बुधवार, 6 मार्च 2019

👉 प्रपंच की माया

प्रपंच की माया जादुई है। इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले बच पाते हैं। ज्यादातर इसमें उलझकर भ्रमित होते हैं। उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि वे भ्रम में भटके हुए हैं। जीवन के बहुमूल्य क्षणों को खो रहे हैं, जीवन लक्ष्य से दूर हो रहे हैं। प्रपंच की मायावी मुस्कानों में, इससे उपजे हंसी ठहाकों में जीवन ठगा जाता है। जिन्दगी की उजली सम्भावनाएँ कब पतन के अंधेरों में समा जाती हैं, पता ही नहीं चलता।
  
इसकी पहचान आसान नहीं है। परचर्चा से इसकी शुरुआत होती है। परनिन्दा का रस इसमें घुलने से इसके नशे का नशीलापन गाढ़ा, मायावी और जादुई बनता है। परचर्चा और परनिन्दा का घुला-मिला रूप ही प्रपंच है। इसकी मायावी चकाचौंध में सबसे पहले जीवन की विवेक दृष्टि खोती है। जीवन लक्ष्य की स्मृति विलीन होती है। फिर अनायास ही द्वेष दुर्मति एवं दुर्बुद्धि पनप जाते हैं। इसके मायावी जादू से मित्र, शत्रु नजर आते हैं और भटकाने वाले प्रपंची जन सगे-सम्बन्धी लगने लगते हैं।
  
प्रपंच के अंकुर कभी भी, कहीं भी, किसी में भी फूट निकलते हैं। बस इसके विषय बीजों के लिए परचर्चा और परनिन्दा का खाद-पानी चाहिए। इसकी विषवल्लरी के उपजते, पनपते और पल्लवित होते ही व्यक्ति आत्मविमुख व ईश्वर विमुख हो जाता है। अन्तःकरण में इसके जन्मते ही ईश्वर और आत्मा केवल दो शब्द बनकर रह जाते हैं। इनका अर्थ खो जाता है। प्रपंच की इस माया में सामान्य जन ही नहीं, साधक भी उलझकर भ्रमित होते और भटकने लगते हैं।
  
उनकी साधना बातों और कर्मकाण्ड तक सिमट जाती है। साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रंपच चूसता रहता है। इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं। परनिन्दा करि विष रस भरही॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं। इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है। सन्त कवि तुलसी के वचनों में सभी के लिए सीख है- ‘परचर्चा, परनिन्दा तजि, भजुहरि’ अर्थात् परचर्चा और परनिन्दा को छोड़कर हरि को भजो। तभी प्रपंच की जादुई माया से छुटकारा मिलेगा। मोक्ष की तात्त्विक अनुभूति होगी।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 112

👉 आज का सद्चिंतन 6 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 March 2019


👉 ज्ञान-यज्ञ इस युग का महानतम अभियान

मनुष्य की मूल शक्ति विचारणा है। उसी के आधार पर इतनी प्रगति कर सकना उसके लिए सम्भव हुआ है। समस्याएँ विचारों की विकृति से उत्पन्न होती हैं और उनका समाधान दृष्टिकोण बदलने से निकलता है। सचमुच जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बनकर रहता है। सोचने की दिशा में ही क्रिया बनती है और उसी की परिणति परिस्थितियों के रूप में सामने आती है। परिस्थितियों का अपने आप में कोई स्वतंत्र आधार नहीं है। वे हमारे कर्तृत्व का परिणाम मात्र हैं। इसी प्रकार कर्तृत्व भी अपने आप नहीं बन जाता है, विचारों की प्रेरणा ही हमारी कार्य पद्धति के लिये पूरी तरह उत्तरदायी होती है। इस तथ्य को समझ लेने पर ही आज की मानवीय समस्याओं का कारण और निवारण ठीक तरह समझा जा सकता है।

