गुरुवार, 21 नवंबर 2019

My Family Is My Strength Part 2 | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

Gayatri Hi Brahmastra | गायत्री ही गायत्री ही ब्रह्मास्त्र



Title

👉 कोयले का टुकड़ा

अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बड़ा आज्ञाकारी और मेहनती छात्र था। लेकिन जब से उसने कॉलेज में दाखिला लिया था उसका व्यवहार बदलने लगा था। अब ना तो वो पहले की तरह मेहनत करता और ना ही अपने माँ-बाप की सुनता।  यहाँ तक की वो घर वालों से झूठ बोल कर पैसे भी लेने लगा था। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि अमित बुरी संगती में पड़ गया है।  कॉलेज में उसके कुछ ऐसे मित्र बन गए हैं जो फिजूलखर्ची करने, सिनेमा देखने और धूम्र-पान करने के आदि हैं।

पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढाई- लिखाई पर ध्यान देने को कहा; पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता, उसका बस एक ही जवाब होता,  मुझे अच्छे-बुरे की समझ है, मैं भले ही ऐसे लड़को के साथ रहता हूँ पर मुझपर उनका कोई असर नहीं होता…

दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे-धीरे परीक्षा के दिन आ गए, अमित ने परीक्षा से ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वो पर्याप्त नहीं थी, वह एक विषय में फेल हो गया । हमेशा अच्छे नम्बरों से पास होने वाले अमित के लिए ये किसी जोरदार झटके से कम नहीं था। वह बिलकुल टूट सा गया, अब ना तो वह घर से निकलता और ना ही किसी से बात करता। बस दिन-रात अपने कमरे में पड़े कुछ सोचता रहता। उसकी यह स्थिति देख परिवारजन और भी चिंता में पड़ गए। सभी ने उसे पिछला रिजल्ट भूल आगे से मेहनत करने की सलाह दी पर अमित को तो मानो सांप सूंघ चुका था, फेल होने के दुःख से वो उबर नही पा रहा था।

जब ये बात अमित के पिछले स्कूल के प्रिंसिपल को पता चली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ, अमित उनके प्रिय छात्रों में से एक था और उसकी यह स्थिति जान उन्हें बहुत दुःख हुआ, उन्होंने निष्चय किया को वो अमित को इस स्थिति से ज़रूर निकालेंगे।

इसी प्रयोजन से उन्होंने एक दिन अमित को अपने घर बुलाया।

प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे। अमित उनके बगल में बैठ गया। अमित बिलकुल चुप था , और प्रिंसिपल साहब भी कुछ नहीं बोल रहे थे। दस -पंद्रह मिनट ऐसे ही बीत गए पर  किसी ने एक शब्द नहीं कहा। फिर अचानक प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के एक धधकते टुकड़े को निकाल मिटटी में डाल दिया, वह टुकड़ा कुछ देर तो गर्मी  देता रहा पर अंततः ठंडा पड़ बुझ गया।

यह देख अमित कुछ उत्सुक हुआ और बोला,  प्रिंसिपल साहब, आपने उस टुकड़े को मिटटी में क्यों डाल दिया, ऐसे तो वो बेकार हो गया, अगर आप उसे अंगीठी में ही रहने देते तो अन्य टुकड़ों की तरह वो भी गर्मी देने के काम आता !

प्रिंसिपल साहब मुस्कुराये और बोले,  बेटा, कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वो टुकड़ा बेकार नहीं हुआ, लो मैं उसे दुबारा अंगीठी में डाल देता हूँ…. और ऐसा कहते हुए उन्होंने टुकड़ा अंगीठी में डाल दिया।

अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धधक कर जलने लगा और पुनः गर्मी प्रदान करने लगा।

कुछ समझे अमित।  प्रिंसिपल साहब बोले, तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो, पहले जब तुम अच्छी संगती में रहते थे, मेहनत करते थे, माता-पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे, पर जैस वो टुकड़ा कुछ देर के लिए मिटटी में चला गया और बुझ गया, तुम भी गलत संगती में पड़ गए  और परिणामस्वरूप  फेल हो गए, पर यहाँ ज़रूरी बात ये है कि एक बार फेल होने से तुम्हारे अंदर के वो सारे गुण समाप्त नहीं हो गए… जैसे कोयले का वो टुकड़ा कुछ देर मिटटी में पड़े होने के बावजूब बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक कर जल उठा, ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगती में जाकर, मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो …

याद रखो,  मनुष्य ईश्वर की बनायीं सर्वश्रेस्ठ कृति है उसके अंदर बड़ी से बड़ी हार को भी जीत में बदलने की ताकत है, उस ताकत को पहचानो, उसकी दी हुई असीम शक्तियों का प्रयोग करो और इस जीवन को सार्थक बनाओ।

