मंगलवार, 4 सितंबर 2018

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (भाग 2)

🔶 आध्यात्मिक लाभ के अतिरिक्त संसार की कोई भी उपलब्धि मनुष्य को क्षुद्रता से विराट की ओर और तुच्छता से उच्चता की ओर नहीं ले जा सकती। यह विशेषता केवल आध्यात्मिकता में ही है कि मनुष्य क्षुद्र से विराट और तुच्छ से उच्च हो जाता।

🔷 आध्यात्मिक जीवन आत्मिक सुख का निश्चित हेतु है। अध्यात्मवाद वह दिव्य आधार है जिस पर मनुष्य की आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार की उन्नतियाँ एवं समृद्धियाँ अवलम्बित हैं। साँसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिये भी जिन परिश्रम, पुरुषार्थ, सहयोग, सहकारिता आदि गुणों की आवश्यकता होती है वे सब आध्यात्मिक जीवन के ही अंश है। मनुष्य का आन्तरिक विकास तो अध्यात्म के बिना हो ही नहीं सकता।

🔶 अध्यात्मवाद जीवन का सच्चा ज्ञान है। इसको जाने बिना संसार के सारे ज्ञान अपूर्ण हैं और इसको जान लेने के बाद कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता। यह वह तत्वज्ञान एवं महा-विज्ञान है जिसकी जानकारी होते ही मानव-जीवन अमरता पूर्ण आनन्द से ओत-प्रोत हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान से पाये हुए आनन्द की तुलना संसार के किसी आनन्द से नहीं की जा सकती क्योंकि इस आत्मानन्द के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। वस्तु-जन्य सुख नश्वर होता है, परिवर्तनशील तथा अन्त में दुःख देने वाला होता है। वस्तु-जन्य मिथ्या आनंद वस्तु के साथ ही समाप्त हो जाता है। जब कि आध्यात्मिकता से उत्पन्न आत्मिक सुख जीवन भर साथ तो रहता ही है अन्त में भी मनुष्य के साथ जाया करता है। वह अक्षय और अविनश्वर होता है, एक बार प्राप्त हो जाने पर फिर कभी नष्ट नहीं होता। शरीर की अवधि तक तो रहता ही है, शरीर छूटने पर भी अविनाशी आत्मा के साथ संयुक्त रहा करता है।

🔷 ऐसे अविनाशी आनन्द की उपेक्षा करके जीवन को क्षणिक एवं मिथ्या सुखदायी उपलब्धियों में लगा देना और उनमें संतोष अथवा सार्थकता अनुभव करना अनमोल मानव जीवन की सबसे बड़ी हानि है। जब आनन्द ही मानव जीवन का वर्तमानकालिक लक्ष्य है तब शाश्वत आनन्द के लिये ही प्रयत्न क्यों न किया जाये? क्यों क्षणभंगुर सुख की छाया-वीथियों में ही भटकते रहा जाये?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/January/v1.2

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति

🔶 स्रष्टा ने जन्म के समय ही एक पारसमणि तुम्हें प्रदान की है और वह ऐसी है जिसके आजीवन छिनने या गुमने का कोई खतरा नहीं है।

🔷 इस पारसमणि का नाम है- विचारणा। जो मस्तिष्क की बहुमूल्य पिटारी में इस प्रकार सुरक्षित रखी रहती है, जहाँ किसी चोर की पहुँच न हो सके। इसके रहते तुम्हें किसी पराभव का संकट आने की आशंका नहीं है।

🔶 विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं, पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शाक्ति अनन्त है। वे एक प्रकार के चुम्बक हैं, जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। साधन किसी को उपहार में नहीं मिले और यदि मिले हों तो टिके नहीं। अपना पेट ही आहार पचाता और जीवित रहने योग्य रस- रक्त उत्पादन करता है। ठीक इसी प्रकार विचार प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमतायें उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं, जैसा कि सोचा और चाहा गया था।

🔶 विचारों की सृजनात्मक क्षमता समझना और उन्हें सही दिशा में गतिशील करना ही सौभाग्य है, जिसे उपलब्ध पारसमणि प्राप्त कराती रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 September 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 September 2018


