गुरुवार, 25 जनवरी 2018

👉 सच्ची भक्ति की महिमा

🔶 एक बुढ़िया माई को उनके गुरु जी ने बाल-गोपाल की एक मूर्ती देकर कहा- "माई ये तेरा बालक है,इसका अपने बच्चे के समान प्यार से लालन-पालन करती रहना।"
बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।

🔷 एक दिन गाँव के बच्चों ने देखा माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है! बच्चो ने माई से हँसी की और कहा - "अरी मैय्या सुन यहाँ एक भेड़िया आ गया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है।

🔶 मैय्या अपने लाल का अच्छे से ध्यान रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये..!" बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर बैठ गयी।

🔷 अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।.....

🔶 बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने का लोभ हो आया!

🔷 भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर मैय्या ड़र गई कि "कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरेलाल को उठाने !" मैय्या ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई!

🔶 तब श्यामसुंदर ने कहा - "मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!" माई ने कहा - "क्या? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से..!

🔷 " (बुढ़िया माई ठाकुर जी को भाग जाने के लिये कहती है, क्योकि माई को ड़र था की कही ये बना-ठना सेठ ही उसके लाल को ना उठा ले जाये )।

🔶 ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले :-"अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से प्रसन्न हूँ" बुढ़िया माई ने कहा - "अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय" अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले - "तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।" इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।

🔷 भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान जी को प्रेम करो - निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Jan 2018


👉 अहिंसा और हिंसा (अंतिम भाग)

🔶 यह सोचना गलती है कि दुख देना हिंसा और आराम देना अहिंसा है। तत्वतः काम के परिणाम और करने वाले की नियत के अनुसार हिंसा अहिंसा का निर्णय होना चाहिये। तात्कालिक और क्षणिक दुख-सुख में दृष्टि को अटकाकर उससे उत्पन्न होने वाले परिणाम की ओर से आँखें बन्द कर लेना बुद्धिमानी न होगी। किये हुए कार्य के परिणाम का गंभीरतापूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने के उपरान्त उसके उचित या अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए और उसी के आधार पर उस कार्य को हिंसा या अहिंसा ठहराना चाहिये।

🔷 विवेकपूर्वक पालन की जाने वाली अहिंसा में दंड देने की, शस्त्र प्रहार करने की युद्ध और संघर्ष करने की गुंजाइश है। एक विचारवान व्यक्ति नेक नीयती, परोपकार और धर्म भावना से अहिंसा धर्म के अनुसार दुष्ट को जान से भी मार सकता है और इसके लिए वह बिलकुल निष्पाप रहेगा। किन्तु एक कायर, बुज़दिल, अकर्मण्य और अशक्त व्यक्ति यदि अपना गलती को छिपाने के लिए कष्ट से डरकर अन्याय सहन करे तो वह अहिंसक कदापि नहीं होगा, बल्कि उसे सच्चे अर्थों में पातकी की और हिंसक कहा जायेगा। वास्तव में कायरता और हिंसा एक ही वस्तु के दो स्वरूप हैं। दोनों की जननी स्वार्थ बुद्धि है। वीरता और उदारता अहिंसा है। जो परमार्थ बुद्धि के कारण उत्पन्न होती है।

📖 अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 2)

🔷 निश्चित ही मनुष्य को जो मिला है, वह उसकी पात्रता देखते हुए किसी विशेष प्रयोजन के लिए धरोहर रूप में दिया गया है। खड़े होकर चलने वाले पैर, दस उँगलियों और अनेक मोड़ों वाले हाथ, बोलने वाली जीभ, सूझबूझ वाला मस्तिष्क, दूरदर्शी विवेक अन्य किसी प्राणी के हिस्से में नहीं आया। परिवार बसाने, समाज बनाने, आजीविका कमाने, वाहनों का उपयोग करने, प्रकृति की रहस्यमयी परत कुरेदने, शिक्षा, चिकित्सा, कला व्यवसाय, सुरक्षा जैसे साधन जुटाने में अन्य कौन प्राणी मनुष्य की समता कर सकता है।

🔶 यह सभी विभूतियाँ ऐसी हैं जिनका महत्त्व उपभोक्ता को तो प्रतीत नहीं होता, पर जब वे छिन जाती है तो स्मरण आता है कि जो सौभाग्य अपने को हस्तगत हुआ था उसे प्राणि जगत के साथ तुलना करने पर अनुपम या अद्भुत ही कहा जा सकता था। उसका सदुपयोग न कर सकने पर जो पश्चाताप होता है, उसकी व्यथा और शृंखला इतनी लम्बी होती है कि जन्म जन्मान्तरों तक उस भूल की पीड़ा व्यथित करती रहे।

