सोमवार, 8 अक्टूबर 2018
रविवार, 7 अक्टूबर 2018
👉 सच्चा श्राद्ध
🔷 श्राद्ध पक्ष चल रहा था। सन्त एक नाथ ने भी प्रचलित लोकरीति के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध करने का निश्चय किया और कुछ ब्राह्मणों को नियत समय पर अपने यहाँ भोजन के लिये आमंत्रित किया।
🔶 सुबह से ही घर में श्राद्ध की रसोई बनने लगी। संत एकनाथ तथा उनकी धर्मपत्नी गिरिजा दोनों पवित्रता, स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखते हुए षट्रस व्यंजन बना रहे थे। घी, दूध और मिष्ठानों की सुगन्ध घर से बाहर सड़क तक व्याप रही थी। उसी समय सड़क से कुछ महार परिवार गुजरे। शायद उन्हें कई दिनों से ठीक तरह खाना नहीं मिला था। पकवानों की सौंधी सुगन्ध उनकी नाक में से घुस कर क्षुधा को और भी भड़काने वाली सिद्ध हुई। लेकिन अपने नसीब में न जानकर वयस्क महारों ने तो भूख को दबाया, परन्तु बच्चों से रहा न जा सका। एक बच्चा बोल ही उठा-माँ कैसी मीठी महक आ रही है। अहा! कितने बढ़िया-बढ़िया पकवान बन रहे होंगे। काश ये हमें मिल सकें।”
🔷 “चुप रह मूर्ख! कोई सुन लेगा तो गालियाँ खानी पड़ेंगी कि निगूढ़ों ने हमारे पकवानों को नजर लगा दी।” बाप ने कहा। माँ एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए बोली-बेटा! हम लोगों की किस्मत में तो इन चीजों की गंध भी नहीं है। व्यर्थ में मन के लड्डू बाँधने से क्या लाभ।”
🔶 माता, पिता और बच्चों में चल रही ये चर्चायें संत एकनाथ जी के कानों में पहुँची। उनका हृदय द्रवित हो उठा। संत की साध्वी पत्नी गिरिजा भी इन बातों को सुनकर महार परिवार को घर में न्यौत लायी और उचित आदर सत्कार सहित उन्हें आसन पर बिठा कर तैयार हो रही रसोई परोसने लगी। महार स्त्री, पुरुष और बच्चे कई दिनों के भूखे थे, इधर पकवानों ने उनकी भूख और भी बढ़ा दी, सो सब तैयार रसोई उनके ही उदर में चली गयी। लेकिन खा-पीकर तृप्त हुए महार-परिजनों ने जिस हृदय से संत एकनाथ तथा गिरिजा को दुआयें दी उससे दम्पत्ति का अन्तस् प्रफुल्लित हो उठा। गिरिजा ने भोजन के बाद यथोचित दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।
🔷 नियत समय पर न्यौते गये ब्राह्मण आये। बनायी गयी रसोई तो महारों के काम आ चुकी थी सो अब दुबारा भोजन तैयार करना पड़ रहा था। खाने में विलम्ब होते देखकर ब्राह्मणों से न रहा गया, वे कुड़कुड़ाने लगे।
🔶 संत ने कहा-”नाराज न होइये ब्राह्मण देव। रसोई तो समय से काफी पहले तैयार हो चुकी थी। परन्तु देखा भगवान सड़क पर भूखे ही जा रहे हैं। इसलिये उन्हें भोजन कराने में सारी रसोई चुक गयी।” विस्मित ब्राह्मण संत एकनाथ से पूरी घटना सुनकर आगबबूला हो उठे-”तो जिनके छूने से भी कुम्भीपाक लगता है उन्हें तुम भगवान कर रहे हो।” “वे भगवान ही तो हैं पूज्यवर! कण-कण में उनका वास है, प्राणिमात्र में वे रहते हैं। यदि वे ही भूखे जा रहे हों तो उन्हें तृप्त कर भगवान की सेवा का अवसर हाथ से जाने देने में क्या बुद्धिमानी है?”
🔷 इन वचनों ने पंडितों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और वे बोले-”अरे! एकनाथ तुम्हारी बुद्धि तो भ्रष्ट नहीं हो गयी है। एक तो हमारे लिये बनाया भोजन अन्त्यज जनों को खिला दिया और दूसरे उन्हें भगवान सिद्ध का उनसे अपवित्र हुए घर में चौके-चूल्हे पर बना भोजन खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करने पर तुले हो।”
🔶 संत एकनाथ उसी विनम्रता से अपनी बात कहते रहे परन्तु रूढ़िग्रस्त और दुराग्रही मन मस्तिष्क वाले ब्राह्मणों पर क्या प्रभाव होना था, उठ कर चल दिये। संत एकनाथ ने उन्हें रोका नहीं। माथे पर तिलक लगाये रेशमी वस्त्रधारी उन बहुरूपियों को उन्होंने विनयपूर्वक रवाना किया व सच्चे ब्राह्मण, हृदय से आशीर्वाद देकर गए। उस महार परिवार द्वारा छोड़ा भोजन दोनों पति-पत्नी ने भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया। यही सच्चा श्राद्ध था।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1987
🔶 सुबह से ही घर में श्राद्ध की रसोई बनने लगी। संत एकनाथ तथा उनकी धर्मपत्नी गिरिजा दोनों पवित्रता, स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखते हुए षट्रस व्यंजन बना रहे थे। घी, दूध और मिष्ठानों की सुगन्ध घर से बाहर सड़क तक व्याप रही थी। उसी समय सड़क से कुछ महार परिवार गुजरे। शायद उन्हें कई दिनों से ठीक तरह खाना नहीं मिला था। पकवानों की सौंधी सुगन्ध उनकी नाक में से घुस कर क्षुधा को और भी भड़काने वाली सिद्ध हुई। लेकिन अपने नसीब में न जानकर वयस्क महारों ने तो भूख को दबाया, परन्तु बच्चों से रहा न जा सका। एक बच्चा बोल ही उठा-माँ कैसी मीठी महक आ रही है। अहा! कितने बढ़िया-बढ़िया पकवान बन रहे होंगे। काश ये हमें मिल सकें।”
