शुक्रवार, 15 नवंबर 2019
गुरुवार, 14 नवंबर 2019
बुधवार, 13 नवंबर 2019
👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)
महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृजनात्मक कदम उठाने की सम्भावना बनती है। खेत में कंकड़, पत्थर, झाड़ झंखाड़ जड़ जमाये बैठे हो तो उपयुक्त बीज बोने पर भी फसल न उगेगी। इस प्रसंग में सर्वप्रथम जोतने, उखाड़ने, बीनने और साफ करने का काम हाथ में लेना होगा। पहलवान बनने से पूर्व बीमारियों से छुटकारा पाना आवश्यक है। बर्तन में पानी भरने का प्रयत्न करने से पूर्व उसके छेद बन्द करने चाहिए। उद्यान लगाने वालों को पौधे चर जाने वाले पशुओं और फल कुतरने वाले पक्षियों से रखवाली का प्रबन्ध भी करना होता हैं।
जीवन साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवांछनीयताओं ने कहाँ-कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मकड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोईघर की, पात्र-उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायेगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी।
मलीनता साफ करने के उपरान्त ही बात बनती है। प्रातः उठते ही शौच, स्नान, मंजन, कंघी, साबुन, बुहारी का काम निपटाना पड़ता है तब अगली गतिविधियाँ अपनाने का कदम उठता है। जन्मते ही बालक गन्दगी में लिपटा आता है, सर्वप्रथम उस जंजाल से मुक्त कराने की व्यवस्था बनानी पड़नी है, सुन्दर कपड़े पहनाना उसके बाद होता है। त्यौहार मनाने का पहला काम है साफ सफाई। पूजा उपचार का भी प्रथम चरण यही है। प्रगतिशील स्थापनाओं का एक पक्ष दुष्ट दुरभिसंधियों से निपटना भी है अन्यथा अन्धी पीसे कुत्ता खाय वाली उक्ति चरितार्थ होती रहेगी। पानी खींचने से पहले कुँआ खोदना पड़ता है। नींव खोदना पहला और दीवार चुनना दूसरा काम है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
जीवन साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवांछनीयताओं ने कहाँ-कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मकड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोईघर की, पात्र-उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायेगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी।
मलीनता साफ करने के उपरान्त ही बात बनती है। प्रातः उठते ही शौच, स्नान, मंजन, कंघी, साबुन, बुहारी का काम निपटाना पड़ता है तब अगली गतिविधियाँ अपनाने का कदम उठता है। जन्मते ही बालक गन्दगी में लिपटा आता है, सर्वप्रथम उस जंजाल से मुक्त कराने की व्यवस्था बनानी पड़नी है, सुन्दर कपड़े पहनाना उसके बाद होता है। त्यौहार मनाने का पहला काम है साफ सफाई। पूजा उपचार का भी प्रथम चरण यही है। प्रगतिशील स्थापनाओं का एक पक्ष दुष्ट दुरभिसंधियों से निपटना भी है अन्यथा अन्धी पीसे कुत्ता खाय वाली उक्ति चरितार्थ होती रहेगी। पानी खींचने से पहले कुँआ खोदना पड़ता है। नींव खोदना पहला और दीवार चुनना दूसरा काम है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 साधना का सत्य
मनुष्य हर तरफ से शास्त्र और शब्दों से घिरा है। लेकिन संसार के सारे शास्त्र एवं शब्द मिलकर भी साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता है, पर इसे पाया नहीं जा सकता। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है। शब्द से निःशब्द में छलांग लगाने का साहस ही साधना है।
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता है। इससे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ‘स्व’ सभी विचारों से परे और पूर्व है। ‘स्व’ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भाव दशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती है। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं है, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं है, वहीं अपने सत्य स्वरूप का बोध होता है, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती है।
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवन क्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैंः १. बाह्य मूर्छित - अन्तः मूर्छित, २. बाह्य जाग्रत् - अन्तः जाग्रत् । इनमें से पहला रूप मूर्छा-अचेतना का है। यह जड़ता का है। यह विचार से पहले की स्थिति है। दूसरा रूप अर्धमूर्छा का है, अर्ध चेतना का है। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति है। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं है। क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इन्द्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता है। लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्थिति मूर्छा की है, जो केवल पलायन है, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२३
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता है। इससे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ‘स्व’ सभी विचारों से परे और पूर्व है। ‘स्व’ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भाव दशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती है। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं है, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं है, वहीं अपने सत्य स्वरूप का बोध होता है, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती है।
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवन क्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैंः १. बाह्य मूर्छित - अन्तः मूर्छित, २. बाह्य जाग्रत् - अन्तः जाग्रत् । इनमें से पहला रूप मूर्छा-अचेतना का है। यह जड़ता का है। यह विचार से पहले की स्थिति है। दूसरा रूप अर्धमूर्छा का है, अर्ध चेतना का है। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति है। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं है। क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इन्द्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता है। लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्थिति मूर्छा की है, जो केवल पलायन है, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२३
👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 5)
Q.7. Why is Gayatri represented as a deity with five faces?