🔷 सृष्टा ने मनुष्य स्तर तक पहुँचाने पर जीवधारियों की क्रमिक प्रगति और पात्रता को देखते हुए सोचा, कि क्यों न इसे सृष्टि की सुव्यवस्था में सहयोगी बनाकर अपना थोड़ा सा भार हल्का किया जाय? इसी दृष्टि से उसे युवराज का पद प्रदान किया गया और तदनुरूप समर्थता से सम्पन्न किया गया कि सृष्टि की सुन्दरता, सुव्यवस्था प्रगति एवं सुसंस्कारिता को बढ़ाने में वह विशेष योगदान भी कर सकेगा।

🔶 इसी आशा अभिलाषा के अनुरूप मनुष्य का सृजन हुआ है। और उसके निर्माण से सृष्टा का समूचा कौशल दाव पर लगा है। उसे अपनी अनुकृति के स्तर का ही बनाया गया है। जो विभूतियाँ उसमें थी उन सभी को बीज रूप में उसने काया के अनेकानेक कोश भण्डार में इस प्रकार भर दिया है कि वह जब चाहे तब उन्हें फलित, प्रस्फुटित करके उच्च स्तरीय बना सके। संक्षेप में यही है मनुष्य की सत्ता और महत्ता का सार संक्षेप।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 26 Jan

🔷 Outer cleanliness is very important but no less is the importance  of internal holiness, i.e. sacredness of life. Both are complimentary to each others. Outer decoration is only useful if organs of internal body are also healthy. But to achieve that sacred condition of life one will have develop virtues and high moral codes in life Healthy body, healthy mind must also bear high character and ideality in life.
 
🔶 The original divinity of human being manifest its potentiality if we discipline our life by five restraint of Panch-sheel These are – hard working habit, management gentlemanship, economical planning and by caring and sharing the sorrows of others. These five trends in life mould the entire personality of a man. Our yielidind to the attraction of sensual passion and attraction is true slavery of human life.

🔷 In coming days if people change their views for the object of life, and does not stick to materialistic life, the era will change. It is our ignorance; tension and scarcity are the main factors which create well in our life. All the dirt and four smelling are when wiped off cleans the home. Similarly when the things will improve and men will rectify himself, the golden era will appears everywhere in this world.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 6)

🔷 मित्रो! लोगों की आर्थिक समस्या का समाधान इस तरह से हम कर सकते हैं। सबसे पहले आपको अपने खर्च में मितव्ययिता बरतनी चाहिए, ताकि आपको कर्जदार होने का मौका न मिले। ताकि आपको परेशान होने का मौका न मिले। आर्थिक समस्याओं के समाधान करने के लिए इन सूत्रों को स्वर्णिम अक्षरों से और हीरे की कलम से अपने मन-मस्तिष्क में लिखने वाले, सचमुच में जहाँ कहीं भी ये सूत्र लोगों के हृदय में हृदयंगम कर लिए जायेंगे, वहाँ लोगों की हालत ठीक होती हुई चली जायेगी। जहाँ मनुष्यों को शराब पीने की आदत होगी, कोकाकोला पीने की आदत होगी, सिनेमा देखने की आदत होगी। आरामपरस्ती की आदत बनी रहेगी, हरामखोरी की आदत बनी रहेगी। आदमी काम से जी चुराते रहेंगे, वहाँ सम्पन्नता और खुशहाली कैसे आ सकती है?

🔶 मित्रो! हम मनुष्य की सारी समस्याओं का समाधान करने चले हैं, जिसमें आर्थिक समस्या भी शामिल है, पैसे की समस्या भी शामिल है। समाज की समस्या भी शामिल है, पारिवारिक समस्या भी शामिल है। वे सारी समस्याएँ भी शामिल हैं, जिससे कि मनुष्य पीड़ित हो रहा है, दुखी हो रहा है, उद्विग्न हो रहा है। इन सारी की सारी समस्याओं का समाधान करने का हमारा एक ही तरीका है कि हम अपने विचारों को किस तरह से अच्छा बनायें। विचारों को किस तरीके से श्रेष्ठ बनायें। विचारों की शृंखला को किस तरह से सुव्यवस्थित बनायें। आज मनुष्य को हर जगह से पीड़ा घेरे हुए है। अशान्तियाँ घेरे हुए हैं। अव्यवस्थाएँ घेरे हुए हैं। इनका समाधान और निराकरण करने का जो ठोस, मूलभूत और चिरस्थाई उपाय है, उसको हम खोज सकें, हल निकाल सकें, उसके लिए हम आपको भेज रहे हैं। अध्यात्म का असली शिक्षण देने के लिए हम आपको बाहर भेज रहे हैं।

