मंगलवार, 15 मार्च 2016

 

इन सबका प्राण तो मैंने सिखाया भी नहीं था। मैं चाहता था कि चलते- चलते इनका प्राण सिखा जाऊँ ,, ताकि आपका अध्यात्म जीवंत हो सके ; ताकि आपकी उपासना जीवंत हो सके और जीवंत उपासना का जो लाभ आपको मिलना चाहिए, वह लाभ आपको मिलने मे समर्थ हो सके और आप अपनी जिंदगी में यह अनुभव कर सकें कि हमको कोई ऐसी चीज बताई गई थी। अगर हमने नहीं की तो ठीक है, लेकिन की तो उसका पूरे का पूरा फायदा उठाया। हम आपको ऐसा ही अध्यात्म सिखाने के इच्छुक हैं। आपको ऐसा अध्यात्म सीखना चाहिए और ऐसा अध्यात्म जानना चाहिए।

मित्रो ! अध्यात्म में आत्मशोधन पहली प्रकिया है। पंचमुखी गायत्री के पाँच मुखों को पाँच दिशाओं, पाँच धाराओं, गायत्री उपासना के पाँच टुकड़ों में बाँट दिया गया है। इसमें तीन चरण हैं, एक पर्व है। इसमें एक ‘ऊँ’ है। गायत्री पाँच हिस्सों में बँटी हुई है, जिसकी हम पाँच हिस्सों में व्याख्या कर सकते हैं। इसको हम पाँच कोशों का जागरण कह सकते हैं। इसके लिए हम आपको पाँच उपासनाएँ सिखा सकते हैं, जिसे आपको समझना चाहिए।

गायत्री माता का पहला वाला खंड वह है, जिसे हम प्रत्येक क्रियाकृत्य के साथ- साथ सबसे पहले सिखाते हैं और कहते हैं कि इसके बिना कोई कृत्य पूरा नहीं हो सकता। वह क्या हो सकता है? वह है- आत्मशोधन की प्रकिया। आत्मशोधन- प्रकिया के कौन- कौन से अंग हैं? आप उसके बिना जप नहीं कर सकते ; उसके बिना हवन नहीं कर सकते। उसके बिना कोई कर्मकांड नहीं कर सकते; यह तो हमारे कर्म का प्रारंभ है और यह हमारे अध्यात्म का प्रारंभ है, जिसको हम आत्मशोधन की प्रकिया कहते हैं।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka.2

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 25)



शिष्य संजीवनी का सीधा मतलब है शिष्यत्व का सम्वर्धन। जो शिष्य अपने शिष्यत्व के खरेपन के लिए सजग, सचेष्ट एवं सतर्क नहीं है, उनका मन रह-रहकर डगमगाता है। साधना पथ की दुष्कर परीक्षाएँ उनके साहस को कंपाती रहती हैं। उनका उत्साह एवं उल्लास कभी भी धराशाही हो जाता है। अन्तःकरण में उठने वाली अनेकों छद्म प्रवंचनाएँ उन्हें किन्हीं भी नाजुक क्षणों में बहकाने में समर्थ होती हैं। सन्देह एवं भ्रम के झोंके उनकी आस्थाओं को सूखे पत्तों की भांति कहीं भी किधर भी उड़ा ले जाते हैं।

ये विडम्बनाएँ हमारे अपने जीवन में न घटें इसके लिए एक ही सार्थक समाधान है कि अपना शिष्यत्व हरदम खरा बना रहे। अपने शिष्यत्व के परिपाक एवं निखार के लिए एक ही साधना व समाधान है। शिष्य संजीवनी का नियमित एवं निरन्तर सेवन। जो यह सेवनकर रहे हैं उन्हें इसके गुणों की अनुभूति भी हो रही है।

यह अनुभूति और भी अधिक स्पष्ट हो, अपना शिष्यत्व और भी अधिक प्रमाणिक हो, इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह सातवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है। इसमें कहा गया है- मार्ग की शोध करो। थोड़ा ठहरो और सोचो कि तुम सचमुच ही गुरु भक्ति का मार्ग पाना चाहते हो या फिर तुम्हारे मन में ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिए, आगे बढ़ने और एक भव्य भविष्य निर्माण करने के लिए स्वपन हैं। सावधान! केवल और केवल गुरुभक्ति के लिए ही मार्ग को प्राप्त करना है। ध्यान रहे गुरुभक्ति किसी महत्त्वाकांक्षा पूर्ति का साधन बनकर कलंकित न होने पाए। इसके लिए कहीं बाहर भटकने की बजाय अपने अन्तःकरण में समाहित होकर मार्ग की शोध करो।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/sadg

जीवन अपने लिए एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। जिसके प्रत्येक पृष्ठ से एक से एक बढ़ कर काम शिक्षायें हमें पढ़ने को मिल सकती है।

कल क्या बीती और कल का दिन कैसे गुजरा इन पर गहराई से विचार करे तो उसमें अनेकों शिक्षाप्रद अनुभव ऐसे मिल सकते हैं जो दूसरों के उपदेश सुनने या विद्वानों को पुस्तकें पढ़ने से भी अधिक कारगर सिद्ध हो सकते है?

कल के समय का जिस प्रकार उपयोग किया गया, और उससे जो पाया गया उससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता था? जिन नासमझियों के कारण कल कई झंझटों में फँसना पड़ा क्या उनसे बचा नहीं जा सकता था? कल किस अवसर पर क्या ऐसे अदूरदर्शी कदम उठ गये जो समझदारी का समय रहते उपयोग करने से टल सकते थे और कुछ किया जा सकता था जो अधिक सुखद और श्रेयस्कर होता? इस प्रकार के प्रश्न यदि अपने आप से पूछे तो सहज ही वे उत्तर सामने आयेंगे जो आगे के लिए ध्यान में रखे जाने पर भावी उन्नति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