Ans. Descriptions of deities and characters in mythology showing many heads and arms are common and may appear odd and paganish to a person not familiar with the subtleties of Indian spiritual tradition. Brahma and Vishnu have been described as having four faces, Shiva with five, Kartikeya with six, Durga with eight and Ganesha with ten heads. It is said that the demon king Ravana had ten heads and twenty arms; and sahastrabahu, another demon had a thousand hands.
Here, the numbers do not refer to the physiology, but to characteristics of the divine or evil attributes of the deities or demons as the case may be.
Indian spirituality frequently mentions five-fold classifications - such as the five basic elements of the cosmos (Tatvas); the five sheaths (Koshas) covering the human soul; the five organs each of perception and action in the human body (Gyanendriyas and Karmendriyas), the five life-forces (Prans); the five types of energies operating in human bodies (Agnis); the five types of Yoga ....etc. The Gayatri Mantra, too is divisible in five parts namely (1) Om (2) Bhurbhuwaha Swaha (3) Tatsaviturvareniyam (4) Bhargo Devasya Dheemahi (5) Dhiyo Yonaha Prachodayat. Each of these corresponds to the five primary emanation of the supreme spirit: Ganesh, Bhawani, Brahma, Vishnu and Mahesh respectively. The entire super-science of spirituality too is encapsuled in the four Vedas and one Yagya.
The five faces of Gayatri refer to these Divine attributes, which the Sadhak has to deal with in course of Sadhana.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 20
Ans. Descriptions of deities and characters in mythology showing many heads and arms are common and may appear odd and paganish to a person not familiar with the subtleties of Indian spiritual tradition. Brahma and Vishnu have been described as having four faces, Shiva with five, Kartikeya with six, Durga with eight and Ganesha with ten heads. It is said that the demon king Ravana had ten heads and twenty arms; and sahastrabahu, another demon had a thousand hands.
Here, the numbers do not refer to the physiology, but to characteristics of the divine or evil attributes of the deities or demons as the case may be.
Indian spirituality frequently mentions five-fold classifications - such as the five basic elements of the cosmos (Tatvas); the five sheaths (Koshas) covering the human soul; the five organs each of perception and action in the human body (Gyanendriyas and Karmendriyas), the five life-forces (Prans); the five types of energies operating in human bodies (Agnis); the five types of Yoga ....etc. The Gayatri Mantra, too is divisible in five parts namely (1) Om (2) Bhurbhuwaha Swaha (3) Tatsaviturvareniyam (4) Bhargo Devasya Dheemahi (5) Dhiyo Yonaha Prachodayat. Each of these corresponds to the five primary emanation of the supreme spirit: Ganesh, Bhawani, Brahma, Vishnu and Mahesh respectively. The entire super-science of spirituality too is encapsuled in the four Vedas and one Yagya.
