सोमवार, 30 दिसंबर 2019

👉 ज्ञान की प्राप्ति

ज्ञान की चाहत बहुतों को होती है, पर ज्ञान की प्राप्ति विरले करते हैं। दरअसल ज्ञान और ज्ञान में भारी भेद है। एक ज्ञान है-केवल जानकारी इकट्ठी करना, यह बौद्धिक समझ तक सीमित है और एक ज्ञान है-अनुभूति, जीवन्त प्रतीति। एक मृत तथ्यों का संग्रह है, जबकि दूसरा जीवन्त सत्य का बोध है। इन दोनों में बड़ा अन्तर है-पाताल और आकाश जितना, अंधकार और प्रकाश जितना। सच तो यह है कि बौद्धिक ज्ञान कोई ज्ञान ही नहीं है, यह तो बस ज्ञान का झूठा अहसास भर है। भला अंधे व्यक्ति को प्रकाश का ज्ञान कैसे हो सकता है? बौद्धिक ज्ञान कुछ ऐसा ही है।
  
ज्ञान के इस झूठे अहसास से अज्ञान ढँक जाता है। इसके शब्द जाल एवं विचारों के धुएँ में अज्ञान विस्मृत हो जाता है। यह तथाकथित ज्ञान अज्ञान से भी घातक है, क्योंकि अज्ञान दिखता हो तो उससे ऊपर उठने की चाहत पैदा होती है। पर वह न दिखे तो उससे छुटकारा पाना सम्भव नहीं रहता। ऐसे तथाकथित ज्ञानी अज्ञान में ही मर-खप जाते हैं।
  
सच्चा ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता, यह भीतर से जागता है। इसे सीखना नहीं उघाड़ना होता है। सीखा हुआ ज्ञान जानकारी है, जबकि उघाड़ा हुआ ज्ञान अनुभूति है। जिस ज्ञान को सीखा जाय, उसके अनुसार जीवन को जबरदस्ती ढालना पड़ता है। फिर भी वह कभी सम्पूर्णतया उसके अनुकूल नहीं बन पाता। उस ज्ञान और जीवन में हमेशा एक अंतर्द्वन्द्व बना ही रहता है। पर जो ज्ञान उघाड़ा जाता है उसके आगमन से ही आचरण सहज उसके अनुकूल हो जाता है। सच्चे ज्ञान के विपरीत जीवन का होना एक असम्भावना है। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता।
  
श्री रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों को एक कथा सुनाते थे। एक घने बीहड़ वन में दो मुनि जा रहे थे। सांसारिक सम्बन्धों की दृष्टि से वे पिता-पुत्र थे। पुत्र आगे चल रहा था, पिता पीछे था। तभी वन में सिंह का गर्जन सुनाई दिया। ब्रह्मज्ञान की बातें करने वाले पिता को घबराहट हुई, उसने पुत्र को सचेत किया- चलो! कहीं पेड़ पर चढ़ जाएँ, आगे खतरा है। पुत्र पिता की इन बातों पर हँसा। हँसते हुए वह बोला-आप तो हमेशा यही कहते रहे हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर, साक्षी और द्रष्टा है। फिर भला खतरा किसे है, जो नश्वर है वह तो मरेगा ही और जो अमर है उसे कोई मार नहीं सकता। पर पिता के मुख में भय की छाया गहरा चुकी थी। अब तक वह पेड़ पर जा चढ़ा था। इधर पुत्र पर सिंह का हमला भी हो गया, पर वह हँसता रहा। अपनी मृत्यु में भी वह द्रष्टा था। उसे न दुःख था और न पीड़ा, क्योंकि उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी, जबकि उसके पिता के पास ब्रह्मज्ञान ज्ञान का झूठा अहसास भर था। इसीलिए कहा जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति विरल है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४८

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग ३)

आत्मा को कितना ही कुचला जाय वह न मरने वाली है और न हार मानती है। अनसुनी, उपेक्षित पड़ी रहने पर भी अन्तरात्मा की विरोधी आवाज उठती ही रहती है। दुष्कर्म करते समय जी धड़कता और पैर काँपते हैं। यह स्थिति कितनी ही दुर्बल क्यों न कर दी जाय, उसका अस्तित्व बना ही रहेगा और झंझट तब तक चलता ही रहेगा, जब तक दुष्प्रवृत्तियाँ उस घुसपैठ से अपना पैर वापस न लौटा लें।

अन्तर्द्वन्द्व जीवन की शान्ति और सुव्यवस्था को नष्ट करते हैं। प्रगतिपथ अवरुद्ध करते हैं और भविष्य को अन्धकारमय बनाते हैं। पापों की परिणति से किसी भी बहाने बचा नहीं जा सकता। यह शारीरिक संविधान की सामान्य क्रिया पद्धति हुई। इसके अतिरिक्त समाजगत, प्रकृतिगत एवं ईश्वरीय व्यवस्था के और भी ऐसे कितने ही आधार हैं, जिनके कारण कुमार्गगामी को अपने दुष्कृत्यों के दण्ड अनेक प्रकार से भुगतने के लिए विवश होना पड़ता है।

राजदण्ड की व्यवस्था इसीलिए है कि दुष्कर्मों की आवश्यक रोकथाम की जा सके और अनीति बरतने वालों को उनकी करतूतों का मजा चखाया जा सके। पुलिस, कचहरी, जेल, फाँसी आदि की शासकीय दण्ड व्यवस्था का अस्तित्व मौजूद है। चतुरता बरतने पर भी लोग अक्सर उसकी पकड़ में आ जाते हैं और आर्थिक, शारीरिक, मानसिक दण्ड भुगतते हैं, बदनामी सहते और नागरिक अधिकारों से वंचित होते हैं।