जीवन का रसास्वादन वे लोग नहीं कर पाते जो अपने लिए ही जीते हैं। खुदगर्जी के तंग दायरे में जीना एक प्रकार की लानत है जो आदमी पर हर घड़ी आत्म ग्लानि की तरह बरसती रहती है। कई व्यक्ति खुदगर्जी की राह अपना कर अधिक सुख साधन इकट्ठे कर लेते हैं दूसरों की तुलना में ज्यादा मालदार लगते हैं। इतना होने पर भी ऐसे लोगों को एक ऐसे अभाव से दुखी रहना ही पड़ेगा जो सामूहिक और पारमार्थिक गतिविधियाँ अपनाये बिना मिल ही नहीं सकता। अपने लिए ही जीना अपनी सुख सुविधाओं की ही बात सोचना वस्तुतः मनुष्य का मानसिक बौनापन है। ओछे और उपहासास्पद ही गिने जाते रहेंगे जहाँ व्यक्तित्व की परख होगी वहाँ उन्हें फिसड्डी ही ठहराया जायेगा। जिन्दगी को प्यार करने वाले लोग अपनी सुव्यवस्था के साधन जुटाने के साथ-साथ यह भी करते हैं कि उन्हें दूसरों के लिए कुछ सोचने और करने का अवसर भी मिलता रहे।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.34

सोमवार, 14 मार्च 2016

 

मित्रो! गायत्री मंत्र कितना सामर्थ्यवान मंत्र है ! मैं चाहता था कि उस सामर्थ्य का लाभ उठाने के लिए मेरे बाद दूसरे आदमी भी रहे होते तो मजा आ जाता। अभी जो लोग रोज गालियाँ दिया करते हैं और कहते हैं कि हमको तीन साल गायत्री मंत्र जप करते हो गये, पर इससे कोई फायदा नहीं हुआ। यदि मैं अपने पीछे ऐसे आदमी छोड़कर मरा होता जो मेरे ही तरीके से गरदन ऊँची करके लोगों से यह कहने में समर्थ रहे होते कि अध्यात्म बड़े काम का है और यह बहुत उपयोगी है, फायदेमंद है और शक्तिशाली है और बड़ा चमत्कारी है। जैसे कि हम हिम्मत के साथ कहते हैं कि आप में से भी ऐसे आदमी होते और हम आपको यह सिखाते कि अध्यात्म क्या हो सकता है?

गायत्री क्या हो सकती है? उपासना क्या हो सकती है और उपासना के आधार क्या हो सकते हैं? बेटे! मैंने इसलिए शिविर में आपको बुलाया था कि गायत्री उपासना के जो पाँच अंग, पाँच कोश- अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनंदमयकोश हैं, इन पाँचों कोशों की उच्चस्तरीय उपासना, जो इसमें जुड़ी हुई है, उसे सामान्य प्रकिया में भी जोड़कर रखा है। यह ऊँचे स्तर की भी है। इसे मैं आपको समझाना चाहता था कि इन पाँचों कोशों का अनावरण कैसे किया जाता है। अभी तक जो ज्ञान आपको दिया गया, वह यह समझकर दिया गया कि अभी आप बालक हैं। समय आएगा तो मैं समझादुँगा, सिखा दूँगा।

मित्रो ! सोचता हूँ, अब शुरूआत तो करूँ, आपको पट्टीपूजन तो कराऊँ, ओलम- बाहरखड़ी तो सिखाऊँ, अक्षरज्ञान तो सिखाऊँ, गिनती गिनना तो सिखाऊँ। फिर पीछे फिजिक्स सिखा दूँगा, केमिस्ट्री सिखा दूँगा, रेखागणित सिखा दूँगा, गणित सिखा दूँगा। ये सब चीजें मैंने छिपाकर रखी थीं। अभी मैंने आपको गिनतियाँ याद कराई थीं और पहाड़े याद कराए थे और आपको जप करना सिखाया, अनुष्ठान करना सिखाया, माला घुमाना सिखाया था, प्राणायाम करना सिखाया था और इनकी विधि सिखाई थी, कर्मकांड सिखाया था।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka.2

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 24)

अन्तरात्मा की इस शुद्ध भावदशा में ही आत्मा की सम्पदा प्रकट होती है। सूर्य की रश्मियों की भाँति ही आत्मा की सम्पत्तियां साधक में प्रकट होती है। यहीं पर शिष्य के जीवन में, साधक के जीवन में सच्चा स्वामित्व विकसित होता है। इसी स्वामित्व की चाहत शिष्य के जीवन में होनी चाहिए। दुनियावी जीवन में हम स्वामित्व की चाहत तो रखते हैं पर यह चाहत होती धन, साधन, भवन-सम्पत्ति का स्वामी बनने की। स्वयं का स्वामी भला कौन होना चाहता है? हालांकि जो स्वयं का स्वामी है, अपना मालिक है वही सच्चे अर्थों में स्वामी है। बाकी सब तो धोखा है। धन, दुकान-मकान का मालिक बनकर हम केवल गुलाम बनते हैं।

इस अटपटे वचन को समझने के लिए सूफी सन्त फरीद के जीवन की एक घटना को समझ लेना ठीक रहेगा। बाबा फरीद अपने शिष्यों के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे। वहीं रास्ते में एक आदमी अपनी गाय को रस्सी से बांधे लिए जा रहा था। फरीद ने उस आदमी से थोड़ी देर रुकने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर वह रुक गया। अब बाबा फरीद ने अपने शिष्यों से पूछा- इन दोनों में मालिक कौन है- गाय या आदमी। शिष्यों ने कहा- यह भी कोई बात हुई, जाहिर है, आदमी गाय का मालिक है।

फरीद ने फिर कहा- यदि गाय के गले की रस्सी काट दी जाय तो कौन किसके पीछे दौड़ेगा- गाय आदमी के पीछे या फिर आदमी गाय के पीछे। शिष्यों ने कहा- जाहिर है आदमी गाय के पीछे भागेगा। तो फिर मालिक कौन हुआ? फरीद ने शिष्यों से कहा, यह जो रस्सी तुम्हें दिखाई पड़ती है गाय के गले में, यह दरअसल आदमी के गले में है। आत्मा की सम्पत्ति को छोड़कर बाकी हर सम्पत्ति हमारे गले का फंदा बन जाती है। यथार्थ में आत्म सम्पदा ही सच्ची सम्पदा है। सच्चे शिष्य ही इसे पाने में समर्थ होते हैं। शिष्यत्व की यह सामर्थ्य किस तरह बढ़े- इसका विवरण अगले पृष्ठों में अनावृत्त होगा।


क्रमशः जारी 
डॉ. प्रणव पण्डया 
देखा जब उस वृद्ध को तो जिन्दगी बदल गई


एक सेठ के एक इकलौता पुत्र था पर छोटी सी उम्र मे ही गलत संगत के कारण राह भटक गया! परेशान सेठ को कुछ नही सूझ रहा था तो वो ईश्वर के मन्दिर मे गया और ईश दर्शन के बाद पुजारी को अपनी समस्या बताई !