🔷 मित्रो! राम नाम की माला घुमाने की नसीहत देने के लिए हम आपको नहीं भेजते हैं। माला घुमाने की प्रारम्भिक शिक्षा गूढ़ है। माला के १०८ दाने जिस तरह से घुमाए जाते हैं, उसी तरह हमारे जीवन के प्रत्येक स्रोत और प्रकृति को आध्यात्मिकता के आधार पर घुमाया जाना चाहिए। जादू या चमत्कार माला के अन्दर नहीं है। माला के अंदर प्रेरणा है, शिक्षा है। माला के अंदर दिशायें हैं, जिसमें माला के अंदर मीठा बोलने का मनका नम्बर एक, परिश्रमी होने का माला का मनका नम्बर दो।

🔶 सच बोलने का माला का मनका नंबर-तीन, सफाई से रहने का माला का मनका नम्बर-चार आदि है। इस तरह से माला के १०८ मनके होते हैं, जो मनुष्यों के स्वभाव और मनुष्यों की सत्प्रवृत्तियों को सुव्यवस्थित बनाने के लिए हैं। यह जादू नहीं है, मैजिक नहीं है, जैसा कि आप लोगों को बता दिया गया है कि लकड़ी के टुकड़ों को आप बार-बार घुमा दिया करें और थोड़े से अक्षरों का-मंत्रों का उच्चारण कर लिया करें। इसमें न कोई जादू है और न ही कोई चमत्कार पैदा होने वाला है। इससे न कोई सिद्धि पैदा होने वाली है, न कोई भूत पैदा होने वाला है। इसमें से ऐसा कुछ भी पैदा होने वाला नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 23)


👉 सब कुछ गुरु को अर्पित हो

🔷 कर्म ही नहीं, मन और वाणी से भी गुरु आराधना करनी चाहिए। बार-बार और हमेशा ही यह सत्य ध्यान में रखना चाहिए कि गुरु आराधना गुरु की शरीर सेवा तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक दायरे में सद्गुरु के विचारों का प्रसार व उनके अभियान को गति देने के लिए प्राण-पण से प्रयास करना भी शामिल है। इस हेतु न केवल स्वयं का जीवन अर्पण करना चाहिए; बल्कि अपनी पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों को लगाना चाहिए। अपनी यह देह पंचमहाभूतों के विकार के सिवा भला और है ही क्या? इस देह की सार्थकता सद्गुरु के कार्य के प्रति समर्पित होने में ही है।
  
🔶 स्वामी विवेकानन्द महाराज के दो शिष्य थे स्वामी कल्याणानन्द और स्वामी निश्चयानन्द। एक दिन स्वामी जी ने इन दोनों को अपने पास बुलाया और कहा- देखो हरिद्वार में साधुओं की सेवा की कोई व्यवस्था नहीं है। उन दिनों आज से करीब सौ वर्ष पूर्व हरिद्वार का समूचा क्षेत्र महाअरण्य था। साधु हों या फिर तीर्थयात्री इन सभी को सामान्य औषधि एवं चिकित्सा के अभाव में अनेकों कष्ट उठाने पड़ते थे। कई बार तो इन्हें मरना भी पड़ता था। स्वामी जी ने अपने इन दोनों शिष्यों को इनकी सेवा का आदेश दिया। इन दोनों साधन विहीन साधुओं के पास अपने सद्गुरु के आदेश के सिवा और कोई भी सम्पत्ति न थी। जब स्वामी कल्याणानन्द एवं स्वामी निश्चयानन्द स्वामी जी को प्रणाम करके चलने लगे, तो उन्होंने कहा- अब तुम दोनों इधर लौटकर फिर कभी न आना, बंगाल को भूल जाना। आदेश अति कठिन था; परन्तु शिष्य भी सद्गुरु को सम्पूर्ण रीति से समर्पित थे।
  
🔷 बेलूड़ मठ से चलकर ये दोनों ही हरिद्वार आए। उन्होंने कनखल में अपनी झोपड़ियाँ बनाई और जुट गए सेवा कार्यों में। दिन भर बीमार साधुओं एवं तीर्थ यात्रियों की सेवा और रात भर अपने सद्गुरु का ध्यान। कार्य चलता रहा, वर्ष बीतते रहे। इस बीच स्वामी जी ने इच्छामृत्यु का वरण किया; परन्तु सद्गुरु आदेश के व्रती ये दोनों गुरु के अन्तिम दर्शन में भी नहीं गए। गुरु कार्य के लिए उन्होंने अनेकों अपमान झेले, तिरस्कार सहे; पर सब कुछ उनके लिए गुरु कृपा ही थी। लगातार ३५ सालों तक उनका यह सेवा कार्य चलता रहा। उनके कार्यों का स्मारक आज भी कनखल क्षेत्र में श्री रामकृष्ण  सेवाश्रम के रूप में स्थित है। सद्गुरु के कार्य के प्रति निष्ठापूर्ण समर्पण ने उन्हें अध्यात्म के शिखरों तक पहुँचा दिया। इन दोनों के लिए स्वामी जी ने स्वयं अपने मुख से कहा था- हमारे ये बच्चे परमहंसत्व प्राप्त कर धन्य हो जाएँगे। गुरुकृपा से यही हुआ भी। ऐसे कृपालु सद्गुरु को शत-सहस्र-कोटिशः नमन!

