गुरुवार, 7 सितंबर 2017

👉 23 साल की उम्र में जान देकर बचाई थीं 360 जिंदगियां, ऐसी थी 'ब्रेव डॉटर ऑफ इंडिया'

🔵 ये है, नीरजा भनोट। 5 सितंबर को इन्हें आतंकियों ने गोलियों से छलनी कर दिया था। इस बहादुर बेटी ने भारत ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'अशोक चक्र' से नवाजा तो पाक ने तमगा-ए-इन्सानियत से। भारत सरकार ने नीरजा के नाम पर डाक टिकट भी जारी किया था। मोगा के गांव घलकलां के देशभगत पार्क में उसका एकमात्र स्टेच्यू स्थापित किया गया है। वहीं पर 16 फुट लंबा जहाज बनाया गया है।

🔴 चंडीगढ़ में आज के दिन 7 सितंबर 1964 को जन्मी नीरजा भनोट को उसके जन्मदिन से दो दिन पहले 5 सितंबर 1986 के दिन आतंकियों ने गोली मार दी थी, लेकिन दम तोड़ने से पहले इस बेटी ने 360 लोगों की जानें बचाई थी। 17 घंटे तक वह आतंकियों से जूझती रही। 5 सितंबर 1986 को पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर Pan Am 73 एयरलाइंस का प्लेन  हथियार बंद 4 आतंकवादियों हाईजैक कर लिया था।

🔵 आतंकवादी प्लेन को 9/11 की तरह इजराइल में किसी निर्धारित जगह पर क्रैश कराना चाहते थे। लेकिन प्लेन में मौजूद फ्लाइट अटेंडेंट नीरजा भनोट ने ऐसा नहीं होने दिया। उसने हिम्मत दिखाते हुए लोगों को बचा लिया, पर अपनी जान गंवा दी। नीरजा का बचपन मुम्बई में बीता। स्कूली शिक्षा बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल से हुई और सेंट जेवियर्स कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली।

🔴 नीरजा को बचपन से ही प्लेन में बैठने और आकाश में उड़ने की इच्छा थी। नीरजा भनोट की शादी 1985 में हो गई थी, लेकिन दहेज के दबाव के कारण उनके रिश्तों में खटास आ गई। वे शादी के दो महीने बाद ही मुम्बई लौट आई थीं। 1986 में मॉडल के रूप में उन्होंने कई TV और प्रिंट ऐड करना शुरू कर दिए थे। शौक को पूरा करने के मकसद से नीरजा ने बाद में एयरलाइंस ज्वाइन कर ली।

🔵 नीरजा ने इसकी विशेष ट्रेनिंग ली कि हाईजैक के दौरान क्या करना चाहिए? तब मां ने जो कहा, उसे भी नहीं माना था नीरजा ने, ब‌ल्कि जवाब दिया था। नीरजा के इरादे स्पष्ट थे। 5 सितंबर को अमेरिकी एयरवेज का विमान पैन एम73, करीब  380 यात्री लेकर पाकिस्तान के करांची हवाई अड्डे पर पायलट का इंतजार कर रहा था। अचानक उसमें चार हथियारबंद आतंकवादी घुस गए और सभी यात्रियों को गन प्वांइट पर ले लिया।

🔴 आतंकियों ने पाक सरकार से पायलट भेजने की मांग की, ताकि वो विमान को अपने मन मुताबिक जगह पर ले जा सकें, पाक सरकार ने मना कर दिया। इससे भन्नाए आतंकियों ने विमान में बैठे अमेरिकी यात्रियों को मारने का फैसला कर लिया। वो अमेरिका के जरिए पाक सरकार पर दबाव बनाने की ताक में थे। लेकिन उन्हें नहीं पता था इसी विमान की 23 साल की अकेली पतली-दुबली फ्लाइट अटेंडेंट उन पर भारी पड़ जाएगी।

🔵 आतंकियों ने गलती से उसी भारतीय लड़की को बुला लिया और विमान में बैठे सभी यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने को कहा। ताकि वो अमेरिकी नागरिकों को चुन-चुन कर मार सकें। लेकिन भारतीय वीरांगना ने दिन में आतंकियों की आंखों में धूल झोंक दिया। विमान में अमेरिकी यात्री बैठे हुए थे, पर एक भी आतंकियों के हवाले नहीं हुए। लड़की ने सबके पासपोर्ट छुपा लिए। यह जानकर आतंकी तिलमिला उठे।

🔴 तब आतंकी एक अंग्रेज को खींचकर विमान के गेट पर ले आए और गोली मारने की तैयारी करने लगे। लेकिन यहां भी लड़की ने अपने कार्यकुशलता का परिचय दिया और आतंकियों का ऐसा ‌दिमाग घूमाया कि उन्होंने उस ब्रिटिश को छोड़ दिया। आतंकी और पाक सरकार में लगातार खींचातानी चलती रही। इधर 380 डरे हुए लोगों में एक अकेली भारतीय लड़की डटी रही। लड़की ने 16 घंटे हिम्मत बांधे रखी।

