गुरुवार, 29 मार्च 2018

👉 ज्ञान और आस्था

🔷 एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

🔶 नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दुहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।

🔷 पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

🔶 अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

🔷 लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि- “नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, मै नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।“

🔶 पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती?”

🔷 पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।

🔶 उन्होंने लक्ष्मी से पूछा- “ तुमने आज नदी कैसे पार की ? इतनी सुबह तो कोई मल्लाह नही मिलता।”

🔷 लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा- ‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से नदी पार कर ली। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’

🔶 पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

🔷 पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।

🔶 पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा- ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में ही लगा हुआ था।’’

🔷 पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 March 2018


👉 MICRO-ANALYSIS OF SPIRITUALISM

🔷 What is spiritualism? It is upside down process of our life. Do you see it as juggling or thaumaturgy? There is nothing like that. Albeit, the direction of life is flipped and turned out here. The way common persons of the world think, wish and do, on the contrary the processes of spiritualistic life is completely different.

🔶 Different types of flirtations and handiwork you perform for a glimpse of God, for worshipping, miraculous enlightenment and getting prosperity, it is better not to indulge into that, because this will be too tough to you. You’ll be shattered into pieces at the very first step. When you will be asked for celibacy and you will be directed that physical celibacy is not as necessary as mental and internal one, then you’ll start biting your finger and say, firstly we are not able to celibate physically, then what to say about going mental celibacy! Our mind and eyes remain indulged in misconduct and vices 24 hours. When whole of your power will be destroyed in this only, then how on earth your serpent power (secret centers of immense divine powers hidden in one’s spinal cord) would get awakened? When you’ll spoil whole of your power needed to awaken the serpent power in these vices and misconducts through your eyes in the form of vicious waves, then you’ve definitely ended up all of your power and energy in vain.

🔷 Similarly, the blood which is formed after you take food and which in turn creates your mind and thoughts, has got contaminated due to intake of improper, fraudulently-earned and ill gotten food. How the hell you’ll be able to make it stable and concentrated in spiritualism and Almighty?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 Amrit Chintan 30 March

🔷 The path followed by great men of the time show us the right way of living. If we follow them we will also attain the same aim of life as they could. Success of our life and wisdom can be attained on their guidance. Our life should not be like depressed, pessimistic or like those who are totally materialistic. We should not be hippocratic either in our talks and actions. That is our show of life totally different then what we are.

🔶 We should work hard for our progress in life, but should not disturbed in our present situation. Money is not everything in life. If we develop our nature and behavior and create an atmosphere of happiness by sharing and caring for other. We can enjoy the bliss of life.

🔷 When one’s Soul attain oneness with super-consciousness or God, it means that beastile behavior (selflessness) gets change into divinity, the beggar becomes a donor and so on. This type of change in human nature is known as unity with God – vilay, visarjan and sharnagati or total surrender to God. At that level the devotee and God become one or adwait i.e. oneness (no two). 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (अन्तिम भाग)

🔷 भावी जीवन की आपकी रूपरेखा क्या हो, आप केवल अपने ही लिए ही नहीं जिएँ, उसमें समाज की भी हिस्सेदारी है, लोगों की भी हिस्सेदारी है, भगवान की भी हिस्सेदारी है, आदर्शों की भी हिस्सेदारी है, धर्म और संस्कृति की भी हिस्सेदारी है—उस हिस्सेदारी को आप कैसे निभा पायेंगे? उसके बारे में शिक्षण, आपका सायंकाल का शिक्षण इस उद्देश्य के लिए है, आप इस उद्देश्य को समझिये। आप घटना को देखेंगे और यहाँ के क्रम को देखेंगे, तो ऊपर ही दृष्टि रह जाएगी। दृष्टि को भीतर ले जाइए, दर्शन समझिये यहाँ के कल्प का और यह मानकर चलिए कि यहाँ कल्प का मतलब है—बदल डालना।

🔶 अब आपको यहाँ से बदलते हुए जाना है। घर जाकर आपको अपना बदला हुआ रूप दिखाना है। घर जाकर के आपके भावी जीवन में आपका क्रिया-कलाप और आपका उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिसमें पिछले जीवन से कोई संगति न हो। आप एक, आपका ईमान दो, आपका भगवान तीन, तीन तो आप ही के हैं सहपाठी। इन तीनों के साथ में तो आप सारे जीवन की मंजिल पूरी कर सकते हैं। जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों के बहकावे में आएँ? जरूरी क्या है कि आप दूसरों को प्रसन्न करने की कोशिश करें? अपने ईमान को प्रसन्न कर लीजिए, बहुत है—भगवान को प्रसन्न कर लीजिए बहुत है।