🔷 “चुप रह मूर्ख! कोई सुन लेगा तो गालियाँ खानी पड़ेंगी कि निगूढ़ों ने हमारे पकवानों को नजर लगा दी।” बाप ने कहा। माँ एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए बोली-बेटा! हम लोगों की किस्मत में तो इन चीजों की गंध भी नहीं है। व्यर्थ में मन के लड्डू बाँधने से क्या लाभ।”
🔶 माता, पिता और बच्चों में चल रही ये चर्चायें संत एकनाथ जी के कानों में पहुँची। उनका हृदय द्रवित हो उठा। संत की साध्वी पत्नी गिरिजा भी इन बातों को सुनकर महार परिवार को घर में न्यौत लायी और उचित आदर सत्कार सहित उन्हें आसन पर बिठा कर तैयार हो रही रसोई परोसने लगी। महार स्त्री, पुरुष और बच्चे कई दिनों के भूखे थे, इधर पकवानों ने उनकी भूख और भी बढ़ा दी, सो सब तैयार रसोई उनके ही उदर में चली गयी। लेकिन खा-पीकर तृप्त हुए महार-परिजनों ने जिस हृदय से संत एकनाथ तथा गिरिजा को दुआयें दी उससे दम्पत्ति का अन्तस् प्रफुल्लित हो उठा। गिरिजा ने भोजन के बाद यथोचित दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।
🔷 नियत समय पर न्यौते गये ब्राह्मण आये। बनायी गयी रसोई तो महारों के काम आ चुकी थी सो अब दुबारा भोजन तैयार करना पड़ रहा था। खाने में विलम्ब होते देखकर ब्राह्मणों से न रहा गया, वे कुड़कुड़ाने लगे।
🔶 संत ने कहा-”नाराज न होइये ब्राह्मण देव। रसोई तो समय से काफी पहले तैयार हो चुकी थी। परन्तु देखा भगवान सड़क पर भूखे ही जा रहे हैं। इसलिये उन्हें भोजन कराने में सारी रसोई चुक गयी।” विस्मित ब्राह्मण संत एकनाथ से पूरी घटना सुनकर आगबबूला हो उठे-”तो जिनके छूने से भी कुम्भीपाक लगता है उन्हें तुम भगवान कर रहे हो।” “वे भगवान ही तो हैं पूज्यवर! कण-कण में उनका वास है, प्राणिमात्र में वे रहते हैं। यदि वे ही भूखे जा रहे हों तो उन्हें तृप्त कर भगवान की सेवा का अवसर हाथ से जाने देने में क्या बुद्धिमानी है?”
🔷 इन वचनों ने पंडितों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और वे बोले-”अरे! एकनाथ तुम्हारी बुद्धि तो भ्रष्ट नहीं हो गयी है। एक तो हमारे लिये बनाया भोजन अन्त्यज जनों को खिला दिया और दूसरे उन्हें भगवान सिद्ध का उनसे अपवित्र हुए घर में चौके-चूल्हे पर बना भोजन खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करने पर तुले हो।”
🔶 संत एकनाथ उसी विनम्रता से अपनी बात कहते रहे परन्तु रूढ़िग्रस्त और दुराग्रही मन मस्तिष्क वाले ब्राह्मणों पर क्या प्रभाव होना था, उठ कर चल दिये। संत एकनाथ ने उन्हें रोका नहीं। माथे पर तिलक लगाये रेशमी वस्त्रधारी उन बहुरूपियों को उन्होंने विनयपूर्वक रवाना किया व सच्चे ब्राह्मण, हृदय से आशीर्वाद देकर गए। उस महार परिवार द्वारा छोड़ा भोजन दोनों पति-पत्नी ने भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया। यही सच्चा श्राद्ध था।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1987
👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 22)
👉 सच्चे अध्यात्मवाद में निहित विलक्षण शक्ति
🔷 यहाँ इतनी पँक्तियाँ इसलिए लिखनी पड़ी हैं कि शरीर बल, सम्पत्ति बल, बुद्धिबल, पद और सहायकों का बल बहुत समय से श्रेय-चर्चा के अधिकारी रहे हैं, पर भुलाया यह भी नहीं जाना चाहिए कि आध्यात्मिक साधना के सहारे उपजने वाला आत्मबल भी उपेक्षणीय नहीं है। वह न तो अप्रामाणिक है और न छद्म। गड़बड़ी मात्र वहीं पड़ती है जहाँ उसके साथ जुड़े सिद्धान्तों को भुला दिया जाता है और कुछ मंत्र-यंत्रों से ही गगनचुम्बी अपेक्षा की जाने लगती है और उसके सफल न होने पर निराशा एवं नास्तिकता उभरती है।
🔶 व्यक्तिगत लाभ तक अपने को सीमाबद्ध कर लेने वाला व्यक्ति अपनी संकीर्णता में इतना अधिक लिप्त हो जाता है कि उसकी दूसरी दुष्प्रवृत्तियाँ इसी आधार पर पनपती हैं। अध्यात्म क्षेत्र मेें भी जो लोग इसी रीति-नीति को अपनाते हैं, उनकी गरिमा भी एक प्रकार से समाप्त प्राय: हो जाती है। अपने लिए स्वर्ग मुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि चमत्कार प्रदर्शन, लोगों से पुजापा बटोरना, अपने को देवताओं का एजेण्ट बताकर उनके द्वारा ओछे लोगों की ऐसी मनोकामनाएँ पूरी कराने का आश्वासन देना जो उनकी पात्रता से बाहर है, ऐसी बातें जिनके मनोरथों में सम्मिलित हो जाएँ, समझना चाहिए कि उनका पूजा-पाठ भजन-कर्मकाण्ड ओछे स्तर का है। उससे अध्यात्म पक्ष की गरिमा बढ़ेगी नहीं वरन् घटेगी ही।
