शनिवार, 25 अगस्त 2018

👉 परिजनों से गुरुदेव की आशा और अपेक्षा (अन्तिम भाग)

🔷 जहाँ थोड़े भी परिवार हैं वहाँ उन्हें संगठित हो जाना चाहिए। युग निर्माण परिवार बना लेना चाहिए और यदि न्यूनतम संख्या ही है तो भी उन्हें टोली बनाकर जन संपर्क के लिये निकलना चाहिये और नये युग की विचारणा एवं प्रक्रिया से सर्व साधारण को परिचित कराने के लिये निकलना चाहिये।

🔶 शाखा संगठन के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रमों की अगले पृष्ठों पर चर्चा है। प्रयत्न हर जगह यह होना चाहिये कि सामूहिकता का विकास हो, और संगठित परिजन उन क्रिया कलापों को आगे बढ़ाने में पूरा उत्साह और सहयोग दिखायें। संघ शक्ति के बिना युग परिवर्तन जैसे महान अभियान में प्रगति नहीं हो सकती इसलिए एकाकी कुछ टुन मुन करते रहने की अपेक्षा हमें सुसंगठित ही होना चाहिए और अपने आपको सृजन सेना का सदस्य मानकर नव निर्माण की दिशा में कुछ चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।

🔷 एक से दस का कर्त्तव्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। पत्रिकायें जहाँ भी पहुँचती हैं- जिनके पास भी पहुँचती हैं वहाँ यह कर्त्तव्य समझा जाना चाहिये कि इन्हें पढ़ने या सुनने का लाभ कम से कम दस व्यक्ति तो उठा ही लिया करें। इसके लिये थोड़ी दौड़ धूप और चेष्टा हर किसी को करनी चाहिये।

🔶 यह प्राथमिक कसौटी है जिस पर कस कर किसी परिजन की अध्यात्म निष्ठा को परखा जा सकेगा और यह समझा जा सकेगा कि उस अभियान के संचालक के साथ उनका मोह ही नहीं प्रेम भी है। मोह दर्शन लाभ करने मात्र से तृप्त हो जाता है पर प्रेम तो कुछ अनुदान माँगता है जो कुछ न दे सके, उचित अनुरोध आग्रह पर भी ध्यान न दे सके उसे कुछ भले ही कहा जाय ‘प्रेमी’ तो नहीं ही कहा जायगा। गुरु देव अपने मार्ग दर्शक के प्रति अपने श्रद्धा भरे प्रेम का परिचय आजीवन देते चले आये हैं वे चाहते हैं कि उनके साथ बँधे हुए लोग भी अपनी भावनात्मक गहराई का एक ही प्रमाण परिचय प्रस्तुत करें। सघन अनुदान-सक्रिय मार्ग दर्शन और शक्ति प्रत्यावर्तन के लिये भी अधिकारी पात्रों को कब से तलाश कर रहे हैं। अब तो वह तलाश व्याकुलता में परिणत हो गई है। पर परिजनों में पात्रता का अभाव उन्हें इतना कष्टकारक होता है कि वे कभी-कभी रो पड़ते हैं।

🔷 परिजनों को आत्मिक प्रगति की दिशा में कहने लायक प्रगति करने के लिये उपरोक्त कसौटियों पर अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 44


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.44

👉 युवक के गुण

🔶 युवा होने का एक ही अर्थ है, जिसकी आत्मा विद्रोही हो, जो झुकना नहीं टूटना जानती हो। जो परिवर्तन चाहता है। जो जीवन को नई दिशाओं में नए आयामों में ले जाने को हमेशा तत्पर हो। क्रान्ति की उद्याम लालसा ही युवा होने का लक्षण है।

🔷 बूढा़ होने का क्या अर्थ है। जो जीवन को स्वीकार न करे, जो हमेशा जीवन के अन्धकारपूर्ण पक्ष की बातें करे, जो घोर निराशावदि हो, जिसे दो रातों के बीच का दिन छोटा प्रतीत होता हो। जो गुलाब की सुन्दरता और सुगन्ध की अवहेलना करे और काँटों को गिने, उनकी बुराई करे। ऐसे लोग जीवन की ओर नहीं, मृत्यु की और उन्मुख होते हैं। युवा होने का अर्थ है जीवन का सामना करना। जो जीवन के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हो, वही युवक है।