अमित समझ चुका था कि उसे क्या करना है, वह चुप-चाप उठा, प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श किये और निकल पड़ा अपना भविष्य बनाने।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (अन्तिम भाग)

भिक्षा व्यवसाय, मृतक भोज, बाल-विवाह, कन्या विक्रय, पत्नी त्याग आदि अनेकानेक प्रचलन ऐसे हैं जो औचित्य की कसौटी पर किसी भी प्रकार खरे सिद्ध नहीं होते फिर भी हमारे गले में फाँसी के फंदे की तरह कसे हुए हैं। इन कुरीतियों को इसी प्रकार सहते रहा गया, उनका मोह न छोड़ा गया तो समझना चाहिए कि हम दिन-दिन गलते, फिसलते, पिछड़ते और घटते गिरते ही चले जायेंगे।

अनैतिकता का तो कहना ही क्या? समय का पालन, वचन का पालन, विश्वास का पालन घटता जा रहा है। व्यवसाय, आचरण, कर्तव्य, उत्तरदायित्व के क्षेत्रों में तनिक तनिक सी बात पर मनुष्य ऐसी कलामुण्डी खाता है मानों नीति मर्यादा पालन की नहीं, कहने सुनने भर की बात रह गई है। कामचोरी, हरामखोरी, करचोरी, रिश्वत, धोखाधड़ी, छल, स्वार्थान्धता, नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना आदि की अवांछनीयताएँ अब सामान्य व्यवहार की, चातुर्य कौशल की अंग बनती जा रही है। लगता है मनुष्य अपनी गरिमा का परित्याग कर प्रेत पिशाच जैसी अपनाई जाने वाली दुष्टता, भ्रष्टता अपनाने के लिए तेजी से अग्रसर हो रहा है।

आज राष्ट्र का एक भी परिवार परिकर इस सर्वव्यापी छूत से बचा हुआ नहीं है। नौकरी के लिए पढ़ाई की अब कोई उपयोगिता रह नहीं गई है। फिर भी लोग घर फूँककर तमाशा देखने और बालकों को उच्च शिक्षा के नाम पर ऐसी स्थिति में पटक देते हैं जिनमें से नौकरी न मिलने पर किसी काम के नहीं रहते।

आज की व्यस्तता को देखते हुए यह आशा तो नहीं की जा सकती कि जन सामान्य चक्रव्यूह तोड़ने वाले अभिमन्यु की भूमिका निभायें। पर इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि वे अपने निजी जीवन में, परिवार के क्षेत्र में जो मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ, अवांछनीयताएँ पनपती देखें उन्हें समय रहते उखाड़ने का प्रयत्न करें। कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि उनका समर्थन न करें, उनकी प्रशंसा भी न करें। विरोध बन पड़े तो करे पर यदि वैसा साहस न हो तो कम से कम असहमति और असहयोग की स्थिति तो बनाये ही रहें। यदि सत्य निष्ठा उमगे, औचित्य के प्रति श्रद्धा जगे तो उसे साहस भरे संघर्ष के रूप में परिणत करना चाहिए और जितना सम्भव हो उतना विरोध अथवा असहयोग जारी रखना ही चाहिए। इतनी प्रखरता यदि जीवन्त रखी जा सके तो उतने से भी अनौचित्य के असुर का मनोबल टूटेगा और देवत्व पनपेगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शक्ति - साधना

शक्ति में समूचा अस्तित्त्व सिमटा है। जड़-चेतन इसी के रूप हैं। कहीं इसकी सुप्त निष्क्रियता झलकती है, तो कहीं इसकी जाग्रत् सक्रियता के दर्शन होते हैं। जीवन के विविध रूप इसी से प्रकटे हैं। पशु-पक्षियों में, वृक्ष-वनस्पतियों में इसी की चेतनता लहराती है। इसकी ही ऊर्जा गति-प्रगति, विकास-विस्तार के अनेक रूप धरती है। सचमुच ही जीवन और जगत् शक्तिमय है। शक्ति के सिवा यहाँ कुछ भी नहीं।
  
शक्ति-लीला का यह रहस्य मानव जीवन में सबसे गहरा है। स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोश शक्ति की विविध रहस्यमयी धाराओं को ही प्रकट करते हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा व सहस्रार चक्र में महाशक्ति अपने अनेकों रहस्यों को उजागर करती है। कुण्डलिनी महाशक्ति तो जैसे मानव जीवन का अधिष्ठान ही है। जगन्माता आदिशक्ति स्वयं ही इस परम रूप में प्रतिष्ठित होकर मानवीय जीवन को सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्रदान करती हैं।
  
