गुरुवार, 17 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 27)



पर शिष्यत्व को अपने जीवन का सार मानने वाले वाले इस मूढ़ता पर मुस्कराते हैं। क्योंकि गुरुदेव के दर्शन भले ही चर्म चक्षुओं से मिलते हों पर उनका बताया मार्ग तो अन्तःकरण में प्रवेश करके अन्तश्चक्षुओं से खोजना पड़ता है। जो बाहर भटकते हैं- वे सदा ही गुमराह बने रहते हैं। बाहर प्रतीक तो है पर सत्य नहीं है। प्रतीक सत्य की ओर इंगित तो करते हैं, पर सत्य नहीं है। सत्य के लिए तो हृदय गुफा में बैठकर उपासना करनी पड़ती है। जीवन का परिष्कार करना पड़ता है। उसे पवित्र बनाना पड़ता है। यदि मन पूछे कि कैसे? तो जवाब होगा ठीक उसी तरह जिस तरह अपने गुरुदेव ने बनाया।

हालांकि यह बड़ा साहस का काम है। क्योंकि बाहरी जीवन में जो पवित्रता को साधते हैं, वे किसी भी हालत में महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर सकते। महत्त्वाकांक्षाओं को, अहंकार की प्रतिष्ठा को, वासना की सन्तुष्टि को त्यागकर ही पवित्रता की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है, साहस का काम है। जो साहसी हैं वे ही इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं। और जो बढ़ते हैं उन्हीं को जीवन का रहस्य उजागर होता है, वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति को समझ पाते हैं। उन्हीं को इस रहस्य का ज्ञान होता है कि सद्गुरु की ज्योति ही आत्म ज्योति है, यही ईश्वरीयता का अनन्त प्रकाश भी है।

इस सम्बन्ध में एक बड़ी ही प्यारी कथा है। यह कथा सन्त रज्जब के बारे में है। सन्त रज्जब को दादू जैसे सद्गुरु की शरण तो मिली थी पर अन्तस में उजियारा नहीं हुआ था। गुरु मिले पर मार्ग नहीं मिला था। क्या करें? किधर जाएँ? ऐसे सवाल उन्होंने दादू साहब से कई बार पूछे पर उन्होंने हँसकर टाल दिया। बहुत पूछने पर एक दिन बोले जो गुरु को देह जानता है, वह भटकता रहता है। पर जो गुरु को चेतना मानता है उसका पथ प्रकाशित हो जाता है। इससे ज्यादा उन्होंने कुछ कहा नहीं। रज्जब की भी आगे हिम्मत नहीं पड़ी। हार- थककर उन्होंने अपने गुरुदेव की छवि को अपने अन्तस में प्रतिष्ठित कर लिया। अपने अस्तित्त्व की सारी भक्ति, सारा प्यार, सारा अनुराग उन्होंने उस छवि में न्यौछावर कर दिया। यह छवि उनके मानस में विहंस उठी।

ध्यान ज्यों- ज्यों प्रगाढ़ हुआ त्यों ही यह छवि रज्जब की चेतना में आत्म ज्योति बनकर जल उठी। रज्जब यहाँ पर ठहरे नहीं वह अपनी साधना करते रहे और वह शुभ घड़ी भी आयी जब आत्म ज्योति ने अनन्त ईश्वरीय प्रकाश का रूप ले लिया। समाधि की इस परम भावदशा में उन्हें यह समाधान मिला कि सद्गुरु और ईष्ट एक ही हैं। गुरु ही गोविन्द है। गुरु से भिन्न और कुछ भी नहीं। रज्जब की साधना का यह मर्म वही जानेंगे जो अपने अन्तःकरण में प्रवेश करके मार्ग की शोध के लिए व्याकुल हैं। शिष्यों की इस व्याकुलता का समाधान शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में निहित है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/sadg
 

जो भी योजना बनाये उसमें आत्म निर्भरता का ही प्रधान भाग रहना चाहिए। दूसरों की सहायता के आधार पर जो क्रिया-कलाप खड़े किये जाते हैं वे आमतौर पर अधूरे और असफल ही रहते हैं। दूसरों का सहयोग भी मिलता ही है पर वह आगे तब आता है जब अपनी पात्रता और प्राथमिकता सिद्ध कर दी जाय। ऐसा स्वावलम्बी लोग ही कर सकते हैं वे ऐसी व्यावहारिक गतिविधियाँ अपनाते हैं जो आज की परिस्थितियों, आज के साधनों से अपने बलबूते खड़ी की जा सकती हो। भले ही इस प्रकार का शुभारम्भ छोटे रूप में हो पर उसमें यह संभावना भरी पड़ी है कि उस छोटे काम में बरती गई तत्परता और सावधानी के आधार पर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध की जा सके। यही से दूसरों का सहयोग द्वार खुलता है। भला कोई कैसे पसन्द करेगा कि किसी हवाई कल्पना की उड़ान में उड़ने वाले शेखचिल्ली के नीचे अपनी उँगली फँसा दे और अपनी कीमती सहायता को जोखिम में डालने का खतरा अंगीकार करे।

