करती हैं!

यह संघ शक्ति अवतरित हुई, उसने सिंह को अपना वाहन बनाया! सिंह साहस और स्फूर्ति का प्रतीक है उसका भावार्थ यह होता है कि देवताओं ने अपनी संगठित शक्ति का तेजी से साहसपूर्वक प्रयोग किया, उसका फल यह हुआ कि बड़े-बड़े दुर्दान्त और दिग्गज राक्षस आये पर दुर्गा उन सब को मारती-काटती चली गयी! वह अपने वाहन सहित राक्षसों पर टूट पड़ी, राक्षसों में अब उनका सामना करने की हिम्मत नहीं रही!

पुराणों की दुर्गा-अवतरण की कथा में संघ शक्ति का अलंकारिक चित्रण है, उसका उपयोग प्रकरान्तर से प्रत्येक युग में होता आया है, रावण जैसे शक्तिशाली असुर के सामने रीछ वानरों की कोई औकात नहीं थी पर यह उनकी संगठित शक्ति का परिणाम था कि एक लाख पुत्र, सवा लाख नातियों के कुनवे वाला मायावी रावण भी धराशायी कर दिया गया! इन्द्र के कोप का सामना करना कठिन हो जाता यदि यादवों ने कृष्ण के इशारे पर संगठित होकर गोवर्धन को नहीं उठा लिया होता! भगवान् बुद्ध को तो "बुद्धं शरणं गच्छामि" के साथ "संघं शरण गच्छामि" का भी नारा लगाना पड़ा था! तब कहीं उस युग में व्याप्त धर्म के नाम पर आडम्बर, अज्ञान, अनाचार और मत-मतान्तरों का अँधड़ रोका जा सका था!

अभी कुछ दिन पुर्व ही यही प्रयोग स्वतंत्रता सेनानियों ने किया! देशभक्तों के रूप में दुर्गा शक्ति ने अवतार लिया था तभी अंग्रेजी हुकूमत जैसी शक्तिशाली सत्ता पर भारतियों को विजय मिल सकी थी!

आज समाज में अच्छे लोगों का अभाव नहीं! लोग आस्तिक हैं, पूजा उपासना करते हैं, दान पुण्य करते हैं, उनमें नेक आदमियों के सब लक्षण है तो भी असुरता चाहे वह मनुष्यों के रूप में हो या दुष्प्रवृत्तियों के रूप में जीतती चली जाती है, अच्छे लोग आये दिन संकट में पड़ते, कष्ट भोगते रहते हैं यह सब उनमें संगठन शक्ति के आभाव के कारण है!

यदि आज भी लोग संगठित हो जायें तो इस युग की असुरता, पाप और अत्याचार को उसी प्रकार भगाया जा सकता है जिस प्रकार दुर्गा को जन्म देकर देवताओं ने असुरों को मार भगाया!!

👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ५)

स्पष्ट है कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण जनुपात अंशदान के रूप सृजन कृत्यों के लिए नियोजित करने की आवश्यकता पड़ेगी। इतना ही नहीं श्रम, समय भी इसके साथ ही देना पड़ेगा। अस्तु न केवल आजीविका का एक अंश वरन समय का श्रमदान भी इस निमित्त नियमित रूप से नियोजित करते रहने की आवश्यकता पड़ेगी। आरम्भ में महीने में एक दिन की आजीविका और हर दिन दो घण्टे का श्रम इस हेतु उन सभी को लगाना होगा जो प्रस्तुत विश्व संकट से उबरने की बात सोचते और इस निमित्त कुछ करने का साहस करते हैं।

योजनाएँ कैसी भी क्यों न हों बुद्धिबल, श्रम तथा धन की माँग करती है। युग परिवर्तन अभियान भी इसका अपवाद नहीं है। जो कहे सो पानी को जाय वाली उक्ति के अनुसार प्रतिपादन कर्त्ताओं को कथनी को करनी में प्रयुक्त करके दिखाना पड़ता है। विशेषतया आदर्शवादी प्रचलनों के सम्बन्ध में तो इसके बिना काम ही नहीं चलता।

तीसरा चरण अवांछनीयता उन्मूलन का है। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्तियाँ सम्पन्न करने के लिए प्रज्ञा अभियान की लाल मशाल इसी निमित्त जलाई गई है। प्रश्न यह है कि दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष का श्रीगणेश कहाँ से किया जाय। गाँधी जी ने सुगम उपाय नमक सत्याग्रह सोचा था और फिर सत्याग्रह आन्दोलन को करो या मरो स्तर तक पहुँचाया था। उसी रणनीति का अनुसरण हमें भी संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध अपनाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Quintessence of Religion

The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others. Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and cooperation should be cultivated and enhanced consistently.

