सोमवार, 28 अगस्त 2017

👉 Heard the Bhagwat four times

🔴 Parikshit Maharaj heard Bhagwat Puran from Shukdeo and attained salvation. A rich man on hearing this, developed great respect for the Bhagwat, and got eager to listen to it from a Brahmin to get liberated.

🔵 He searched and found a profound priest of Bhagwat. He told him his intention of hearing the Bhagwat. The priest told him that this is Kaliyug, all the pious activities in this age is reduced four times, thus he had to listen to it for four times. The reason behind the priest’s proposition was to get enough money out of the deal. He gave the fees to the priest and heard four Bhagwat lectures but it was of no use. The man then met a higher level of saint. He asked him, how Parikshit could get and he didn’t after listening to the Bhagwat.

🔴 The saint told him, that Parikshit Maharaj had known the death to be imminent and was completely detached from the world while hearing and Shukdeo Muni was narrating without the feeling of any kind of greed.

🔵 Whoever has got the knowledge in the form of an advice, free of any kind of self vested interests, that has produced desired results.

🌹 From Pragya Puran

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 56)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 सामाजिक कुरीतियों से हिंदू समाज इतना जर्जर हो रहा है कि इन विकृतियों के कारण जीवनयापन कर सकना भी मध्यम वर्ग के लोगों के लिए कठिन होता चला जा रहा है। बच्चों का विवाह एक नरभक्षी पिशाच की तरह हर अभिभावक के सिर पर नंगी तलवार लिए नाचता रहता है। विवाह के दिन जीवन भर के गाढ़ी कमाई के पैसों को होली की तरह फूँक देने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। हत्यारा दहेज छुरी लेकर हमारी बच्चियों का खून पी जाने के लिए निर्भय होकर विचरण करता रहता है।

🔵 मृत्युभोज, औसर- मोसर, नेगचार, मुंडन, दस्टौन, जनेऊ और भी न जाने क्या- क्या ऊट- पटांग काम करने के लिए लोग विवश होते रहते हैं और जो कुछ कमाते हैं, उसका अधिकांश भाग इन्हीं फिजूलखर्चियों में स्वाहा करते रहते हैं। जेवर बनवाने में रुपए में से आठ आने हाथ रहते हैं, जान- जोखिम ईर्ष्या, अहंकार, सुरक्षा की चिंता, ब्याज की हानि आदि अनेक आपत्तियाँ उत्पन्न होती रहती हैं, फिर भी परम्परा जो है। सब लोग जैसा करते हैं, वैसा ही हम क्यों न करें? विवेक का परम्पराओं की तुलना में परास्त हो जाना, वैसा ही आश्चर्यजनक है जैसा कि बकरे का शेर की गरदन मरोड़ देना। आश्चर्य की बात तो अवश्य है, पर हो यही रहा है।
 
🔴 शरीर के रोगी, मन के मलीन और समाज के कुसंस्कारी होने का एक ही कारण है- अविवेक यों हम स्कूली शिक्षा ऊँचे दर्जे तक प्राप्त किए रहते हैं और अपने ढंग की चतुरता भी खूब होती है, पर जीवन की मूलभूत समस्याओं को गहराई तक समझने में प्रायः असमर्थ ही रहते हैं। बाहरी बातों पर खूब बहस करते और सोचते- समझते हैं, पर जिस आधार पर हमारा जीवनोद्देश्य निर्भर है, उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते। इसी का नाम है- अविवेक विचारशीलता का यदि अभाव न हो और गुण- दोष की दृष्टि से अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं पर सोचना समझना आरंभ करें, तो प्रतीत होगा कि बुद्धिमत्ता का दावा करते हुए भी हम कितनी अधिक मूर्खता से ग्रसित हो रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.77

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.14

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 5)

🔵 युग संधि में जागृत आत्माओं को यही करना पड़ता है। समस्या 700 करोड़ मनुष्यों की है। वे एक स्थान पर नहीं समस्त भूमंडल पर बिखरे हुए बसे हैं। अनेक भाषा बोलते हैं। अनेक धर्म सम्प्रदायों का अनुसरण करते हैं। शासन पद्धतियों और सामाजिक परम्पराओं में भिन्नता है। मनःस्थिति और परिस्थिति में भी भारी अन्तर है। इतना होते हुए भी उन सबसे सर्म्पक साधना है। युग चेतना से परिचित और प्रभावित करना है। इतना ही नहीं सर्म्पकै प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है जिसके दबाव में लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए हिम्मत ही नहीं तत्पर भर हो सकें। यह कार्य कहने सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है। पर वस्तुतः उतना कठिन और जटिल है। ऐसा उत्तरदायित्व उठाने वालों को कैसा होना चाहिए उसका अनुमान लगाने पर यही कहना पड़ता है कि उनकी मजबूती-घहराती नदियों पर मीलों लम्बे पुल का-उस पर दौड़ने वाले वाहनों का बोझा उठा सकने वाले पायों जैसी होनी चाहिए।