शक्ति-लीला के इस रहस्य से जो अनजान-अनभिज्ञ रहते हैं, वे शक्ति-समुद्र में वास करते हुए भी दीन-दुःखी व दयनीय बने रहते हैं। ‘सागर-बिच मीन पियासी’ यही उनकी जीवन कहानी होती है। जो इस रहस्य को जानने की साधना करते हैं, वे आदिशक्ति की सन्तान होने का गौरव पाते हैं। उनके रोम-रोम में शक्ति के समुद्र लहराते हैं। उनकी नाड़ियों व शिराओं में ऊर्जा की धाराएँ उफनती हैं। शक्ति-साधकों के लिए कहीं भी कुछ भी असम्भव नहीं रहता।
  
असम्भव को सम्भव करने वाली शक्ति साधना की यह परम विद्या गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में समायी है। जो अनुभवी हैं वे इस सच्चाई को जानते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों का प्रति क्षण इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। जो शक्ति-साधक इन क्षणों के महत्त्व को पहचान कर गायत्री महाशक्ति की साधना में तल्लीन होंगे वे शक्ति स्रोत बने बिना न रहेंगे। जीवन और जगत् की अनेकों रहस्यमयी शक्ति के अनुदानों से उनका जीवन कृतार्थ होगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२८

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 9)

Q.11. What is Savita?         
Ans. The deity for meditation on Gayatri Mantra is ‘Savita’. Savita is the cosmic power of God which provides energy to all animate and inanimate systems of the cosmos. In the Sun and other stars, for instance, it works as fission and fusion of atoms.

Q.12. Why is Gayatri Upasana considered supreme as compared to other forms of worship?

Ans. Gayatri is the fountainhead of all streams of divine powers personified and designated as deities (Lakhyami, Durga, Saraswati etc.) Thus by invocation of Gayatri the Sadhak starts accessing divine attributes. Speciality of Gayatri Sadhana lies in the fact that it provides the Sadhak an access to the huge store of spiritual energy accumulated in the cosmos by Tap of innumerable Gayatri Sadhakas since times immemorial. With a little effort, he is able to get assistance from the ancient Rishis in astral realms (the abodes of elevated and enlightened soul) and moves speedily realms on the spiritual path.  
Gayatri Sadhana is based on the super-science governing the laws of transformation of matter and energy by influx of divine energies from supramental (Para) realms to the natural (a-Para) realm.  

Gayatri is also personification of God’s power of righteous wisdom. Assimilating the substance and meaning underlying its worship leads to far-sighted wisdom. This alone is  sufficient incentive to inspire one to lead righteous life and effortlessly get rid of worldly sorrows, grief, pain and suffering. The Sadhak gets patience to endure difficulties which cannot be avoided. He is also crowned with worldly success on account of inculcation of perseverance and courage to march ahead on the path of integral growth.

Attainment of heaven and liberation are the outcome of refinement in outlook and incorporation of excellence in the method of working. It  is not necessary to wait for the next life after death for achieving these twin aims. Liberation from bondage means freedom from the fetters of greed, infatuation and egoism. A person who assimilates the knowledge underlying Gayatri and infuses his soul with inner refinement surely gets liberated from worldly bondage. However,   when Jap is performed in a routine manner as a ritual and no attempt is made to assimilate its substance in practical life, no perceptible progress takes place.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 24

बुधवार, 20 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक्त जोड़ों का विवाह कर दिया जाय और सार्वजनिक घोषणा के रूप में उनका पंजीकरण करा देना या घरेलू त्यौहार जैसा कोई हलका सा हर्षोत्सव कर देना यही औचित्य की मर्यादा है। पर अपने यहाँ उसे युद्ध जीतने या पहाड़ उठाने जैसा बना लिया गया है। उस धमाल में पैसों की, समय की जितनी बर्बादी होती है उसका हिसाब लगाने पर प्रतीत होता है कि आजीविका का एक तिहाई अंश इसी कुप्रचलन में होली की तरह जल जाता है। खर्चीली शादियाँ हमें किस तरह दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। कितने ही परिवारों की सुख शान्ति और प्रगति किस प्रकार इस नरभक्षी पिशाचिनी की बलिवेदी पर नष्ट होती है इसे अधिकाँश लोग समझते भी हैं और कोसते भी हैं। फिर भी आश्चर्य यह है कि छोड़ते किसी से नहीं बनता। इसे कुरीतियों का माया जाल ही कहना चाहिए जो तोड़ने का दम−खम करने वालों को भी अपने शिकंजे से छूटने नहीं देता।