खेद है कि अब तक इस प्रकार का चिन्तन नहीं के बराबर हुआ है जो हुआ है उसको महत्त्व नहीं दिया गया। हमारे मूर्धन्य व्यक्ति इतना भर सोचते रहे है कि शासनतंत्र के माध्यम से सुविधा-साधन बढ़ा देने से मनुष्य सुखी रहने लगेगा और अपनी उलझनें सुलझा लेगा। पर देखते हैं कि वह मान्यताएँ गलत सिद्ध होती चली जा रही हैं। शासन तंत्र को सुधारने के लिये जितने हाथ-पैर पीटे जाते हैं उतनी ही उससे विकृतियाँ उत्पन्न होती चली जा रही हैं। अर्थ-तंत्र से नि:संन्देह कई प्रकार की सुविधाएँ उत्पन्न की हैं पर परिणाम उलटा ही रहा है। तथाकथित प्रगति की जड़ें बिलकुल खोखली हैं, किसी भी धक्के में वह लडख़ड़ा सकती है। स्थायी प्रगति और सुदृढ़ समर्थता के लिए चरित्र बल होना चाहिए और वह उत्कृष्ट विचारणा की भूमि पर ही उग सकता है।

ज्ञान-यज्ञ देखने-सुनने में छोटी बात लगती है, पर उसकी सम्भावनाएँ उतनी विशाल हैं कि यदि ठीक तरह इस अभियान को चलाया जा सका तो विश्वास है कि लोक-मानस में विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की गहरी स्थापना सम्भव हो सकेगी और नये युग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सकेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-66 (4.44-46)

👉 Gyan Yagya The greatest movement of the present Era

The core power of the human beings is the thought process. This has made it possible for the mankind to make so much of progress accomplished until now. Problems arise as a result of abnormalities or anomalies in thoughts and can be resolved by changing the way of thinking. A person really becomes the way he/she thinks. The direction of thoughts defines the deeds and the deeds give rise to relevant situations or circumstances we come across. The circumstances do not have any independent existence. They are merely the product of our deeds. Similarly, the actions do not take place automatically, they are driven by our thoughts which are totally responsible for our deeds. The true understanding of this fundamental truth can help us find the causes and solutions of all the present day problems.

It is very unfortunate that a very little thinking of this kind has ever been done so far and that too hasn’t been accorded much significance it deserves. The leaders kept on thinking that improving comforts and facilities (the standards of living) would make people happy and at ease, enabling them to solve their problems themselves.But it is well evident that this kind of misconceptions have proven wrong. The efforts made to improve the material standards of the administration have ended up with even more irregularities being committed.

The improved economy has no doubt yielded more facilities and conveniences but the ultimate outcome has always been the opposite.Such progress is superficial and fragile and can easily fall to pieces. A long-lasting progress and powerful capabilities need a very powerful character which can only develop on the solid foundation of eminent thinking.

The Gyan-yagya# can nurture with such thoughts. It may seemingly appear to be trivial campaign but has so much immense potential that if it can be run and managed properly, it could facilitate sound establishment of prudent thinking and noble deeds among the masses which can ultimately make the dream of a new era come true.

#A selfless work or campaign of disseminating life-elevating thoughts or knowledge

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna-Philosophy,structure and Planning-66(4.44-46)

👉 अवसर का प्रतीक चित्र:-

एक बार एक कलाकार ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई। उसे देखने के लिए नगर से सैकड़ों धनी- मानी व्यक्ति भी पहुँचे। एक लड़की भी उस प्रदर्शनी को देखने आई। उसने देखा सब प्रतीक- चित्र टँगा है जिसके मुँह को बालों से ढक दिया गया है और जिसके पैरों पर पंख लगे थे। चित्र के नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था ''अवसर''। चित्र कुछ भद्दा सा था इसलिए लोग उस पर उपेक्षित दृष्टि डालते और आगे बढ़ जाते।

लड़की का ध्यान प्रारम्भ से ही इस चित्र की ओर था। जब वह उसके पास पहुँची तो चुपचाप बैठ कलाकार से पूछ ही लिया- 'श्रीमान् जी यह चित्र किसका है? आपने इसका मुँह क्यों ढक रखा है तथा उसके पैरों में पंखों का क्या रहस्य है?' कलाकार ने जवाब दिया- 'बेटी। यह ''अवसर'' का चित्र है। चूँकि साधारण व्यक्ति इसे पहचान नहीं पाते।'' अत: मैंने इसका मुँह ढक रखा है ताकि इसे देखकर जिज्ञासा तो उठे। पैरों में पंख इसलिए कि यह अवसर जो आज  चला गया, कल फिर आयेगा नहीं। इसलिए इसे उड़ने से पहले ही थाम लो। इसका सदुपयोग कर लो।'' लड़की ने मर्म को समझा और तत्क्षण ही अपने जीवन निर्माण में जुट गयी।