🔴 आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को समाज की संरचना के लिए आन्दोलन परक कार्य ही करना पड़े। वह क्षेत्र छोटा होता है और उसमें थोड़े से व्यक्ति ही खप सकते हैं।सृजन प्रोजन बहुत बड़ा है। उसके असंख्यों पक्ष है। उनमें से जो जिसे कर सके वह उसे सँभाले। कला, साहित्य, विज्ञान, उत्पादन, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य जैने अनेकों क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें बिना अधिक जन-सर्म्पक साधे भी अभीष्ट प्रयोजनों में निरत रहा जा सकता है और आन्दोलनकारियों से भी अधिक महत्व का ऐसा कार्य किया जा सकता है जो नवयुग की आवश्यकता में अपने ढंग से पूरा करने में असाधारण योगदान कर सके। युद्ध जीतने में सभी को तलवार नहीं चलानी पड़ती। वे लोग भी द्वितीय पंक्ति के सैनिक ही हैं जो युद्ध सामग्री बनाते अथवा सैनिकों पर पड़ने वाले खर्च को अपने परिश्रम से जुटाते हैं।

🔵 आन्दोलकारियों-प्रचारकों की तरह ही वे लोग भी उपयोगी हैं जो उनके लिए साधन सामग्री जुटाने अथवा कार्य क्षेत्र बनाने में तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों का घर रह कर काम करना भी परिव्राजको की ही तरह महत्वपूर्ण कार्य है। हर व्यक्ति की मानसिक संरचना एवं परिस्थिति परिव्राजकों की भूमिका निभाने की नहीं होती। होती भी हो तो उस कार्य के लिए सीमित संख्या में ही सुयोग्य व्यक्ति चाहिए। अधिक सृजन शिल्पी तो अपने-अपने ढंगों के उत्तरदायित्व सँभालते हुए अपने निर्वाह की व्यवस्था चलाते हुए समन्वित प्रक्रिया अपनायेंगे और लक्ष्य की प्राप्ति में अपने ढंग का ऐसा योगदान करेंगे जिसकी महत्ता को किसी प्रकार कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता। जन्म समय के आधार पर यह निर्धारण भी किया जाता हैं कि कौन प्रतिभा किस प्रयोजन में लगे, जिससे उसका साँसारिक निर्वाह भी चलता रहे। और युग सृजन में भागीदार बनने का सौभाग्य भी मिलता रहे।


🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.48

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Aug 2017

🔴 मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहते हैं। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए ही उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

🔵 मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी, प्रतिकूलताओं को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी परिस्थितियों को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उलझती रहेंगी।

🔴 हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य और विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दंड की दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य, पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकता। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अन्धकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा? दूसरों को ठगने या परेशान करने का अर्थ है ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती जिसके मन में ईश्वर का विश्वास, भय और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 1)

🔵 अश्लीलता को अनैतिक माना गया है। शरीर के वे अंग जो कामाचार से सम्बन्धित हैं उन्हें निर्वस्त्र न रखने की मर्यादा है। उन पर दृष्टिपात करने से कामुकता भड़कती और उन मर्यादाओं को तोड़ने के लिए मन चलता है जो नर और नारी के बीच शील मर्यादाओं का पुल बाँधें हुए है।

🔴 मनुष्यता के साथ कितने ही ऐसे शील जुड़े हुए हैं जो पशु-पक्षियों में कीट पतंगों में नहीं है। उनमें अस्तेय नहीं है। किस वस्तु पर किसका अधिकार है यह ज्ञान उन्हें नहीं होता इसलिए खानपान की वस्तुएँ जिसे जहाँ मिलती है वह वहाँ से हथियाने लगता है। दया, क्षमा, उदारता, कृतज्ञता जैसे गुण भी उनमें नहीं होते। स्वार्थ को तनिक सा आघात लगते ही वे क्रुद्ध होते और लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। इसी प्रकार यौनाचार के सम्बन्ध में कोई मर्यादा उनमें नहीं है। भिन्न लिंग के साथ यौनाचार करने में उन्हें कोई लज्जा, भय, संकोच नहीं होता। किन्तु मनुष्य को वैसी छूट नहीं है। मनुष्य वस्त्र पहनते हैं। विशेषकर कामुकता से संबंधित अवयवों को ढ़ककर रहते हैं। यह मानवोचितशील है। इसकी मर्यादाओं का उल्लंघन करना अश्लीलता कहलाती है, जो हेय मानी गई है।

🔵 जननेन्द्रिय, जंघाए, वक्ष, कमर जैसे अवयव देखने से कामोत्तेजना उभरती है और यौनाचार के लिए मन चलता है। इसलिए स्त्रियाँ भी और पुरुष भी इन अंगों को ढक कर रखते हैं। इनके नग्न प्रदर्शन से मनोविकार भड़कते हैं, जो यौनाचार शील पर आघात पहुँचाते हैं।