🔶 युवक मैं उसे कहूँगा जो खतरों से खेलने को, जूझने को तैयार हो। लीक से हटकर चलने को तैयार हो। पर ऐसे लोगों की संख्या कम है, क्योंकि खतरा मोल लेने में, लीक से हटकर चलने में, भटक जाने का, बिखर जाने की सम्भावना है। यदि नदी समुद्र में जाने से डरे, तो क्या होगा? जो भटकने से डर गया, वह पंगु हो जाता है, डरपोक हो जाता है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

👉 अहंकार का त्याग

🔶 मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे।

🔷 यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला- महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा।

🔶 डाकू के चुप होते ही साधु बोला- महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें।

🔷 यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली।

🔶 यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निर्थक हो जाएगा। यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले- निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्या के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारी तपस्या अधूरी है। अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो।

🔷 कथा का संदेश यह है कि वही तपस्या प्रतिफलित होती है, जो निरहंकार होकर की जाए। वस्तुत: अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश उपलब्धि का आधार बनता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Aug 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 37)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔶 अपने दायित्व की क्रमबद्ध व्यवस्था बना लेना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति की दूरदर्शिता विवेकशीलता और कार्यकुशलता उच्चस्तर की है। कारखानों-दफ्तरों में, मैनेजरों की योग्यता पर उनका संचालन और विकास निर्भर रहता है। शासन में, प्राँतों के संरक्षक गवर्नर माने जाते है। अँग्रेजी शासन के जमाने में भारत के प्रधान व्यवस्थापक को गवर्नर, जनरल कहते थे। वह पद सबसे ऊँचा माना जाता था। सुपरिंटेंडेंट शब्द भी प्राय: इसी अर्थ का बोधक है।
  
🔷 महत्त्वपूर्ण सफलताएँ जब भी, जहाँ भी, जिन्हें भी मिली हैं, उनमें व्यवस्था तंत्र की प्रमुख भूमिका रही है। सेनापतियों का कौशल उनकी रणनीति के आधार पर आँका जाता है। योजनाबद्ध उपक्रम बनाकर ही विशालकाय निर्माण कार्य बन पड़ते हैं। श्रम को, श्रमिकों को, साधनों को पर्याप्त मात्रा में जुटा लेने पर भी इस बात की गारंटी नहीं होती कि जिस स्तर की जितनी सफलता अभीष्ट थी, वह मिल ही जाएगी। यह संभावना इस बात पर टिकी रहती है कि आज के उपलब्ध साधनों का किस प्रकार श्रेष्ठतम उपयोग करते बन पड़ा। यह इस बात पर निर्भर रहता है कि हाथ के नीचे जो काम हैं, उसके अनुकूल और प्रतिकूल पक्ष की, हर हलचल और समस्या को कितनी गंभीरता और यथार्थता के साथ आँका गया? समय रहते उनसे निपटने का किस प्रकार जुगाड़ बिठाया गया?

🔶 सफलता ऐसे ही तेजस्वियों का वरण करती है। श्रेयाधिकारी वे ही बनते हैं। जो मात्र अपने जिम्मे के काम को बेगार की तरह भुगत लेते हैं, उन्हें श्रमिक भर कहा जा सकता है। व्यवस्थापक का श्रेय तो उन्हें मिल ही नहीं पाता। परिपूर्ण दिलचस्पी, एकाग्र मनोयोग, समुचित उत्साह और आगे बढ़ने का अदम्य साहस मिलकर ही ऐसी स्थिति विनिर्मित करते हैं, जिसमें बड़े काम सध सकें, भले ही प्रश्नकर्ता साधारण साधनों, साधारण योग्यताओं वाला ही क्यों न हो? ऐसे लोग परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भयभीत नहीं होते। उन्हें अनुकूल बनाने में अपनी समग्र क्षमता को दाँव पर लगाते हैं। ऐसे ही लोग नेतृत्व कर सकने के अधिकारी होते हैं। यों ऊँची कुरसी पर बैठने और पदवी पाने के लिए तो नर-वानर भी लालायित रहते हैं।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 47

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 4)

🔶 In terms of spiritual elevation these correspond to
(i) Self-Analysis;
(ii) Self-Refinement;
(iii) Self-Development;
(iv) Self-Realization.