काल ही जीवन है। काल पर वस्तुत: किसी का बस नहीं।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1)

अवतार का लीला-संदोह

बुद्ध के बुद्धवाद का स्वरूप 'विचार क्रान्ति' था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा का सम्मान करते हुए लाखों व्यक्तियों ने उसमें भाव भरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी, हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त, आम्ब्रपाली जैसी कलाकार, अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में उस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था, क्योंकि समस्यायें छोटी और स्थानीय थीं। बुद्ध-काल तक समाज का विस्तार बडे क्षेत्र में हो गया था। इसलिए बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास सम्भव था, उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तन भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।

प्रज्ञावतार-बुद्धावतार का उत्तरार्ध है। बुद्धि प्रधान युग की समस्यायें भी चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़मान्यता से विरत करने वाली ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।

आज आस्था संकट के कारण मनुष्य सुख-समृद्धि से सम्पन्न होने के बावजूद जिस जंजाल में स्वयं फँसा हुआ है एवं अन्यों के लिए विपत्ति का कारण बना हुआ है, उसका निवारण आस्था, प्रज्ञारूपी अस्त्र द्वारा ही सम्भव है।

परस्पर सम्वाद में वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर भगवान् इसीलिए प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की परिस्थितियाँ देवर्षि को समझौते हैं और पिछले अव्रतारों का स्मरण दिलाते हुए इस बार भी विभाषिका निवारण हेतु अपनी शक्तियों को सन्तुलन स्थापना के लिए आवश्यक प्रतिपादित करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 15

मंगलवार, 5 मार्च 2019

👉 एक खूबसूरत सोच

मात्र कुढ़ते रहने से, चिन्ता की चादर ओढ़कर निष्क्रिय हो जाने से और मन ही मन कुड़ बुड़ाते रहने से किसी को रत्ती भर लाभ न तो कभी हुआ है न कभी आगे होने वाला है।

इसलिए ऐ परमेश्वर के प्यारे पुत्रों! जिन्दा ही मर जाने की बजाय तुम मरकर भी जीवित बने रहने की विद्या का अभ्यास करो। निष्क्रियता की घुटन का घेरा तोड़कर उत्फुल्ल क्रियाशीलता की खुली हवा में साँस लेना सीखो।

रेशम का कीड़ा अपना कोया खुद बुनता है और फिर उसी में घुटकर मर जाता है। घुटन की छटपटाहट से उबरने के लिए वह भी शायद हमारी ही तरह कभी विधाता, कभी व्यवस्था और कभी पड़ौसी को कोसता होगा। हमारे मन रूपी कीड़े को भी अपने ही बनाये कोयों की कैद में बंधना-घुटन पड़ता है।
‘कोयाबन्दी’ की निष्क्रियता के अँधेरे बंद तहखानों से निकलकर ऊपर आओ, ‘मानसिक कालकोठरी’ के वातायनों को सूर्य की ऊष्मा और स्वच्छ सुरभित पवन का स्वागत करने दो। तुम्हारे कुस्वास्थ्य का यही एक मात्र निदान है।

जाओ और यही संदेश अपने संपर्क में आने वाले जन-जन तक पहुंचाओ ताकि जहाँ-जहाँ भी किसी प्रकार की बुराई हो उसे दूर करने में अपनी-अपनी सीमा और शक्ति भर वे सक्रिय सहयोग दे सकें। उनकी समस्त सामर्थ्य केवल हवा के साथ लड़ने में ही व्यर्थ न चली जाये।

सेन्ट पाल

👉 आज का सद्चिंतन 5 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 March 2019


👉 चिंतन

एक बकरी के पीछे शिकारी कुत्ते दौड़े। बकरी जान बचाकर अंगूरों की झाड़ी में घुस गयी। कुत्ते आगे निकल गए।
              
बकरी ने निश्चिंतापूर्वक अँगूर की बेले खानी शुरु कर दी, और जमीन से लेकर अपनी गर्दन पहुचे उतनी दूरी तक के सारे पत्ते खा लिए। पत्ते झाड़ी में नहीं रहे। छिपने का सहारा समाप्त् हो जाने पर कुत्तो ने उसे देख लिया और मार डाला !!             
      