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 43

बुधवार, 24 जनवरी 2018

👉 संत की वाणी

🔷 किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया !.दोनों बाप बेटा आराम से जीवन व्यतीत करने लगे!

🔶 एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा -- ”देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहां से भाग जाना, समझे !

🔷 ”हां बापू, समझ गया !“ एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर दूं। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा, -- ”उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं ?“

🔶 उस आदमी ने उत्तर दिया --”वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं! “

🔷 यह सुनकर उसका माथा ठनका। ‘इसका उपदेश नहीं सुनूंगा ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहां से भाग निकला!

🔶 जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुंचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे, ”कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएं उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं!“

🔷 ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया। वहां पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहां बैठे पहरेदार ने टोका, -- ”अरे कहां जाते हो? तुम कौन हो?“

🔶 उसे महात्मा का उपदेश याद आया, ‘झूठ नहीं बोलना चाहिए।’ चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया -- ”मैं चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं!“

🔷 ”अच्छा जाओ।“ उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा! मजाक कर रहा है। चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहां ढेर सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया!

🔶 एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा! वहां रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहां रखा था। वह खाना खाने लगा!

🔷 खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।’ उसने अपने मन में कहा, ‘खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए।’ इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा!

🔶 पहरेदार ने फिर पूछा -- ”क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की?“

🔷 देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया!“ इतना कहकर वह वहां से चल पड़ा !

🔷 उधर रसोइए ने शोर मचाया --”पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है !“ पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया!

🔶 राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्धारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था!

🔷 आपका धन चुराया लेकिन आपका खाना भी खाया, जिसमें नमक मिला था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़कर भागा।

🔶 उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी !

🔷 वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि बेटा पकड़ लिया गया- लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर !

🔶 लड़का बोला --”बापू जी, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो! लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल !

🔷 सच्चे संत की वाणी में अमृत बरसता है, आवश्यकता आचरण में उतारने की है ....!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Jan 2018


👉 अहिंसा और हिंसा (भाग 2)

🔶 बड़े बुद्धिमान, ज्ञानवान, शरीरधारी प्राणियों को दुख देने, दण्ड देने या मार डालने या हिंसा करने के समय यह विचारना आवश्यक है। कि यह दुख किस लिए दिया जा रहा है। सब प्रकार के दुख को पाप और सब प्रकार के सुख को पुण्य नहीं कहा जा सकता। गरीब भेड़ों के खून के प्यासे भेड़ियों को मार डालना न तो पाप है और न सर्प को दूध पिलाना पुण्य है। हिंसा अहिंसा की परिभाषा कष्ट या आराम के आधार पर करना एक बड़ा घातक भ्रम है। जिसके कारण केवल पाप का विकास और धर्म का नाश होता है।
एक आप्त वचन है कि- वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति अर्थात्- विवेकपूर्वक की गई हिंसा हिंसा नहीं है।

🔷 अविवेकपूर्वक दूसरों को जो कष्ट दिया गया है वह हिंसा है। जिह्वा की चटोरेपन के लोभ में निरपराध और उपयोगी पशु पक्षियों का माँस खाने के लिए उनकी गरदन पर छुरी चलाना पातक है, अपने अनुचित स्वार्थ की साधना के लिए निर्दोष व्यक्तियों की दुख देना हिंसा है। किन्तु निस्वार्थ भाव से लोक कल्याण के लिए तथा उसी प्राणी के उपकार के लिए यदि उसे कष्ट दिया जाय, तो वह हिंसा नहीं, वरन्, अहिंसा ही होगी। डॉक्टर निस्वार्थ भाव से रोगी की वास्तविक सेवा करने के लिए फोड़े को चीरता है, एक न्यायमूर्ति जज समाज की व्यवस्था कायम रखने के लिए डाकू को फाँसी की सजा का हुक्म देता है, एक धर्म प्रचारक अपने जिज्ञासु साधक आत्म कल्याण के लिए तपस्या करने के मार्ग पर प्रवृत्त करता है। मोटी दृष्टि से देखा जाय तो डॉक्टर का फोड़ा चीरना जज का फाँसी देना, गुरु का शिष्य को कष्ट में डालना, हिंसा और अधर्म जैसा प्रतीत होता है। पर असल में यह सच्ची अहिंसा है।