🔷 These are gradual steps of the realization through japa- sadhana. Although we don't find the multiple activities and exercises like yoga practices in it, the sadhana process of japa is so effective that just with the sincere performance of this single practice, starting with self-analysis, we can reach the supreme goal of self-realization. The great significance of japa is not due to chance, or without any firm basis. Had it been so, such a large number of devotees and yogis of the Gayatri Sadhana would not have been advised to waste time in practicing more and more japa for longer and longer durations.

🔶 The aforesaid principles of psychology and spirituality work towards success of japa. These can elevate the devotee’s personality out of the darkness of ignorance into the light of divine wisdom. The four principles mentioned above work in the subliminal domains of the consciousness to remove the layers of ignorance from the subconscious and thus help in the emergence of light of spirit within the individual soul.

🔷 Training is an integral part of education. It is indeed the first samskara to be cultivated for personality development. We may never find an educated person who has not undergone training in one form or the other. From nursery rhymes and tables to revision and continuous practice of problem solving in higher classes the process of training by cramming and repetition is very common; this is also necessary for the inculcation of any desired tendency.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 परिजनों से गुरुदेव की आशा और अपेक्षा भाग 2

🔶 जहाँ एक पत्रिका अखण्ड-ज्योति ही मँगाई जाती है वहाँ प्रयत्न करके युग निर्माण योजना मँगाना भी आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि युग परिवर्तन के महान अभियान का मार्ग दर्शन एवं स्वरूप उसी के प्रकाश में जाना जा सकता है। जो मँगाते नहीं हैं उन्हें भी यह प्रयत्न करना चाहिए कि कहीं से माँग कर पढ़ लें। अब उस की उपयोगिता भी अखण्ड-ज्योति जितनी हो गई है।

🔷 जो पचास वर्ष के हो गये। जिनके बड़े बच्चे अपने छोटे भाई बहिनों का उत्तरदायित्व संभालने में समर्थ हो गये अथवा जिनके पास गुजारे के लिए दूसरे साधन मौजूद हैं उन्हें अधिक कमाने और बेटे पोतों के लिये अधिक संग्रह करने की ललक छोड़ देनी चाहिए। यह लिप्सा अब बहुत पीछे युग की बात रह गई। समाजवाद का युग बिलकुल निकट आ गया। संग्रहीत पूँजी का लाभ कोई न उठा सकेगा। हर किसी को रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना पड़ेगा। अमीरी अब गये गुजरे जमाने की बात हो चली। राजाओं के राज गये-जमींदारों की जमींदारी-महन्तों की महन्ती भर रही है। समानता की लहरें आकाश-चूम रही हैं। धनी और हरामखोर व्यक्ति अगले दिनों सम्मान नहीं तिरस्कार प्राप्त करेंगे। घृणित समझे जायेंगे और बुरी तरह मरेंगे। इसीलिए समय रहते उस विपत्ति भरी कुरुचि को समय से पूर्व ही छोड़ देना चाहिए और जो समय लोभ एवं मोह की पूर्ति में लगाया जा रहा है, उसे लोक मंगल के लिये नियोजित करने की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता दिखानी चाहिए। समर्थ व्यक्तियों को ऐसी ही हिम्मत दिखाने की आवश्यकता है।