जाति-पाँति के नाम पर प्रचलित ऊँच-नीच की मान्यता के पीछे न कोई तर्क है न तथ्य, न प्रमाण, न कारण। फिर भी अपने समाज में ब्राह्मण-ब्राह्मण के, ठाकुर-ठाकुर के, अछूत-अछूत के बीच जो ऊँच-नीच का भेद-भाव चलता है उसे देखते हुए लगता है कि यह सवर्ण-असवर्ण के मध्य चलने वाला विग्रह नहीं है, वरन् हर बिरादरी वाले अपनी ही उपजातियों में ऊँच-नीच का भेद बरतते-बरतते इस प्रकार बँट गये हैं मानो उनका कोई एक देश, धर्म, समाज या संस्कृति रह ही नहीं गई हो। इस दुर्विपाक से सभी परिचित हैं, सभी दुःखी हैं, सभी विरुद्ध हैं। फिर भी कुरीतियों का कुचक्र तो देखिये कि बरताव में सुधारक भी पिछड़े लोगों की तरह ही आचरण करते हैं।

नर-नारी के बीच बरता जाने वाला भेदभाव कुरीतियों की दृष्टि से और भी घिनौना है। इसने पर्दे के प्रतिबन्ध में आये जन समुदाय को दूसरे दर्जे के नागरिक की, नजरबन्द कैदी की स्थिति में ले जाकर पटक दिया है। नारी आज की स्थिति में देश की अर्थ व्यवस्था में, सामाजिक प्रगति में कुछ योगदान दे सकने की स्थिति में रही ही नहीं। अशिक्षा, उपेक्षा, अयोग्यता, पराधीनता, अस्वस्थता के बन्धनों में जकड़ी हुई, अन्धाधुन्ध प्रजनन के प्राण घातक भार के अत्याचार से लदी हुई नारी अपने आपके लिए, नर समुदाय के लिए, समूचे समाज के लिए भारभूत बनकर रह रही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्या तुम मनुष्य हो?

क्या तुम मुनष्य हो? इस अटपटे सवाल के बारे में यही कहना है कि प्रेम तुममें जितना गहरा है, तुम उतने ही श्रेष्ठ मनुष्य हो। इसके विपरीत तुममें साधन-सम्पत्ति का लोभ जितना ज्यादा है, मनुष्य के रूप में तुम उतने ही निम्न हो। प्रेम और परिग्रह जिन्दगी की दो दिशाएँ हैं। हृदय प्रेम से भरा हो, तो परिग्रह शून्य हो जाता है। और जिनका चित्त लोभ और परिग्रह से घिरा है, वहाँ प्रेम शून्य होता है।
  
एक महारानी ने अपने मौत के बाद अपनी कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का हुक्म दिया था- ‘इस कब्र में अपार धनराशि गड़ी हुई है। जो व्यक्ति निहायत गरीब एवं एकदम असहाय हो, वह इसे खोदकर ले सकता है।’ उस कब्र के पास से हजारों दरिद्र एवं भिखमंगे निकले, लेकिन उनमें से कोई भी इतना दरिद्र एवं असहाय नहीं था जो धन के लिए मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदे। एक अत्यन्त बूढ़ा भिखमंगा तो वहाँ सालों-साल से रह रहा था। वह हमेशा उधर से गुजरने वाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को कब्र की ओर इशारा कर देता था।
  
हालांकि आखिर में वह व्यक्ति भी आ ही गया, जिसकी दरिद्रता इतनी ज्यादा थी कि उसने उस कब्र को खोद ही डाला। आप जानना चाहेंगे कि वह व्यक्ति कौन था? तो सुनिए वह स्वयं एक सम्राट था। और उसने इस कब्र वाले देश को बस अभी-अभी जीता था। उसने अपनी विजय के साथ इस कब्र की खुदाई शुरू करवा दी। पर उसे इस कब्र में एक पत्थर के सिवा और कुछ नहीं मिला। इस पत्थर पर लिखा हुआ था, ‘मित्र, तू अपने से पूछ, क्या तू मनुष्य है। क्योंकि धन के लिए कब्र में सोए हुए मुरदों को परेशान करने वाला मनुष्य हो ही नहीं सकता।’
  
वह सम्राट जब निराश होकर उस कब्र के पास से वापस लौट रहा था, तो उस कब्र के पास रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को लोगों ने खूब जोर से हँसते हुए देखा। वह हँसते हुए कह रहा था ‘मैं कितने सालों से इन्तजार कर रहा था, आखिरकार आज धरती के दरिद्रतम निर्धन और सबसे ज्यादा असहाय व्यक्ति का दर्शन हो ही गया।’ सच में प्रेम विहीन व्यक्ति से बड़ा दरिद्र और दीन-दुःखी और कोई हो ही नहीं सकता। जो प्रेम के अलावा किसी और सम्पदा की खोज में लगा रहता है, एक दिन वही सम्पदा उससे सवाल करती है- क्या तुम मनुष्य हो?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२७

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 8)

Q.10. What is the relationship between Gayatri Mantra and other powers of God?