सहयोग देने की तरह सहयोग लेने की भी आवश्यकता रहती है। पर निर्भर अपने ही पक्षधर रहना चाहिए। इतनी बड़ी बात सोची ही क्यों जाय? इतना बड़ा स्वप्न देखा ही क्यों जाय जिसमें दूसरों का सहयोग न मिलने पर खीज़ या निराशा ही पल्ले बँधे?

कठिनाइयों से कोई बच नहीं सकता। जीवन इतना सरल नहीं है कि उसे गुप-चुप बिना किसी झंझट के जिया जा सके। हमें वह साहस एकत्रित करना ही होगा कि आये दिन नाम रूप बदल कर आने वाली कठिनाइयों का सामना और समाधान करने की सूझ-बूझ परिपक्व होती रहे। शान्ति की आकांक्षा अशान्ति को परास्त करके पाई गई विशय के रूप में की जानी चाहिए। बिना झंझट का सरल और सुख सुविधाओं से भरा पूरा जीवन क्रम एक मधुर कल्पना भर है व्यावहारिक वास्तविकता नहीं जीवन का निर्माण ही खुद इस तरह हुआ है कि उस्तरे की तरह उस पर बार-बार धार रखने की रगड़ से वास्ता पड़ता रहे। जो इस यथार्थता का सामना नहीं करना चाहता, सरलता को ही शान्ति मानता है उसे खाली हाथ ही रहना पड़ेगा अपना शरीर और मन भी क्या कम अशान्ति उत्पन्न करते हैं। नगर निवासियों की तरह ही वनवासी और सक्रियों की तरह ही निष्क्रिय भी क्षुब्ध रहते हैं। उलझनों का स्वरूप बदला जा सकता है पर उनसे न ता कोई गृही बच सकता है और न वैरागी। शान्ति तो उन्हें ही मिल सकती है जो अशान्ति से टकराने की कला के अभ्यस्त और पारंगत बन चुके  है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.34
बस थोड़ा सा सोचने की देर है……
 

शादी की बीसवीं वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल था। प्रेम भी बहुत था दोनों में लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं।

बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए। इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे।

अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन सी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके। पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है। डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया।

अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे। एक-दूसरे की डायरियाँ लीं। पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई। आखिर में महिला प्रथम की परिपाटी के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की।

पहला पन्ना...... दूसरा पन्ना........ तीसरा पन्ना

..... आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ढंग का तोहफा नहीं दिया।
.......आज होटल में खाना खिलाने का वादा करके भी नहीं ले गए।
.......आज मेरे फेवरेट हीरो की पिक्चर दिखाने के लिए कहा तो जवाब मिला बहुत थक गया हूँ
........ आज मेरे मायके वाले आए तो उनसे ढंग से बात नहीं की
.......... आज बरसों बाद मेरे लिए साड़ी लाए भी तो पुराने डिजाइन की

ऐसी अनेक रोज़ की छोटी-छोटी फरियादें लिखी हुई थीं। पढ़कर पति की आँखों में आँसू आ गए। पूरा पढ़कर पति ने कहा कि मुझे पता ही नहीं था मेरी गल्तियों का। मैं ध्यान रखूँगा कि आगे से इनकी पुनरावृत्ति ना हो।

अब पत्नी ने पति की डायरी खोली
पहला पन्ना.......कोरा
दूसरा पन्ना.........कोरा
तीसरा पन्ना...........कोरा
अब दो-चार पन्ने साथ में पलटे वो भी कोरे फिर 50-100 पन्ने साथ में पलटे तो वो भी कोरे

पत्नी ने कहा कि मुझे पता था कि तुम मेरी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकोगे। मैंने पूरा साल इतनी मेहनत से तुम्हारी सारी कमियां लिखीं ताकि तुम उन्हें सुधार सको। और तुमसे इतना भी नहीं हुआ। पति मुस्कुराया और कहा मैंने सब कुछ अंतिम पृष्ठ पर लिख दिया है। पत्नी ने उत्सुकता से अंतिम पृष्ठ खोला। उसमें लिखा था