🔶 जहाँ कला, प्रतिभा, बुद्धि, कुशलता, सम्पदा जैसी ईश्वर प्रदत्त अतिरिक्त विभूतियाँ हैं उनकी जिम्मेदारी और भी अधिक है। इस ईश्वरीय अमानत को वे गुलछर्रे उड़ाने के लिए नहीं विश्व मानव को सुविकसित समुन्नत बनाने के लिये पवित्र धरोहर समझें और उसका उसी रूप में प्रयोग करें। न करेंगे तो सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा ऐसे विभूतिवान व्यक्ति ईश्वर के दरबार में अधिक बड़े अपराधी ठहराये जायेंगे और अधिक दण्ड के भागी बनेंगे। भावी पीढ़ियाँ भी उन्हें घृणास्पद ही मानेंगी।

🔷 समाज को ईश्वर की प्रत्यक्ष प्रतिमा मानना चाहिए और अपने पुण्य परमार्थ की सत्प्रवृत्ति को भावनात्मक नव निर्माण की श्रेष्ठतम युग साधना में नियोजित करना चाहिये। न्यूनतम समय एक घण्टा और न्यूनतम राशि - ही इस कार्य के लिए अनिवार्य मानी गई है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि 8 घण्टे सोने 8 घण्टे आजीविका उपार्जन और 4 घण्टा फुटकर कामों में खर्च करने के उपरान्त 4 घण्टा प्रतिदिन लोक मंगल के लिए लगाये जायें और महीने में एक एक दिन की आमदनी नव निर्माण के लिए लगाने के उदारता दिखाई जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 43

👉 सम्पदा को रोकें नहीं

🔶 परमात्मा के अनन्त वैभव से विश्व में कमी किसी बात की नहीं। भगवान् आपके हैं और उसके राजकुमार के नाते सृष्टि की हर वस्तु पर आपका समग्र अधिकार है। उसमें से जब जिस चीज की जितनी आवश्यकता हो, उतनी लें और आवश्यकता निबटते ही अगली बात सोचें। संसार में सुखी और सम्पन्न रहने का यही तरीका है।

🔷 बादल अपने, नदी अपनी, पहाड़ अपने और वन खाद्यान्न अपने। इनमें से जब जिसके साथ रहना हो, रहें। जिसका जितना उपयोग करना हो करें। कोई रोक- टोक नहीं है। नदी को रोक कर यदि अपना बनाना चाहेंगे और किसी दूसरे को पास न आने देंगे, उपयोग न करने देंगे, तो समस्या उत्पन्न होगी। एक जगह जमा किया हुआ पानी अमर्यादित होकर बाढ़ के रूप में उफनने लगेगा और आपके निजी खेत- खलिहानों को ही डुबो देगा। बहती हुई हवा कितनी ही सुरभित क्यों न हो, उसे आप अपने ही पेट में  भरना चाहेंगे, तो पेट फूलेगा, फटेगा, औचित्य इसी में है कि जितनी जगह फेफड़ों में हो उतनी ही श्वास में और बाकी हवा दूसरों के लिये छोड़ दें। मिल- बांटकर खाने की यह नीति ही सुखकर है।

✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

👉 इस संसार के यात्री

🔷 “ इस संसार के निवासी तूफान में फँसे हुए जहाज के उन यात्रियों के समान हैं, जिनके पास भोजन की सामग्री बहुत कम रह गई है। ईश्वर या प्रकृति ने हमको ऐसी स्थिति में डाल दिया है कि आपत्ति से बचने के लिए कम से कम भोजन करना और निरन्तर उद्योग करते रहना हमारे लिए अनिवार्य हो गया है। यदि हम में से कोई व्यक्ति ऐसा न करें और दूसरे के उस श्रम का उपभोग कर लें, जो सामान्य हित के लिए आवश्यक नहीं हैं, तो यह हमारे तथा हमारे महकारियों दोनों के लिए नाशकारी है। अपने आपको स्वाभाविक और न्यायोचित श्रम से बचाकर और उस का भार दूसरों के कन्धों पर लाद कर भी हम अपने को क्यों चोर और धोखेबाज नहीं समझते?”