सहारा देने वाले को जो नष्ट करता है, उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।
       
मनुष्य भी आज सहारा देने वालीं जीवन दायिनी नदियां, पेड़ पौधो, जानवर, गाय, पर्वतो आदि को नुकसान पंहुचा रहा है और इन सभी का परिणाम भी अनेक आपदाओ के रूप में भोग रहा है।

प्राकृतिक सम्पदा बचाओ
अपना कल सुरक्षित करो

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 27 से 30

अवतार का लीला-संदोह

अवतार प्रक्रिया आदिकाल से चली आ रही है और आदिकाल से अब तक मनुष्य जाति ने अनेक प्रकार के उतार-चढाव देखे है। स्वाभाविक ही भिन्न-भिन्न कालों में समस्यायें और असन्तुलन भिन्न-भिन्न प्रकार के रहे है।

जिस प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हुई हैं, तब उसी का समाधान करने के लिए एक दिव्य चेतना, जिसे अवतार कहा गया है प्रादुर्भूत हुई है और उसी क्रम से अवतार, युग प्रवाह को उलटने के लिए अपनी लीलाएँ रचते रहे है। सृष्टि के आरम्भ में जल ही जल था। प्राणी जगत में जलचरों की ही प्रधानता थी, तब उस असंतुलन को मत्स्यावतार ने साधा। जब जल और थल पर प्राणियों की हलचलें बढी तो उनके अनुरूप क्षमता सम्पन्न कच्छप काया ने सन्तुलन बनाया। उन्हीं के नेतृत्व में समुद्र-मन्थन के रूप में प्रकृति दोहन का पुरुषार्थ सम्पन्न हुआ। हिरण्याक्ष  समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूँढ़कर उसे अपने ही एकाधिकार में कर लिया तो भगवान् का वाराह रूप ही उसका दमन करने में समर्थ-सक्षम हो सका। जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमाने में समर्थ हो गया तो संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित संचय की-प्रवृत्ति भी बढी। संचय और उपभोग की पशु प्रवृत्ति को उदारता में परिणत करने के लिए भगवान् वामन के छोटे बौने और पिछडे़ लोग उठ खड़े हुए और बलि जैसे सम्पन्न व्यक्तियों को स्वेच्छापूर्वक उदारता अपनाने के लिए सहमत कर लिया गया।

उच्छृंखलता जब उद्धत और उद्दण्ड हो जाती है तब शालीनता से उसका शमन नहीं हो सकता। प्रत्याक्रमण द्वारा ही उसका दमन करना पड़ता है। ऐसे अवसरों पर नरसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है। उन आदिम परिस्थितियों में भगवान् ने नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझा तथा नृसिंह अवतार के रूप में दुष्टता के दमन एवं सज्जनता के संरक्षण का आश्वासन पूरा किया'।

इसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध के अवतार आते हैं। इन सभी का अवतरण बढ़ते हुए अनाचरण के प्रतिरोध और सदाचरण के समर्थन-पोषण के उद्देश्य के लिए हुआ। परशुराम ने शस्त्र बल से सामन्तवादी निरंकुश आधिपत्य को समाप्त किया। राम ने मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया तो कृष्ण ने अपने समय की धूर्तता और छल-छद्म से घिरी हुई परिस्थितियों का दमन 'विषस्य विषमौषधम्' की नीति अपना कर किया। कृष्ण चरित्र में कूटनीतिक दूरदर्शिता की इसलिए प्रधानता है कि इस समय की परिस्थितियों में सीधी उँगली से घी नहीं निकल पा रहा था। इसलिए काटे से काँटा निकालने का उपाय अपनाकर अवतार प्रयोजन को पूरा करना पड़ा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 14

