मंगलवार, 12 जनवरी 2021

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan 12 Jan 2021

🔸 जिन्दगी को ठीक तरह से जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनो से ही सम्पन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिन्दगी की लम्बी मन्जिल बड़ी हंसी-खुशी और सुविधा के साथ पूरी हो जाती है ।अकेले चलने में यह रास्ता भारी हॊ जाता है और कठिन प्रतीत होता है। ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरन्तर, मित्र, सखा, सेवक, गुरू, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न मांगे, केवल एक ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि धरती ही ईश्वर के स्वर्गलोक जैसी आनन्दलोक प्रतीत होने लगती है। यों  ईश्वर सबके साथ है और वह सबकी सहायता भी करता है पर जॊ उसे समझते और देखते हैं, वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है।
                
🔹 डरता वह है जिसे  ईश्वर का डर नहीं होता। जो  ईश्वर से डरता है , उसके आदेशों का उल्लंघन नहीं करता, उसे संसार  में किसी से  भी डरना नहीं पड़ता। संसार  की हर वस्तु से डरने और सशंकित रहने का एक ही कारण है, ईश्वर से न डरना, उसकी अवज्ञा करना, जो ऐसा नहीं करते, उसे अपना मित्र, सहायक  और मार्गदर्शक मानते हैं उन्हें  सबसे पहला उपहार निर्भयता का प्राप्त हॊता है, उन्हें फ़िर किसी से भी डरना नहीं पड़ता, आपत्तियाँ उसे खिलवाड़ दीखती हैं।  
    
🔸 विपन्नता की स्थिति में धैर्य न छोड़ना, मानसिक संतुलन नष्ट न होने देना, आशा ,पुरुषार्थ को न छोड़ना आस्तिकता का प्रथम चिन्ह है। जिसे परमात्मा जैसी अनन्त सत्ता के साथ बैठने का सौभाग्य प्राप्त है वह किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से क्यों डरेगा? क्यों अधीर होगा? क्यों निराशा और कातरता प्रकट करेगा? धैर्य और साहस की अजस्र धारा उसके मन: क्षेत्र में उठती ही रहनी ही चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 11 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९६)

मंजिल नहीं, पड़ाव है—सवितर्क समाधि
    
योग साधक के लिए यह अवस्था बड़ी खतरनाक होती है। इतने सारे चित्र-विचित्र रंगों का गर्दो-गुबार उसे पागल कर सकता है। यहाँ चाहिए उसे सद्गुरु की मदद। जो उसे सभी भ्रमों से उबार के बचा लें। अराजकता का जो तूफान यहाँ उठ रहा है, उससे उसे निकाल लें। सद्गुरु ही सहारा और आसरा होते हैं यहाँ पर साधक के लिए। क्योंकि यह अवस्था कोई एक दिन की नहीं है। कभी-कभी तो यहाँ कई साल और दशक भी लग जाते हैं और गुरु का सहारा न मिले तो कौन जाने साधक को पूरा जीवन ही यहाँ गुजारना पड़े। पशु, मनुष्य और देवता सभी तो मिल जाते हैं यहाँ। अज्ञानी-ज्ञानी एवं महाज्ञानी सभी का जमघट लगता है यहाँ पर।
    
अनुभवी इस सच को जानते हैं कि अपने अस्तित्व में परिधि से केन्द्र तक बहुत अवस्थाएँ हैं। जो एक के बाद एक नये-नये रूपों में प्रकट होती है। यह अंतर्यात्रा योग साधक के जीवन में सम्पूर्ण रहस्यमय विद्यालय बनकर आती है। एक कक्षा के बाद दूसरी कक्षा। बोध के बदलते स्तर एवं बनती-मिटती सीमाएँ। बाल विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय  तक सारे स्तर यहाँ अपने अस्तित्व में खुलते बन्द होते हैं। इन सभी स्तरों को एक के बाद उत्तीर्ण करना बड़ा कठिन है। अनुभव तो यही कहता है कि सद्गुरु के बिना इस भँवर से शायद ही कोई विरला निकल पाये।
    
सद्गुरु कृपा हि केवलम्। सवितर्क से निवितर्क तक मार्ग है। सवितर्क समाधि तक तो अनेकों आ पहुँचते हैं। पर निवितर्क तक कोई विरला ही पहुँच पाता है। इन्द्रिय अनुभूति से सवितर्क की अवस्था कठिन तो है, पर सम्भव है। पर सवितर्क से निर्वितर्क की अवस्था अति जटिल है। योग सूत्रों के बौद्धिक व्याख्याकार भले ही कुछ कहते रहें, भले ही वे इन दोनों अवस्थाओं में मात्र एक अक्षर का अंतर माने, पर यहाँ की सच्चाई कुछ और ही है। यहाँ तक कि यहाँ होने वाली एक हल्की सी भूल भी साधक की सम्पूर्ण साधना का समूचा सत्यानाश कर सकती है। ज्यादातर साधक इसी बिन्दु पर आकर या तो उन्मादी हो जाते हैं या पतित।
    
यहाँ उपजने वाले भ्रम साधकों को उन्मादी बनाते हैं और किसी पूर्व समय के दुष्कृत कर्मबीज साधकों को पतन के अँधेरों में ढँक देता है। बड़ी पीड़ादायक अवस्था है यह। संयम के साथ जितनी सावधानी यहाँ अपेक्षित है, उतनी शायद कहीं भी और कभी भी नहीं होती।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 9 जनवरी 2021

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan

🔸 वातावरण परिवर्तन का स्थूल स्वरूप आंदोलनपरक होता है। सूक्ष्म वातावरण विचार संघात एवं सद्भावनात्मक प्रयोगों से प्रवावित होता है। विशिष्ट आध्यात्मिक उपचारों की प्रचंड उर्जा उत्पन्न करके भी वातावरण बदला जा सकता है। प्रखर प्रतिभाएं अपनी प्राण शक्ति से युग को बदल सकती हैं। अवतारी महामानव समय के प्रवाह को पलटते हैं। ठीक इसी प्रकार तप साधना की चेतनात्मक  प्रचंड उर्जा सूक्ष्म जगत को परिष्कृत करके उसे इस योग्य बना सकती है कि उज्जवल भविष्य की संभावनाएं दैवी अनुग्रह की तरह उभरती, उमड़ती चली आएँ। व्यक्ति विशेष की तपश्चर्या और सामूहिक अध्यात्म साधना के यदि प्रबल प्रयास हो सकें तो वातावरण बदलने चमत्कार उत्पन्न हो सकते हैं।                     

🔹 मनुष्य समाज में वांछित परिस्थितिओं का निर्माण दो आधारों पर ही संभव है- एक है, मानवीय अंत:करण तथा दूसरा है, सूक्ष्म वातावरण। स्थूल साधन ,सुविधाएं एवं परिस्थितिओं में भी परिवर्तन लाना तो होगा, किन्तु वह वस्तुत: उपर्युक्त दोनों तथ्यों पर आधारित है। मूल आधारों में परिवर्तन या तो संभव ही नहीं, यदि हो भी जाए तो टिकाऊ नहीं रह सकता। मनुष्य के अन्त:करण के अनुसार ही उसकी गतिविधियां बनती हैं तथा उसी के अनुसार परिणाम उत्पन्न होने लगते  हैं।
    
🔸 युग परिवर्तन के लिए व्यक्ति और समाज में उत्कृष्टता के तत्वों का अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रबल प्रयत्नों का किया जाना आवश्यक है। व्यक्ति को चरित्रनिष्ठ ही नहीं, समाजनिष्ठ भी हॊना चाहिए। मात्र अपने आप को अच्छा रखना ही पर्याप्त नहीं। अपनापन विस्तृत होना चाहिए और अपने शरीर अवयवों, परिवार सदस्यों की तरह ही समूचे समाज की श्रेष्ठता को सुरक्षित रखने और बढ़ाने के लिए भी प्रयत्न चलाने चाहिए। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९५)

