🔷 जहाँ थोड़े भी परिवार हैं वहाँ उन्हें संगठित हो जाना चाहिए। युग निर्माण परिवार बना लेना चाहिए और यदि न्यूनतम संख्या ही है तो भी उन्हें टोली बनाकर जन संपर्क के लिये निकलना चाहिये और नये युग की विचारणा एवं प्रक्रिया से सर्व साधारण को परिचित कराने के लिये निकलना चाहिये।
🔶 शाखा संगठन के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रमों की अगले पृष्ठों पर चर्चा है। प्रयत्न हर जगह यह होना चाहिये कि सामूहिकता का विकास हो, और संगठित परिजन उन क्रिया कलापों को आगे बढ़ाने में पूरा उत्साह और सहयोग दिखायें। संघ शक्ति के बिना युग परिवर्तन जैसे महान अभियान में प्रगति नहीं हो सकती इसलिए एकाकी कुछ टुन मुन करते रहने की अपेक्षा हमें सुसंगठित ही होना चाहिए और अपने आपको सृजन सेना का सदस्य मानकर नव निर्माण की दिशा में कुछ चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।
🔷 एक से दस का कर्त्तव्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। पत्रिकायें जहाँ भी पहुँचती हैं- जिनके पास भी पहुँचती हैं वहाँ यह कर्त्तव्य समझा जाना चाहिये कि इन्हें पढ़ने या सुनने का लाभ कम से कम दस व्यक्ति तो उठा ही लिया करें। इसके लिये थोड़ी दौड़ धूप और चेष्टा हर किसी को करनी चाहिये।
🔶 यह प्राथमिक कसौटी है जिस पर कस कर किसी परिजन की अध्यात्म निष्ठा को परखा जा सकेगा और यह समझा जा सकेगा कि उस अभियान के संचालक के साथ उनका मोह ही नहीं प्रेम भी है। मोह दर्शन लाभ करने मात्र से तृप्त हो जाता है पर प्रेम तो कुछ अनुदान माँगता है जो कुछ न दे सके, उचित अनुरोध आग्रह पर भी ध्यान न दे सके उसे कुछ भले ही कहा जाय ‘प्रेमी’ तो नहीं ही कहा जायगा। गुरु देव अपने मार्ग दर्शक के प्रति अपने श्रद्धा भरे प्रेम का परिचय आजीवन देते चले आये हैं वे चाहते हैं कि उनके साथ बँधे हुए लोग भी अपनी भावनात्मक गहराई का एक ही प्रमाण परिचय प्रस्तुत करें। सघन अनुदान-सक्रिय मार्ग दर्शन और शक्ति प्रत्यावर्तन के लिये भी अधिकारी पात्रों को कब से तलाश कर रहे हैं। अब तो वह तलाश व्याकुलता में परिणत हो गई है। पर परिजनों में पात्रता का अभाव उन्हें इतना कष्टकारक होता है कि वे कभी-कभी रो पड़ते हैं।
🔷 परिजनों को आत्मिक प्रगति की दिशा में कहने लायक प्रगति करने के लिये उपरोक्त कसौटियों पर अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.44
🔶 शाखा संगठन के उद्देश्य, स्वरूप और कार्यक्रमों की अगले पृष्ठों पर चर्चा है। प्रयत्न हर जगह यह होना चाहिये कि सामूहिकता का विकास हो, और संगठित परिजन उन क्रिया कलापों को आगे बढ़ाने में पूरा उत्साह और सहयोग दिखायें। संघ शक्ति के बिना युग परिवर्तन जैसे महान अभियान में प्रगति नहीं हो सकती इसलिए एकाकी कुछ टुन मुन करते रहने की अपेक्षा हमें सुसंगठित ही होना चाहिए और अपने आपको सृजन सेना का सदस्य मानकर नव निर्माण की दिशा में कुछ चिन्तन और कुछ प्रयत्न निरन्तर करते रहना चाहिए।
🔷 एक से दस का कर्त्तव्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। पत्रिकायें जहाँ भी पहुँचती हैं- जिनके पास भी पहुँचती हैं वहाँ यह कर्त्तव्य समझा जाना चाहिये कि इन्हें पढ़ने या सुनने का लाभ कम से कम दस व्यक्ति तो उठा ही लिया करें। इसके लिये थोड़ी दौड़ धूप और चेष्टा हर किसी को करनी चाहिये।
🔶 यह प्राथमिक कसौटी है जिस पर कस कर किसी परिजन की अध्यात्म निष्ठा को परखा जा सकेगा और यह समझा जा सकेगा कि उस अभियान के संचालक के साथ उनका मोह ही नहीं प्रेम भी है। मोह दर्शन लाभ करने मात्र से तृप्त हो जाता है पर प्रेम तो कुछ अनुदान माँगता है जो कुछ न दे सके, उचित अनुरोध आग्रह पर भी ध्यान न दे सके उसे कुछ भले ही कहा जाय ‘प्रेमी’ तो नहीं ही कहा जायगा। गुरु देव अपने मार्ग दर्शक के प्रति अपने श्रद्धा भरे प्रेम का परिचय आजीवन देते चले आये हैं वे चाहते हैं कि उनके साथ बँधे हुए लोग भी अपनी भावनात्मक गहराई का एक ही प्रमाण परिचय प्रस्तुत करें। सघन अनुदान-सक्रिय मार्ग दर्शन और शक्ति प्रत्यावर्तन के लिये भी अधिकारी पात्रों को कब से तलाश कर रहे हैं। अब तो वह तलाश व्याकुलता में परिणत हो गई है। पर परिजनों में पात्रता का अभाव उन्हें इतना कष्टकारक होता है कि वे कभी-कभी रो पड़ते हैं।
🔷 परिजनों को आत्मिक प्रगति की दिशा में कहने लायक प्रगति करने के लिये उपरोक्त कसौटियों पर अपनी पात्रता सिद्ध करनी चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 माता भगवती देवी शर्मा
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1972 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/May/v1.44



