अचानक उसे खयाल आया कि अब विमान का ईंधन खत्म होने वाला है। ऐसा हुआ तो विमान में अंधेरा छा जाएगा और ‌भागदौड़ मच जाएगी। जिसमें बेतहाशा खून बहेगा। लड़की ने फिर अपने भारतीय होने की पहचान दी। उसने तत्काल आतंकियों को खाने का पैकेट दिया और यात्रियों को आपातकालीन खिड़कियों के बारे में तेजी समझाया। तभी विमान का ईंधन खत्म हो गया। चारों तरफ अंधेरा छा गया।

🔴 इस बीच नीरजा ने मौका पाकर विमान के दरवाजे खोल दिए और यात्रियों ने प्लेन से नीचे कूदाना शुरू कर दिया। लेकिन इसी बीच दहशतगर्दों ने गोलियां दागना शुरू कर दी। मौका देखकर पाक कमांडो भी विमान के पास पहुंच गए। फिर दोनों तरफ से धुआंधार गोलीबारी के बीच लोग भागने लगे थे और नीरजा आतंकियों को छकाने में लगी थी। नीरजा ने आतंकियों को उलझाए रखा ताकि वो किसी को नुकसान न पहुंचा सकें और वो इसमें कामयाब भी रही।

सबके निकल जाने के बाद आखिर में जब वो विमान से निकलने लगी, तो अचानक उसे कुछ बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी। नीरजा ने रोते हुए बच्चों को छोड़कर भागना ठीक नहीं समझा। वो वापिस गई और बच्चों को ढूंढ निकाला। जैसे ही वह उन्हें लेकर एक आपातकालीन खिड़की ओर बढ़ी एक आतंकी उसके सामने आ खड़ा हुआ। नीरजा ने बच्चों को नीचे धकेल दिया और आतंकी ने नीरजा को गोलियों से छलनी कर दिया।

🔴 17 घंटे तक चले इस खून खराबे में अंततः 20 लोगों की जान चली गई और वो भारतीय वीरांगना भी शहीद हो गई। पाक की धरती पर ही दुनिया भर के 360 लोगों की जान बचाने वाली बहादुर बेटी नीरजा ​को पाकिस्तान भी सेल्यूट करता है। घटना के दो दिन बाद वो अपना 23वां जन्मदिन मनाने वाली थी। लेकिन सपने अधूरे रह गए। 2004 में इस बात का पता चला कि 5 सितंबर, 1986 में हुई उस भयावह घटना के पीछे लीबिया के चरमपंथियों का हाथ था।

बहादुर बेटी नीरजा भनोट के बलिदान को सलाम करते हुए बॉलीवुड में एक मूवी 'नीरजा' बनाई गई। इसमें नीरजा भनोट का किरदार सोनम कपूर ने निभाया। इंडस्ट्री के कई बड़े नामों समेत 200 कलाकारों ने फिल्म बनाने में सहयोग किया। मूवी को हाल ही में आईफा 2017 में बेस्ट मूवी का अवार्ड दिया गया। साथ ही मूवी को नेशनल अवार्ड से भी नवाजा गया था। नीरजा भनोट के नाम पर हर साल एक अवार्ड भी दिया जाता है।

👉 एक गणित का सूत्र

🔴 राजा ने एक सुंदर सा महल बनाया। और महल के मुख्य द्वार पर एक गणित का सूत्र  लिखवाया और घोषणा की इस सूत्र से यह द्वार खुल जाएगा और जो भी सूत्र को हल कर के द्वार खोलेगा में उसे अपना उत्तराधीकारी घोषित कर दूंगा.....

🔵 राज्य के बड़े बड़े गणितज्ञ आये और सूत्र देखकर लोट गए किसी को कुछ समझ नहीं आया.... आख़री तारीख आ चुकी।

🔴 उस दिन 3 लोग आये और कहने लगे हम इस सूत्र को हल कर देंगे उसमे 2 तो दूसरे राज्य के बड़े गणितज्ञ अपने साथ बहुत से पुराने गणित के सूत्रो की किताबो सहित आये लेकिन एक व्यक्ति जो साधक की तरह नजर आ रहा था सीधा साधा कुछ भी साथ नहीं लाया उसने कहा में बेठा हु यही पास में ध्यान कर रहा हु अगर पहले ये दोनों महाशय कोशिश कर के द्वार खोल दे तो मुझे कोई परेशानी नहीं।

🔵 पहले इन्हें मोका दिया जाए दोनों गहराई से सूत्र हल करने में लग गए लेकिन नहीं कर पाये और हार मान ली।