पुजारी जी ने कहा की आप कुछ दिन मन्दिर मे भेजना कोशिश पुरी करेंगे की आपकी समस्या का समाधान हो आगे जैसी सद्गुरु देव और श्री हरि की ईच्छा !

सेठ ने पुत्र से कहा की तुम्हे कुछ दिनो तक मन्दिर जाना है नही तो तुम्हे सम्पति से बेदखल कर दिया जायेगा, घर से मन्दिर की दूरी ज्यादा थी और सेठ उसे किराये के गिनती के पैसे देते थे! अब वो एक तरह से बंदिश मे आ गया!

मंदिर के वहाँ एक वृद्ध बैठा रहता था और एक अजीब सा दर्द उसके चेहरे पर था और रोज वो बालक उस वृद्ध को देखता और एक दिन मन्दिर के वहाँ बैठे उस वृद्ध को देखा तो उसे मस्ती सूझी और वो वृद्ध के पास जाकर हँसने लगा और उसने वृद्ध से पुछा हॆ वृद्ध पुरुष तुम यहाँ ऐसे क्यों बैठे रहते हो लगता है बहुत दर्द भरी दास्तान है तुम्हारी और व्यंग्यात्मक तरीके से कहा शायद बड़ी भूलें की है जिंदगी मे?

उस वृद्ध ने जो कहा उसके बाद उस बालक का पूरा जीवन बदल गया! उस वृद्ध ने कहा हाँ बेटा हँस लो आज तुम्हारा समय है पर याद रखना की जब समय बदलेगा तो एक दिन कोई ऐसे ही तुम पर हँसेगा! सुनो बेटा मैं भी खुब दौड़ा मेरे चार चार बेटे है और उन्हे जिंदगी मे इस लायक बनाया की आज वो बहुत ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर है वो की आज मैं उन्हे दिखाई नही देता हुं! और मेरी सबसे बड़ी भुल ये रही की मैंने अपने बारे मे कुछ भी न सोचा! अपने इन अंतिम दिनो के लिये कुछ धन अपने लिये बचाकर न रखा इसलिये आज मैं एक पराधीनता का जीवन जी रहा हुं! पर मुझे तो अब इस मुरलीधर ने सम्भाल लिया की यहाँ तो पराधीन हुआ हुं कही आगे जाकर पराधीन न हो जाऊँ!

बालक को उन शब्दो ने झकझोर कर रख दिया! बालक - मैंने जो अपराध किया है उसके लिये मुझे क्षमा करना हॆ देव! पर हॆ देव आपने कहा की आगे जाकर पराधीन न रहूँ ये मेरी कुछ समझ मे न आया?

वृद्ध - हॆ वत्स यदि तुम्हारी जानने की ईच्छा है तो बिल्कुल सावधान होकर सुनना अनन्त यात्रा का एक पड़ाव मात्र है ये मानवदेह और पराधीनता से बड़ा कोई अभिशाप नही है और आत्मनिर्भरता से बड़ा कोई वरदान नही है! अभिशाप की जिन्दगी से मुप्ति पाने के लिये कुछ न कुछ जरूर कुछ करते रहना! धन शरीर के लिये तो तपोधन आत्मा के लिये बहुत जरूरी है!

नियमित साधना से तपोधन जोडिये आगे की यात्रा मे बड़ा काम आयेगा! क्योंकि जब तुम्हारा अंतिम समय आयेगा यदि देह का अंतिम समय है तो धन बड़ा सहायक होगा और देह समाप्त हो जायेगी तो फिर आगे की यात्रा शुरू हो जायेगी और वहाँ तपोधन बड़ा काम आयेगा!

और हाँ एक बात अच्छी तरह से याद रखना की धन तो केवल यहाँ काम आयेगा पर तपोधन यहाँ भी काम आयेगा और वहाँ भी काम आयेगा! और यदि तुम पराधीन हो गये तो तुम्हारा साथ देने वाला कोई न होगा!
उसके बाद उस बालक का पुरा जीवन बदल गया!
इसलिये नियमित साधना से तपोधन इकठ्ठा करो!

शनिवार, 12 मार्च 2016

खिलौनों ने अध्यात्म का सत्यानाश कर दिया (भाग 3)

मित्रों! ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति, चमत्कारों की देवी, ज्ञान की देवी, विज्ञान की देवी, सामर्थ्य की देवी गायत्री माता, जिसका कि हम इन शिविरों में अनुष्ठान करने के लिए बुलाएँ, पर क्या करें आप तो हमें कई तरह से परेशान कर देते हैं, हैरान कर देते हैं। हमारा मानसिक संतुलन खराब कर देते हैं। आप तो शांतिकुञ्ज को धर्मशाला बना देते हैं।

आप तो इसको अन्नक्षेत्र बना देते हैं और बेटे! उन लोगों को लेकर चले आते हैं, जिनका कि इस अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है; उपासना से कोई संबंध नहीं है; अनुष्ठान से कोई संबंध नहीं है; आप भीड़ लाकर खड़ी कर देते हैं और हमारा अनुशासन बिगाड़ देते हैं। भीड़ पग- पग पर हमको हैरान करती है और पग- पग पर अवज्ञा करती है। एक के स्थान पर पाँच लोग आ जाते हैं।

कल एक व्यक्ति आया और बोला- साहब! हम अनुष्ठान नहीं कर सकते। हम तो अपनी औरत की वजह से यहाँ आए हैं, जो यह कहती है कि हमारे बाल- बच्चे नहीं होते हैं। हम तो इसी कारण से आए हैं, अन्यथा किसी अनुष्ठान से हमारा कोई ताल्लुक नहीं है और हम कोई अनुष्ठान नहीं करेंगे। नहीं करेंगे, बेटे! ऐसा कर कि तेरी औरत के अगर बच्चा होने वाला होगा तो वहाँ धर्मशाला में ही हो जाएगा और अगर न होना होगा तो यहाँ भी नहीं हो सकता। तू कल ले जा। कल मैंने उसे भगा दिया।