सोमवार, 4 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव (अन्तिम भाग)

भगवान् शिव का वाहन वृषभ है। वृषभ सौम्यता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है। तात्पर्य यह कि शिव का साहचर्य उन्हें मिलता है। जो स्वभाव से सरल और सौम्य होते हैं, जिनमें छल-छिद्र आदि विकार नहीं होते। साथ ही जिनमें आलस्य न होकर निरन्तर काम करने की दृढ़ता होती है। श्मशान में उनका निवास है अर्थात् वे मृत्यु को कभी भूलते नहीं। भगवान की शक्ति और नियमों को मृत्यु की तरह अकाट्य मानकर चलने में मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्तियां जागृत रहती हैं जिससे वह लौकिक कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी अपने जीवन-लक्ष्य की ओर निष्काम भाव से चलता रह सकता है। मृत्यु को लोग भूले रहते हैं, इसलिए कर्म करते हैं। इस महातत्त्व की उपासना का अर्थ अपने आपको बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिये प्रकाश बनाए रखना होता है। इस तरह की जीवन-व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पाई जाती है, शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियां धुली हुई होनी चाहिए।

यह प्रसंग भगवान् शिव की आध्यात्मिक शक्तियों पर प्रकाश डालते हैं। इनके साथ कथानक और घटनायें भी जुड़ी हुई हैं जो जीवन के आदर्शों की व्याख्या करती हैं इनमें से गंगावतरण की कथा मुख्य है। गंगाजी विष्णुलोक से आती हैं। यह अवतरण महान् आध्यात्मिक शक्ति के रूप में होता है। उसे संभालने का प्रश्न बड़ा विकट था। शिवजी को इसके उपयुक्त समझा गया और भगवती गंगा को उनकी जटाओं में आश्रय मिला। गंगाजी यहां ज्ञान की प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं। लोक-कल्याण के लिए उसे धरती पर प्रवाहित करने की बात है ताकि अज्ञान से मरे हुए लोगों को जीवन दान मिल सके पर उस ज्ञान को धारण करना भी तो कठिन बात थी जिसे शिव जैसा संकल्प-शक्ति वाला महापुरुष ही धारण कर सकता है। अर्थात् महान बौद्धिक क्रान्तियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श समाये हुए हों वही ब्रह्म-ज्ञान को धारण कर उसे लोक हितार्थ प्रवाहित कर सकता है।

गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिवजी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना है। सांसारिक व्यवस्था को चलाकर भी वे योगी रहते हैं। पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृशक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है। यहां उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्म-कल्याण की साधना असम्भव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हंसते खेलते पूरा किया जा सकता है।

यह सभी आदर्श इस बात की शिक्षा देते हैं कि मनुष्य शिव की तरह के पदार्थों और समाज में प्रचलित परम्पराओं का आध्यात्मिक मूल्यांकन करना सीख ले तो निस्सन्देह उसका शारीरिक और सामाजिक जीवन अधिकाधिक निरापद होता चला जायेगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव-जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं जिनके बिना मनुष्य-जीवन पाने का अर्थ हल नहीं होता। मनुष्य का धर्म उसकी विवेक-बुद्धि है जिसके सहारे वह ज्ञान-विज्ञान की ओर अग्रसर होता है और मनुष्य से देव बनने में समर्थ होता है। इस की सामर्थ्य प्राप्त करके ही आत्म कल्याण और लोक-हित की परम्परा जीवित रखी जा सकती है। यह सन्देश हमें आदिकाल से भगवान् शिव देते चले आ रहे हैं। इन आध्यात्मिक रहस्यों की ओर से हमें उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 143-145


#PragyeShwar_Mahadev 
#AWGP_Video_Gallery

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 March 2019


👉 आज का सद्चिंतन 4 March 2019

शनिवार, 2 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव (भाग 2)

शिव के स्वरूप, अलंकार और जीवन सम्बन्धी घटनाओं का और भी विशद् वर्णन मिलता है। ऐसे प्रत्येक प्रसंग में या तो किसी दार्शनिक तत्व का विवेचन सन्निहित है अथवा व्यावहारिक आचरण की शिक्षा दी गई है। आइये, इन पर एक-एक करके विचार किया जाये—

