मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 10)

🌞 पहला अध्याय

🔴 काम क्रोधादि हमें इसलिए सताते हैं कि उनकी दासता हम स्वीकार करते हैं। जिस दिन हम विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देंगे, भ्रम अपने बिल में धँस जायगा। भेड़ों में पला हुआ शेर का बच्चा अपने को भेड़ समझता था, परन्तु जब उसने पानी में अपनी तस्वीर देखी तो पाया कि मैं भेड़ नहीं शेर हूँ। आत्म-स्वरूप का बोध होते ही उसका सारा भेड़पन क्षणमात्र में चला गया। आत्मदर्शन की महत्ता ऐसी ही है, जिसने इसे जाना उसने उन सब दुःख दारिद्रयों से छुटकारा पा लिया, जिनके मारे वह हर घड़ी हाय-हाय किया करता था।

🔴 जानने योग्य इस संसार में अनेक वस्तुएँ हैं पर उन सबमें प्रधान अपने आपको जानना है। जिसने अपने को जान लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों ने अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार किए हैं। प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई विद्युत शक्ति, ईथर शक्ति, परमाणु शक्ति आदि को ढूँढ़ निकाला है। अध्यात्म जगत के महान अन्वेषकों ने जीवन सिन्धु का मन्थन करके आत्मा रूपी अमृत उपलब्ध किया है। इस आत्मा को जानने वाला सच्चा ज्ञानी हो जाता है और इसे प्राप्त करने वाला विश्व विजयी मायातीत कहा जाता है।

🔵 इसलिए हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आपको जाने। मैं क्या हूँ, इस प्रश्न को अपने आपसे पूछे और विचार करे, चिन्तन तथा मननपूर्वक उसका सही उत्तर प्राप्त करे। अपना ठीक रूप मालूम हो जाने पर, हम अपने वास्तविक हित-अहित को समझ सकते हैं। विषयानुरागी अवस्था में जीव जिन बातों को लाभ समझता है, उनके लिए लालायित रहता है, वे लाभ आत्मानुरक्त होने पर तुच्छ एवं हानिकारक प्रतीत होने लगते हैं और माया लिप्त जीव जिन बातों से दूर भागता है, उसमें आत्म-परायण को रस आने लगता है। आत्म-साधन के पथ पर अग्रसर होने वाले पथिक की भीतरी आँखें खुल जाती हैं और वह जीवन के महत्वपूर्ण रहस्य को समझकर शाश्वत सत्य की ओर तेजी के कदम बढ़ाता चला जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 61)

🔵 स्वाधीन बनो! सभी उपायों से स्वाधीन बनो!! अपनी संभावनाओं तथा परमात्मा की कृपा पर विश्वास करो। दूसरों पर भरोसा तुम्हें  अधिकाधिक असहाय और दुःखी करेगा। यदि तुम स्वयं पर विश्वास नहीं करोगे तो अत्यन्त पीड़ादायक अनुभव तुम्हें वह करने के लिये बाध्य करेंगे। विधि के विधान में भावुकता या आत्मकरुणा के लिये कोई स्थान नहीं है। वह तुम्हारे पशुस्वभाव को खराद कर आध्यात्मिक आकार में बदल देगा। उसका एक मात्र उद्देश्य है तुम्हारे चरित्र में परिवर्तन करना।  

🔴 फिर विलम्ब क्यों? जिसकी अनुभूति इसी क्षण की जा सकती है उसे आगामी जन्म के लिये क्यों रख छोड़ो? निष्ठावान बनो। प्रचण्ड निष्ठावान बनो। अधिकारी या अनधिकारी होने का प्रश्न नहीं है। तुम्हारी  मुक्ति निश्चित है। क्योंकि उच्च जीवन में तुम्हें बलपूर्वक ठेल दिया जायगा। यही प्रत्येक व्यक्ति की नियति है। ईश्वरत्व को व्यक्त करना ही पड़ेगा।

🔵 उसी प्रकार एक आध्यात्मिक उदासीनता की भी आवश्यकता है। दिन भर में आनेवाली हजारों क्षुब्ध करने वाली घटनाओं की ओर क्यों ध्यान देते हो? स्वाधीन बनो। यह जान लो कि यह सब तुम्हारे उस पूर्वसंस्कार के महाप्रवाह की धाराएँ हैं जिनसे तुम्हें स्वयं को सदैव के लिये अलग कर लेना है। जो होता है होने दो, तुम्हारे विषय में लोग जो भी कहें कहने दो। तुम्हारे लिये यह सब मृगतृष्णा के समान हो जाना चाहिये। यदि सचमुच तुमने संसार का त्याग कर दिया है तो फिर तुम क्षुब्ध कैसे हो सकते हो! अपने आदर्श और प्रयत्नों में स्थिर रहो। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 गायत्री की दैनिक साधना (भाग 1)

🔴 निस्संदेह मन्त्रों में बहुत बड़ा बल मौजूद है और यदि कोई उनका ठीक ठीक उपयोग जान ले तो अपनी और दूसरों की बड़ी सेवा कर सकता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का कथन है कि -
मंत्र परम लघु जासुबस विधि हरिहर सुर सर्व।
महामत्त गजरात कहँ बस करि अंकुश खर्व॥