🔴 अंत में उस साधक को ध्यान से जगाया गया और कहा की आप सूत्र हल करिये आप का समय शुरू हो चुका हे साधक ने आँख खोली और सहज मुस्कान के साथ द्वार की और चला द्वार को धकेला और यह क्या द्वार खुल गया।

🔵 राजा ने साधक से पूछा आप ने  ऐसा  क्या किया साधक ने कहा जब में ध्यान में बेठा तो सबसे पहले अंतर्मन से आवाज आई की पहले चेक कर ले की सूत्र हे भी या नहीं
इसके बाद इसे हल करने की सोचना और मेने वही किया।

🔴 ऐसे ही कई बार जिंदगी में समस्या होती ही नहीं और हम विचारो में उसे इतनी बड़ी बना लेते हे की वह समस्या कभी हल न होने वाली है।

🔵 लेकिन हर समस्या का उचित इलाज आत्मा की आवाज है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन 7 Sep 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Sep 2017

🔵 आत्म-निर्माण के कार्य में सत्संग निःसन्देह सहायक होता है किन्तु आज की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में जो विडंबना फैली है, उससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक है। सड़े-गले, औंधे-सीधे, रूढ़िवादी, भाग्यवादी, पलायनवादी विचार इन सत्संगों में मिलते हैं। फालतू लोग अपना समुदाय बढ़ाने के लिए सस्ते नुस्खे बताते रहते हैं या किसी देवी देवता के कौतूहल भरे चरित्र सुनाकर उनके सुनने मात्र से स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलने की आशा बँधाते रहते हैं। ऐसा विडम्बनापूर्ण सत्संग किसी का क्या हित साधेगा?

🔴 आज सत्संग की आवश्यकता स्वाध्याय से ही पूरी करनी पड़ती है। जहाँ जीवन को प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन कर सकने की दृष्टि से उपयुक्त सत्संग मिल सके, वहाँ जाने और लाभ उठाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। पर जहाँ व्यर्थ की विडम्बनाओं में समय बर्बाद किया जाता हो, वहाँ जाने में कुछ लाभ नहीं। आज की स्थिति में सरल सत्संग स्वाध्याय ही हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने वाला, चरित्र को उज्ज्वल करने वाला, गुणकर्म, स्वभाव में प्रौढ़ता उत्पन्न करने वाला साहित्य उपलब्ध करके नियमित रूप से उसे पढ़ते रहने से भी घर बैठे सत्पुरुषों के साथ सत्संग का लाभ लेने की सुविधा मिल सकती है।

🔵  स्वाध्याय केवल पुस्तकें पढ़ने को ही नहीं कहते। उसका वास्तविक उद्देश्य आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरणा प्राप्त करना है। प्रत्येक मनुष्य को हर घड़ी अपने स्वयं के चरित्र का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि उसका चरित्र पशु तुल्य है या सत्पुरुषों जैसा। आत्म-निरीक्षण की प्रणाली का नाम ही स्वाध्याय है। पूर्ण मानव बनने के सद् उद्देश्य से जिनने भी स्वाध्याय का अनुसरण किया है उनकी आत्मा अवश्यमेव परिष्कृत हुई है, उनकी महानता जागृत हुये बिना नहीं रही।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 6 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 62)

🌹  राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔴 अगली शताब्दी की संभावनाएँ अद्भुत, अनुपम और अभूतपूर्व हैं। वैज्ञानिक, बौद्धिक और औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ ही उदार चेतना का अवमूल्यन भी इन्हीं दिनों हुआ है। जिसके कारण प्रगति के नाम पर जो कुछ हस्तगत हुआ है, उसका दुरुपयोग होने का परिणाम उलटे रूप में ही सामने आए हैं। सुविधा साधन अवश्य ही बढ़े हैं, पर उलझे मानस ने न केवल व्यक्तित्व का स्तर गिराया है, वरन् साधनों को इस बुरी तरह प्रयुक्त किया है कि पिछले पूर्वजों की सामान्य स्थिति की तुलना में हम कहीं अधिक समस्याओं में फँस जाने जैसी स्थिति अवश्य है, पर ऐसा नहीं हो सकता कि देवत्व से एक सीढ़ी नीचे ही समझा जाने वाला मनुष्य असहाय बनकर अपना सर्वनाश ही देखता रहे, समय रहते न चेतें।

🔵 मानस बदलने से प्रचलन गड़बड़ाते हैं और व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। बिखराव और विषमता दो बड़े संकट हैं, जो असंख्यों प्रकार के संकटों को जन्म देते हैं। इन्हें निरस्त करने के लिए एकता और समता की सर्वतोमुखी प्रतिष्ठा करनी पड़ती है। इतना बन पड़ने पर वे सभी अवरोध अनायास ही समाप्त हो जाते हैं, जो तिल से ताड़ बनकर, राई का पर्वत बन कर महाविनाश को चुनौती देते हुए गर्ज-तर्जन कर रहे थे। नवयुग में एकता और समता के दोनों सिद्धांत हर व्यक्ति को इच्छा या अनिच्छा और अंगीकार करने पड़ेंगे, ऐसा मनीषियों, भविष्यद्रष्टाओं का अभिमत है। शासन और समाज को भी अपनी मान्यताएँ व्यवस्थाएँ इसी प्रकार की बनानी पड़ेंगी।