इतने पर भी पीछा नहीं छूटता। शारीरिक व्याधि और मानसिक आधि उन्हें घेरती है और तिल-तिल करके रेतने, काटने जैसा कष्ट देती है। शरीर पर मन का अधिकार है। अचेतन मन के नियन्त्रण में आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष, श्वास-प्रश्वास, रक्त-संचार, ग्रहण-विसर्जन आदि अनेकों स्वचालित समझी जाने वाली गतिविधियाँ चलती हैं। चेतन मन की शक्ति से ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ काम करती हैं। शरीर तभी तक जीवित है जब तक उसमें चेतना का अस्तित्व है। प्राण निकलते ही शरीर सड़ने और नष्ट होने लगता है। चेतना का केन्द्र स्थान मस्तिष्क है। मन के रूप में ही हम चेतना का अस्तित्व देखते एवं क्रिया-कलापों का अनुभव करते हैं। यह संस्थान मनोविकारों से पाप-ताप एवं कषाय-कल्मषों से विकृत होता है तो उसका प्रभाव शारीरिक आरोग्य पर भी पड़ता है और मानसिक सन्तुलन पर भी। नवीनतम वैज्ञानिक शोधों का निष्कर्ष यह है कि बीमारियों का केन्द्र पेट या रक्त में न होकर मस्तिष्क में रहता है। मन गड़बड़ाता है तो शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लगता है। बीमारियों में नित नई शोध होती है और आये दिन एक से एक प्रभावशाली उपचार ढूँढ़े जाने की घोषणाएँ होती हैं। अस्पताल तेजी से बढ़ रहे हैं और चिकित्सकों की बाढ़ आ रही है। आधुनिकतम उपचार भी खोजे जा रहे हैं, इतने पर भी स्वास्थ्य समस्या का समाधान निकल नहीं रहा है। तात्कालिक चमत्कार की तरह दवाएँ अपना जादू दिखाती तो हैं, पर दूसरे ही क्षण रोग अपना रूप बदलकर नई आकृति में फिर सामने आ खड़े होते हैं। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक कि मानसिक विकृतियों के फलस्वरूप नष्ट होने और अगणित रोग उत्पन्न होने के तथ्य को स्वीकार नहीं कर लिया जाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग ३)

काम-विषयक सदाचार चरित्र की सर्वश्रेष्ठ विशेषता और कसौटी मानी गई है। कुछ अर्थों में ‘‘चरित्र’’ शब्द से मर्यादित कामोपभोग का ही अर्थ लगाया जाता है। जिन देशों में स्त्री-पुरुषों के बीच की शील मर्यादाएं निश्चित नहीं, वहां भारी विश्रृंखल पैदा हुआ देखा जाता है। पाश्चात्य देश इस कुटिल प्रवंचना में ग्रसित होने के कारण अपना श्रेय खो चुके हैं। पाश्चात्य सिद्धान्तों पर आधारित इस घृणित दुष्प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति और समाज कम अस्त-व्यस्त नहीं हुआ। इस विषैली कामुकता की दुर्भाग्यपूर्ण स्वच्छन्दता ने आज सारे सामाजिक ढांचे को ही खोखला कर दिया है। इसके दुष्परिणाम भी बुरी तरह से लोगों को आहत बनाने में लगे हैं। स्वास्थ्य की दुर्दशा, अशक्तता, अपहरण, हत्या और आत्म-हत्याओं के आज जितने दृश्य दिखाई दे रहे हैं उन सबका अधिकांश कारण मनुष्य का चारित्रिक पतन ही है। सदाचार की सीमायें जब तक निर्धारित न होंगी और दुराचार पर जब-तक प्रतिबन्ध न लगेगा तब-तक समाज में सुख शान्ति और व्यवस्था का स्थापित होना प्रायः असम्भव ही है।

भीतर-बाहर से पवित्र रहने, शुद्ध आचरण करने, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय, सत्संग, शक्ति पुरुषार्थ, आत्मिक-प्रसन्नता के आधार पर ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। आत्म-नियन्त्रण, संयम और सम्भाषण से न केवल अपने को वरन् अपने पास-पड़ोस और सम्पर्क में आने वालों को भी सुख मिलता है। मानवता का विकास भी इसी से सम्भव है कि दूसरों को भी अपने ही समान समझें और सबके साथ सद्व्यवहार करें। यह सब चरित्रवान् व्यक्ति के लक्षण हैं। जिनके द्वारा दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिले वही चरित्र के सच्चे धनी कहे जा सकते हैं।

पर-निन्दा, छिद्रान्वेषण, झूठ, छल, कपट, व्यभिचार, लोलुपता ये सब आसुरी प्रवृत्तियां हैं। इनसे विनाशकारी परिणाम ही उपस्थित होते हैं। पर आत्म-संयम और स्वत्वाभिमान के द्वारा वैयक्तिक व सामाजिक सभी प्रकार की श्रेष्ठताओं का उदय होता है। चरित्र-साधना का मूलाधार मानसिक पवित्रता है। जीवन के प्रत्येक छोटे-मोटे व्यवसाय व क्रिया-कलापों में मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़ता ही है। आत्मिक पवित्रता का परिणाम सदाचरण है जिससे सुख मिलता है। कुविचारों से कुकर्म उठ खड़े होते हैं, जिससे कष्ट, क्लेश और मुसीबतें आ उपस्थित होती हैं। इसलिए छोटे-से-छोटे कार्य में भी पवित्रता का भाव बनाये रखने से चारित्रिक-विकास होता है। प्रातःकाल सोकर उठने से दिन भर कार्यरत रहने और सायंकाल निद्रा-माता की गोद में जाने तक जितने कर्म हमें करने पड़ें उनमें पवित्रता का भाव बना रहे तो ही किसी को चरित्रवान् कहलाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह एक साधना है जिसकी सिद्धियां अनन्त हैं।

चरित्र का आधार धर्म है। मन, वचन और कर्म के धार्मिक कृत्यों के निर्वाह को सदाचार कहा जाता है। इससे चरित्र बनता है। मानवता से ओत-प्रोत भावनाओं से चरित्र की रक्षा सम्भव है। अतएव अपने जीवन में उदारतापूर्वक धार्मिक भावनाओं को धारण किए रहने से चारित्रिक-बल प्रगाढ़ बना रहता है। बुद्धि, धन या शरीर बल तब तक सुख नहीं दे सकते जब तक चरित्र में मानवता, बुद्धि में धर्मभाव और शरीर से सत्कर्म नहीं बन पड़ते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.10

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 6)

Q.6. How many “Onkars” are included in the Gayatri Mantra?