✍🏻 टालस्टाय

👉 भक्त और भगवान

🔷 तीनों लोकों में राधा की स्तुति से देवर्षि नारद खीझ गए थे। उनकी शिकायत थी कि वह तो कृष्ण से अथाह प्रेम करते हैं फिर उनका नाम कोई क्यों नहीं लेता, हर भक्त ‘राधे-राधे’ क्यों करता रहता है। वह अपनी यह व्यथा लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।

🔶 नारदजी ने देखा कि श्रीकृष्ण भयंकर सिर दर्द से कराह रहे हैं। देवर्षि के हृदय में भी टीस उठी। उन्होंने पूछा, ‘भगवन! क्या इस सिर दर्द का कोई उपचार है। मेरे हृदय
के रक्त से यह दर्द शांत हो जाए तो मैं अपना रक्त दान कर सकता हूं।’

🔷 श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘नारदजी, मुझे किसी के रक्त की आवश्यकता नहीं है। मेरा कोई भक्त अपना चरणामृत यानी अपने पांव धोकर पिला दे, तो मेरा दर्द शांत हो सकता है।’

🔶 नारद ने मन में सोचा , ‘भक्त का चरणामृत, वह भी भगवान के श्रीमुख में। ऐसा करने वाला तो घोर नरक का भागी बनेगा। भला यह सब जानते हुए नरक का भागी बनने को कौन तैयार हो?’

🔷 श्रीकृष्ण ने नारद से कहा कि वह रुक्मिणी के पास जाकर सारा हाल सुनाएं तो संभवत: रुक्मिणी इसके लिए तैयार हो जाएं।

🔶 नारदजी रुक्मिणी के पास गए। उन्होंने रुक्मिणी को सारा वृत्तांत सुनाया तो रुक्मिणी बोलीं, ‘नहीं, नहीं! देवर्षि, मैं यह पाप नहीं कर सकती।’ नारद ने लौटकर रुक्मिणी की बात श्रीकृष्ण के पास रख दी।

🔷 अब श्रीकृष्ण ने उन्हें राधा के पास भेजा। राधा ने जैसे ही सुना, तत्काल एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने दोनों पैर डुबोए। फिर वह नारद से बोली, ‘देवर्षि, इसे तत्काल श्रीकृष्ण के पास ले जाइए। मैं जानती हूं कि भगवान को अपने पांव धोकर पिलाने से मुझे रौरव नामक नरक में भी ठौर नहीं मिलेगा। पर अपने प्रियतम के सुख के लिए मैं अनंत युगों तक नरक की यातना भोगने को तैयार हूं।’ अब देवर्षि समझ गए कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम के स्तुतिगान क्यों हो रहे हैं। उन्होंने भी अपनी वीणा उठाई और राधा की स्तुति गाने लगे।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 Aug 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 36)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔷 प्रतिभाओं को दुहरे मोरचे पर लड़ने का अभ्यास करना चाहिए। उनमें से एक है दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और दूसरा है सत्प्रवृत्ति संवर्धन। इन प्रयासों का शुभारंभ अपने निज के जीवनक्रम से करके इन्हें परिवार में प्रचलित किया जा सकता है। इसके बाद पड़ोसियों, स्वजन-संबंधियों परिचित-घनिष्टों और उन सबको आलोक वितरण से लाभान्वित किया जा सकता है, जो अपने प्रभाव-परिचय क्षेत्र में आते हैं।
  
🔶 अपने स्वभाव में अनेक ऐसी आदतें सम्मिलित हो सकती हैं, जो अखरती तो नहीं, पर लकड़ी में लगे घुन की तरह निरंतर खोखला करने में अनवरत रूप से लगी रहती हैं। इनसे निपटने के लिए मोरचाबंदी यही से आरंभ करनी चाहिए। सबसे बुरी किंतु सर्वाधिक प्रचलित कुटेव एक है-वह है आलस्य। चोरी अनेक तरह की है, किंतु अपने आपको और अपने सगे-संबंधियों को सबसे अधिक हानि पहुँचाने वाली है कामचोरी। इसमें प्रतीत भर ऐसा होता है कि हम आराम से रह रहे हैं, मजे के दिन काट रहे हैं, पर सच बात यह है कि इस कुटेव के कारण आदमी दिन-दिन अनुपयोगी, अनगढ़, अयोग्य, अक्षम, अशक्त होता जाता है। प्रगति की समस्त संभावनाएँ आलसी को दूर से ही नमस्कार करके उलटे पैरों लौट जाती हैं।
  
