शनिवार, 18 अप्रैल 2020

👉 आत्म-चिंतन की साधना

रात को सब कार्यों से निवृत होकर जब सोने का समय हो तो सीधे चित्त लेट जाइये। पैर सीधे फैला दीजिए, हाथों को मोड़कर पेट पर रख लीजिए। सिर सीधा रहे। पास में दीपक या लाइट जल ररही हो तो बुझा दीजिए या मंद कर दीजिए। नेत्रों को अधखुला कर रखिए।

अनुभव कीजिए कि आपका आज का एक दिन एक जीवन था। अब जबकि एक दिन समाप्त हो रहा हैं तो एक जीवन की इतिश्री हो रही हैं। निद्रा एक मृत्यु हैं। अब इस घडी में एक दैनिक जीवन को समाप्त करके मृत्यु की गॉद में जा रहा हूँ।

आज के जीवन की आध्यात्मिक द्रष्टि से समलोचना कीजिए। प्रात:काल से लेकर सोते समय तक के कार्यों पर द्रष्टिपात कीजिए। मुझ आत्मा के लिए वह कार्य उचित था या अनुचित? यह उचित था तो उतनी सावधानी एवं शक्ति के साथ उसे करना चाहिए था उसके अनुसार किया या नहीं। बहुमूल्य समय का कितना भाग उचित रीति से व्यतीत क्या? वह दैनिक जीवन सफल रहा या असफल? आत्मिक पूँजी में लाभ हुआ या घाटा? सद्-वृत्तियाँ प्रधान रहीं या असद्-वृत्तियाँ? इस प्रकार के प्रश्नों के साथ दिनभर के कार्यों का भी निरीक्षण कीजिए।

जितना अनुचित हुआ हो उसके लिए आत्म-देव के सम्मुख पश्चाताप हैं। जो उचित हुआ हो उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आगामी जीवन में, उस दिशा में विशेष रूप से अग्रसर करें। इसके पश्चात् शुभ वर्ण आत्म-ज्योति का ध्यान करते हुए निद्रा देवी की गॉद में सुखपूर्वक चले जाइए।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

👉 शरणागति


👉 "आंतरिक सामर्थ्य ही सांथ देगी"

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

"तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी।

भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।"

अखण्ड ज्योति मई, 1969

👉 भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा

इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचण्ड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही बलिष्ठ समझता है। जो जितना सम्पन्न और धूर्त है, वह अपनी शेखी उसी अनुपात से धारता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशों को डराता और फुसलाता भी है। यही क्रम इन दिनों चलता रहा है, किन्तु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा। परिस्थितियां इस प्रकार करवटें लेंगी कि जो पिछले दिनों होता रहा है अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति ही सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैब बल जनसमुदाय को आकर्षित, प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नयी शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। यों प्राचीन काल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।

बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।

समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1987 पृष्ठ 58

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 15 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 15 April 2020


👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 April 2020

अपने माता-पिता गुरुजनों आदि के साथ उन पर एहसान चढ़ाने वाली भाषा न बोलें।

जीवन में अनेक बार व्यक्तियों का आपस में टकराव हो जाता है। माता-पिता के साथ, गुरुजनों के साथ, मित्रों के साथ, पड़ोसियों के साथ, व्यापारियों और ग्राहकों के साथ इत्यादि , अनेक जगह पर टकराव हो जाता है। कभी-कभी यह टकराव, गलतियों के कारण होता है, और कभी-कभी एक दूसरे के व्यवहार को ठीक तरह से न समझने के कारण, भ्रांतियों से भी ऐसा टकराव हो जाता है।

यह टकराव हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, स्वाभाविक है। क्योंकि सभी लोग अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान् हैं। अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान होने के कारण अनेक बार भूल चूक हो जाती है। गलतियां हो जाती हैं। किसी भी व्यक्ति से हो सकती हैं। केवल परमात्मा ही एक ऐसा तत्व है जो कभी गलती नहीं करता. उसे छोड़ कर सभी से कुछ न कुछ छोटी बड़ी गलतियां हो जाती हैं।