🔴 मानवीय शील के अंतर्गत अपनी वैध धर्मपत्नी या धर्म पति के साथ ही यौनाचार की छूट है। अन्यों के साथ विभिन्न सम्बन्धों की विधा है। स्त्रियाँ अन्य पुरुषों के साथ पिता, भाई या पुत्र के सम्बन्ध रखें इसी प्रकार पुरुषों को नारियों के प्रति माता, बहिन या पुत्री के भाव रखने चाहिए। कामुकता की दृष्टि इन मर्यादाओं को तोड़ती और मानवशील को आघात पहुँचाती है। इसीलिए चोरी जैसे अपराधों में उसे गिना गया है।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 45

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.45

👉 आज का सद्चिंतन 28 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Aug 2017


रविवार, 27 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 55)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 उचित- अनुचित का, लाभ- हानि का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना, किधर नहीं चलना इसका निर्णय करने के लिए उपयुक्त बुद्धि भगवान् ने मनुष्य को दी है। उसी के आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं, पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है, वही महत्त्वपूर्ण समस्या सामने आने पर कुंठित हो जाता है। परम्पराओं की तुलना में तो किसी विरले का ही विवेक जाग्रत रहता है, अन्यथा आंतरिक विरोध रहते हुए भी लोग पानी में बहुत हुए तिनके की तरह अनिच्छित दिशा में बहने लगते हैं। भेड़ों को झुण्ड जिधर भी चल पड़े, उसी ओर सब भेड़ें बढ़ती जाती हैं। एक भेड़ कुँए में गिर पड़े तो पीछे की सब भेड़ें उसी कुँए में गिरती हुई अपने प्राण गँवाने लगती हैं। देखा- देखी की, नकल करने की प्रवृत्ति बंदर में पाई जाती है। वह दूसरों को जैसा करते देखता है, वैसा ही खुद भी करने लगता है। इस अंधानुकरण की आदत को जब मनुष्य का मन भी, इसी तरह मान लेने के लिए करता है, तो वह यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि आदमी बंदर की औलाद है।
 
🔵 समाज में प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ ऐसी हैं, जिनमें लाभ रत्ती भर भी नहीं, हानि अनेक प्रकार से हैं, पर एक की देखा- देखी दूसरा उसे करने लगता है। बीड़ी और चाय का प्रचार दिन- दिन बढ़ रहा है। छोटे- छोटे बच्चे बड़े शौक से इन्हें पीते हैं। सोचा यह जाता है कि यह चीजें बड़प्पन अथवा सभ्यता की निशानी हैं। इन्हीं पीना एक फैशन की पूर्ति करना है और अपने को अमीर, धनवान साबित करना है। ऐसी ही कुछ भ्रांतियों से प्रेरित होकर शौक, मजे, फैशन जैसी दिखावे की भावना से एक की देखा- देखी दूसरा इन नशीली वस्तुओं को अपनाता है और अंत में एक कुटेब के रूप में वह लत ऐसी बुरी तरह लग जाती है कि छुड़ाए नहीं छूटती।
 
🔴 चाय, बीड़ी, भाँग, गाँजा, शराब, अफीम आदि सभी नशीली चीजें भयंकर दुर्व्यसन हैं, इनके द्वारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होता है और आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हर नशेबाज स्वभाव की दृष्टि से दिन- दिन घटिया आदमी बनता जाता है। क्रोध, आवेश, चिंता, निराशा, आलस्य, निर्दयता, अविश्वास आदि कितने ही मानसिक दुर्गुण उपज पड़ते हैं। समझाने पर या स्वयं विचार करने पर हर नशेबाज इस लत की बुराई को स्वीकार करता है, पर विवेक की प्रखरता और साहस की सजीवता न होने से कुछ कर नहीं पाता। एक अंध परम्परा में भेड़ की तरह चलता चला जाता है। क्या यही मनुष्य की बुद्धिमत्ता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.76

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.14

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (अंतिम भाग)

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार में हर जाति एवं उपजाति के लोग मौजूद हैं। उसकी छाँट करके प्रारम्भिक रूप में प्रगतिशील जातीय सभाएं गठित कर दी जावेंगी, पर उतने थोड़े लोगों के संगठन किसी जाति पर व्यापक प्रभाव कहाँ डाल सकेंगे? उन्हें अपने-अपने संगठनों का व्यापक विस्तार करना होगा। प्रगतिशीलता का तात्पर्य और उद्देश्य समझाने के लिए उन्हें अपने-अपने कार्य क्षेत्र में दर दर मारा-मारा फिरता पड़ेगा। संगठन का उद्देश्य और कार्यक्रम समझ लेने पर ही तो कोई उससे प्रभावित होगा और उसमें सम्मिलित होने की तैयारी करेगा।