(1) शिव का स्वरूप— भगवान् शंकर के स्वरूप में जो विचित्रतायें हैं वह किसी मनुष्य की देह में सम्भव नहीं इसलिए उसकी सत्यता संदिग्ध मानी जाती है। पर हमें यह जानना चाहिये कि यह चित्रण सामान्य नहीं, अलंकार है जो मनुष्यों में योग-साधनाओं के आधार पर जागृत होते हैं।

(2) माथे पर चन्द्रमा— चन्द्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है अर्थात् योगी का मन सदैव चन्द्रमा की भांति उत्फुल्ल, चन्द्रमा की भांति खिला निःशंक होता है। चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है अर्थात् उसे जीवन की अनेक गहन परिस्थितियों में रहते हुए भी किसी प्रकार का विभ्रम अथवा ऊहापोह नहीं होता। वह प्रत्येक अवस्था में प्रमुदित रहता है, विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

(3) नीलकंठ— पुराणों में ऐसी कथा आती है कि देवों और दानवों का रक्तपात बचाने के लिए भगवान शंकर ने विष पी लिया था और तब से इनका कंठ नीला है अर्थात् इन्होंने विष को कंठ में धारण किया हुआ है। इस कथानक का भी सीधा साधा सम्बन्ध योग की सिद्धि से ही है। योगी पुरुष अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार पा लेता है, जिससे उसके स्थूल शरीर पर बड़े तीक्ष्ण विषों का भी प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह सामान्य मानकर ही पचा लेता है। यह बात इस तरह भी है कि संसार के मान अपमान, कटुता-क्लेश आदि दुख-कष्टों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह साधारण घटनायें मानकर आत्मसात् कर लेता है और संसार का कल्याण करने की अपनी आत्मिक वृत्ति में निश्चल भाव से लगा रहता है। दूसरे व्यक्तियों की तरह लोकोपकार करते समय उसे स्वार्थ आदि का कोई ध्यान नहीं होता। वह निर्विकार भावना की भलाई में जुटा रहता है। खुद विष पीता है पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है।
(4) विभूति रमाना— शिव ने सारे शरीर पर भस्म रमा रखी है। योग की पूर्णता पर संयम सिद्धि होती है। योगी अपने वीर्य को शरीर में रमा लेते हैं जिससे उसका सौन्दर्य फूट पड़ता है। इस सौन्दर्य को भस्म के द्वारा अपने आप में रमा लेता है। उसे बाह्य अलंकारों द्वारा सौन्दर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती। अक्षुण्ण संयम ही उसका अलंकार बन गया है, जिससे उसका स्वास्थ्य और शरीर सब कांतियुक्त हो गये हैं।
(5) तृतीय नेत्र— योग की भाषा में इसे नेत्रोन्मीलन या आज्ञा-चक्र का जागरण भी कहते हैं। उसका सम्बन्ध गहन आध्यात्मिक जीवन से है। घटना प्रसंग जुड़ा हुआ है कि शिवजी ने एक बार तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भी जला दिया था योगी का यह तीसरा नेत्र यथार्थ ही बड़ा महत्व रखता है। सामान्य परिस्थितियों में वह विवेक के रूप में जागृत रहता है, पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि कामवासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं कर पाते। उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है। इसे वैज्ञानिक बुद्धि का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। पर सबका तात्पर्य यही है कि तृतीय नेत्र होना साधारण क्षमता से उठाकर विशिष्ट श्रेणी में पहुंचा देना है। भारतीय संस्कृति का यह वैज्ञानिक पहलू कहीं अधिक मूल्यवान् भी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 141-142

👉 आज का सद्चिंतन 2 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 March 2019


👉 कालिदास की कथा

कालिदास एक गया बीता व्यक्ति था, बुद्धि की दृष्टि से शून्य एवं काला कुरूप। जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। जंगल में उसे इस प्रकार बैठे देख राज्य सभा से विद्योत्तमा अपमानित पण्डितों ने उस विदुषी को शास्त्रार्थ में हराने व उसी से विवाह कराने का षड्यन्त्र रचने के लिए कालिदास को श्रेष्ठ पात्र माना। शास्त्रार्थ में अपनी कुटिलता से उसे मौन विद्वान् बताकर उन्होंने प्रत्येक प्रश्न का समाधान इस तरह किया कि विद्योत्तमा ने उस महामूर्ख से हार मान उसे अपना पति स्वीकार कर लिया।