जब कभी ऐसी गलतियां हो जाएं, तो आपस में लड़ाई झगड़ा आरोप प्रत्यारोप इत्यादि का व्यवहार नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से अपने माता-पिता और गुरुजनों के साथ तो ऐसा झगड़ा कभी भी नहीं करना चाहिए।

चाहे आप प्रधानमंत्री पद पर भी क्यों न पहुंच जाएं, तब भी आप अपने माता-पिता के सामने तो छोटे ही रहेंगे। क्योंकि आपको उनके ही आशीर्वाद से सेवा से प्रशिक्षण से अनेक प्रकार के सहयोग से ऊंची ऊंची योग्यताएं प्राप्त हुई हैं। इसलिए उनके साथ सदा नम्रता का व्यवहार रखना चाहिए। जैसा कि आजकल हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी अपनी माता जी के चरण स्पर्श करते और उनका आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ रहे हैं। यह बात सबको मालूम है.

जब हम सब अल्पज्ञ हैं, गलतियाँ होनी संभव हैं, तो बड़ी नम्रता से अपनी गलतियाँ स्वीकार कर लेनी चाहिएँ,  और समस्याओं को निपटा देना चाहिए। बड़े बुजुर्गों के साथ असभ्यतापूर्ण या एहसान चढ़ाने वाली भाषा न बोलें, कि मैंने आपके लिए यह काम किया, वह काम किया, और आपने मेरे साथ यह किया, यह ठीक नहीं किया इत्यादि। बड़ों के साथ ऐसा व्यवहार करना असभ्यता है। इस प्रकार की असभ्यता नहीं करनी चाहिए।

इसलिए कभी माता पिता या गुरुजनों के साथ टकराव हो भी जाए, तो उनके उपकारों को याद रखें, और उनके साथ नम्रता पूर्वक ही व्यवहार करें। गलतियाँ हो जाने पर आपस में मिल बैठकर शांति से उन्हें सुलझा लेना चाहिए। यदि आपस में न सुलझे, तो किसी अन्य बुद्धिमान परिवार के अनुभवी बुजुर्ग अथवा किसी विद्वान की सहायता से उस समस्या को सुलझा लेना चाहिए। इससे आपका परिवार संगठित व्यवस्थित सुखी और संपन्न बना रहेगा । अन्यथा आपका परिवार कुछ ही समय में आपसी भ्रांतियों के कारण नष्ट हो जाएगा

👉 पीड़ा और प्रार्थना

पीड़ा और प्रार्थना में गहरा सम्बन्ध है। पीड़ा का अनुभव सकारात्मक हो, दृष्टिकोंण रचनात्मक हो तो पीड़ा स्वतः ही प्रार्थना बन जाती है। ऐसा न हो तो हर पीड़ा- निषेध व नकारात्मक दृष्टिकोंण के जाल में उलझ-फँस कर कभी वैर बनती है तो कभी द्वेष बन जाती है। इतना ही नहीं, ज्यादातर दशाओं में यह वैर-द्वेष के साथ मन को सन्ताप देने वाला विषम-विषाद बन जाती है। जीवन को अवसन्न करने वाला अवसाद बन जाती है।
  
पीड़ा का अनुभव सकारात्मक होने का मतलब है अन्तर्मन में प्रभु प्रेम उपस्थित होना। भगवान् के मंगलमय विधान में गहरी आस्था होना। ऐसा हो तो जीवन की पीड़ाएँ-दर्द का उन्माद जगाने की बजाय प्रार्थना को जन्म देती हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ा जितनी गहरी होती है, प्रार्थना उतनी ही घनीभूत होती जाती है। पीड़ा के क्षणों में मन स्वाभाविक रूप से भगवान् के समीप सरकने लगता है। सच तो यह है कि यदि पीड़ा दर्द है, तो प्रार्थना उसकी दवा है।
  
