रविवार, 24 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 73)

🌹  अपना मूल्यांकन भी करते रहें
🔴 यह निर्विवाद सत्य है कि धर्म और सदाचार के आदर्शवादी सिद्धांतों का प्रशिक्षण भाषणों और लेखों से पूरा नहीं हो सकता। ये दोनों माध्यम महत्त्वपूर्ण तो हैं, पर इनका उपयोग इतना ही है कि वातावरण तैयार कर सकें। वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है, जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाए। चूँकि हमें नए समाज की, नए आदर्शों, जनमानस में प्रतिष्ठापना करनी है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि युग निर्माण परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाए बिना जनमानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना संभव नहीं। इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करे कि उसके जीवन में आलस्य, प्रमाद, अव्यवस्था एवं अनैतिकता की जो दुर्बलताएँ समाई हुई हों, उनका गंभीरतापूर्वक निरीक्षण करे और इस आत्म-चिंतन में जो-जो दोष दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने के लिए एक क्रमबद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।
     
🔵 आत्म चिंतन के लिए हम में से हर एक हो अपने से निम्न १० प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।
   
🔴 (१) समय जैसी जीवन की बहुमूल्य निधि का हम ठीक प्रकार सदुपयोग करते हैं या नहीं? आलस्य और प्रमाद में उसकी बरबादी तो नहीं होती?

🔵 (२) जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का हमें ध्यान है या नहीं? शरीर सज्जा में ही इस अमूल्य अवसर को नष्ट तो नहीं कर रहे? देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के पुनीत कर्तव्य की उपेक्षा तो नहीं करते?

🔴 (३) अपने विचारधारा एवं गतिविधियों को हमने अंधानुकरण के आधार पर बनाया है या विवेक, दूरदर्शिता एवं आदर्शवादिता के अनुसार उनका निर्धारण किया है?

🔵 (४) मनोविकारों और कुसंस्कारों के शमन करने के लिए हम संघर्षशील रहते हैं या नहीं? छोटे-छोटे कारणों को लेकर हम अपनी मानसिक शांति से हाथ धो बैठने और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध करने की भूल तो नहीं करते।

🔴 (५) कटु भाषण, छिद्रान्वेषण एवं अशुभ कल्पनाएँ करते रहने की आदतें छोड़कर सदा संतुष्ट, प्रयत्नशील एवं हँसमुख रहने की आदत हम डाल रहे हैं या नहीं?

🔵 (६) शरीर, वस्त्र, घर तथा वस्तुओं को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखने का अभ्यास आरंभ किया या नहीं? श्रम से घृणा तो नहीं करते?

🔴 (७) परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक ध्यान एवं समय लगाते हैं या नहीं?

🔵 (८) आहार सात्विकता प्रधान होता है न? चटोरपन की आदत छोड़ी जा रही है न? सप्ताह में एक समय उपवास, जल्दी सोना, जल्दी उठना, आवश्यक ब्रह्मचर्य का नियम पालते हैं या नहीं?

🔴 (९) ईश्वर उपासना, आत्मचिंतन एवं स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम में स्थान दे रखा है या नहीं?

🔵 (१०) आमदनी से अधिक खर्च तो नहीं करते? कोई दुर्व्यसन तो नहीं? बचत करते हैं न?

उपरोक्त दस प्रश्न नित्य अपने आपसे पूछते रहने वाले को जो उत्तर आत्मा दे, उन पर विचार करना चाहिए और जो त्रुटियाँ दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने का नित्य ही प्रयत्न करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.104

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.19

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग 3)

🔴 ध्यान की तीसरी कसौटी- जागरुकता है। जागरुकता का अर्थ है- बाह्य जागृति के साथ अन्तः जागृति एक साथ। ध्यान सध रहा है, तो जागरुकता भी अपने आप ही सध जाती है। ध्यान साधक की प्रगाढ़ता में साधक के अन्दर एक गहरी समझ पैदा होती है। वह बाह्य जीवन को भी अच्छी तरह से समझता है और आन्तरिक जीवन को भी। उसे अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का भली प्रकार बोध हो जाता है। वह जिन्दगी की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को यहाँ तक कि आसानी से नजर अन्दाज कर दी जाने वाली बातों को न केवल समझता है, बल्कि उनका समुचित उपयोग भी कर लेता है। उसे आन्तरिक एवं सूक्ष्म प्रकृति के संकेतों की भी बहुत गहरी समझ होती है। ध्यान की प्रगाढ़ता साधक में जिस क्रम में बढ़ती है, त्यों-त्यों वह मानवीय चेतना के सभी आयामों में जागरुक एवं सक्रिय हो जाता है।
 