👉 गुस्सा करने से पहले सोचें

🔶 एक बार मेहनती और ईमानदार नौजवान बहुत पैसे कमाना चाहता था। उसका सपना था कि वह मेहनत करके खूब पैसे कमाये और एक दिन अपने पैसे से एक कार खरीदे। जब भी वह कोई कार देखता तो उसका अपनी कार खरीदने का मन करता।

🔷 कुछ साल बाद उसकी अच्छी नौकरी लग गयी। उसकी शादी भी हो गयी और कुछ ही वर्षों में वह एक बेटे का पिता भी बन गया। सब कुछ ठीक चल रहा था मगर फिर भी उसे एक दुख सताता था कि उसके पास उसकी अपनी कार नहीं थी। धीरे – धीरे उसने पैसे जोड़ कर एक कार खरीद ली। कार खरीदने का उसका सपना पूरा हो चुका था और इससे वह बहुत खुश था। वह कार की बहुत अच्छी तरह देखभाल करता था और उसमें शान से घूमता था।

🔶 एक दिन रविवार को वह कार को रगड़ – रगड़ कर धो रहा था। यहां तक कि गाड़ी के टायरों को भी चमका रहा था। उसका 5 वर्षीय बेटा भी उसके साथ था। बेटा भी पिता के आगे पीछे घूम – घूम कर कार को साफ होते देख रहा था। कार धोते धोते अचानक उस आदमी ने देखा कि उसका बेटा कार के बोनट पर किसी चीज़ से खुरच – खुरच कर कुछ लिख रहा है। यह देखते ही उसे बहुत गुस्सा आया। वह अपने बेटे को पीटने लगा। उसने उसे इतनी जो़र से पीटा कि बेटे के हाथ की एक उंगली टूट गयी। दरअसल वह आदमी अपनी कार को बहुत चाहता था और वह बेटे की इस शरारत को बर्दाश्त नहीं कर सका।

🔷 बाद में जब उसका गुस्सा कुछ कम हुआ तो उसने सोंचा कि जा कर देखूँ कि कार में कितनी खरोंच लगी है। कार के पास जा कर देखने पर उसके होश उड़ गये। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह फूट – फूट कर रोने लगा। कार पर उसके बेटे ने खुरच कर लिखा था  I love you Papa.  आई लव यू पापा!

🔶 मित्रों गुस्से में हम अपनी सोचने समझने की शक्ति खो देते हैं और अक्सर गलत फैसले ले लेते हैं। जिससे हमें बाद में बहुत नुकसान उठाना पड़ता है, बहुत पछताना पड़ता है।  इसलिए गुस्से में आकर कोई गलत फैसला लेने से पहले या कोई गलत क़दम उठाने से पहले हमें ये ज़रूर सोंचना चाहिये कि हमारे इस फैसले का अंजाम क्या होगा?

सोमवार, 3 सितंबर 2018

👉 ईश्वर प्राप्ति की मनोदशा

🔷 एक जिज्ञासु ने किसी महात्मा से पूछा-ईश्वर किन को मिल सकता है? महात्मा ने कुछ उत्तर न दिया। कई दिन वही प्रश्न पूछने पर एक दिन महात्मा उसे नदी में स्नान कराने ले गये और उस जिज्ञासु को साथ लेकर गले तक पानी में घुस गये। यहाँ पहुँचकर उनने उस व्यक्ति की गरदन पकड़ ली और जोर से पानी में दबोच दिया। कई मिनट बाद उसे छोड़ा तो वह साँस घुटने से बुरी तरह हाँफ रहा था।

🔶 महात्मा ने पूछा जब तुम्हें पानी में डुबाया गया तो उस समय तुम्हारी मनोदशा क्या थी? उसमें उत्तर दिया में केवल यह सोचता था कि किसी प्रकार मेरे प्राण बचें और बाहर निकले, इसके अतिरिक्त और कोई विचार मेरे मन में नहीं उठ रहा था। महात्मा ने कहा-जैसी तुम्हारी मनोदशा पानी में डूबे रहते थी, वैसी ही व्याकुलता और एक मात्र इच्छा यदि परमात्मा के प्राप्त करने के लिये किसी की हो जाय तो उसे अविलम्ब परमात्मा मिल सकता है।