The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 11 June 2020

■ उन्नति की आकाँक्षा करने से पहले मनुष्य को अपने को परखकर देख लेना चाहिए कि ऊँचे चढ़ने के लिए जिस श्रम की आवश्यकता होती है, उसकी जीवन वृत्ति उसमें है भी या नहीं। यदि है तो उसकी आकाँक्षा अवश्य पूर्ण होगी अन्यथा इसी में कल्याण है कि मनुष्य उन्नति की आकाँक्षा का त्याग कर दे, नहीं तो उसकी आकाँक्षा स्वयं उसके लिए एक कंटक बन जायेगी।

□ हममें से अधिकांश लोग किसी कार्य की शुरुआत इसलिए नहीं करते, क्योंकि आने वाले खतरों को उठाने का साहस हममें नहीं होता। हम दूसरों की आलोचना, विरोध से डरते हैं। असफलता या लोकनिन्दा का भय हमें कार्य की शुरुआत में ही निस्तेज कर देता है, इसी कारणवश हम दीन-हीन जीवन व्यतीत करते हैं। संसार की जो जातियाँ साहस पर ही जीती हैं, वे ही सबकी अगुवा भी बन जाती हैं।

◆ किसी कार्य को केवल विचार पर ही नहीं छोड़ देना चाहिए। कार्य रूप में परिणत हुए बिना योजनाएँ चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हों, लाभ नहीं दे सकतीं।  विचार की आवश्यकता वैसी ही है जैसी रेलगाड़ी को स्टेशन पार करने के लिए सिग्नल की आवश्यकता होती है। सिग्नल का उद्देश्य केवल यह है कि ड्राइवर यह समझले कि रास्ता साफ है अथवा आगे कुछ खतरा है? विचारों द्वारा भी ऐसे ही संकेत मिलते हैं कि वह कार्य उचित और उपयुक्त है या अनुचित और अनुपयुक्त?

◇ मनुष्य के साध्य, सुख और शान्ति का निवास कामनाओं, उपादानों अथवा भोग-विलास में नहीं है। वह कम से कम कामनाओं, अधिक से अधिक त्याग और विषय-वासनाओं के विष से बचने में ही पाया जा सकता है। जो निःस्वार्थी, निष्काम, पुरुषार्थी, परोपकारी, संतोषी तथा परमार्थी हैं, सच्ची सुख-शान्ति के अधिकारी वही हैं। सांसारिक स्वार्थों एवं लिप्साओं के बंदी मनुष्य को सुख-शान्ति की कामना नहीं करनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 10 जून 2020

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ४)

भटकाव से भ्रमित और कुत्साओं से ग्रसित व्यक्ति ऐससी ललक लिप्साओं में संलग्न रहता है जिन्हें दूरदर्शिता की कसौटी पर कसने से व्यर्थ निरर्थक एवं अनर्थ की ही संज्ञा दी जा सकती है। पेट प्रजनन इतना कठिन नहीं है जिनकी उचित आवश्यकताएँ थोड़ा सा समय श्रम लगाकर जुटाकर जुटाई न जा सके। सामथ्यों और साधनों की बर्बादी तो मूर्खता एवं धूर्तता जैसे प्रयोजनों में ही नष्ट भ्रष्ट होती रहती है। इसे जो जितनी बचा सकेगा उसे अपने पास सत्प्रयोजनों में लगा सकने योग्य भण्डार उतनी ही मात्रा में भरा पूरा दृष्टिगोचर होने लगेगा। बर्बादी से बचने और प्रगति पथ पर चढ़ दौड़ने की सुविधा प्राप्त करने का एक ही उपाय है-संयम। सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श अपनाने पर ही व्यक्तित्व के अभ्युदय का शुभारम्भ होता है।

इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम के चतुर्विध आत्मानुशासन को अध्यात्म की भाषा में तप साधना कहा गया है और साधना से सिद्धि का तत्वदर्शन समझाते हुए कहा गया है कि संयमी के पास ही श्रेय खरीदने के लिए पूँजी जुटती है। जिनकी तृष्णाएँ, महत्वाकांक्षाएँ ही आकाश चूमती हैं, जो संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति में ही चित्तवृत्तियों को केन्द्रित किए हुए हैं उन्हें विलास वैभव जुटाने की बात ही सोचते हुए जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। परमार्थ की बात तो वे आत्म प्रवंचना एवं लोक विडम्बना के लिए करते रहते हैं। वस्तुतः उनसे उस सन्दर्भ में कोई कारगर कदम उठाते बन नहीं पड़ता। यही कारण है कि महानता और संयम साधना को पर्यायवाची पूरक माना जाता है। औसत नागरिक का स्तर अपनाना, महत्वाकांक्षाएँ उसी परिधि में सीमित कर लेना ऐसा निर्धारण है जिसे अपनाते ही हर स्तर और हर परिस्थिति का व्यक्ति महान प्रयोजनों के लिए नियोजित कर सकने योग्य शारीरिक, मानसिक ही नहीं आर्थिक अनुदान की भी बचत कर सकता है।

अगले दिनों नव सृजन के लिए इतने अधिक प्रकार के इतनी अधिक संख्या में कार्यक्रम अपनाने पड़ेंगे जो वर्तमान कुप्रचलनों का स्थान ग्रहण कर सकें। वर्तमान प्रयोजनों में असीम श्रम और धन लगा हुआ है। नशा एवं मांस व्यवसाय, कुत्सित साहित्य कामुकता भड़काने वाले फिल्म, जुआ, लाटरी जैसे कृत्यों में न जाने कितनी बुद्धि, मेहनत और दौलज लगाई गई है। इसे हटाना तभी संभव है जब समानान्तर सत्प्रवृत्तियों में उस उत्साह को नियोजित किया जा सके। इसके लिए पूँजी भी उतनी ही चाहिए और श्रम भी उतना ही। यह कहाँ से जुटे? स्पष्ट है कि इसकी पूँजी जागृत आत्माओं द्वारा की गई बचत कटौती से ही बन पड़ेगी। शिक्षा, साहित्य, कला, स्वास्थ्य, कुटीर उद्योग, बाल विकाश जैसे कार्यों को इतने विशाल परिमाण में खड़ा करना होगा कि ५०० करोड़ मनुष्यों की इस दुनिया को पुराना छोड़ने के साथ ही नया अपनाने के लिए ढाँचा खड़ा और सरंजाम जुटा दीखे। स्पष्ट है कि इसके लिए समय, श्रम और धन की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ेगी। उसे असमंजस की बेला में सर्व साधारण से उपलब्ध न किया जा सकेगा। उसकी आरम्भिक पूर्ति युग चेतना के अग्रदूतों को ही करनी होगी, अनुकरण का प्रचलन तो बाद में बनेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ऐसी हो गुरु में निष्ठा:-