🔵 यों तो बहुत से मन्त्र हैं। उनके सिद्ध करने और प्रयोग करने के विधान अलग अलग हैं और फल भी अलग अलग हैं। परन्तु एक मंत्र ऐसा है जो सम्पूर्ण मन्त्रों की आवश्यकता को अकेला ही पूरा करने में समर्थ है। यह गायत्री मन्त्र है। गायत्री मन्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद चारों वेदों में है। इसके अतिरिक्त और कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जो चारों वेदों में पाया जाता हो। गायत्री वास्तव में वेद की माता है। तत्वदर्शी महात्माओं का कहना है कि गायत्री मन्त्र के आधार पर वेदों का निर्माण हुआ है, इसी महामन्त्र के गर्भ में से चारों वेद उत्पन्न हुए हैं। वेदों के मन्त्र दृष्टा ऋषियों ने जो प्रकाश प्राप्त किया है वह गायत्री से प्राप्त किया है।

🔴 गायत्री मन्त्र का अर्थ इतना गूढ़ गंभीर और अपरिमित है कि उसके एक एक अक्षर का अर्थ करने में एक एक ग्रन्थ लिखा जा सकता है। आध्यात्मिक, बौद्धिक, शारीरिक, साँसारिक, ऐतिहासिक, अनेक दिशाओं में उसका एक एक अक्षर अनेक प्रकार के पथ प्रदर्शन करता है। वह सब गूढ़ रहस्य यहाँ इन थोड़ी सी पंक्तियों के छोटे से लेख में लिखा नहीं जा सकता। यहाँ तो पाठकों को गायत्री का प्रचलित, स्थूल और सर्वोपयोगी भावार्थ यह समझ लेना चाहिए कि-तेजस्वी परमात्मा से सद्बुद्धि की याचना इस मन्त्र में की गई है।

🔵 श्रद्धापूर्वक इस मन्त्र की धारणा करने पर मनुष्य तेजस्वी और विवेकशील बनता है। गायत्री माता अपने प्रिय पुत्रों को तेज और बुद्धि का प्रसाद अपने सहज स्नेह वश प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त अनेक आपत्तियों का निवारण करने की शक्ति गायत्री माता में है। कोई व्यक्ति कैसी ही विपत्ति में फँसा हुआ हो यदि श्रद्धापूर्वक गायत्री की साधना करे तो उसकी आपत्तियाँ कट जाती हैं और जो कार्य बहुत कठिन तथा असंभव प्रतीत होते थे वे सहज और सरल हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1944 सितम्बर

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 9)

🌞 पहला अध्याय

🔵 जीवन को शुद्ध, सरल, स्वाभाविक एवं पुण्य-प्रतिष्ठा से भरा-पूरा बनाने का राजमार्ग यह है कि हम अपने आपको शरीर भाव से ऊँचा उठावें और आत्मभाव में जागृत हों। इससे सच्चे सुख-शांति और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। आध्यात्म विद्या के आचार्यों ने इस तथ्य को भली प्रकार अनुभव किया है और अपनी साधनाओं में सर्व प्रथम स्थान आत्मज्ञान को दिया है।

🔴 मैं क्या हूँ? इस प्रश्न पर विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मैं आत्मा हूँ। यह भाव जितना ही सुदृढ़ होता जाता है उतने ही उसके विचार और कार्य आध्यात्मिक एवं पुण्य रूप होते जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसी ही साधनाएँ निहित हैं जिनके द्वारा हम अपने आत्म स्वरूप को पहिचानें और हृदयंगम करें। आत्मज्ञान हो जाने पर वह सच्चा मार्ग मिलता है जिस पर चलकर हम जीवन लक्ष्य को, परमपद को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

🔵 आत्म स्वरूप को पहिचानने से मनुष्य समझ जाता है कि मैं स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर नहीं हूँ। यह मेरे कपड़े हैं। मानसिक चेतनाएँ भी मेरे उपकरण मात्र हैं। इनसे मैं बँधा हुआ नहीं हूँ। ठीक बात को समझते ही सारा भ्रम दूर हो जाता है और बन्दर मुट्ठी का अनाज छोड़ देता है। आपने यह किस्सा सुना होगा कि एक छोटे मुँह के बर्तन में अनाज जमा था। बन्दर ने उसे लेने के लिए हाथ डाला और मुट्ठी में भरकर अनाज निकालना चाहा। छोटा मुँह होने के कारण वह हाथ निकल न सका, बेचारा पड़ा-पड़ा चीखता रहा कि अनाज ने मेरा हाथ पकड़ लिया है, पर ज्योंही उसे असलियत का बोध हुआ कि मैंने मुट्ठी बाँध रखी है, इसे छोड़ूँ तो सही। जैसे ही उसने उसे छोड़ा कि अनाज ने बन्दर को छोड़ दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1.3

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 60)

🔵 मानसिक तथा नैतिक अनुभवों के महत् सातत्य पर विचार करो। तब तुम्हारे सामने यह स्पष्ट हो जायेगा कि जब तक प्रगति पूर्णता में पर्यवसित नहीं होती तब तक मनुष्य का पुन: पुन: जन्म होता ही रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों, इच्छाओं तथा कर्मों द्वारा एक एक संसार का निर्माण कर रहा है जिसका कि वह स्वयं शासक होगा। वस्तुगत अनुभवों के समुद्र की तलहटी का स्पर्श कर तथा उससे परे व्यक्तिगत चेतना के शुद्ध आत्मा की अनुभूति के प्रयत्न में जीव को एक नहीं असंख्य शरीर धारण करने पड़ते है।

🔴 सिद्धियों तथा कोरी विद्या की इच्छा का दमन करो। मिथ्याज्ञान का बढ़ना तथा सिद्धियाँ प्राप्त करना अपने आप में विनाशकारी हैं क्योंकि वे अहंकार को बढ़ाते हैं तथा व्यक्ति को अधिक स्वार्थी बना देते हैं। चेतना का विभिन्न प्रकार से विस्तार आध्यात्मिक प्रक्रिया की एक मानी हुई घटना है। किन्तु यह पूर्णता: आनुसंगिक है। परन्तु जब इसे ही आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य श्रेष्ठ मान लिया जाता है तब यह साधना के मार्ग में हजारों गुण अधिक बाधा उत्पन्न कर देता है।