🔷 ईश्वर के निकटवर्ती संबंधी बनना, उनको दर्शन देने के लिए बाधित करना, उनकी कचहरी के दरबारी बनकर सामीप्य-सान्निध्य जैसी मुक्ति का मजा लूटना, औरों से अपने को वरिष्ठ होने की मान्यता बनाना-ऐसा ओछापन है जो किसी भी वास्तविक भगवद् भक्त का अनुगामी बनने वाले को तनिक भी शोभा नहीं देता। यह सब लगभग ऐसा ही है जैसा कि सेठ, साहूकार, राजनेता, पंचतारा होटलों में मौज मजा करने वालों की मन:स्थिति होती है। अमीर लोग भी सेवक, चाकर, चारण और चमचों को इनाम-इकराम बाँटते रहते हैं। ईश्वर की हैसियत उन्हीं लोगों के समतुल्य बना देने का मनोरथ न तो किसी के अध्यात्मवादी होने का प्रमाण है और न ऐसे व्यक्ति को साधक-उपासक ही कहा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 24
🔷 यहाँ इतनी पँक्तियाँ इसलिए लिखनी पड़ी हैं कि शरीर बल, सम्पत्ति बल, बुद्धिबल, पद और सहायकों का बल बहुत समय से श्रेय-चर्चा के अधिकारी रहे हैं, पर भुलाया यह भी नहीं जाना चाहिए कि आध्यात्मिक साधना के सहारे उपजने वाला आत्मबल भी उपेक्षणीय नहीं है। वह न तो अप्रामाणिक है और न छद्म। गड़बड़ी मात्र वहीं पड़ती है जहाँ उसके साथ जुड़े सिद्धान्तों को भुला दिया जाता है और कुछ मंत्र-यंत्रों से ही गगनचुम्बी अपेक्षा की जाने लगती है और उसके सफल न होने पर निराशा एवं नास्तिकता उभरती है।
🔶 व्यक्तिगत लाभ तक अपने को सीमाबद्ध कर लेने वाला व्यक्ति अपनी संकीर्णता में इतना अधिक लिप्त हो जाता है कि उसकी दूसरी दुष्प्रवृत्तियाँ इसी आधार पर पनपती हैं। अध्यात्म क्षेत्र मेें भी जो लोग इसी रीति-नीति को अपनाते हैं, उनकी गरिमा भी एक प्रकार से समाप्त प्राय: हो जाती है। अपने लिए स्वर्ग मुक्ति, ऋद्धि-सिद्धि चमत्कार प्रदर्शन, लोगों से पुजापा बटोरना, अपने को देवताओं का एजेण्ट बताकर उनके द्वारा ओछे लोगों की ऐसी मनोकामनाएँ पूरी कराने का आश्वासन देना जो उनकी पात्रता से बाहर है, ऐसी बातें जिनके मनोरथों में सम्मिलित हो जाएँ, समझना चाहिए कि उनका पूजा-पाठ भजन-कर्मकाण्ड ओछे स्तर का है। उससे अध्यात्म पक्ष की गरिमा बढ़ेगी नहीं वरन् घटेगी ही।
🔷 ईश्वर के निकटवर्ती संबंधी बनना, उनको दर्शन देने के लिए बाधित करना, उनकी कचहरी के दरबारी बनकर सामीप्य-सान्निध्य जैसी मुक्ति का मजा लूटना, औरों से अपने को वरिष्ठ होने की मान्यता बनाना-ऐसा ओछापन है जो किसी भी वास्तविक भगवद् भक्त का अनुगामी बनने वाले को तनिक भी शोभा नहीं देता। यह सब लगभग ऐसा ही है जैसा कि सेठ, साहूकार, राजनेता, पंचतारा होटलों में मौज मजा करने वालों की मन:स्थिति होती है। अमीर लोग भी सेवक, चाकर, चारण और चमचों को इनाम-इकराम बाँटते रहते हैं। ईश्वर की हैसियत उन्हीं लोगों के समतुल्य बना देने का मनोरथ न तो किसी के अध्यात्मवादी होने का प्रमाण है और न ऐसे व्यक्ति को साधक-उपासक ही कहा जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 24
👉 4 Tips
🔷 1. Be impeccable with your word: Speak with integrity. Say only what you mean. Avoid using the word to speak against yourself or to gossip about others. Use the power of your word in the direction of truth and love.
🔶 2. Don't take anything personally: Nothing others do is because o you. What others say and do is a projection of their own reality, their own dream. When you are immune to the opinions and actions of others, you won't be the victim of needless suffering.
🔷 3. Don't make assumptions: Find the courage to ask questions and to express what you really want. Communicate with others as clearly as you can to avoid misunderstandings, sadness and drama. With just this one agreement, you can completely transform your life.
🔶 4. Always do your best: Your best is going to change from moment to moment; it will be different when you are healthy as opposed to sick. Under any circumstance, simply do your best and you will avoid self-judgment, self-abuse and regret.
📖 Miguel Ruiz
🔶 2. Don't take anything personally: Nothing others do is because o you. What others say and do is a projection of their own reality, their own dream. When you are immune to the opinions and actions of others, you won't be the victim of needless suffering.
🔷 3. Don't make assumptions: Find the courage to ask questions and to express what you really want. Communicate with others as clearly as you can to avoid misunderstandings, sadness and drama. With just this one agreement, you can completely transform your life.
🔶 4. Always do your best: Your best is going to change from moment to moment; it will be different when you are healthy as opposed to sick. Under any circumstance, simply do your best and you will avoid self-judgment, self-abuse and regret.