मंजिल नहीं, पड़ाव है—सवितर्क समाधि
    
महर्षि पतंजलि के इस सूत्र में योग साधकों के लिए महत्त्वपूर्ण सूचना है, गहरा संदेश है इसमें। और वह संदेश यह है कि ज्ञान का अधिष्ठान तो अपनी आत्मा है। अपने अस्तित्व के केन्द्र में पहुँचे बगैर सही ज्ञान, सही बोध सम्भव नहीं है। जब तक साधक की केन्द्र तक पहुँच नहीं, तब तक उसे ज्ञान के अनुमान मिलते हैं या फिर ज्ञान का आभास। और बहुत हुआ तो ज्ञान की झलकियों की स्थिति बनती है। इन्द्रियाँ जो देखती-सुनती हैं, उससे सच की सही समझ नहीं बन पड़ती। बुद्धि ठहरी अंधे की लाठी। जिस प्रकार अंधा लाठी के सहारे टटोलता है, अनुमान लगाता है, कुछ उसी तरह का। अंधे की समझ हमेशा शंकाओं से भरी होती है। बार-बार वह सच्चे-झूठे तर्कों व शब्दों के सहारे अपनी शंकाओं को दूर करने के लिए कोशिश करता है। परन्तु देखे बिना, सम्यक् साक्षात्कार के बिना भला सच कैसे जाना जा सकता है।
    
इसके बाद की अवस्था है-बुद्धि के पार की, अंतर्प्रज्ञा के जागरण की। यहाँ मिलती है झलकियाँ, यहाँ खुलता है दिव्य अनुभूतियों का द्वार। यहाँ झलक दिखाता है सच। कुछ यूँ जैसे कि घिरी बदलियों के बीच सूरज अपनी झलक दिखाये और फिर छुप जाये। एक पल का पुण्य आलोक और फिर बदलियों का छत्र अँधेरा। जिसे सवितर्क समाधि कहते हैं, वहाँ ऐसी झलकियों की लुका-छिपी चलती है। बड़ी अद्भुत भावदशा है यह। अंतश्चेतना की विचित्र भावभूमि है यहाँ।
    
यहाँ ज्ञान की कई धाराओं का संगम है। इन्द्रियों का सच, बुद्धि के  सच, अंतर्प्रज्ञा का सच, लोकान्तरों के सच और आत्मा का सच। सभी यहाँ घुलते-मिलते हैं। सवितर्क समाधि में कई रंग उभरते और विलीन होते हैं। समझ में ही नहीं आता कि असली रंग कौन सा है? किसे कहें और किससे कहें कि वास्तविक यही है। जो इससे गुजरे हैं अथवा जो इसमें जी रहे हैं, उन्हीं को इस अवस्था का दर्द मालूम है। क्योंकि बड़े भारी भ्रमों का जाल यहाँ साधक को घेरता है। और अंतस् में होती है गहरी छटपटाहट। समझ में ही नहीं आता कि सच यह है कि वह। यहाँ तक कि स्वयं अपने जीवन, चरित्र एवं चेतना के बारे कई तरह की शंकाएँ घर करने लगती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan

🔸 हमारे चिन्तन में गहराई हो, साथ ही श्रद्धायुक्त नम्रता भी। अंतरात्मा में दिव्य-प्रकाश की ज्योति जलती रहे। उसमें प्रखरता और पवित्रता बनी रहे तो पर्याप्त है। पूजा के दीपक इसी प्रकार टिमटिमाते हैं। आवश्यक नहीं उनका प्रकाश बहुत दूर तक फैले। छोटे-से क्षेत्र में पुनीत आलोक जीवित रखा जा सके तो वह पर्याप्त है। परमात्मा के प्रति अत्यन्त उदारतापूर्वक आत्मभावना पैदा होती है वही श्रद्धा है। सात्विक श्रद्धा की पूर्णता में अंत:करण स्वत: पवित्र हो उठता है। श्रद्धायुक्त जीवन की विशेषता से ही मनुष्य स्वभाव में ऐसी सुंदरता बढ़ती जाती है, जिसे देखकर श्रद्धावान स्वयं संतुष्ट बना रहता है। श्रद्धा सरल हृदय की ऐसी प्रीतियुक्त भावना है, जो श्रेष्ठ पथ की सिद्धि कराती है।                       

🔹 जीवन का सम्मान ही आचार शास्त्र है। अनीति ही जीवन को नष्ट करती है। मूर्खता और लापरवाही से तो उसका अपव्यय भर होता है। बुरी तो बर्बादी भी है पर विनाश तो पूरी विपत्ति है। बर्बादी के बाद तो सुधरने के लिए कुछ बच भी जाता है पर विनाश के साथ तो आशा भी समाप्त हो जाती है। अनीति अपनाने से बढ़कर जीवन का तिरस्कार और कुछ हो नहीं सकता। पाप अनेकों हैं उनमें प्राय: आर्थिक अनाचार और शरीरों को क्षति पहुँचाने जैसी घटनाएं ही प्रधान होती हैं। इनमें सबसे बड़ा पातक जीवन का तिरस्कार है। अनीति अपनाकर हम उसे क्षतिग्रस्त, कुंठित, हेय और अप्रमाणिक बनाते हैं। दूसरों को हानि पहुँचाना जितनी बुरी बात है – दूसरों के ऊपर पतन और पराभव थोपना जितना निंदनीय है, उससे कम पातक यह भी नहीं है कि हम जीवन का गला अपने हाथों घोटें और उसे कुत्सित, कुंठित, बाधित, अपंगों एवं तिरस्कृत स्तर का ऐसा बना दें जो मरण से भी अधिक कष्टदायक हो। 
    
🔸 श्रद्धा तप है। वह ईश्वरीय आदेशों पर निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा देती है। आलस से बचाती है। कर्तव्यपालन में प्रमाद से बचाती है। सेवा धर्म सिखाती है। अंतरात्मा को प्रफुल्ल, प्रसन्न रखती है। इस प्रकार के तप और त्याग से श्रद्धावान व्यक्ति के हृदय मॆं पवित्रता एवं शक्ति का भंडार अपने आप भरता चला जाता है। गुरु कुछ भी न दे  तो भी श्रद्धा में वह शक्ति है, जो अनन्त आकाश से अपनी सफलता में तत्व और साधन को आश्चर्यजनक रूप से खींच लेती है। ध्रुव, एकलव्य, अज, दिलीप की साधनाओं में सफलता का रहस्य उनके अंत:करण की श्रद्धा ही रही है। उनके गुरुओं ने तो केवल उसकी परख की थी। यदि इस तरह की श्रद्धा आज भी लोगों में आ जाए, लोग पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छाओं पर चलने को कटिबद्ध हो जाएं तो विश्वशांति, चिर-संतोष और अनन्त समृद्धि की परिस्थितियाँ बनते देर न लगे। उसके द्वारा सत्य का उदय, प्राकट्य और प्राप्ति तो अवश्यंभावी हो जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 3 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९४)

मंजिल नहीं, पड़ाव है—सवितर्क समाधि

सीमाओं से मुक्त गगन में श्वेत हंस की भाँति साधक उड़ना चाहता है। इसी लिए तो वह अंतर्यात्रा के लिए संकल्पित हुआ था, जिसके प्रयोगों में रहस्यमयता है, किन्तु इनकी परिणति बड़ी स्पष्ट है। जो इन प्रयोगों में संलग्न हैं, वे अपनी अनुभूति में इस सच का साक्षात्कार करते हैं। अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोगों में लवलीन साधक अपनी प्रयोग यात्रा में ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता है, त्यों-त्यों उसके सामने मानव चेतना के नये-नये पहलू उजागर होते हैं। शक्ति एवं ज्ञान के नव स्रोत खुलते हैं। ध्यान की प्रगाढ़ता होते ही योग साधक की अंतःऊर्जा भी प्रगाढ़ होने लगती है। साथ ही प्रखर होने लगती है उसके ज्ञान की रश्मियाँ। चेतना के उच्चस्तरीय आयाम उसमें झिलमिलाते हैं, झलकते हैं। सवितर्क समाधि में यह झलक और भी तीव्र होती है। परन्तु यह सब कुछ नहीं है। यहाँ से मंजिल का अहसास, आभास तो होता है, पर मंजिल अभी दूर ही रहती है।
    