🔵 जैसे कि तुम एक पागल कुत्ते से सावधान रहते हो उसी प्रकार अहंकार से सावधान रहो। जिस प्रकार कि तुम विष का स्पर्श नहीं करोगे या विषधर साँप से नहीं खेलोगे, उसी प्रकार सिद्धियों, तथाकथित सिद्धियों से दूर रहो। अपने मन तथा बुद्धि की सभी शक्तियों को ईश्वर की ओर मोड़ दो। आध्यात्मिक जीवन का और क्या लक्ष्य होगा ?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 8)

🌞 पहला अध्याय

🔵 आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है।

🔴 इस प्रकार शरीर भावी व्यक्ति का जीवन पाप की ओर, पशुत्व की ओर चलता है और आत्मभावी व्यक्ति का जीवन प्रवाह पुण्य की ओर, देवत्व की ओर प्रवाहित होता है। यह सर्व विदित है कि इस लोक और परलोक में पाप का परिणाम दुःखदाई और पुण्य का परिणाम सुखदाई होता है। अपने को आत्मा समझने वाले व्यक्ति सदा आनन्दमयी स्थिति का रसास्वादन करते हैं।

🔵 जिसे आत्मज्ञान हो जाता है वह छोटी घटनाओं से अत्यधिक प्रभावित, उत्तेजित या अशान्त नहीं होता। लाभ-हानि, जीवन-मरण, विरह-विछोह, मान-अपमान, लोभ-मोह, क्रोध, काम, भोग, राग-द्वेष आदि की कोई घटना उसे अत्यधिक क्षुभित नहीं करती, क्योंकि वह जानता है कि यह सब परिवर्तनशील संसार में नित्य का स्वाभाविक क्रम है।

🔴 मनोवांछित वस्तु या स्थिति सदा प्राप्त नहीं होती, कालचक्र के परिवर्तन के साथ-साथ अनिच्छित घटनाएँ भी घटित होती रहती हैं, इसलिए उन परिवर्तनों को एक मनोरंजन की तरह, नाट्य रंगमंच की तरह, कौतूहल और विनोद की तरह देखता है। किसी अनिच्छित स्थिति को सामने आया देखकर वह बेचैन नहीं होता। आत्मज्ञानी उन मानसिक कष्टों से सहज ही बचा रहता है जिनसे शरीर भावी लोग सदा व्यथित और बेचैन रहते हैं और कभी-कभी तो अधिक उत्तेजित होकर आत्महत्या जैसे दुःखद परिणाम उपस्थित कर लेते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1.3

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 7)

🔴 पहला अध्याय

🔵 इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। आत्मा के स्वार्थ के सत्कर्मों में शरीर को भी कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं। तप, त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों में शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दुःख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। 

🔴 इन दो विरोधी तत्त्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदाएँ, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है। यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं।

🔵 वैसे उनकी मनःस्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्त्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्त्व को बर्बाद कर दिया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 6)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 बाहरी दुनियाँ में मुलजिम को सजा दिलाने का काम दो महकमों के आधीन है, एक पुलिस, दूसरा अदालत। पुलिस तो मुलजिम को पकड़ ले जाती है और उसके कामों का सबूत एकत्रित करके अदालत के सामने पेश करती है, फिर अदालत का महकमा अपना काम करता है। जज महाशय अपराध और अपराधी की स्थिति के बारे में बहुत दृष्टियों से विचार करते हैं, तब जैसा उचित होता है वैसा फैसला करते हैं। एक ही जुर्म में आए हुए अपराधियों को अलग-अलग तरह की सजा देते हैं। तीन खूनी पकड़ कर लाए गए, इनमें से एक को बिल्कुल बरी कर दिया, दूसरे को पाँच साल की सजा मिली, तीसरे को फाँसी।

🔵 हत्या तीनों ने की थी, पर सजा देते वक्त मजिस्ट्रेट ने बहुत बातों पर विचार किया। जिसे बरी कर दिया गया था, वह मकान बनाने वाला मजदूर था, छत पर काम करते वक्त पत्थर का टुकड़ा उसके हाथ से अचानक छूट गया और वह नीचे सड़क पर चलते एक मुसाफिर के सिर में लगा, सिर फट गया, मुसाफिर की मृत्यु हो गई। जज ने देखा की हत्या तो अवश्य हुई, मजदूर निर्दोष है, उसने जान-बूझकर बुरे इरादे से पत्थर नहीं फेंका था, इसलिए उसे बरी कर दिया गया। दूसरा मुलजिम एक किसान था। खेत काटते हुए चोर को ऐसी लाठी मारी कि वह मर गया। मजिस्ट्रेट ने सोचा-चोरी होते देखकर गुस्सा आना स्वाभाविक है, पर किसान की इतनी गलती है कि मामूली अपराध पर इतना नहीं मारना चाहिए था, इसलिए उसे पाँच साल की सजा मिली। तीसरा मुलजिम एक मशहूर डाकू था। एक धनी पुरुष के घर में रात को घुस गया और उसका कत्ल करके धन-माल चुरा लाया। इसका अपराध जघन्य था इसलिए फाँसी की सजा दी गई।

🔴 तीनों ही अपराधियों ने खून किया था, जुर्म का बाहरी रूप एक-सा था, पर मजिस्ट्रेट सूक्ष्मदर्शी होता है, वह बाहरी बातों को देखकर ही सजा नहीं दे डालता वरन् भीतरी बारीकियों पर भली प्रकार विचार करके तब कुछ फैसला करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 6)