🔷 परमात्मा को प्राप्त करने के लिये जिसमें तीव्र लगन और सच्ची आकांक्षा है उसको प्रभु की प्राप्ति में बहुत विलम्ब नहीं लगता।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1961

👉 प्रेम का परिमाण

🔷 गौतम बुद्ध यात्रा पर थे। रास्ते में उनसे लोग मिलते। कुछ उनके दर्शन करके संतुष्ट हो जाते तो कुछ अपनी समस्याएं रखते थे। बुद्ध सबकी परेशानियों का समाधान करते थे।

🔶 एक दिन बुद्ध कहीं जा रहे थे, रास्ते में एक व्यक्ति मिला वह चलते-चलते बुद्ध को अपनी समस्या सुनाने लगा बोला- “मैं एक विचित्र तरह के द्वंद्व से गुजर रहा हूँ। मैं लोगों को प्यार तो करता हूँ पर मुझे बदले में कुछ नहीं मिलता। जब मैं किसी के प्रति स्नेह रखता हूँ तो यह अपेक्षा तो करूंगा ही कि बदले में मुझे भी स्नेह या संतुष्टि मिले। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं मिलता। मेरा जीवन स्नेह से वंचित है। मैं स्वयं को अकेला महसूस करता हूँ।

🔷 कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे व्यवहार में ही कोई कमी है? कृपया बताएं कि मुझ में कहां गलती और कमी है?” बुद्ध ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया, वे चुप रहे! सब चलते रहे। चलते-चलते बुद्ध के एक शिष्य को प्यास लगी। कुआं पास ही था।

🔶 रस्सी और बाल्टी भी पड़ी हुई थी। शिष्य ने बाल्टी कुएं में डाली और खींचने लगा। कुआं गहरा था। पानी खींचते-खींचते उसके हाथ थक गए पर वह पानी नहीं भर पाया क्योंकि बाल्टी जब भी ऊपर आती खाली ही रहती।

🔷 सभी यह देखकर हंसने लगे। हालांकि कुछ यह भी सोच रहे थे कि इसमें कोई चमत्कार तो नहीं? थोड़ी देर में सबको कारण समझ में आ गया। दरअसल बाल्टी में छेद था।

🔶 बुद्ध ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और कहा- “हमारा मन भी इसी बाल्टी की ही तरह है जिसमें कई छेद हैं। आखिर इसमें प्रेम का पानी टिकेगा भी तो कैसे?

🔷 मन में यदि सुराख रहेगा तो उसमें प्रेम भरेगा कैसे। क्या वह रुक पाएगा? तुम्हें प्रेम मिलता भी है तो टिकता नहीं है। तुम उसे अनुभव नहीं कर पाते क्योंकि मन में बदले की अपेक्षा रूपी विकार का छेद हैं। तुम प्रेम दो पर अपेक्षा छोड दो। अभी तुम्हे जो प्रेम मिलता भी है उसे अपेक्षा की तराजू पर रख कर तौल देते हो सो वह स्वतः हल्का हो जाता है। लेकिन जब ये अपेक्षा की तराजू फेंक कर देखोगे तो सबका प्रेम अधिक ही महसूस होगा।“

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 September 2018

👉 आज का सद्चिंतन 3 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 3)

👉 विज्ञान और प्रत्यक्षवाद ने क्या सचमुच हमें सुखी बनाया है?  

