सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

👉 मनःस्थिति के अनुरूप ही चुनाव

🔷 एक सिद्ध पुरुष नदी में जान कर रहे थे। एक चुहिया पानी में बहती आई। उनने उसे निकाल लिया। कुटिया में ले आये और वह वहीं पल कर बड़ी होने लगी।

🔶 चुहिया सिद्ध सिद्ध पुरुष की करामातें देखती रही, सो उसके मन में भी कुछ वरदान पाने की इच्छा हुई। एक दिन अवसर पाकर बोली- ''मैं बड़ी हो गई, किसी वर से मेरा विवाह करा दीजिए।''

🔷 संत ने उसे खिड़की में से झाँकते सूरज को दिखाया और कहा-''इससे करा दें।'' चुहिया ने कहा-''यह तो आग का गोला है। मुझे तो ठंडे स्वभाव का चाहिए।'' संत ने बादल की बात कही-''वह ठंडा भी है, सूरज से बड़ा भी। वह आता है, तो सूरज को अंचल में छिपा लेता है।'' चुहिया को यह प्रस्ताव भी रुचा नहीं। वह इससे बड़ा दूल्हा चाहती थी।

🔶 संत ने पवन को बादल से बड़ा बताया, जो देखते- देखते उसे उड़ा ले जाता है। उससे बड़ा पर्वत बताया, जो हवा को रोक कर खड़ा ले जाता है। जब चुहिया ने इन दोनों को भी अस्वीकार कर दिया, तो- सिद्ध पुरुष ने पूरे जोश-खरोश के साथ पहाड़ में बिल बनाने का प्रयास करते चूहे को दिखाया। चुहिया ने उसे पसंद कर लिया, कहा-''चूहा पर्वत से भी श्रेष्ठ है; वह बिल बनाकर पर्वतों की जड़ खोखली करने और उसे इधर से उधर लुढ़का देने में समर्थ रहता है।

🔷 एक मोटा चूहा बुलाकर संत ने चुहिया की शादी रचा दी। उपस्थित दर्शकों को संबोधित करते हुएसंत ने कहा-''मनुष्य को भी इसी तरह अच्छे से अच्छे अवसर दिए जाते हैं, पर वह अपनी मन:स्थिति के अनुरूप ही चुनाव करता है।''

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 8

👉 आज का सद्चिंतन 15 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 October 2018


👉 धर्म और आधुनिक विज्ञान

“स्पष्ट है कि जो भी धर्म अथवा दर्शन आधुनिक विज्ञान के प्रतिकूल होगा वह पाखण्ड और दम्भ बनकर रह जाएगा। यदि हम मानव प्रगति को दृढ़ आधार पर सुरक्षित रखना चाहते है तो विज्ञान और धर्म तथा राजनीति और धर्म के बीच पाई जाने वाली समस्त विसंगति का अन्त किया जाना चाहिये। जिससे समन्वित विचार और भावनाओं की प्रतिष्ठा हो सके। भारत में एक धर्म मूलक दर्शन प्रस्तुत है जो स्वयं सभ्यता के समान पुरातन है। वह विज्ञान के असाधारण अनुकूल है, यद्यपि विदेशियों को यह दावा विलक्षण प्रतीत हो सकता है। उस धर्म मूलक दर्शन से एक नीतिशास्त्र विकसित हुआ है, जो अधिक न्यायपूर्ण सामाजिक तथा आर्थिक संगठन का दृढ़ आध्यात्मिक आधार बनने योग्य है। यह एक असाधारण बात है कि विकास के सिद्धान्त का और नियम के शासन का- जिस रूप में उसे वैज्ञानिक जानते है- निरूपण हिन्दू धर्म में पहले ही कर दिया गया है। वेदान्त का परमात्मा मनुष्य की कल्पना द्वारा उत्पन्न और मानव-रूप-आरोपित परमात्मा नहीं है। गीता में ईश्वर के प्रभुत्व की व्याख्या ऐसी भाषा में की गई है, जिसमें आधुनिक विज्ञान द्वारा धार्मिक विश्वोत्पत्ति शास्त्र के विरुद्ध उठाई गई आपत्तियों का अनुमान और समाधान निहित है।”