मित्रो! मैं चाहता था कि संस्था का स्तर अच्छा बना रहता और अनुष्ठानों का स्तर अच्छा गना रहता, पर मैं क्या कर सकता हूँ। मैंने आपको निमंत्रणपत्र इसलिए भेजे थे कि आप क्वालिटी के आदमी कहीं न कहीं से ढूँढ़कर लाएँगे, जिनकी मुझे बहुत जरूरत है। लोग फार्म भर करके मंजूरी मँगा लेते हैं, लेकिन उससे क्वालिटी के आदमी नीं आ पाते। क्वालिटी के आदमी न आने से मुझे बड़ा क्लेश होता है। मैं किसे समझाऊँ, क्यों समझाऊँ और क्या समझाऊँ?

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 23)

स्वयं का स्वामी ही सच्चा स्वामी

शक्ति के साथ शान्ति की चाहत भी शिष्यत्व की एक कसौटी है। और इस तरह का मेल भी बड़ा विरल है। क्योंकि दुनियादारी से भरे जीवन में शक्ति अशान्ति का पर्याय बनकर ही आती है। जितनी ज्यादा शक्ति, जितना ज्यादा रूतबा-मर्तबा उतनी ही ज्यादा अशान्ति। इसका कारण एक ही है कि दुनियादारी में शक्ति के मायने अहंता के पोषण के सिवा और कुछ नहीं। और अहंता का पोषण अशान्ति से ज्यादा और कुछ भी नहीं दे सकता।

अहंता-जितनी बढ़ेगी अशान्ति भी उतनी ही बढ़ेगी। परन्तु शिष्यत्व की साधना में ये सारे समीकरण एकदम उलट जाते हैं। शिष्य की शक्ति तो समर्पण की शक्ति की है। अहंता के विसर्जन और विलीनता की शक्ति है। यह शक्ति ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-त्यों शान्ति भी बढ़ती है। क्रमिक रूप में यह सघन और प्रगाढ़ होती जाती है।

इस शक्ति और शान्ति के प्रसार के साथ साधक का अन्तर्मन एवं अन्तःकरण पवित्र एवं निर्मल होता जाता है। शिष्य के जीवन में पवित्रता की बाढ़ आती है। भक्ति का समुद्र उमड़ता है। निर्मल भावनाओं का तूफान उठता है। अन्तःकरण के ऐसे वातावरण में शिष्य की आत्मा उत्तरोत्तर विकसित होती है। उसमें सद्गुरु कृपा का सहज अवतरण होता है।

गुरुकृपा की अनुभूति की सहज अवस्था यही है। इस अवस्था को पाए बिना गुरुकृपा का रहस्य कभी भी अनुभव नहीं हो पाता। यह दुर्लभ अनुभूति जिन्हें हुई है अथवा जिन्हें हो रही है वही हां केवल वही इस सत्य को समझ सकते हैं। बाकी के पल्ले तो केवल बौद्धिक तर्क-वितर्क का संजाल ही पड़ता है।


क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/i

वह प्रकाश तब तक अन्तर में बना रहेगा जब तक ऐसी गुदगुदी बनी रहेगी जो मनोरथ पूरा न होने पर भी उस उपलब्धि जैसा ही उल्लास बनाये रहे। यह उज्ज्वल सपनों का आनन्द जब अभ्यास में आता है तब इतना मधुर होता है कि उसे बनाये रखने के लिये कठिन से कठिन कर गुजरने की हिम्मत की जा सके।

मुसीबतें और असफलताएं सिर्फ यह जानने के लिये आती हैं कि व्यक्ति किस हद तक साहस सँजोये रह सकता है। जिन्होंने हर कठिनाई को एक चुनौती माना उसके लिए इस संसार में कोई अवरोध नहीं, छात्रों को आये दिन अध्यापक के पूछे प्रश्नों को हल करना पड़ता है। तभी उसे उत्तीर्ण होने की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अवरोध एक प्रकार का अध्यापक है जो प्रतिभा को विकसित करने के लिये उत्तेजना प्रदान करता है और चिर स्मरणीय सफलता वरण कर सकने की क्षमता से सुसम्पन्न बनाता है। जो कठिनाई के दिनों में आशावादी रह सका, समझना चाहिए पुरुषार्थी महामानवों की पंक्ति में उसी का अभिषेक किया जाने वाला है।

बड़ी सफलताएं इस बात की अपेक्षा करती हैं कि व्यक्ति में धैर्यपूर्वक देर तक कठिन परिश्रम करते रहने की क्षमता हो। ऐसी मनः स्थिति उसी की हो सकती है जिसने आशावाद को अपने स्वभाव का अंग बना लिया हो। छुई-मुई की तरह जरा-सी कठिनाई आने पर जो मुरझा जाते हैं, अवरोधों को राई न मानकर जो पर्वत समझते हैं, उनके लिये अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रहना ही एक समस्या है, अपने आपको सँभाल सकना ही जिनके लिए भार बना हुआ है, उनके लिये सफलता के लिये जितनी शक्ति आवश्यक है उतनी जुटा सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा और वे हर काम में हर बार असफल ही होते रहेंगे। आशा रहित जीवन एक प्रकार से निर्जीव ही कहा जा सकता है।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 52
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/October.52

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

खिलौनों ने अध्यात्म का सत्यानाश कर दिया

मित्रो! ऐसे समय में आप लोगों को यहाँ आना पड़ा। गायत्री उपासना, जिसके लिए हमारा सारे का सारा जीवन समर्पित हो गया। गायत्री उपासना, जो हमारे जीवन का प्राण है। जिसके लिए हम जिएँगे और उसी के लिए मरेंगे। जिसके लिए हमने अपनी भरी जवानी निछावर कर दी। दूसरे आदमी भरी जवानी में तरह- तरह की कामनाएँ करते हैं। उस जमाने में हमने छह घंटे रोज के हिसाब से चौबीस साल तक, पंद्रह वर्ष की उम्र से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक हम जमीन पर सोए। छाछ और जौ की दो रोटियों के अलावा हमने तीसरी चीज ही नही देखी। नमक कैसा होता है, चौबीस वर्ष तक हमने कभी छुआ ही नहीं।