Ans.  Gayatri Mantra is complete in itself. It is not at all necessary to supplement it by assigning three or five ‘Oms’ by way of  beej Mantra or samput. This is done only in the Tantrik system. The common man should not  bother about some odd references in scriptures which justify prefixing, inter-fixing or suffixing more than one Onkars (Om) with the  Gayatri Mantra The practice of using more than one  Onkar was probably adopted by different sects as a mark of distinction (as followers of various sects use uniform, Tilak chhap marking on forehead etc. to identify themselves).  

The standard Guru-Mantra, Gayatri comprises of three Vyahritis and three phrases of eight letters each pre-fixed by Om. Om is in fact, a symbol of reverence preceding all Ved Mantras, as Mr., Mrs., Miss, etc. are prefixed to the names of persons. However, there is no restriction in using more than one  Onkars though the standard practice of pre-fixing one Onkar (Om) is recommended for maintaining uniformity.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 41

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

👉 चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं

एक साधु अपने शिष्य के साथ किसी अंजान नगर में घूमते हुए पहुंचे. रात बहुत हो चुकी थी इसलिए वे दोनों रात गुजारने के लिए किसी आसरे की तलाश कर रहे थे. तभी शिष्य ने अपने गुरु के कहने पर किसी के घर का दरवाजा खटखटाया. वो घर किसी धनी परिवार का था. दरवाजे की आवाज सुनकर घर के अंदर से परिवार का मुखिया बाहर निकलकर आया. वह संकीर्ण वृत्ति का था. साधु के आसरा मांगने पर उसने कहा – ”मैं अपने घर के अंदर तो आपको नहीं ठहरा सकता, लेकिन तलघर में हमारा गोदाम है. आप चाहें तो रात वहां गुजार सकते हैं, किंतु सवेरा होते ही आपको यहां से जाना होगा।”

साधु अपने शिष्य के साथ तलघर में रात गुजारने के लिए मान गये. तलघर के कठोर आंगन पर वे विश्राम की तैयारी कर ही रहे थे कि तभी साधु को दीवार में एक सुराख नजर आया. साधु ने सुराख को गौर से देखा और कुछ देर चिंतन के बाद उसे भरने में जुट गये. शिष्य ने सुराख को भरने का कारण जानना चाहा तो साधु ने कहा – ”चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती है.” दूसरी रात वे दोनों एक निर्धन किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।

किसान और उसकी पत्नी ने प्रेम व आदर पूर्वक उनका स्वागत किया. इतना ही नही उनके पास जो कुछ भी रूखा-सूखा था, वह उन्होंने अपने मेहमान के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें रात गुजारने के लिए अपना बिस्तर भी दिया और स्वयं नीचे फर्श पर सो गये. सुबह होते ही साधु व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी बहुत रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मृत पड़ा था. यह बैल किसान की रोज़ी-रोटी का सहारा था. यह सब देखकर शिष्य ने साधु से कहा – ”गुरुजी, आपके पास तो अनेक सिद्धियां हैं, फिर आपने यह सब कैसे होने दिया? उस धनी के पास तो इतना कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी सहायता की. जबकि इस गरीब किसान के पास कुछ ना होते हुए भी इसने हमारा इतना सम्मान किया. फिर आपने कैसे उसके बैल को मरने दिया।”

साधु ने कहा – चीज़ें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती है।

साधु ने अपनी बात स्पष्ट कि – उस धनी के तलघर में सुराख से मैंने देखा उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था. लेकिन वह धनी बेहद ही लोभी और कंजूस था. इस कारण मैंने उस सुराख को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण का भंडार गलत हाथ में ना जाएं. जबकि इस ग़रीब किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर आराम कर रहे थे. रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने उन्हें रोक दिया. चूंकि यमदूत खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण हरने के लिए कहा।

अब तुम ही बताओ, मैंने सही किया या गलत. यह सुनकर शिष्य अपने गुरु के समक्ष नतमस्तक हो गया।

दोस्तों, ठीक इसी प्रकार दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसी ऩज़र आती हैं जैसे हम है. अगर सच में कुछ बदलना है तो सर्वप्रथम अपनी सोच, कर्म व अपने आप को बदलने की कोशिश करों।

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग २)

कर्म फलित होने में देर लगाते हैं। जौ बोने के दस दिन में ही उनके अंकुर छः इंच ऊँचे उग आते हैं। किन्तु जिनका जीवन लम्बा है, जो चिर स्थायी हैं, उनके बढ़ने और प्रौढ़ होने में देर लगती हैं। नारियल की गुठली बो देने पर भी एक वर्ष में अंकुर फोड़ती है और वर्षों में धीरे धीरे बढ़ती है। बरगद का वृक्ष भी देर लगाता है। जबकि एरंड का पेड़ कुछ ही महीनों में छाया और फल देने लगता है। हाथी जैसे दीर्घजीवी पशु, गिद्ध जैसे पक्षी, ह्वेल जैसे जलचर अपना बचपन बहुत दिन में पूरा करते हैं। मक्खी, मच्छरों का बचपन और यौवन बहुत जल्दी आता है, पर वे मरते भी उतने ही जल्दी हैं। शारीरिक और मानसिक परिश्रम का, आहार-विहार का, व्यवहार शिष्टाचार का प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता रहता है। उनकी उपलब्धि सामयिक होती हैं, चिरस्थायी नहीं। स्थायित्व नैतिक कृत्यों में होता है, उनके साथ भाव-संवेदनाएँ और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं। जड़ें अन्तरंग की गहराई में धँसी रहती हैं, इसलिए उनके भले या बुरे प्रतिफल भी देर में मिलते हैं और लम्बी अवधि तक ठहरते हैं, इन कर्मों के फलित होने में प्रायः जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है।