The five faces of Gayatri refer to these Divine attributes, which the Sadhak has to deal with in course of Sadhana.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 20
मंगलवार, 12 नवंबर 2019
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (अन्तिम भाग)
सन्तुलित मस्तिष्क का तात्पर्य भावना रहित बन जाना नहीं है। भले-बुरे को एक दृष्टि से देखने जैसी समदर्शिता की दुहाई देना भी सन्तुलन नहीं है। बुरे के प्रति सुधार और भले के प्रति उदार रहकर ही सन्तुलन बना रह सकता है। आँखों के सामने तात्कालिक लाभ का पर्दा उठ जाने, शरीर को ही सब कुछ मानकर उसी के परिकर को पोषित करते रहने की मोह माया ही भ्रान्तियों के ऐसे भण्डार जमा करती है जिन्हें विकृतियों का रूप धारण करते देर नहीं लगती। यही वह आँधी और तूफान है जिसके कारण उठने वाले चक्रवात समस्वरता बिगाड़कर रख देते है और ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कुचक्र में फँसने के उपरान्त मनुष्य न जीवितों में रहे न मृतकों में, न बुद्धिमानों में गिना जा सके और व विक्षिप्तों में।
मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।
मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।
मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 अन्तःलोक का आलोक
हवा के एक झोंके ने मिट्टी का दीया बुझा दिया। मिट्टी के दीयोंं का भरोसा भी क्या? कब टूटे और बिखरकर मिट्टी में मिल गए। उन ज्योतियों का साथ भी कितना, जिन्हें हवाएँ जब-तब बुझा सकती हैं। ज्योति के बिना जीवन अँधेरों में डूब जाता है। ये अँधेरे सदा ही भयावह होते हैं। जिन्हें अनुभव है, वे जानते हैं कि अँधेरे में प्राण कँप जाते हैं और साँसें लेना भी कठिन हो जाता है।
जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्येातियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती है और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हंैं।
अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है, तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।
याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप रही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक, चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२२
जीवन ही नहीं जगत् भी अँधेरे से घिरा है। ऐसी कोई भी ज्योति इस जगत् में नहीं है, जो अँधेरे को पूरी तरह मिटा दे। जो भी ज्येातियाँ हैं, उन्हें देर-सबेर हवाओं के झोंके अँधेरों में डुबा देते हैं। ये जलती है और बुझ जाती हैं, पर अँधेरे की सघनता जस की तस बनी रहती है। जगत् में फैला हुआ अँधेरा शाश्वत है। जो इस जगत् की ज्योतियों पर भरोसा करते हैं, वे नासमझ हैं, क्योंकि ये ज्योतियाँ सब की सब आखिरकार अँधेरे से हार जाती हंैं।
अंधकार से भरे इस जगत् से परे एक और लोक भी है। जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है। इस बाहरी जगत् में प्रकाश क्षणिक और सामयिक है एवं अँधेरा शाश्वत है, तो इस आन्तरिक जगत् में अंधकार क्षणिक व सामयिक है और प्रकाश शाश्वत है। अचरज की बात यह है कि यह प्रकाश लोक हमारे बहुत निकट है, क्योंकि अंधकार बाहर है और प्रकाश भीतर।
याद रहे, जब तक अन्तःलोक के आलोक में जागरण नहीं होता, तब तक कोई भी ज्योति अभय नहीं दे पाती। जरूरत इस बात की है कि मिट्टी के मृण्मय दीपों पर भरोसा छोड़ा जाय और चिन्मय ज्योति को खोजा जाय। क्योंकि यही अभय, आनन्द और आलोक का स्रोत है। अँधेरे से घबराहट और आलोक की चाहत यह जताती है कि हमारी वास्तविकता प्रकाश ही है। क्योंकि आलोक ही आलोक के लिए प्यासा हो सकता है। जहाँ से प्रकाश की चाहत पनप रही है, वहीं खोजो, अन्तःलोक का आलोक, चिन्मय ज्योति का स्रोत वहीं छिपा है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२२
👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 4)
Q.6. Why is the Primordial Divine Energy (Gayatri) represented in so many forms (idols)?