🔴 पहला अध्याय

🔵 जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरुचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल एवं अनीति भरे दुष्कर्म करते हुए अन्तःकरण में एक प्रकार का कुहराम मच जाता है, पाप करते हुए पाँव काँपते हैं और कलेजा धड़कता है इसका तात्पर्य यह है कि इन कामों को आत्मा नापसन्द करता है।

🔴 यह उसकी रुचि एवं स्वार्थ के विपरीत है। किन्तु जब मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है। आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसी की आवाज पर चलने वाले सदा पुण्य कर्मी होते हैं। पाप की ओर उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती इसलिए वैसे काम उनसे बन भी नहीं पड़ते।

🔵  आत्मा को तत्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्गति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख-शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकट्ठा करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 59)

गुरुदेव की वाणी ने पुन: मेरी आत्मा से कहा: -

🔵 अपने शरीर से ऐसा व्यवहार करो मानों वह तुमसे भिन्न कोई है। यदि तुम उससे कहो कि ऐसा कर तो वह करेगा। आचार्य ने कहा अंगीठी की सजावट के ऊपर की घड़ी के समान स्वयं को बैठे हुए कल्पना करो तथा तुम्हारे अपने आने जाने को देखो। तुम पाओगे कि उनमें से अधिकांश कितने व्यर्थ तथा निरर्थक हैं। अत: तात्कालिक घटनाओं को अनावश्यक महत्त्व न दो, न ही उनसे आसक्त होओ। यदि भौतिक वस्तुओं का अध्यात्मीकरण नहीं कर सकते तो उनकी उपेक्षा करो।

🔴 दैनंदिन जीवन में आध्यात्मिकता को लाना अवश्य ही बहुत कठिन है, किन्तु परीक्षा वही है। केवल (आध्यात्मिक) ऊँचाइयों में ही नहीं (सांसारिक परिस्थितियों) घाटियों में भी ईश्वर को अपने सामने देखना होगा। सचमुच वह मन कितना एकाग्र होता है जो कि साधारण परिस्थितियों में भी आध्यात्मिकता की झलक देख सकता है।

🔵 अहंकार के थोड़े से भी चिह्न को उखाड़ फेंको। जितना अधिक तुम अपने व्यक्तित्व का अध्ययन करोगे उतना ही अधिक तुम पाओगे कि तुम्हारे कार्यों तथा विचारों में अहंकार ही दौड़ा आ रहा है। अहंकार को केवल जीतना ही नहीं होगा अपितु उसका पूर्णतः दमन करना होगा। आत्मदोष तथा आत्माग्लानि में भी इस दमित अहंकार का अस्तित्व दीख पड़ता है। सच्चा आत्मसाक्षात्कारी पुरुष न तो दूसरों को दोष देता है ने -स्वयं को ही। महत् वस्तुओं से आवृत होने के कारण वह परिस्थितियों की उपेक्षा करता है।

🔴 अपने को मरा हुआ देखो। जीवित अवस्था में भी स्वयं को शरीर से भिन्न कर लो। वस्तुओं के रूप नहीं उनकी आत्मा को देखो। तब तुम्हारी नई और शुद्ध दृष्टि में समस्त जीवन एक नये आलोक में दीख पड़ेगा तथा तुम्हारे सामने उच्चतर और नये रूप में उद्भासित होगा। एकदम नये आध्यात्मिक रूपों में।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 5)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 पिछली पंक्तियों में पाठक पढ़ चुके हैं कि हमारा गुप्त चित्र अंतर्मन ही निरंतर चित्रगुप्त देवता का काम करता रहता है। जो कुछ भले या बुरे काम हम करते हैं, उनका सूक्ष्म चित्र उतार-उतार कर अपने भीतर जमा करता रहता है। सिनेमा की पर्दे पर मनुष्य की बराबर लम्बी-चौड़ी तस्वीर दिखाई देती है, पर उसका फिल्म केवल एक इंच ही चौड़ा होता है। इसी प्रकार पाप-पुण्य का घटनाक्रम तो विस्मृत होता है, पर उसका सूक्ष्म चित्र एक पतली रेखा मात्र के भीतर खिंच जाता है और वह रेखा गुप्त मन के किसी परमाणु पर अदृश्य रूप से जमकर बैठ जाती है। शार्टहैंड लिखने वाले बड़ी बात को थोड़ी सी उल्टी-सीधी लकीरों के इशारे पर जरा से कागज पर लिख देते हैं। कर्मरेखा को ऐसी ही दैवी शार्टहैंड समझा जा सकता है।

🔵 पाठकों को इतनी जानकारी तो बहुत पहले हो चुकी होगी कि मन के दो भाग हैं- एक बहिर्मन, दूसरा अंतर्मन। बाहरी मन तो तर्क-वितर्क करता है, सोचता है, काट-छाँट करता है, निर्णय करता है और अपने इरादों को बदलता रहता है, पर अंर्तमन भोले-भाले किंतु दृढ़ निश्चयी बालक के समान है, वह काट-छाँट नहीं करता वरन् श्रद्धा और विश्वास के आधार पर काम करता है। बाहरी मन तो यह सोच सकता है कि पाप कर्मों की रेखाएँ अपने ऊपर अंकित होने न दूँ और पुण्य कर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर अंकित करूँ। जिससे पाप फल न भोगना पड़े और पुण्य फल का भरपूर आनंद प्राप्त हो, परंतु भीतरी मन ऐसा नहीं है।