पहले ही दिन जब उसे वास्तविकता का पता चला जो उसने उसे घर से निकाल दिया। धक्का देते समय जो वाक्य उसने उसकी भर्त्सना करते हुए कहे- वे उसे चुभ गये। दृढ़ संकल्प- अर्जित कर वह अपनी ज्ञान वृद्धि में लग गया। अन्त में वही महामूर्ख अपने अध्ययन से कालान्तर में महाकवि कालिदास के रूप में प्रकट हुआ और अपनी विद्वता की साधना पूरी कर विद्योत्तमा से उसका पुनर्मिलन हुआ।

लेकिन जो अवसर की महत्ता नहीं पहचानते, उन्हें तो अन्तत : पछताना ही पड़ता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 27 से 30


यदा मनुष्यो! नात्मानमात्मनोद्धर्तुमर्हति ।
कृतावतारोऽलं तस्य स्थितो: सशोधयाम्यहम्॥२७॥
क्रमेऽस्मिन्सुविधायुक्ता: साधनै: सहिता:नरा:।
विभीषिकायां नाशस्याऽनास्थासंकटपाशिता:॥२८॥
तन्निवारणहेतोश्च कालेऽस्मिंश्चलदलोपमें ।
प्रज्ञावताररुपेऽवतराम्यत्र तु पूर्ववत्॥२९॥
त्रयोविंशतिवारं यद्भ्रष्टं सन्तुलनं भुवि ।
संस्थापितं मयैवैतद् भ्रष्टं सन्तुलयाम्यहम्॥३०॥

टीका:- जब मनुष्य अपने बल-बूते दल-दल से उबर नहीं पाते तो मुझे अवतार लेकर परिस्थितियाँ सुधारनी पड़ती हैं? इस बार सुविधा-साधन रहते हुए भी मनुष्यों को जिस विनाश विभीषका में फँसना पड़ रहा हैं उसका मूल कारण आस्था-संकट ही हैं। उसके निवारण हेतु मुझे इस अस्थिर, समय में इस बार प्रज्ञावतार के रूप में अवतरित होना है। पिछले तेईस बार की तरह इस बार भी बिगड़े सन्तुलन को फिर संभालना है ॥२७-३०॥

व्याख्या:- मानवी पुरुषार्थ की भी अपनी महिमा-महत्ता है। लेकिन जब मनुष्य दुर्बुद्धि जन्य विभीषिकाओं के सामने स्वयं को विवश-असहाय अनुभव करता है, तब परिस्थितियाँ अवतार प्रकटीकरण की बनती हैं। भगवान ने हर बार मानवता के परित्राण हेतु असंतुलन कि स्थिति में अवतार लिया है और सृष्टि की डूबती नैया को पार लगाया है।

सृष्टा अपनी अद्भुत कलाकृति विश्व-वसुधा को, मानवी सत्ता को, सुरभ्य वाटिका को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही बचाता और अपनी सक्रियता का परिचय देता है तथा परिस्थितियों को उलझने का चमत्कार उत्पन्न करता है। यही अवतार है। संकट के सामान्य स्तर से तो मनुष्य ही निपट लेते है, पर जब आसामान्य स्तर की विपन्नता उत्पन्न हो जाती है तो सृष्टा को स्वयं ही अपने आयुध सम्भालने पड़ते है। उत्थान के साधन जुटाना भी कठिन है पर पतन के गर्त में द्रुतगति से गिरने वाले लोक मानस को उलट देना अति कठिन है। इस कठिन कार्य को सृष्टा ने समय-समय पर स्वयं ही सम्पन्न किया है। आज की विषम वेला भी अवतरण की परम्परा का निर्वाह करते हुए अपनी लीला संदोह प्रस्तुत करते कोई भी प्रज्ञावान प्रत्यक्ष देख सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 14

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...