~ राजगोपालचार्य

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 26)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔷 सतयुग-ऋषियुग था। ऋषियों के पास तपोबल ही एकमात्र शस्त्र था। वृत्तासुर के अनाचार पर दधीचि ऋषि की अस्थियों से बना वज्र इतना प्रचण्ड प्रहार कर सका था कि उसे इन्द्र वज्र का नाम दिया गया और उसने वृत्तासुर की व्यापक अवांछनीयता को निरस्त करके रख दिया। अपने समय में विश्वामित्र ने भी ऐसा तपयज्ञ सम्पन्न किया था, जिससे उस समय की व्यापक असुरता का निराकरण सम्भव हुआ और त्रेता में सतयुग की सुसंस्कारिता वापिस लौट आई। भगीरथ का तप ऐसे ही सत्परिणामों का माध्यम बना था।
      
🔶 अभी कुछ दिन पूर्व योगी अरविन्द, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस स्तर की आत्माओं ने प्रचण्ड अध्यात्म का मार्ग अपनाया और इसी कारण भारत को नया आश्वासन देने वाले दर्जनों महामानव एक साथ उत्पन्न हुए थे। बुद्ध की साधना को भी तत्कालीन वातावरण में भारी हेर-फेर कर सकने वाली माना जा सकता है।
  
🔷 विगत ५० वर्षों में इतने सहयोगी, अनुगामी उत्पन्न हुए हैं कि उनके ऊपर भौतिक स्तर पर महाक्रान्ति की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है और हमें उच्चस्तरीय तपश्चर्या के लिए अवसर मिल सकता है। सो मार्गदर्शक के अनुसार सन् ९० के वसन्त से अपने लिए एक मात्र कार्य सूक्ष्म जगत में भावनात्मक परिवर्तन लाने के लिए आज की परिस्थितियों के अनुरूप विशिष्ट स्तर की तप-साधना करने के लिए निर्देश मिला है। सो, उसी दिन से उस प्रयोग को तत्काल अपना लिया गया है। सैनिक अनुशासन पालने वाले के लिए और कोई ननुनच करने जैसा विकल्प है भी तो नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 28

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 2)

🔷 माँस मनुष्य का स्वाभाविक आहार नहीं हो सकता। हम इस संसार में सुख−शाँति और निर्द्वंद्वता का जीवन जीने के लिये आये हैं। आहार हमारे जीवन धारण की सामर्थ्य को बढ़ाता है, इसलिये पोषण और शक्ति प्रदान करने वाला आहार तो चुना जा सकता है, किन्तु जो आहार हमारी मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों को नष्ट करता हो, वह पौष्टिक होकर भी स्वाभाविक नहीं हो सकता। हमारे जीवन की सुख−शाँति शरीर पर उतनी अवलम्बित नहीं, जितना इनका संबंध मन, बुद्धि और आत्मा की शुद्धता से है। इसलिये जो आहार इन तीनों को शुद्ध नहीं रख सकता, वह हमारा स्वाभाविक आहार कभी भी नहीं हो सकता।

🔶 बहुत स्पष्ट बात है। जंगल के शेर, चीते, भेड़िये भालू, लकड़बग्घे माँसाहार करते हैं, इन्हें देखकर लोग कहते हैं कि शक्तिशाली होने के लिये माँसाहार आवश्यक है। उनकी एक दलील यह भी होती है कि माँस खाने की प्रेरणा स्वयं प्रकृति ने दी है, समुद्र की बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को जंगल के बड़े जन्तु छोटे जीवों को मारकर खाते रहते हैं? प्रकृति ने मानवेत्तर प्राणियों की संख्या न बढ़ने देने के लिये ऐसी व्यवस्था की है पर मनुष्य उन परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न है, जिनमें अन्य जीव−जन्तु जन्म लेते, बढ़ते और विकसित होते हैं।

🔷 शेर, चीते माँसाहारी होने के कारण बलवान् होते हैं पर उनमें इस कारण दुष्टता और अशाँति से जो संशयशीलता उत्पन्न होती है, वह उन्हें भयग्रस्त और कायर बना देती है। शेर दिन भर भय ग्रस्त रहता है। चीते और भेड़िये खूँखार होने के अतिरिक्त समय केवल इसी प्रयत्न में रहते हैं कि कहाँ छिपे रहें, जिससे कोई उन्हें देख न ले या मार न डाले। साँप चलते हुए इतना भय ग्रस्त होता है कि सामान्य सी खुटक से भी वह बुरी तरह घबड़ा जाता है। मनुष्य भी यदि माँसाहार करता है तो उसमें भी स्वभावतः ऐसी संशयशीलता, अविश्वास और भय की भावना होनी चाहिये। यह बुराइयाँ मनुष्य को सदैव ही अधःपतित करती रही हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.26