🔷 समय का बदलाव, वैज्ञानिक उपलब्धियों तक, तर्क के आधार पर, प्रदर्शन करने के रूप में जब लाभदायक प्रतीत होता है तो उसके स्थान पर तप, संयम, परमार्थ जैसी उन मान्यताओं को क्यों स्वीकार कर लिया जाए, जो आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता की दृष्टि से कितनी ही सराही क्यों न जाती हो, पर तात्कालिक लाभ की कसौटी पर उनके कारण घाटे में ही रहना पड़ता है।
  
🔶 नए समय के नए तर्क, अपराधियों-स्वेच्छाचारियों से लेकर हवा के साथ बहने वाले मनीषियों तक को समान रूप से अनुकूल पड़ते हैं और मान्यता के रूप में अंगीकार करने में भी सुविधाजनक प्रतीत होते हैं, तो हर कोई उसी को स्वीकार क्यों न करे? उसी दिशा में क्यों न चलें? मनीषी नीत्से ने दृढ़तापूर्वक घोषणा की है कि ‘‘तर्क के इस युग में पुरानी मान्यताओं पर आधारित ईश्वर मर चुका। अब उसे इतना गहरा दफना दिया गया है कि भविष्य में कभी उसके जीवित होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।’’ धर्म के सम्बन्ध में भी प्रत्यक्षवादी बौद्धिक बहुमत ने यही कहा है कि वह अफीम की गोली भर है, जो पिछड़ों को त्रास सहते रहने और विपन्नता के विरुद्ध मुँह न खोलने के लिए बाधित करता है, साथ ही वह अनाचारियों को निर्भय बनाता है ताकि लोक में अपनी चतुरता और समर्थता के बल पर वे उन कार्यों को करते रहें, जिन्हें अन्याय कहा जाता है।

🔷 परलोक का प्रश्न यदि आड़े आता हो तो वहाँ से बच निकलना और भी सरल है। किसी देवी-देवता की पूजा-पत्री कर देने या धार्मिक कर्मकाण्ड का सस्ता-सा आडम्बर बना देने भर से पाप-कर्मों के दण्ड से सहज छुटकारा मिल जाता है। जब इतने सस्ते में तथाकथित पापों की प्रतिक्रिया से बचा जा सकता है तो रास्ता बिल्कुल साफ है। मौज से मनमानी करते रहा जा सकता है और उससे कोई कठोर प्रतिफल की आशंका हो तो पूजा-पाठ के सस्ते से खेल-खिलवाड़ करने से वह आशंका भी निरस्त हो सकती है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 5

👉 Awakening of Supernormal Faculties Through Sadhana (Part 1)

🔷 A human being is a repository of innumerable potentials. Being the highest creation of God (Supreme Consciousness) on earth, human beings have, in principle, inherited all His divine attributes. Nevertheless, God has placed necessary safeguards against the misuse of these faculties. These divine capabilities are accessible only to those who have the wisdom of their righteous use. It is a time-tested principle of Nature that boons are granted according to the worthiness of the aspirant.

🔶 All those who have risen to great heights could do so only by practising this principle in their lives. The principle of accessing supernormal faculties (siddhi) through sadhana (self-discipline) is unquestionable. In fact, through the medium of deities, we endeavour to infuse self-discipline in ourselves. It has been possible for mankind to achieve material and cultural progress through the formulation and observance of the necessary codes of conduct and behaviour for the control and refinement of the wayward and crude impulses of the lower human self.

🔷 Those who aspire for self-transformation have to adopt this practice of conscious self-discipline in their lives. Human life, with myriads of latent physical, mental and spiritual qualities, may be likened to a garden of sweet fruits. Even if only a few of these qualities are cultivated systematically, one can relish the fruits of joy. But if the baser tendencies and bodily habits are left undisciplined, they run amuck. Such aimless life leads to the growth of thorny bushes of misery and suffering in the garden of life. Like a kalpavriksha (a mythological tree supposed to fulfil every desire of a person sitting beneath it), the human life is potentially full of innumerable precious gifts. One can benefit from these divine gifts only when life's energies are properly focused, disciplined and directed towards noble deeds. The efforts made towards this end have been called sadhana.