🔵 ध्यान की चौथी कसौटी- दौर्मनस्य का समाप्त हो जाना है। सामान्य क्रम में देखा यही जाता है कि मन में एक के बाद एक नयी-नयी इच्छाएँ अंकुरित होती रहती हैं। इनमें से सभी का पूरी हो पाना प्रायः असम्भव होता है। इच्छा पूरी न होने की स्थिति में मनुष्य या तो स्थिति को उसका दोषी मानता है अथवा फिर किसी सम्बद्ध व्यक्ति को। और मन ही मन उससे बैर ठान लेता है। यही दौर्मनस्य की भावदशा है। ध्यान साधना करने वाले व्यक्ति के मन में इच्छाओं की बाढ़ नहीं आया करती है। उसके अन्तःकरण में निरन्तर जलने वाली ज्योति उसके सामने इस सत्य को प्रकाशित करती रहती है कि यहाँ अथवा किसी अन्य लोक में कुछ भी पाने योग्य नहीं है। इसके अलावा उसे इस महासत्य का हमेशा बोध होता है कि सृष्टि में सब कुछ भगवान् महाकाल की इच्छानुसार हो रहा है, फिर भला दोष किसका? जब दोष ही नहीं तब द्वेष क्यों? ये भावनाएँ उसे हमेशा दौर्मनस्य से बचाए रखती है।

🔴 ध्यान की पांचवीं कसौटी है- दुःख का अभाव। ध्यान साधक की चेतना में स्थिरता और नीरवता का इतना अभेद्य कवच चढ़ा रहता है कि उसे दुःख स्पर्श ही नहीं कर पाते। महर्षि पतंजलि ने दुःख को चित्त की चंचलता का परिणाम कहा है। जिसका चित्त जितना ज्यादा चंचल है, वह दुःखी भी उतना ही ज्यादा होता है। जहाँ चंचलता ही नहीं वहाँ दुःख कैसा? चंचल चित्त वाले व्यक्ति एक छोटी सी घटना से भी भारी दुःखी हो जाते हैं। किन्तु जिनका चित्त स्थिर है, उन्हें भारी से भारी दुःख भी विचलित नहीं कर पाते। श्रीमद्भगवद्गीता की भाषा में ‘न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 3
http://beta.literature.awgp.in/akhandjyoti/2003/September/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 24 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Sep 2017


शनिवार, 23 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 72)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  
🔴 यह आवश्यकता हम लोगों को ही पूरी करनी होगी। दूसरों लोग इस मोर्चे से पीछे हट रहे हैं। उन्हें नेतागिरी यश, प्रशंसा और मान प्राप्त करने की ललक तो है, पर अपने को आदर्शवाद की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत करने का साहस नहीं हो रहा है। आज के अगणित तथाकथित लोकसेवी अवांछनीय लोकमान्यताओं के ही अनुगामी बने हुए हैं। धार्मिक क्षेत्र के अधिकांश नेता, संत-महंत जनता की रूढ़ियों, मूढ़ताओं और अंध-परम्पराओं का पोषण उनकी अवांछनीयताओं को समझते हुए भी करते रहते हैं। राजनैतिक नेता अपना चुनाव जीतने के लिए वोटरों की अनुचित माँगें पूरी करने के लिए भी सिर झुकाए रहते हैं।
     
🔵 इस स्थिति में पड़े हुए लोग जनमानस के परिष्कार जैसी लोकमंगल की मूलभूत आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। इस प्रयोजन की पूर्ति वे करेंगे, जिनमें लोकरंजन की अपेक्षा लोकमंगल के लिए आगे बढ़ने का, निंदा, अपयश और विरोध सहने का साहस हो। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने बंदूक की गोलियाँ खाई थीं। बौद्धिक पराधीनता के विरुद्ध छेड़े हुए अपने विचार क्रांति संग्राम में भाग लेने वाले सेनानियों को कम से कम गाली खाने के लिए तैयार रहना ही होगा, जो गाली खाने से डरेगा, वह अवांछनीयता के विरुद्ध आवाज कैसे उठा सकेगा?
   
🔴 अनुचित से लड़ कैसे सकेगा? इसलिए युग परिवर्तन के महान् अभियान का नेतृत्व कर सकने की आवश्यकता शर्त यह है कि इस क्षेत्र में कोई यश और मान पाने के लिए नहीं विरोध, निंदा और तिरस्कार पाने की हिम्मत लेकर आगे आए। नव निर्माण का सुधारात्मक अभियान गतिशील बनाने में मिलने वाले विरोध और तिरस्कार को सहने के लिए आगे कौन आए? इसके लिए प्रखर मनोबल और प्रचंड साहस की आवश्यकता होती है। इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मूर्धन्य स्तर के लोग भी साहस विहीन लुंज-पुंज दिखाई दे रहे हैं और शौर्य पराक्रम के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से डरकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