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

👉 वासना स्वभाव नहीं विकार मात्र

🔶 राजकुमार युयुत्स सहित राजदरबार के अनेक श्री सामन्तों ने भी श्रावणी पर्व में भाग लिया। महर्षि आँगिरस उस दिन प्रजा से हेमाद्रि संकल्प कराया करते थे। पिछले वर्ष भर किसी ने पाप और बुराइयाँ की होतीं, जब तक उसका प्रायश्चित नहीं करा लेते थे, वे नया यज्ञोपवीत किसी को भी नहीं प्रदान करते थे।

🔷 आज अनहोनी हो गई। एक वर्ष तक लगातार उच्चस्तरीय साधना और तपश्चर्या करने के कारण निषाद कुल में जन्मे बटुक काँदीवर को उन्होंने क्षत्रियत्व प्रदान कर राज्य की सेना में प्रवेश का अधिकार दे दिया, जबकि राजकुमार युयुत्स को उन्होंने असंयमी ठहराकर एक वर्ष के लिये क्षत्रियत्व का अधिकार छीन लिया। उन्होंने बताया—“राजकुमार ने अनेक महिलाओं का शील भंग कर उन्हें व्यभिचारिणी बनाया है, उन्हें 1 वर्ष तक नंगे पाँव, उघारे बदन राज्य की गौयें चरानी चाहियें और दुग्ध कल्प करके शरीर शुद्ध करना चाहिये। जब तक वे वह प्रायश्चित नहीं कर लेते, उन्हें राजकुमार के सम्मानित संबोधन से भी वंचित रखा जायेगा। उन्हें केवल युयुत्स कहकर पुकारा जायेगा।

🔶 काँदीवर को क्षत्रियत्व और अपने आपको पदच्युत होते देखकर युयुत्स का दम्भ उग्र हो उठा। उसने याचना की गुरुवर! वासना मनुष्य का स्वभाव है। स्वाभाविक बातें अपराध नहीं गिनी जानी चाहियें। इस पर मनुष्य का अपना वश नहीं, इसलिए वासना व्यक्ति के लिये क्षम्य है।

🔷 आंगिरस तत्त्वदर्शी थे और दूरदर्शी भी। उन्होंने कहा—“युयुत्स! समाज और जातिगत स्वाभिमान से गिराने वाला कोई भी कर्म पाप ही गिना जाता है, फिर चाहे वह किसी की सहमति से ही क्यों न हो। जिन कुमारियों को तुमने भ्रष्ट किया है, वे एक दिन सुहागिनें बनेंगी। क्या उनके पतियों के साथ यह अपराध न होगा? तुम्हारी यह स्वाभाविकता क्या समाज के असंयम और पथ भ्रष्टता का कारण नहीं बनी?”

🔶 महर्षि आंगिरस अंत तक दृढ़ रहे। युयुत्स पराजित होकर लौटे। उनके कंधे पर पड़ा यज्ञोपवीत व्यभिचार के अपराध में छीन लिया गया।

🔷 चोट खाया सर्प जिस तरह फुँकार मारकर आक्रमण करता है, युयुत्स का हृदय भी ऐसे ही प्रतिशोध से जलने लगा। वह महर्षि को नीचा दिखाने के उपक्रम खोजने लगा।

🔶 राजधानी में संस्कृति समारोह आयोजित किया गया। उसका संचालन किसकी इच्छा से हो रहा है, यह किसी ने नहीं जाना। अच्छे−अच्छे संभ्रांत व्यक्ति आमन्त्रित किये गये। महर्षि आंगिरस प्रधान अतिथि के रूप में आमन्त्रित किये गये थे।