🔶 गुण्डे बदमाशों को क्षमा कर देने वाला हरामखोरों का दान देन वाला दुष्टता को सहन करने वाला, देखने में अहिंसक प्रतीत होता है। पर असल में वह घोर पातकी हिंसक और हत्यारा है। क्योंकि अपनी बुज़दिली और हीनता को अहिंसा की बेड़ी में छिपाता हुआ असल में वह पाजीपन की मदद करता है। एक प्रकार से अनजाने में दुष्टता की जहरीली बेल को सींचकर दुनिया के लिए प्राणघातक फल उत्पन्न करने में सहायक बनता है। ऐसी अहिंसा को जड़बुद्धि के अज्ञानी ही अहिंसा कह सकते है असल में तो वह प्रथम श्रेणी की हिंसा है।

📖 अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/July/v2.14

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 1)

🔷 जीवन यदि शरीर मात्र ही हो और प्रसव के समय उसका आदि और चिता के साथ अन्त माना जाय, तो फिर कृमि-कीटकों की तरह पेट प्रजनन की उधेड़ बुन में लगे रहना भी पर्याप्त हो सकता है। मनःसंस्थान अधिक विकसित होने के कारण इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित रूप में, लोभ-मोह में भी चरितार्थ होते रहने दिया जा सकता है। उद्धत अहंकारिता का त्रिदोष इसमें और मिल सके तो फिर प्रेत-पिशाचों जैसी स्थिति में भी रहा जा सकता है। वे खाते कम और खुतराते अधिक हैं। उपभोग उतना नहीं कर पाते जितना विनाश करते हैं। उनकी प्रसन्नता ध्वंस, पतन और दुर्गति के दृश्य देखने पर अवलम्बित रहती है। जलते और जलाते, कुढ़ते और कुढ़ाते दिन बिताते हैं। इन्हीं वर्ग समुदायों में से किसी में रहना जिन्हें भाया, सुहाया हो उनसे कोई क्या कहे? किन्तु जिन्हें कुछ आगे की बात सोचनी आती है, उनसे तो कहने सुनने जैसी ढेरों बातें हैं। उनमें से कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें हीरे मोतियों से तोला जा सकता है।

🔶 किसी को यदि यह आभास हो कि हम मात्र शरीर नहीं है। आत्मा नाम की किसी वस्तु का भी अस्तित्व है और उसका थोड़ा बहुत सम्बन्ध आत्मा से भी है, तो ढेरों ऐसे प्रश्न उभर कर आते हैं जिनका स्वरूप और समाधान ढ़ूँढे बिना गति नहीं। कुछ ऐसे ज्वलन्त प्रश्न हैं जिनकी उपेक्षा वही कर सकता है, जिसे लोक-परलोक से, आत्मा-परमात्मा से, उत्थान-पतन से, कर्म-अकर्म से कुछ लेना-देना न हो। जिनकी दृष्टि लोभ और मोह से एक कदम भी आगे को नहीं जाती। जिसे तत्काल की सुख-सुविधा, आत्मश्लाघा, सस्ती वाहवाही के अतिरिक्त और कुछ सुहाता न हो। जिसे न भूत का स्मरण हो और न भविष्य के भले बुरे होने का अनुमान। ऐसे परमहंस, जड़ भरत या अतिशय चतुर व्यक्ति ही इस स्थिति में रहते पाये गये हैं। जिन्हें तत्काल से आगे-पीछे की कोई बात सोचने की न फुरसत मिले न आवश्यकता लगे।

🔷 यदि गहरी न छानी हो और अपना अस्तित्व शरीर से भिन्न भी प्रतीत होता हो, तो फिर सोचना होगा कि सृष्टा ने जो सुविधाएँ किसी भी जीवधारी को नहीं दी है वे मात्र मनुष्य को ही क्यों प्रदान कर दी? जबकि उसे समदर्शी न्यायकारी और परमपिता कहा जाता है। इन तीनों विशेषताओं का तब खण्डन हो जाता है, जब अन्य प्राणियों को वंचित रखकर कुछ असाधारण सुविधाएँ मनुष्य को ही देने की बात सामने आती हैं। सबको समान या किसी को नहीं, इसी में प्राणियों का पिता कहलाने वाले परमात्मा की न्यायप्रियता एवं समदर्शिता सिद्ध होती है। न्यूनाधिक वितरण करने पर तो उस पर पक्षपात का लांछन लगता है। ऐसा हो नहीं सकता। परमात्मा ही जब ऐसी अनीति बरतेगा तो उसकी सृष्टि में न्याय नीति का अस्तित्व किस प्रकार बना रह सकेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 25 Jan

🔷 Every man in his pains or disgrace condition need love and sympathy to stand in life. Man who knows the value of those virtues will not remain a silent observer, but engage himself for the service he can impart. Such help, guidance or encouragement gives a strong boost up in life. One should never miss such chances to give proper stand to the down-trodden.
 