📖 Miguel Ruiz
शनिवार, 6 अक्टूबर 2018
👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 21)
👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि
🔶 अपनी अपेक्षा पिछड़ों, दु:खियारों, आवश्यकताओं की सहायता करना मानवी कर्तव्य है। गिरों को उठाने, उठों को उछालने में ही सच्चे सामर्थ्यवानों के हाथ खुलते और सहायता देते रहे हैं। इस लम्बे जीवन की अवधि में कितनों की कितनी भौतिक एवं आत्मिक सहायता बन पड़ी, यह प्रसंग तो असाधारण रूप से विस्तृत है, पर उसकी चर्चा पर इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि देने वाले का अहंकार उभर सकता है और लेने वाला किसी अहसान की अनुभूति में अपनी हेठी समझकर संकोचग्रस्त हो सकता है।
🔷 सिद्धियों के और भी किसी प्रत्यक्ष प्रमाण का परिचय प्राप्त करना हो तो उसी गणना में एक कड़ी यह भी है कि इन दिनों अस्सी वर्ष की आयु तक पहुँचने वाले प्राय: जराजीर्ण हो जाते हैं और मौत के घर जाने की तैयारी करने लगते हैं। पर यहाँ दृश्य दूसरा ही है। शरीर, मन, संकल्प और पुरुषार्थ उसी स्तर का परिचय दे रहा है जैसे कि वयोवृद्ध द्रोणाचार्य धनुष संधानने और लक्ष्य बेधने की शिक्षा अंत काल तक देते रहे। बुढ़ापे में भी जवानी जीवंत रह सकती है, इस स्तर का इस प्रयोक्ता का एक सघन स्वरूप यह भी है।
🔶 चर्चा को अप्रासंगिक, अनावश्यक और अहंकार स्तर का उद्धत उल्लेख न समझा जाए, इसलिए इस लम्बे प्रसंग को उनके लिए शेष छोड़ दिया है, जो शरीर न रहने पर कुछ और खोजने-बताने के लिए उत्सुक होंगे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 23
🔶 अपनी अपेक्षा पिछड़ों, दु:खियारों, आवश्यकताओं की सहायता करना मानवी कर्तव्य है। गिरों को उठाने, उठों को उछालने में ही सच्चे सामर्थ्यवानों के हाथ खुलते और सहायता देते रहे हैं। इस लम्बे जीवन की अवधि में कितनों की कितनी भौतिक एवं आत्मिक सहायता बन पड़ी, यह प्रसंग तो असाधारण रूप से विस्तृत है, पर उसकी चर्चा पर इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि देने वाले का अहंकार उभर सकता है और लेने वाला किसी अहसान की अनुभूति में अपनी हेठी समझकर संकोचग्रस्त हो सकता है।
🔷 सिद्धियों के और भी किसी प्रत्यक्ष प्रमाण का परिचय प्राप्त करना हो तो उसी गणना में एक कड़ी यह भी है कि इन दिनों अस्सी वर्ष की आयु तक पहुँचने वाले प्राय: जराजीर्ण हो जाते हैं और मौत के घर जाने की तैयारी करने लगते हैं। पर यहाँ दृश्य दूसरा ही है। शरीर, मन, संकल्प और पुरुषार्थ उसी स्तर का परिचय दे रहा है जैसे कि वयोवृद्ध द्रोणाचार्य धनुष संधानने और लक्ष्य बेधने की शिक्षा अंत काल तक देते रहे। बुढ़ापे में भी जवानी जीवंत रह सकती है, इस स्तर का इस प्रयोक्ता का एक सघन स्वरूप यह भी है।
🔶 चर्चा को अप्रासंगिक, अनावश्यक और अहंकार स्तर का उद्धत उल्लेख न समझा जाए, इसलिए इस लम्बे प्रसंग को उनके लिए शेष छोड़ दिया है, जो शरीर न रहने पर कुछ और खोजने-बताने के लिए उत्सुक होंगे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 23
👉 Serve Man as God
🔶 The only way of getting our divine nature manifested is by helping others to do the same. If there is inequality in nature, still there must be equal chance for all – or if greater for some and for some less - the weaker should be given more chance than the strong. In other words, a Brahmana is not so much in need of education as a Chandala. If the son of a Brahmana needs one teacher, that of a Chandala needs ten. For greater help must be given to him whom nature has not endowed with an acute intellect from birth. It is a madman who carries coals to Newcastle. The poor, the downtrodden, the ignorant - let these be your god.
🔷 This is the gist of all worship - to be pure and to do good to others. He who sees Siva in the poor, in the weak, and in the diseased, really worships Siva; and if he sees Siva only in the image, his worship is but preliminary.
🔶 The life of Buddha shows that even a man who has no metaphysics, belongs to no sect, and does not go to any church, or temple, and is a confessed materialist, even he can attain to the highest. …. He was the only man who was ever ready to give up his life for animals, to stop a sacrifice. He once said to a king: ‘If the sacrifice of a lamb helps you to go to heaven, sacrificing a man will help you better; so sacrifice me.’ The king was astonished.
🔷 ‘The good live for others alone. The wise man should sacrifice himself for others.’ I can secure my own good only by doing your good. There is no other way, none whatsoever.
🔶 Go from village to village; do good to humanity and to the world at large. Go to hell yourself to buy salvation for others… ‘When death is so certain, it is better to die for a good cause.’
🔷 Throughout the history of the world, you find great men make great sacrifices and the mass of mankind enjoy the benefit. If you want to give up everything for your own salvation, it is nothing. Do you want to forgo even your own salvation for the good of the world? You are God, think of that.
📖 Swami Vivekananda
🔷 This is the gist of all worship - to be pure and to do good to others. He who sees Siva in the poor, in the weak, and in the diseased, really worships Siva; and if he sees Siva only in the image, his worship is but preliminary.
🔶 The life of Buddha shows that even a man who has no metaphysics, belongs to no sect, and does not go to any church, or temple, and is a confessed materialist, even he can attain to the highest. …. He was the only man who was ever ready to give up his life for animals, to stop a sacrifice. He once said to a king: ‘If the sacrifice of a lamb helps you to go to heaven, sacrificing a man will help you better; so sacrifice me.’ The king was astonished.
🔷 ‘The good live for others alone. The wise man should sacrifice himself for others.’ I can secure my own good only by doing your good. There is no other way, none whatsoever.
🔶 Go from village to village; do good to humanity and to the world at large. Go to hell yourself to buy salvation for others… ‘When death is so certain, it is better to die for a good cause.’
🔷 Throughout the history of the world, you find great men make great sacrifices and the mass of mankind enjoy the benefit. If you want to give up everything for your own salvation, it is nothing. Do you want to forgo even your own salvation for the good of the world? You are God, think of that.