हालाँकि यह स्थिति भी योग साधक की पवित्रता की गवाही देती है। वस्तुतः स्फटिक के समान शुद्घ मन में अंतर्प्रज्ञा जाग्रत तो होती है, परन्तु अभी आत्मा का सम्पूर्ण प्रकाश अस्तित्व में नहीं फैल पाता। यहाँ इस अवस्था में ज्ञान का अरुणोदय तो होता है, परन्तु ज्ञान सूर्य की प्रखरता का चरम बिन्दु अभी भी बाकी रहता है। यह स्थिति अँधेरे की समाप्ति की तो है, परन्तु पूरी तरह उजाला होने में अभी भी कसर बाकी रहती है। यह बीच की भावदशा है और कई बार यहाँ बड़े विभ्रम खड़े हो जाते हैं। क्या सच है और क्या नहीं है? यह प्रश्न सदा मन को मथते रहते हैं।
    
इस भावदशा को बताते हुए महर्षि का सूत्र है-
तत्र शब्दार्थ ज्ञान विकल्पैः सकीर्णा सवितर्का समापत्तिः॥ १/४२॥
शब्दार्थ— तत्र = उनमें; शब्दार्थज्ञानविकल्पैः = शब्द, अर्थ, ज्ञान इन तीनों के विकल्पों से; संकीर्णा = संकीर्ण-मिली हुई; समापत्तिः = समाधि; सवितर्का = सवितर्क है।

अर्थात् सवितर्क समाधि वह समाधि है-जहाँ योगी अभी भी वह भेद करने के योग्य नहीं रहता है, जो सच्चे ज्ञान के तथा शब्दों पर आधारित ज्ञान और तर्क या इन्द्रिय बोध पर आधारित ज्ञान के बीच होता है, क्योंकि यह सब मिली-जुली अवस्था में मन में बना रहता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९३)

स्फटिक मणि सा बनाइये मन
    
जिसे महर्षि कहते हैं शुद्ध स्फटिक की भाँति। परम पूज्य गुरुदेव कहते थे, मन-मन में भेद है। मन कोयला भी है और हीरा भी। विचारों के शोरगुल, विचारों के धूल भरे तूफान में इसका शुद्ध स्वरूप प्रकट नहीं होता है। ध्यान की गहनता इसे सम्भव बनाती है। जो ध्यान करते हैं, इसे अनुभव करते हैं। यह अनुभूति उन्हें शान्ति भी देती है और ऊर्जा भी। इसी से ज्ञान की नवीन किरणें भी फूटती और फैलती हैं। यह अवस्था कुछ ऐसी है जैसे कि गंगाजल को जब घर एक बाल्टी में लाते हैं, तो उसमें काफी कुछ कीचड़-गन्दगी होती है, परन्तु उसमें फिटकिरी का ढेला दो-चार बार घुमादें, तो बाद में सारी गन्दगी शान्त और गंगाजल होता है-एकदम निर्मल-स्वच्छ। बस कुछ ऐसे ही मन में ध्यान की फिटकिरी घुमाने की बात है। फिर यह होता है-शुद्ध स्फटिक की भाँति।

यह मन की विशेष अवस्था है, जिसका अहसास केवल उन्हीं को हो सकता है, जिन्होंने इसे जिया हो-अनुभव किया हो। क्योंकि यह मन की वर्तमान अवस्था एवं व्यवस्थता से एकदम उलट है। जहाँ वर्तमान में अज्ञान, अशान्ति एवं असक्ति छायी रहती है, वही इसमें ज्ञान, शान्ति एवं ऊर्जा के नये-नये रूप भासते हैं। जीवन का हरपल-हरक्षण ज्ञानदायी, शान्तिदायी एवं ऊर्जादायी होता है। और यह सब होता है-बिना किसी बाहरी साधन-सुविधाओं की बैशाखी का सहारा लिये। अभी तो स्थिति है कि ज्ञान चाहिए तो पढ़ो, सीखो; शान्ति चाहिए तो शान्त वातावरण तलाशो और शक्ति चाहिए तो शरीर व मन को स्वस्थ रखने की कवायद करो। पर इस अद्भुत अवस्था वाला मन तो जब, जहाँ, जिस वस्तु, विषय अथवा विचार पर एकाग्र होता है, वही वह उससे तदाकार हो जाता है। और फिर विषय, वस्तु या विचार में निहित ज्ञान, शान्ति एवं ऊर्जा स्वयमेव उसके अपने हो जाते हैं।
    
इसमें प्रतिबिम्बित होता है—बोधकर्त्ता, बोध एवं बोध विषय। यानि कि क्षीणवृत्ति वाले मन का साधक जब, जहाँ, जैसे चाहे किसी भी आधार को लेकर समाधिस्थ हो सकता है। इस क्रम में सबसे पहला आधार तो वह स्वयं ही है। वह यदि स्वयं को ही ध्यान का विषय बना ले, तो स्वयं की सभी सूक्ष्मताओं एवं बारीकियों को भली प्रकार अनुभव कर सकता है। वर्तमान आगत एवं विगत सभी उसे स्वयं में भासते हैं। वह अनुभव कर सकता है, वर्तमान के कारणों को और इसके परिणामों को। विचार हों या संस्कार, अपना जन्म-जन्मान्तर का अतीत हो या फिर सुदूर ठिठका हुआ भविष्य सभी उसे स्पष्ट नजर आते हैं।
    
यही नहीं वह जिसे भी अपने ध्यान का विषय बना ले, उसी के सभी रहस्यों को अनुभव कर सकता है। तदाकार होने की यह अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि है। इसके अवलम्बन से किसी भी वस्तु, व्यक्ति, विषय, विचार के यथार्थ को जाना जा सकता है। ऐसे व्यक्ति के ध्यान की एकाग्रता में सब कुछ बड़े स्पष्ट रीति से साफ-साफ प्रतिबिम्बित होता है। ऐसा सम्प्रज्ञात समाधि पाने वाला योगी जब जो चाहे देख-जान सकता है। कहते हैं कि ज्योतिष के मर्मज्ञ अतीत को पहचान लेते हैं और भविष्य की आहट को सुन लेते हैं। परन्तु इसके लिए उन्हें अपने  अद्वितीय अनुमानों का सहारा लेना पड़ता है। इस सम्बन्ध में उनकी दृष्टि व अनुभव बहुत ही सीमाओं में बँधे होते हैं।
    
परन्तु वह योग साधक जिसका चित्त स्फटिक की भाँति स्वच्छ है, उसके संकल्प मात्र से, तनिक सा एकाग्र होने पर से उसे सब कुछ अनुभव होने लगता है। परन्तु इसमें अभी तर्क की सीमाएँ बनी रहती हैं। विकल्प की अवस्था बनी रहती है। वह इस अवस्था को पाने के बाद भी भेदों के पार नहीं जा पाता। सीमाबद्ध होता है, उसका ज्ञान। सीमाओं से मुक्त होने के लिए तो समाधि की निर्वितर्क अवस्था चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 शान्तिकुंज - कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी

मित्रो! सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ  बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं को है, जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो, जो पढ़े-लिखे हों। इस तरह के लोग आयेंगे तो ठीक है, नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगी साक्षात् नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप। जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारे जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें, वे लोग आएँ। 

प्रतिभावानों के लिए निमन्त्रण है, बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमन्त्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे। आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या-क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है। यह कॉलेज है, विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आपमें से जिन्हें आदमी बनना हो, इस विद्यालय की संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमन्त्रण है। कैसे जीवन को ऊँचा उठाया जाता है, समाज की समस्याओं का कैसे हल किया जाता है? यह आप लोगों को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों, भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ। अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.४१

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९२)

स्फटिक मणि सा बनाइये मन

यह तथ्य भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिये कि असंभव को संभव बनाने वाला अन्तर्यात्रा का विज्ञान उनके लिए ही है, जो अंतर्चेतना के वैज्ञानिक होने के लिए तत्पर हैं। वैज्ञानिक अपनी अनूठी दृष्टि, प्रक्रियाओं एवं प्रयोगों की वजह से विशेष होता है। जिन बातों को, जिन तथ्यों को सामान्य जन यूँ ही कहकर टाल देते हैं, वह अपनी विशेष दृष्टि से उनमें कुछ विशेष की खोज करता है। अपने अनुसंधान के अध्यवसाय से वह इनमें से ऐसे रहस्यों को उजागर करता है, जिनके बारे में कभी जाना, समझा एवं कहा-सोचा नहीं गया था। इन अर्थों में वह साधक होता है, सामान्य और औसत मनुष्यों से अलग। दूसरे अर्थों में योग साधक भी रहस्यवेत्ता वैज्ञानिक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सामान्य पदार्थ वैज्ञानिक बाह्य प्रकृति एवं पदार्थों को लेकर अनुसंधान करते हैं, जबकि योग साधक आंतरिक प्रकृति एवं चेतना को लेकर अनुसंधान करते हैं। जिस जीवन को साधारण लोग दुःखों का पिटारा या फिर सुख-भोग का साधन समझते हैं, उसमें से वह अलौकिक आध्यात्मिक विभूतियों के मणि-मुक्तकों का अनुसंधान कर लेता है। 
     