🔴 यह सत्यनिष्ठ जज की तरह फैसला करता है, कोई लोभ, लालच, भय, स्वार्थ उसे प्रभावित नहीं करता। कहा जाता है कि मनुष्य के अंदर एक ईश्वरीय शक्ति रहती है, दूसरी शैतानी। आप गुप्त मन को ईश्वरीय शक्ति और तर्क, मन, छल-कपट, स्वार्थ, लोभ में रत रहने वाले बाह्य मन को शैतानी शक्ति कह सकते हैं। बाहरी मन धोखेबाजी कर सकता है, परंतु भीतरी मन तो सत्य रूपी आत्मा का तेज है, वह न तो मायावी आचरण करता है, न छल-कपट। निष्पक्ष रहना उसका स्वभाव है। इसलिए ईश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण कार्य सौंपा है। दुनिया उसे चित्रगुप्त देवता कहती है। यदि वह भी पक्षपात करता, तो भला इतनी ऊँची जज की पदवी कैसे पा सकता था? हमारा गुप्त मन खुफिया जासूस की तरह हर घड़ी साथ-साथ रहता है और जो-जो भले-बुरे काम किए जाते हैं, उनका ऐमालनामा अपनी खुफिया डायरी में दर्ज करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 5)*

🔴 पहला अध्याय

🔵 आत्मा शरीर से पृथक् है। शरीर और आत्मा के स्वार्थ भी पृथक हैं। शरीर के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व इन्द्रियाँ करती हैं। दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन यह सदा ही शारीरिक दृष्टिकोण से सोचते और कार्य करते हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया वस्त्र, सुन्दर-सुन्दर मनोहर दृश्य, मधुर श्रवण, रूपवती स्त्री, नाना प्रकार के भोग-विलास यह इन्द्रियों की आकांक्षाएँ हैं।

🔴 ऊँचा पद, विपुल धन, दूर-दूर तक यश, रौब, दाब यह सब मन की आकांक्षाएँ हैं। इन्हीं इच्छाओं को तृप्त करने में प्रायः सारा जीवन लगता है। जब यह इच्छाएँ अधिक उग्र हो जाती हैं तो मनुष्य उनकी किसी भी प्रकार से तृप्ति करने की ठान लेता है और उचित-अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने स्वार्थ साधने की नीति पर उतर आता है। यही समस्त पापों का मूल केन्द्र बिन्दु है।

🔵 शरीर भाव में जाग्रत रहने वाला मनुष्य यदि आहार, निद्रा, भय, मैथुन के साधारण कार्यक्रम पर चलता रहे तो भी उस पशुवत जीवन में निरर्थकता ही है, सार्थकता कुछ नहीं। यदि उसकी इच्छाएँ जरा अधिक उग्र या आतुर हो जायें तब तो समझिये कि वह पूरा पाप पुंज शैतान बन जाता है, अनीतिपूर्वक स्वार्थ साधने में उसे कुछ भी हिचक नहीं होती। इस दृष्टिकोण के व्यक्ति न तो स्वयं सुखी रहते हैं और न दूसरों को सुखी रहने देते हैं।

🔴 काम और लोभ ऐसे तत्त्व हैं कि कितना ही अधिक से अधिक भोग क्यों न मिले वे तृप्त नहीं होते, जितना ही मिलता है उतनी ही तृष्णा के साथ-साथ अशान्ति, चिन्ता, कामना तथा व्याकुलता भी दिन दूनी और रात चौगुनी होती चलती है। इन भोगों में जितना सुख मिलता है उससे अनेक गुना दुःख भी साथ ही साथ उत्पन्न होता चलता है। इस प्रकार शरीर भावी दृष्टिकोण मनुष्य को पाप, ताप, तृष्णा तथा अशान्ति की ओर घसीट ले जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 58)

🔵 संसार जो अशांति का समुद्र है उसमें एक चट्टान की तरह के रहो। विविधता के इस असीम जंगल में सिंह के समान विचरण करो। सर्वशक्तिमत्ता तुम्हारे पीछे है, किन्तु पहले सांसारिक या केवल भौतिक शक्ति प्राप्ति की सभी इच्छाओं का दमन करो। तुम्हारे मार्ग में आने वाली माया की सभी बाधाओं को वैराग्य के खड्ग से दो टुकडे़ कर डालो। किसी पर शासन न करो।  किसी को तुम पर शासन न करने दो ।

🔴 मृत्यु से न डरो क्योंकि इसी क्षण भी मृत्यु तुम्हारा प्राण हरण कर ले तो भी यह जान रखो कि तुम सही मार्ग पर हो। अत: निर्भय हो कर बढ़ चलो। महत् जीवन में मृत्यु एक घटना मात्र है। मृत्यु के परे भी आध्यात्मिक उन्नति की सुविधायें और संभावनायें हैं। व्यक्ति क्या हो सकता है इसका कोई अन्त नहीं। सब कुछ व्यक्तिगत प्रयत्न पर निर्भर करता हैं। ईश्वर की कृपा तो -सदैव हमारे साथ है ही।

🔵 अपने आसपास की सभी वस्तुओं का अध्ययन करो। और तुम पाओगे कि प्रत्येक वस्तु में तुम्हारे लिये एक आध्यात्मिक सन्देश है। एक की ही सर्वोपरि सत्ता है। वह एक जो अनेक के प्रत्येक पक्ष में विद्यमान है। विविधता अपने विक्षेपकारी भेदों द्वारा भले ही तुम्हें छलती रहे तब भी तुम सर्वव्यापी एकत्व की पूजा करो। आभास छलता है जैसी कि कहावत है। किन्तु मनुष्य का यह कर्त्तव्य है की वह छल को पकड़े तथा सभी आभासों के पीछे के सत्य का दर्शन करे।