🔷 यह समझा जाना चाहिए कि पसीने की हर बूँद मोती होती है। जीवन की बहुमूल्य शृंखला क्षणों के छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी है। समुन्नत वे रहे हैं जिन्होंने समय का मूल्य समझा और उसकी हर इकाई का श्रेष्ठतम एवं क्रमबद्ध व्यस्त उपयोग करने का तारतम्य बिठाया। जो आलस्य-प्रमाद में उसे गँवाते रहते हैं, धीमी गति और ढीले तारतम्य से उसे ज्यों-त्यों करके काटते रहते हैं, वे किसी प्रकार अपनी मौत के दिन पूरे भर कर पाते हैं। उन्हें और तो कुछ मिलना ही क्या था, प्रतिभा परिवर्धन के सहज लाभ तक से वे वंचित रह जाते हैं। यह दुर्घटना अपने या अपने किसी प्रिय पात्र के जीवन में घटने न पाए, इसका विशेष सतर्कतापूर्वक ध्यान रखे जाने की आवश्यकता है। लंबे समय के भारी और कठिन काम करने वालों को बीच-बीच में थोड़ा सुस्ताने की आवश्यकता अवश्य पड़ती है। पर उसकी पूर्ति थोड़ी देर के लिए काम या मन बदलने भर से पूरी हो जाती है। हृदय, जन्म के दिन से लेकर मृत्युपर्यंत धड़कता रहता है। इसी अवधि में वह कुछ क्षणों का विश्राम भी ले लेता है। हमारे भी काम और विश्राम के बीच इसी प्रकार का तालमेल बिठाया जाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 46

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 3)

🔷 Mahatma Gandhi referred to it as the basis of the world religion of the future. The structure of Gayatri Mantra is in perfect tune with the science of cosmic sound. It will not be possible for us to analyse its sonic pattern and the resonance of its subtle vibrations in this small article. We shall mainly elucidate the major steps of psychological elevation and evolution of a sadhaka as consciousness by the japa of this mantra. Japa is a scientific process of inward orientation of mind.

🔶 The japa of the Gayatri Mantra enables a harmonious linkage and flow of the individual consciousness (of the sadhaka) with the cosmic consciousness. If a beginner understands the psychological impact of mantra-japa or has intrinsic faith in it then meditating as per the requirement of the japa-sadhana will not be difficult for him. With prior conditioning of the mind, the rhythmic process of japa also helps in controlling its waywardness.

🔷 Once this stage of training of the mind is over, the progress of meditation and hence the japa-sadhana moves quite smoothly and at an uninterrupted pace. In terms of mental and emotional enlightenment, japa (japa- sadhana) involves the following:
(i) Training of repeating the same mantra;
(ii) Recognition of imbibing the inspirations of what has been repeated;
(iii) Recollection and Contemplation of recalling the mental connection during meditation and reestablishing the broken links with the inner self;
(iv) Retention of Deepening the faith (in the mantra) and sincerity to the level of inner experience and intrinsic emotions.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 परिजनों से गुरुदेव की आशा और अपेक्षा (भाग 1)

🔷 अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम संदेश देते हुए गुरु देव ने कहा-प्रत्येक परिजन को पेट और प्रजनन की पशु प्रक्रिया से ऊँचे उठकर उन्हें दिव्य जीवन की भूमिका सम्पादित करने के लिये कुछ सक्रिय कदम बढ़ाने चाहिएं। मात्र सोचते विचारते रहा जाय और कुछ किया न जाय तो काम न चलेगा। हममें से प्रत्येक को अधिक ऊँचा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और कर्तव्य में ऐसा हेर-फेर करना चाहिए जिसके आधार में परमार्थ प्रयोजनों को अधिकाधिक स्थान मिल सके। उपलब्ध विभूतियों और सम्पदाओं को अपने शरीर और अपने परिवार के लिए सीमित नहीं कर लेना चाहिए वरन् उनका एक महत्व पूर्ण अंश लोक मंगल के लिये नियोजित करना चाहिए।