ध्यान की परम प्रगाढ़ता संस्कारों की काई-कीचड़ को धो डालती है। हालाँकि यह सब होता मुश्किल है, क्योंकि एक-एक संस्कार को मिटने-हरने में भारी श्रम, समय एवं साधना की जरूरत पड़ती है। इन तक पहुँचने से पहले मन की उर्मियों को शान्त करना पड़ता है। मन की लहरें जब थमती हैं, मन की शक्तियाँ जब क्षीण होती हैं, तभी साधना गहरी व गहन होती है। इसी सत्य को महर्षि ने अपने इस सत्य में स्पष्ट किया है-
    
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः॥ १/४१॥
    
शब्दार्थ-क्षीणवृत्तेः = जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे; मणेः इव अभिजातस्य = स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का; ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु = ग्रहीता (पुरुष), ग्रहण (अंतःकरण और इन्द्रियाँ) तथा ग्राह्य (पञ्चभूत एवं विषयों) में; तत्स्थतदञ्जनता = स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना ही; समापत्तिः = सम्प्रज्ञात समाधि है।

अर्थात् जब मन की वृत्तियाँ क्षीण होती हैं, तब मन हो जाता है शुद्ध स्फटिक की भाँति। फिर वह समान रूप से प्रतिबिम्बित करता है—बोधकर्त्ता को, बोध को और बोध के विषय को।
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र अपने में अनेकों रहस्य समेटे है। इसका प्रत्येक चरण मूल्यवान् है, इसे सही रीति से समझने के लिए जरूरी है इसके प्रत्येक चरण में अपना ध्यान केन्द्रित करना। इस क्रम में सबसे पहली बात है, मन की वृत्तियों का क्षीण होना। सच तो यह है कि मन का अपना कोई विशेष अस्तित्व नहीं। यह तो बस विचारों-भावों की लहरों का प्रवाह है। इन लहरों की गति एवं तीव्रता कुछ ऐसी है कि मन का अस्तित्व भासता है। सारी उम्र ये लहरें न तो थमती है और न मिटती है। यदि कोई तरीका ऐसा हो कि ये लहरें शान्त हो जाएँ? आम जन के लिए तो ऐसा कठिन है। पर ध्यान इन कठिन को सम्भव बनाता है। ध्यान ज्यों-ज्यों गहरा होता है, मन की लहरें शान्त पड़ती जाती हैं और इस शान्ति के साथ प्रकट होती है-एक अद्भुत स्वच्छता।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १६२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सच्चिदानन्द

भगवान् के यों अगणित नाम हैं उनमें से एक नाम है-सच्चिदानंद। सत् का अर्थ है-टिकाऊ अर्थात् न बदलने वाला-न समाप्त होने वाला। इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वही है। परिवर्तनों का सूत्र-संचालक भी वही है। इसलिए परब्रह्म को सत् कहा गया है।
    
चित् का अर्थ है-चेतना, विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप हैं। मानवी अंतःकरण में उसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। बुद्धिमान् और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरों के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।
    
प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग-अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनंत चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों को व्यवस्था का एवं प्राणियों को चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए उसे ‘चित्’ अर्थात् चेतन कहते हैं।
    
इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘आनंद’ है। आनंद जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसी ओर दौड़ता है। शरीरगत इन्द्रियाँ अपने-अपने लालच दिखाकर मनुष्य को सोचने और करने की प्रेरणा देती हैं। सुविधा-साधन शरीर को सुख प्रदान करते हैं। मानसिक ललक-लिप्सा, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए ललचाती रहती हैं। अंतःकरण की उत्कृष्टता वाला पक्ष आत्मा कहलाता है। उसे स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति, समाधि जैसे आनंदों की अपेक्षा रहती है।
    
वस्तुतः आनंद प्रकारान्तर से प्रेम का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु, व्यक्ति एवं प्रकृति से प्रेम हो जाता है, वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष-द्वेष उभर पड़े, तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान्, गुणवान् होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।
    
अँधेरे में  जितने स्थान पर टॉर्च की रोशनी पड़ती है, उतना ही प्रकाशवान् होता है। वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टॉर्च-प्रकाश कहना चाहिए, जिसे जहाँ भी फें का जाएगा, वहीं सुंदर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारा दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान ही आनंददायक अथवा अप्रिय, कुरूप बनाता चलता है और दृष्टिकोण के अनुसार ही अनुभूति होते चली जाती है। 
    
आनंद ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुख है अर्थात् ईश्वर ही आनंद है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। 
    
आत्मा परमात्मा का ही एक सूक्ष्म अंश माना गया है। यह आत्मा उसी सच्चिदानंद को निरंतर खोजती रहती है, परन्तु माया के अवरोध के कारण उसको प्राप्त नहीं कर पाती है। जब माया का आवरण हट जाता है, तो सच्चिदानन्द के स्वरूप का बोध हो जाता है और वह उसी में निमग्न हो जाती है। 
    
आत्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप को प्राप्त करने की अभिलाषा शाश्वत है। उसे प्रेम या भक्तियोग से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह लौकिक प्रेम की श्रेणी का नहीं, अपितु अध्यात्म श्रेणी का है, जिसके द्वारा सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है। यह स्पष्ट जानना चाहिए कि परमात्मा के अनेकानेक नाम है। उनमें से सच्चिदानन्द नाम भी सार्थक है।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 उपासना और साधना का समन्वय

साधना का दूसरा-पक्ष उत्तरार्ध, उपासना है। विविधविध शारीरिक और मानसिक क्रियाकृत्य इसी प्रयोजन के लिए पूरे किए जाते हैं। शरीर से व्रत, मौन, अस्वाद, ब्रह्मचर्य, तीर्थयात्रा, परिक्रमा, आसन, प्राणायाम, जप, कीर्तन, पाठ, बन्ध, मुद्राएं, नेति, धौति, बस्ति, नौलि, बज्रोली, कपालभाति जैसे क्रियाकृत्य किए जाते हैं। मानसिक साधनाओं में प्राय: सभी चिन्तन परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिंदुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षटचक्र वेधन, कुंडलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के किए जाने वाले, मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किए जाने वाले सभी कृत्य ध्यान योग की श्रेणी में गिने जाते हैं। स्थूल शरीर से श्रमपरक, सूक्ष्म शरीर से चिन्तनपरक उपासनाएं की जाती हैं। कारणशरीर तक केवल भावना की पहुँच है। निष्ठा, आस्था, श्रद्धा का भाव भरा समन्वय 'भक्ति' कहलाता है। प्रेम-संवेदना इसी को कहते हैं। यह स्थिति तर्क से ऊपर है। मन और बुद्धि का इसमें अधिक उपयोग नहीं हो सकता है। भावनाओं की उमंग भरी लहरें ही अन्त:करण के मर्मस्थल का स्पर्श कर पाती हैं।

मनुष्य के अस्तित्व को तीन हिस्सों में बाँटा गया है – सूक्ष्म, स्थूल और कारण। यह तीन शरीर माने गए हैं। दृश्य सत्ता के रूप में हाड़-मांस का बना सबको दिखाई पड़ने वाला चलता-फिरता, खात-सोता, स्थूल शरीर है। क्रिया शीलता इसका प्रधान गुण है। इसके नीचे वह सत्ता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इसका कार्य समझ और केन्द्र मस्तिष्क है। शरीर विज्ञान में अनाटांमी, फ़िज़ियालोजी दो विभाजन हैं। मन:शास्त्र को साइकोलाजी और पैरा-साइकोलाजी इन दो भागों में बाँटा गया है। मन के भी दो भाग हैं – एक सचेतन, जो सोचने विचारने के काम आता है और दूसरा अचेतन, जो स्वभाव एवं आदतों का केन्द्र है। रक्त संचार, स्वांस-प्रस्वांस, आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष जैसी स्वसंचालित रहने वाली क्रियाएं इस अचेतन मन की प्रेरणा से ही संभव होती हैं। तीसरा कारण शरीर- भावनाओं का,  मान्यताओं एवं आकांक्षाओं का केन्द्र है, इसे अन्त:करण कहते हैं। इन्हीं में 'स्व' बनता है। 