🔵 आज सच्चे अध्यात्म को कल्पना लोक से उतार कर व्यावहारिक जीवन में उतारे जाने की नितांत आवश्यकता है। इसके बिना हम आत्मिक प्रगति न कर सकेंगे। अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित न कर सकेंगे और यदि यह न किया जा सका, तो समाज के नव निर्माण का, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना समस्त साहस बटोर कर अपनी वासनाओं, तृष्णाओं, संकीर्णताओं और स्वार्थपरताओं से लड़ पड़ें। इन भव बंधनों को काट डालें और जीवन को ऐसा प्रकाशवान् बनाएँ, जिसकी आभा से वर्तमान युग का सारा अंधकार तिरोहित हो सके और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ आलोकित हो उठें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.102

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 Shrutayudh and Bhasmasur

🔴 Both the devils had got boons due to their austerities. It was their immoral intelligence, which made them to choose such things that ultimately became the cause of their deaths. Shrutayudh had got a Gada, which he had got by the boon from Lord Shiva on the condition that he would not misuse it. If he did then it would in turn destroy him. In the battle of Mahabharata, in a fit of anger he used it on Shri Krishna who was charioteer of Arjun. The Gada returned from midway and tore him apart. Bhasmasur had asked for a boon that the person would be destroyed if he places his hand on his head. When he started misusing this power, God created illusion and made him keep his hand on his own head, which resulted in his death.

🔵 It is the direction of choice that decides our destiny and future.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Sep 2017

🔵 प्रेमास्पद के प्राणों में अपने प्राण, अपनी इच्छा और आकाँक्षायें घुलाकर व्यक्ति उस “अहंता” से बाहर निकल आता है तो पाप और पतन की ओर प्रेरित कर ऐसे दिव्य मनुष्य को नष्ट करता रहता है। प्रेमी कभी यह नहीं चाहता मुझे कुछ मिले वरन् वह यह चाहता है कि अपने प्रेमी के प्रति अपनी निष्ठा कैसे प्रतिपादित हो इसलिये वह अपनी बातें भूलकर केवल प्रेमी की इच्छाओं में मिलकर रहता है, जब हम अपने आपको दूसरों के अधिकार में डाल देंगे तो पाप और वासना जैसी स्थिति आवेगी ही क्यों और तब मनुष्य अपने जीवन-लक्ष्य से पतित ही क्यों होगा? सच्चा प्रेम तो प्रेमी की उपेक्षा से भी रीझता है। प्रेम की तो व्याकुलता भी मानव अन्तःकरण को निर्मल शान्ति प्रदान करती है।

🔴 मन जो इधर-उधर के विषयों और तुच्छ कामनाओं में भटकता है, प्रेम उसके लिये बाँध देने को रस्सी की तरह है। प्रेम की सुधा पिये हुये मन कभी भटक नहीं सकता, वह तो अपना सब कुछ त्याग करने को तैयार रहता है। जो समर्पित कर सकता है, पाने का सच्चा सुख तो उसे ही मिलता है। प्रेमी को भोग तो क्या स्वर्ग भी आसक्त नहीं कर सकते और परमात्मा को पाने के लिये भी तो यह सन्तुलन आवश्यक है। प्रेम साधना द्वारा मनुष्य लौकिक जीवन का पूर्ण रसास्वादन करता हुआ पारमार्थिक लक्ष्य पूर्ण करता है। इसलिये प्रेम से बड़ी मनुष्य-जीवन में और कोई उपलब्धि नहीं।

🔵 स्वाति नक्षत्र के बादल चातक के मुख पर क्या चुपचाप जल बरसा जाते हैं? नहीं, वे गरज कर कठोर ध्वनि करते और डराते हैं। पत्थर ही नहीं कई बार तो रोष में भरकर बिजली भी गिराता है, वर्षा और आँधी के थपेड़े क्या कम कष्ट देते हैं किन्तु चातक के मन में अपने प्रियतम के प्रति क्या कभी नाराजी आती है? तुलसी दास ने बताया कि यह प्रेम की ही महिमा है कि चालक पयोद के इन दोषों में भी उसके गुण ही देखता है। अमंगल सी दिखने वाली भगवान की सृष्टि में कठिनाइयों के झंझावात कम हैं, न अभाव और कष्ट-पीड़ायें, एक-एक पग भार है और लक्ष्य प्राप्ति का बाधक है, पर यह केवल उनके लिये है जिन्होंने प्रेम तत्व को जाना नहीं। प्रेम तो समुद्र की तरह अगाध है, उसमें जितने गहरे पैठा जाये उतने ही बहुमूल्य उपहार मिलते और मानव-जीवन को धन्य बनाते चले जाते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 23 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Sep 2017


👉 भावना से सिद्धि :-

🔵 महाराज अंबरीष के संबंध में प्रजा में प्रख्यात था कि वे बड़े ही धर्म परायण व्यक्ति है। प्रतिदिन राजमहल के प्रांगण में ही बनवाये गये भगवान विष्णु के मंदिर में प्रातःकाल उषा बेला में पहुंचने, भगवान के विग्रह की पूजा अर्चना करने, संध्या, उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती।