🔴 प्रवाह और प्रचलन के अनुरूप अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। अडंगेबाजी तो भली-बुरी व्यवस्था में अपनी उद्दंडता का परिचय देने के लिए कहीं न कहीं से आ टपकती है। जलते दीपक की लौ बुझाने के लिए पतंगों के दल उस पर टूट पड़ने से बाज़ नहीं आते, भले ही इस दुरभिसंधि में उन्हें अपने पंख जलाने और प्राण गँवाने पड़ें। तूफान का मार्ग रोकने वाले वृक्षों को उखड़ते और झोंपड़ों को आसमान में उड़ते हुए आए दिन देखा जाता है। महाकाल के निर्धारण एवं अनुशासन के सामने कोई उद्दंडता अवरोध बन कर अड़ेगी और व्यवधान बनकर कारगर रोकथाम करेगी, इसी आशंका न की जाए तो ही ठीक है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.86

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.16

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 61)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 सार्वजनिक संस्थाओं में स्वार्थपरता और नेतागिरी लूटने के लिए जिन दुरात्माओं ने अड्डा जमा लिया है, उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जाए। धर्म और अध्यात्म का लबादा ओढ़कर जो रंगे सियार अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, उनकी असलियत चौराहे पर नंगी खड़ी कर दी जाए, ताकि लोग उन्हें भरपूर धिक्कारे। भोले लोगों को अनेक हाथों से लूटने से बचाना, एक ऊँची और श्रेष्ठ सेवा होती है। ८० लाख भिखमंगे नाना प्रकार के ढोंग बनाकर जिस तरह ठगी और हरामखोरी करने में जुटे हुए हैं, आखिर उसे कब तक सहन किया जाता रहेगा। स्वच्छ शासन प्रदान करने के लिए राजनैतिक नेता और विधायकों, शासकों और अफसरों को यह सोचने के लिए बाध्य किया जाएगा कि वे अपने निजी लाभ के लिए नहीं, लोकमंगल के लिए ही शासन-तंत्र का उपयोग करें।

🔵 इस प्रकार संघर्ष की बहुमुखी प्रचंड प्रक्रिया अगले दिनों युग निर्माण योजना आरंभ करेगी। उसके साधन जैसे-जैसे विकसित होते जाएँगे, संघ शक्ति जितनी मात्रा में उसके हाथ लगेगी, उसी अनुपात में वह शांत, अहिंसक, सज्जनोचित, सांस्कृतिक कार्य के अथक सम्पादन में जुटेगी। पग-पग पर अनौचित्य के, अन्याय के साथ लड़ा जाने वाला यह धर्म-युद्ध तभी समाप्त होगा, जब मानवता के आदर्श की विजय पताका सारे विश्व में फहराने लगेगी।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.84

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (अंतिम भाग)

🔵 काम बड़ा है तो उसके अनुरुप व्यक्तित्व भी चाहिए। यह आवश्यकता जब भी जितनी मात्रा में भी पूरी हुई तब उसी अनुपात से व्यापक समस्याओं के समाधान सम्भव हुए हैं। जन साधारण के लिए तो कर्तव्य पालन ही सम्भव होता है।वे अपनी निज समस्याओं को सुलझाने में ही अधिकाँश क्षमता खो बैठते हैं जो बचती है उससे लोक मंगल का प्रयोजन एक सीमा तक ही पूरा करपाते हैं। यों बूँद-बूँद से भी घड़ा भरता है पर उन बूँदों का संचय करने और उस संचय का सदुपयोग करने की प्रतिभा भी तो किसी में चाहिए।

🔴 नव निर्माण में असंख्य दिशा धाराएँ हैं-विकृतियों से जूझने के लिए असंख्य मोर्चे हैं, पाटने के लिए अनेक खाई, खन्दक और बनने के लिए अनेकों पुत्रल बाँध सामने है। इनके लिए जितनी साधन सामग्री चाहिए उससे अनेक गुनी आवश्यकता उन हस्तियों की है जो मौलिक विशेषताओं से संचित सपदाओं की दृष्टि से सम्पन्न एवं समर्थ कही जा सकें।उथले लोग गुब्बारे की तरह फूलते और बबूले की तरह फूटते रहते हैं।