📖 Akhand Jyoti, May June 2003

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (भाग 1)

🔷 यह विचार निश्चय ही भ्राँतिपूर्ण है कि धन-वैभव, मान-सम्मान तथा पद-प्रतिष्ठा पा लेने पर जीवन सफल एवं सार्थक हो जाता है। यह उन उपलब्धियों की तुलना में तुच्छ एवं नगण्य है, जिन्हें आगे बढ़ कर और वर्तमान भूमिका से ऊपर उठकर अवश्य पाया जा सकता है।

🔶 विद्या-बुद्धि, पुत्र-कलत्र ऐश्वर्य एवं वैभव आदि समस्त साँसारिक उपलब्धियाँ अस्थिर तथा क्षणभंगुर हैं। हजारों लोगों को यह नित्य प्रति मिलती और मिटती रहती हैं। इनकी प्राप्ति होने से सुख हो जाता है और चले जाने से दुःख होता है। संसार की यह सारी अस्थिर उपलब्धियाँ मनुष्य को सुख-दुःख के दोलन में झुलाती रहती हैं जिससे चित्त क्षुब्ध एवं व्याकुल रहता है। इन उपलब्धियों के सुख में भी दुःख छिपा रहता है। मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि यह सब विभूतियाँ नश्वर एवं गमनशील हैं। किसी समय भी नष्ट हो सकती हैं, छोड़ कर जा सकती है। इन्हें पाकर मनुष्य इनकी रक्षा, इन्हें अपने पास बनाये रहने के लिए दिन-रात व्यग्र एवं व्यस्त रहा करता है। ऐसी दशा में सुख संतोष अथवा निश्चिन्तता का होना सम्भव नहीं। इस प्रकार इन साँसारिक उपलब्धियों की प्राप्ति एवं अप्राप्ति दोनों ही दुःख का कारण हैं।

🔷 संसार में रह कर साँसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने का प्रयत्न करना बुरा नहीं। बुरा है उनके लोभ में उस महान लाभ का त्याग कर देना जो स्थिर एवं शाश्वत सुख का हेतु है। ऐसा सुख जिसमें न तो विक्षेप होता है और न परिवर्तन। इन उपलब्धियों के बीच से गुजरते हुए मानव-जीवन के सारपूर्ण सर्वोपरि लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही सच्चा पुरुषार्थ है मनुष्य को जिसे करना ही चाहिए।

🔶 मानव-जीवन का सर्वोपरि लाभ आध्यात्मिक लाभ ही है। साँसारिक लाभों के नितान्त अभाव की स्थिति में भी आध्यात्मिक लाभ मनुष्य को सर्वमुखी बनाने में सर्वदा समर्थ है जब कि आध्यात्मिक लाभ के अभाव में संसार की समग्र उपलब्धियाँ भी मनुष्य को सुखी एवं संतुष्ट नहीं बना सकतीं। बल्कि वे उल्टी जान के लिये जंजाल बनकर चिन्ता में वृद्धि किया करती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/January/v1.2

👉 प्रार्थना करें, याचना नहीं

🔷 भगवान से प्रार्थना कीजिये, याचना नहीं। आपकी स्थिति ऐसी नहीं कि कमजोरियों के कारण किसी का मुँह ताकना पड़े और याचना के लिए हाथ फैलाना पड़े।
प्रार्थना कीजिये कि आपका प्रसुप्त आत्मबल जाग्रत् हो चले ।। प्रकाश का दीपक जो विद्यमान है, वह टिमटिमाये नहीं वरन् रास्ता दिखाने की स्थिति में बना रहे। मेरा आत्मबल मुझे धोखा न दे। समग्रता में न्यूनता का भ्रम न होने दे।

🔶 जब परीक्षा लेने और शक्ति निखारने हेतु संकटों का झुण्ड आये, तब मेरी हिम्मत बनी रहे और जूझने का उत्साह भी। लगता रहे कि यह बुरे दिन अच्छे दिनों की पूर्व सूचना देने आये हैं।

🔷 प्रार्थना कीजिये की हम हताश न हों, लड़ने की सामर्थ्य को पत्थर पर घिसकर धार रखते रहें। योद्धा बनने की प्रार्थना करनी है, भिक्षुक बनने की याचना नहीं। जब अपना भिक्षुक मन गिड़गिड़ाये, तो उसे दुत्कार देने की प्रार्थना भी भगवान् से करते रहें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 2 सितंबर 2018