🔴 इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभावग्रस्तों को प्रतिदिन एक स्वर्णमुद्रा बांटते थे, जिनकी भीड़ रोज प्रातः से ही लग जाया करती थी।

🔵 पूजा और दान के बाद आरंभ होता था स्वाध्याय। इसके उपरांत अंबरीष अपनी समस्याओं को उनके पास लेकर सुलझाने के लिए आये नागरिकों से भेंट करते, उनके कष्ट सुनते, और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे।

🔴 इन सभी कार्यों से निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिये ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुंच जाते थे। महाराज अंबरीष को यही समय मिलता था भोजन के लिए। कष्टसाध्य जीवन जीते हुए ईश्वर भक्ति और प्रजावत्सलता के पुण्य कार्यों में लगे रहने के कारण अंबरीष को एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति से अपनी कष्टसाध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गये थे।

🔵 महाराज अंबरीष की ख्याति से प्रभावित होकर अवंती राज्य के नरेश उदयभानु ने अपनी कन्या उदयानी के विवाह का प्रस्ताव किया। अंबरीष ने स्पष्ट कह दिया कि वह कठोर दिनचर्या का अभ्यस्त है और उसके साथ विवाह कर उदयानी को कष्ट तथा असुविधायें ही मिलेंगी।

🔴 परंतु उदयभानु ने कहा कि- ‘उदयानी स्वयं भक्ति, सेवा तथा तप तितिक्षा में विशेष रुचि रखती थी। यह प्रस्ताव भी उसी का है।’

🔵 अंबरीष ने प्रसन्न होकर विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात् प्रथम रात्रि को उषाकाल में, अंबरीष के उठने से पहले ही उदयानी जाग गयी और उसने विष्णु मंदिर में जाकर पूजा-अर्चा कर ली। अंबरीष जब जागकर मंदिर में गये तो यह देखकर बड़े खिन्न हुए कि उनसे पहले ही उदयानी पूजा-पाठ से निवृत्त हो चुकी है और वह भी उन्हीं के मंदिर में। प्रथम पूजा का श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए यह सोचकर अंबरीष ने उदयानी को निर्देश दे दिया कि वह बाद में ही पूजा के लिए जाया करे। उदयानी ने सहर्ष इस निर्देश को अंगीकार कर लिया।

🔴 कुछ समय बाद अंबरीष अनुभव करने लगे कि उदयानी उनकी अपेक्षा साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमंडल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य-शांति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उदयानी भाव समाधि की स्थिति में जा पहुंची हैं।

🔵 मैं इतने समय से पूजा, भक्ति और सेवा साधना में लगा हुआ हूं। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। उदयानी किस प्रकार इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार अंबरीष को और भी खिन्न और उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि भी कम होने लगी।

🔴 इन्हीं दिनों अंबरीष के गुरु, उस समय के प्रख्यात सिद्धयोगी राज-प्रासाद में आये। दिव्य दृष्टि से योगी ने महाराज अंबरीष के मनोद्वेगों को ताड़ लिया और पूछा ‘राजन्! आजकल आप निराश और खिन्न से क्यों दिखाई देते हैं?’

🔵 अंबरीष ने अपनी मनोव्यथा खोल दी तो योगी ने समाधान किया- ‘‘राजन्! सिद्धि पूजा या दीर्घ अवधि का नहीं भावना का परिणाम है। तुम जो पूजा साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है, जबकि राजमहिषी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया उसके पास अहं कहां बचा? और जहां अहं मिट जाता है वहां ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।’’

🔴 इन वचनों ने अंबरीष की साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।

🌹 ...........अखण्ड ज्योति फरवरी 1979

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 71)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  

🔴 जानकारियाँ देने और ग्रहण करने भर की आवश्यकता वाणी और लेखनी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है। तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करके विचार बदले जा सकते हैं, पर अंतराल में जमी हुई आस्थाओं तथा चिर अभ्यस्त गतिविधियों को बदलने के लिए समझाने-बुझाने से भी बड़ा आधार प्रस्तुत करना पड़ेगा और यह है-अपना आदर्श एवं उदाहरण प्रस्तुत करना।’’ अनुकरण की प्रेरणा इसी से उत्पन्न होती है। दूसरों को इस सीमा तक प्रभावित करना कि वे भी अवांछनीयता को छोड़ने का साहस दिखा सकें, तभी संभव है, जब वैसे ही साहसी लोगों के अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किए जा सकें। आज आदर्शवादिता की बढ़-चढ़कर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर सकें, ऐसे निष्ठावान् देखने को नहीं मिलते। यही कारण है कि उपदेशों पर किया श्रम व्यर्थ सिद्ध होता चला जा रहा है और सुधार की अभीष्ट आवश्यकता पूरी हो सकने का सुयोग नहीं बन पा रहा है।
    