🔷 मरकत−मणियों से जगमगाते राजमहल की आभा उस समय और भी द्विगुणित हो गई, जब श्रीसामन्तों के मध्य प्रवेश किया नृत्याँगना काँचीबाला ने। झीने रेशमी वस्त्रों पर षोडश शृंगार देखते ही बनता था। काम−रूप थी काँचीबाला उसे देखते ही राजाओं के मन स्खलित हो−हो जाते थे।

🔶 नृत्य प्रारम्भ हुआ, पाँव थिरकने लगे, साज गति देने लगा। ताल के साथ नृत्य करती काँचीबाला ने अपनी चूनर उतार फेंकी। दर्शकों की साँसें गर्म हुईं पर फिर नृत्य में अटक गईं। अन्ततः उसने अपने संपूर्ण वस्त्राभूषण उतार फेंके। साज बन्द हो गया, दर्शक न जाने कहाँ चले गये। अकेले, आंगिरस और काँचीबाला। एक कामुक दृष्टि डाली नृत्याँगना ने महर्षि पर और प्रश्न किया—“नारी अभिसार क्यों करती है ऋषिवर!?” महर्षि बोले—“पुरुष की आत्म−दर्शन की जिज्ञासा को उद्दीप्त करने के लिये भद्रे! आज तुम्हारे सौन्दर्य में सचमुच अलौकिक बाल रूप है।” काँचीवाला आई थी, भ्रष्ट करने, पर आप गलकर पानी हो गई। यह सब युयुत्स का प्रबंध था। पर उससे महर्षि का क्या बिगड़ता। युयुत्स को अन्ततः तप और प्रायश्चित के लिये जाना ही पड़ा।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.15

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 October 2018

आज का सद्चिंतन 14 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 25)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔶 इस आशा की एक झलक झाँकी के उपरान्त तत्काल दूसरा पक्ष समझ में आता है कि उसने भौतिक उपलब्धियों से कुछेक समर्थों के लिए बढ़-चढ़कर सुविधा-साधन उपलब्ध करने के अतिरिक्त और कोई ऐसा आधार प्रस्तुत नहीं किया है, जिससे मानसिक क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों का निराकरण हो सके और मानवी व्यवहार में सद्भावना का अभिवर्धन हो सके। ऐसी दशा में आगे भी विज्ञान के आधार पर जो और भी प्रगति होगी, वह वर्तमान प्रचलन को ही उत्तेजित करेगी। उसमें मानवी उत्कृष्टता का न तो कोई पक्ष जुड़ सका है और न ऐसा कुछ बन पड़ने की सम्भावना है, जिससे जन साधारण को मानवी गरिमा की मर्यादाओं में अनुबन्धित किया जा सके। यदि ऐसा न बन पड़ा, तो सम्पन्नता और समर्थता के साथ-साथ अनीति भी बढ़ती ही जाएगी और अन्तत: प्रस्तुत प्रगति योजनाएँ भयावह विपन्नता के अतिरिक्त और कुछ उपलब्ध न कर सकेंगी।
  
🔷 समस्याएँ प्रत्यक्षवाद के साथ जुड़ी हुई अनैतिकता के कारण उत्पन्न हुई हैं। जड़ को काटे बिना विषवृक्ष की कुछेक पत्तियाँ तोड़ देने भर से क्या कुछ बनने वाला है? एक नाम रूप वाली विपत्तियाँ दूसरे नाम रूप से सामने आएँ, इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक उपचारों से और कुछ हेर-फेर बन पड़ने वाला नहीं है।
  
🔶 स्मरण पुरातन सतयुग का आता है, जब साधनों की आज की तुलना में कहीं अधिक कमी थी, पर साथ ही सद्भावनाओं के समुन्नत रहने पर लोग उस स्थिति में भी इस प्रकार रह लेते थे, जिन्हें आज भी स्वर्गोपम होने का प्रतिपादन इतिहासकार करते हैं। उन परिस्थितियों का जन्म तपस्वियों द्वारा सूक्ष्म जगत का, चेतना-क्षेत्र का परिष्कार कर सकने पर ही सम्भव हुआ था। आज भी वही एक मात्र विकल्प है, जिसे अपनाकर मनुष्य की देवोपम सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को उभारा जा सकता है और इसी अवरोध के कारण उत्पन्न हुई सभी विकृतियों का, सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है।

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 27

👉 How can I improve myself within a month?