👉 साधुता की कसौटी

🔶 एकबार एक धनी व्यक्ति ने एक ऊँची बली पर रत्न जटित कीमती कमण्डल टाँग दिया और घोषणा की कि जो कोई साधु इस बल्ली पर सीधा चढ़कर कमण्डल उतार लेगा उसे यह कीमती पात्र ही नहीं बहुत दक्षिणा भी दूँगा। बहुत से त्यागी और विद्वान् साधुओं ने भी प्रयत्न किया पर किसी को सफलता न मिली। अन्त में कश्यप नामक नट विद्या में बहुत सा जीवन बिताकर साधु बने एक बौद्ध भिक्षु ने उस बल्ली पर चढ़कर कमण्डलु उतार लिया। उसकी बहुत प्रशंसा हुई और धन भी मिला।

🔷 जब यह समाचार भगवान बुद्ध के पास पहुँचा तो वे बहुत दुःखी हुये। उनने सब शिष्यों को बुलाकर कहा-भविष्य तुम में से कोई भिक्षु इस प्रकार का चमत्कार न दिखाये और न उन लोगों से भिक्षा ग्रहण करे जो साधु का आचार नहीं चमत्कार देखकर उसे बड़ा मानते हों।
चमत्कार नहीं चरित्र और ज्ञान ही साधुता की कसौटी है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1961

👉 विनम्रता का परिचय

🔶 लोकतंत्र के महान समर्थक अब्राहम लिंकन एक बार अपने गांव के नजदीक एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। भाषण के बीच एक महिला खड़ी होकर बोली - 'अरे, यह राष्ट्रपति है? यह तो हमारे गांव के मोची का लड़का है।'

🔷 अपने प्रति ये अपमानजनक शब्द सुनकर लिंकन ने बड़े ही विनम्र शब्दों में उस महिला से कहा, 'मैडम! आपने बहुत अच्छा किया जो उपस्थ्ति जनता से मेरा यथार्थ परिचय करा दिया, मैं वही मोची का बेटा हूँ। क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ? 'अवश्य', उस महिला ने कहा।

🔶 तब लिंकन ने पूछा - 'क्या आप यह बताने का कष्ट करेंगी कि मेरे पिताजी ने आपके जूते आदि तो ठीक तरह से मरम्मत किए थे न? आपको उनके कार्य में कोई शिकायत तो नहीं मिली।'

🔷 उस महिला ने सफाई देते हुए कहा - 'नहीं, नहीं, उनके कार्य में कोई शिकायत नहीं मिली। वे अपना काम बड़ी अच्छी तरह करते थे।'

🔶 तब लिंकन ने उत्तर दिया, 'मैडम! जिस प्रकार मेरे मोची पिता ने अपने कार्य में आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दिया, उसी प्रकार मैं भी आपको आश्वस्त करता हूँ कि आपने मुझे राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने का जो मौका दिया है, उसे मैं बड़ी ही कुशलता से करूंगा और यह मेरी कोशिश रहेगी कि मेरे काम में आपको कोई शिकायत का मौका न मिले।'

🔷 यह है अमरीकी इतिहास के सर्वाधिक सफल राष्ट्रपति लिंकन की विनम्रता का उदाहरण, जिन्हें आज भी बड़ी श्रद्धा एवं आदर के साथ स्मरण किया जाता है।

👉 उक्त उदाहरण का विश्लेषण कर हम यह कह सकते हैं कि

🔷 विनम्रता-आत्म-सम्मान (यानी ऊँचे स्वाभिमान) का एक विशेष गुण है।

🔶 व्यक्ति की महानता को दर्शाती है।

🔷 एक पॉजिटिव पर्सनेलिटी ही सारी खूबियों की बुनियाद है।

🔶 मनुष्य को उदारचित बनाती है।

🔷 परोपकार की भावना प्रदान करती है।

🔶 धैर्यवान व संयमी बनाती है और सभी को अपनी ओर आकर्षित करती है।
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

👉 आज का सद्चिंतन 2 September 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 2)