अन्तःकरण की संरचना दैवी तत्वों से हुई हैं। उसमें स्नेह-सौजन्य सद्भाव सच्चाई जैसी प्रवृत्तियाँ ही भरी पड़ी हैं। जीवन यापन की रीति उत्कृष्टता के आधार पर बनाने की प्रेरणा इस क्षेत्र में अनायास ही मिली रहती है। इस क्षेत्र में जब निकृष्टता प्रवेश करती हैं, तो सहज उसकी प्रतिक्रिया होती हैं। रक्त में जब बाहरी विजातीय तत्व प्रवेश करते हैं तो श्वेत कण उन्हें मार भगाने के लिए प्राणपण से संघर्ष छेड़ते हैं और परास्त करने में कुछ उठा नहीं रखते। ठीक इसी प्रकार अन्तःकरण की दैवी चेतना आसुरी दुष्प्रवृत्तियों को जीवन सत्ता में प्रवेश करने और जड़ जमाने की छूट नहीं देना चाहती। फलतः दोनों के बीच संघर्ष छिड़ जाता है। यही अन्तर्द्वन्द्व है, जिसके रहते आन्तरिक जीवन उद्विग्न अशान्त ही बना रहता है और उस विक्षोभ की अनेक दुःखदायी प्रतिक्रिया फूट-फूटकर बाहर आती रहती हैं।

दो साँड़ लड़ते हैं, तो लड़ाई की जगह को तहस-नहस करके रख देते हैं। खेत में लड़ें तो समझना चाहिए कि उतनी फसल चौपट ही हो गई। दुष्प्रवृत्तियाँ जब भी जहाँ भी अवसर पाती हैं वहीं घुसपैठ करने, जड़ जमाने में चूकती नहीं। घुन की तरह मनुष्य को खोखली करती हैं और चिनगारी की तरह चुप-चुप सुलगती हुई अन्त में सर्वनाशी ज्वाला बनकर प्रकट होती हैं। ठीक इसी प्रकार दुष्प्रवृत्तियाँ आत्मसत्ता पर आधिपत्य जमाने के लिए कुचक्र रचती रहती हैं, किन्तु अन्तरात्मा को यह स्थिति सह्य नहीं, अस्तु वह विरोध पर अड़ी रहती है। फलतः संघर्ष चलता ही रहता है और उसके दुष्परिणाम अनेकानेक शोक सन्तापों के रूप में सामने आते रहते हैं। मनोविज्ञानी इस स्थिति को दो व्यक्तित्व कहते हैं। एक ही शरीर में भले-बुरे व्यक्तित्व शान्ति सहयोग पूर्वक रह नहीं सकते। कुत्ते-बिल्ली की, साँप-नेवले की दोस्ती कैसे निभे? एक म्यान में दो तलवार ठूँसने पर म्यान फटेगी ही। शरीर में ज्वर या भूत घुस पड़े तो कैसी दुर्दशा होती है, इसे सभी जानते हैं। नशेबाजों की दयनीय स्थिति देखते ही बनती हैं। यह परस्पर विरोधी शक्तियों का एक स्थान पर जमा होना ही हैं, जिसमें विग्रह की स्वाभाविकता टाली नहीं जा सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 मन को साधने की साधना

मन के साधे-साधना है, सम्पदा है। मन न सधे तो बाधा है, विपदा है। अद्भुत है मनुष्य का मन। यही रहस्य है-सांसारिक सफलताओं का और आध्यात्मिक विभूतियों का। पाप-पुण्य, बन्धन-मोक्ष, स्वर्ग-नरक सभी कुछ इसी में समाये हैं। अंधेरा और उजाला सब इसी में हैं। इसी में जन्म और मृत्यु के कारण हैं। यही है द्वार बाहरी दुनिया का, यही है सीढ़ी अन्तस् की। इसको साधने की साधना बन पड़े तो मनुष्य सबसे पार हो जाता है।
  
जिनकी जिन्दगी में साधना का सच है, उनकी अनुभूति यही कहती है कि मन सब कुछ है। सब उसकी ही लीला और कल्पना है। यह खो जाय तो सारी लीला विलीन हो जाती है। एक बार महाकाश्यप ने तथागत से पूछा था-भगवन् मन तो बड़ा चंचल है, यह सधे कैसे? खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, यह निर्मल कैसे हो? इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् चुप रहे। हाँ अगले दिन वह महाकाश्यप के साथ एक यात्रा के लिए निकले।
  
इस यात्रा में दोपहर के समय वह एक वृक्ष की छाँव में विश्राम के लिए रुके। उन्हें प्यास लगी तो महाकाश्यप पास के पहाड़ी झरने से पानी लेने के लिए गये। लेकिन झरने में से अभी बैलगाड़ियाँ निकली थीं और उसका सब पानी गंदा हो गया था। महाकाश्यप ने सारी बात भगवान् को बताते हुए कहा-प्रभु! झरने का पानी गंदा है, मैं पीछे जाकर नदी से पानी ले आता हूँ। लेकिन बुद्ध ने हँसते हुए कहा-नदी दूर है, तुम फिर से वापस झरने के मूल में जाओ और पानी लेकर आओ। भगवान् के कहने से महाकाश्यप फिर से वापस लौटे-उन्होंने देखा अपने मूल स्रोत में झरने का पानी बिल्कुल साफ है, वे जल लेकर वापस आ गये।
  
उनके लाये जल को पीते हुए भगवान् ने उन्हें बोध दिया-महाकाश्यप मन की दशा भी कुछ इसी तरह से है। जिन्दगी की गाड़ियाँ इसे विक्षुब्ध करती रहती हैं। यदि कोई शान्ति और धीरज से उसे देखता रहे, उसके मूल स्रोत में प्रवेश करने की कोशिश करे तो सहज ही निर्मलता उभर आती है। बस बात मन को साधने की है। मन को साधने की साधना करते हुए ही जीवन निर्मलता, सफलता एवं आध्यात्मिक विभूतियों का भण्डार बन जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४७

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 5)

Q.5 Does Gayatri Mantra conform to the rules of Sanskrit Grammar?