🔶 20 ideas -:

1. Detoxify your speech. Reduce the use of negative words. Be polite.
2. Read everyday. Doesn’t matter what. Choose whatever interests you.
3. Promise yourself that you will never talk rudely to your parents. They never deserve it.
4. Observe people around you. Imbibe their virtues.
5. Spend some time with nature everyday.
6. Feed the stray animals. Yes, it feels good to feed the hungry.
7. No ego. No ego. No ego. Just learn, learn and learn.
8. Do not hesitate to clarify a doubt. “He who asks a question remains fool for 5 minutes. He who does not ask remains a fool forever”.
9. Whatever you do, do it with full involvement. That’s meditation.
10. Keep distance from people who give you negative vibes but never hold grudges.
11. Stop comparing yourself with others. If you won’t stop, you will never know your own potential.
12. “The biggest failure in life is the failure to try”. Always remember this.
13. “I cried as I had no shoes until I saw a man who had no feet”. Never complain.
14. Plan your day. It will take a few minutes but will save your days.
15. Everyday, for a few minutes, sit in silence. I mean sit with yourself. Just yourself. Magic will flow.
16. In a healthy body resides a healthy mind. Do not litter it with junk.
17. Keep your body hydrated at all times. Practice drinking 8–10 glasses of water.
18. Make a habit to eat at least one serving of raw vegetable salad on a daily basis.
19. Take care of your health. “He who has health has hope and he who has hope has everything”.
20. Life is short. Life is simple. Do not complicate it. Don’t forget to smile.😊🌟

Keep reading this daily at least once.

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 1)

🔶 डॉ. बारमस रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) की बीमारी पर एक शोध−कार्य चला रहे थे। अनेक रोगियों का अध्ययन करते समय उन्होंने जो एक सामान्य बात पाई वह यह थी कि रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) के अधिकाँश बीमार लोग माँसाहारी थे। उनके मस्तिष्क में एक विचार उठा कि कहीं माँसाहार ही तो रक्तचाप का कारण नहीं है, यदि है तो किन परिस्थितियों में? इस प्रश्न के समाधान के लिये उन्होंने प्रयोग की दिशायें ही बदल दीं। अब वे माँसाहार से होने वाले शरीर पर प्रभाव का अध्ययन करने लगे। उनके प्रयोग और निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुये दूसरे वैज्ञानिकों ने भी माना कि माँसाहार केवल शरीर ही नहीं, मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। दोनों पर उसकी प्रतिक्रिया दूषित और अस्वाभाविक होती है।

🔷 कई माँसाहारी जीवों को कुछ दिन के लिये माँस देना बिलकुल बन्द कर दिया गया। इस अवधि में निर्वाह के लिये उन्हें घास, सब्जी और फल खाने को दिये गये। देखा गया कि ऐसा करने से कुछ दिन में ही इन जानवरों का उतावलापन मन्द पड़ गया, वे काफी शान्त रहने लगे, कम हिंसक हो चले।

🔶 एक दूसरे कमरे में कुछ शाकाहारी जीवों को रखकर उन्हें माँसाहार के लिये विवश किया गया। उनमें से कुछ ऐसे थे, जिन्होंने तो आमरण अनशन ही कर दिया, उन्होंने माँस को सूँघा तक नहीं। अन्त में परीक्षण के लिये उन्हें अम्लीय (एसिडिक) आहार दिया गया। इससे उन पर बड़े दूषित प्रभाव दिखाई दिये, उनकी पाचन क्रिया अवरुद्ध हो गई और कई तरह के रोगों ने घेर लिया। उनमें अधिक स्वार्थपरता आ गई, उनका सौम्य स्वभाव नष्ट हो गया, वे गुर्राने और काटने तक लगे। पहले उनके पास जाने में उन्हें कोई भय नहीं लगता था। वे सकरुण आँखों से देखते रहते थे। पर इस तरह के प्रयोग के बाद उनमें संशयशीलता की मात्रा एकाएक बहुत अधिक हो गई।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.26

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

देवताओं के गायत्री मन्त्र

🔷 अनेक कष्टो से मनुष्य की रक्षा करती है गायत्री मंत्र।
भूत प्रेत, चोर डाकू, राज कोप, आशंका, भय, अकाल मृत्यु, रोग और अनेक प्रकार की बाधाओं का निवारण करके मनुष्य को सदैव तेजश्वी बनाय रखता है।
इन मंत्रों को प्रतिदिन जपकर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऎश्वर्य प्राप्ति की जा शक्ति है।