🔴 कहने पर से तो इन संस्थाओं के सदस्य सब लोग बन नहीं जायेंगे और यदि बन भी गये तो उनमें वह साहस कहाँ से आवेगा, जिसके बल बूते पर वह बहती नदी के प्रवाह को चीर कर उलटी चलने वाली मछली की तरह नवीन परम्परा स्थापित करने का आदर्श उपस्थित कर सकें निश्चय ही इसके लिए व्यापक प्रचार और प्रयास की जरूरत होगी। जन-संपर्क बनाने के लिए दौरे करने पड़ेंगे, उद्देश्य को समझा सकने वाला साहित्य-जनता तक पहुँचना पड़ेगा और उनके मस्तिष्क में वह भावना भरनी पड़ेगी जिससे वे युगधर्म को पहचान सकें और प्रतिगामिता की हानियों और प्रगतिशीलता के लाभों से परिचित हो सकें।

🔵 जातियों के क्षेत्र छोटे-छोटे हैं बिखरे हुए पड़े हैं, उन बिखरे हुए मन को को एक सूत्र में पिरोने में कितने मनोयोग की आवश्यकता है उसे कार्यक्षेत्र में उतरने वाले ही जानते हैं। कितना विरोध, कितना उपहास, कितना व्यंग सहना पड़ता है, कितना समय नष्ट करना पड़ता है उसे वही सहन कर सकेगा जिसमें त्यागी तपस्वी जैसी भावना विद्यमान हो। घर बैठे मुफ्त में यश को लूट भागने वाले बातूनी लोग इस प्रयोजन को पूरा कहाँ कर सकेंगे? इसलिए सबसे पहली आवश्यकता ऐसे भावनाशील लोगों की ही पड़ेगी, जो युग की सब से बड़ी आवश्यकता-सामाजिक क्रान्ति के लिए अपनी सच्ची श्रद्धा को अञ्जलि में लेकर संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ा सकें।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 52
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.52

👉 आज का सद्चिंतन 27 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Aug 2017


शनिवार, 26 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 53)

🌹  संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार के लिए, अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

🔴 इस संसार में अनेक परमार्थ और उपकार के कार्य हैं, वे सब आवरण मात्र हैं, उनकी आत्मा में, सद्भावनाएँ सन्निहित हैं। सद्भावना सहित सत्कर्म भी केवल ढोंग मात्र बनकर रह जाते हैं। अनेक संस्थाएँ आज परमार्थ का आडम्बर करके सिंह की खाल ओढ़े फिरने वाले शृंगाल का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। उनसे लाभ किसी का कुछ नहीं होता, विडम्बना बढ़ती है और पुरुषार्थ को भी लोग आशंका एवं संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। प्राण रहित शरीर कितने ही सुंदर वस्त्र धारण किए हुए क्यों न हो, उसे कोई पसंद न करेगा, न उससे किसी का कोई भला होगा। इसी प्रकार सद्भावना रहित जो कुछ भी लोकहित, जनसेवा के प्रयास किए जाएँगे, वे भलाई नहीं, बुराई ही उत्पन्न करेंगे।

🔵 बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल-फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वारा प्रचार करने वाले पक्के प्रचारक, पूरी तरह मन, कर्म, वचन से बुराई फैलाने वाले लोग बहुसंख्या में मौजूद हैं। अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं, बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं, फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता और वे पोथी के वचनों की तरह केवल कहने-सुनने भर की बातें रह जाती हैं। कथा-वार्ताओं को लोग व्यवहार की नहीं कहने-सुनने की बात मानते हैं और इतने मात्र से ही पुण्य लाभ की संभावना मान लेते हैं।

🔴 सत्प्रवृत्तियों को मनुष्य के हृदय में उतार देने से बढ़कर और कोई महत्त्वपूर्ण सेवा कार्य इस संसार में नहीं हो सकता। वस्तुओं की सहायता भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध हो सकती है, पर उसका स्थाई महत्त्व नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य लोग ऐसी सेवा कर भी नहीं सकते। हर आदमी स्थायी रूप से अपनी समस्या, अपने पुरुषार्थ और विवेक से ही हल कर सकता है। दूसरों की सहायता पर जीवित रहना न तो किसी मनुष्य के गौरव के अनुकूल हे और न उससे स्थायी हल ही निकलता है। जितनी भी कठिनाइयाँ व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में दिखाई पड़ती हैं, उनका एकमात्र कारण कुबुद्धि है।

🔵 यदि मनुष्य अपनी आदतों को सुधार ले, स्वभाव को सही बना ले और विचारों तथा कार्यों का ठीक तारतम्य बिठा ले तो बाहर से उत्पन्न होती दीखने वाली सभी कठिनाइयाँ बात की बात में हल हो सकती हैं। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि सत्प्रवृत्तियों को अधिकाधिक पनपने का अवसर मिले। इसी प्रयास में प्राचीनकाल में कुछ लोग अपने जीवन के उत्सर्ग करते थे, उन्हें बड़ा माना जाता था और ब्राह्मण के सम्मानसूचक पद पर प्रतिष्ठित किया जाता था। चूँकि सत्प्रवृत्तियों को पनपना संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है इसलिए उसमें लगे हुए व्यक्तियों को सम्मान भी मिलना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.73