शक्कर कैसी होती है, चौबीस वर्ष तक हमारी निगाह में ही नहीं आई। शाक- दाल किसे कहते हैं, हमने जाना भी नहीं। केवल गायत्री उपासना के लिए। सारी दुनिया हमको पागल कहती रही। बेवकूफ और बेहूदा बताती रही। पैसा हम कमा नहीं सके। जमीन पर पड़े रहे। खाने का जायका हम ले नहीं सके। इंद्रियों का जायका उठा नहीं सके। यश प्राप्त न कर सके। सम्मान प्राप्त न कर सके। जिस गायत्री मंत्र के लिए, जिस गायत्री की महत्ता के लिए बेटे! हम निछावर हैं और हमारा जीवन जिसके लिए समर्पित है, वह ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति है, जिसका आधार इतना बड़ा है कि मनुष्य के भीतर वह देवत्व का उदय कर सकती है और मनुष्य अपने इसी जीवन में स्वर्ग जैसा आनंद लेने में समर्थ हो सकता है।

मित्रों! ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति, चमत्कारों की देवी, ज्ञान की देवी, विज्ञान की देवी, सामर्थ्य की देवी गायत्री माता, जिसका कि हम इन शिविरों में अनुष्ठान करने के लिए बुलाएँ, पर क्या करें आप त;ो हमें कई तरह से परेशान कर देते हैं, हैरान कर देते हैं। हमारा मानसिक संतुलन खराब कर देते हैं। आप तो शंातिकुंज को धर्मशाला बना देते हैं। आप तो इसको अन्नक्षेत्र बना देते हैं और बेटे! उन लोगों को लेकर चले आते हैं, जिनका कि इस अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है; उपासना से कोई संबंध नहीं है; अनुष्ठान से कोई संबंध नहीं है; आप भीड़ लाकर खड़ी कर देते हैं और हमारा अनुशासन बिगाड़ देते हैं।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 22)

स्वयं का स्वामी ही सच्चा स्वामी

शिष्य संजीवनी के इस सूत्र में श्रुतियों का सार है, सन्त वचनों की पवित्रता है, सिद्ध परम्परा का रहस्य है। बड़े ही गुह्य एवं अटपटे भाव हैं इस सूत्र के। सूत्र की पहली बात में ही बड़ी उलटबांसी है। सामान्य जीवन की रीति यही है कि शक्ति की अभीप्सा इसलिए की जाती है कि लोगों की नजर में, जन समुदाय के बीच में अपने अहंकार को प्रतिष्ठित किया जा सके।

अहंता की प्रतिष्ठा जितनी ज्यादा होती है, लोगों की नजर में व्यक्ति का रूतबा, दबदबा, मर्तबा उतना ही ज्यादा होता है। उसकी बड़ी धाक होती है सबकी दृष्टि में। सभी उससे डरते, दबते या घबराते हैं। जितना ज्यादा मान उतनी ही ज्यादा शक्ति। यही सोच है जमाने की। यही चलन है दुनिया की। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि मान पाने के लिए, मर्तबा पाने के लिए लोग शक्ति की चाहत रखते हैं।

लेकिन शिष्य के जीवन में तो इसका अर्थ ही उल्टा है। शिष्य तो शक्ति इसलिए चाहता है कि वह स्वयं को पूरी तरह से अपने सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर सके। अपने अस्तित्त्व को गुरुदेव के अस्तित्त्व को विलीन कर सके। समर्पण की साधना के लिए विसर्जन की भावदशा के लए, विलीनता की अनुभूति के लिए गहन शक्ति की आवश्यकता है। यह काम थोड़ी-बहुत शक्ति से नहीं हो सकता। अपने बिखरे हुए अस्तित्त्व को समेटना, एकजुट करना और फिर उसे गुरुदेव के अस्तित्त्व में मिला देना बड़े साहस का काम है।

इसके लिए महान् शक्ति चाहिए। अपने को बनाने, बड़ा सिद्ध करने के लिए तो सभी प्रयासरत रहते हैं। परन्तु स्वयं को मिटाने, विसॢजत करने के लिए विरले ही तैयार होते हैं। शिष्य को यही विरल काम करना होता है। उसे अपने शिष्यत्व का खरापन साबित करने के लिए स्वयं को पूरी तरह मिटा देना होता है। उसे लोगों की नजर में नहीं भगवान् और अपने सद्गुरु की नजर में खुद को प्रमाणित करना होता है। जो ऐसा करने में समर्थ होता है वही खरा शिष्य बन पाता है।


क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/i
निराशाग्रस्त-निर्जीव और निरर्थक जीवन (भाग 1)

निराशा का दूसरा नाम है भय, बेचैनी और अशाँति। भविष्य को अन्धकार में देखना और प्रस्तुत विपत्ति को अगले दिनों और अधिक बढ़ती हुई सोचना एक ऐसा स्वविनिर्मित संकट है जिसके रहते, सुखद परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकना कदाचित ही सम्भव हो सके। सोचने का एक तरीका यह है कि अपना गिलास आधा खाली है और अभावग्रस्त स्थिति सामने खड़ी है। सोचने का दूसरा तरीका यह है कि अपना आधा गिलास भरा है जबकि सहस्रों पात्र बिना एक बूँद पानी के खाली पड़े हैं। अभावों को, कठिनाइयों को सोचते रहना एक प्रकार की मानसिक दरिद्रता है।