🔵 जन-मानस के परिवर्तन की महती आवश्यकता को यदि सचमुच पूरा किया जाना है, तो उसका रास्ता एक ही है कि आदर्शों को जीवन में उतार सकने वाले साहसी लोगों का एक ऐसा दल प्रकट हो, जो अपने आचरणों द्वारा यह सिद्ध करे कि आदर्शवादिता केवल एक-दूसरे को उपदेश करने भर की विडंबना नहीं है वरन् उसे कार्य रूप में परिणत भी किया जा सकता है। इस प्रतिपादन का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए हमें अपने को ही आगे करना होगा। दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर गोली नहीं चलाई जा सकती। आदर्श कोई और प्रस्तुत करे और नेतृत्व हम करें, अब यह बात नहीं चलेगी। हमें अपनी आस्था की प्रामाणिकता अपने आचरण द्वारा सिद्ध करनी होगी। आचरण ही सदा से प्रामाणिक रहा है, उसी से लोगों को अनुकरण की प्रेरणा मिलती है।
   
🔴 आज जन मानस में यह भय और गहराई तक घुस गया है कि आदर्शवादी जीवन में कष्ट और कठिनाइयाँ भरी पड़ी हैं। उत्कृष्ट विचारणा केवल कहने-सुनने भर का मनोरभ करने के लिए है। उसे व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। प्राचीनकाल के महापुरुषों के उदाहरण प्रस्तुत करना काफी नहीं, उत्साह तो प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न होता है। जो सामने है, उसी से अनुकरण की प्रेरणा उपज सकती है। जो इस अभाव एवं आवश्यकता की पूर्ति किसी न किसी को तो पूरी करनी हो होगी। इसके बिना विकृतियों और विपत्तियों के वर्तमान संकट से छुटकारा पाया न जा सकेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 Sep 2017

🔵 साँसारिक भोगों की दृष्टि से बाह्य स्वच्छता पर प्रायः अधिकाँश ध्यान देते हैं, किंतु आध्यात्मिक शृंगार के बिना उस स्वच्छता का कोई आनन्द नहीं मिल पाता। मनुष्य का मन बड़ा चंचल होता है। इन्द्रियों के वशीभूत होकर मनुष्य राग-द्वेषादि कुप्रवृत्तियों में फँसकर अनिष्ट करता रहता है। मन की पवित्रता के लिये ईश्वर आराधन, सत्पुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य के स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता होती है। पवित्र मन में अनेक गुणों का विकास स्वतः होने लगता है।

🔴 लौकिक वस्तुओं को लेकर अभिमान, मोह, ममता, लोभ, क्रोध आदि द्वेष दुर्विकारों का त्याग ही अन्तर्जीवन की शुद्धि है। इसी प्रकार अपने अन्तःकरण में श्रद्धा, भक्ति, विवेक, सन्तोष, क्षमा, उदारता, विनम्रता, सहिष्णुता, एवं अविचल प्रसन्नता का धारण करना ही सुन्दर शृंगार है। केवल बाह्य शरीर के शृंगार पर ध्यान देना, मनुष्य के स्थूल दृष्टिकोण का परिचारक है। आत्म ज्ञान के साधकों तथा श्रेय के उपासकों के लिये आन्तरिक शृंगार की महत्ता अधिक है।

🔵 शृंगार और शुद्धि आत्मा के विकास के विषय हैं इसमें सन्देह नहीं है किन्तु अपना दृष्टिकोण एकाँगी न होना चाहिये। हमें सौंदर्य के सच्चे स्वरूप को समझने का प्रयत्न करना चाहिये। मनुष्य की बाह्य पवित्रता से आन्तरिक शुद्धता का महत्व कम नहीं है वरन् यह दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। मनुष्य का जीवन इन दोनों में उभयनिष्ठ होना चाहिये। तभी शृंगार की पूर्णता का आनन्द प्राप्त होता है। यह आनन्द मनुष्य को मिल सकता है पर इसके लिये अपनी आत्मा को सद्गुणों एवं सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रखने की जरूरत होती है। शुद्ध शरीर, स्वच्छ मन और सद्चित्त वृत्तियों के द्वारा ही यह संयोग प्राप्त किया जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 22 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Sep 2017


गुरुवार, 21 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 70)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  