📖 Swami Vivekananda
👉 नदी बनाम जोहड़ (तालाब)
🔶 एक जल-पूरित नदी कल-कल करती हुई आनन्द और उल्लास के साथ बही जा रही थी । उसके किनारे बड़े-बड़े सुन्दर नगर और उपनगर बसे हुए थे। इन सभी नगरों के निवासी विविध प्रकार से उसके जल का उपयोग करके अपने दैनिक जीवन को सफल बनाते रहते थे।
🔷 पर्वतों से टकराकर नदी का पानी जहाँ ऊपर से नीचे गिरता था वहाँ एक विशाल विद्युत-केन्द्र बनाया गया था जहाँ बिजली का उत्पादन होकर उससे अनेक प्रकार के यान्त्रिक और औद्योगिक कार्यों का संचालन किया जा रहा था।
🔶 आगे चलकर इसी नदी से कुछ नहरें निकाली गई थीं। कहीं नावों से इसमें व्यापार करके अपनी आजीविका चला रहे थे।
🔷 ऐसा था इस नदी का जीवन । आदि से अन्त तक अपने अंग-प्रत्यंग से औरों का भला करती हुई जब इस प्रकार वेग से समुद्राभिमुख बही चली जा रही थी तब एक ठहरी हुई जोहड़ ने, जिसका पानी प्रवाहहीन होने के कारण दुर्गन्धयुक्त हो गया था इस नदी से कहा-
🔶 “बहन, बताओ अपने इस दिन-रात के बहते हुए जीवन में आखिर तुम्हें किस बात का अनुभव होता है, जो तुम निरन्तर कल-कल करती हुई किलोलें में किया करती हो? मुझे क्यों नहीं देखती, जो एक जगह ठहरकर अपने जीवन को प्रगति और प्रवाह से दूर करके स्थिर होकर यहाँ पड़ी-पड़ी आराम के साथ अपने दिन गुजार रही हूँ।”
🔷 नदी ने जोहड़ से कहा-प्रगति और प्रवाह का पन्थ अपनाने से ही मेरा आभ्यन्तर स्वच्छ और निर्मल बना हुआ है और इसीलिए मेरी हर बूँद का सदुपयोग किया जाता है। प्रगति और प्रवाहहीन होने के कारण ही तुम गंदगी का आगार बनी हुई हो। औरों के उपयोग में न आने वाले तुम्हारे जीवन का इस दुनिया में अधिक अस्तित्व नहीं है।
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.13
🔷 पर्वतों से टकराकर नदी का पानी जहाँ ऊपर से नीचे गिरता था वहाँ एक विशाल विद्युत-केन्द्र बनाया गया था जहाँ बिजली का उत्पादन होकर उससे अनेक प्रकार के यान्त्रिक और औद्योगिक कार्यों का संचालन किया जा रहा था।
🔶 आगे चलकर इसी नदी से कुछ नहरें निकाली गई थीं। कहीं नावों से इसमें व्यापार करके अपनी आजीविका चला रहे थे।
🔷 ऐसा था इस नदी का जीवन । आदि से अन्त तक अपने अंग-प्रत्यंग से औरों का भला करती हुई जब इस प्रकार वेग से समुद्राभिमुख बही चली जा रही थी तब एक ठहरी हुई जोहड़ ने, जिसका पानी प्रवाहहीन होने के कारण दुर्गन्धयुक्त हो गया था इस नदी से कहा-
🔶 “बहन, बताओ अपने इस दिन-रात के बहते हुए जीवन में आखिर तुम्हें किस बात का अनुभव होता है, जो तुम निरन्तर कल-कल करती हुई किलोलें में किया करती हो? मुझे क्यों नहीं देखती, जो एक जगह ठहरकर अपने जीवन को प्रगति और प्रवाह से दूर करके स्थिर होकर यहाँ पड़ी-पड़ी आराम के साथ अपने दिन गुजार रही हूँ।”
🔷 नदी ने जोहड़ से कहा-प्रगति और प्रवाह का पन्थ अपनाने से ही मेरा आभ्यन्तर स्वच्छ और निर्मल बना हुआ है और इसीलिए मेरी हर बूँद का सदुपयोग किया जाता है। प्रगति और प्रवाहहीन होने के कारण ही तुम गंदगी का आगार बनी हुई हो। औरों के उपयोग में न आने वाले तुम्हारे जीवन का इस दुनिया में अधिक अस्तित्व नहीं है।
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.13
👉 फैशन का कलंक धो डालिये (अन्तिम भाग)
🔶 भारत के नागरिकों की कारों, मोटर साइकिल और यहां तक कि रिक्शों, तांगों में गाते हुए रेडियो सेट तथा ट्रांजिस्टरों को देखकर संसार का कौन-सा देश इस बात पर विश्वास कर लेगा कि भारत एक गरीब देश है और मित्रों की सहायता का अधिकारी है? और यदि वह उसको गरीब समझ कर उसके कारणों पर सोचेगा तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि भारत की गरीबी के प्रमुख हेतुओं में से एक उसके नागरिकों की, फैशनपरस्ती और फिजूलखर्च है। यह एक राष्ट्रीय अपमान है, देश की गौरव गरिमा पर लांछन है। इस पर हम सबको और खासतौर पर भारतीय नौजवानों को गम्भीरता से विचार ही नहीं करना है बल्कि अपनी बालवृत्तियों में सुधार कर कलंक मिटाने का प्रयत्न करना है। यदि हम कपड़ों लत्तों में फैलसूफ हैं तो अपने परिवार वालों अथवा परोक्ष रूप से अपने अनेक देश बन्धुओं को नंगा रहने पर मजबूर करते हैं।
🔷 सुन्दरता, वस्त्रों अथवा वेशविन्यास की विचित्रता अथवा अपव्ययता में नहीं है वह व्यवस्था एवं करीने में है। मोटे तथा सस्ते कपड़े भी यदि ठीक सिले-धुले और पहने गये हैं तो वे मनुष्य के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देंगे। अपनी तथा अपने देश काल के अनुसार ही रहन-सहन रखना बुद्धिमानी, भद्रता तथा सज्जनता है। फैशन के नशे में सब कुछ समझने पर भी पैसा खोना सरासर नादानी है। उस पैसे को बचाकर हम सबको अपने-अपने परिवार तथा राष्ट्र की उन्नति पर खर्च कर जीवन से प्रदर्शन का कलंक धो डालने में ही कल्याण है, शोभा है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 112
🔷 सुन्दरता, वस्त्रों अथवा वेशविन्यास की विचित्रता अथवा अपव्ययता में नहीं है वह व्यवस्था एवं करीने में है। मोटे तथा सस्ते कपड़े भी यदि ठीक सिले-धुले और पहने गये हैं तो वे मनुष्य के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देंगे। अपनी तथा अपने देश काल के अनुसार ही रहन-सहन रखना बुद्धिमानी, भद्रता तथा सज्जनता है। फैशन के नशे में सब कुछ समझने पर भी पैसा खोना सरासर नादानी है। उस पैसे को बचाकर हम सबको अपने-अपने परिवार तथा राष्ट्र की उन्नति पर खर्च कर जीवन से प्रदर्शन का कलंक धो डालने में ही कल्याण है, शोभा है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 112
शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018
👉 सफलता का एक मंत्र ये भी है
🔷 दयानन्द नाम का एक बहुत बड़ा व्यापारी था और उसका इकलौता पुत्र सत्यप्रकाश जो पढ़ने से बहुत जी चुराता था और परीक्षा मे भी किसी और के भरोसे रहता और फेल हो जाता! पर एक दिन उसके जीवन मे ऐसी घटना घटी फिर उसने संसार से कोई आशाएं न रखी और फिर पुरी तरह से एकाग्रचित्त होकर चलने लगा!