Ans. According to Savitri Upnishad, from the eternal omnipotence of God represented by Om, seven streams of divine power, known as Vyahritis, emanate. Three amongst these (Bhur , Bhuwaha and Swaha) form the prefix of Gayatri Mantra. The Vyahritis are also known as the ‘Sheersha’ (fountainhead) of Gayatri.

When Gayatri- the Primordial Power of the Divine, with Its totality of energy systems, interacts with the five basic elements of material universe (Panch Bhautik Prakriti - Savitri), complex, mysterious reactions are set into motion. Spirituality identifies these five basic elements (of which the entire material universe in its of solid, liquid and gaseous states and physical bodies of animate systems are composed) as Prithvi, Jal, Vayu, Tej and Akash. In course of interaction of the cosmic energies with these basic elements subtle sound waves similar to those produced by twenty-four letters of Gayatri Mantra are created.
In the course of thousands of years of research, Indian spiritual masters and yogis have evolved procedures for accessing divine energy by “tuning” into these cosmic sound waves by chanting of Gayatri Mantra, performance of Yagya and other associated procedures of Gayatri Sadhana.
(Also please see the answer to Q.No. 8)

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 23

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 19 Nov 2019

👉 प्रार्थना

प्रार्थना का संगीत प्रेम की सरगम से सजता है। प्रेम की सजल संवेदनाओं से ही प्रार्थना के स्वर स्फुटित होते हैं। प्रेम के शब्दों को गूँथकर ही प्रार्थना का काव्य रचा जाता है। भावमय भगवान् केवल भावनाओं की सघन पुकारों को सुने बिना नहीं रहते। संवेदनाओं की सजलता ही उन्हें स्पर्श कर पाती है।
  
सजल संवेदनाओं, सघन भावनाओं एवं प्रेम की प्रतीति को जो अपने जीवन में घोल देते हैं, उनका जीवन सहज ही प्रार्थनामय हो जाता है। सूफी फकीरों में इस बारे में एक घटना बहुप्रचलित है। सूफी फकीर नूरी को उनके कुछ अन्य फकीर साथियों के साथ काफिर होने का आरोप लगाया गया था। इसके लिए इन सबको मृत्युदण्ड भी सुना दिया था।
  
मृत्युदण्ड की घड़ी में जब जल्लाद फकीर नूरी के एक साथी के पास नंगी तलवार को लहराता हुआ आया, तो नूरी ने उठकर स्वयं को अपने मित्र के स्थान पर पेश किया। ऐसा करते समय नूरी के चेहरे पर गहरी प्रसन्नता और स्वरों में भरपूर नम्रता थी। इस दृश्य को देखकर दर्शक स्तब्ध रह गए। हजारों की भीड़ एक पल को सहम गयी।
  
अचरज से भरे जल्लाद ने कहा- हे युवक! तलवार ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग उत्सुक एवं व्याकुल हों और फिर तुम्हारी तो अभी बारी भी नहीं आयी। जल्लाद की इन बातों पर फकीर नूरी मुस्करा उठे और कहने लगे- मेरे लिए प्रेम ही प्रार्थना है। मैं जानता हूँ कि जीवन, संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है। लेकिन प्रेम के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है। जिसे प्रेम उपलब्ध हो जाता है, उसके लिए सारा जीवन प्रार्थना बन जाता है। और प्रार्थनाशील मनुष्य का कर्त्तव्य है कि जब भी कोई कष्ट आगे आए, तो स्वयं सबसे आगे हो जाओ और जहाँ सुख-सुविधाएँ मिलती हों तो वहाँ पीछे होने की कोशिश करो।
  
फकीर नूरी की इन बातों ने जता दिया कि प्रार्थना का कोई ढाँचा नहीं होता। वह तो हृदय का सहज अंकुरण है। जैसे पर्वत से झरने बहते हैं, वैसे ही प्रेमपूर्ण व्यक्ति के प्रत्येक कर्म में प्रार्थना की धुन गूँजती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२६

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 7)

Q.9. Why is Gayatri designated as Vedmata, Devmata and Vishwamata?  

Ans. Gayatri has been called Vedmata because it is the essence of source of Vedas. It is called Devmata because there is perpetual growth of divinity and righteousness in its devotee. Its ultimate object is to inculcate and awaken the feeling of ‘Vasudhaiv Kutumbakam’ and ‘Atmavat Sarvabhooteshu’ (Welfare of man - the individual lies in the welfare of all humankind). It is known as Vishwamata since it aims at establishment of good-will, equality, unity and love amongst the entire human race, cutting across barriers of language, race, colour, sex etc. and ultimately uniting the whole world on basis of realised spiritual unity in diversity.