प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।

वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहाः "हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो?" शिष्य पहले तो कहा करते थेः ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाय मेरे प्रभु!ʹअब सब चुप हो गये।

उनमें संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु सेवापरायण, गुरुभक्त था। उसने कहाः "गुरुदेव! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।" गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।" संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।"

वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ।

वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ, करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता। गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते किंतु संदीपक की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।

काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपक के समक्ष प्रकट हो गये और बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है।

बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोलाः."शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।" गुरु ने डाँटाः "वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे! अरे मूर्ख! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।" संदीपक ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया।.शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है!

शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने प्रकटे। संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ नहीं  चाहिए। "भगवान ने आग्रह किया तो बोलाः "आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे।

गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे,.गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे। "भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया। संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन!

शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा ! पुत्र ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।" गुरु के संतोष से संदीपक गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।

अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो,उऩ महापुरुषों का नाम सदगुरु है।

सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाये।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।

👉 The Only Source of Inner Joy

God has set a marvelous interdependence within and between the conscious and the inanimate components of Nature in order to maintain the eternal beauty and harmonious functioning of His grand creation. The uncountable numbers of stars and planets revolving in the limitless Universe are mutually connected by natural forces of attraction. Any break in this connectivity would disturb the maintained equilibrium and stability and result in gigantic collision and devastation of the universal system. The same is true of the mutual affinity of the living beings. Just imagine! If a mother does not have a feeling of love or affection for her child, or there is no binding of love between husband and wife, brother and brother, and other family members, then what will be the state of family institution? Lack of the feelings of affectionate caring, amity, cooperation, etc would ruin the entire social system as the letter is founded on these sentiments and consequent unity of its members. Dry-hearts and cruelty would destroy the sense of beauty from Nature…

A sublime spring of pure love is flowing deep within every heart. If we like to be happy, and prosper in an ambience of peace, we will have to awaken the feeling of love in our heart; this should not be an emotional excitement, rather, a feeling of compassion, generosity, honesty, humility, sensitivity, care and respect for others. Those who adopted this divine attitude on every front of their life are truly religious and followers of God. The world reciprocates to them accordingly.

Every moment, every circumstance is auspicious for them.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1944

👉 विचारक्रान्ति की आवश्यकता एवं उसका स्वरूप

आज की सुविधा, संपन्नता की प्राचीनकाल से तुलना की जाए और मनुष्य के सुख-संतोष को भी दृष्टिगत रखा जाए तो पिछले जमाने की असुविधा भरी परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ॆंगे। इन पंक्तियों में भौतिक प्रगति तथा साधन-सुविधाओं की अभिवृद्धि को व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निन्दा की जा रही है। कहने का आशय इतना भर है कि परिस्थितियाँ कितनी भी अच्छी और अनुकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के आन्तरिक स्तर में कोई भी सुधार नहीं हुआ है तो सुख-शांति किसी भी उपाय से प्राप्त नहीं की जा सकती है।

सर्वतोमुखी पतन और पराभव के इस संकट का निराकरण करने के लिए एक ही उपाय कारगर हो सकता है। वह है – व्यक्ति और समाज का भावनात्मक परिष्कार। भावना स्तर में अवांछनीयताओं के घुस पड़ने से ही तमाम समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, इन समस्याओं का यदि समाधान करना है तो सुधार की प्रक्रिया भी वहीं से प्रारम्भ करनी पड़ेगी, जहाँ से ये विभीषिकाएं उत्पन्न हुई हैं। अमुक-अमुक समाधान-सामयिक उपचार तो हो सकता है, पर चिरस्थाई समाधान के लिए आधार को ही ठीक करना पड़ता है।

अधर्म का आचरण करने वाले असंयमी, पापी, स्वार्थी, कपटी, धूर्त और दुराचारी लोग शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं धन-संपत्ति, यश-वैभव आदि सब कुछ खो बैठते हैं। उन्हें बाह्य जगत में घृणा और तिरस्कार तथा अंतरात्मा में धिक्कार ही उपलब्ध होते हैं। ऐसे लोग भले ही उपभोग के कुछ साधन इकट्ठे कर लें, पर अनीति का मार्ग अपनाने के कारण उनका रोम-रोम अशांत तथा आत्म-प्रताड़ना की आग में झुलसता रहता है। चारों ओर घृणा, तिरस्कार एवं असहयोग ही मिलता है। आतंक के बल पर यदि वे कुछ पा भी लेते हैं तो उपभोग के पश्चात् उनके लिए विषतुल्य-दुखदायक ही सिद्ध होता है। आत्मशान्ति पाने,  सुसंयमित जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य को धर्ममय जीवनक्रम अपनाने के लिए तत्पर होना पड़ता है। नैतिकता, मानवता एवं कर्तव्यपरायणता को ही अपने जीवन में समाविष्ट करना होता है। इस प्रवृत्ति का व्यापक प्रसार करने के लिए किए गए प्रयत्नों को नैतिक क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है। बुद्ध धर्म के प्रथम मंत्र 'धम्मं शरणं गच्छामि' में इसी नैतिक क्रान्ति की चिनगारी निहित है, इस मंत्र को लोकव्यापी बनाने के लिए जो प्रयत्न बौद्ध धर्मावलम्बियों ने किया था, उसे विशुद्ध नैतिक क्रान्ति ही कहा जएगा।