जो रात्रि के अन्धकार को ही शाश्वत मान बैठा और जिसे यह विश्वास नहीं कि कुछ समय बाद अरुणोदय भी हो सकता है उसे बौद्धिक क्षेत्र का नास्तिक कहना चाहिए। दार्शनिक नास्तिक वे हैं जो सृष्टि की अव्यवस्थाओं को तलाश करके यह सोचते हैं कि दुनिया बिना किसी योजना व्यवस्था या सत्ता के बनी है। उन्हें सूर्य और चन्द्रमा का उदय अस्त-बीज और वृक्ष का अनवरत सम्बन्ध जैसे पग-पग पर प्रस्तुत व्यवस्था क्रम सूझते ही नहीं। ईश्वर का अस्तित्व और कर्तव्य उनकी दृष्टि से ओझल ही रहता है। ठीक इसी प्रकार की बौद्धिक नास्तिकता वह है जिसमें जीवन के ऊपर विपत्तियों और असफलताओं की काली घटाएं ही छाई दीखती हैं। उज्ज्वल भविष्य के अरुणोदय पर जिन्हें विश्वास ही नहीं जमता।

जीवन का पौधा आशा के जल से सींचे जाने पर ही बढ़ता और फलता-फूलता है। निराशा के तुषार से उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते रहने वाला आशावादी ही उनके लिये ताना-बाना बुनता है। प्रयत्न करता है-साधन जुटाता है और अन्ततः सफल होता है। यह सही है कि कई बाद आशावादी स्वप्न टूटते भी हैं और गलत भी साबित होते हैं पर साथ ही यह भी सत्य है कि उजले सपनों का आनन्द कभी झूठा नहीं होता।

क्रमशः जारी

गुरुवार, 10 मार्च 2016

खिलौनों ने अध्यात्म का सत्यानाश कर दिया

गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ-
ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

मित्रो! हमने यह क्या कर डाला! अज्ञान के वशीभूत हो करके हमने उस धर्म की जड़ में कुल्हाड़ा दे मारा और उसे काटकर फेंक दिया, जिसका उद्देश्य था कि हमको पाप से डरना चाहिए और श्रेष्ठ काम करना चाहिए। पापों के डर को तो हमने उसी दिन निकाल दिया, जिस दिन हमारे लिए गंगा पैदा हो गई। गंगा नहाइए और पापों का डर खतम। अच्छा साहब! चलिए ,, एक डर तो खतम हुआ। एक झगड़ा और रह गया है। क्या रह गया है? श्रेष्ठ काम कीजिए, त्याग कीजिए, बलिदान कीजिए, समाज सेवा कीजिए, अमुक काम कीजिए।

पर इनका सफाया किसने कर दिया? बेटे! यह सत्यनारायण स्वामी ने कर दिया और महाकाल के मंदिर ने कर दिया। इन खिलौनों को देखिए और बैकुंठ को जाइए। अध्यात्म का सत्यानाश हो गया। अध्यात्म दुष्ट हो गया, अध्यात्म भ्रष्ट हो गया। भ्रष्ट और दुष्ट अध्यात्म को लेकर हम चलते हैं और फिर यह उम्मीद करते हैं कि इसके फलस्वरूप हमें वे लाभ मिलने चाहिए, वे चमत्कार मिलने चाहिए, वे सीढ़ियाँ मिलनी चाहिए और वे वरदान मिलने चाहिए।

साथियों! यह कैसे हो सकता है? नास्तिकता का यह बहुत बुरा तरीका है और बहुत गंदा तरीका है, जो आपने अख्तियार कर रखा है। यह नास्तिकता का तरीका है। इसमें आध्यात्मिकता के मूल सिद्धांतों को काट डाला गया है और कर्मकांडों की लाश को इतना ज्यादा सड़ा दिया गया है, जिस तरह से लाश जब एक बार सड़ जाती है तो उसका फूलना शुरू हो जाता है और फूल करके मुरदा इतना बड़ा हो जाता है कि देखने में मालूम पड़ता है कि मरा हुआ आदमी तिगुना- चौगुना हो गया।

सड़ा हुआ अध्यात्म हमको चौदह- चौदह मंजिल के मंदिरों में दिखाई पड़ता है तथा यह मन आता है कि अभी और चौदह मंजिलें बन गई होतीं, तो हम सीधे बैकुंड चले जाते और बीच में किराया- भाड़ा खरच नहीं करना पड़ता। आध्यात्मिकता की लाश अखंड कीर्तनों के माध्यम से और भंडारों के माध्यम से इतनी फैलती और सड़ती जा रही है कि हमको मालूम पड़ता है कि अध्यात्म अब सड़ गया है। अध्यात्म मर गया, अध्यात्म का प्राण समाप्त हो गया। अब केवल अध्यात्म की लाश का बोलबाला है हर जगह अध्यात्म की लाश बढ़ती चली जाती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 21)

स्वयं का स्वामी ही सच्चा स्वामी

शिष्य संजीवनी का सेवन करने वालों का आध्यात्मिक वैभव बढ़ने लगा है। ऐसा अनेकों साधकों की अनुभूतियां कहती हैं। इन अनुभूतियों के हर पन्ने में एक अलग अहसास है। निखरते शिष्यत्व की एक अलग चमक है। महकती साधना की एक अनूठी खुशबू है। समर्पण की सरगम इनमें हर कहीं सुनी जा सकती है। जिन्होंने भी शिष्य संजीवनी के सत्त्व को, सार को पिया है- उन सभी में शिष्यत्व की नयी ऊर्जा जगी है।

कइयों ने गुरुवर की चेतना को अपने में उफनते-उमगते-उमड़ते पाया है। कुछ ने गुरुदेव के रहस्यमय स्वरों को अपनी भाव चेतना में सुना है। अनेकों का साधना जीवन उच्चस्तरीय चेतना के संकेतों-संदेशों से धन्य हुआ है। निश्चित ही बड़भागी हैं ये सब जिनका जीवन शिष्यत्व की सघन भावनाओं से आवृत्त हुआ है। उनसे भी धन्यभागी हैं वे जो इन पंक्तियों को पढ़ते हुए सच्चे शिष्यत्व के लिए प्रयासरत हो रहे हैं।

इस प्रयास को तीव्र से तीव्रतर बनाने के लिए शिष्य संजीवनी का यह छठा सूत्र बड़ा ही गुणकारी है। इसमें कहा गया है- ‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो। लेकिन ध्यान रहे कि जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी जो उसे लोगों की दृष्टि में ना कुछ जैसा बना देगी। इसी के साथ शान्ति की अदम्य अभीप्सा भी करो। पर ध्यान रहे कि जिस शान्ति की कामना तुम्हें करनी है, वह ऐसी पवित्र शान्ति है, जिसमें कोई विघ्र न डाल सकेगा।