The individual basis of Gayatri is to establish righteous wisdom. ‘Naha’ implies inculcation of cooperation and collective endeavour - mutual caring and sharing.
The absolute wisdom condensed in Gayatri magnified itself as the Vedas. For this reason Gayatri is known as the Mother of Vedas. (Gayatri Mantra is the  means for invocation of Divine grace).  
Gayatri is the fountainhead of all divine powers (Devtas). It is therefore, known as the Devmata. (Ref. Tandya Brahman).

Gayatri sustains the cosmos as the three Supreme Emanations of the Supreme, known as Brahma, Vishnu and Mahesh. Hence, it is called Vishwamata (Ek Pwan Kashi Khand, Poorvardha 4.9.58)

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 22

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ४)

जीभ का चटोरापन अनावश्यक मात्रा में अभक्ष्य पेट पर लादता है और क्रमशः अपच, रक्त दूषण बढ़ाते-बढ़ाते समूची स्वास्थ्य सम्पदा को ही बर्बाद करके रख देता है। इसी प्रकार कामुक चिन्तन में निरत रहने वाले पाते तो कुछ नहीं, अपनी एकाग्रता और चिन्तन की शालीनता गिराते-गिराते, घटाते-घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्रता के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं।

व्यक्तित्व को खोखला करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपने चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय, साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आप से स्वयं लड़ते रहने की शूरता किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायेगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है। इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।

वह व्यक्तिगत सुधार परिधि की गुण, कर्म, स्वभाव क्षेत्र की चर्चा हुई। अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए। परिवार एवं समाज में प्रयुक्त होने वाले प्रचलनों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए और खोजना चाहिए कि सर्वत्र न सही अपने निज के व्यवहार तथा सम्बद्ध परिवार में ऐसी क्या अवांछनीयताएँ हैं जो व्यक्तिगत क्षेत्र में पनपने पर भी समूचे समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। हैजा प्लेग के विषाणु आरम्भ में किसी छोटे क्षेत्र में होते हैं पर छूत की बीमारी बनकर दूर-दूर तक फैलते और असंख्यों का प्राण हरण करते चले जाते हैं। मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ और अनैतिकताएँ एक प्रकार से चरित्र एवं समाज क्षेत्र की बीमारियाँ हैं। यह जहाँ पनपती हैं उतने ही क्षेत्र में तबाही नहीं करती वरन् अपनी चपेट में सुविस्तृत क्षेत्र को जकड़ती और पतन पराभव का वातावरण बनाती चली जाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 17 नवंबर 2019

👉 जीवन जीने की कला

जीवन-जीने की कला में है। जिस किसी भी तरह अनगढ़ तौर-तरीकों से जीते रहने का नाम जीवन नहीं है। दरअसल जो जीने की कला जानते हैं, केवल वही यथार्थ में जीवन जीते हैं। जीवन का क्या अर्थ है? क्या है हमारे होने का अभिप्राय? क्या है मकसद? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं? इन सवालों के ठीक-ठीक उत्तर में ही जिन्दगी का रहस्य समाया है।
  
यदि जीवन में गन्तव्य का बोध न हो, तो भला गति सही कैसे हो सकती है और यदि कहीं पहुँचना ही न हो, तो संतुष्टि कैसे पायी जा सकती है? जिसके पास सम्पूर्ण जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसकी दशा उस माली की तरह है, जिसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, लेकिन उसके पास ऐसा धागा नहीं है जो उन्हें जोड़ सके, एक कर सके। आखिरकार वह कभी भी अपने फूलों की माला नहीं बना पायेगा।
  
जो जीवन जीने की कला से वंचित है, समझना चाहिए कि उनके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती है। जीने की कला से वंचित व्यक्ति जीवन के उस समग्र अनुभव से सदा के लिए वंचित रह जाता है, जिसके अभाव में जीना और न जीना बराबर ही हो जाता है।
  
ऐसे व्यक्ति का जीवन उस वृक्ष की भाँति है, जिसमें न तो कभी फूल लग सकते हैं और न कभी फल। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती। क्योंकि आनन्द की अनुभूति तो जीवन को कलात्मक ढंग से जीने पर, उसे समग्रता में अनुभव करने पर होती है। जीवन में यदि आनन्द पाना है, तो जीवन को फूलों की माला बनना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूँथना होगा। जो जीने की इस कला को नहीं जानते हैं, वे सदा के लिए जिन्दगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२५

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ३)