🔶 १. गणेश गायत्री:- यह समस्त प्रकार के विघ्नों का निवारण करने में सक्षम है
ॐ एक दृष्टाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।

🔷 २. नृसिंह गायत्री:- यह मंत्र पुरषार्थ एवं पराक्रम की बृद्धि होती है।
ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।

🔶 ३. विष्णु गायत्री:- यह पारिवारिक कलह को समाप्त करता है।
ॐ नारायण विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।

🔷 ४. शिव गायत्री:- यह कल्याण करने में अदूतीय है।
ॐ पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

🔶 ५. कृष्ण गायत्री:- यह मंत्र कर्म क्षेत्र की सफलता हेतु इसका जप आवश्यक है।
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।

🔷 ६. राधा गायत्री:- यह मंत्र प्रेम का अभाव दूर होकर, पूर्णता को पहुचता है।
ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात्।

🔶 ७. लक्ष्मी गायत्री:- यह मंत्र पद प्रतिष्ठा, यश ऐश्वर्य और धन Sसम्पति की प्राप्ति होती है।
ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

🔷 ८. अग्नि गायत्री:- यह मंत्र इंद्रियों की तेजस्विता बढ़ती है।
ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात्।

🔶 ९. इन्द्र गायत्री:- यह मंत्र दुश्मनों है हमले से बचाता है।
ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात्।

🔷 १०. सरस्वती गायत्री:- यह मंत्र ज्ञान बुद्धि की वृद्धि होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।
ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।

🔶 ११. दुर्गा गायत्री:- यह मंत्र से दुखः और पीड़ानही रहती है।शत्रु नाश, विघ्नों पर विजय मिलती है।
ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।

🔷 १२. हनुमान गायत्री:- यह मंत्र कर्म के प्रति निष्ठा की भावना जागृत होती हैं।
ॐ अंजनी सुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि।  तन्नो मारुति: प्रचोदयात्।

🔶 १३. पृथ्वी गायत्री:- यह मंत्र दृढ़ता, धैर्य और सहिष्णुता की वृद्धि होती है।
ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्त्रमूत्यै धीमहि। तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।

🔷 १४. सूर्य गायत्री:- यह मंत्र शरीर के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि। तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।

🔶 १५. राम गायत्री:- यह मंत्र इससे मान प्रतिष्ठा बढती है।
ॐ दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि। तन्नो राम: प्रचोदयात्।

🔷 १६. सीता गायत्री:- यह मंत्र तप की शक्ति में वृद्धि होती है।
ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात्।

🔶 १७. चन्द्र गायत्री:- यह मंत्र निराशा से मुक्ति मिलती है और मानसिकता प्रवल होती है।
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात्।

🔷 १८. यम गायत्री:- यह मंत्र इससे मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।
ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि। तन्नो यम: प्रचोदयात्।

🔶 १९. ब्रह्मा गायत्री:- यह मंत्र व्यापारिक संकटो को दूर करता है।
ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

🔷 २०. वरुण गायत्री:- यह मंत्र प्रेम भावना जागृत होती है, भावनाओ का उदय होता हैं।
ॐ जलबिम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुण: प्रचोदयात्।

🔶 २१. नारायण गायत्री:- यह मंत्र प्रशासनिक प्रभाव बढ़ता है।
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो नारायण: प्रचोदयात्।

🔷 २२. हयग्रीव गायत्री:- यह मंत्र समस्त भयो का नाश होता है।
ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हयग्रीव: प्रचोदयात्।

🔶 २३. हंस गायत्री:- यह मंत्र विवेक शक्ति का विकाश होता है,बुद्धि प्रखर होती है।
ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।

🔷 २४. तुलसी गायत्री:- परमार्थ भावना की उत्त्पति होती है।
ॐ श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।

🔶 गायत्री साधना का प्रभाव तत्काल होता है जिससे साधक को आत्मबल प्राप्त होता है और मानसिक कष्ट में तुरन्त शान्ति मिलती है। इस महामन्त्र के प्रभाव से आत्मा में सतोगुण बढ़ता है।