🔴 व्यक्ति और समाज की समग्र प्रगति के लिए चिंतन की स्वस्थ दिशा एवं उत्कृष्टता दृष्टिकोण का होना अनिवार्य एवं आवश्यक है। इसकी पूर्ति चाहे आज की जाए चाहे से हजार वर्ष बाद। प्रगति का प्रभाव उसी दिन उदय होगा, जिस दिन यह भली-भाँति अनुभव कर लिया जाएगा कि दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए दुर्बुद्धि का परित्याग आवश्यक है। आज की स्थिति में सबसे बड़ा शौर्य, साहस, पराक्रम और पुरुषार्थ यह है कि हम पूरा मनोबल इकट्ठा करके अपनी और अपने सवे संबंधित व्यक्तियों की विचार शैली में ऐसा प्रखर परिवर्तन प्रस्तुत करें, जिसमें विवेक की प्रतिष्ठापना हो और अविवेकपूर्ण दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों को पैरों तले कुचल कर रख दिया जाए।
   
🔵 मूढ़ता और दुष्टता के प्रति व्यामोह ने हमें असहाय और कायर बना दिया है। जिसे अनुचित अवांछनीय समझते हैं, उसे बदलने सुधारने का साहस कर नहीं पाते। न तो सत्य को अपनाने का साहस है और न असत्य को त्यागने का। कुड़-कुड़ाते भर जरूर हैं कि हम अनुपयुक्त विचारणा एवं परिस्थितियों से ग्रस्त हैं, पर जब सुधार और बदलाव का प्रश्न आता है, तो पैर थर-थर कर काँपने लगते हैं और जी काँपने लगता है। कायरता नस-नस में रम कर बैठ गई है। अपनी अवांछनीय मान्यताओं से जो नहीं लड़ सकता, वह आक्रमणकारियों से क्या लड़ेगा? जो अपनी विचारणा को नहीं सुधार सकता, वह परिस्थितियों को क्या सुधारेगा?
  
🔴 युग परिवर्तन का शुभारंभ अपनी मनोभूमि के परिवर्तन के साथ आरंभ करना होगा। हम लोग नव निर्माण के संदेशवाहक एवं अग्रदूत हैं। परिवर्तन की प्रक्रिया हमें अपनी चिंतन दिशा अविवेक से विलग कर विवेक के आधार पर विनिर्मित करनी चाहिए। जो असत्य है, अवांछनीय है, अनुपयोगी है, उसे छोड़कर हम साहस दिखाएँ। अब बहादुरी का मुकुट उनके सिर बाँधा जाएगा, जो अपनी दुर्बलताओं से लड़ सकें और अवांछनीयता को स्वीकार करने से इंकार कर सकें। नव निर्माण के अग्रदूतों की साहसिकता इसी स्तर की होनी चाहिए। उनका प्रथम चरण अपनी अवांछनीय मान्यताओं को बदल डालने और अपने क्रिया-कलाप में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए एक बार पूरा मनोबल इकट्ठा कर लेना चाहिए और बिना दूसरों की निंदा-स्तुति की, विरोध-समर्थन की चिंता किए निर्दिष्ट पथ पर एकाकी चल देना चाहिए। ऐसे बड़े कदम जो उठा सकते हों, उन्हीं से यह आशा की जाएगी कि युग परिवर्तन के महान् अभियान में वास्तविकता योगदान दे सकेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.99

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 ज्ञान प्रधान धर्मशास्त्र (अंतिम भाग)

🔴 जो यह कहते हैं कि विवेकबुद्धि की तराजू पर तोलना मूर्खता है, वे निश्चय अदूरदर्शी है। मान लीजिए, एक ईसाई किसी मुसलमान से इस प्रकार झगड़ रहा है :—”मेरा धर्म प्रत्यक्ष ईश्वर ने ईसा से कहा है।” मुसलमान कहता है :—”मेरा भी धर्म ईश्वर-प्रणीत है।” इस पर ईसाई जोर देकर बोला—”तेरी धर्म पुस्तक में बहुत सी झूठी बात लिखी हैं, तेरा धर्म कहता है कि हर एक मनुष्य को सीधे से नहीं तो जबरदस्ती मुसलमान बनाओ। यदि ऐसा करने में किसी की हत्या भी करनी पड़े तो पाप नहीं है। मुहम्मद के धर्म प्रचारक को स्वर्ग मिलेगा।” मुसलमान ने कहा :—”मेरा धर्म जो लिखा है सो सब ठीक है।” ईसाई ने उत्तर दिया :—”ऐसी बातें मेरी धर्म पुस्तक में नहीं लिखी हैं, इससे वे झूठी नहीं हैं।”

🔵 मुसलमान झल्लाकर बोला:— ”तेरी पुस्तक से मुझे क्या प्रयोजन है? काफिरों को मार डालने की आज्ञा को झूँठ करने का तुझे क्या अधिकार है? तेरा कथन है कि ईसा का लिखा सब सच है मैं कहता हूँ मुहम्मद जो कुछ कह गये हैं, वही ठीक है।” इस प्रकार के प्रश्नोत्तरों से दोनों को लाभ नहीं पहुँचता। एक दूसरे की धर्मपुस्तक को बुरी दृष्टि से देखते हैं इससे वे निर्णय नहीं कर सकते कि किस पुस्तक के नीतितत्व श्रेष्ठ हैं। यदि विवेचक बुद्धि को दोनों काम में लावें तो सत्य वस्तु का निर्णय करना कठिन न होगा। किसी धर्म पुस्तक पर विश्वास न होने पर भी उसमें लिखी हुई किसी खास बात को यदि विवेचक बुद्धि स्वीकार कर ले तो तुरन्त समाधान हो जाता है।