🔷 आत्मा और परमात्मा को जो आदमी प्रसन्न कर सकते हैं, सारी दुनिया उनसे प्रसन्न रहती है अथवा चलिए यह मान लें—सारी दुनिया प्रसन्न न भी है, नाराज बनी है, तो उस नाराजगी से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। आपकी आत्मा नाराज हो, आपका परमात्मा नाराज और सारी दुनिया आपसे प्रसन्न बनी रहे और आरती उतारती रहे, तो उससे कुछ बनने वाला भी नहीं है। यही चिन्तन है, जो आपको एक महीने लगातार अपने मनःक्षेत्र में घुमाते रहना चाहिए। मन को बदलिए, सोचने के तरीके बदलिए, जीवन की कार्य-पद्धति बदलिये। बहुत कुछ बदलना है आपको। अगर बदल डालेंगे, तो मजा आ जाएगा! बस, आज तो मुझे इतना ही कहना था आपसे।

॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 76)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔷 सद्गुरु के ध्यान में रमी ऐसी ही एक गुरुकृपा सिद्ध महातपस्विनी माँ ज्योतिर्मयी का कथा प्रसंग बड़ा ही प्रेरक है। माता ज्योतिर्मयी का विवाह अल्पायु में उनके मायके वालों ने कर दिया था; पर देव का आघात उनके पति नहीं रहे। पति के बूढ़े माता-पिता भी इकलौते पुत्र के वियोग की वजह से स्वर्ग सिधार गए। इधर मायके वालों पर भी दुर्भाग्य की कुदृष्टि थी। वह थी भी माता-पिता की इकलौती कन्या। पुत्री की इस दारुण वेदना से विह्वल माता-पिता अधिक दिन जीवित न रह पाये। वे भी परलोकवासी हो गए। बारह-तेरह वर्ष की बालिका ज्योतिर्मयी का इस संसार में अपना कोई न रहा।
  
🔶 रोती-बिलखती, यह विधवा बालिका अपने जीवन के घने अँधेरे से घबरा गई। क्या करें? कहाँ जाएँगे? ये सवाल उसके सामने भूखे शेर की तरह गर्जने लगे। इनसे छुटकारा पाने के लिए उसके पास मात्र गंगा की गोद के सिवा और कोई भी रास्ता न था। सो उसने अपने गाँव के पास बहती हुई गंगा नदी की धारा में प्राण त्यागने की ठान ली। रात के घने अँधेरे में जब वह गंगा की गोद में छलाँग लगाने के लिए उद्यत थी, तभी किसी ने पीछे से आकर उसका हाथ पकड़ लिया। अचानक इस तरह हाथ पकड़ लेने पर वह चिहुँकी और चौंकी। पीछे मुड़कर देखा, तो गैरिक वस्त्रधारी एक वृद्ध संन्यासी खड़े थे। उनके श्वेत केश शुभ्र चाँदनी में चाँदी की तरह चमक रहे थे।
  
🔷 उन्होंने प्यार से उसका हाथ थाम कर केवल इतना कहा- बेटी! जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान् होता है। भगवान् अपने इस सबसे प्यारे बच्चे की सहायता के लिए किसी न किसी को अवश्य भेजता है। उसी ने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है। आओ तुम मेरे साथ आओ। उन संन्यासी के स्वरों में माँ की ममता थी। बालिका ज्योतिर्मयी ने उन पर सहज विश्वास कर लिया। वही उनके गुरु हो गए और भरोसा, गुरु का ध्यान ही उसका धर्म बन गया। इसी धर्म के निर्वाह में उसके दिवस-रात्रि बीतने लगे।
  