जीवात्मा की मूल सत्ता का सीधा सम्बंध इसी  'स्व' से है। यह  'स्व'  जिस स्तर का होता है, उसी के अनुसार विचारतंत्र और क्रियातंत्र काम करने लगते हैं। जीवन की सूत्र संचालक सत्ता यही है। कारण शरीर का स्थान हृदय माना गया है। रक्त फेंकने वाली और धड़कते रहने वाली थैली से यह केन्द्र भिन्न है। इसका स्थान दोनों ओर की पसलियों के मिलने वाले आमाशय के ऊपर वाले स्थान को माना गया है। साधना विज्ञान में हृदय गुफा में अंगुष्ठ प्रमाण प्रकाश ज्योति का ध्यान करने का विधान है। यहाँ जीवात्मा की ज्योति और उसका निवास 'अहम्'  मान्यता के भाव केन्द्र में माना गया है। शरीर में  इसका केन्द्र जिस  हृदय में है,  उसे अन्त:करण नाम दिया गया है। 'कारणशरीर' के रूप में इसी की व्यवस्था की जाती है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९१)

अतिचेतन तक को वश में कर लेता है ध्यान

इसके बाद अगली स्थिति मन की है। मन की गंगा में विचार व भावनाओं का जल बहता है। इसे प्रदूषण मुक्त करना एवं इस प्रवाह को नियंत्रित करना, इसे ऊर्जा केन्द्र के रूप में परिवर्तित करना ध्यानयोग के साधक की अगली चुनौती है। जिस तरह से नदी के जल पर बाँध बनाकर उस जल के वेग को शक्ति में परिवर्तित किया जाता है। कुछ इसी तरह की चुनौती ध्यान के साधक की भी होती है। यदि जलधारा के वेग को नियंत्रित न किया जा सका, तो इससे टरबाइन चलाना सम्भव नहीं होगा और फिर विद्युत् उत्पादन न हो सकेगा। ध्यान के साधक को भी अपने विचार व भाव प्रवाह को ध्येय की लय में बाँधना पड़ता है।
    
निरन्तर प्रयास से ऐसा हो पाता है। पवित्र ध्येय के साथ जब मन लय पूर्ण होता है, तो न केवल विचार एवं भावनाएँ शुद्ध होती हैं, बल्कि उनमें ऊर्जस्विता आती है और ये सचमुच ही लेजर किरणों के पुञ्ज में बदल जाती है। अभी की स्थिति में तो हमारी ऊर्जा टिमटिमाहट की भाँति है, इससे कोई विशेष कार्य नहीं सध सकता। ध्यान की प्रक्रिया में आध्यात्मिक शल्य चिकित्सा के लिए मन की तरंगों का लेजर किरणों के पुञ्ज में परिवर्तित होना अनिवार्य है। यही वह उपकरण है, जिसके प्रकाश में अचेतन की गहराइयों में उतरना सम्भव हो जाता है। इसी के द्वारा अचेतन के संस्कारों की शल्य क्रिया बन पड़ती है। यह प्रक्रिया जटिल है, कठिन है, दुरूह है, दुष्कर है। यह श्रम साध्य भी है और समय साध्य भी।
    
चेतन मन की तरंगों से जो लेजर किरणों का पुञ्ज तैयार होता है, उसी से अचेतन के संस्कारों को देखना एवं इन्हें हटाना बन पड़ता है। ये संस्कार परत दर परत होते हैं। इनकी परतों में भारी विविधताएँ होती हैं, जो कालक्रम से प्रकट होती हैं। यह विविधता परस्पर विरोधाभासी भी हो सकती है। उदाहरण के लिए एक परत में साधना के संस्कार हो सकते हैं, तो दूसरी में  वासना के। एक परत में साधुता के संस्कार हो सकते हैं, तो दूसरी में शैतानियत के। इस सत्य को ठीक तरह से जानने के लिए ध्यान के गहरे अनुभव से गुजरना निहायत जरूरी है।
    
सामान्य जीवन के उदाहरण से समझना हो, तो यही कहेंगे कि जिस तरह बीज में वृक्ष का समूचा अस्तित्व छिपा होता है, उसी तरह से अचेतन की परतों में मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व समाया होता है। बीज से पहले कोपलें एवं जड़ें निकलती हैं, उसकी कोमलता को देख औसत व्यक्ति यह नहीं सोच सकता कि इस वट बीज में कितना वृहत् आकार छुपा है, परन्तु कालक्रम में धीरे-धीरे सब प्रकट होता है। जेनेटिक्स को जानने वाला कुशल वैज्ञानिक अपने कतिपय प्रक्रियाओं से उसमें कुछ परिवर्तन भी कर सकता है। ठीक यही बात ध्यान के बारे में है-इस प्रयोग में ध्यान विज्ञानी अचेतन के संस्कारों का आवश्यक परिष्कार, परिमार्जन यहाँ तक कि रूपान्तरण  तक करने में समर्थ होते हैं।
    
इतना ही अचेतन के अँधेरों से निकल अतिचेतन के प्रकाशमय लोक में प्रवेश करते हैं। और तब आती है वह स्थिति, जिसके लिए महर्षि पतंजलि कहते हैं कि योगी हो जाता है मालिक, अतिसूक्ष्म परमाणु से लेकर अपरिसोम तक का। क्योंकि अतिचेतन के पास सारी शक्ति होती है। वह होता है सर्वशक्तिमान, वह होता है सर्वत्र, वह होता है सर्वव्यापी। अतिचेतन के पास वह हर एक शक्ति होती है, जो सम्भव होती है। यह वह स्तर है, जहाँ सारे असम्भव सम्भव बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९०)

अतिचेतन तक को वश में कर लेता है ध्यान

अंतर्यात्रा के पथ पर श्रद्घा एवं सम्पूर्ण सामर्थ्य से चल रहे साधक के व्यक्तित्व से कभी ज्ञान के आश्चर्य पल्लवित होते हैं, तो कभी उसमें अचरज में डालनी शक्ति सामर्थ्य नजर आती है। जिसे कभी सुना नहीं गया, जिसके बारे में कभी सोचा नहीं गया, ऐसे कितने ही अचरज साधक के सामने आ खड़े होते हैं। इसी के साथ आती है-अलौकिक शक्तियाँ, जिनमें अपार, अद्भुत एवं आश्चर्यपूर्ण सामर्थ्य होती है। अंतर्यात्रा के इस दौर में जो कुछ भी घटित होता है, उसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर बताया नहीं जा सकता। यदि उसे बताया भी जाय, तो सुनने वालों को यह सब नानी की कहानी की भाँति लगेगा। तार्किक लोग इसे अविश्वसनीय कहेंगे। और बुद्धिमान लोगों के लिए यह गल्प कथा होगा।
    
पर महर्षि पतंजलि कहते हैं कि यह उनके लिए सत्य है, जो ध्यान करते हैं, जिनके पास ध्यान की पारसमणि है, उनसे स्वर्ण राशि दूर नहीं, क्योंकि इस लोहे से जीवन की कुरूपता ही सुवर्ण में बदल जाने वाली है। 
    
महर्षि अपने अगले सूत्र में ध्यान के प्रभाव को बताते हुए कहते हैं-
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः॥ १/४०॥
    
शब्दार्थ-(उस समय) अस्य=इसका (योग साधक का); परमाणुपरममहत्त्वान्तः = परमाणु से लेकर परम महत्त्व तक; वशीकारः = वशीकार (हो जाता है)।
    
अर्थात्  इस प्रकार योगी अति सूक्ष्म परमाणु से लेकर अपरिसोम तक सभी का वशीकार कर लेता है अर्थात वश में कर लेता है।
    