आज की परिस्थितियां लगभग बुद्धकाल जैसी ही हैं। अनीति, अनाचार, अविवेक आदि दुर्गुण व्यापक जन-मानस में जड़ जमाए बैठे हैं। ऐसी ही विषम बेला में महाकाल की प्रेरणा जाग्रत आत्माओं को झकझोरती है, विशिष्ट आत्माएं ऐसी ही विपन्न परिस्थितियों में अवतरित होकर, लोकव्यापी संगठन खड़ा कर समाधान करने में जुट पड़ती देखी जाती हैं। महाकाल की प्रबल प्रेरणा से जागृत आत्माओं को नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति में संलग्न देखा और समझा जा सकता है। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन की गति विधियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं। समझ लेना चाहिए कि नैतिक क्रान्ति का चक्र तेजी से गतिशील हो गया है और युग परिवर्तन सन्निकट ही है। जनमानस में संव्याप्त निकृष्ट चिन्तन एवं भ्रष्ट आचरण का अब अंत ही समझना चाहिए। मानवी पुरुषार्थ जब संतुलन बनाए रहने में असफल होता है तो व्यवस्था को भगवान स्वयं संभालते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 9 जून 2020

👉 शुभ कर्मों से प्रीति

एक गांव था ! वह ऐसी जगह बसा था... जहाँ आने जाने के लिए एक मात्र साधन नाव थी .... क्योंकि बीच में नदी पड़ती थी और कोई रास्ता भी नहीं था।

एक बार उस गाँव  में महामारी फैल गई और बहुत सी मौते हो गयी... लगभग सभी लोग वहाँ से जा चुके थे...

अब कुछ ही गिने चुने लोग बचें थे और वो नाविक गाँव में बोल कर आ गया था कि मैं इसके बाद नहीं आऊँगा जिसको चलना है वो आ जाये.... सबसे पहले एक भिखारी आ गया और बोला मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है.... मुझे अपने साथ ले चलो... ईश्वर आपका भला करेगा! नाविक सज्जन पुरुष था.... उसने कहा कि यही रुको यदि जगह बचेगी तो तुम्हें मैं ले जाऊँगा....

धीरे -धीरे करके पूरी नाव भर गई सिर्फ एक ही जगह बची ! नाविक भिखारी को बोलने ही वाला था कि एक आवाज आयी रुको मैं भी आ रहा हूँ ....
यह आवाज जमीदार की थी.... जिसका धन-दौलत से लोभ और मोह देख कर उसका परिवार भी उसे छोड़कर जा चुका था.... अब सवाल यह था कि किसे लिया जाए.....

जमीदार ने नाविक से कहा - मेरे पास सोना चांदी है .... मैं तुम्हें दे दूँगा और भिखारी ने हाथ जोड़कर कहा कि भगवान के लिए मुझे ले चलो... नाविक समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ तो उसने फैसला नाव में बैठे सभी लोगों पर छोड़ दिया और वो सब आपस में चर्चा करने लगे.... इधर जमीदार सबको अपने धन का प्रलोभन देता रहा और उसने उस भिखारी को बोला ये सबकुछ तू ले ले.... मैं तेरे हाथ पैर जोड़ता हूँ....मुझे जाने दे !  तो भिखारी ने कहा:- मुझे भी अपनी जान बहुत प्यारी है  अगर मेरी जिंदगी ही नहीं रहेगी   तो मैं इस धन दौलत का क्या करूँगा..? जीवन है तो जहान है!

तो सभी ने मिलकर... ये फैसला किया कि ये जमीदार ने आज तक हमसे लुटा ही है ब्याज पर ब्याज लगाकर हमारी जमीन अपने नाम कर ली.....और माना की ये भिखारी हमसे हमेशा माँगता रहा पर उसके बदले में इसने हमें खूब दुआएं दी और इस तरह भिखारी को साथ में ले लिया गया...!
बस यही फैसला है...  ईश्वर भी वही हमारे साथ  न्याय करता है... जब अंत समय आता हैं ... वो सारे कर्मों का लेखा- जोखा हमारे सामने रख देता हैं और फैसले उसी हिसाब से होते हैं ... फिर रोना गिड़गिगिड़ाना काम नहीं आता !  शुभ कर्म ही साथ  होते है...

इसलिए अभी भी वक्त है- हमारे पास सम्भलने का....और शुभ कर्म करने का..... बाद में कुछ नहीं होगा...  शायद इसलिए कहा गया है.. अब पछताय क्या जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत....