Ans. At times points are raised about supposed grammatical inaccuracies in the composition of Gayatri Mantra. These misconceptions arise when the Shrutis (Richas of Vedas and Upnishads) are studied and evaluated as literary, human creations. Unlike the religious books and teachings of the Rishis compiled as Smritis, Puranas, Tantras etc., Shrutis are considered eternal divine revelations (A- paurusheya) dealing with inter-relationship of soul and God. Thus, Shrutis are not meant for literary comprehension and intellectual dissertations. Their compilers had explicitly stated that in order to understand and experience the mysteries of Vedas (i.e. Shrutis), it is essential to have adequate exposure to various related scriptural texts, commentaries of seers, interaction with seer scholars and above all the grace of God, This alone can purify the soul, making it receptive to the supreme wisdom revealed in the shrutis.

It is, thus, irrefutable that the Vedas (which include the Gayatri Mantra) are not governed by the laws of Sanskrit Grammar, which is a product of human endeavour and came into existence at a much later stage in human evolution.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 40

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग २)

समाज की सुव्यवस्था का आधार उज्ज्वल चरित्र के व्यक्तियों का बाहुल्य माना गया है। सुख-शान्ति और सन्तोष की परिस्थितियां नेक व्यक्तियों के सदाचार से बनती हैं। प्रेम, स्नेह, मैत्री, दया, आत्मीयता और सहानुभूति का वातावरण जहां भी रहेगा वहीं स्वर्ग जैसे सुखों की रसानुभूति होने लगती है। जो मनुष्य स्वभावतः दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार करते हैं, स्नेह वर्तते और परोपकार की भावना रखते हैं वे अपने चरित्र की उज्ज्वल छाप दूसरों पर भी छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है तो ऐसे स्थान विशेष में स्वर्गिक परिस्थितियों का उभार स्वयमेव होने लगता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। इसलिए चरित्र की महान महत्ता को सभी महापुरुषों ने स्वीकार किया है।

यह देखा जाता है कि लोग अपने बच्चों के नाम राम-कृष्ण, शिव-शंकर, राणाप्रताप, रणजीत आदि रखना अधिक पसन्द करते हैं। रावण, कंस या खरदूषण नाम रखना किसी को भी प्रिय नहीं। इससे प्रतीत होता है कि लोगों में चरित्रवान् की प्रतिष्ठा व सम्मान का भाव अधिक पाया जाता है। यह बात अपने यहां ही नहीं हर देश, जाति और संस्कृति में पाई जाती है। इससे चरित्र की महान् महत्ता प्रतिपादित होती है। मनुष्य की कीर्ति, यश और सम्मान का आधार बाह्यजगत की सफलताएं नहीं हैं। उसकी आन्तरिक श्रेष्ठता के आधार पर युगों तक यश शरीर अमर रहता है। सोलहवीं सदी में सबसे बड़ा पहलवान कौन हुआ, ईसा के जन्म से दो शताब्दी पूर्व कौन व्यक्ति सर्वाधिक धनी हुआ है यह कोई भी न जानता होगा, इतिहास में भी इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता किन्तु भगवान राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र, शिव, दधीच, अर्जुन आदि चरित्रवान् महापुरुषों की जीवनियां आज भी लोगों को मुंह जबानी याद हैं।

दुराचारी व्यक्ति अपनी बाह्य-शक्तियों को भी देर तक बनाए नहीं रख सकते। कुकर्मों पर चलने से उनकी दुर्दशा स्वाभाविक है। फलतः उनका जीवन दिन-दिन पतित होता जाता है और उन्हें निरन्तर नारकीय यन्त्रणायें भोगनी पड़ती हैं किन्तु चरित्रवान व्यक्तियों को बुरा-समय भी वरदान सिद्ध हुआ है। अपनी चारित्रिक विशेषता के कारण सत्यव्रती हरिश्चन्द्र ने अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया, उर्वशी का श्राप कालान्तर में अर्जुन के लिए वरदान सिद्ध हुआ। रावण के दुष्कर्मों का फल विनाश के रूप में मिला और विभीषण की नेकी का परिणाम यह हुआ कि उसे लंका की राजगद्दी मिली। चरित्र मनुष्य को सदैव ही ऊंचे उठाता है। परिस्थितियां तो चरित्रवान पुरुषों की चेरी कहीं गई हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

👉 अद्भुत पात्र Adbhut Patra

एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी किसी भिक्षुक ने राजा से भिक्षा मांगी थी राजा ने उससे कहा, जो भी चाहते हो मांग लो दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था उस भिक्षुक ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दे'।

राजा ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था वह तो जादुई था जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई वह उतना ही अधिक खाली होता गया राजा को दुखी देख वह भिक्षुक बोला न भर सकें तो वैसा कह दे मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा राजा! ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि राजा अपना वचन पूरा नहीं कर सके।

राजा ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था सभी उस पात्र में डाल दिया गया लेकिन अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा तब उस राजा ने पूछा भिक्षु तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है उसे भरना मेरी साम‌र्थ्य से बाहर है क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है..?

वह भिक्षुक हंसने लगा और बोला कोई विशेष रहस्य नहीं राजा यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय कभी भी भरा नहीं जा सकता..? धन से पद से ज्ञान से- किसी से भी भरो वह खाली ही रहेगा, क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है उतना ही दरिद्र होता जाता है हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं क्यों..? क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है और परमात्मा सत्य में बसता है शांति चाहते हो ? संतृप्ति चाहते हो..?  तो अपने संकल्प को कहने दो कि परमात्मा और सत्य के अतिरिक्त और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए......