पीड़ा और प्रार्थना का यही मिलन तप है। तपश्चर्या का अर्थ धूप में खड़ा हो जाना नहीं है, न भूखे रहकर उपवास करना है। तपश्चर्या का सही अर्थ जीवन के पीड़ादायक क्षणों में भगवान् के भाव भरे स्मरण, सर्वस्व समर्पण व उनमें ही लीन होना है। यथार्थ तप है- जीवन के खालीपन की पीड़ा को उसकी समग्रता में अनुभव करना, जीवन की अर्थहीनता को उसकी पूरी त्वरा में अनुभव करना। जीवन की यह बेकार भागदौड़ जिसको अभी बड़ी उपयोगी समझते हैं, यदि अचानक यह निरर्थक लगने लगे तो बड़ी घबराहट होगी। गहरी पीड़ा पनपेगी। इस पीड़ा को झेलने का नाम, इसे भगवान् के प्रेम व स्मरण तथा समर्पण में भीग कर सहने का नाम है तपश्चर्या। पीड़ा व प्रार्थना का अद्भुत मिलन, जिसके भी जीवन में आता है, उसका जीवन स्वाभाविक ही रूपान्तरित हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१५

👉 Darkness to Light

Truth! Truth!! Truth!!! What a force and impact this word carries that even uttering this word seems to sooth the tongue, thought of it itself gives some light to the mind and feeling of it rejuvenates the heart. The transition from falsehood to truth is an ascent from filthy mire to pious skies, a transmutation from beastly instincts, devilish darkness to divine virtues and eternal light.

Truth is absolute, eternal. God is Truth, the Soul is Truth, God’s creation of Nature is Truth; Truth is Omnipresent. It is the ultimate goal of life; truth is the ceaseless perennial quest of the individual self, for which it takes birth, life after life, Age after Age… This life is bestowed upon us as yet another opportunity to realize the ultimate truth and savor the nectar of infinite bliss.

It is pitiable that we remain ignorant of this fact that – what we think of the world around (and die hunting for the mirage of joy in it) is not true; it is nothing but the image of our own perception. Once you understand this fact, you will turn towards truth. You will become a follower of Truth; it will be your ideal; an integral part of your character. “Truth” will then show you the divine radiance of your inner self.

If every word, every deed of yours is truthful, the world will truthfully honor you and you will inspire many others towards its noble path. The Vedic teaching reminds all of us to follows the path of truth – “Asato Ma Sadgamaya”, as this is the only source of auspicious welfare of all…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

👉 मांस का मूल्य

मगध सम्राट् बिंन्दुसार ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा :- देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है...? मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आद तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता.. शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है.....उसने मुस्कुराते हुऐ कहा :- राजन्... सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।

सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री आचार्य चाणक्य चुप रहे। सम्राट ने उससे पुछा : आप चुप क्यों हो? आपका इस बारे में क्या मत है? चाणक्य ने कहा : यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है...., एकदम गलत है, मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूँगा....रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।

चाणक्य ने द्वार खटखटाया....सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा? प्रधानमंत्री ने कहा :-संध्या को महाराज एकाएक बीमार हो गए है उनकी हालत नाजूक है राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते है....आप महाराज के विश्वास पात्र सामन्त है। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहे, ले सकते है। कहे तो लाख स्वर्ण मुद्राऐं दे सकता हूँ.....। यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फिका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राऐं किस काम की?

उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजोरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राऐं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राऐं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामन्तों, सेनाधिकारीयों के द्वार पर पहुँचे और सभी से राजा के लिऐ हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ....सभी ने अपने बचाव के लिऐ प्रधानमंत्री को दस हजार, एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख तक स्वर्ण मुद्राऐं दे दी। इस प्रकार करोडो स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुँच गऐ और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं रख दी....!

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है....? यह मुद्राऐं किसलिऐ है? प्रधानमंत्री चाणक्य ने सारा हाल सुनाया और बोले: दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। अपनी जान बचाने के लिऐ सामन्तों ने ये मुद्राऐं दी है। राजन अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है....??