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ३)

युग परिवर्तन या व्यक्ति परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत दृष्टिकोण और समाजगत प्रवाह प्रचलन को बदलने की बात कही जाती है। उसे समन्वित रूप से एक शब्द में कहा जाय तो प्रवृत्तियों का परिवर्तन भी कह सकते हैं। लोग आज जिस तरह सोचते, चाहते, मानते और करते है उसके उद्गम केन्द्र में ऐसे हेरफेर की आवश्यकता है जिससे सड़े गले ढर्रें का परित्याग और शालीनता का अवलम्बन संभव हो सके। इसके लिए क्या करना होगा? उसे भी संक्षेप में कहा जा सकता है। इसके लिए तीन सिद्धान्त सूत्रों को समझने अपनाने भर से काम चल जायेगा।

एक यह कि निर्वाह में संयम सादगी का इतना समावेश किया जाय जिसे औसत नागरिक स्तर का और शरीर यात्रा के लिए अनिवार्य कहा जा सके।

दूसरा यह कि सादगी अपनाने के उपरान्त जो क्षमता सम्पदा बचती है उसे सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए, नव निर्माण के लिए समयदान, अंशदान के रूप में अधिकाधिक उदार उत्साह के साथ समर्पित किया जाय।

तीसरा यह कि अन्तरंग और बहिरंग दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ फेंकने के लिए साहसिक शौर्य पराक्रम के साथ संघर्ष  किया जाय।

इन तीनों सत्प्रवृत्तियों को प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों का स्थानापन्न बनाया जा सके तो समझना चाहिए कि निकृष्टता के दलदल से उबरने और उज्ज्वल भविष्य का नव सृजन कर सकने वाला राजमार्ग हस्तगत हो गया। इतने भर हेरफेर से युग परिवर्तन का सुनिश्चित आधार बन सकता है और हम नरक से उबर कर स्वर्ग में अपने ही पुरुषार्थ से प्रवेश करने में सफल हो सकते हैें।

इन दिनों विलास, संग्रह और अहंता की ललक लिप्सा हर किसी पर उन्मादी आवेश की तरह छाई हुई है। वासना, तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ किसी को सूझता नहीं। संकीर्ण स्वार्थ परता और अहमन्यता के लिए कोई कुछ भी करने को तैयार है। लगता है मानों औचित्य और विवेक को तिलाञ्जलि दे दी गई हो। यह ढर्रा जब तक चिन्तन और व्यवहार में इसी प्रकार घुसा रहेगा तब तक सर्वत्र हुई विपन्नता से छुटकारा पाना कठिन है। परिवर्तन अन्तरंग में हो सका तो बहिरंग परिस्थितियों के बदलने में संदेह की गुंजायश ही न रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 You are standing in the Middle

You are standing in the middle of the cosmic layer of God’s creation. At the higher realms are the great saints, Siddhas, angels and incarnations of divine powers. Beneath your level of existence are the animals, birds, insects and lower organisms. Those above are enjoying in the divine paradise and those below are suffering in various forms. You, the human being are the only one allowed to share both the joys and the pains. You are also the only one privileged with the freedom of action to transform your fate accordingly. It’s up to you whether you want to move your life-course downwards or upwards and destine its devolution to the lower, beastly forms or evolution to beatified, illumined states…

If you chose to decline then don’t care for anything. Just eat, rest and live for sensual joys. Earn these joys by whatever means – ethical or unethical. It’s really easy to fall down. You can spend all your stock of good omen for petty pleasures or drain it out by adopting heinous actions. But then there will be nothing but repenting and darkness…

If you want to rise high on the celestial scale of evolution of your life, you will have to distinguish between the right and the wrong, truth and false, fair and unfair, and choose the righteous path of wisdom and ideals. Climbing up on the higher mountains is harder, but then, your endeavors will lead to greater achievements in the end. If you bear hardships for adoption of high ideals, you are indeed elevating your life towards brighter ends.

You are the architect of your future destiny. Life is momentary. So don’t miss any instant of this precious opportunity. You are in the middle. You can see both ways upwards and downwards and select the future course of your life prudently.

📖 Akhand Jyoti, Nov. 1943
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

शनिवार, 6 जून 2020

👉 समर्पण

एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवो में घूम रहा था।

घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया, उसने अपने मंत्री को कहा कि, पता करो की इस गाँव में कौन सा दर्जी हैं,जो मेरे बटन को सिल सके, मंत्री ने पता किया, उस गाँव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपडे सिलने का काम करता था।

उसको राजा के सामने ले जाया गया, राजा ने कहा, क्या तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो, दर्जी ने कहा,यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है, उसने मंत्री से बटन ले लिया, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फोरन सी दिया, क्योंकि बटन भी राजा के पास था, सिर्फ उसको अपना धागे का प्रयोग करना था।

राजा ने दर्जी से पूछा कि, कितने पैसे दू, उसने कहा, महाराज रहने दो, छोटा सा काम था, उसने मन में सोचा कि, बटन भी राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया हैं, राजा ने फिर से दर्जी को कहा, कि, नहीं नहीं बोलो कितनीे माया दू, दर्जी ने सोचा कि, 2 रूपये मांग लेता हूँ, फिर मन में सोचा कि; कहीं राजा यह ने सोचलें,कि, बटन टाँगने के मुझ से 2 रुपये ले रहा हैं, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा, क्योंकि उस जमाने में २ रुपये की कीमत बहुत होती थी।

दर्जी ने राजा से कहा, कि, महाराज जो भी आपको उचित लगे, वह दे दो, अब था तो राजा ही, उसने अपने हिसाब से देना था, कहीं देने में उसकी पोजीशन ख़राब न हो जाये।

उसने अपने मंत्री से कहा कि, इस दर्जी को २ गाँव दे दों, यह हमारा हुकम है।

कहाँ वो दर्जी सिर्फ २ रुपये की मांग कर रहा था, और कहाँ राजा ने उसको २ गाँव दे दिए ,, जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता हैं, सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते है, देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं, इसलिए संत-महात्मा कहते है, प्रभु के चरणों पर अपने आपको -अर्पण कर दों,, फिर देखो उनकी लीला।

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग २)