🔶 To be dutiful in life covers a great aspect of successful life. A man in a society is expected to fulfill his duties for his own body maintainance, for the members of his family and also a full flazed responsibility for the society and country he lives in every man is expected to prove himself dutiful in all above dimensions of life.

🔷 One who knows the value of time management and economy; that will achieve at least half of the royal road of success in life. Other virtues of life like simplicity hard labour. Restrained life and kindness and loving nature are very valuable achievement for progress both in material life and spiritual progress.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 5)

🔷 मित्रो! मनुष्यों को मनुष्यता का शिक्षण करना हमारा और आपका सबसे बड़ा काम है। हमारा काम वह नहीं है जो लोग हमसे उम्मीद करते हैं। लोग हमसे यह उम्मीद करते हैं कि हम दुनिया की आर्थिक समस्या को कैसे सुधार पायेंगे? लोगों को मालदार कैसे बना पायेंगे? और लोगों की आर्थिक व्यवस्था कैसे बना पायेंगे। मित्रो! हम आर्थिक व्यवस्था की बात तो नहीं करते, परन्तु उसका मजबूत आधार हम बनाकर देंगे। जहाँ परिश्रमी और पुरुषार्थी लोग रहते हैं, वहाँ मालदारों की कमी नहीं रहती है। जापान छोटा सा द्वीपों वाला देश है, जहाँ बराबर भूकम्प आते रहते हैं। जहाँ बराबर तूफान आते रहते हैं और जहाँ बराबर तबाही आती रहती है।

🔶 जरा-सा देश है जापान, लेकिन वहाँ के नागरिक कैसे श्रमपरायण एवं पुरुषार्थी होते हैं। छोटी-सी जमीन में इतनी पैदावार कर ली कि किसी जमाने में विश्व में पहले नम्बर का देश था। आज तो नहीं रहा। एटमबम गिरने के बाद में कुछ परिवर्तन तो हुए, लेकिन अभी भी उसके मुकाबले का देश दुनिया में तलाश करें, तो उसके मुकाबले का कोई दूसरा देश दिखाई नहीं पड़ता। एकदम कम साधन, इतनी कम जमीन, इतनी कम व्यवस्था में रहकर भी उसने सारी दुनिया को चैलेंज किया। कभी चीन पर हावी हुआ था, तो कभी अमेरिका को चैलेंज किया था। आर्थिक दृष्टि से अपने समान देशों से वह कहाँ-से चला गया।

🔷 मित्रो! यह क्या है? यह सम्पदा कहाँ से आती है? यह सम्पदा मनुष्य के शरीर में भरी पड़ी है और भीतर दबी पड़ी है। यदि हम आदमी को पुरुषार्थवान बना दें और कम्युनिस्ट बना दें, तो? आपने देखा नहीं, थोड़े दिन पहले जो लोग पाकिस्तान से आये थे, अपनी सारी-की चीजों को गवाँ कर आये थे। वे यहाँ हिन्दुस्तान में आ गये और भिक्षा माँगने की अपेक्षा लेमनजूस बेचना शुरू कर दिया। टॉफी बेचना शुरू कर दिया, पापड़ बेचना शुरू कर दिया और खिलौना बेचना शुरू कर दिया। आप देखिए न, पंजाब से आया आदमी कोई भिखारी मालूम पड़ता है क्या? सब मालदार हो गये और वे पैसे के मालिक बने बैठे हैं।

🔶 सारे-के आदमी दुकान चला रहे हैं। आप सबको उनने चैलेंज कर दिया और जाने वे कहाँ-से चले गये। आप तो यह चाहते हैं कि गुरुजी, हमें आप लक्ष्मी का मंत्र बता दीजिए, हमारी नौकरी लगवा दीजिए। हम तो मैट्रिक पास हैं और मारे-मारे फिरते हैं। हमें कहीं काम पर लगा दीजिए, नौकरी लगवा दीजिए। पागल कहीं का, भूखा मरेगा। जो आदमी पुरुषार्थी नहीं है, जिसके अन्दर परिश्रम का माद्दा नहीं है और जो मेहनतकश नहीं है और जिस आदमी को मेहनत करने में मजा नहीं आता, वह आदमी मित्रो! ऐसे ही पैदा हुआ है और उसे ऐसे ही मरना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 22)

👉 सब कुछ गुरु को अर्पित हो

🔷 इन महामंत्रों का प्रत्येक अक्षर साधक के साधना पथ का प्रदीप है। इससे निकलने वाली प्रत्येक किरण के प्रकाश में साधक का साधनामय जीवन उज्ज्वल होता है। गुरु तत्त्व जितना श्रेष्ठ है, उतना ही श्रेष्ठ गुरु का कार्य है। तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी शिवानन्द जी महाराज कहते थे- ‘डिवोशन टू संघ इज़ डिवोशन टू ठाकुर’ यानि कि मिशन-मठ के संगठन के प्रति भक्ति ठाकुर के प्रति भक्ति है। सद्गुरु का कार्य सद्गुरु की चेतना का ही विस्तार है। जो शिष्य अपने सद्गुरु के कार्य के प्रति समर्पित है, यथार्थ में वही सद्गुरु के प्रति समर्पित है। जो सद्गुरु के कार्य के लिए अपने समय, श्रम एवं धन का नियोजन करते हैं, वही अपने गुरु की सच्ची आराधना करते हैं।
  