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग १)

कर्मफल एक ऐसी सच्चाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकार ही करना होगा। यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की शृंखला में जकड़ी हुई है। क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम कण-कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग-पग पर होता है।

भूतकालीन कृत्यों के आधार पर वर्तमान बनता है और वर्तमान का जैसा भी स्वरूप है, उसी के अनुरूप भविष्य बनता चला जाता है। किशोरावस्था में कमाई हुई विद्या और स्वास्थ्य सम्पदा जवानी में बलिष्ठता एवं सम्पन्नता बनकर सामने आती है। यौवन का सदुपयोग-दुरुपयोग बुढ़ापे के जल्दी या देर से आने, देर तक जीने या जल्द मरने के रूप में परिणत होता है। वृद्धावस्था की मनःस्थिति संस्कार बनकर मरणोत्तर जीवन के साथ जाती और पुनर्जन्म के रूप में अपनी परिणति प्रकट करती है।

कुछ कर्म तत्काल फल देते हैं, कुछ की परिणति में विलम्ब लगता है। व्यायामशाला, पाठशाला, उद्योगशाला के साथ सम्बन्ध जोड़ने के सत्परिणाम सर्वविदित हैं, पर वे उसी दिन नहीं मिल जाते, जिस दिन प्रयास आरम्भ किया गया था। कुछ काम अवश्य ऐसे होते हैं, जो हाथों-हाथ फसल देते हैं। मदिरा पीते ही नशा आता है। जहर खाते ही मृत्यु होती है। गाली देते ही घूँसा तनता है। दिन भर परिश्रम करते ही शाम को मजदूरी मिलती है। टिकट खरीदते ही सिनेमा का मनोरंजन चल पड़ता है। ऐसे भी अनेकों काम हैं, पर सभी ऐसे नहीं होते। कुछ काम निश्चय ही ऐसे हैं, जो देर लगा लेते हैं। असंयमी लोग जवानी में ही खोखले बनते रहते हैं, उस समय कुछ पता नहीं चलता। दस-बीस वर्ष बीतने नहीं पाते कि काया भी जर्जर होकर अनेक रोगों से घिर जाती है।

समय साध्य परिणतियों को देखकर अनेकों को कर्मफल पर अविश्वास होने लगता है। वे सोचते हैं कि आज का प्रतिफल हाथों-हाथ नहीं मिला तो वह कदाचित भविष्य में भी कभी नहीं मिलेगा। अच्छे काम करने वाले प्रायः इसी कारण निराश होते हैं और बुरे काम करने वाले अधिक निर्भय निरंकुश बनते हैं। तत्काल फल न मिलने की व्यवस्था भगवान ने मनुष्य की दूरदर्शिता, विवेकशीलता को जाँचने के लिए ही बनाई है। अन्यथा वह ऐसा भी कर सकता था कि झूठ बोलते ही मुँह में छाले भर जाय। चोरी करने वाले के हाथ में दर्द होने लगे। व्यभिचारी तत्काल नपुंसक बन जाय। यदि ऐसा रहा होता तो आग में हाथ डालने से बचने की तरह लोग पाप-कर्मों से भी बचे रहते और दीपक जलाते ही रोशनी की तरह पुण्य फल का हाथों-हाथ चमत्कार देखते। पर ईश्वर को क्या कहा जाय। उसकी भी तो अपनी मर्जी और व्यवस्था है। सम्भवतः मनुष्य की दूरदर्शिता विकसित करने एवं परखने के लिए ही इतनी गुंजायश रखी है कि वह सत्कर्मों और दुष्कर्मों का प्रतिफल विलम्ब से मिलने पर भी अपनी समझदारी के आधार पर भविष्य को ध्यान में रखते हुए आज की गतिविधियों को अनुपयुक्तता से बचाने और सत्साहस को अपनाने में जो अवरोध आते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 किमाश्चर्य परमं?

किमाश्चर्य परमं? - ‘सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?’- युगों पहले यक्ष ने युधिष्ठिर से यह सवाल पूछा था। धर्म का मर्म जानने वाले युधिष्ठिर ने इस सवाल के उतर में यक्ष से कहा था- ‘हजारों लोगों को रोज मरते हुए देखकर भी अपनी मौत से अनजान बने रहना, खुद को मौत से मुक्त मान लेना, जीते रहने की लालसा में अनेकों दुष्कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा आश्चर्य है।’ अनेकों शवयात्राएँ रोज निकलती हैं, ढेरों लोग इनमें शामिल भी होते हैं। इसके बावजूद भी वे अपनी शवयात्रा की कल्पना नहीं कर पाते। काश! ऐसी कल्पना की जा सके अपनी मौत के कदमों की आहट सुनी जा सके, तो निश्चित ही जीवन दृष्टि संसार से हटकर सत्य पर केन्द्रित हो सकती है।
  
सूफी फकीर शेखसादी के वचन हैं- ‘बहुत समय पहले दज़ला के किनारे एक मुरदे की खोपड़ी ने कुछ बाते एक राहगीर से कही थी। वह बोली थी ः ऐ मुसाफिर, जरा होश में चल। मैं भी कभी भारी दबदबा रखती थी। मेरे ऊपर हीरों जड़ा ताज़ था। फतह मेरे पीछे-पीछे चली और मेरे पाँव कभी जमीन पर न पड़ते थे। होश ही न था कि एक दिन सब कुछ खत्म हो गया। कीड़े मुझे खा गए हैं और आज हर पाँव मुझे बेरहम ठोकर मारकर आगे निकल जाता है। तू भी अपने कानों से गफलत की रूई निकाल ले, ताकि तुझे मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत हासिल हो सके।’
  
सच में मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत को जो सुन लेता है, वह जान लेता है कि जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। उन दोनों के बीच जो है वह केवल जीवन का आभास भर है। यह जीवन की एक छाया भर है। क्योंकि जीवन तो शाश्वत है, और इसकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती। जन्म का अन्त है, जीवन का नहीं। और मृत्यु का प्रारम्भ है जीवन का नहीं। जीवन तो इन दोनों से पार है। इसे वही पाते हैं जो अनवरत तप और सतत सत्कर्मों से जीवन की छाया से पार शाश्वत में प्रवेश करते हैं। ऐसे लोग मौत से मुँह नहीं चुराते, बल्कि इसे शाश्वत जीवन का प्रवेश द्वार बना लेते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं हैं। और जो करने में समर्थ होते हैं, वे मर कर भी नहीं मरते।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४६

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग १)