🔷 गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में क्या कहा जाए। ब्रह्म की जितनी महिमा है, वह सब गायत्री की भी मानी जाती हैं। वेदमाता गायत्री से यही विनम्र प्रार्थना है कि वे दुर्बुद्धि को मिटाकर सबको सद्बुद्धि प्रदान करें।

आज का सद्चिंतन 13 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 24)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔷 किन्तु जो काम बन पड़ा है, उसकी तुलना में हजार-लाख गुना और करने के लिए पड़ा है। वह अदृश्य जगत से सम्बन्धित एवं सूक्ष्म स्तर का भी है। उसकी जड़ें चेतना क्षेत्र के सूक्ष्म जगत में असाधारण गहराई में घुसी हुई हैं। प्रस्तुत विकृतियाँ भी अभूतपूर्व हैं। जो बदलाव, परिष्कार प्रस्तुत किया जाना है, वह भी ऐसा है जिसे अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।
  
🔶 भूतकाल में भी अनीति का उन्मूलन और नीति का संस्थापन बराबर होता रहा है, पर वह परिवर्तन रहे क्षेत्र स्तर के ही हैं। भूतकाल में साधनों और वाहनों के अभाव में दुनियाँ इतनी निकट नहीं आई थी कि समस्त संसार को एक गाँव-कस्बे की तरह आँका जा सके और प्रगति और अवगति की समस्याएँ समस्त विश्व को थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ एक ही स्तर पर प्रभावित करें। इसलिए अपने समय का व्यापक परिवर्तन इतने स्तर का, इतना उलझा हुआ एवं इतना विस्तृत है कि उसे अब तक के सुधार-परिवर्तनों की तुलना में अद्भुत, अनुपम एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। इसके लिए प्रयत्न भी हल्के-फुल्के करने से काम नहीं चलेगा, वरन वह इतने प्रबल, इतने प्रचण्ड, इतने सशक्त और इतने व्यापक होने चाहिए; जिन्हें असाधारण ही कहा जा सके।
  
🔷 विज्ञान के पक्षधरों ने दुनियाँ को अधिक सुखद बनाने के लिए परिकल्पनाएँ कम नहीं की हैं। उन्होंने असाधारण ढाँचे खड़े करने और अद्भुत प्रयोग करने, साधन जुटाने के लिए कम माथा-पच्ची नहीं की है, पर उन सबमें एक ही कमी रही है कि वे भौतिक परिप्रेक्ष्य में भौतिक उपचारों से ही सुधार लाने की बात पर विश्वास करते हैं। आकाश पर कब्जा कर लेने, समुद्र क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लेने, प्रकृति-सम्पदाओं में से और भी अधिक छीन लेने, अनुपयुक्त को नष्ट करने वाले उपकरण ढूँढ़ने, सम्पदा-संवर्धन के नए स्रोत खोज निकालने जैसी योजनाएँ ही बन रही हैं, जिन्हें इक्कीसवीं सदी की समुन्नत योजनाएँ कहा जाता है। लोग कुछ स्तर तक विश्वास भी करते हैं कि भौतिक विज्ञान अति समर्थ है। उसने अब तक एक से एक बढ़कर उपलब्धियाँ प्रस्तुत की हैं और अपने आविष्कारों से जादू लोक जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं तो भविष्य के लिए उसकी जो योजनाएँ हैं, अवधारणाएँ हैं, वे क्यों पूर्ण न होंगी?

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 26

👉 सत्य के लिए सर्वस्व त्याग

🔷 यदि मेरी मित्रतायें मेरा साथ नहीं देतीं तो न दें। प्रेम मुझे छोड़ देता है तो छोड़ दे। मेरा तो एक ही आग्रह है कि मैं उस सत्य के प्रति सच्ची रह सकूँ, जिसकी सेवा और परिपालन के लिये, मैंने अपनी इच्छाओं का, वैभव विलास से परिपूर्ण पाश्चात्य जीव−पद्धति तक का बहिष्कार कर दिया है। जब तक मेरे शरीर में रक्त की अन्तिम बूँद और अन्तिम श्वास विद्यमान है, मैं एकमेव सत्य की प्राप्ति के हित तिल−तिल जलती रहूँगी। सत्य ही तो मनुष्य जीवन का सार है।