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.13

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 4)

🔵 इन विषम परिस्थितियों में बहुमुखी समस्याओं की जड़े लोक मानस में अत्यन्त गहराई में घुसी हुई होने के कारण, युग परिवर्तन अतीव कठिन है। गुण, कर्म, स्वभाव लोक धारा को उलटना-समुद्र के खारी जल को हिमालय की सम्पदा बना देना कितना कठिन है उसे हर कोई नहीं समझ सकता। उसे भुक्तभोगी बादल ही जानते हैं कि उसमें कितना साहस करने कितना भार ढोने कितना उड़ना, और कितना त्याग करना पड़ता है। युग परिवर्तन के भावी प्रयासों को लगभग इसी स्तर का माना जाना चाहिए।

🔴 युग सन्धि की अत्यन्त महत्वपूर्ण वेला है। इन वर्षो में महान परिवर्तन होंगे और विकट समस्याओं को समाधान करना होगा। बुझते दीपक की लौ, प्रभाव से पूर्व की सघन तमिस्रा मरणासन्न की साँस, चींटी के उगते पंख, हारे जुआरी के दाव को देख कर, मरता सो क्या न करता की उक्ति को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। असुरता अपनी अन्तिम घड़ियों में जीवन-मरण की लड़ाई लड़ेगी और संकट, विक्रह अपेक्षाकृत अधिक बढ़ेंगे। इसी प्रकार देवत्व की प्रतिष्ठापना के लिए भी बीजारोपण के साथ प्रचंड उत्साह के साथ काम करने वाले किसान जैसी भूमिका की दर्शनीय होगी।

🔵 दोनों पक्ष एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते हुए भी परम साहसकिता का परिचय देंगे। एक दूसरे के साथ टकराने से भी पीछे न हटेंगे। साँड़ लड़ते हैं तो खेत खलिहानों को तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। युग परिवर्तन प्रसव पीड़ा जैसे कष्ट कारक होते हैं उसमें डाक्टरों, नर्सो की पूर्णतया जागरुक रहना पड़ता है। प्रसूता की तो जान पर ही बीतती है। उसकी सुरक्षा सान्त्वना में अतिरिक्त इन लोगों को नव जात शिशुओं के लिए आवश्यक सुविधाएँ भी पहले से ही जुटानी होती है।

🔴 युग संधि में दुहरे उत्तरदायित्व जागृत आत्माओं को सँभालने पड़ते हैं। विनाशकारी परिस्थितियों से जूझना और विकास के सृजन प्रयोजनों को सोचना। किसान और माली को भी यही करना पड़ता है। खर पतवार उखाड़ना-बेतुकी डालियों को काटना- पशु पक्षियों से फसल को रखाना जैसी प्रतिरोध सुरक्षा की जागरुकता दिखाने पर ही उनके पल्ले कुछ पड़ेगा अन्यथा परिश्रम निरर्थक चले जाने की आशंका बनी रहेगी। उन्हें एक मोर्चा सृजन का भी सँभालना पड़ता है। बीज-बोना, खाद देना, सिंचाई का प्रबन्ध करना, रचनात्मक काम है। इसकी उपेक्षा की जाय तो उत्पादन की आशा समाप्त होकर ही रहेगी। इसे दो मोर्चो पर दुधारी तलवार से लड़ने के समतुल्य माना जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.47

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Aug 2017

🔴 साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

🔵 आत्मोन्नति एकाँगी नहीं होती, केवल एक से ही वह पूरी नहीं हो सकती वरन् तत्संबन्धी सभी उपकरण जुटाने पड़ते हैं। पहलवान का इच्छुक व्यक्ति केवल मात्र व्यायाम पर जुटा रहे और पौष्टिक भोजन, तेल, मालिश, ब्रह्मचर्य, विश्राम आदि की उपेक्षा करे तो उसका सफल होना कठिन है। आत्मोन्नति के सुव्यवस्थित साधनों के संबंध में आध्यात्म विद्या के तत्वदर्शी आचार्य सदा से सावधान रहे हैं। उन्होंने अपने शिष्यों की सर्वांगीण उन्नति पर सदा से ही पूरा पूरा ध्यान रखा है और इस संबंध में बड़े नियमों प्रतिबंधों एवं उत्तरदायित्वों का शास्त्रों में अनेक प्रकार का वर्णन किया है। व्यवहारिक जीवन उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, लोक सेवा एवं स्वार्थ त्याग से ओत-प्रोत आचरणों का अधिकाधिक अवसर आना उन अवसरों पर अपना उत्तरदायित्व सफलतापूर्वक पूरा किया जाना प्रत्येक साधके के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