🔶 नई मान्यता के अनुसार मनुष्य एक चलता-फिरता पौधा मान लिया गया। अधिक से अधिक उसे वार्तालाप कर सकने की विशेषता वाला पशु माना जाने लगा। प्राणीवध में जिस निर्दयता और निष्ठुरता का आरोपण कर लोग अनुचित और अधार्मिक माना करते थे, वह अब असमंजस का विषय नहीं रह सकेगा, ऐसा दीखता है। कद्दू-बैंगन की तरह किसी भी पशु-पक्षी को माँसाहार के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। दूसरे की पीड़ा जब हमें स्वयं को अनुभव नहीं होती और सामिष आहार में अधिक प्रोटीन होने और अपने शरीर को लाभ मिलने की बात प्रत्यक्षवादी कहने लगें तो कोई प्राणीवध को इसलिए क्यों अस्वीकार करे कि उसके कारण नीति का अनुशासन बिगड़ता है तथा भावनाएँ विचलित होती हैं।

🔷 ठीक यही बात अन्य मानवी मर्यादाओं के सम्बन्ध में भी हैं। अपराधों के लिए द्वार इसीलिए खुला कि उसमें मात्र दूसरों की हानि होती है। अपने को तो तत्काल लाभ उठाने का अवसर मिल जाता है। अन्य विचारों में भी पशु-प्रवृत्तियों को अपनाए जाने के सम्बन्ध में जो तर्क दिए गए और प्रतिपादन प्रस्तुत किए गए हैं, उन्हें देखते हुए यौन सदाचार के लिए भी किसी पर कोई दबाव नहीं पड़ता। जब इस सम्बन्ध में पशु सर्वथा स्वतन्त्र हैं तो मनुष्य के लिए ही क्यों इस सन्दर्भ में प्रतिबन्ध होना चाहिए। जीव जगत में जब धर्म, कर्तव्य दायित्व जैसी कोई मान्यता नहीं, तो फिर मनुष्य ही उन जंजालों में अपने को क्यों बाँधे? जब बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, जब बड़ी चिड़िया को छोटी चिड़ियों पर आक्रमण करने में कोई हिचक नहीं होती, जब चीते हिरन स्तर के कमजोरों को दबोच लेते हैं तो फिर समर्थ मनुष्य ही अपने असमर्थ जनों का शोषण करने में क्यों चूकें?
  
🔶 प्रत्यक्षवाद ने, भौतिक विज्ञान ने सुविधा-संवर्धन के लिए कितने ही नए-नए आधार दिए हैं, तो उसकी उपयोगिता और यथार्थता पर क्या किसी को सन्देह करना चाहिए। यदि आत्मा, परमात्मा, धर्म, कर्तव्य पुण्य, परमार्थ जैसी मान्यताओं के आधार पर कोई लाभ हाथों-हाथ नहीं मिलता तो फिर व्यर्थ ही उन बन्धनों को क्यों माना जाए, जिनके कारण अपने को तो तात्कालिक घाटे में ही रहना पड़ता है। समर्थों को इसके कारण संत्रस्त और शोषण का शिकार बनना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 4

👉 Saint Versus Mimic

🔶 A mimic reached the court of a king and begged from him a paltry sum of rupees five only as his family was famishing without food. "I am an admirer of arts. It is the moral duty of State to encourage and honour an artist. I shall gladly reward you in appreciation of a feat of your art, i.e. mimicry; but I do not consider it appropriate to give you even rupees five as alms," said the king. "Doesn't matter your Highness, I don't want you to violate your principle. Please give me three days time to show you my next act of mimicry." Saying this, the mimic left the court. Next day a saint was seen in a meditative posture on a mound outside the capital of the kingdom, with erect spine, closed eyes, glowing face and long matted hair.

🔷 Cowherds grazing the cattle near the mound spotted the saint from a distance and went to him out of curiosity. The ascetic was so absorbed in his meditation on a deer- skin, that he did not betray any sign of noticing the crowd standing in front of him. 'Swamiji'  where from have you come? Should we arrange for some fruits, milk and dry fruits for you? There was no response whatsoever either by gesture or word from Swamiji. In the evening all cowherds went back to town along with their cattle.