🔶 प्रातः स्नान आदि नित्यकर्मों से निबटकर वह सद्गुरु के ध्यान में खो जाती। सहस्रदल कमल पर गुरुदेव की भव्यमूर्ति का ध्यान यही उसकी साधना थी। नियमित अभ्यास के प्रभाव से ध्यान का चुम्बकत्त्व घना होता गया और इस चुम्बकत्व ने उसके प्राण प्रवाह की गति बदल दी। निम्नगामी प्राण विद्युत् ऊर्ध्वगामी होने लगी। जो ऊर्जा निम्न केन्द्रों पर एकत्रित रहती थी। अब उसने ऊर्ध्वगामी होकर चेतना के उच्च केन्द्रों को जाग्रत् करना प्रारम्भ कर दिया। चक्रों के जागरण, बेधन एवं प्रस्फुटन की क्रिया चल पड़ी। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, काम करते हुए ज्योतिर्मयी की भावनाएँ सहस्रदल कमल में स्थापित सद्गुरु की चेतना में विलीन होती रहती थी। समय के साथ इसमें प्रगाढ़ता आती गयी।
  
🔷 वर्षों बीत गए और गुरु ने स्थूल देह का त्याग कर दिया; पर उनकी सूक्ष्म चेतना के साथ ज्योतिर्मयी का अभिनव साहचर्य था। वह हमेशा कहती थी कि सच्चा शिष्य हमेशा अपने गुरु के साथ रहता है। वह अपने गुरु में रहता है और गुरु उसमें समाए रहते हैं। अब उसका व्यक्तित्व सभी आध्यात्मिक सिद्धियों, शक्तियों एवं विभूतियों का भण्डार बन गया। आध्यात्मिक साधना की दुर्लभ कही जाने वाली अवस्थाओं को उसने सहज प्राप्त कर लिया। हालाँकि उसके आस-पास के लोग उसकी इस उच्च स्थिति से अनजान थे। उन्हें तो इस सत्य का तब पता चला, जब हिमालय की दुर्गम कन्दराओं में तप करने वाले योगिराज महानन्द ने उन्हें बताया कि तुम्हारे गाँव के पास गंगा किनारे वास करने वाली माँ ज्योतिर्मयी परम योगसिद्ध हैं और उन्हें यह अवस्था सद्गुरु के ध्यान से मिली है। इस सच को सुनकर सभी कह उठे- सद्गुरु की महिमा अनन्त! इस अनन्त महिमा के अनन्त विस्तार का अगला आयाम इस प्रकार है

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 118

बुधवार, 28 मार्च 2018

👉 मित्रता हो वहाँ संदेह न हो

🔶 एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

🔷 एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया। फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, ‘बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया।

🔶 एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, ‘यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।’.और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया।

🔷 मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, ‘तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?’ उस फकीर का उत्तर था, ‘जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। दोस्तों जहाँ मित्रता हो वहाँ संदेह न हो।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 March 2018

👉 Only Remorse can save from the punishment of wicked acts

🔶 It is fair to say that if we had behaved badly or done something unfair to someone, we cannot just ignore it as if it never happened. It may be possible that the person who was mistreated has gone away and may not be accessible or traceable any more. In such a situation, it may not be possible to make up for what we had done to him/her. However, there is another way to accomplish it. Every person is a part of society. Hence, damage or harm caused to any individual is, in reality, damage caused to society. We can compensate damage we caused to that individual by doing as much good to society. When the amount of good done to society makes up for the amount of harm done to the individual, it can be safely said that we have atoned for the wrongdoing and have come to a point where we can free us from any sense of guilt.

🔷 It is absolutely impossible to set us free from any wrongdoing by means of observing some cheap religious rituals. Reading sacred texts and good thoughts, satasanga (staying in touch with people of great character), listening to discourses and devotional songs, going on pilgrimage, fasting, etc. help us to purify our mind and also enlighten us to restrain, from now on, our tendency to commit anything wrong. The scriptures speak about religious rites and observances having a grand ability to cleanse us from our sins. They only mean to say that the cleansing of the mind (achieved through such observances) may negate any possibility of that individual committing sinful acts in future.

🔶 The inescapable justice system of God directs that anyone who wishes to absolve them from the consequences of their wrongdoing should devote themselves to selfless services to the community that can boost up its goodness or merits. This can help anyone to cleanse him/herself from any past wrongdoings and thus, imparts peace and freedom from guilt and unworthy intentions.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP AND KARYAKRAM – Vangmay 66 Page 6.18