मैं तुम्हारे मुँह पर तुम्हारी जितनी भी शिकायत कर लूँ लेकिन तुमने जो मेरे और मेरे परिवार के लिए त्याग किए हैं और इतने वर्षों में जो असीमित प्रेम दिया है उसके सामने मैं इस डायरी में लिख सकूँ ऐसी कोई कमी मुझे तुममें दिखाई ही नहीं दी। ऐसा नहीं है कि तुममें कोई कमी नहीं है लेकिन तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा त्याग उन सब कमियों से ऊपर है। मेरी अनगिनत अक्षम्य भूलों के बाद भी तुमने जीवन के प्रत्येक चरण में छाया बनकर मेरा साथ निभाया है। अब अपनी ही छाया में कोई दोष कैसे दिखाई दे मुझे।

अब रोने की बारी पत्नी की थी। उसने पति के हाथ से अपनी डायरी लेकर दोनों डायरियाँ अग्नि में स्वाहा कर दीं और साथ में सारे गिले-शिकवे भी। फिर से उनका जीवन एक नवपरिणीत युगल की भाँति प्रेम से महक उठा।

दोस्तो, ये एक काल्पनिक कहानी हो सकती है। पति की जगह पत्नी भी हो सकती है और पत्नी की जगह पति भी। सीखना केवल ये है कि जब जवानी का सूर्य अस्ताचल की ओर प्रयाण शुरू कर दे तब हम एक-दूसरे की कमियां या गल्तियां ढूँढने की बजाए अगर ये याद करें हमारे साथी ने हमारे लिए कितना त्याग किया है, उसने हमें कितना प्रेम दिया है, कैसे पग-पग पर हमारा साथ दिया है तो निश्चित ही जीवन में प्रेम फिर से पल्लवित हो जाएगा।

बस थोड़ा सा सोचने की देर है ………

बुधवार, 16 मार्च 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 26)



बाहरी जीवन को पवित्र बनाते हुए समूचे साहस के साथ आगे बढ़कर मार्ग की शोध करो। कभी मत भूलो, जो मनुष्य साधना पथ पर चलना चाहता है उसे अपने सम्पूर्ण स्वभाव को बुद्धिमत्ता के साथ उपयोग में लाना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य अपने आप में खुद ही अपना मार्ग, अपना सच और अपना जीवन है। इस सूत्र को अपना कर उस मार्ग को ढूँढो। उस मार्ग को जीवन और प्रकृति के नियमों के अध्ययन के द्वारा ढूँढों। अपनी आध्यात्मिक साधना एवं परा प्रकृति की पहचान करके इस मार्ग को ढूँढों। ज्यों- ज्यों सद्गुरु की चेतना के साथ तुम्हारा सान्निध्य सघन होगा, ज्यों- ज्यों तुम्हारी उपासना प्रगाढ़ होगी, त्यों- त्यों यह परम मार्ग तुम्हारी दृष्टि पथ पर स्पष्ट होगा।

उस ओर से आता हुआ प्रकाश तुम्हारी ओर बढ़ेगा और तब तुम इस मार्ग का एक छोर छू लोगे। और तभी तुम्हारे सद्गुरु का प्रकाश, हां उन्हीं सद्गुरु का प्रकाश, जिन्हें कभी तुमने देहधारी के रूप में देखा था, हां उनका ही प्रकाश एकाएक अनन्त प्रकाश का रूप धारण कर लेगा। उस भीतर के दृश्य से न भयभीत होओ और न आश्चर्य करो। क्योंकि तुम्हारे सद्गुरु ही सर्वेश्वर हैं। जो गुरु हैं वही ईष्ट हैं।हां इतना जरूर है कि इस सत्य तक पहुँचने के पहले अपने भीतर के अन्धकार से सहायता लो और समझो कि जिन्होंने प्रकाश देखा ही नहीं है, वे कितने असहाय हैं और उनकी आत्मा कितने गहन अंधकार में है।

शिष्य संजीवनी का यह सूत्र बड़ा अटपटा है किन्तु है अतिशय बोधपूर्ण। शिष्य को गुरु मिलने पर भी मार्ग खोजना पड़ता है। ना समझ लोग कहेंगे कि भला यह कैसी उलटी बात है, क्योंकि गुरु मिला तो मार्ग भी मिल गया। पर शिष्य परम्परा के सिद्धजन कहते हैं कि यह इतना आसान नहीं है। कारण यह है कि गुरु के मिलने पर ना समझ लोग उन्हें बस सिद्धपुरुष भर मान लेते हैं। उनकी शक्तियों को पहचानते तो हैं, पर केवल अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए, बस लोभ- लाभ के लिए। मनोकामना कैसे पूरी होगी इसी फेर में उनके चक्कर काटते हैं। काम कैसे बनेगा? इसी फेर में उनका फेरा लगाते रहते हैं। अपनी इसी मूर्खता को वे गुरुभक्ति का नाम देते हैं। स्वार्थ साधन को साधना कहते हैं।