इस सूत्र में आश्चर्य तो है, पर ऐसा जो अनिवार्यतः घटित होता है-योग साधक की ध्यान-साधना में। इस सूत्र में निहित भाव इतना ही है कि ध्यान द्वार है अपरिसोम का, अतिचेतन का। जो इस द्वार को खोलना जानता है, उसके जीवन में सभी असम्भव सम्भव होते हैं। लेकिन यह सब होता तभी है, जबकि साधक को ध्यान की तकनीक में विशेषज्ञता हासिल हो। सामान्यतया देखा यही जाता है कि ध्यान के गहरे विज्ञान से लोगों का परिचय नहीं है। साधारण जनों की बात तो जाने दें, अपने को ध्यानयोगी महात्मा बताने वाले भी ध्यान की यथार्थता व सार्थकता से अपरिचित नजर आते हैं। ध्यान के नाम पर जो होता या किया जाता है, वह प्रायः नींद लाने वाली गोली से अधिक कुछ नहीं होता। ये पंक्तियाँ किसी को बुरी जरूर लग सकती है, पर सत्य को तो सुना व स्वीकारा जाना ही चाहिए।

जिन्हें ध्यान की गहरी अनुभूति है, वे इस सत्य से अवश्य सहमत होंगे कि ध्यान एक गहन आध्यात्मिक शल्य क्रिया है। इसे बड़ी बारीकी एवं समझदारी से करना पड़ता है। यह समूची प्रक्रिया तीन चरणों में सम्पन्न होती है। युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव के अनुसार ध्यान करने से पहले व्यक्ति को ध्यान के लायक होना पड़ता है। ध्यान की यह सुपात्रता ही ध्यान की प्रक्रिया का पहला चरण है- जिसमें शरीर व मन को ध्यान के अनुरूप बनाना पड़ता है। शरीर स्वस्थ, हल्का-फुल्का व निरोग रहे, इसके लिए आवश्यक है-खान-पान का संयम। ध्यानयोगी का भोजन औषधि की भाँति होना चाहिए। जो शरीर को स्वस्थ रखने में तो सहायक हो, परन्तु शरीर को ऐसा न बनाये, जिससे मानसिक चेतना देह पर ही टिकी रहे। शरीर की स्थिति ऐसी हो, जो मन को ऊर्ध्वगामी बनाने में सहायक हो।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

👉 आप समर्पित हो जाइए

मित्रो ! मनुष्य की सामान्य शक्ति सीमित है। प्रत्येक प्राणी को भगवान ने उतना ही सामान दिया है कि वह अपने जीवन का गुजारा कर ले। कीड़े-मकोड़ों को, पशुओं को, पक्षियों को इतना ही ज्ञान, साधन, शक्ति और इन्द्रियाँ मिली हैं, ताकि वह अपना पेट भर ले और वंशवृद्धि की इच्छा पूरी करने के लिए औलाद पैदा करता रहे। लेकिन अगर आपको कुछ इससे ज्यादा जानना हो या प्राप्त करना हो, तब आपको वहाँ जाना पड़ेगा, जहाँ शक्तियों के भण्डार भरे पड़े हैं। एक जगह ऐसी है, जहाँ बहुत शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। जहाँ सम्पत्ति का कोई ठिकाना नहीं। जहाँ समृद्धि भरी पड़ी है। सारे विश्व का मालिक भगवान है, यह सब उसी का तो सामान है। 

एक सर्वशक्तिमान सत्ता है भगवान। उसके साथ अगर आप नाता जोड़ लें, तो आपकी मालदारी का कोई ठिकाना नहीं रहेगा। आप इतने सम्पन्न हो जाएँगे कि मैं कह नहीं सकता आपसे। आप बापा जलाराम के तरीके से सम्पन्न भी हो सकते हैं, आप सुदामा के तरीके से मालदार भी हो सकते हैं, विभीषण के तरीके से धनवान भी हो सकते हैं, सुग्रीव के तरीके से मुसीबतों से बचकर खोया हुआ राजपाट पा सकते हैं, आपके यहाँ नरसी मेहता के तरीके से हुण्डी भी बरस सकती है। उसके यहाँ कोई कमी नहीं है। यहाँ जो आपको बुलाया गया है, उसका एक कारण यह भी है कि आपसे कहा जाए कि आप भगवान के साथ में अपना रिश्ता जोड़ लीजिए। आप पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं। उसका मतलब यह है कि आप इन उपायों के द्वारा अपना रिश्ता भगवान के साथ में जोड़ लें और भगवान के साथ रिश्ता जुड़ गया, तो मजा आ जाएगा। ...

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८९)

अभिरुचि के ही अनुरूप हो ध्यान 
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र पहले के सभी सूत्रों से कहीं अधिक गहन एवं व्यापक है। साथ ही इस सूत्र में उनकी वैज्ञानिकता के गहरे रहस्य भी निहित हैं। ध्यान के प्रयोग के लिए विषय वस्तु के चुनाव में अभिमत का, आकर्षण का, गहन रुचि का भारी महत्त्व है। किसी के व्यक्तित्व पर ध्येय को आरोपित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा हुआ अथवा किया गया, तो ध्यान बोझ बन जाएगा। ध्यान के क्षण विश्रान्ति न बनकर व्यायाम बन जाएँगे। दुर्भाग्यवश होता ऐसा ही है। अपनी मान्यताओं, आग्रहों, प्रतीकों को सभी के ध्यान का विषय बनाने के लिए भारी प्रयत्न किए जाते हैं। यही वजह है कि ध्यान के ज्यादातर प्रयोग अपने सार्थक परिणाम नहीं प्रस्तुत कर पाते।
    
ध्यान अपने यथार्थ में सम्प्रदाय, मजहब, देश, काल की सीमाओं में बँधा हुआ नहीं है। इसकी असीमता व्यापक है, इसके उद्देश्य उच्चतम है। यह तो व्यक्तित्व को रूपान्तरित करने वाली औषधि है। इस अर्थ में ध्यान की प्रक्रिया एवं विषय वस्तु का चुनाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसी तरह से किया जाना चाहिए, जिस तरह से कोई चिकित्सक अपने मरीज के लिए औषधि चुनता है। समाधान के पहले निदान की प्रक्रिया अनिवार्य है। और निदान तभी सम्भव है, जब व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं एवं उसके गुण-दोषों की सम्यक् जानकारी ली गयी हो।
    
ध्यान की प्रक्रिया का सच यह है कि ध्यान की विषय वस्तु के प्रति साधक के मन में गहरी आस्था हो। उसके भाव एवं विचार सहज ही उस ओर बहने लगे। ध्यान की विषय वस्तु के चिन्तन एवं स्फुरण मात्र से उसके अन्तस् में उल्लास एवं श्रद्धा तरंगित हो। अपने आप ही उसका विचार प्रवाह ध्यान की विषय वस्तु में विलीन होने के लिए आतुर हो उठे। और ऐसा तभी हो सकता है, जब ध्यान की विषय वस्तु व्यक्ति के अन्तस् की विशेषताओं के अनुरूप हो। उदारण के लिए एक प्रकृति प्रेमी व्यक्ति के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य ध्यान की विषय वस्तु बन सकता है। जबकि एक विचारवान् व्यक्ति  किसी दार्शनिक विचार पर ध्यान करना अधिक पसन्द करेगा।
    
नीलगगन में आते हुए सूरज का ध्यान किसी एक के लिए सहज है। जबकि दूसरे की श्रद्धा गोपाल कृष्ण में टिकती है। किसी को भगवान् बुद्ध की ध्यानस्थ मूर्ति संवेदित करती है, तो कोई महापराक्रमी हनुमान् को अपने ध्यान का केन्द्र बनाना चाहता है। इन सबसे अलग किसी की आस्था साकार सीमाओं से अलग व्यापक विराट् निराकार में टिकती है। असीमता का भाव उसमें संवेदनों की सृष्टि करता है। किसी का मन उपनिषदों के  तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के चिन्तन में रमता है। यदि प्रश्न यह उठे कि इसमें से श्रेष्ठ क्या है? तो उत्तर यह होगा कि व्यक्तित्व की विशेषताओं के अनुरूप वह सभी ध्यान श्रेष्ठ है।
    
इस सम्बन्ध में एक सत्य और है कि ध्यान की विषय वस्तु का चयन उचित है या नहीं? इसका मापन इस बात से भी होता है कि ध्यान करने वाले की चेतना निरन्तर परिमार्जित, पवित्र एवं रूपान्तरित हो रही  है या नहीं। पवित्रता एवं रूपान्तरण को ध्यान के प्रभाव की अनिवार्य शर्त एवं परिणति के रूप में परखा जाना चाहिए। ऐसा होने पर ही साधक की ध्यान साधना की सफलता खरी साबित होती है। फिर स्वाभाविक ही उसके जीवन में योग विभूतियाँ अंकुरित-पल्लवित होने लगती हैं। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८८)