🔶 एक दिन दयानन्द का बेटा स्कूल से घर लोटा तो वो दहलीज से ठोकर खाके नीचे गिरा जैसै ही उसके माँ बाप ने देखा तो वो भागकर आये और गिरे हुये बेटे को उठाने लगे पर बेटे सत्यप्रकाश ने कहा आप रहने दिजियेगा मैं स्वयं उठ जाऊँगा!
🔷 दयानन्द- ये क्या कह रहे हो पुत्र? सत्यप्रकाश- सत्य ही तो कह रहा हूँ पिताश्री इंसान को सहायता तभी लेनी चाहिये जब उसकी बहुत ज्यादा जरूरत हो और इंसान को ज्यादा आशाएं नही रखनी चाहिये नही तो एक दिन संसार उसे ऐसा गिराता है की वो फिर शायद कभी उठ ही न पाये!
🔶 दयानन्द- आज ये कैसी बाते कर रह हो पुत्र? बार बार पुछने पर भी पुत्र कुछ न बोला कई दिन गुजर गये फिर एक दिन दयानन्द- आखिर हमारा क्या अपराध है पुत्र, की तुम हमारे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हो!
🔷 सत्यप्रकाश- तो सुनिये पिता श्री एक दिन मैं स्कूल से जब घर लौट रहा था तो एक वृद्ध सज्जन माथे पर फल की टोकरी लेकर फल बेच रहे थे और चलते चलते वो ठोकर लगने से गिर गये जब मैं उन्हे उठाने पहुँचा तो उन्होंने कहा बेटा रहने दो मैं उठ जाऊँगा पर मैं आपको धन्यवाद देता हूँ की आप सहायता के लिये आगे आये!
🔶 फिर उन्होने कहा पुत्र आप एक विद्यार्थी हो आपके सामने एक लक्ष्य भी है और मैं आपको सफलता का एक मंत्र देता हूँ की संसार से ज्यादा आशाएं कभी न रखना! फिर मैंने पूछा बाबा आप ऐसा क्यों कह रहे हो और संसार से न रखुं आशाएं तो किससे रखुं?
🔷 उन्होने कहा मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ पुत्र की जो गलती मैंने की वो गलती आप न करना और आशाएं स्वयं से रखना अपने सद्गुरु और इष्टदेवजी से रखना किसी और से ज्यादा आशाएं रखोगे तो एक दिन आपको असफलताएं ज्यादा और सफलताएं कम मिलेगी!
🔶 मेरा एक इकलौता पुत्र जब उसका जन्म हुआ तो कुछ समय बाद मॆरी पत्नी एक एक्सीडेंट मे चल बसी और वो भी गम्भीर घायल हो गया उसके इलाज मे मैंने अपना सबकुछ लगा दिया वो पूर्ण स्वस्थ हो गया और वो स्कूल जाने लगा और मैं उससे ये आशाएं रखने लगा की एक दिन ये कामयाब इंसान बनेगा और धीरे धीरे मॆरी आशाएं बढ़ने लगी फिर एक दिन वो बहुत बड़ा आदमी बना की उसने मॆरी सारी आशाओं को एक पल मे पूरा कर दिया!
🔷 तो मैंने पूछा की वो कैसे? तो उन्होने कहा की वो ऐसे की जब मैं रात को सोया तो अपने घर मे पर जब उठा तो मैंने अपने आपको एक वृद्धआश्रम मे पाया और जब मैं घर पहुँचा तो वहाँ एक सज्जन पुरूष मिले उन्होने बताया की बाबा अब ये घर मेरा है आपका बेटा मुझे बेचकर चला गया! फिर मैं अपने सद्गुरु के दरबार मे गया क्षमा माँगने!
🔶 फिर मैंने कहा पर बाबा सद्गुरु से क्षमा माँगने क्यों तो उन्होने कहा पुत्र वर्षों पहले उन्होंने मुझसे कहा था की बेटा संसार से ज्यादा आशाएं न रखना नही तो अंततः निराशा ही हाथ आयेगी और फिर मैंने उन्हे प्रणाम करके अपनी आगे की यात्रा शुरू की और आज मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि आज मैं इस संसार से नही बस अपने आपसे अपने सद्गुरु से और अपने इष्टदेवजी से आशाएं रखता हूँ!
🔷 और फिर मैं वहाँ से चला आया! दयानन्द- माना की वो बिल्कुल सही कह रहे थे पर बेटा इसमे हमारा क्या दोष है? सत्यप्रकाश- क्योंकि जब उन्होंने अपने पुत्र का नाम बताया तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई! क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र का नाम दयानन्द बताया और वो दयानन्द जी कोई और नही आप ही हो!
🔶 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना हमेशा ऐसी आशाएं रखना जो तुम्हे लक्ष्य तक पहुँचा दे पर संसार से कभी मत रखना अपने आपसे, अपने सद्गुरु से और अपने ईष्ट से रखना क्योंकि जिसने भी संसार से आशाएं रखी अंततः वो निराश ही हुआ और जिसने नही रखी वो लक्ष्य तक पहुँचने मे सफल हुआ!
🔷 मित्रों तो सफलता का एक सूत्र ये भी है की संसार से ज्यादा आशाएं कभी मत रखना क्योंकि ये संसार जब भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की आशाओं पर खरा न उतरा तो भला हम और आप क्या है!
🔶 एक दिन दयानन्द का बेटा स्कूल से घर लोटा तो वो दहलीज से ठोकर खाके नीचे गिरा जैसै ही उसके माँ बाप ने देखा तो वो भागकर आये और गिरे हुये बेटे को उठाने लगे पर बेटे सत्यप्रकाश ने कहा आप रहने दिजियेगा मैं स्वयं उठ जाऊँगा!