🔴 प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों का अभिरक्षक है, प्रत्येक व्यक्ति अपने बंधन को तोड़ने वाला है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने लिये सत्य की खोज करनी होगी। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही भूमि पर खड़ा है। प्रत्येक को अपना युद्ध स्वयं लड़ना होगा। क्योंकि अनुभूति सदैव पूर्णत: व्यक्तिगत अनुभव ही है। अन्ततोगत्वा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं का उद्धारकर्ता तथा स्वामी है। क्योंकि परमात्मा जो सर्वदा वर्तमान है वह पूर्ण एकत्व के रूप में व्यक्तित्व के प्रत्येक अंश में उद्भासित हो उठेगा। यही उपदेश है। इसकी ही अनुभूति करनी है और इसकी अनुभूति होने पर वह महान्- लक्ष्य (ईश्वर दर्शन) भी प्राप्त हो जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

💎 चार कीमती रत्न 💎

1~ पहला रत्न है: "माफी"🙏
 
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

2~ दूसरा रत्न है: "भूल जाना"🙂

अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~ तीसरा रत्न है: "विश्वास"�

हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना। यही सफलता का सूत्र है।

4~ चौथा रत्न है: "वैराग्य"

हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निश्चित ही हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए बिना लिप्त हुवे जीवन का आनंद लेना। वर्तमान में जीना।💫

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शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 57)

🔵 अपनी जड़ता से स्वयं को जगाओ। अपने संपूर्ण स्वभाव का पुनर्निर्माण करो। सर्वव्यापी सौंदर्य के प्रति अपनी आँखे खोलो। प्रकृति  से संपर्क करो। बहुत सी बातें जो तुम्हें अभी ज्ञात नहीं हैं, वह प्रकृति तुम्हें सिखा देगी। वह तुम्हें व्यक्तित्व की महान शांति प्रदान करेगी। तुम्हारे चारों ओर के दृश्य में अदृश्य परमात्मा को देखो। साक्षी बनो। कर्त्ता कर्मफल के भार से दबा होता है। यदि तुम्हें कर्म करना ही फड़े तो कर्म में भी साक्षी बनो।

🔴 आत्मनिरीक्षण तथा आत्मसाक्षात्कार के अतिरिक्त और किसी बात की चिंता न करो तुममें जो सर्वश्रेष्ठ है उसे करो। दूसरों के मतामत की ओर ध्यान न दो। शक्तिशाली बनो। अपने स्वयं की आत्मा को गुरु बनाओ। महान् आदर्श तथा विचारों से उसे लबालब भर दो जिससे कि वह स्वयं सर्वोच्च परमात्मा को अभिव्यक्त करने के लिये व्याकुल हो उठे। एक बार सशक्त हो उठने पर वह स्वयं जाग उठेगा। तब स्वप्न में भी न सोची गई वस्तुएँ तुम्हारे सामने उद्घाटित हो उठेंगी।

🔵 निन्दा से बचो। क्या तुम अपने बंधु के रखवाले हो ? क्या तुम उसके कर्मों के संरक्षक हो ? किसने तुम्हें उसका निर्णायक बनाया है? दूसरों के अनुचित आचरण की सूक्ष्म स्मृति तक को पोंछ डालो। अपने स्वयं की चिन्ता करो। तुम स्वयं में ही बहुत सी निन्दनीय बातें पाओगे। साथ ही बहुत सी ऐसी भी बातें पाओगे जो तुम्हें आनन्द देंगी। प्रत्येक व्यक्ति का उसके अपने आप में उसका अपना संसार होना चाहिये।

🔴 तुम्हारे भीतर के (निम्न) मनुष्य को मर जाने दो जिससे कि परमात्मा प्रकाशित हो सके। किसी भी बात की चिन्ता न कर शांति से रहना क्या अच्छा नहीं है ? मनुष्य पर आस्था न रखो। आस्था रखो भगवान पर। वे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे तथा तुम्हें आगे ले जायेंगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 4)

 🔴 पहला अध्याय

🔵 मनुष्य शरीर में रहता है, यह ठीक है, पर यह भी ठीक है कि वह शरीर नहीं है। जब प्राण निकल जाते हैं तो शरीर ज्यों का त्यों बना रहता है, उसमें से कोई वस्तु घटती नहीं तो भी वह मृत शरीर बेकाम हो जाता है। उसे थोड़ी देर रखा रहने दिया जाय तो लाश सड़ने लगती है, दुर्गन्ध उत्पन्न होती है और कृमि पड़ जाते हैं। देह वही है, ज्यों की त्यों है, पर प्राण निकलते ही उसकी दुर्दशा होने लगती है। इससे प्रकट है कि मनुष्य शरीर में निवास तो करता है पर वस्तुतः वह शरीर से भिन्न है। इस भिन्न सत्ता को आत्मा कहते हैं। वास्तव में यही मनुष्य है। मैं क्या हूँ? इसका सही उत्तर यह है कि मैं आत्मा हूँ।
🔴 शरीर और आत्मा की पृथकता की बात हम लोगों ने सुन रखी है। सिद्घान्ततः हम सब उसे मानते भी है। शायद कोई ऐसा विरोध करे कि देह से जीव पृथक नहीं है, इस पृथकता की मान्यता सिद्घान्त रूप से जैसे सर्व साधारण को स्वीकार है, वैसे ही व्यवहार में सभी लोग उसे अस्वीकार करते हैं। लोगों के व्यवहार ऐसे होते हैं मानो वे वस्तुतः शरीर ही हैं। शरीर के हानि-लाभ उनके हानि-लाभ हैं। किसी व्यक्ति का बारीकी के साथ निरीक्षण किया जाय और देखा जाय कि वह क्या सोचता है? क्या कहता है? और क्या करता है? तो पता चलेगा कि वह शरीर के बारे में सोचता है, उसी के सम्बन्ध में सम्भाषण करता है और जो कुछ करता है, शरीर के लिए करता है। शरीर को ही उसने 'मैं' मान रखा है।