🔶 हर एक को यह समझ लेना चाहिए कि दृष्टिकोण के परिष्कार गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता और परमार्थ प्रयोजनों में तत्परता अपनाये बिना कभी किसी की आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं। ईश्वर उपासना और साधनात्मक गति विधियाँ अपनाने का प्रभाव परिणाम भी इन्हीं सत्प्रवृत्तियों का विकास होना चाहिए अन्यथा वह जप भजन भी एक चिह्न पूजा बनकर रह जायगा और उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।

🔷 उपासना एवं जीवन साधना का श्रेष्ठ किन्तु सरल रूप क्या हो सकता है इसकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। उस दिशा में एक-एक कदम हर किसी को उठाना चाहिये और ‘इन दोनों गति विधियों को अपने जीवन क्रम में अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित कर लेना चाहिए।

🔶 गुरु देव ने कहा-प्रत्येक जागृत आत्मा को क्रमबद्ध रूप से इस संगठन सूत्र में आबद्ध हो जाना चाहिए। युग-निर्माण परिवार की नियमित सदस्यता स्वीकार कर लेनी चाहिए और भावनात्मक नव निर्माण के लिए एक घण्टा समय और दस पैसा (उस समय के हिसाब से, आज के समय में एक रुपया) जैसे प्रतीकात्मक अनुदान को नियमित रूप से बिना किसी ढील-पोल के आरम्भ कर देना चाहिए। इस क्रम में व्यतिरेक न आने पाये इसलिए ‘ज्ञान घट’ की स्थापना आवश्यक है। उस बन्धन के सहारे नियमितता टूटने नहीं पायेगी और परिवार की सदस्यता के साथ आत्मिक प्रगति का क्रम यथावत् चलता रहेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 43
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.43

👉 आत्मविजेता ही विश्व विजेता

🔷 साधना से तात्पर्य है ‘आत्मानुशासन’। अपने ऊपर विजय प्राप्त करने वाले को सबसे बढ़कर योद्धा माना गया है। दूसरों पर आक्रमण करना सरल है। बेखबर लोगों पर हमला करना तो और भी सरल है। इसलिए आक्रमणकारियों को योद्धा कहने का औचित्य कम ही है।

🔶 असली शत्रु हमारे कुसंस्कार हैं, जो पशु प्रवृत्तियों के रूप में अन्तरंग की उत्कृष्टता को दबाये बैठे रहते हैं और उत्कृष्टता की दृष्टि में एक कदम बढ़ाने की तैयारी करते ही भारी  अड़चन बनकर द्वार रोकते हैं। इनसे निपटना कम बहादुरी का काम नहीं है।

🔷 घुन लकड़ी को और विषाणु स्वास्थ्य को चौपट करते हैं। व्यसन और दुर्गुण ही मनुष्य को नीचे गिराते हैं। और उसके अभ्युदय का कोई प्रयास सफल नहीं होने देते।

🔶 यदि हम अपने असली शत्रुओं को समझ पायें और उनकी जड़ों को उखाड़ पायें, तो समझना चाहिए कि परम पुरुषार्थ कर गुजरने में सफलता पाई। ऋषि- मनीषी इसलिये बार- बार यह कहते आये हैं- अपने को जानो ,, अपने आपे को पहचानो, देखो और सुनने का प्रयास करो। इसका भावार्थ यही है कि अपने अन्दर क्या है? हमसे अच्छा कौन जान सकता है? दूसरों के दोष देखना सरल है, अपने दोष देख पाना सबसे कठिन। जो ऐसा आत्मपरिष्कार कर लेता है- ऐसा आत्मविजेता ही विश्वविजेता कहलाता  है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