🔶 सद्गुरु की आराधना के लिए गुरु कार्य हेतु अपने साधन एवं समय का एक महत्त्वपूर्ण अंश लगाना चाहिए। गुरु कार्य छोटा हो या बड़ा उसे करने में किसी भी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि लोगों को जिन कार्यों के लिए लज्जित होना चाहिए, उन्हें करने में वे लज्जित नहीं होते। बड़े मजे से झूठ, छल, कपट करते हैं, धोखाधड़ी करते हैं। इन कार्यों में उन्हें लज्जा नहीं आती है; पर गुरु की आज्ञा का पालन करने में वे शर्माते हैं। सद्गुरु का कार्य जो भी है, उसे भक्तिपूर्ण रीति से करना चाहिए। इसके लिए लज्जा का त्याग करने में भी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 42

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

👉 “संगत बुरी असाधु की- आठों पहर उपाधि”

🔷 सम्राट चमूपति ने राजपुरोहित महामंत्री और अनेक विद्वान व्यक्तियों से परामर्श किया किन्तु वे राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता न छुड़ा पाये। महामंत्री के सुझाव पर उन्होंने राजकुमार का विवाह कर दिया- सोचा यह गया था कि नये उत्तरदायित्व राजकुमार के स्वभाव में परिवर्तन ला देंगे किन्तु स्थिति में कुछ परिवर्तन के स्थान पर राजकुमार का स्वभाव और भी उग्र हो गया। जबकि दूसरे सभी राजकुमारों की- सौम्यता, सौजन्यता के घर-घर गीत गाये जाते थे श्रीवत्स का स्वभाव राज-कुल का कलंक सिद्ध हो रहा था।

🔶 उन्हीं दिनों महर्षि श्यावाश्व ने वाजि- मेधयज्ञ का आयोजन किया था। सम्राट चमूपति उस आयोजन के प्रमुख यजमान के रूप में आमंत्रित किये गये। आचार्य प्रवर का सन्देश पाकर एक दिन वे आश्रम की ओर चल पड़े। प्रथम विराम, उन्होंने राजधानी से 5 योजन की दूरी पर स्थित अरण्यजैत ग्राम में किया। महाराज का विराम-शिविर प्रमुख परिचारकों के साथ- ग्राम के बाहर एक देव स्थान के पास किया गया। दिनभर के थके परिचारकों को जल्दी ही नींद आ गई किन्तु सम्राट किसी विचार में खोये अब भी जाग रहे थे।

🔷 तभी किसी विलक्षण आवाज ने उन्हें चौंका दिया। आवाज एक नन्हें से तोते की थी। वह मनुष्य की बोली में अपनी स्वामी से बोला-तात! आज तो बहुत अच्छा शिकार पास आ गया। इसके पास तो सोने का मुकुट, रजत की अम्बारियाँ और मणि-मुक्ताओं से जड़ित बहुमूल्य वस्त्र भी हैं- एक ही दाव में जीवन भर का हिसाब पूरा कीजिए स्वामी- ऐसा समय फिर हाथ नहीं आयेगा।

🔶 तोते का मालिक- अरण्यजीत का खूँखार दस्यु नायक- महाराज को पहचानता था। उसने तोते को चुप करना चाहा किन्तु ढीठ तोता- चुप न रहा- फिर बोला- आर्य! महाराज हैं तो क्या हुआ डरो मत सिर धड़ से अलग कर दो और चुपचाप इनका सारा सामान अपने अधिकार में ले लो।

🔷 सम्राट चमूपति- रात के अन्धकार की नीरवता से पहले ही सहमे हुए थे तोते की भयंकर मन्त्रणा ने उन्हें और डरा दिया- उन्हें नीति वचन याद आया “जहाँ मनुष्य को कुछ आशंका हो उस स्थान का तत्काल परित्याग कर देना चाहिए” सो उन्होंने अंग रक्षकों को जगाया और अविलम्ब वहाँ से चल पड़े।