मनुष्य जीवन की सार्थकता उज्ज्वल और उद्दात्त चरित्र से होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के भागीदार वे होते हैं जिनमें चारित्रिक बल की न्यूनता नहीं पाई जाती। जिस पर सभी लोग विश्वास करते हों, ऐसे ही लोगों की साख औरों पर पड़ती है। पर-उपदेश तो वाक्पटुता के आधार पर धूर्त व्यक्ति तक कर लेते हैं। किन्तु दूसरों को प्रभावित कर पाने की क्षमता, लोगों को सन्मार्ग का प्रकाश दिखाने की शक्ति चरित्रवान् व्यक्तियों में हुआ करती है। सद्-विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता को ही चरित्र कहते हैं। जिसके विचार देखने में भले प्रतीत हों किन्तु आचार सर्वदा भिन्न हों, स्वार्थपूर्ण हों, अथवा जिनके विचार छल व कपट से भरे हों और दूसरे को धोखा देने, प्रपंच रचने के उद्देश्य से चिन्ह पूजा के रूप में सत्कर्म करने की आदत होती है उन्हें चरित्रवान् नहीं कहा जा सकता। सत्कर्मों का आधार इच्छाशक्ति की प्रखरता है। जो अपनी इच्छाओं को नियन्त्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान् कहा जा सकता है। संयत इच्छा-शक्ति से प्रेरित सदाचार का ही नाम चरित्र है।

विपुल धन सम्पत्ति, आलीशान मकान, घोड़े-गाड़ी, यश, कीर्ति आदि कमाने एवं विविध भाग भोगने की इच्छा आम लोगों में पाई जाती है। बालकों का हित भी इसी में मानते हैं कि उनके लिए उत्तराधिकार में बहुत धन दौलत जमा करके रखी जाय। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि जिस धन से भावी सन्तान आत्म-निर्माण न कर सके वह धन क्या? बिना श्रम उत्तराधिकार में मिला धन घातक होता है। सच्ची बपौती व्यक्ति का आदर्श चरित्र होता है, जिससे बालक अपनी प्रतिभा का स्वतः विकास करते हैं। उज्ज्वल चरित्र का आदर्श भावी सन्तति के जीवन-निर्माण में प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है।

समाज का सौन्दर्य, सुख और शान्ति चरित्रवान् व्यक्तियों के द्वारा स्थिर रहती है। दुष्चरित्र और दुराचारी लोगों से सभी भयभीत रहते हैं। उनके पास आने में लोग लज्जा व संकोच अनुभव करते हैं। जो भी उनके सम्पर्क में आता है उसे ही वे अपने दुष्कर्मों की आग में लपेट लेते हैं। ऐसा समाज दुःख, कलह ओर कटुता से झुलसकर रह जाता है। अनेकों प्रकार की भौतिक सम्पत्तियां व सांसारिक सुख सुविधाएं होते हुए भी लोगों को शान्ति उपलब्ध नहीं होती। अधिकतर लोग कुढ़-कुढ़कर जीवन बिताते रहते हैं। यह सब चारित्रिक न्यूनता के कारण ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

👉 देव संस्कृति की गौरव गरिमा

सभ्यता और संस्कृति इस युग के दो बहु-चर्चित विषय हैं। आस्थाओं और मान्यताओं को संस्कृति और तदनुरूप व्यवहार, आचरण को सभ्यता की संज्ञा दी जाती है। मानवीय सभ्यता और संस्कृति कहें या चाहे जो भी नाम दें मानवीय दर्शन सर्वत्र एक ही हो सकता है, मानवीय संस्कृति केवल एक हो सकती है दो नहीं क्योंकि विज्ञान कुछ भी हो सकता है। इनका निर्धारण जीवन के बाह्य स्वरूप भर से नहीं किया जा सकता। संस्कृति को यथार्थ  स्वरूप प्रदान करने के लिए अन्ततः धर्म और दर्शन की ही शरण में जाना पड़ेगा।
  
संस्कृति का अर्थ है-मनुष्य का भीतरी विकास। उसका परिचय व्यक्ति के निजी चरित्र और दूसरों के साथ किये जाने वाले सद्व्यवहार से मिलता है। दूसरों को ठीक तरह समझ सकने और अपनी स्थिति तथा समझ धैर्यपूवक दूसरों को समझा सकने की स्थिति भी उस योग्यता में सम्मिलित कर सकते हैं, जो संस्कृति की देन है।
  
आदान-प्रदान एक तथ्य है, जिसके सहारे मानवीय प्रगति के चरण आगे बढ़ते-बढ़ते वर्तमान स्थिति तक पहुँचे हैं। कृषि, पशुपालन, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प-उद्योग विज्ञान, दर्शन जैसे जीवन की मौलिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित प्रसंग किसी क्षेत्र की बपौती नहीं है। एक वर्ग की उपलब्धियों से दूसरे क्षेत्र के लोग परिचित हुए हैं। परस्पर आदान-प्रदान चले हैं और भौतिक क्षेत्र में सुविधा संवर्धन का पथ-प्रशस्त हुआ है। ठीक यही बात धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में भी है। एक लहर ने अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित किया है। तो दूसरी लहर ने उसे आगे धकेला है। लेन-देन का सिलसिला सर्वत्र चलता रहा है। मिल-जुलकर ही मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ा है। इस सम्पर्क से धर्म और संस्कृति भी अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने एक-दूसरे को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित किया है।
  
यह सभ्यताओं का समन्वय एवं आदान-प्रदान उचित भी है और आवश्यक भी। कट्टरता के इस कटघरे में मानवीय विवेक को कैद रखे  रहना असम्भव है। विवेक दृष्टि से जाग्रत होते ही इन कटघरों की दीवारें टूटती हैं और जो रुचिकर या उपयोगी लगता है, उसका बिना किसी प्रयास या दबाव के आदान-प्रदान चल पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए कट्टरपन्थी प्रयास सदा से हाथ-पैर पीटते रहे हैं, पर यह कठिन ही रहा है। हवा उन्मुक्त आकाश में बहती है। सर्दी-गर्मी का विस्तार व्यापक क्षेत्र में होता है। इन्हें बन्धनों में बाँधकर कैदियों की तरह अपने ही घर में रुके रहने के लिए बाधित नहीं किया जा सकता है। सम्प्रदायों और सभ्यताओं में भी यह आदान-प्रदान अपने ढंग से चुपके-चुपके चलता रहा है।
  