🔵 शरीर आत्मा का मन्दिर है। उसकी स्वस्थता, स्वच्छता और सुविधा के लिए कार्य करना उचित एवं आवश्यक है, परन्तु यह अहितकर है कि केवल मात्र शरीर के ही बारे में सोचा जाय, उसे अपना स्वरूप मान लिया जाय और अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया जाय। मनुष्य अपने आपको शरीर मान लेने के कारण शरीर के हानि-लाभों को भी अपने हानि-लाभ मान लेता है और अपने वास्तविक हितों को भूल जाता है। यह भूल-भुलैया का खेल जीवन को बड़ा कर्कश और नीरस बना देता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 4)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 भले-बुरे कर्मों का ग्रे मैटर के परमाणुओं पर यह रेखांकन (जिसे प्रकट के शब्दों में अंतःचेतना का संस्कार कहा जा सकता है) पौराणिक चित्रगुप्त की वास्तविकता को सिद्ध कर देता है। चित्रगुप्त शब्द के अर्थों से भी इसी प्रकार की ध्वनि निकलती है। गुप्त चित्र, गुप्त मन, अंतःचेतना, सूक्ष्म मन, पिछला दिमाग, भीतर चित्र इन शब्दों के भावार्थ को ही चित्रगुप्त शब्द प्रकट करता हुआ दीखता है। ‘चित्त’ शब्द को जल्दी में लिख देने से ‘चित्र’ जैसा ही बन जाता है। सम्भव है कि चित्त का बिगाड़ कर चित्र बन गया हो या प्राचीनकाल में चित्र को चित्त और चित्र एक ही अर्थ के बोधक रहे हों। कर्मों की रेखाएँ एक प्रकार के गुप्त चित्र ही हैं, इसलिए उन छोटे अंकनों में गुप्त रूप से, सूक्ष्म रूप से, बड़े-बड़े घटना चित्र छिपे होते हैं, इस क्रिया प्रणाली को चित्रगुप्त मान लेने से प्राचीन शोध का समन्वय हो जाता है।

🔵 यह चित्रगुप्त निःसंदेह हर प्राणी के हर कार्य को, हर समय बिना विश्राम किए अपनी बही में लिखता रहता है। सबका अलग-अलग चित्रगुप्त है। जितने प्राणी हैं, उतने ही चित्रगुप्त हैं, इसलिए यह संदेह नहीं रह जाता कि इतना लेखन कार्य किस प्रकार पूरा हो पाता होगा। स्थूल शरीर के कार्यों की सुव्यवस्थित जानकारी सूक्ष्म चेतना में अंकित होती रहे, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ‘पौराणिक चित्र गुप्त एक है और यहाँ अनेक हुए’ यह शंका भी कुछ गहरी नहीं है। घटाकाश, मठाकाश का ऐसा ही भेद है। इंद्र, वरुण, अग्नि, शिव, यम, आदि देवता बोधक सूक्ष्मत्व व्यापक समझे जाते हैं। जैसे बगीचे की वायु गंदे नाले की वायु आदि स्थान भेद से अनेक नाम वाली होते हुए भी मूलतः विश्व व्यापक वायु तत्व एक ही है, वैसे ही अलग-अलग शरीरों में रहकर अलग-अलग काम करने वाला चित्रगुप्त देवता भी एक ही तत्त्व है।

🔴  यह हर व्यक्ति के कर्मों लेखाकिस आधार पर कैसा, किस प्रकार, कितना, क्यों लिखता है? यह अगली पंक्तियों में बताया जाएगा एवं चित्रगुप्त द्वारा लिखी हुई कर्म रेखाओं के आधार पर स्वर्ग-नरक का विवरण और उनके प्राप्त होने की व्यवस्था पर प्रकाश डाला जाएगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 3)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 आधुनिक शोधों ने उपरोक्त अलंकारिक कथानक में से बड़ी ही महत्वपूर्ण सच्चाई को खोज निकाला है, डॉक्टर फ्राइड ने मनुष्य की मानसिक रचना का वर्णन करते हुए बताया है कि जो भी भले या बुरे काम ज्ञानवान प्राणियों द्वारा किए जाते हैं, उनका सूक्ष्म चित्रण अंतः चेतना में होता रहता है। ग्रामोफोन के रिकार्डों में रेखा रूप में गाने भर दिए जाते हैं। संगीतशाला में नाच-गाना हो रहा है और साथ ही अनेक बाजे बज रहे हैं, इन अनेक प्रकार की ध्वनियों का विद्युत शक्ति से एक प्रकार का संक्षिप्त एवं सूक्ष्म एकीकरण होता है और वह रिकार्ड में जरा-सी जगह में रेखाओं की तरह अंकित होता जाता है।

🔵 तैयार किया हुआ रिकार्ड रखा रहता है वह तुरंत ही अपने आप या चाहे जब नहीं बजने लगता वरन तभी उन संग्रहीत ध्वनियों को प्रकट करता है, जब ग्रामोफोन की मशीन पर उसे घुमाया जाता है और सुई की रगड़ उन रेखाओं से होती है। ठीक इसी प्रकार भले और बुरे जो भी काम किए जाते है, उनकी सूक्ष्म रेखाएँ अंतः चेतना के ऊपर अंकित होती रहती हैं और मन के भीतरी कोने में धीरे-धीरे जमा होती जाती हैं। जब रिकार्ड पर सुई का आघात लगता है, तो उसमें भरे हुए गाने प्रकट होते हैं। इसी प्रकार गुप्त मन में जमा हुई रेखाएँ किसी उपयुक्त अवसर का आघात लगने पर ही प्रकट होती हैं। भारतीय विद्वान् ‘कर्म रेखा’ के बारे में बहुत प्राचीनकाल से जानकारी रखते आ रहे हैं। ‘कर्म रेख नहिं मिटे, करे कोई लाखन चतुराई’ आदि अनेक युक्तियाँ हिंदी और संस्कृत साहित्य में मौजूद हैं, जिनसे प्रकट होता है कि कर्मों की कई रेखाएँ होती हैं,जो अपना फल दिए बिना मिटती नहीं।