स्वभाव में कटुता, कर्कशता, उतावली, अधीरता, उत्तेजना की उद्दण्डता भी उतनी ही घातक है जितनी कि दीनता, भीरुता, निराशा, कायरता। यह दोनों ही असन्तुलन भिन्न प्रकार के होते हुए भी हाई ब्लड प्रेशर, लो ब्लड प्रेशर की तरह अपने-अपने ढंग से हानि पहुँचाते हैं। स्वभाव को सहिष्णु, धैर्यवान, गम्भीर, दूरदर्शी, सहनशील बनाने का प्रयत्न यदि निरन्तर जारी रखा जाय तो शिष्टता, सज्जनता के ढाँचे में प्रकृति ढलती जायेगी और हर किसी की दृष्टि में अपना मूल्य बढ़ेगा।

ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल जुलकर रहना, मिल बाँटकर खाना, हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सके तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालु, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहमन्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। आमतौर से ऐसे लोग अविश्वस्त और चरित्रहीन समझे जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हो तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।

ऐसे-ऐसे और भी अनेकों दोष दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे-धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहते से नहीं मिट जाती, उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती है। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उनसे जूझने के लिए मोर्चे पर खड़े करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 16 नवंबर 2019

👉 सच्चा ज्ञान:-

एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला और एक आश्रम में जाकर ठहरा। पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम के जो बुढे गुरु थे वह कुछ थोड़ी सी बातें जानते थे, रोज उन्हीं को दोहरा देते थे।

फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, 'यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं।'

लेकिन उसी रात एक ऐसी घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवन भर वह आश्रम नहीं छोड़ा। क्या हो गया?

दरअसल रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत करने और उसकी बातें सुनने।

उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना।

उस युवा संन्यासी के मन में हुआ; 'गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठे हैं, उन्हे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी—कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है।'

युवा संन्यासी ने यह सोचा कि 'आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत—बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा।'

तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि- "आपको मेरी बातें कैसी लगीं?"

बूढे गुरु खिलखिला कर हंसने लगे और बोले- "तुम्हारी बातें? मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूँ तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल भी बोलते ही नहीं हो।"

वह संन्यासी बोला- "मै दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूँ।"

वृद्ध ने कहा- "हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो, तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं।"

'वास्तव में दोस्तों!! एक ज्ञान वह है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं।

हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें लगता है कि हमें ईश्वर के संबंध में पता है। पर भला ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है? हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं! अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है?

लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है। तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी-कभी जन्मता है। लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 16 Nov 2019



👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग २)

दुर्व्यसनों, दुर्गुणों, उच्छृंखलताओं एवं बुरी आदतों से उत्पन्न होने वाली हानियाँ इतनी अधिक हैं कि उनकी आग में उपार्जन, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तुलन, भविष्य, परिवार सभी कुछ ईंधन की तरह जलते और समाप्त होते देखा जा सकता है। इसलिए प्रगति की योजनाएँ बनाते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों ने कहाँ कहाँ डेरे तम्बू गाड़ रखे हैं। अनुपयुक्त आदतों की विष बेलें कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमाती जा रही है। इस उखाड़-पछाड़ के बिना सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण हो नहीं सकेगा।

प्रत्यक्ष शत्रुओं से निपटना आसान है। चोर उचक्कों की सुरक्षा चौकीदारी से हो सकती है, किन्तु उन दुष्प्रवृत्तियों से निपटना तो दूर उनको ढूँढ़ निकालना और होने वाली हानियों का अनुमान लगाना तक कठिन पड़ता है। अदृश्य को कैसे देखा जाय? अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय? सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइक्रोस्कोप ही इन विषाणुओं का अता-पता बता सकता है जो दुर्गुणों के रूप में विषाणुओं की भूमिका निभाते और सर्वनाश का ताना-बाना बुनते रहते हैं।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में किस हेय स्तर की दुष्प्रवृत्तियाँ अधिकार जमाती हैं, इसका तीखा निष्पक्ष पर्यवेक्षण करना चाहिए। शरीर क्षेत्र का शत्रु नम्बर एक आलस्य है और मनःक्षेत्र का प्रमाद। आलसी और प्रमादी प्रकारान्तर से आत्म हत्यारे हैं, वे अपने इन बहुमूल्य यन्त्रों को जंग लगाकर भोंथरे, अनुपयोगी एवं अपंग बना देते हैं। पक्षाघात पीड़ित जीते तो हैं किन्तु अशक्त असमर्थ, अर्ध मृतक की तरह रहकर। जिनके शरीर पर आलस्य का शनिश्चर छाया है वे काम से जी चुराते और परिश्रम में बेइज्जती अनुभव करते देखे जाते हैं। प्रमादी मस्तिष्क पर जोर नहीं डालते। उचित-अनुचित के पक्ष विपक्ष पर माथा पच्ची नहीं करते। जो चल रहा है उसी ढर्रे पर बेपेंदी के लोटे की तरह लुढ़कते रहते हैं। न समय की परवाह होती है न हानि लाभ की। किसी तरह दिन काटते चलना ही अभीष्ट होता है। पराक्रम रहित शरीर अपंग है और उत्साह रहित मस्तिष्क मूढ़मति। ऐसी दीन दयनीय स्थिति मनुष्य की अपनी बनाई होती है। यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक-एक क्षण का उपयोग करने के लिए दिन भर के भविष्य के कार्य निर्धारित कर लिये जाय और उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर श्रमशील तत्परता और रुचि रस से भरी पूरी तन्मयता का संयुक्त नियोजन किया जा सके तो सफलता चरण चूमेगी और प्रगति पथ पर सरपट दौड़ने वाली चाल चौगुनी सौगुनी बढ़ती दीखेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विजय का महापर्व