Ans. God is omnipresent. The primordial Divine Energy symbolized as Gayatri take up numerous forms and functions in innumerable ways. The analogy of an actor will illustrate the point. An actor in a play has to wear different costumes on various occasions to portray different roles. For each role, he is made to don specific garments with appropriate ornamentation and adopts suitable histrionics. The person chooses the deity according to one’s need. During Trikal Sandhya for instance, the trinity Brahmi - Vaishnavi - Shambhavi is invoked. Aspirants for strength and success in worldly pursuits worship Durga; for prosperity, Lakhyami; for scholarship and cultural excellence, Saraswati; and so on.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 19
Ans. God is omnipresent. The primordial Divine Energy symbolized as Gayatri take up numerous forms and functions in innumerable ways. The analogy of an actor will illustrate the point. An actor in a play has to wear different costumes on various occasions to portray different roles. For each role, he is made to don specific garments with appropriate ornamentation and adopts suitable histrionics. The person chooses the deity according to one’s need. During Trikal Sandhya for instance, the trinity Brahmi - Vaishnavi - Shambhavi is invoked. Aspirants for strength and success in worldly pursuits worship Durga; for prosperity, Lakhyami; for scholarship and cultural excellence, Saraswati; and so on.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 19
सोमवार, 11 नवंबर 2019
👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग ५)
उत्कृष्ट व्यक्तित्व का एक ही पक्ष है- भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का दमन, न्यूनतम निर्वाह की अपरिग्रह परम्परा का वरण। जिनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएँ अभिलाषाएँ, तृष्णा, लिप्साएँ असाधारण रूप से उभरी होती है, उनके लिए यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता कि वे नीति-नियमों का व्यतिरेक न करें। इसी प्रकार यह भी नहीं बन पड़ता कि समय, श्रम या साधनों का उपार्जन से कम उपयोग अपने लिए करें और उस बचत को उच्च स्तरीय प्रयोजनों के लिए नियोजित करें। लिप्सा में भौतिक दोष यह है कि उसकी तृप्ति की कोई मर्यादा नियत नहीं रहती। कमी कभी दूर नहीं होती और अधिक कमाने, जोड़ने, उड़ाने की व्याकुलता उसी अनुपात से बढ़ती चली जाती है। फल यह होता है कि आदर्शवादिता की मात्र उथली चर्चा या खोखली विडम्बना ही बन पाती है। वैसा कोई ठोस प्रयत्न नहीं बन पड़ता जैसा कि उत्कृष्ट जीवन के लिए अपेक्षित है। अतएव निस्पृह जीवन के लिए यह अनिवार्य है कि भौतिक आकाँक्षाओं और आवश्यकताओं को उतना नियन्त्रित किया जाय कि वे लगभग औसत नागरिक स्तर की जा पहुँचे। आत्म-निर्माण का, आत्म-परिष्कार का सुनियोजन इससे कम में नहीं बन पड़ता।
अध्यात्म जीवन जीने की एक शैली है। पूजा उपचार उसके लिए भावनात्मक पृष्ठभूमि बनाने वाले उपचार हैं। उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को याचना, रिश्वत, जेबकटी, बाजीगरी के रूप में जो अपनाते हैं, वे भूल करते हैं। देवताओं को मन्त्रबल से वशवर्ती बनाकर उनसे उचित अनुचित कुछ करा लेने की दुरभिसन्धि में नियत व्यक्ति जब अपनी दुरभिसन्धियों को भक्ति भावना, योग साधना आदि का नाम देते हैं, तब हँसी रोके नहीं रुकती। बाल क्रीड़ाओं से यदि ऊँचा उठा जा सके, तो अध्यात्म का एक मात्र यही स्वरूप रहा जाता है कि व्यक्तित्व को अधिकतम पवित्र, प्रखर एवं उदात्त बनाया जाय। जो क्षमता विभूतियाँ उपलब्ध हैं उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जाय। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श हर घड़ी सामने रखकर अपनेपन का दायरा इतना बड़ा बना दिया जाय कि आत्मवत् सर्वभूतेषु की प्रतीति होने लगे। दूसरों के दुःख को बँटा लेने और अपने सुख को बाँट देने की उमंग इतनी उमगे कि उसे रोक सकने में संकीर्ण स्वार्थपरता कोई व्यवधान प्रस्तुत न कर सकें।