और इस शान्ति के वातावरण में आत्मा उसी प्रकार विकसित होगी, जैसे शान्त सरोवर में पवित्र कमल विकसित होता है। शक्ति और शान्ति के साथ ही स्वामित्व की भी अपूर्व अभीप्सा करो। परन्तु ये सम्पत्तियाँ केवल शुद्ध आत्मा की हों। और इसलिए सभी शुद्ध आत्मा इनकी समान रूप से स्वामी हों।’

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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बुधवार, 9 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 20)

गुरुचेतना में समाने की साहसपूर्ण इच्छा

इस अर्थ में भी वह अप्राप्य है। क्योंकि ज्यों-ज्यों तुम पास पहुँचोगे त्यों-त्यों वह दूर हटता जाएगा। प्रकाश के पास पहुँच कर भी ज्योति दूर रह जाती है। ज्योति से मिलन तो ज्योति बनकर ही होता है। ज्योति में समाकर ज्योति से एकाकार होकर ही ज्योति से मिला जा सकता है।

इस सूत्र के सार को यदि समझे- तो बात इतनी भर है कि साहसपूर्ण इच्छा तो अपने सद्गुरु में समाने की है। गुरुचेतना में विलय ही शिष्य की पहचान है। इसी में शिष्यत्व का खरापन है। सद्गुरु ही प्रकाश स्रोत के रूप में हमारे अन्तःकरण में है। वही परमचेतना के रूप में हमसे परे है। और वही अभी अप्राप्य है। उनकी परम ज्योति को स्वयं को मिटाकर ही छुआ जा सकता है।

उनमें समाकर ही जीवन पूर्ण होता है। बार-बार हजार बार बल्कि लाखों बार यह बात दुहराई जा सकती है कि जो शिष्य है, जिन्हें शिष्यत्व प्राप्त हुआ है- उनकी केवल देह बची रह जाती है, बाकी तो उनमें चेतना सद्गुरु की रहती है। गुरुदेव ही शिष्य की देह को आधार बना कर अपनी लीला करते रहते हैं पर ऐसा होता तभी है, जब उपरोक्त सूत्र का सही-सही अनुपालन हो।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/guruca
आध्यात्मिक चिंतन अनिवार्य

जो लोग आध्यात्मिक चिंतन से विमुख होकर केवल लोकोपकारी कार्य में लगे रहते हैं, वे अपनी ही सफलता पर अथवा सद्गुणों पर मोहित हो जाते हैं। वे अपने आपको लोक सेवक के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी अवस्था में वे आशा करते हैं कि सब लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करें, उनका कहा मानें ।। उनका बढ़ा हुआ अभिमान उन्हें अनेक लेागों का शत्रु बना देता है। इससे उनकी लोक सेवा उन्हें वास्तविक लोक सेवक न बनाकर लोक विनाश का रूप धारण कर लेती है।

आध्यात्मिक चिंतन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रह जाती है। वह भूलों पर भूल करता चला जाता है और इस प्रकार अपने जीवन को विफल बना देता है।

हारिये न हिम्मत   
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Loose_not_your_heart/Spiritual
विचार शक्ति का महत्व समझिये। (अन्तिम भाग)

ऐसे कापुरुषों की भी संसार में कमी नहीं है जो मानव जीवन का मूल्य न समझकर मृत्यु के दिन गिनते रहते हैं। यह भ्रम उन्हें खाये डालता है कि वे बीमार हैं, शक्ति हीन हैं। काल्पनिक दुःख एवं चिन्ताएं हर समय उन पर सवार रहती हैं। वस्तुतः इन्हें शारीरिक रूप से कोई बीमारी नहीं होती परन्तु मानसिक निर्बलता के कारण उनकी शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की शक्ति तथा सामर्थ्य पंगु बन जाती हैं। अनेक प्रकार के शारीरिक रोग इन्हें घेरे रहते हैं। जीवन के आनन्द से वंचित कर देते हैं। निर्बल एवं- रोगी शरीर व्यक्ति सुखों से सदैव वंचित ही रहता है।

मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि अनेक शारीरिक रोग मानसिक निर्बलता तथा संवेगों से उत्पन्न होते हैं। शरीर विज्ञान-शास्त्रियों का भी मत है कि केवल मानसिक चित्रों के आधार पर ही अनेक शारीरिक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस सम्बन्ध में डॉ. टुके ने अपनी पुस्तक ‘इन्फ्लूएन्स आफ दी माइण्ड अपान दी बॉडी’ में लिखा है- ‘पागलपन, मूढ़ता, अंगों का निकम्मा हो जाना, पित्त पाण्डु रोग, बालों का शीघ्र गिरना, रक्तहीनता, घबराहट, मूत्राशय के रोग, गर्भाशय में पड़े हुए बच्चे का अंग भंग हो जाना, चर्म रोग, फुन्सियाँ-फोड़े तथा एक्जिमा आदि कितने ही स्वास्थ्यनाशक रोग केवल मानसिक क्षोभ तथा भाव से ही पैदा होते हैं।’

यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं, सुख तथा समृद्धि पाना चाहते हैं, सफलता का वरण करना चाहते हैं तो विचारों को निर्मल, पवित्र तथा उदात्त बनाइये। यदि कोई ऐसा विचार मन में आये कि आप बीमार हैं, दुर्बल हैं, तो तुरन्त उसे दबा दें। यदि मस्तिष्क से कोई ऐसी ध्वनि निकले जो सफलता में बाधक बने-तो फौरन उसे बाहर निकाल दीजिये। विश्वास रखिये आप संसार के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं तथा ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोग देने के लिये संसार में जन्में हैं। अनेक महत्वपूर्ण कार्य आपको पूरे करने हैं। उठिये, आगे बढ़िये-मंजिल पर तीव्रता से कदम बढ़ाइये, जीवन के किसी मोड़ पर खड़ी सफलता आतुरता से आपकी प्रतीक्षा कर रही है।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/October.44

मंगलवार, 8 मार्च 2016

विचार शक्ति का महत्व समझिये। (भाग 1)