🔵 युग सृजन के लिए सम्पदा, प्रतिभा, शिक्षा, श्रमशीलता जैसी विभूतियाँ प्रचुर परिमाण में चाहिए ही। पर उससे भी अधिक आवश्यकता उन देवात्माओं की है जिनमें आन्तरिक वर्चस् विपुल परिमाणों से भरा पड़ा हैं वर्चस् ही आत्मबल हैं। ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी, व्यक्ति वही होते हैं जिनमें इस आन्तरिक वैभव की दैवी अनुदान की-समुचित मात्रा विद्यमान हो।
 
🔴 इस खोज को इन दिनों सबसे अधिक महत्व दिया जाना है। कठिन उत्तरदायित्व सामने हैं उन्हें निभाने योग्य प्रतिभाओं के आगे आने और लाने की आवश्यकता ऐसी है जिसे एक क्षण के लिए भी आगे नहीं टाला जा सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.51

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Sep 2017

🔵 सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े  तेईस घंटे पाप करते रहने और आधे घंटे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देव दर्शन से सकल मनोरथ सहज ही पूरे जो जाने की मान्यता भी धृष्टता कही जा सकती है पर सच्चे अध्यात्म का सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर विश्वास का आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए- सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

🔴 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने।

🔵 अपने परिवार के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के लिए जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल-वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने - बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यही वातावरण अपने घर में भी धुला हुआ हो सकता है, पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयां घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकती हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 6 Sep 2017


👉 यह संसार क्या है?

🔴 एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है? ' इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई। 'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।

🔵  कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'

🔴 कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा, 'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।'

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 60)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 मृतक भोज के नाम पर घृणित दावतें खाने की निष्ठुरता, पशुबलि की नृशंसता, ऊँच-नीच के नाम पर मानवीय अधिकारों का अपहरण, नारी को पद-दलित और उत्पीड़न करने की क्रूरता हमारे समाज पर लगे हुए ऐसे कलंक हैं, जिनका समर्थन कोई भी विवेकशील और सहृदय व्यक्ति कर ही नहीं सकता। मूढ़ परम्पराओं ने इन कुरीतियों को धार्मिकता के साथ जोड़ दिया है, इस स्थिति को कब तक सहन किया जाता रहेगा? इस मूढ़ता के विरुद्ध प्रचार मोर्चे से आगे बढ़कर हमें कई और ऐसे सक्रिय कदम उठाने पड़ेंगे, जिन्हें भले ही अशान्ति उत्पन्न करने वाले कहा जाए, परंतु रुकेंगे तभी, जब मानवता के मूलभूत आधारों को स्वीकार करने वाले और झगड़े का खतरा मोल लेकर भी अनीति से हर मोर्चे पर जूझने के लिए कमर कस लें, भले ही इस संदर्भ में हमें कोई भी खतरा क्यों न उठाना पड़े।

🔵 वैयक्तिक दोष-दुर्गुणों से लड़ने और जीवन को स्वच्छ, पवित्र निर्मल बनाने के लिए अगर कुसंस्कारों से लड़ना पड़ता है, तो वह लड़ाई लड़ी ही जानी चाहिए। परिवार में कुछ सदस्यों को दास-दासी की तरह और कुछ को राजा-रानी की तरह रहने को यदि परम्परा का पालन माना जाता है, तो उसे बदल कर ऐसी परम्पराएँ स्थापित करनी पड़ेंगी, जिनमें सबको न्यायानुकूल अधिकार, लाभ, श्रम तथा सहयोग करने की व्यवस्था करे। आर्थिक क्षेत्र में बेईमानी को प्रश्रय न मिले।
 
🔴 व्यक्तिगत व्यवहार में छल करने और धोखेबाजी की गुंजाइश न रहे। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए प्रबल लोकमत तैयार करना पड़ेगा और अवांछनीय तत्त्वों के उस प्रतिरोध को इतना सक्रिय बनाना पड़ेगा कि अपराध, उद्दंडता और गुंडागर्दी करने की हिम्मत करना किसी के लिए भी संभव न रहे। हराम की कमाई खाने वाले, भ्रष्टाचारी, बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी, जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाए। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पड़ें। समाज में उनका उठना-बैठना बंद हो जाए और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.83

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 8)

🔵 ज्ञान और विज्ञान की सुविस्तृत सम्पदा ही मनुष्य को समर्थ, सम्पन्न कुशल बना सकी है। यह उपलब्धियाँ बादलों से नहीं बरसतीं, वरन् अनवरत अध्यावसाय के द्वारा ही एक-एक मंजिल पार करते हुए इन्हें खोज निकालना सम्भव हुआ है।यदि शोध प्रयासों को मानवी प्रवृत्ति में स्थान न मिला हो तो आग जैसी क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ करतल गत न होतीं और आदिम मनुष्य की पीढ़ियाँ अभी भी अपने वानर वर्ग के अन्य साथियों के साथ गुजर कर रही होतीं। कोलम्बस ने अमेरिका खोज निकाला और संसार के विकास, विस्तार में एक नये अध्याय का समावेश हुआ।