अभिरुचि के ही अनुरूप हो ध्यान 

समाधि की मंजिल तक पहुँचाने वाले अन्तर्यात्रा के इस मार्ग में  योग साधक में अनेकों भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन होते हैं। भौतिक एवं रसायन की यह शब्दावली भले ही किसी को अचरज में डाल दे, फिर भी सच को तो कहा ही जाना चाहिए। जो अन्तर्यात्रा में गतिशील हैं, इसके वैज्ञानिक प्रयोगों में स्वयं को खपा रहे हैं, वे इस यथार्थ से सहमत होंगे। हाँ,  जिनके लिए ये प्रायोगिक सत्य केवल तर्क का विषय हैं, उन्हें अवश्य हमें अपने सन्दर्भ से अलग मानना पड़ेगा। अन्तर्यात्रा में योग साधक की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती है, त्यों-त्यों उसकी भावनाओं एवं विचारों में गहरे परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों का स्वरूप कुछ इस तरह से बनता, बदलता है कि उसे रूपान्तरण की संज्ञा दी जा सकती है। इन परिवर्तनों के कारण जीवन की रासायनिक क्रिया भी परिवर्तित होती है। और परिवर्तित होता है—व्यक्ति का भौतिक शरीर एवं उसका व्यवहार। जिसे देखा और अनुभव किया जा सकता है।

इस समूचे परिवर्तन की प्रक्रिया का यदि आधार ढूँढें, तो वह एक ही है, पवित्रता के साथ जुड़ी सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया। व्यवहार हो या विचार अथवा फिर अन्तस् की भावनाएँ। योग साधना के साथ ही इनमें पवित्रता की प्रक्रिया घटित होने लगती है। इनसे कषाय-कल्मष एवं कुसंस्कारों का बोझ घटने लगता है। साथ ही बढ़ने एवं विकसित होने लगते हैं- इनके सूक्ष्म प्रभाव। जिसकी आभा अनेकों को अपने घेरे में लेती है। जिसके स्पर्श मात्र से औरों में रूपान्तरण के रासायनिक प्रयोग होने लगते हैं। और अन्ततोगत्वा इसकी परिणति जीवन के भौतिक व्यवहारों तक आए बिना नहीं रहती।

अन्तर्यात्रा विज्ञान के ये सारे प्रयोग एवं उसकी सूक्ष्मताएँ ध्यान की प्रयोगशाला में घटित होती है। इसी वजह से महर्षि पतंजलि ने ध्यान को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उन्होंने अपनी कई सूत्रों में इस तकनीक की बारीकियों को उजागर किया है।  महर्षि पतंजलि- मानव चेतना के महान् वैज्ञानिक हैं। इसी तरह से परम पूज्य गुरुदेव भी अध्यात्म विज्ञान के महान् प्रयोगकर्त्ता रहे हैं। इस सत्य के अनुरूप ही महर्षि ने अपने अगले सूत्र में ध्यान की विषय वस्तु के दायरे को और अधिक व्यापक किया है। उनका कहना है कि ध्यान की विषय वस्तु को सीमित नहीं किया, इसको काल, स्थान, परिवेश एवं अभिरुचि के अनुसार परिवर्तित भी किया जा सकता है। और इसी परिवर्तन से ध्यान की समूची प्रक्रिया के प्रभावों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

महर्षि का अगला सूत्र इसी सत्य को उजागर करता है। उनका यह सूत्र है- यथाभिमतध्यानाद्वा॥ १/३९॥
शब्दार्थ-यथाभिमतध्यानात् = जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यान से, वा = भी (मन स्थिर हो जाता है)।
अर्थात् ध्यान करो किसी उस चीज पर भी, जिसमें तुम्हारी गहरी रुचि हो।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आप समर्पित हो जाइए

मित्रो! एक बार लैला ने मजनूँ की परीक्षा लेनी चाही और जानना चाहा कि मजनूँ कैसा है? पहले तो उसने ऐसा इंतजाम कर दिया कि उसको कुछ पैसे मिल जाया करें, दुकानदारों से खाने को मिल जाया करे। फिर उसने सोचा, ऐसा तो नहीं कि वह हरामखोर हो और फोकट का खा रहा हो। उसने अपनी बाँदी से यह कहला भेजा कि लैला बहुत बीमार है। सुनकर मजनूँ बड़ा दुःखी हुआ। बाँदी ने कहा-दुःखी होने से क्या फायदा? आप कुछ मदद कीजिए न उनकी। उसने कहा-लैला को हम बहुत प्यार करते हैं। प्यार करते हो तो कुछ दीजिए न। मजनूँ ने कहा-मैं क्या दूँ? बाँदी ने कहा-डॉक्टरों ने यह कहा है कि लैला की नसों में खून का एक प्याला चढ़ाया जाएगा, आप अपना खून देंगे क्या, जिससे कि लैला की जिन्दगी बचायी जा सके। मजनूँ फौरन तैयार हो गया। उसने जो कटोरा बाँदी लेकर आयी थी, खून से लबालब भर दिया। बाँदी जब खून लेकर चली, तब उसने बाँदी से एक और बात कही-बाँदी जल्दी आना, अभी कई कटोरे खून मेरे शरीर में है। वह मैं उसके सुपुर्द करूँगा, क्योंकि उससे मैं मुहब्बत करता हूँ और मुहब्बत का मतलब होता है-देना। बाँदी जब एक कटोरा खून लेकर के गयी, तो नकली मजनूँ जो थे, सब भगा दिए गये। लैला ने अपने बाप से कह दिया-जो मुझसे इतनी मुहब्बत करता है और जो मुहब्बत की कीमत को समझता है, उसके ही साथ मैं रहूँगी। लैला और मजनूँ की शादी हो गई। 

आपकी भी शादी भगवान के साथ में हो सकती है, लेकिन करना क्या चाहिए? सिर्फ एक बात करनी चाहिए कि भगवान की मर्जी पर चलने के लिए आप आमादा हो जाइए। भगवान जो आपसे चाहते हैं, उसको कीजिए। आपका चाहना भी ठीक है, लेकिन आप जो चाहते हैं, उससे पहले बहुत कुछ दे दिया है भगवान ने। आपको इनसान की जिन्दगी दी है और ऐसी जिन्दगी दी है कि आप अपनी मनमर्जी पूरी कर सकते हैं। मनमर्जी के लिए कोई कमी नहीं है। आपके हाथ कितने बड़े हैं, आपकी जुबान और आँखें कितनी शानदार हैं, इसमें आप संतोष कर सकते हैं। अपनी दैनिक जरूरतों की भगवान से अपेक्षा मत कीजिए। आप अपनी हविश, अपनी तमन्नाओं, इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भगवान को मजबूर करेंगे कि कर्तव्य की बात को छोड़कर वह पक्षपात करने लगे और कर्मफल की महत्ता का परित्याग कर दे? आप ऐसा मत कीजिए, उनको न्यायाधीश रहने दीजिए। 

आप अपने घिनौने चिन्तन को बदल दीजिए, अपने छोटे दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दीजिए, लोभ और लालच से बाज आइए और भगवान की सुन्दर दुनिया को ऊँचा बनाने के लिए, शानदार बनाने के लिए राजकुमार के तरीके से कमर बाँधकर खड़े हो जाइए। आप समर्पित हो जाइए, शरणागति में आइए, विराजिए, विसर्जन कीजिए, फिर देखिए आप क्या पाते हैं? आज मुझे यही निवेदन करना था आप लोगों से। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.१४

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan

🔸 आज की सुविधा, संपन्नता की प्राचीनकाल से तुलना की जाए और मनुष्य के सुख-संतोष को भी दृष्टिगत रखा जाए तो पिछले जमाने की असुविधा भरी परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ॆंगे। इन पंक्तियों में भौतिक प्रगति तथा साधन-सुविधाओं की अभिवृद्धि को व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निन्दा की जा रही है। कहने का आशय इतना भर है कि परिस्थितियाँ कितनी भी अच्छी और अनुकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के आन्तरिक स्तर में कोई भी सुधार नहीं हुआ है तो सुख-शांति किसी भी उपाय से प्राप्त नहीं की जा सकती है।     