🔴 हम जिसे विश्वास कहते हैं वह भी विवेचक बुद्धि से ही उत्पन्न हुआ है। परन्तु यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि दो महात्माओं के कहे हुए जुदे-जुदे या परस्पर विरुद्ध विधानों की परीक्षा करने के शक्ति हमारी विवेचक बुद्धि में है या नहीं? यदि धर्मशास्त्र इन्द्रियातीत है और उसकी मीमाँसा करना हमारी शक्ति के बाहर का काम हो तो समझ लेना चाहिये कि पागलों की व्यर्थ बकबक या झूठी किस्सा कहानियों की पुस्तकों से धर्मशास्त्र का अधिक महत्व नहीं है। धर्म ही मानवी अन्तःकरण के विकास का फल है। अन्तःकरण के विकास के साथ-साथ धर्म मार्ग चल निकले हैं। धर्म का अस्तित्व पुस्तकों पर नहीं किन्तु मानवी अन्तःकरण पर अवलम्बित है। पुस्तकें तो मनुष्यों की मनोवृत्ति के दृश्यरूप मात्र हैं। पुस्तकों से मनुष्यों के अन्तःकरण नहीं बने हैं किन्तु मनुष्यों के अन्तःकरणों से पुस्तकों का आविर्भाव हुआ है। मानवी अन्तःकरण का विकास ‘कारण’ और ग्रन्थ रचना उसका ‘कार्य’ है, ‘कारण’ नहीं। विवेचक बुद्धि की कसौटी पर रख कर यदि हम किसी कार्य को करेंगे तो उसमें धोखा नहीं उठाना पड़ेगा। धर्म को भी उस कसौटी पर परख लें तो उसमें हमारी हानि ही क्या है?

🌹 समाप्त
🌹 स्वामी विवेकानन्द जी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/September/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 21 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Sep 2017


मंगलवार, 19 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 69)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  

🔴 युग निर्माण की योजना का श्री गणेश हमें अपने आप से आरंभ करना चाहिए। वर्तमान नारकीय परिस्थितियों को भावी सुख-शान्तिमयी स्वर्गीय वातावरण में बदलने के लिए चिंतन ही एकमात्र वह केन्द्र बिन्दु है, जिसके आधार पर व्यक्ति की दिशा, प्रतिभा, क्रिया, स्थिति एवं प्रगति पूर्णतया निर्भर है। चिंतन की उत्कृष्टता, निकृष्टता के आधार पर व्यक्ति, देव और असुर बनता है। स्वर्ग और नरक का सृजन पूर्णतया मनुष्य के अपने हाथ में है। अपने भाग्य और भविष्य का निर्माण हर कोई स्वयं ही करता है। उत्थान एवं पतन की कुँजी चिंतन की दिशा को ही माना गया है।
   
🔵 हमें अपनी परिस्थितियाँ यदि उत्कृष्ट स्तर की अभीष्ट हों तो इसके लिए एक अनिवार्य शर्त यह है कि अपने चिंतन की धारा निकृष्टता की दिशा में प्रवाहित होने से रोककर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ दें। यह मोड़ ही हमारे स्तर, स्वरूप और परिस्थितियों को बदलने में समर्थ हो सकता है। चिंतन निकृष्ट स्तर का हो और हम महानता वरण कर सकें, यह संभव नहीं। संकीर्ण और स्वार्थी लोग अनीति से कुछ पैसे भले ही इकट्ठे कर लें, पर उन विभूतियों से सर्वथा वंचित ही बने रहेंगे, जो व्यक्तित्व को प्रखर और परिस्थितियों को सुख-शांति से भरी संतोषजनक बना सकती है।
 
🔴 समाज व्यक्तियों के समूह का नाम है। व्यक्ति जैसे होंगे समाज वैसा ही बन जाएगा। लोग जैसे होंगे वैसा ही समाज एवं राष्ट्र बनेगा। दीन दुर्बल स्तर की जनता कभी समर्थ और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती। धर्म, शासन, व्यवसाय, उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, कला आदि सभी क्षेत्रों का नेतृत्व जनता के ही आदमी करते हैं। जन-मानस का उत्तर गिरा हुआ हो तो ऊँचे, अच्छे, समर्थ और सजीव व्यक्तित्व नेतृत्व के लिए कहाँ से आएँगे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.98

