👉 भक्ति के अपूर्व सोपान हैं- श्रवण और कीर्तन
इस भक्तिसूत्र ने सभी के भावसूत्रों को स्वयं में गूंथ लिया। सच यही है कि यदि भगवान की कथा को ठीक-ठीक सुना गया, हृदय के पट खोलकर सुना गया, केवल कानों से नहीं प्राणों से सुना गया तो निश्चित ही भगवान के गुणों को सुनते-सुनते, अन्तःकरण में उनके स्मरण का सातत्य बनने लगेगा। जो सुना जाता है, वही बोध बन जाता है और हृदय से सुना हुआ धीरे-धीरे जीवन में रमता जाता है। जो गहराइयों में सुना जाता है, वह रोएँ-रोएँ में व्याप्त हो जाता है। सतत सुना हुआ धीरे-धीरे घेर लेता है और फिर समूचा जीवन उसमें डूब जाता है।
श्रवण की जितनी महिमा है, उतनी ही कीर्तन की भी है। श्रवण के साथ कीर्तन भी जरूरी है। श्रवण एवं कीर्तन दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। सुनना निष्क्रिय है तो कीर्तन सक्रिय है। निष्क्रियता में सुनें तो सक्रियता में अभिव्यक्त करें। व्यर्थ की चर्चा, व्यर्थ की बातों से भला क्या होगा। बातें हों, चर्चा हो तो अपने प्रिय प्रभु के सौन्दर्य की। चर्चा हो तो उनके विराट् अस्तित्त्व की। ऐसी चर्चा होती है तो कहने वाले को, सुनने वाले को, दोनो को ही भगवान का बरबस स्मरण हो आता है। यह स्मरण होता रहे तो धीरे-धीरे भगवान और भक्त कब एकात्म-एकाकार हो जाते हैं पता ही नहीं चलता।
देवर्षि के इस सूत्र के साथ अनेकों की भावनाओं के ये अनगिन धागे भी गुंथते चले गए। भावों में भक्ति का उफान उठा और उफनता ही चला गया। देवर्षि अपने साथ बैठे अन्य ऋषियों के साथ इसे अनुभव करते रहे। तभी उनके स्मृतिसरोवर में एक तरंग उठी। इस तरंग का बिम्ब उनके माथे की लकीरों में भी प्रकट हुआ। ये लकीरें किंचित गहरी हुईं। इस सूक्ष्म परिवर्तन को ऋषि धौम्य ने अनुभव किया और वे बोल उठे- ‘‘देवर्षि नारद निरन्तर भगवन्नाम का संकीर्तन करते रहते हैं। उन्हें सहज ही भगवान और उनके भक्तों का सहज सान्निध्य मिलता रहता है। इस सान्निध्य की स्मृतियाँ भी अनेकों होंगी। ऐसी ही किसी स्मृतिकथा का श्रवण कराकर देवर्षि हम सबको धन्य करें।’’ ऋषि धौम्य का यह विचार सभी को प्रीतिकर लगा। इसीलिए सभी ने उत्साहपूर्वक उसका अनुमोदन किया।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५२