जीवन अमूल्य है।
हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को प्यारी होती है..! इस धरती पर हर किसी को स्वेछा से जीने का अधिकार है... 🦆 🦐

👉 संयुक्त रहने का लाभ


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 14 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 14 April 2020


👉 विनाश नहीं सृजन होने जा रहा है

वैज्ञानिक, राजनेता, भविष्यवक्ता, अन्वेषक अपने-अपने तर्क और तथ्य आगे रखकर यह प्रमाणित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि महाविनाश में अब उँगलियों पर गिनने जितने समय को देर है किसी सीमा तक उठे हुए कदम अब वापस नहीं लौटेंगे। इन प्रवक्ताओं के कथन अनुमान, विश्लेषण पर कोई आक्षेप न करते हुए हमें यह पूरी हिम्मत के साथ कहने ही छूट मिली है कि आतंक के समय रहते शान्त होने की भविष्यवाणी करें और जन साधारण से कहें कि विकसित होने की अपेक्षा सृजन की बात सोचें। दुनिया यह नहीं रहेगी जो आज है। उसकी मान्यताएं, भावनाएं, विचारणाएं। आकांक्षाएं ही नहीं, गतिविधियाँ भी इस तरह बदलेंगी कि सब कुछ नया-नया प्रतीत होने लगे।

आज से पाँच सौ वर्ष पुराना कोई मनुष्य कहीं जीवित हो और आकर अबकी भौतिक प्रगति के दृश्य देखे तो उसे आश्चर्यचकित होकर रह जाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि यह उसके जानने वाली दुनिया नहीं रही। यह तो भूतो की बस्ती जैसी बन गई है। सचमुच पिछले दिनों बुद्धिवाद और भौतिकवाद की सम्मिलित संरचना हुई भी ऐसी ही है जिसे असाधारण अद्भुत, अनुपम और आश्चर्यजनक परिवर्तन कहा जा सके।

ठीक इसी के समतुल्य दूसरा परिवर्तन होने जा रहा है। उसके लिए पाँच सौ वर्ष प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इस नये परिवर्तन के लिए एक शताब्दी पर्याप्त है। आज की चकाचौंध जैसी परिस्थितियाँ और आसुरी मायाचार जैसी समस्याएँ अब इन दिनों भयावह लगती है और उनके चलते प्रवाह को देखकर लगता है कि सूर्य अस्त हो चला और निविड़ निशा से भरा अंधकार अति समीप आ पहुँचा पर ऐसा होगा नहीं। यह ग्रहण की युति है। बदली की छाया है, जिसे हटा देने वाले प्रचंड आधार विद्यमान भी हैं और गतिशील भी। लंका काण्ड की नृशंसता के उपरान्त रामराज्य का सतयुग वापस आया था। वैसी ही पुनरावृत्ति की हम अपेक्षा कर सकते हैं।

विनाश की सोचते और चेष्टा करते हुए मनुष्य का बुद्धि संसार थक जायेगा और वैभव के साधन स्रोत सूख जायेंगे। उन्हें नये सिरे से नई बातें सोचनी पड़ेगी कि प्रवाह की इस दिशा को उलट दिया जाय और उपलब्ध साधनों को सृजन के लिए लगाया जाय। ऊपर से पड़ने वाले दबाव ऐसी ही उलट फेर संभव करेंगे। उनने उलटे को उलट कर सीधा करने का निश्चय कर लिया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986 पृष्ठ 19-20

👉 Look Introvert for Peace

If you are looking for introvert peace, you must follow the path to spirituality. For this you must turn your extrovert sight inwardly. A bewildered fellow deluded and tired of wandering in the hazy mist of external world, finds immense peace and light in the inner world.

When we understand the illusory nature of the gamut of things and activities in the world around and get introvert, ponder over our inner self, only then we realize that we had lost our way all these days; our cravings, materialistic needs and passions were driving our life and we were running behind the mirage of happiness. But nor we know that nothing can ever satisfy the passions, no one can ever fulfill his ambitions. Attempting to do so is like pouring petrol in fire. Thus, instead of running behind the shadow to catch it, we must turn our back to it. Having a glimpse of the inner treasure detaches us from the perishable pennies for which we had been wasting all our potentials and time. Introvert search takes us near the God and shows the key to infinite joy and peace.