व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही व्यवहार करता है। विचारों का प्रभाव हमारे आचार पर अवश्यंभावी रूप से पड़ता है। अतएव मानव जीवन की सफलता के लिये स्वस्थ एवं उन्नत विचार परमावश्यक हैं। शारीरिक स्वास्थ्य तथा सौंदर्य भी स्वस्थ एवं प्रसन्न मन पर ही निर्भर है अतएव स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन का होना अनिवार्य है।

जैसी हमारी मानस कल्पनाएं तथा विचार होंगे, वैसा ही जीवन भी ढल जायेगा। वस्तुतः हम जो सोचते हैं, उससे शरीर की ग्रन्थियों में एक प्रकार का रस द्रवित होता है। यदि विचार सुखदाय, स्फूर्तिवान तथा आशाप्रद होंगे तो शरीर के नन्हें-नन्हें कोषों तथा रोमों को भी नूतन स्फूर्ति एवं चैतन्यता प्राप्त होगी। इसके विपरीत भय, चिन्ता, द्वेष एवं मनोमालिन्य की भावनाएं शरीर के घटकों में अज्ञात विष उड़ेलती रहती हैं जिससे जीवन शक्ति तथा कार्यक्षमता नष्ट होती है तथा अनगिनत रोग और पीड़ाएं उत्पन्न होती हैं। स्वस्थ रहने के लिये यह परमावश्यक है कि हमारे मन में निराशा, चिन्ता, दुर्बलता और अवसाद के विचार न आने पायें। रोगों की जड़ें शरीर में नहीं अपितु मन में होती हैं।

अनेकों व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अपने भाव संस्थान को निर्बल तथा कायर भावनाओं से विकृत बनाये रहते हैं। वे स्वयं को संसार के दुर्भाग्यशाली व्यक्तियों में गिनने हैं इस बात में विश्वास रखते हैं कि उन्हें किसी कार्य में सफलता प्राप्त हो ही नहीं सकती। परिणामतः या तो वे कार्य ही नहीं करते, यदि प्रारम्भ भी करते हैं तो असफलता के भय से या बाधायें आ जाने पर, बीच में ही छोड़ बैठते हैं। बिना दृढ़ निश्चय एवं संकल्प शक्ति के कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/October.44

शनिवार, 5 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 19)

गुरुचेतना में समाने की साहसपूर्ण इच्छा

शिष्य संजीवनी का यह सूत्र बड़ा अटपटा सा है, किन्तु इसमें बड़े ही रहस्यमय सच समाए हैं। और सच कहो तो अध्यात्म सदा से रहस्य ही है। रहस्य का मतलब ही होता है कि जिसे खोजने तो हम निकल सकते हैं, परन्तु जिस दिन हम उसे खोज लेंगे उस दिन हमारा कोई पता ही न होगा। अध्यात्म के अलावा जितनी दूसरी खोजें हैं, वे तथ्य परक हैं। तथ्य और रहस्य में एक भारी फरक है।

और वह भारी फरक यह है कि तथ्य चाहे जिस किसी चीज से सम्बन्धित हो, सदा ही  बुद्धि से नीचे रहता है, लेकिन रहस्य हमेशा ही बुद्धि से ऊपर रहता है। तथ्य की गहराई को जब बुद्धि खोजने जाती है, तो स्वयं खो जाती है। तथ्यों को हम अपनी मुट्ठी में रखने में समर्थ होते हैं, पर रहस्य स्वयं हमें ही अपनी मुट्ठी में रख लेता है।

शिष्य संजीवनी का यह पाँचवा सूत्र कुछ ऐसा ही है। सूत्रकार इस मानवीय स्वभाव से परिचित है कि मनुष्य इच्छा किए बिना रह नहीं सकता। हर पल एक नयी इच्छा-नयी चाहत मन में अंकुरित होती रहती है। इच्छाओं की यह बेतरतीब बाढ़ हमारा सारा जीवन रस चूस लेती है। सूत्रकार कहते हैं कि इसका उलटा भी सम्भव है। यानि कि यदि इच्छा के स्वरूप को बदल दिया जाय, तो इच्छा का यह नया रूप हमारे जीवन रस को चूसने या सोखने की बजाय बढ़ाने वाला सिद्ध हो सकता है।

इसके लिए करना इतना भर होगा- कि जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो। जबकि हम करते इसके ठीक उल्टा हैं। उसे चाहते हैं- उसे पाने की कोशिश करते हैं, जो बाहर है। ये बाहर की इच्छाएँ किसी भी तरह यदि पूरी हो भी जाती हें, तो भी परेशानियाँ और अंधेरा ही बढ़ता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/guruc
आलोचना से डरें नहीं- उसके लिये तैयार रहें। (भाग 3)

अपनी निष्पक्ष समीक्षा आप कर सकना यह मनुष्य का सबसे बड़ा साहस है। अपने दोषों को ढूँढ़ना, गिनना और समझना चाहिए। साथ ही यह प्रयत्न करना चाहिए कि उन दुर्गुणों को अपने व्यक्तित्व में से अलग कर दिया जाय। निर्दोष और निर्मल व्यक्तित्व विनिर्मित किया जाय। जिस प्रकार हम दूसरों के पाप और दुर्गुणों से चिढ़ते हैं और उनकी निन्दा करते हैं वैसी ही सख्ती हमें अपने साथ भी बरतनी चाहिए और यह चेष्टा करनी चाहिए कि निन्दा करने का कोई आधार ही शेष न रहे और अप्रिय आलोचना के वास्तविक कारणों का ही उन्मूलन हो जाय।

अपने आप से लड़ सकना शूरता का सबसे बड़ा प्रमाण है। दूसरों से लड़ सकने को तो निर्जीव तीर तलवार भी समर्थ हो सकते हैं पर अपने से लड़ने के लिए सच्ची बहादुरी की जरूरत पड़ती है।

हम अपनी आलोचना आप करें ताकि बाहर वालों को निन्दात्मक आलोचना करने का अवसर ही न मिले। हम प्रशंसा के योग्य रीति-नीति अपनायें ताकि हर दिशा से प्रशंसा के प्रमाण अपने आप बरसने लगें।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1972 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/September.20

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...