यदि वर्तमान परिस्थिति अनुपयुक्त लगती हो और उसे सुधारने बदलने का सचमुच ही मन हो तो सड़ी नाली की तली तक साफ करनी चाहिए। सड़ी कीचड़ भरी रहने पर दुर्गन्ध और विषकीटकों से निपटने के छुट पुट उपायों से कोई स्थायी समाधान मिल नही सकेगा। समाजगत विभीषिकाओं और व्यक्तिगत व्यथाओं के नाम रूप कितने ही क्यों न हो सबका आत्यन्तिक समाधान एक ही है कि दृष्टिकोण की दिशाधारा बदली जाय और अभ्यस्त ढर्रे की रीति नीति में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया जाय। उलटे को उलटकर सीधा किया जा सकता है। एक शब्द में इसी को युग क्रान्ति कहा जा सकता है जिसे नियोजित किये बिना और कोई गति नहीं। जहाँ तक उतर चुके उसके उपरान्त अब महा विनाश का, सामूहिक आत्म हत्या का ही अन्तिम पड़ाव है।

मानवी क्षमता इन दिनों अनुपयुक्त को अपनाने बढ़ाने में संलग्न है। हसेना यह चाहिए कि प्रवाह मुड़े और अदूरदर्शिता को निरस्त करके औचित्य को समर्थन मिले। मनुष्य शक्तियों का भण्डार है। दुर्भाग्य एक ही है कि उसे दुष्प्रवृत्तियों में नियोजित करके बर्बादी के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। यह स्थिति उलटी जानी चाहिए। क्षमताओं को अपव्यय से बचाया और सृजन प्रयोजनों में लगाया जाना चाहिए। यहाँ एक आवश्यक और भी है कि जो गन्दगी फैलाई जा चुकी है उसे हटाने के लिए भी तूफानी प्रयत्न किया जाय, अन्यथा मार्ग में बिखरे हुए काँटे प्रगति पथ के अवरोध ही बने रहेंगे।

‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ के उद्घोष में निदान और उपचार के दोनों ही पक्षों का समावेश है। परिस्थितियों को बदलने के लिए मनःस्थिति को, समाज को सुधारने के लिए व्यक्ति परिष्कार को अनिवार्य माना जाना चाहिए। हर व्यक्ति को इस तथ्य से अवगत, सहमत करना चाहिए कि इन दिनों लोक मानस की दिशाधारा में समग्र परिवर्तन की आवश्यकता है। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य की संरचना तो दूर, बढ़ती हुई विपत्तियों के त्रास से भी आत्म रक्षा संभव न हो सकेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Illuminate Every Home

Those desirous of enlightened transformation at personal, familial and social level must read and contemplate upon the Yug Sahitya and follow it in practice.

This literature, written in very lucid and self-explanatory style is focused at resolution of the problems of today and guiding the path to collective enlightenment. Good books, volumes, or words containing the pure knowledge, elevated thoughts and works of saints, sages and altruistic reformers carry the strength of their life-force and thus have the potential to transform ordinary mortal beings into great personalities. It is therefore said the punya (good omen) gained by Swadhyaya (devoted self-study and following) of such a literature is many times more than perhaps what one could get by biggest ever charity like donating the entire globe with all its resources…

If you have faith in me, and the driving optimism and will of ushering into an era of global welfare and peace, then engage your self in the swadhyaya of the YugSahitya and expand it into every house, every family around you.

Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 राष्ट्र की प्रगति का मूल आधार-चरित्रनिष्ठा

मनुष्य की सर्वोपरि सम्पदा उसकी चरित्रनिष्ठा है। यह एक ऐसा शब्द है, जो मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का उद्बोधन करता है। व्यक्तिगत जीवन में कर्त्तव्य परायण, सत्यनिष्ठा, पारिवारिक जीवन में स्नेह-सद्भाव  एवं सामाजिक  जीवन में शिष्टता-शालीनता, नागरिकता आदि आदर्शों के प्रति जिस व्यक्ति में अगाध निष्ठा है और जो प्रतिपल इन आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात् रखता है, उसे चरित्रवान् कहा जा सकता है। किसी राष्ट्र या समाज की उन्नति का आधार वहाँ के भौतिक साधन, खनिज सम्पदा या उर्वर भूमि नहीं होते, वरन् किसी देश का उत्कर्ष उसके चरित्रवान नागरिकों पर निर्भर करता है।
  
चरित्रवान् व्यक्तियों की प्रामाणिकता पर हर कोई विश्वास करता है तथा उन्हें सम्मान देता है। यही नहीं, उनके प्रति श्रद्धा भी लोगों के हृदय में उमड़ती रहती है। यह श्रद्धा ही उनकी मूल्यवान सामाजिक सम्पत्ति होती है। स्वामी विवेकानन्द ने इस संदर्भ में कहा है- ‘संसार का इतिहास उन थोड़े से व्यक्तियों द्वारा बनाया गया है, जिनके पास चरित्रबल का उत्कृष्ट भण्डार था। यों कई योद्धा और विजेता हुए हैं, बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, किन्तु इतिहास ने केवल उन्हीं व्यक्तियों को अपने हृदय में स्थान दिया है, जिनका व्यक्तित्व समाज के लिए, मानव जाति के लिए एक प्रकाश स्तंभ का काम कर सका है।’
  
चरित्रवान व्यक्ति के लिए अपना स्वार्थ नहीं, दूसरों का, समाज का हित मुख्य रहता है। इसी कारण वे सामूहिक हितों या परमार्थ प्रयोजनों के लिए अपने स्वार्थ का ही नहीं, अपने अस्तित्व का भी परित्याग कर देते हैं।
  