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 सर्वपितृ अमावस्या

🔵 पितृ-पक्ष का हिन्दू-धर्म और हिन्दू-संस्कृति में बड़ा महत्व है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी हिन्दू माना नहीं जा सकता। हिन्दू-शास्त्रों के अनुसार मृत्यु होने पर मनुष्य का जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाता है और ऊंचा उठकर पितृ-लोक में पहुंचता है। इन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करने के लिए पिण्डदान और श्राद्ध का विधान किया गया है। श्राद्ध पितरों के नाम पर ब्राह्मण-भोजन भी कराया जाता है। इसके पुण्य-फल से भी पितरों का संतुष्ट होना माना गया है। धर्म-शास्त्रों में यह भी कहा है कि जो मनुष्य श्राद्ध करता है वह पितरों के आशीर्वाद से आयु, पुत्र, यश, बल, वैभव, सुख और धन-धान्य को प्राप्त होता है। इसीलिये धर्म-प्राण हिन्दू आश्विन मास के कृष्ण पक्ष भर प्रतिदिन नियम पूर्वक स्नान करके पितरों का तर्पण करते हैं। जो दिन उनके पिता की मृत्यु का होता है, उस दिन अपनी शक्ति के अनुसार दान करके ब्राह्मण-भोजन कराते हैं।

🔴 एक समय इस देश में श्राद्ध-कर्म का इतना प्रचार था कि उसके ध्यान में लोग अपने तन-बदल की सुधि भूल जाते थे। उन्हें बाल बनवाने, तेल लगाने, पान खाने आदि का भी अवकाश न मिलता था। उसी बात के चिह्न स्वरूप आज प्रायः सभी हिन्दू, चाहे वे श्राद्ध करने वाले न भी हों, इन कार्यों से पृथक रहना धर्मानुकूल मानते हैं। वैसे जिन लोगों के पिता स्वर्गवासी हो गये हैं, वे अमावस्या तक और जिनकी माता स्वर्गवासी हो गई हैं, वे मातृ-नवमी तक न तो बाल बनवाते हैं और न तेल लगाते हैं।

🔵 पितरों का पिण्डदान करने का सबसे बड़ा स्थान गया माना जाता है और जनता में ऐसी मान्यता है कि गया में पितरों को पिण्डदान कर देने पर फिर प्रति वर्ष पिण्ड देने की आवश्यकता नहीं रहती। यह भी कहते हैं कि महाराज रामचन्द्रजी ने गया आकर फल्गू किनारे अपने मृत पिता महाराज दशरथ का पिण्डदान किया था। कुछ भी हो इस प्रथा से इतना प्रत्यक्ष जान पड़ता है कि हिन्दुओं की सभ्यता प्राचीन काल में काफी ऊंचे दर्जे तक पहुंच चुकी थी और जीवित माता-पिता की सेवा करना ही अपना परम धर्म नहीं मानते थे, वरन् उनके मरने पर भी उनकी स्मृति-रक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे और इसके लिए 15 दिन का समय अलग दिया था। हिन्दुओं की इस प्रथा की प्रशंसा अन्य लोगों ने भी की। हिन्दुस्तान के मुगल सम्राट शाहजहां ने, जब उसे उसके लड़के औरंगजेब को लिखा था कि ‘‘तुम से तो हिन्दू लोग ही बहुत अच्छे हैं जो मरने के बाद भी अपने पिता को जल और भोजन देते हैं तू तो अपने जीवित पिता को भी दाना-पानी के बिना तरसा रहा है।’’

🔴 इस विषय पर विशेष विचार करने से यही प्रतीत होता है कि पितृ-पक्ष का महत्व इस बात में नहीं है कि हम श्राद्ध-कर्म को कितनी धूम-धाम से मनाते हैं और कितने अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वरन् उसका वास्तविक महत्व यह है कि हम अपने पितामह आदि गुरुजनों की जीवितावस्था में ही कितनी सेवा-सुश्रूषा, आज्ञापालन करते हैं। चाहे अन्य लोग इसका कुछ भी अर्थ क्यों न लगावें, पर हम तो यही कहेंगे कि जो व्यक्ति अपने जीवित पिता-माता आदि की सेवा नहीं करते, उल्टा उनको दुख पहुंचाते हैं, या उनका अपमान करते हैं, बाद में उनका पिण्डदान और श्राद्ध करना कोरा ढोंग है और उसका कोई परिणाम नहीं। क्योंकि अगर हमारे श्राद्ध का फल पितरों तक सूक्ष्म रूप से पहुंचता भी है तो वह तभी संभव है जब हम सच्ची भावना और एकाग्र चित्त से उस कार्य को करें। पर जो लोग जन्म भर अपने पिता-माता को हर तरह से कष्ट पहुंचाते रहे, उनको भला-बुरा कहते रहे, वे फिर किस प्रकार श्रद्धा और हार्दिक भावना से श्राद्ध आदि कर्म कर सकते हैं?

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/pitaron_ko_shraddha_den_ve_shakti_denge/v1.91

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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