🔷 दयानन्द- ये क्या कह रहे हो पुत्र? सत्यप्रकाश- सत्य ही तो कह रहा हूँ पिताश्री इंसान को सहायता तभी लेनी चाहिये जब उसकी बहुत ज्यादा जरूरत हो और इंसान को ज्यादा आशाएं नही रखनी चाहिये नही तो एक दिन संसार उसे ऐसा गिराता है की वो फिर शायद कभी उठ ही न पाये!
🔶 दयानन्द- आज ये कैसी बाते कर रह हो पुत्र? बार बार पुछने पर भी पुत्र कुछ न बोला कई दिन गुजर गये फिर एक दिन दयानन्द- आखिर हमारा क्या अपराध है पुत्र, की तुम हमारे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हो!
🔷 सत्यप्रकाश- तो सुनिये पिता श्री एक दिन मैं स्कूल से जब घर लौट रहा था तो एक वृद्ध सज्जन माथे पर फल की टोकरी लेकर फल बेच रहे थे और चलते चलते वो ठोकर लगने से गिर गये जब मैं उन्हे उठाने पहुँचा तो उन्होंने कहा बेटा रहने दो मैं उठ जाऊँगा पर मैं आपको धन्यवाद देता हूँ की आप सहायता के लिये आगे आये!
🔶 फिर उन्होने कहा पुत्र आप एक विद्यार्थी हो आपके सामने एक लक्ष्य भी है और मैं आपको सफलता का एक मंत्र देता हूँ की संसार से ज्यादा आशाएं कभी न रखना! फिर मैंने पूछा बाबा आप ऐसा क्यों कह रहे हो और संसार से न रखुं आशाएं तो किससे रखुं?
🔷 उन्होने कहा मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ पुत्र की जो गलती मैंने की वो गलती आप न करना और आशाएं स्वयं से रखना अपने सद्गुरु और इष्टदेवजी से रखना किसी और से ज्यादा आशाएं रखोगे तो एक दिन आपको असफलताएं ज्यादा और सफलताएं कम मिलेगी!
🔶 मेरा एक इकलौता पुत्र जब उसका जन्म हुआ तो कुछ समय बाद मॆरी पत्नी एक एक्सीडेंट मे चल बसी और वो भी गम्भीर घायल हो गया उसके इलाज मे मैंने अपना सबकुछ लगा दिया वो पूर्ण स्वस्थ हो गया और वो स्कूल जाने लगा और मैं उससे ये आशाएं रखने लगा की एक दिन ये कामयाब इंसान बनेगा और धीरे धीरे मॆरी आशाएं बढ़ने लगी फिर एक दिन वो बहुत बड़ा आदमी बना की उसने मॆरी सारी आशाओं को एक पल मे पूरा कर दिया!
🔷 तो मैंने पूछा की वो कैसे? तो उन्होने कहा की वो ऐसे की जब मैं रात को सोया तो अपने घर मे पर जब उठा तो मैंने अपने आपको एक वृद्धआश्रम मे पाया और जब मैं घर पहुँचा तो वहाँ एक सज्जन पुरूष मिले उन्होने बताया की बाबा अब ये घर मेरा है आपका बेटा मुझे बेचकर चला गया! फिर मैं अपने सद्गुरु के दरबार मे गया क्षमा माँगने!
🔶 फिर मैंने कहा पर बाबा सद्गुरु से क्षमा माँगने क्यों तो उन्होने कहा पुत्र वर्षों पहले उन्होंने मुझसे कहा था की बेटा संसार से ज्यादा आशाएं न रखना नही तो अंततः निराशा ही हाथ आयेगी और फिर मैंने उन्हे प्रणाम करके अपनी आगे की यात्रा शुरू की और आज मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि आज मैं इस संसार से नही बस अपने आपसे अपने सद्गुरु से और अपने इष्टदेवजी से आशाएं रखता हूँ!
🔷 और फिर मैं वहाँ से चला आया! दयानन्द- माना की वो बिल्कुल सही कह रहे थे पर बेटा इसमे हमारा क्या दोष है? सत्यप्रकाश- क्योंकि जब उन्होंने अपने पुत्र का नाम बताया तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई! क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र का नाम दयानन्द बताया और वो दयानन्द जी कोई और नही आप ही हो!
🔶 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना हमेशा ऐसी आशाएं रखना जो तुम्हे लक्ष्य तक पहुँचा दे पर संसार से कभी मत रखना अपने आपसे, अपने सद्गुरु से और अपने ईष्ट से रखना क्योंकि जिसने भी संसार से आशाएं रखी अंततः वो निराश ही हुआ और जिसने नही रखी वो लक्ष्य तक पहुँचने मे सफल हुआ!
🔷 मित्रों तो सफलता का एक सूत्र ये भी है की संसार से ज्यादा आशाएं कभी मत रखना क्योंकि ये संसार जब भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की आशाओं पर खरा न उतरा तो भला हम और आप क्या है!
👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 20)
👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि
🔷 जिन्होंने विनिर्मित प्रज्ञा पीठों की हजारों की संख्या में भव्य इमारतें देखी हैं, वे एक ही बात सोच सकते हैं कि यह अपने समय का अभिनव सृजन आन्दोलन है। चार धाम बनाने वालों को जितना श्रेय मिला उसकी तुलना में यह सृजन कार्य कितना महँगा और कितना विस्तृत बन पड़ा है, इसे एक आश्चर्य ही कहना चाहिए। प्रचलित कुरीतियों एवं अवांछनीयताओं के साथ टक्कर लेने की मोर्चेबन्दी को दूसरे महाभारत के समतुल्य कहा जा सकता है।
🔶 ईर्ष्यालुओं दुर्जनों और विद्वेषियों के आक्रमण सच्चाई को किस प्रकार हराने और तोड़ने में असफल होते हैं, इस तथ्य को मात्र वे लोग ही जानते हैं जो अपने निकट सम्पर्क में रहे और उन हरकतों से परिचित रहे हैं। चूँकि इन प्रसंगों की कभी चर्चा नहीं की गई, प्रतिरोध के लिए एक पतली छड़ी तक नहीं उठाई गई तो वे अनाचार कैसे प्रगट होते, जिन्हें दैवी प्रयोजनों में विश्वामित्र यज्ञ-ध्वंस षड्यन्त्र की ही उपमा दी जा सकती है। भक्त की रक्षा कैसे होती है, इसके प्रमाण में प्रहलाद की, गज की, द्रौपदी आदि की उपमा दी जाती है। एक कड़ी और भी इन्हीं दिनों की यह जुड़ सके तो कोई हर्ज नहीं। इसे भी एक सिद्धि कह सकते हैं।
🔷 सहायता के लिए किसी के आगे हाथ न पसारने के पीछे कोई अहंकार प्रदर्शन का भाव नहीं रहा किन्तु यह एक प्रयोग परीक्षण था कि यदि भगवत् प्रयोजन के लिए कहीं से कोई प्रामाणिकता उभरे तो उसकी शक्ति और सम्पदा कितनी बढ़ जाती है? इसके लिए पुरातन उदाहरण हनुमानजी का है। नया उदाहरण अपने समय के इस प्रयोग-परीक्षण को समझा जा सकता है कि गंगा के याचना न करने पर भी हिमालय किस प्रकार कभी न सूखने वाली जलराशि प्रदान करता रहता है? अपनाए गए क्रिया-कलापों में कितनी जनशक्ति की, कितनी धनशक्ति की, कितने साधनों की आवश्यकता पड़ती है और वह सुदामापुरी को द्वारिका पुरी में बदल जाने का कैसे उदाहरण बनती है? इस दृश्य को कोई एक प्रकार से सिद्ध स्तर की भी गिन सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 22
🔷 जिन्होंने विनिर्मित प्रज्ञा पीठों की हजारों की संख्या में भव्य इमारतें देखी हैं, वे एक ही बात सोच सकते हैं कि यह अपने समय का अभिनव सृजन आन्दोलन है। चार धाम बनाने वालों को जितना श्रेय मिला उसकी तुलना में यह सृजन कार्य कितना महँगा और कितना विस्तृत बन पड़ा है, इसे एक आश्चर्य ही कहना चाहिए। प्रचलित कुरीतियों एवं अवांछनीयताओं के साथ टक्कर लेने की मोर्चेबन्दी को दूसरे महाभारत के समतुल्य कहा जा सकता है।
🔶 ईर्ष्यालुओं दुर्जनों और विद्वेषियों के आक्रमण सच्चाई को किस प्रकार हराने और तोड़ने में असफल होते हैं, इस तथ्य को मात्र वे लोग ही जानते हैं जो अपने निकट सम्पर्क में रहे और उन हरकतों से परिचित रहे हैं। चूँकि इन प्रसंगों की कभी चर्चा नहीं की गई, प्रतिरोध के लिए एक पतली छड़ी तक नहीं उठाई गई तो वे अनाचार कैसे प्रगट होते, जिन्हें दैवी प्रयोजनों में विश्वामित्र यज्ञ-ध्वंस षड्यन्त्र की ही उपमा दी जा सकती है। भक्त की रक्षा कैसे होती है, इसके प्रमाण में प्रहलाद की, गज की, द्रौपदी आदि की उपमा दी जाती है। एक कड़ी और भी इन्हीं दिनों की यह जुड़ सके तो कोई हर्ज नहीं। इसे भी एक सिद्धि कह सकते हैं।
🔷 सहायता के लिए किसी के आगे हाथ न पसारने के पीछे कोई अहंकार प्रदर्शन का भाव नहीं रहा किन्तु यह एक प्रयोग परीक्षण था कि यदि भगवत् प्रयोजन के लिए कहीं से कोई प्रामाणिकता उभरे तो उसकी शक्ति और सम्पदा कितनी बढ़ जाती है? इसके लिए पुरातन उदाहरण हनुमानजी का है। नया उदाहरण अपने समय के इस प्रयोग-परीक्षण को समझा जा सकता है कि गंगा के याचना न करने पर भी हिमालय किस प्रकार कभी न सूखने वाली जलराशि प्रदान करता रहता है? अपनाए गए क्रिया-कलापों में कितनी जनशक्ति की, कितनी धनशक्ति की, कितने साधनों की आवश्यकता पड़ती है और वह सुदामापुरी को द्वारिका पुरी में बदल जाने का कैसे उदाहरण बनती है? इस दृश्य को कोई एक प्रकार से सिद्ध स्तर की भी गिन सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 22
👉 We can control
🔷 We cannot control the way people interpret our ideas or thoughts, but we can control the words and tones we choose to convey them. Peace is built on understanding, and wars are built on misunderstandings. Never underestimate the power of a single word, and never recklessly throw around words. One wrong word. or misinterpreted word, can change the meaning of an entire sentence - and even start a war. And one right word, or one kind word, can grant you the heavens and open doors.
~ Suzy Kassem
~ Suzy Kassem
👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 3)
🔷 इन जलते राष्ट्रीय सत्यों को भारतीय नौजवान वर्ग नहीं समझ पा रहा और न वह तब तक समझ ही पायेगा जब तक प्रयत्नपूर्वक उसके मस्तिष्क में यह विचार नहीं भरे जायेंगे कि फैशनपरस्ती मानसिक न्यूनता का द्योतक है, आन्तरिक दरिद्रता का विज्ञापन है। उसका यह विचार कि बनाव-शृंगार अथवा प्रदर्शनपूर्ण, वेश-विन्यास से वह अपने व्यक्तित्व को ऊंचा कर रहा है—भ्रमपूर्ण है। बाहरी आडम्बरों से विरचित व्यक्तित्व स्वयं इसका गवाह है कि व्यक्ति व्यक्तित्वहीन है, ओछा और बालवृत्ति वाला है। मनुष्य का व्यक्तित्व आत्मा की उच्चता है जो चेहरे पर आकर्षण बन कर बोलती है वस्त्रों की तड़क-भड़क व्यक्तित्व की छटा नहीं है और न उससे किसी के हीन व्यक्तित्व में महानता का समावेश ही होता है। उसे यह भ्रान्त धारणा हृदय से निकाल देनी चाहिए कि वेशविन्यास की विलक्षणता उसे विलक्षण सिद्ध कर सकेगी।
🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।
🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111
🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।
🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111
गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018
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