👉 दुष्कर्मों के दण्ड से प्रायश्चित्त ही छुड़ा सकेगा

🔶 यह ठीक है कि जिस व्यक्ति के साथ अनाचार बरता गया अब उस घटना को बिना हुई नहीं बनाया जा सकता। सम्भव है कि वह व्यक्ति अन्यत्र चला गया हो। ऐसी दशा में उसी आहत व्यक्ति की उसी रूप में क्षति पूर्ति करना सम्भव नहीं। किन्तु दूसरा मार्ग खुला है । हर व्यक्ति समाज का अंग है। व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति वस्तुत: प्रकारान्तर से समाज की ही क्षति है । उस व्यक्ति को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुँचाये। समाज को इस प्रकार हानि और लाभ का बैलेन्स जब बराबर हो जायेगा तभी यह कहा जायेगा कि पाप का प्रायश्चित हो गया और आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताडऩा से छुटकारा पाने की स्थिति बन गई।

सस्ते मूल्य के कर्मकाण्ड करके पापों के फल से छुटकारा पा सकना सर्वथा असम्भव है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, तीर्थ, व्रत आदि से चित्त में शुद्धता की वृद्धि होना और भविष्य में पाप वृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात समझ में आती है। धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो माहात्म्य शास्त्रों में बताये गये हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की सम्भावना का नाश हो जाये।

🔶 ईश्वरीय कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा-साधना में संलग्न हों और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शान्ति एवं पवित्रता की स्थिति उपलब्ध कर लें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.18

👉 Amrit Chintan 29 March

🔶 The true happiness is in which mind becomes one with soul. Mind is operation of brain and soul is purest form of mind or sacred consciousness. In the language of Yoga that is when mind acts as a soul the God consciousness. This is true yoga. This union of soul and mind is known as highest bliss. Salvation, God realization, ultimate the highest pleasure and bliss beyond any imagination of material pleasure of the world.

🔷 We must love our younger and pay our respects and regards to elders. Our attitude can keep your position safe. Every man at the lowest level of society keeps an impression of highest esteem for the self-disrespect of his vices and weakness. A feeling of his own honesty, sacredness, nobility and sincerity always exists in his mind. Really that proves the concept of solid water molecule H2O is always conscious of its purity inside. Remove pollution outside the molecule configuration.

🔶 Your character is reflected in the reaction of people around you. One’s progress depends on this reaction of your sub-ordinates, officers, clients and those who get concerned to you. Because the persons and society observes your all actions and reactions. The true personality is not only your courteous behavior but the personality waves radiate both from your subtler body also, which they read.
                                        
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 8)

🔶 अगर आपने नारी के बारे में विकृत विचार बना रखे हैं, तो नारी आपको काट खायेगी डाकिन की तरह और साँपिन की तरह डस लेगी; आपका स्वास्थ्य खराब कर देगी, आपकी अक्ल को खराब कर देगी, आपके चिन्तन को भ्रष्ट कर देगी और आपको लम्पट बना देगी, अगर आपका दृष्टिकोण गलत है तब। अगर आपने दृष्टिकोण सही कर लिया तब? तब वही नारी आपको देवता की तरह वरदान दिया देगी। शिवाजी को एक नारी ने ही देवता जैसा वरदान दिया था, आपको याद होगा। आप ऐसा नहीं कर सकते? आप चिन्तन को बदलिये, नहीं तो आप यहाँ किसलिए आए हैं? यहाँ भी नहीं करेंगे, तो क्या करेंगे? केवल मात्र चिन्ह-पूजा करते रहेंगे? टाइमपास करते रहेंगे? नहीं, टाइमपास मत कीजिए, चिन्ह-पूजा मत कीजिए। अपने सारे-के चिन्तन को आमूल-चूल परिवर्तन करने की कोशिश कीजिए।

🔷 ब्रह्मचर्य के बारे में विचार और चिन्तन करते रहिए। बीच में जब कभी भी आपकी आँखें खुलें, फालतू समय हो और नारी का विचार आये, तो केवल बेटी की दृष्टि से विचार कीजिए, बहिन की दृष्टि से विचार कीजिए, माता की दृष्टि से विचार कीजिए, यहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी का भी सहकर्मी की दृष्टि से विचार कीजिए। सीताजी और राम वनवास में रहते थे—वह उनकी सहकर्मी थीं और गाँधीजी, कस्तूरबा रहते थे—वह भी सहकर्मी थीं, तो आप ऐसा क्यों नहीं कर सकेंगे? रामकृष्ण परमहंस और उनकी धर्मपत्नी शारदामणि जी साथ-साथ रहे, सारे जीवनभर रहे; लेकिन कभी उन्होंने एक-दूसरे को कामवासना की दृष्टि से नहीं देखा। आप उतना न कर पाएँ, तो कम-से इतना तो कीजिए कि नारियों के प्रति जो आपकी कुदृष्टि जीवनभर रही है, जिससे आपकी आँखों का तेजस् खत्म हो गया है, आप उस तेजस् को फिर से प्राप्त करने की कोशिश कीजिए और अपना चिन्तन बदल दीजिए। आपको यही सब बातें याद करनी हैं।