🔴 खोजियों ने अन्तरिक्ष खोजा है और उसमें से उतना पाया है जितना कि रत्नाकर कहे जाने वाले समुद्र से भी न मिल सका। कहते हैं कि खोजने वालों ने ही भगवान को ढूँढ़ निकाला अन्यथा वह क्षीर सागर में शेष नाग के ऊपर चादर ताने गहरी नींद में सो रहा था। मनुष्योत्तर प्राणियों के लिए वह अभी भी उसी तरह अविज्ञात स्थिति में पड़ा हुआ है। आत्मा का अस्तित्व मनुष्य ने ही खोजा है। अन्यथा अन्य जीवधारी अपनी सत्ता शरीर तक ही सीमाबद्ध किये रहते। धर्म और अध्यात्म मनुष्य की अपनी खोज है।

🔵 अपने समय में एक बहुत बड़ा काम युग मानवों को खोज निकालना है। बड़े काम के किए बड़ी हस्तियाँ ही चाहिए। उन्हें एक सीमा तक ही शिक्षा और परिस्थितियाँ विकसित कर सकती है। नैपोलियन और सिकन्दर किसी सैनिक संस्था द्वारा विनिर्मित नहीं किये जा सके। वशिष्ठ औरन विश्वामित्र किस आश्रम में किस साधन के सहारे विनिर्मित किये जा सके। इसका पता लग नहीं पा रहा है। अंगद और हनुमान, भीम और अर्जुन, चाणक्य और कुमार जीव, बुद्ध और महावीर, गाँधी और पटैल, शिवाजी और प्रताप किस प्रकार तैयार किये जाय उसका कोई उपाय अभी भी सूझा नहीं पड़ रहा है।
 
🔴 ईसा जटाथुस्त-अरस्तू और सुकरात, लिंकन और वाशिंगटन-विवेकानन्द और गोविन्दसिंह, नानक और कबीर किस प्रकार तैयार किये जाँय, इसका कोई मार्ग मिल नहीं रहा है, शतरुपा, कौशल्या, सीता, सावित्री, मदालसा, शकुन्तला उपलब्ध करने के लिए क्या किया जा सकता है इसके लिए भारी माथा पच्ची के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता। अरविन्द और रमण, रामकृष्ण परमहंस और विरजानन्द जैसी हस्तियाँ ही युग निर्माण जैसे महा-प्रयोजन को पूरा करने में अग्रिम भूमिका निभा सकती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.50

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Sep 2017

🔵 इस भूमण्डल पर जितने लोग दीर्घजीवी और चिरस्मरणीय हो गये हैं वे सभी ब्राह्ममुहूर्त में उठने के लिये प्रसिद्ध थे। भोर में नहीं उठने से प्रातः-काल के कार्य-कलाप यथोचित ढंग से सम्पन्न नहीं हो सकते। देर करके उठने से प्रातः कृत्यों में ही दिन का बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है और अन्योन्य कार्य समूह यथासमय सम्पन्न नहीं हो सकते। सुप्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक महात्मा अरस्तू का कथन है, “ भोर होने के पहिले ही शय्या त्याग करने का अभ्यास करना उचित है। ऐसा करने से धन, स्वास्थ्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। “अफ्रीका देश के नीग्रो लोगों में एक कहावत प्रचलित है कि जो भोर में उठता है उसके भ्रमण का पथ संक्षेप होता है।”

🔴 यदि आप दीर्घजीवी बनना चाहते हो, अपने हृदय को वसन्त कालीन वायु प्रवाह की तरह आनन्दोल्लास पूर्ण करना चाहते हों, अपनी धमनियों में झरझर शब्द करती हुई प्रवाहित होनेवाली छोटी नदी की धारा की भाँति स्वच्छ रक्त की धारा प्रवाहित करने की अभिलाषा रखते हों, आयु को बढ़ाने वाली पुष्प-फलादि के सौरभ से पूर्ण प्रातः समीरण का सेवन करके अपने जीवन की तेजस्विता बढ़ाने की इच्छा रखते हों, तो खूब तड़के शय्या त्याग करने का अभ्यास करें।

🔵 यदि आप इस जीवन में कोई महत्व का कार्य करके अपने मानव जन्म को सार्थक बनाना चाहते हों, यदि अकाल मृत्यु से बचने की अभिलाषा रखते हों तो प्रतिज्ञा पूर्वक नियमित रूप से भोर में उठा करें तथा प्रातः कालीन वायु का सेवन करें और ईश्वर का नाम लेकर उत्साह पूर्वक अपने कार्य में प्रवृत्त हों।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 5 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Sep 2017