🔴 दूसरों के दुःख का असर होना इसको दया कहते हैं। अथवा दुःखी जीवों के प्रति जो प्रीति-भाव रखा जाता है, उसको दया कहते हैं। इस दयावृत्ति से संवेदना-शक्ति की उन्नति होती है। दयावृत्ति का भक्ति और प्रीति के साथ अतिघनिष्ठ सम्बन्ध है। जो मनुष्य प्राणीमात्र के अंतःकरण में ईश्वर का निवास मानकर भक्ति करता है वही सबसे प्रेम भाव रख सकता है, और उसी से दूसरों का दुःख नहीं देखा जाता। दूसरों के दुःख को देखकर उसको अपने अंतर में दुःख का असर होता है, जिससे तत्काल हृदय द्रवीभूत होकर अपने अंतर के दुःख की निवृत्ति के लिये दुःखी प्राणी की सहायता करने के लिये तत्पर होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 3)

🔵 बुद्ध धर्म के शून्यवाद ने जब वैदिक परम्पराओं को ग्रस लिया था तब साँस्कृतिक दुर्दशा पर महल के झरोखे में बैठी आँसू बहाती हुई राजकुमारी की आँखों का पानी सड़क पर चलते हुए कुमारिल भट्ट के ऊपर पड़ा। उसने ऊपर आँख उठा कर देखा और कारण पूछा तो राजकुमारी ने कहा-को वेदान् उद्धरस्यसि? अर्थात् वेदों का उद्धार कौन करेगा? कुमारिल का पौरुष इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा कि मैं करूंगा? और सचमुच उस कर्मठ युवक ने वैदिक सभ्यता की रक्षा के लिए वह सब कुछ कर दिखाया जो कोई निष्ठावान व्यक्ति कर सकता है। आज विवाहों के अपव्यय ने भारतीय संस्कृति को उस घृणित एवं मरणोन्मुख परिस्थितियों में ला पटका है जिसमें कुछ दिन वह और पड़ी रही तो उसे अपनी मौत आप मर जाने के लिए ही विवश होना पड़ेगा। कुमारिल भट्ट की इस कुसमय की घड़ी में जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।

🔴 यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा के नाम पर चारों ओर व्याप्त नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए गौतम बुद्ध की आत्मा विद्रोह कर उठी थी, उनने तप करके जो शक्ति प्राप्त की, उसे समाज की तत्कालीन प्रवृत्तियों को बदलने में लगा दिया। आज यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा से बढ़ कर विवाहों के नाम पर होने वाले अपव्यय की क्रूर बलिवेदी लाखों कन्याओं के रक्त स्नान से अभिषिक्त होती रहती है। इस नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए सहस्रों युद्धों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है पर सब ओर सन्नाटा देख कर ‘वीर विहीन मही’ होने की आशंका दिखाई पड़ने लगती है और भारतीय गौरव का मस्तक लज्जा से नीचा झुक जाता है।

🔵 युग-निर्माण के उपयुक्त अभिनव समाज रचना का महान अभियान आरम्भ करते हुए सबसे प्रथम यही आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि प्रत्येक जाति में ऐसे तेजस्वी युवक निकलें जो संगठन की प्रारम्भिक भूमिका का ढाँचा खड़ा करने में अपना समय लगावें और साहसपूर्वक कुछ काम कर गुजरने की लगन लेकर आगे बढ़ें। इसके लिए घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आजीविका कमाते हुए, बच्चों का पालन करते हुए भी कोई व्यक्ति थोड़ा समय पारमार्थिक कामों में लगाता रहे तो उतने में भी सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो सकता है। पूरा समय दे सकने वाले प्रतिभाशाली लोग वानप्रस्थों की तरह देश धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए मिल सकें तब तो कहना ही क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51-52

👉 आज का सद्चिंतन 26 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Aug 2017


शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 52)

🌹  संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार के लिए, अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

🔴 परमार्थ परायण जीवन जीना है तो उसके नाम पर कुछ भी करने लगना उचित नहीं। परमार्थ के नाम पर अपनी शक्ति ऐसे कार्यों में लगानी चाहिए जिनमें उसकी सर्वाधिक सार्थकता हो। स्वयं अपने अंदर से लेकर बाहर समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करना, बढ़ाना इस दृष्टि से सबसे अधिक उपयुक्त है। संसार में जितना कुछ सत्कार्य बन पड़ रहा है, उन सबके मूल में सत्प्रवृत्तियाँ ही काम करती हैं। लहलहाती हुई खेती तभी हो सकती है, जब बीज का अस्तित्व मौजूद हो। बीज के बिना पौधा कहाँ से उगेगा? भले या बुरे कार्य अनायास ही नहीं उपज पड़ते, उनके मूल में सद्विचारों और कुविचारों की जड़ जमी होती है।