🔶 आपको यहाँ स्वाध्याय नियमित करने के लिए बताया गया है। आपको यहाँ सत्संग से जोड़कर रखा गया है। आपको कुछ सीखने के लिए और भावी योजनाओं को बनाने के लिए बताया गया है तथा उसके लिए मार्गदर्शन भी किया गया है; उसके लिए आपको तरह-तरह के कार्यक्रम भी दिए गए हैं। आपका यहाँ जो शिक्षण होता है, वह इसी दृष्टि से होता है। आपको रोटी कमाना आता है, नहाना-धोना भी आता है, व्यापार भी आता है, लेन-देन भी आता है, नौकरी करना भी आता है और जो काम नहीं आता, वह हम यहाँ सिखाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 75)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔶 ध्यान की इस भाव भरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव पराम्बा माँ भवानी से कहते हैं-

न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्।
शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः॥ ९६॥

इदमेव शिवं त्विदमेवशिवं त्विदमेव शिवं त्विदमेव शिवम्।
मम शासनतो मम शासनतो मम शासनतो मम शासनतः॥ ९७॥
  
एवं विधं गुरुं ध्यात्वा ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्।
तत्सद्गुरुप्रसादेन मुक्तोऽहमिति भावयेत्॥ ९८॥

🔷 गुरुदेव के अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है॥ ९६॥ भगवान् शिव कहते हैं- यह गुरु तत्त्व कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है॥ ९७॥ इस तरह (पिछली कड़ी में बतायी गयी) विधि से गुरुदेव का ध्यान करने से स्वतः ही ज्ञान उत्पन्न होता है। उन कृपालु सद्गुरु की कृपा से ‘मैं मुक्त हूँ’ ऐसा चिन्तन करना चाहिए॥ ९८॥
  
🔶 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु के ध्यान की फलश्रुति बतायी गयी है। यह ध्यान प्रक्रिया वही है, जिसकी कथा पिछली कड़ी में कही गयी थी। यह ध्यान अतिविशिष्ट है। इस ध्यान से सद्गुरु के सदाशिव होने का अनुभव मिलता है और यह अनुभव कहता है कि गुरु से अधिक और कुछ नहीं है। यही परम कल्याणकारी है। शिव के इस आदेश व उपदेश की सार्थकता उन्हें अनुभव होती है, जो अपने सद्गुरु के ध्यान में रमे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 117

👉 सबसे बड़ा पुण्य!

🔷 एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था. यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था।

🔶 एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा-

🔷 “महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

🔶 देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं।”

🔷 राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

🔶 देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया।

🔷 राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है।”

🔶 उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए।

🔷 कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी।

🔶 राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

🔷 देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं!”

🔶 राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?”

🔷 देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

🔶 राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ?

🔷 देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है। परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं।

🔶 देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”

🔷 अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”

🔶 राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

🔷 मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे।

👉 आज का सद्चिंतन 28 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 March 2018


👉 Amrit Chintan 28 March

🔷 It is through self-discipline and self-restrain that one develops control on his treasure mind. A firm believe on the ideality of life develops courage to act on those lines. This self introspection develops respect for others and develops gentlemen ship and responsibility of a good citizen. Without constant vigilance on self. True culture can not develop; only outward show of few courteous words will not hide your true nature for a long time.

🔶 As it is said that man creates his own destiny. It means that every man have given a choice for self-growth in all dimensions. One must select his own ideal goal of life. If others don’t help he should works hard alone. This royal road may create obstructions and resistance but man have power with in to overcome that and attain excellence in any field of life.