👉 मेहनत से ही छुआ जाता है बुलंदियों को

 🔴 एक बहुत ही गरीब लड़का था | उसे खाना खाने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता था। दो वक्त की रोटी भी उसे सही से नसीब नहीं हो रही थी। वो लड़का बहुत ही मेहनती था। बिना किसी की सहायता लिए वह अपने स्कूल की फीस जमा किया करता था। वह भले ही एक समय खाना न खाता पर अपनी किताबें भी वह स्वयं ही खरीदता था।

🔵 उसके सारे साथी उससे बहुत ही ज्यादा जलते थे। एक दिन उसके मित्रों ने उस लड़के पर एक लांछन लगाना चाहा और उसे झूठे आरोप में फँसाने का फैसला किया। एक दिन स्कूल के प्राचार्य अपने कक्ष में बैठे हुए थे तभी वे सब बच्चे उस लड़के की शिकायत लेकर वहाँ पहुँचे और प्राचार्य जी से बोले – यह लड़का रोज कहीं से पैसे चुराता है और चुराए पैसों से अपने स्कूल की फीस जमा करता है। कृपया आप इसे सजा दें।

🔴 प्राचार्य ने उस लड़के से पूछा – क्या जो ये सब बच्चे बोल रहे हैं वो सच है बेटे?

🔵 लड़का बोला – प्राचार्य महोदय, मैं बहुत निर्धन परिवार से हूँ, एक गरीब हूँ लेकिन मैंने आज तक कभी चोरी नहीं की.. मैं चोर नहीं हूँ।

🔴 प्राचार्य ने उस लड़के की बात सुनी और उसे जाने के लिए कहा।

🔵 लेकिन सारे बच्चों ने, प्राचार्य से निवेदन किया कि इस लड़के के पास इतने पैसे कहाँ से आते हैं इसका पता लगाने के लिए कृपया जाँच की जाये।

🔴 प्राचार्य ने जब जाँच की तो उन्हें पता चला कि वह स्कूल के खाली समय में एक माली के यहाँ सिंचाई का काम करता है और उसी से वह कुछ पैसे कमा लेता है जो उसकी फीस भरने के काम आ जाते हैं।

🔵 अगले ही दिन प्राचार्य ने उस लड़के को और अन्य सभी बच्चों को अपने कक्ष में बुलाया और उस लड़के की तरफ देखकर उन्होंने उससे प्यार से पुछा – “बेटा! तुम इतने निर्धन हो, अपने स्कूल की फीस माफ क्यों नहीं करा लेते?”

🔴 उस निर्धन बालक ने स्वाभिमान से उत्तर दिया – “श्रीमान, जब मैं अपनी मेहनत से स्वयं को सहायता पहुँचा सकता हूँ, तो मैं अपनी गिनती असमर्थों में क्यों कराऊँ? कर्म से बढ़कर और कोई पूजा नहीं होती, ये मैंने आपसे ही सीखा है!

🔵 छात्र की बात से प्राचार्य महोदय का सिर गर्व से ऊँचा हो गया, और बाकि बच्चे जो उस लड़के को गलत साबित करने में लगे थे उनको भी बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने उससे मांगी।

🔴 मेहनत करके अपने दम पर कमाने में विश्वास रखने वाला वह निर्धन बालक था – सदानंद चट्टोपाध्याय..

🔵 बड़ा होने पर ठीक बीस वर्षों बाद इन्हें बंगाल के शिक्षा संगठन के डायरेक्टर का पद सौंपा गया था। उन्होंने एक बहुत अच्छी बात हम सबको सिखाई कि “मेहनती और सच्चे ईमानदार व्यक्ति हमेशा ही सफलता के ऊँचे शिखर पर चढ़ जाते हैं, और एक दिन अपने कठिन परिश्रम के बदौलत संसार भर में अपने नाम की छाप छोड़ जाते हैं”।

🔴 मित्रों, वास्तव में कर्म से बढ़कर कोई पूजा नहीं होती। मेहनत और ईमानदारी से कर्म करते हुए हम तमाम मुसीबतो, विपत्तियों और  बाधाओं से निकलकर, संघर्ष करते हुए ही हम सफलता को प्राप्त करेंगे और आकाश की बुलंदियों को छुएंगे।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

👉 तप-तेज के नाश का कारण

🔵 सतयुग के आदि में जंभ नामक एक बड़ा प्रबल दैत्य था। उसने प्रचण्ड तप करके ऐसी शक्ति प्राप्त की थी जिसके बल से उसने सभी देवताओं को परास्त किया।

🔴 एक दिन बालखिल्य ऋषियों के आश्रम में लक्ष्मी जी बैठी हुई थीं। संयोगवश जंभ दैत्य भी उधर से आ निकला। वह लक्ष्मी की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया और उन्हें जबरदस्ती अपने रथ में बिठाकर हरण कर ले चला।