🔵 समय पाकर बीज जिस प्रकार अंकुरित होता और फलता-फूलता है, उसी प्रकार सत्प्रवृत्तियाँ भी अगणित प्रकार के पुण्य-परमार्थों के रूप में विकसित एवं परिलक्षित होती हैं। जिस शुष्क हृदय में सद्भावनाओं के लिए, सद्विचारों के लिए कोई स्थान नहीं मिला, उसके द्वारा जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य बन पड़े, यह लगभग असंभव ही मानना चाहिए। जिन लोगों ने कोई सत्कर्म किए हैं, आदर्श का अनुकरण किया है, उनमें से प्रत्येक को उससे पूर्व अपनी पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण कर सकने योग्य सद्विचारों का लाभ किसी न किसी प्रकार मिल चुका होता है।

🔴 कुकर्मी और दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्यों के इस घृणित स्थिति में पड़े रहने की जिम्मेदारी उनकी उस भूल पर है, जिसके कारण वे सद्विचारों की आवश्यकता और उपयोगिता को समझने से वंचित रहे, जीवन के इस सर्वोपरि लाभ की उपेक्षा करते रहे, उसे व्यर्थ मानकर उससे बचते और कतराते रहे। मूलतः मनुष्य एक प्रकार का काला कुरूप लोहा मात्र है। सद्विचारों का पारस छूकर ही वह सोना बनता है। एक नगण्य तुच्छ प्राणी को मानवता का महान् गौरव दिला सकने की क्षमता केवल मात्र सद्विचारों में है। जिसे यह सौभाग्य नहीं मिल सका, वह बेचारा क्यों कर अपने जीवन-लक्ष्य को समझ सकेगा और क्यों कर उसके लिए कुछ प्रयत्न-पुरुषार्थ कर सकेगा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.72

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.13

👉 वीरांगना स्पेशल (स्वयं की सुरक्षा)

👉 महिलाऐं व लड़कियाँ संवेदना रहित इस समाज में स्वयं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर सकती है

1. एक नारी को तब क्या करना चाहिये जब वह देर रात में किसी उँची इमारत की लिफ़्ट में किसी अजनबी के साथ स्वयं को अकेला पाये?

विशेषज्ञ का कहना है: जब आप लिफ़्ट में प्रवेश करें और आपको 13 वीं मंज़िल पर जाना हो, तो अपनी मंज़िल तक के सभी बटनों को दबा दें! कोई भी व्यक्ति उस परिस्थिति में हमला नहीं कर सकता जब लिफ़्ट प्रत्येक मंजिल पर रुकती हो!

2. जब आप घर में अकेली हों और कोई अजनबी आप पर हमला करे तो क्या करें?
तुरन्त रसोईघर की ओर दौड़ जायें

विशेषज्ञ का कहना है: आप स्वयं ही जानती हैं कि रसोई में पिसी मिर्च या हल्दी कहाँ पर उपलब्ध है! और कहाँ पर चक्की व प्लेट रखे हैं! यह सभी आपकी सुरक्षा के औज़ार का कार्य कर सकते हैं! और भी नहीं तो प्लेट व बर्तनों को ज़ोर- जोर से फैंके भले ही टूटे! और चिल्लाना शुरु कर दो! स्मरण रखें कि शोरगुल ऐसे व्यक्तियों का सबसे बड़ा दुश्मन होता है! वह अपने आप को पकड़ा जाना कभी भी पसंद नहीं करेगा!

3. रात में आटो या टैक्सी से सफ़र करते समय!

विशेषज्ञ का कहना है: आटो या टैक्सी में बैठते समय उसका नं० नोट करके अपने पारिवारिक सदस्यों या मित्र को मोबाईल पर उस भाषा में विवरण से तुरन्त सूचित करें जिसको कि ड्राइवर जानता हो! मोबाइल पर यदि कोई बात नहीं हो पा रही हो या उत्तर न भी मिल रहा हो तो भी ऐसा ही प्रदर्शित करें कि आपकी बात हो रही है व गाड़ी का विवरण आपके परिवार/ मित्र को मिल चुका है! . इससे ड्राईवर को आभास होगा कि उसकी गाड़ी का विवरण कोई व्यक्ति जानता है और यदि कोई दुस्साहस किया गया तो वह अविलम्ब पकड़ में आ जायेगा! इस परिस्थिति में वह आपको सुरक्षित स्थिति में आपके घर पहुँचायेगा! जिस व्यक्ति से ख़तरा होने की आशंका थी अब वह आपकी सुरक्षा क्षात्र धान रखेगा!

4. यदि ड्राईवर गाड़ी को उस गली/रास्ते पर मोड़ दे जहाँ जाना न हो और आपको महशूस हो कि आगे ख़तरा हो सकता है - तो क्या करें?