Once we know our real self, grasp the reality of the world, and see the inner light, the nectar-spring of unprecedented peace erupts from within and extinguishes the flames of discontent, desperations and tensions forever. With the rise of the feeling of true fulfillment, there hardly remains any worldly need or desire; every thing in hand or gifted by Nature for survival suffices and every
circumstance becomes a source of expanding you.

📖 Akhand Jyoti, March. 1941

👉 शाश्वत नियम

वसन्त आती है, चली जाती है। पतझड़ आती है, चली जाती है। सुख आते हैं, चले जाते हैं। दुःख आते हैं, चले जाते हैं। सुख और दुःख का आना-जाना ठीक वसन्त व पतझड़ के आने व जाने की तरह है। आना और जाना यही इस जगत् का शाश्वत नियम है। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन क्रमशः बन्धनों से मुक्त होने लगता है।
  
एक अँधियारी रात में कोई प्रौढ़ व्यक्ति नदी के तट से कूदकर आत्महत्या करने पर विचार कर रहा था। मूसलाधार बारिश थी, नदी पूरे बाढ़ पर थी। आकाश में घने बादल छाए हुए थे, बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। वह उस क्षेत्र का सबसे धनी व्यक्ति था। लेकिन अचानक घाटे में उसकी सारी सम्पदा चली गयी। इसी वजह से वह आत्महत्या का निश्चय करके यहाँ आया था। लेकिन वह नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के किनारे पहुँचने को हुआ, कि किन्हीं दो वृद्ध, परन्तु मजबूत हाथों ने उसे थाम लिया। तभी बिजली चमकी और उसने देखा कि आचार्य रामानुज उसे पकड़े हुए हैं।
  
उन्होंने उससे इस अवसाद का कारण पूछा और सारी कथा सुनकर वह हँसने लगे और बोले, तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे? वह बोला- हाँ तब मेरे सौभाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था और अब सिवाय अंधियारे के मेरे जीवन में और कुछ भी बाकी नहीं है। यह सुनकर आचार्य रामानुज फिर से हँस पड़े और बोले, दिन के बाद रात्रि और रात्रि के बाद दिन। जब दिन नहीं टिका तो रात्रि कैसे टिकेगी? परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भाँति हो जाता है, जो वर्षा व धूप में समान ही बनी रहती है।

सुख व दुःख को जो समभाव से ले, समझो कि उसने जीवन के शाश्वत नियम को जान लिया। इस शाश्वत नियम की अनुभूति करने वाला, एक दिन स्वयं को भी जान लेता है। क्योंकि समत्व में ठहर जाना ही स्वयं के अस्तित्त्व में प्रतिष्ठित होना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१४

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

👉 मन की तृप्ति

लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई मे लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की माताजी कुछ पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं .. उनकी कमर झुकी हुई थी,. चेहरे की झुर्रियों मे भूख तैर रही थी .. आंखें भीतर को धंसी हुई किन्तु सजल थीं .. उनको देखकर मन मे ना जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया ..

"दादी लस्सी पिहौ का ? "
मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक .. क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 2-4-5 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 35 रुपए की एक है .. इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उन दादी के मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी!

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए .. मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा ..
"ये काहे के लिए ?"
" इनका मिलाई के पियाइ देओ पूत ! "

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था .. रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी !
एकाएक आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा .. उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं ...

अब मुझे वास्तविकता मे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने ही दोस्तों और अन्य कई ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए ना कह सका !

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे .. कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर मे बैठ जाने पर आपत्ति ना हो .. लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी ..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम लोगों के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पड़ोस मे ही जमीन पर बैठ गया।

क्योंकि ये करने के लिए मैं स्वतंत्र था .. इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती .. हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा.. लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बिठाया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा ..
"ऊपर बैठ जाइए साहब! "

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर मुस्कुराहट थी
बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसूं .. होंठों पर मलाई के कुछ अंश और सैकड़ों दुआएं थीं
ना जाने क्यों जब कभी हमें 10-20-50 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कभी कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

दोस्तों.. जब कभी अवसर मिले अच्छे काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ ना दे.. !!

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 13 April 2020


👉 In the Shrine of the Heart

Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs
and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.

The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

📖 Akhand Jyoti, March. 1941

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...