🔶 यदि वह सत्य मुझ से रेगिस्तान में चलने को कहेगा तो मैं उसके पीछे−पीछे जाऊँगी, मुझे उसे प्राप्त करने के लिये पर्वतों पर चढ़ना पड़ा, समुद्र की थाह लेनी पड़ी तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगी। उसने माँग की मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ तो मुझे वह भी स्वीकार होगा पर सत्य का आश्रय मैं छोड़ नहीं सकती। मैं तो सत्य से चिपकी रहूँगी, भले ही मुझे यह दिखाई दे कि मुझे अपना कहने वाला भी कोई नहीं रहा। मेरी हार्दिक कामना है कि जब मैं मरूँ और मेरी समाधि बनाई जाये तो उस पर लिखा जाये—“उसने सब कुछ छोड़कर भी सत्य के पीछे चलने का प्रयत्न किया।”

✍🏻 एनी बेसेंट
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 1

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 23)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔷 १९५८ के सहस्रकुण्डीय महायज्ञ के सफल प्रयोग परीक्षण ने अपनी श्रद्धा-विश्वास असंख्य गुना बढ़ा दिया और बाद में निर्देशित हुए कामों का सिलसिला चल पड़ा, जिनका कि उल्लेख पहले भी हो चुका है। साहित्य सृजन, संगठन, केन्द्रों की खर्चीली व्यवस्था, अभावग्रस्तों की सहायता जैसे काम इस प्रकार चलते रहे, मानो वे सभी कार्य किसी दूसरे ने किए हों और अपने सिर पर श्रेय अनायास ही लद गया हो। यह वैयक्तिक सफलता का प्रसंग नहीं माना जाना चाहिए कि यह किसी के पुरुषार्थ का प्रतिफल सामने आया, वरन् यह समझा जाना चाहिए कि भक्ति के साथ शक्ति का भी अविच्छिन्न सामंजस्य हैं। निर्देशक शक्ति अपने संकेतों पर चलने वाले समर्पित व्यक्ति के लिए वैसी ही व्यवस्था भी करती है, जैसी कि मोर्चे पर लड़ने जाने वाले सैनिक के लिए आवश्यक सुविधा सामग्री का प्रबन्ध सेनापति या रक्षा विभाग द्वारा किया जाता है।
  
🔶 वैयक्तिक प्रयास से बन पड़ने में जिन्हें संभव समझा जा सकता है, उन छिटपुट कामों को संपन्न करने के उपरांत निर्देशक ने अपनी कठपुतली में इतनी क्षमता भर दी कि वह संकेतों के इशारे भर से मनमोहक नृत्य अभिनय कर सके। इतना बन पड़ने के उपरान्त वह भारी वजन लादा गया, जिसे सम्पन्न करने की कोई व्यक्ति विशेष कल्पना तक नहीं कर सकता, जिसे वह अदृश्य सत्ता ही कर सकती है, जिसने इतना बड़ा पसारा बनाकर खड़ा किया है और जो मनुष्य को एक सीमा तक नटखटपन बरतने तक की छूट देने के उपरांत जब देखती है कि उद्दण्डता मर्यादा से बाहर जा रही है, तब उसके कान पकड़कर सीधी राह अपनाने के लिए बाधित ही नहीं, प्रताड़ित भी कर सकती है। इसी को युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। यही है इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना, महाक्रान्ति की अभूतपूर्व परियोजना।
  
🔷 प्रस्तुत प्रयोजन के लिए जितना कुछ दृश्य रूप में मानवी प्रयत्नों के अन्तर्गत सम्भव था, उसे युग निर्माण योजना के अन्तर्गत पिछले कई वर्षों से किया जाता रहा है। उसमें जो सफलता मिली है, वह लगभग इसी स्तर की मानी जा सकती है जितनी की मानवी पुरुषार्थ के अंतर्गत आने की परिकल्पना की जा सकती है। मानवी पुरुषार्थ और साधना के समन्वय से संसार के इतिहास में बहुत कुछ ऐसा बन पड़ा है, जिसे असाधारण भी कहा जा सकता है और आश्चर्यजनक भी। इसी आधार पर मिशन के दृश्य प्रयास जिस प्रकार बन पड़े हैं और उसके प्रतिफल जिस प्रकार के सामने आए, उन्हीं में इन्हें भी एक गिना जा सकता है।

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 25

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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