🔹 सर्वतोमुखी पतन और पराभव के इस संकट का निराकरण करने के लिए एक ही उपाय कारगर हो सकता है। वह है – व्यक्ति और समाज का भावनात्मक परिष्कार। भावना स्तर में अवांछनीयताओं के घुस पड़ने से ही तमाम समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, इन समस्याओं का यदि समाधान करना है तो सुधार की प्रक्रिया भी वहीं से प्रारम्भ करनी पड़ेगी, जहाँ से ये विभीषिकाएं उत्पन्न हुई हैं। अमुक-अमुक समाधान-सामयिक उपचार तो हो सकता है, पर चिरस्थाई समाधान के लिए आधार को ही ठीक करना पड़ता है।     

🔸 अधर्म का आचरण करने वाले असंयमी, पापी, स्वार्थी, कपटी, धूर्त और दुराचारी लोग शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं धन-संपत्ति, यश-वैभव आदि सब कुछ खो बैठते हैं। उन्हें बाह्य जगत में घृणा और तिरस्कार तथा अंतरात्मा में धिक्कार ही उपलब्ध होते हैं। ऐसे लोग भले ही उपभोग के कुछ साधन इकट्ठे कर लें, पर अनीति का मार्ग अपनाने के कारण उनका रोम-रोम अशांत तथा आत्म-प्रताड़ना की आग में झुलसता रहता है। चारों ओर घृणा, तिरस्कार एवं असहयोग ही मिलता है। आतंक के बल पर यदि वे कुछ पा भी लेते हैं तो उपभोग के पश्चात् उनके लिए विषतुल्य-दुखदायक ही सिद्ध होता है। आत्मशान्ति पाने, सुसंयमित जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य को धर्ममय जीवनक्रम अपनाने के लिए तत्पर होना पड़ता है। नैतिकता, मानवता एवं कर्तव्यपरायणता को ही अपने जीवन में समाविष्ट करना होता है। इस प्रवृत्ति का व्यापक प्रसार करने के लिए किए गए प्रयत्नों को नैतिक क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है। बुद्ध धर्म के प्रथम मंत्र 'धम्मं शरणं गच्छामि' में इसी नैतिक क्रान्ति की चिनगारी निहित है, इस मंत्र को लोकव्यापी बनाने के लिए जो प्रयत्न बौद्ध धर्मावलम्बियों ने किया था, उसे विशुद्ध नैतिक क्रान्ति ही कहा जएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

👉 हमारे अंग बन जाओ

मित्रो ! हमारी एक ही महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु-शिष्य एक-दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति-पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक-दूसरे से घुल-मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है-दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महात्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महात्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास। 

वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। सामने वाले पर वार करना हो तो तलवार नहीं, कलाई नहीं, हिम्मत की पूछ होती है। हिम्मत न हो तो हाथ में तलवार भी हो, तो बेकार है। यदि वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्तित्व जीवन्त हो जाएगा, बोलने लगेगा व सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान व बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-६८-पेज-१.१४

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८७)

अन्तर्चक्षु खोल—देगा निद्रा का मर्म
    
सामान्य जनों के लिए सपने एक कौतूहल की भाँति होते हैं। परम्परावादी मनोवैज्ञानिक इनमें इच्छाओं के दमन को ढूँढते हैं। जबकि योग विज्ञानी इन्हें अन्तर्चेतना के नवीन आयामों के प्रवेश द्वार के रूप में देखते हैं। सच यही है कि सपना एक जबरदस्त क्रिया है- यह अधिक शक्तिशाली है और सामान्य क्रम में सोचने की तुलना में अधिक अर्थपूर्ण भी। क्योंकि सपनों का सम्बन्ध सामान्य ढंग से सोचने-विचारने वाले मन की तुलना में अधिक गहरे अंश से सम्बन्धित है। जब कोई नींद में जाता है, तब मन का वह हिस्सा जो दिन भर काम कर रहा था, थका होता है, निढाल होता है। यह मन का बहुत छोटा हिस्सा होता है, अचेतन की तुलना में प्रायः दशांश। अचेतन नौ गुना ज्यादा बड़ा और ज्यादा शक्तिशाली  है। हाँ, इसकी शक्तिमत्ता अतिचेतन की तुलना में जरूर कम है। परन्तु सामान्य चेतन मन की तुलना में इसकी शक्ति बहुत ज्यादा है।
    
यही वजह है कि जो समस्याएँ चेतन मन द्वारा हल नहीं होती, वे अचेतन द्वारा हल कर ली जाती हैं। जो समाधान जाग्रत् अवस्था में नहीं मिलते, वे प्रायः स्वप्न में मिल जाते हैं। बेन्जीन के अन्वेषक विज्ञानी काकुले की खोज कथा को सभी जानते हैं। वे बेन्जीन की रायायनिक संरचना को लेकर जिन दिनों काम कर रहे थे, उन दिनों उन्हें अनेकों प्रयासों के बाद भी कामयाबी नहीं मिली। अन्ततः एक दिन उन्हें स्वप्न में बेन्जीन की संरचना का रहस्य मिला। कारण इतना भर है कि अचेतन की गहरी परतों में समाधान के गहरे सूत्र छिपे हैं। पर ये मिलते उन्हीं को हैं, जो अपनी समस्या को, प्रश्न को इन परतों तक पहुँचा सकें।
    
इसी तरह से निद्रा भी बहुत ज्ञान दे सकती है। क्योंकि वहाँ अनंत सम्पत्ति का भण्डार है। बहुत से जन्मों का भण्डार। क्योंकि बहुत सी चीजों को हमने वहाँ संचित किया है। योग साधक के जीवन में इसका महत्त्व बढ़ जाता है। क्योंकि साधना की गहनता में चेतना की गहरी परतें आन्दोलित-आलोड़ित होती है। जप एवं ध्यान के सूक्ष्म स्पन्दन इन्हें लगातार स्पन्दित करते हैं। इन स्पन्दनों से जहाँ जन्म-जन्मान्तर के संचित संस्कार उद्घाटित होते हैं, वहीं विराट् चेतना की झलकें भी झलकती हैं। कभी-कभी तो विशिष्ट जनों से, सिद्ध योगियों से सान्निध्य भी बनता है।
    
साधकों के संसार में यह बड़ा सुपरिचित रहस्य है कि सूक्ष्म जगत् में विचरण करने वाले सिद्ध योगी साधकों तक अपने सन्देश, अपनी सहायताएँ पहुँचाने के लिए स्वप्न एवं निद्रा का ही सहारा लेते हैं। ऐसा करने के लिए वे साधक के मन को अपनी संकल्प ऊर्जा से निस्पन्द एवं एकाग्र कर देते हैं। और फिर संवाद की सहज स्थिति बन जाती है। इस स्थिति में वे साधक के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन और आने वाली परेशानियों के प्रति जागरूकता, अपेक्षित सावधानियाँ सभी कुछ बता देते हैं। यह कहना, सुनना इतना स्पष्ट होता है, जैसे कि सब कुछ जगते में ही कहा-सुना जाता है। यहाँ तक कि जगने पर भी इसकी स्मृति धुँधली एवं धूमिल नहीं पड़ती।
    
प्रगाढ़ निद्रा की साधना में भारी उपयोगिता है। इस अवस्था में योग साधक का ज्योति शरीर चेतना के विभिन्न आयामों की यात्रा कर लेता है। सद्गुरु के सान्निध्य में उसके सामने बोध के नवीन आयाम खुलते हैं। जब कभी साधक के जीवन में इस तरह की सूक्ष्म यात्राएँ होती हैं, तो इनके अनुभव बड़े अलौकिक होते हैं। उदाहरण के लिए हिमालय के दिव्य प्रदेशों में गमन, देवलोकों में गमन जैसी अनुभूतियाँ साधकों को अपनी निद्रा में सहज मिलती है। सच तो यह है कि उनके लिए निद्रा जागरण की तुलना में ज्यादा उपयोगी होती है। युगऋषि गुरुदेव कहते थे कि इन अनुभवों को अपने ध्यान का माध्यम बनाकर समाधि को सिद्ध किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...