धर्म और संस्कृति दोनों ही सार्वभौमिक हैं, उन्हें सर्वजनीन कहा जा सकता है। मनुष्यता के टुकड़े नहीं हो सके। सज्जनता की परिभाषा में बहुत मतभेद नहीं है। शारीरिक संरचना की तरह मानवी अन्तःकरण की मूल सत्ता भी एक ही प्रकार की है। भौतिक प्रवृत्तियाँ लगभग एक-सी हैं। एकता व्यापक है और शाश्वत। पृथकता सामयिक है और क्षणिक। हम सब एक ही पिता के पुत्र हैं। एक ही धरती पर पैदा हुए हैं। एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। एक ही सूर्य से गर्मी पाते हैं और बादलों के अनुदान से एक ही तरह अपना गुजारा करते हैं फिर कृत्रिम विभेद से बहुत दिनों तक बहुत दूरी तक किस प्रकार बँधे रह सकते हैं? औचित्य को आधार मानकर परस्पर आदान-प्रदान का द्वार जितना खोलकर रखा जाय उतना ही स्वच्छ हवा और रोशनी का लाभ मिलेगा। खिड़कियाँ बन्द रखकर हम अपनी विशेषताओं को न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न स्वच्छ हवा और खुली धूप में मिलने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं। संकीर्णता अपनाकर पाया कम और खोया अधिक जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 4)

Q.4.  What is the basis of words in Gayatri Mantra adding upto 24 letters?

Ans. The confusion about Gayatri Mantra having a total of 23 letters only, arises mainly because of the word Nayam in Varenyam. In the composition of the Richas (couplets) of Vedas, meanings are subordinate to the syntax of words, which is according to specified musical notations. The chhandas (components of Vedas classified according to number of letters) in the Vedas are composed keeping in view the symphony to be created by the succession of words for a desired objective. Musicians change the pitch and duration of the tones to conform to a Raga. The mystery of difference between the “written” and pronounced Nyam in the Mantra lies in its sonic effect. In this way considering Nyam as a composite of Ni and Yam according to their musical notation, the first, second and third segments of the Mantra add up to 8 words each. Adya Shankaracharya endorses this view. The Pingal Shastra and Mantrartha Chandrodaya also support the grammatical conformity of Gayatri Mantra on the same principle. In this way, the letters in the Mantra are to be counted as follows:

TAT SA VI TU VAR RE NI YAM BHA RGO DEV SYA DHI       1+ 1+  1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+
MA HI DHI YO YO NAH  PRA  CHO  DA YAT         1+ 1+  1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1   =  24

For further reference please refer to the monthly periodical Akhand Jyoti, May 1983 issue.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 39

Chalak Bagula Aur Kekda | चालक बगुला और केकड़ा | Motivational Stories



Title

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

👉 शांति की तलाश Looking For Peace

एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे। उनके प्रिय शिष्य आनंद ने मार्ग में उनसे एक प्रश्न पूछा -‘भगवान! जीवन में पूर्ण रूप से कभी शांति नहीं मिलती, कोई ऐसा मार्ग बताइए कि जीवन में सदा शांति का अहसास हो।

बुद्ध आनंद का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए बोले, तुम्हे इसका जबाब अवश्य देगे किन्तु अभी हमे प्यास लगी है, पहले थोडा जल पी ले। क्या हमारे लिए थोडा जल लेकर आओगे?

बुद्ध का आदेश पाकर आनंद जल की खोज में निकला तो थोड़ी ही दूरी पर एक झरना नजर आया। वह जैसे ही करीब पंहुचा तब तक कुछ बैलगाड़िया वहां आ पहुची और झरने को पार करने लगी। उनके गुजरने के बाद आनंद ने पाया कि झील का पानी बहुत ही गन्दा हो गया था इसलिए उसने कही और से जल लेने का निश्चय किया। बहुत देर तक जब अन्य स्थानों पर जल तलाशने पर जल नहीं मिला तो निराश होकर उसने लौटने का निश्चय किया।

उसके खाली हाथ लौटने पर जब बुद्ध ने पूछा तो उसने सारी बाते बताई और यह भी बोला कि एक बार फिर से मैं किसी दूसरी झील की तलाश करता हूँ जिसका पानी साफ़ हो। यह कहकर आनंद जाने लगा तभी भगवान बुद्ध की आवाज सुनकर वह रुक गया। बुद्ध बोले-‘दूसरी झील तलाश करने की जरुरत नहीं, उसी झील पर जाओ।

आनन्द दोबारा उस झील पर गया किन्तु अभी भी झील का पानी साफ़ नहीं हुआ था । कुछ पत्ते आदि उस पर तैर रहे थे। आनंद दोबारा वापिस आकर बोला इस झील का पानी अभी भी गन्दा है। बुद्ध ने कुछ देर बाद उसे वहाँ जाने को कहा। थोड़ी देर ठहर कर आनंद जब झील पर पहुंचा तो अब झील का पानी बिलकुल पहले जैसा ही साफ़ हो चुका था। काई सिमटकर दूर जा चुकी थी, सड़े- गले पदार्थ नीचे बैठ गए थे और पानी आईने की तरह चमक रहा था।

इस बार आनंद प्रसन्न होकर जल ले आया जिसे बुद्ध पीकर बोले कि आनंद जो क्रियाकलाप अभी तुमने किया, तुम्हारा जबाब इसी में छुपा हुआ है। बुद्ध बोले -हमारे जीवन के जल को भी विचारों की बैलगाड़ियां रोज गन्दा करती रहती है और हमारी शांति को भंग करती हैं। कई बार तो हम इनसे डर कर जीवन से ही भाग खड़े होते है, किन्तु हम भागे नहीं और मन की झील के शांत होने कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लें तो सब कुछ स्वच्छ और शांत हो जाता है। ठीक उसी झरने की तरह जहाँ से तुम ये जल लाये हो। यदि हम ऐसा करने में सफल हो गए तो जीवन में सदा शान्ति के अहसास को पा लेगे।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...