👉 प्रेम का अर्थ

🔶 “प्रेम करने का अर्थ है विश्व के सब जीवों और वस्तुओं से आत्मीयता, बन्धुत्व और एकता का अनुभव करना, और इतना गहरा अनुभव करना कि अपने आस-पास के सब लोगों पर उसका प्रभाव पड़े ओर उन्हें अधिक सुरक्षा और एकता की प्रतीति हो। प्रेम से सब के कल्याण और उन्नति की भावना उत्पन्न होती है। प्रेम से निर्भीकता, स्पष्टता, स्वतंत्रता और सत्यता बढ़ती है। प्रत्येक माता जानती है कि प्रेम देश और काल से सीमित नहीं होता। प्रेम से हमें अपनी अनन्तता और असीमता का अनुभव होने में सहायता मिलती है। प्रेम द्वारा ऐसी भावना बनाने से घृणायुक्त व्यक्ति में भी अच्छाई और प्रेम का जीवन भरा जा सकता है। प्रेम में महान उत्पादक शक्ति है। इसका परिणाम प्रारम्भ में चाहे धीरे-धीरे हो किन्तु स्थायी होता है। यह प्रभाव जिस व्यक्ति से प्रेम या विश्वास किया जाता है, उसके हृदय और चरित्र में बैठ जाता है।”

✍🏻 बी-ग्रेग

👉 आज का सद्चिंतन 23 Aug 2018


👉 ज्ञान बढाती है ‘जिज्ञासा’:-

🔶 जिज्ञासु व्यक्ति किसी भी बात की तह तक बैठकर उसमें से किसी न किसी प्रकार की उपयोगिता खोज लाता है। जिज्ञासा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चारों उन्नतियों की हेतु होती है। मनुष्य को अपनी जिज्ञासा को प्रमादपूर्वक नष्ट नहीं करना चाहिए। उसे विकसित एवं प्रयुक्त करना चाहिए और जिसमें नहीं है, उसे चाहिए कि वह तन्मय एवं गहरे पैठने के अभ्यास से उसे पैदा करे, क्योंकि जिज्ञासा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में प्रगति एवं उन्नति का आधार बनती है।

🔷 एक बादशाह का एक बहुत ही मुँह लगा नौकर था। वह दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता था। एक दिन उसे विचार आया कि वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता है, तब भी उसे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं और मीर मुँशी जो कभी कुछ नहीं करता पाँच सौ रुपये वेतन पाता है। इस भेद का क्या कारण है? उनने अपने यह उलझन बादशाह को कह सुनाई।

🔶 बादशाह ने हँसकर कह दिया- “किसी दिन मौके पर बतलाऊँगा।“ एक दिन एक घोड़ों का काफिला उसकी सीमा से गुजरा। बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि “जाकर मालूम कर यह काफिला कहाँ जा रहा है?”

🔷 नौकर गया और आकर बतलाया कि “हुजूर वह काफिला सीमा के कंधार देश जा रहा है।“

🔶 अब बादशाह ने मीर मुंशी को भेजा। उसने आकर बतलाया कि “यह काफिला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है। उसमें पाँच सौ घोड़े और बीस ऊँट भी है। मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घोड़े बेचने जा रहें हैं। खरीदना चाहें तो कम कीमत पर मिल सकते हैं। मैंने पचास ऐसे घोड़ों को छाँट लिया है, जो नौजवान और बड़ी ही उत्तम नस्ल के हैं।“

🔷 बादशाह ने तुरंत ही पचास घोड़े खरीद लिए, जिससे उसे कम दामों पर अच्छे घोड़े मिल गए। काफिले के विषय में चिंता जाती रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण-ग्राहकता का बड़ अनुकूल प्रभाव पड़ा। बादशाह ने नौकर से कहा- “देखा तुम्हें पाँच रुपये क्यों मिलते हैं और मीर मुँशी को पाँच सौ क्यों?”

🔶 नौकर ने इस अंतर के रहस्य को समझा और सदा के लिए सावधान हो गया।

📖 अखण्ड ज्योति Nov 1999 से साभार

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