🔶 They spread the news of arrival of a great saint outside the town. The next day many elites of the town, courtiers, merchants, traders and devout persons rushed out of the town in their vehicles, carrying fruits, sweets, sumptuous dishes and preparations for the Mahatma. Everybody was anxious that the Mahatma would bless him by accepting even a morsel of his offerings. The saint did not even blink his eyes. He remained sitting there unmoved. The news of the presence of a highly evolved saint reached the prime minister of the kingdom. He too rushed to the mound in his chariot full of gold and silver coins which were placed in front of the saint as an offering.

🔷 The prime minister humbly requested the saint "Just oblige your servant once by opening your eyes oh great yogi. I have not come to plead for fulfillment of any desire." Even the request of prime minister went unheeded; and he became assured that the sadhu was a highly elevated soul indeed - free from all worldly attachments. He went back to the town and apprised the king of his impression about the Mahatma. The king started lamenting "When such a great yogi has come to my state I should have definitely gone to welcome him." Early morning the next day he started for the darshan of the yogi. The news spread throughout the state like wild fire.

🔶 The pathways through which king had to pass were cleaned. Policemen were posted in the way. The King offered one lakh asharfis (gold coins) at the feet of the ascetic and bowing his head at his feet besought his blessings but the saint remained unmoved and self absorbed. Now every body was sure that they were fortunate to have darshan of a truly great saint free from all worldly allurements.

🔷 On the fourth day the mimic again entered the court and with folded hands said, "Oh King! You must have seen the miracle of the art of mimicry and must have been impressed by it. If so, please do give me at least a prize of five rupees, so that I may manage to procure simple food for my family.

🔶 " The king exclaimed: "I have not seen a foolish person like you. When the public of the whole populace of the state was standing at your feet eager to offer you the riches of the world, you did not even look at the treasure heap of wealth and riches and now you are craving before me for a paltry sum of five rupees." The mimic replied "Your Highness! At that time it was the question of dignity of the robe and role of a saint. I would have degraded the exalted status of a saint if I had succumbed to temptation in the saint's apparel and role. Now I have come to you as an ordinary mimic requesting for reward and remuneration for my labour to be able to discharge my minimum duties as a householder  to provide mere sustenance to my famished family."

📖 Akhand Jyoti, May June 2003

👉 मानव अभ्युदय का सच्चा अर्थ

🔶 बुद्ध ने उपनिषद् की शिक्षाओं को जीवन में कार्यान्वित करने की कला का अभ्यास करने के बाद अपना संदेश दिया था। वह संदेश था कि भूमि या आकाश में, दूर या पास में, दृश्य या अदृश्य में, जो कुछ भी है उसमें असीम प्रेम की भावना रखो, हृदय में द्वेष या हिंसा की कल्पना भी जाग्रत न होने दो। जीवन की ही चेष्टा में उठते-बैठो, सोते-जागते, प्रतिक्षण इसी प्रेमभावना में ओतप्रोत रहना ही ब्रह्म-विहार है, दूसरे शब्दों में जीवन की यही गतिविधि है जिससे ब्रह्म का आत्मा में विचार किया जाता है।

🔷 यह ब्रह्म की आत्मा क्या है? उपनिषद् के शब्दों में जो आकाश में तेजोमय और अमृतमय है और जो विश्वचेतना है वही ब्रह्म है और उपनिषद् का कहना है कि आकाश में ही नहीं बल्कि जो हमारे अन्तःकरणों में भी तेजोमय और अमृतमय पुरुष है और जो विश्वचेतना का स्रोत है वह ब्रह्म है। इस विराट विश्व के रिक्त स्थान में उस को चेतनता प्राप्त है और हमारी अंतर-आत्मा में भी उसी की चेतनता है।

🔶 इस लिये इस व्यापक चेतना की प्राप्ति के लिए हमें अपने अन्तर की चेतना से विश्व की असीम चेतनता का समभाव स्थापित करना है। वस्तुतः मानव के अभ्युदय का सच्चा अर्थ इसी चेतना के उदय और विस्तार में है। वही हमारे-सारे ज्ञान-विज्ञान का ध्येय रहा है।

✍🏻 रवीन्द्रनाथ ठाकुर
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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