🔴 भाग्य के बारे में मोटे तौर से ऐसा समझा जाता है कि सिर की अगली मस्तक वाली हड्डी पर कुछ रेखाएँ ब्रह्मा लिख देता है और विधि के लेख को मेंटनहारा अर्थात् उन्हें मिटाने वाला कोई नहीं है। डॉक्टर वीबेन्स ने मस्तिष्क में भरे हुए ग्रे मैटर (भूरा चर्बी जैसा पदार्थ) का सूक्ष्म दर्शक यंत्रों की सहायता से खोज करने पर वहाँ के एक-एक परमाणु में अगणित रेखाएँ पाई हैं, यह रेखाएँ किस प्रकार बनती हैं, इसका कोई शारीरिक प्रत्यक्ष कारण उन्हें नहीं मिला, तब उन्होंने अनेक मस्तिष्कों के परमाणुओं का परीक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला की अक्रिय, आलसी एवं विचार शून्य प्राणियों में यह रेखाएँ बहुत ही कम बनती हैं, किंतु कर्मनिष्ठ एवं विचारवानों में इनकी संख्या बहुत बड़ी होती है। अतएव यह रेखाएँ शारीरिक और मानसिक कार्यों को संक्षिप्त और सूक्ष्म रुप से लिपिबद्ध करने वाली प्रमाणित हुईं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.1

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 3)


🔴 पहला अध्याय

🔵 जब वह समझ जाता है कि मैं क्या हूँ तब उसे वास्तविक ज्ञान हो जाता है और सब पदार्थों का रूप ठीक से देखकर उसका उचित उपयोग कर सकता है। चाहे किसी दृष्टि से देखा जाय आत्मज्ञान ही सर्वसुलभ और सर्वोच्च ठहरता है।

🔴 किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि आप कौन हैं? तो वह अपने वर्ण, कुल, व्यवसाय, पद या सम्प्रदाय का परिचय देगा। ब्राह्मण हूँ, अग्रवाल हूँ, बजाज हूँ, तहसीलदार हूँ, वैष्णव हूँ आदि उत्तर होंगे। अधिक पूछने पर अपने निवास स्थान, वंश व्यवसाय आदि का अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा। प्रश्न के उत्तर के लिए ही यह सब वर्णन हों सो नहीं, उत्तर देने वाला यथार्थ में अपने को वैसा ही मानता है। शरीर-भाव में मनुष्य इतना तल्लीन हो गया है कि अपने आपको वह शरीर ही समझने लगा है।

🔵 वंश, वर्ण, व्यवसाय या पद शरीर का होता है। शरीर मनुष्य का एक परिधान, औजार है। परन्तु भ्रम और अज्ञान के कारण मनुष्य अपने आपको शरीर ही मान बैठता है और शरीर के स्वार्थ तथा अपने स्वार्थ को एक कर लेता है। इसी गड़बड़ी में जीवन अनेक अशान्तियों, चिन्ताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part1

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 56)

और तब गुरुदेव की वाणी ने कहा:-

🔵 वत्स! स्वयं को अन्तरतम में निविष्ट करो। बाह्य वस्तुएँ तीर और बर्छी के समान हैं जो आत्मा में खरोंचें लगाती हैं। अपनी अन्तरात्मा को अपना निवास स्थान बनाओ। सोलोमन महान ने ठीक ही कहा है - निस्सार वस्तुओं का अभिमान! सभी कुछ निस्सार है। सचमुच ऐसा ही है। मृत्यु के क्षणों में समस्त संसार का धन किस काम का है? उपनिषद के प्रसिद्ध नचिकेता ने कितना अच्छा कार्य किया। त्याग से प्राप्त होने वाली विजय के द्वारा उसने स्वयं यम को जीत लिया। सभी कुछ, जिनका रूप है अवश्य नष्ट होंगे। यही सभी रूपों की नियति है। मन भी एक रूप है इसका भी परिवर्तन तथा विघटन अनिवार्य है। इसलिये तुम नाम रूप के परे जाओ।

🔴 सर्वोच्च दृष्टिकोण से किसी भी वस्तु का उतना मूल्य नहीं है। सर्वोच्च अर्थ में एक बार यदि तुमने अपने हृदय को प्रभु को समर्पित कर दिया तो फिर तुम्हें कोई भी वस्तु बाँध नहीं सकती। इससे तुम्हारे मन में स्वाधीनता तथा विस्तार का भाव आना चाहिये। प्रेम सबसे बड़ी शक्ति है। प्रेम की शक्ति के द्वारा प्रेमास्पद को ढाँकने वाले सभी पर्दों को चीर दिया जा सकता है।

🔵 मन को शुद्ध करो। मन को शुद्ध करो!! यही धर्म का सर्वस्व है। धर्म का यही एक मात्र अर्थ है। सर्वोच्च दिशा में विचारों के सतत प्रवाह का अभ्यास करो। लक्ष्य की स्थिरता का अधिकाधिक विकास करो, तब कोई भी वस्तु तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगी। जिस प्रकार चील उड़ती है उसी सरलता से तुम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकोगे। अहो! यदि कोई सतत परमात्मा का चिन्तन कर सके तो वह स्वयं अपने आप में मुक्ति होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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