आदर्शों के प्रति निष्ठा, सामाजिक हितों के लिए उत्सर्ग का साहस व्यक्तित्व को इतना तेजस्वी बनाता है कि अनायास ही उस व्यक्ति के प्रति लोकश्रद्धा का ऊफान उमड़ने लगता है। जब किसी समाज या राष्ट्र पर संकटों के बादल घिर जाते हैं, तो जनसमुदाय ऐसे चरित्रवान, उत्साही और साहसी व्यक्तियों से ही मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है और उसे अपना नेतृत्व सौंपता है।
  
देशभक्ति या राष्ट्र प्रेम व्यक्ति के चरित्र का एक अनिवार्य अंग है और जिन देशवासियों में अपने राष्ट्र के प्रति जितनी गाढ़ी भक्ति होगी, उसमें सुव्यवस्था, शांति और समुन्नति के आधार उतने ही पुष्ट होते चले जायेंगे। राष्ट्र का अर्थ-अपना समाज, देश परिवार ही तो है। हम सभी उसकी एक-एक इकाई हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि इन दिनों अपने देश-समाज में सर्वत्र स्वार्थपरता, बेईमानी, बदनीयती और भ्रष्टाचार ही संव्याप्त है। चरित्रनिष्ठ आदर्श नेतृत्वों का एक प्रकार से अभाव ही दीखता है। जन सामान्य में भी चारित्रिक मूल्यों के प्रति आस्था कम होती जा रही है और आदर्शों की अवहेलना की जाने लगी है।  यह अवहेलना, उपेक्षा ही व्यक्तिगत प्रगति एवं राष्ट्र की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है।
  
वस्तुतः इतिहास ने उन महापुरुषों का ही गुणगान किया है, जिन्होंने अपने समाज को, राष्ट्र को नये जीवन-मूल्य, चरित्र के नये मापदण्ड दिये और आदर्शों की समयानुकूल परिभाषा अपने व्यक्तित्व तथा कृतित्व के माध्यम से की है। चरित्र-मानवीय सद्गुणों के उस समुच्चय का नाम है, जो व्यक्ति के समग्र जीवन को आच्छादित करते हैं और जीवन तथा व्यवहार के सभी क्षेत्रों में उसे प्रामाणिक सिद्ध करते हैं। चरित्र साधना से व्यक्तिगत जीवन में सरसता तथा सामाजिक जीवन में सुव्यवस्था आती है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय प्रगति की संभावना बढ़ती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 5 जून 2020

👉 Sabse Badi Seva सबसे बड़ी सेवा

दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।

जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।

अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।

मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे।

महात्मा बुद्ध

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग १)

आदत पड़ जाने पर तो अप्रिय और अवांछनीय स्थिति भी सहज और सरल ही प्रतीत नहीं होती, प्रिय भी लगने लगती है। बलिष्ठ और बीमार का मध्यवर्ती अन्तर देखने पर यह प्रतीत होते देर नहीं लगती कि उपयुक्त एवं अनुपयुक्त के बीच कितना बड़ा फर्क होता है। अतीत के देव मानवों के स्तर और सतयुगी स्वर्गोपम वातावरण से आज के व्यक्ति और समाज की तुलना करने पर यह समझते देर नहीं लगती कि उत्थान के शिखर पर रहने वाले इस धरती के सिरमौर पतन के कितने गहरे गर्त में क्यों व कैसे आ गिरे।

आज शारीरिक रुग्णता, मानसिक उद्विग्नता, आर्थिक तंगी, पारिवारिक विपन्नता, सामाजिक अवांछनीयता क्रमशः बढ़ती ही चली जा रही है, अभ्यस्तों को तो नशेगाजी की लानत और उठाईगीरी भी स्वाभाविक लगती है, कोढ़ी भी आने समुदाय में दिन गुजारते रहते है पर सही और गलत का विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि हम सब ऐसी स्थिति में रह रहे है जिसे मानवी गरिमा से गई गुजरी, सड़ी ही कहा जा सकता है।

उत्थान पतन के विवेचन कर्ता बताते रहे है कि परिस्थिति और कुछ नहीं मनःस्थिति की परिणति मात्र है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के समन्वय से व्यक्तित्व बनता है। यही है जो शक्तिशाली चुम्बक की तरह अपनी सजातीय परिस्थितियों को खींचता, घसीटता और इर्द गिर्द जमा करता रहता हैं। जो भीतर से जैसा है वह बाहर से भी उसी स्तर के वातावरण से घिरा रहता है। बीज के अनुरूप ही पेड़ का स्वरुप और फलों का स्वाद आकार होता है। व्यक्तित्व को बीज और परिस्थितियों को उसकी परिणति कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

समाज व्यक्तियों का समूह मात्र है। लोगों का स्तर जैसा भी भला बुरा होता है समाज का प्रचलन, स्वरूप एवं माहौल वैसा ही बनकर रहता है। व्यक्ति को महत्ता देनी हो तो उसकी मनःस्थिति को ही श्रेय या दोष देना चाहिए। गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर ही मनुष्य का वास्तविक वैभव है। उसी के अनुरूप मनुष्य उठते गिरते और सुख दुख पाते रहते हैं। बहुमत जैसा होता है समाज का स्वरूप एवं ढाँचा भी तदनुरूप बनकर खड़ा हो जाता है। मानवी उत्थान पतन के इस तत्व दर्शन को समझने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि परिस्थितियों में सुधार परिवर्तन करना हो तो व्यक्ति के अन्तराल को कुरेदना चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण, स्वभाव एवं चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश हो सके तो ही सयह सम्भव है कि शान्ति, प्रगति और प्रसन्नता का आनन्द लेते हुए हँसती हँसाती, खिलती खिलाती जिन्दगी जियी जा सके। सभ्य सज्जनों का समुदाय ही समुन्नत समाज कहा और स्वर्ग सतयुग कहकर सराहा जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 2 जून 2020