🔵 देव गुरु बृहस्पति यह सब देख रहे थे। उनने देवताओं से कहा-बस अब प्रयोजन सिद्ध हो गया। अब इस पर आक्रमण करो, यह अवश्य मारा जायेगा। देवताओं ने पूछा-इसका क्या कारण है? देव गुरू ने कहा- पर नारी की ओर कुदृष्टि से देखने के कारण अब इसका पूर्व संचित तप नष्ट हो गया। अब इसे हरा देना कुछ कठिन नहीं है। देवताओं ने उस पर आक्रमण किया और प्रतापी जंभ दैत्य को आसानी से मार गिराया।

🔴 पर नारी के प्रति कुदृष्टी रखने वाले का तप –तेज नष्ट हो जाता है

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 59)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 इन दिनों नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में अवांछनीय तत्त्वों का इतना अधिक बाहुल्य हो गया है कि शांति और सुव्यवस्था के लिए एक प्रकार से संकट ही उत्पन्न हो गया है। छल, असत्य, बनावट और विश्वासघात का ऐसा प्रचलन हो गया है कि किसी व्यक्ति पर सहज ही विश्वास करना खतरे से खाली नहीं रहा। विचारों की दृष्टि से मनुष्य बहुत ही संकीर्ण, स्वार्थी, ओछा और कमीना होता चला जा रहा है। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त कोई लक्ष्य नहीं, आदर्शवादिता और उत्कृष्टता अब कहने-सुनने भर की बात रह गई है। व्यवहार में कोई बिरला ही उसे काम में लाता हो। सामाजिक कुरीतियों का तो कहना ही क्या? विवाहोन्माद, मृत्यु-भोज ऊँच-नीच नारी तिरस्कार, बाल-विवाह वृद्ध-विवाह आदि न जाने कितनी प्रकार की कुरीतियाँ अपने समाज में घुसी बैठी हैं। यदि उन्हें ज्यों का त्यों ही बना रहने दिया गया, तो हम संसार के सभ्य देशों में पिछड़े हुए और उपहासास्पद ही न माने जाएँगे, वरन् अपनी दुर्बलताओं के शिकार होकर अपना अस्तित्व ही खो बैठेंगे।

🔵 अगले दिनों इस बात की आवश्यकता पड़ेगी कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरंभ किया जाए। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरंभ किए गए धर्म-युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगों को योद्धा कहा जाता था, अब मापदण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके, उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जाएगा। उस बहादुरी के ऊपर शोषण-विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुद्धि और कुत्सा से लड़ सकने में जो लोग समर्थ होंगे, उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।
 
🔴 भारतीय समाज को बेईमान और गरीब बनने के लिए विवश करने वाले सत्यानाशी विवाहोन्माद नामक असुर से पूरी शक्ति के साथ जूझना पड़ेगा। अभी प्रचार, विरोध, प्रतिज्ञापत्र आदि के हल्के कदम उठाए गए हैं, आगे चलकर असहयोग, सत्याग्रह और घिराव जैसे बड़े कदम उठाकर इस कुप्रथा को गर्हित और वर्जित बनने के लिए घृणित और दुष्ट समझे जाने के लिए विवश करेंगे। अगले दिनों ऐसा प्रबल लोकमत तैयार करेंगे, जिसमें विवाहों के नाम पर प्रचलित उद्धतपन को जीवित रह सकना असंभव हो जाए। पूर्ण सादगी और स्वल्प खर्च के विवाहों का प्रचलन होने तक अपना संघर्ष चलता रहेगा। हम तब तक न चैन लेंगे और न लेने देंगे, जब तक कि इस अनैतिक एवं अवांछनीय प्रथा का देश से काला मुँह न हो जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.82

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 Be like a Swan. (Part 3)

🔵 I was requesting you the same. If you have acknowledged the importance of GAYATRI, start becoming its carrier. Her carrier has only two specifications; one is that it can separate water from milk. Whatever is available in this world is messed. All is mixed. If somewhere is seen an element of truth then soon starts being seen a deep touch of falseness and dishonesty associated with that truth. How then will you separate these two? It is possible only through your discriminative capacity that you separate it. It is said about RAJHANS that ‘YA HANSA MOTI CHUNAI YA LANGHAN MAR JAYE’. It is desirable to die of hunger in place of eating anything you find, for survival. 
 
🔴 If you cannot earn honestly and live a proper life, then what is the use of that life? Do not live. By ‘do not live’ I mean to suggest that you must live hand to mouth, you may live with difficulties also. Majority of persons are compelled to live in poverty. Someone dies of a disease. Someone is lodged in jail. Someone faces premature death of his/her children/wife/ husband/relative. Someone faces another kind of trouble. Majority of people are there in this world who face some or the other kind of trouble. What is the harm if you face troubles of living a true & honest yet in poverty? A pill of dishonesty with coating of honesty—very this way, we can see public around behaving. Very this is called the world. You kindly disassociate yourself with it to try to proceed to become a SWAN. Finished, today’s session.

====== OM SHANTI======

🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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