🔷 Try to visualize your own thoughts of mind. Analyze them. It’s most sacred form is covered by some evil and polluted coats. Try to work on them. You will be able to find the sacred component and an eternal peace in it. It is something like water; any pollution in water can be separated out as it is always outside the molecule of water. H2O, the Fractional distillation will always remove pollution and clear colorless, tasteless, odorless, specific gravity on water will be collected by cooked steam. The thoughts should be directed towards God- Who is embodiment of truth and ideality. It needs constant vigilance and practice. This is true divine nature of man. Which is true spirituality, religion is sectism which we have created. 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 7)

🔷 हमारा उदाहरण है आपके सामने। फिजूलखर्ची हमने कानी कौड़ी की भी नहीं की है। जो भी हमारे पास था, उसको बेहतरीन कामों में लगा दिया है, जिसका परिणाम आपने देखा न! देखा होगा। हमारे गाँव में स्कूल बना हुआ है, गायत्री तपोभूमि बनी हुई है, आप देख लीजिए। हमारे पास जमीदारियों के बॉण्ड आए थे; सब खत्म हो गए, सब लगा दिए। आप ऐसा नहीं कर सकते? पैसे को फिजूलखर्चियों में लगाएँगे, औलाद के लिए जमा करेंगे—आप ऐसी योजना नहीं बना सकते। आप यहाँ से जाने के बाद में जो साधन हैं, उन्हीं को बढ़ाते रहेंगे—ऐसा ही सोचते रहेंगे। बढ़ाने की बात मत सोचिए। पहली बात वहाँ से सोचिए कि हम ठीक तरह इनका कैसे इस्तेमाल कर पाएँ। जब ठीक तरीके से इस्तेमाल करेंगे, तब आप यकीन रखिए भगवान आपको दो हाथ से नहीं, चार हाथ से देगा।

🔶 भगवान के चार हाथ भी हैं, इनसान के दो हाथ ही हैं। विष्णु भगवान के देखे हैं न? चार हाथ हैं। सहस्त्रशीर्षा पुरुषः—उसके हजारों हाथ हैं और आपको हजारों हाथों से इतना देगा, जिसे आप सँभाल भी नहीं पाएँगे। हमारा उदाहरण आप देख लीजिए, हमने अपने आपको खाली कर दिया; भगवान की चीज भगवान् को सौंप दी है और भगवान ने अपनी चीजें हमको सौंप दी हैं। क्या आप ऐसी हिम्मत नहीं कर सकते? आप ऐसी दूरदर्शिता नहीं दिखा सकते? आपको ऐसी बुद्धिमानी नहीं आती? आप ऐसी अक्ल से रिश्ता नहीं जोड़ना चाहते? अगर जोड़ना चाहते हो, तो कृपा कीजिये और आप यहाँ संयमशील बनिए। पैसे के बारे में संयमशील, समय के बारे में संयमशील। आपको समय के बारे में अनुशासित किया गया है न? जब घण्टी बजती है, तब आपको आने के बारे में कहा गया है न? सुबह जब आपको प्रज्ञापेय मिलता है, तब घण्टी बजती है और आपसे यह आशा की जाती है कि आप समय पर पहुँच जाइए।

🔷 जब खाने-पीने के लिए घण्टी बजती है, तब आपसे यह आशा की जाती है कि आप बिना समय गँवाये जल्दी पहुँचेंगे। इसी तरह आपको हर टाइम-टेबिल के शिकंजे में कस दिया है। यह अभ्यास है आपका। भावी जीवन में आपको जिस शिकंजे में कसा जा रहा है, उसको आगे भी जारी रखें। केवल यहीं तक यह बातें सीमित नहीं हैं। जीभ को, आपसे संयम के लिए कहा गया है, केवल यहाँ के लिए ही नहीं, बल्कि सारे जीवन के लिए कहा गया है। आप बाहर भी जा करके रहिए। यहाँ एक कमरे में दो आदमियों को रहने की इजाजत नहीं है। अगर स्त्री-पुरुष हैं, तो भी दो कमरों में अलग-अलग रहेंगे; क्योंकि हर आदमी एकाकी बनकर रहे और दूसरी बात यह कि कभी वासनात्मक दृष्टि से एक-दूसरे को न देखें। आप वासनात्मक दृष्टि से मत देखिये। लड़कियाँ कहाँ चली जाएँगी दुनिया से? औरतें क्या मिट जाएँगी और औरतों के लिए मर्द नहीं रहेंगे क्या? मर्द रहेंगे; लेकिन उनके बीच जो जहर है, उस जहर को निकाल दीजिए। जहर निकल जाता है, तो साँप कितना सुन्दर मालूम पड़ता है! देखने में कितना अच्छा लगता है? और जहरीला होता है, तो काट खाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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