👉 Parmatma Ka Karya परमात्मा का कार्य

एक औरत रोटी बनाते बनाते मंत्र जाप कर रही थी, अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही...।

एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख। कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था,  खुन से लथपथ। मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था। दौड़ कर  नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।

अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया। फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी। रास्ते भर भगवान को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे प्रभु क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..।

खैर डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया। चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई।...

रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था। भगवान से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।

उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी, कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..? उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के। आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी? फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।

फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे, उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।

उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।

भगवान कहते हैं, "मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।"

उस औरत ने घर के मंदिर में झांक कर देखा, लगा भगवान मुस्करा रहे थे।

👉 Yug Parivartan Ka Aadhar युग परिवर्तन का आधार भावनात्मक नव निर्माण (अंतिम भाग)

जाति या लिंग के कारण किसी को ऊँचा या किसी को नीचा न ठहरा सकेंगे, छूत- अछूत का प्रश्न न रहेगा। गोरी चमड़ी वाले लोगों से श्रेष्ठ होने का दावा न करेंगे और ब्राह्मण हरिजन से ऊँचा न कहलायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव, सेवा एवं बलिदान ही किसी को सम्मानित होने के आधार बनेंगे, जाति या वंश नहीं। इसी प्रकार नारी से श्रेष्ठ नर है उसे अधिक अधिकार प्राप्त है, ऐसी मान्यता हट जायेगी। दोनों के कर्तव्य और अधिकार एक होंगे। प्रतिबन्ध या मर्यादाएँ दोनों पर समान स्तर की लागू होंगी। प्राकृतिक सम्पदाओं पर सब का अधिकार होगा। पूँजी समाज की होगी। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसमें से प्राप्त करेंगे और सामर्थ्यानुसार काम करेंगे। न कोई धनपति होगा न निर्धन, मृतक उत्तराधिकार में केवल परिवार के असमर्थ सदस्य ही गुजारा प्राप्त कर सकेंगे। हट्टे- कट्टे और कमाऊ बेटे बाप के उपार्जन के दावेदार न बन सकेंगे, वह बचत राष्ट्र की सम्पदा होगी। इस प्रकार धनी और निर्धन के बीच का भेद समाप्त करने वाली समाजवादी व्यवस्था समस्त विश्व में लागू होगी। हराम खोरी करते रहने पर भी गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा किसी को न मिलेगी। व्यापार सहकारी समितियों के हाथ में होगा, ममता केवल कुटुम्ब तक सीमित न रहेगी, वरन् वह मानव मात्र की परिधि लाँघते हुए प्राणिमात्र तक विकसित होगी। अपना और दूसरों का दुःख- सुख एक जैसा अनुभव होगा। तब न तो माँसाहार की छूट रहेगी और न पशु पक्षियों के साथ निर्दयता बरतने की। ममता और आत्मीयता के बन्धनों में बँधे हुए सब लोग एक दूसरे को प्यार और सहयोग प्रदान करेंगे।
    
शरीर, मन, वस्त्र, उपकरण सभी को स्वच्छ रखने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। शुचिता का सर्वांगीण विकास होगा। गंदगी को मानवता का कलंक माना जायेगा। न किसी का शरीर मैला कुचैला रहेगा न वस्त्र। घरों को गंदा गलीज न रहने दिया जायेगा। मनुष्य और पशुओं के मल- मूत्र को पूरी तरह खाद के लिए प्रयुक्त किया जायेगा। वस्तुएँ यथा स्थान, यथा क्रम और स्वच्छ रखने की आदत डाली जायेगी। मन में कोई छल- कपट, द्वेष- दुर्भाव जैसी मलीनता न रहेगी।
    
एकता, समता, ममता और शुचिता इन चार मूलभूत सिद्धान्तों के आधार पर विभिन्न आचार संहिताएँ, रीति- नीति, विधि व्यवस्थाएँ, मर्यादाएँ और परम्पराएँ बनाई जा सकती हैं। भौगोलिक तथा अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उनमें हेर- फेर भी यत्किंचित होते रह सकते हैं। पर आधार उनके यही रहेंगे।
    
यह ध्यान रखने की बात है कि संसार की दो ही प्रमुख शक्तियाँ है- एक राजतन्त्र दूसरी धर्मतन्त्र। राजसत्ता में भौतिक परिस्थितियों को प्रभावित करने की क्षमता है और धर्म सत्ता में अन्तःचेतना को। दोनों को कदम से कदम मिलाकर एक दूसरे की पूरक होकर रहना होगा।
    
नव निर्माण की पृष्ठभूमि धर्म मूलक ज्ञान होगा। इसी के लिए ज्ञानतन्त्र खड़ा किया गया है और ज्ञान यज्ञ का महान अभियान चलाया गया है। स्वल्प साधनों से भी वह जिस द्रुतगति के साथ बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए पूर्व से सूर्योदय होने के और उसका प्रकाश सर्वत्र फैलने की बात पर सहज ही विश्वास किया जा सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...