विजय पथ पर केवल धर्मपरायण, साहसी ही अपने पाँव रखते हैं, जिनमें जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत है, वही इस राह पर चल पाते हैं। अनीति, अनाचार, अत्याचार और आतंक से लोहा यही लौहपुरुष लेते हैं। विजय दशमी के रहस्य इन्हीं के अन्तर्चेतना में उजागर होते हैं। विजय का महापर्व इनके ही अस्तित्त्व को आनन्दातिरेक से भरता है।
  
विजय के साथ संयोजित दशम् संख्या में कई सांकेतिक रहस्य संजोये हैं। दशम् का स्थान नवम के बाद है। जिसने नवरात्रियों में भगवती आदिशक्ति की उपासना की है, वही दशम् की पूर्णता का अधिकारी होता है। वही अपनी आत्मशक्ति के प्रभाव से दस इन्द्रियों का नियंत्रण करने में समर्थ होता है। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य एवं अक्रोध के रूप में धर्म के दस लक्षण उसकी आत्म चेतना में प्रकाशित होते हैं।
  
प्रभु श्रीराम के जीवन में शक्ति आराधन एवं धर्म की यही पूर्णता विकसित हुई थी। तभी वह आतंक एवं अत्याचार के स्रोत दशकण्ठ रावण को मृत्युदण्ड देने में समर्थ हुए। मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवन चेतना में अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रिय संयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान-इन दस धर्म साधनों की पूर्ण प्रभा-प्रकीर्ण हुई थी। इस धर्म साधन के ही प्रभाव से उनकी सभी दस नाड़ियाँ-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, कहू, अलंवुषा एवं शंखिनी पूर्ण जाग्रत् एवं ऊर्जस्विनी हुई थीं।
  
प्रभु श्रीराम की धर्म साधना में एक ओर तप की प्रखरता थी, तो दूसरी ओर संवेदना की सजलता। इस पूर्णता का ही प्रभाव था कि जब उन्होंने धर्म युद्ध के लिए अपने पग बढ़ाये तो काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मांतगी तथा कमला ये सभी दस महाविद्याएँ उनकी सहयोगिनी बनीं और ‘यतो धर्मस्ततोजयः’ के महा सत्य को प्रमाणित करते हुए विजय दशमी धर्म विजय का महापर्व बन गयी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२४

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 6)

Q.8. Why is Gayatri known as Tripada- Trinity?
Ans. Gayatri is Tripada- a Trinity, since being the Primordial Divine Energy, it is the source of three cosmic qualities known as “Sat”, “Raj” and “Tam” represented in Indian spirituality by the deities “Saraswati” or “Hreem”.  “Lakhyami” or “Shreem” and “Kali” or “Durga” as “Kleem”. Incorporation of “Hreem” in the soul augments positive traits like wisdom, intelligence, discrimination between right and wrong, love, self-discipline and humility. Yogis, spiritual masters, philosophers, devotees and compassionate saints derive their strength from Saraswati.

The intellectuals, missionaries, reformists, traders, workers, industrialists, socialists, communists are engaged in management of equitable distribution of Shreem (Lakhyami) for human well-being. Shreem is the source of wealth, prosperity, status, social recognition, sensual enjoyment and resources.

“Kleem” (Kali or Durga) is the object of reverence and research by the physical scientists. The plethora of scientific research and development depends on the “Kleem” element of Gayatri.

The “Hreem”,  “Shreem” and  “Kleem” elements of Gayatri have eternally existed in the cosmos. The modern western civilisation has particularly devoted itself to the management of  “Kleem” (Heat, light, electricity, magnetism, gravity, matter, nuclear energy etc.) and Shreem; whereas the occultists and mystics of East have remained particularly engaged in research of “Hreem”. It is evident that the key to lasting global peace harmony and prosperity lies in integral devotion of Hreem, Shreem and Kleem. Gayatri Sadhana is the super-science for mastery of these three aspects of the Divine Mother.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 21

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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