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अध्यात्म जीवन जीने की एक शैली है। पूजा उपचार उसके लिए भावनात्मक पृष्ठभूमि बनाने वाले उपचार हैं। उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को याचना, रिश्वत, जेबकटी, बाजीगरी के रूप में जो अपनाते हैं, वे भूल करते हैं। देवताओं को मन्त्रबल से वशवर्ती बनाकर उनसे उचित अनुचित कुछ करा लेने की दुरभिसन्धि में नियत व्यक्ति जब अपनी दुरभिसन्धियों को भक्ति भावना, योग साधना आदि का नाम देते हैं, तब हँसी रोके नहीं रुकती। बाल क्रीड़ाओं से यदि ऊँचा उठा जा सके, तो अध्यात्म का एक मात्र यही स्वरूप रहा जाता है कि व्यक्तित्व को अधिकतम पवित्र, प्रखर एवं उदात्त बनाया जाय। जो क्षमता विभूतियाँ उपलब्ध हैं उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जाय। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श हर घड़ी सामने रखकर अपनेपन का दायरा इतना बड़ा बना दिया जाय कि आत्मवत् सर्वभूतेषु की प्रतीति होने लगे। दूसरों के दुःख को बँटा लेने और अपने सुख को बाँट देने की उमंग इतनी उमगे कि उसे रोक सकने में संकीर्ण स्वार्थपरता कोई व्यवधान प्रस्तुत न कर सकें।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 साधना से सिद्धि
साधना की गयी पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेकों साधकों की विकलता यही है। लगातार सालों-साल साधना करने के बाद वे सोचने लगते हैं, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है? ऐसे अनेकों प्रश्न कंटक उनके अन्तःकरण में हर पल चुभते रहते हैं। निरन्तर की चुभन से उनकी अन्तरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है। बड़ी ही असह्य होती है चुभन और रिसन की यह पीड़ा। बड़ा ही दारुण होता है यह दर्द।
महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसी ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विकलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह एक खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। रात प्रायः बीत गयी थी। खेतों पर सुबह का सूरज फैलने लगा था। पास से गुजरती बैलगाड़ी की आवाज सुनकर चाँदनी के फूलों-सी बगुलों की पात सूरज की ओर उड़ गयी। इनकी ओर उसने बड़ी ही निराश नजरों से देखा। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिये।
उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा- गुरुदेव! मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान् मुझसे इतना रूठे क्यों हैं? महायोगी हँसे और कहने लगे-पुत्र! कल मैं एक बगीचे में गया था। वहाँ कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएँ में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम पड़ा। लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हँसने लगे।
मैंने देखा-यह बाल्टी तो ठीक मनुष्य के अन्तःकरण जैसी है, इसमें छेद ही छेद हैं। बस यह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएँ में गयी, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष, दुर्गुणों को दूर करो।
पहले संयम-तब साधना -फिर सिद्धि। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इन्कार नहीं है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११९
महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसी ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विकलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह एक खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। रात प्रायः बीत गयी थी। खेतों पर सुबह का सूरज फैलने लगा था। पास से गुजरती बैलगाड़ी की आवाज सुनकर चाँदनी के फूलों-सी बगुलों की पात सूरज की ओर उड़ गयी। इनकी ओर उसने बड़ी ही निराश नजरों से देखा। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिये।
उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा- गुरुदेव! मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान् मुझसे इतना रूठे क्यों हैं? महायोगी हँसे और कहने लगे-पुत्र! कल मैं एक बगीचे में गया था। वहाँ कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएँ में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम पड़ा। लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हँसने लगे।
मैंने देखा-यह बाल्टी तो ठीक मनुष्य के अन्तःकरण जैसी है, इसमें छेद ही छेद हैं। बस यह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएँ में गयी, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष, दुर्गुणों को दूर करो।
पहले संयम-तब साधना -फिर सिद्धि। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इन्कार नहीं है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११९
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