विशेषज्ञ का कहना है कि आप अपने पर्स के हैंडल या अपने दुपट्टा/ चुनरी का प्रयोग उसकी गर्दन पर लपेट कर अपनी तरफ़ पीछे खींचती हैं तो सैकिण्डो में उस व्यक्ति का असहाय व निर्बल हो जायेगा! यदि आपके पास पर्स या दुपट्टा न भी हो तो भी आप न घबरायें! आप उसकी क़मीज़ के काल़र रो पीछे से पकड़ कर खींचेंगी तो शर्ट का जो बटन लगाया हुआा है वह भी वही काम करेगा और  आपको अपने बचाव का मौक़ा मिल जायेगा!

5. यदि रात में कोई आपका पीछा करता है!

विशेषज्ञ का कहना है: किसी अभी नज़दीकी खुली दुकान या घर में घुस कर उन्हें अपनी परेशानी बतायें! यदि रात होने के कारण बन्द हों तो नज़दीक में एटीएम हो तो एटीएम बाक्स में घुस जायें क्योंकि वहाँ पर सीसीटीवी कैमरा सगे होते हैं! पहचान उजागर होने के भय से किसी की भी आप पर वार करने की हिम्मत  नहीं होगी!

आख़िरकार मानसिक रुप से ही जागरुक होना ही आपका आपके पास रहने वाला सबसे बड़ा हथियार सिद्ध होगा!

कृपया समस्त नारी शक्ति जिसका आपको ख़्याल है उन्हें न केवल बतायें बल्कि उन्हें जागरुक भी कीजिए! अपनी नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये ऐसा करना! न केवल हम सभी का नैतिक उत्तरदायित्व है बल्कि कर्त्तव्य भी है! 

प्रिय मित्रों इससे समस्त नारी शक्ति -अपनी माताश्री, बहन, पत्नी व महिला मित्रों को अवगत करावें!


आप सभी से विनम्र निवेदन की इस संदेश को महिला शक्ति की जानकारी में अवश्य लायें यह समस्त नारी शक्ति की सुरक्षा के लिये सहायक सिद्ध होगा!

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 2)

🔵 यों कर्मठ व्यक्तियों की हर क्षेत्र में आवश्यकता रहती है पर सामाजिक क्रान्ति के गृह-युद्ध में पग-पग पर मोर्चा जमाये अड़े रहने वाले सैनिकों जैसी क्रान्तिकारी भावनाएं जिनके अन्दर विद्यमान हों ऐसे लोगों का अस्तित्व हो आशा का केन्द्र बन सकता हैं। पिछले दिनों स्वाधीनता संग्राम ही राजनैतिक क्रान्ति हो कर चुकी है। उसमें मातृभूमि के लिये एक से एक बढ़ कर उत्सर्ग करने वाले, अहिंसक एवं हिंसात्मक संघर्ष में भाग लेने वाले अगणित क्रान्तिकारियों का तप त्यागपूर्ण व्यक्तित्व ही सफलता का आधार बना था। ठीक वैसी ही आवश्यकता इस सामाजिक क्रान्ति के लिये भी अभीष्ट होगी।

🔴 एक माता की गोद से बच्चा छूट कर नदी की प्रबल धारा में बहने लगा। माता अपने शिशु की प्राण रक्षा के लिये सहायता को चीत्कार कर रही हैं। ‘होशियार’ लोग मौखिक सहानुभूति तो दिखा रहे थे पर करने को कुछ भी तैयार न थे। उसी समय एक नव-युवक उफनती नदी में अपने प्राण हथेली पर रख कर कूदा और बहते बच्चे को पकड़ कर किनारे पर ले आया। इस युवक का नाम था अब्राहम लिंकन जो अपनी ऐसी ही महानताओं के कारण अमेरिका का प्रेसीडेण्ट हुआ।

🔵 आज विवाहों का अपव्यय एक ऐसी उफनती नदी बना हुआ है जिसमें सारे समाज की बालिकाएं बही चली जा रही हैं और प्रत्येक अभिभावक उनको बचाने के लिए चीत्कार कर रहा है। यह दृश्य हम सब देखते सुनते तो हैं। मौखिक विरोध और दुख भी प्रकट करते हैं पर करने की बारी आती है तो ‘अक्लमन्द’ लोगों की तरह पल्ला झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। ऐसे कुसमय ये स्वर्गीय अब्राहम की आत्मा देखती है कि उसके जैसे उदार और साहसी लोगों से भारत की भूमि रहित क्यों हो गई?

🔴 कोई प्राण हथेली पर लेकर नदी में कूदने और इन बच्चियों को बचाने के लिए क्यों तैयार नहीं होता? आत्मा के अमर और शरीर को नश्वर मानने वाले, गीता-पाठी लोगों में से मोह और लोभ को छोड़ कर धर्म के लिए कुछ साहस कर सकने वाले लोग क्यों कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते? इसका उत्तर युग की आत्मा हम से माँगती हैं और हम क्लीव, निर्जीव की तरह सिर नीचा किये मुरझाये- से खड़े हैं। इस धिक्कार योग्य स्थिति में पड़ी हुई अपनी पीढ़ी की मनोदशा पर आँसू ही बहाये जा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.51

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...