🔶 प्रातःकाल होने को थी महाराज ने श्यावाश्व के आश्रम में प्रवेश किया उधर भगवान रश्मि-माल ने अपनी प्रथम किरण से उनका अभिषेक किया। आश्रम के द्वार पर महाराज पहुँचे ही थे कि एक अति मधुर ध्वनि कानों में पड़ी- आज के मंगलमूर्ति अतिथि- आइये, पधारिये आपका स्वागत है, आपका स्वागत है। आश्चर्य से महाराज श्री ने दृष्टि ऊपर उठाई। समीप के वृक्ष पर बैठा एक नन्हा सा शुक बोल रहा था। महाराज ने ऊपर की ओर देखा और रात की घटना सजीव हो मानस पटल पर गूँज उठी- सम्राट बोले- तात! तुम्हारा स्वर कितना मधुर, कितना मोहक है और एक वह स्वर था जिसने मुझे रात में डरा ही दिया।

🔷 शुक के पूछने पर महाराज ने रात का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वेदनासिक्त प्रच्छ्वास छोड़ते हुये शुक ने कहा- तात! अरण्यजैत का वह शुक मेरा सगा ही भाई है उसके कृत्य के लिये क्षमा याचना करता हूँ।

🔶 महाराज बोले- वत्स! एक ही उदर से जन्मे तुम दोनों भाइयों में यह विसंगति कैसी? नन्हे शुक ने उत्तर दिया- महाराज! सब संगति का फल है। मेरा भाई दस्युओं के गाँव में रहता है सो स्वाभाविक ही है कि उसमें वहाँ के लोगों जैसी क्रूरता हो, मुझे जो ज्ञान मिला वह महर्षि श्यावाश्व के इस संस्कार भूत आश्रम के वातावरण का प्रतिफल है। महाराज- श्री राजकुमार श्रीवत्स के बुरे होने का कारण समझ गये और उन्हें सुधारने का सूत्र भी मिल गया- सत्संगति।

📖 अखण्ड ज्योति 1984 नवम्बर
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 24 Jan 2018


👉 अहिंसा और हिंसा

🔶 अहिंसा को शास्त्रों में परम धर्म कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्यता का प्रथम चिन्ह है। दूसरों को कष्ट, पीड़ा या दुःख देना निःसंदेह बुरी बात है, इस बुराई के करने पर हमें भयंकर पातक लगता है। और उस पातक के कारण नारकीय रारव यातनायें सहन करनी पड़ती हैं। बौद्ध और जैन धर्म तो अहिंसा को ही संपूर्ण धर्म मानते हैं। अन्य धर्मों में भी अहिंसा के लिए बहुत ऊँचा स्थान है।

🔷 ऐसे प्रधान धर्म का पालन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके तत्वज्ञान पर एक विवेचनात्मक दृष्टि डाली जाय। हमें जानना चाहिए कि हिंसा क्या है। और दूसरों को दुःख की व्याख्या क्या है। किसी को दुख न देने की मोटी कहावत तो इतनी स्थूल है कि उसका आचरण करने पर एक घंटे भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता और एक दिन भी ऐसी अहिंसा काम में आने लगे तो सृष्टि सर्वनाश ही समझना चाहिए। सिंह, व्याघ्र और सर्प, बिच्छुओं को दुख न देने की नीति ग्रहण की जाय तो सहस्रों निरपराध प्राणियों के प्राण संकट में पड़ते रहें।

🔶 हत्यारे और डाकुओं को न सताया जाय, तो समाज की सुख, शान्ति ही चली जावें जुँए, चीलर, रक्तजुँए, खटमल आदि को पाल कर रखा जाय, तो चैन से बैठना मुश्किल हो जाय। मक्खी, मच्छर, पिस्सू, बीमारियों के कीड़े फसल के शत्रु कीड़े आदि को न सताया जाय तो जीवनयापन होना कठिन है। शरीर के हिलने जुलने साँस लेने पानी पीने भोजन करने में अनिवार्यतः हिंसा होती है। इससे चार भाई भी उपाय नहीं है।

🔷 मूढ़ता के कारण अज्ञानी व्यक्ति जिन कार्यों को अहिंसा माने लेते हैं। असल में वह एक भ्रम मात्र है। जीवित पदार्थों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है कहा गया है कि जीवो जीवस्य भोजनम शाक अन्न दूध जल, वायु से जीवित प्राणियों को खाकर हम भी जीवित रहते है। ऐसी अनिवार्य हिंसा जो स्वाभाविक है,वह हिंसा नहीं कही जा सकती। अमुक शाक खाने में हिंसा हो जायगा या मुख पर पट्टी बाँधे बिना साँस लेने से हिंसा हो जायेगी। ऐसी सनक के लिए अपना समय और शक्ति बर्बाद करना व्यर्थ है क्योंकि यह अनिवार्य है। ढकोसले बनाने पर भी उसका बचाव नहीं हो सकता। मुँह पर पट्टी बाँध लेने से भी जीव पेट में पहुँचेगा, यह न पहुंचेंगे तो वह खुद ही मर जायगा।  

📖 अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/July/v2.14

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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