क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/sadg

दूसरों के दुःख दर्द में हिस्सा बटाना चाहिए पर वह उतना भावुकता पूर्ण न हो कि अपने साध नहीं नष्ट हो जाये और अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाय। आमतौर से उदार व्यक्तियों को ऐसी ही ठगी का शिकार होना पड़ता है। दूसरों को उबारने के लिये किया गया दुस्साहस सराहनीय है पर वह इतना आवेश ग्रस्त न हो कि डूबने वाला तो बच न सके उलटे अपने को भी दूसरे बचाने वालों की ओर निहारना पड़े उदारता के साथ विवेक की नितान्त आवश्यकता है। मित्रता स्थापित करने के साथ वह सूक्ष्म बुद्धि भी सचेत रहनी चाहिए जिससे उचित और अनुचित का सही और गलत का वर्गीकरण किया जाता है।

भावुक आतुरता के साथ यदि उदारता को जोड़ दिया जाये तो उससे केवल धूर्त ही लाभान्वित होगे और उन्हें ढूँढ़ सकना संभव ही न होगा जो इस प्रयोग के लिये सर्वोत्तम हो सकते थे। जीवन का आनन्द मैत्री रहित नीरस और स्वार्थी व्यक्ति नहीं ले सकते इस तथ्य के साथ यह परिशिष्ट और जुड़ा रहना चाहिए कि सज्जनता के आवरण में छिपी हुई धूर्तता की परख की क्षमता भी उपार्जित की जाय। ऐसा न हो कि उदारता का कोई शोषण कर ले और फिर अपना मन सदा के लिये अश्रद्धालु बन जाये।

दूसरों के लिये हमें बहुत कुछ करना चाहिए यह ठीक है। पर यह भी कम सही नहीं कि हमें दूसरों से प्रतिदान की अधिक आशाएँ नहीं करनी चाहिए हर किसी को अपने ही पैरों पर खड़ा होना होता है और अपनी ही टाँगों से चलना पड़ता है। सवारियाँ भी समय समय पर मिलती है दूसरों का सहयोग भी प्राप्त होता है। पर वह इतना कम होता है कि उससे जीवन रथ को न तो दूरी तक खींचा जा सकता है और वह तेज चाल से चल सकता है। काम तो अपनी ही टाँगे आती है। खड़ा होने के लिए अपनी ही नस नाड़ियों माँसपेशियों और हड्डियों पर वजन पड़ता है। यदि वे चरमराने लगे तो फिर दूसरे आदमी कब तक कितनी दूर तक हमें खड़ा होने या चलने में सहायता कर सकेंगे?

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.34
सतत पुरुषार्थी ही पहुँचते है शिखर पर 
 

एक बार एक नगर मे एक राजा के दरबार मे किसी ने ये प्रश्न रखा की भाग्य ही सबकुछ है या कर्म का भी कोई मूल्य है! किसी ने कहा की जो भाग्य मे है वही मिलता है तो किसी ने कहा नही मनुष्य अपने पुरुषार्थ द्वारा वो भी हासिल कर सकता है जो भाग्य मे नही है !

अनेक तरह का वाद विवाद हुआ कोई हल न निकला तो राजा राजगुरु के पास गये और राजगुरु ने कहा की हॆ राजन आपके प्रश्न का उत्तर देने की पुरी पुरी कोशिश करेंगे आगे हरी ईच्छा! राजा और राजगुरु ने गुप्त मंत्रणा की और दो तरह के लोगो के दो दल बनाये! और उन दोनो दलों को दस दस बीघा ज़मीन दी और कुछ समय दिया गया और कहा की निश्चित समय मे जो इस जमीन से जितनी उपज पैदा करेगा उसे विशेष पारितोषिक दिया जायेगा!

दोनो ही तैयारी मे जुट गये अब एक दल ने भविष्य को ध्यान मे रखते हुये फसल के पानी के लिये सभी ने मिलकर एक कुआँ खोदा और दुसरे दल ने सोचा की बरसात के पानी से काम चला लेंगे और यदि जरूरत पड़ी तो इनका कुआँ तो है ही ना इससे काम चला लेंगे! और कुछ दिनो बाद बारिश पुरी नही हुई तो एक की फसल कमजोर पड़ने लगी अब वो सभी बड़े दुःखी रहने लगे रातों की नींद और दिन का चेन चला गया! और उधर दुसरे दल ने बरसात न होने पर भी पुरी मेहनत से जो कुआँ खोदा था उसके पानी से फसल को बर्बाद होने से बचा लिया!

निश्चित अवधि के बाद दोनो ही दल राजदरबार मे पहुँचे राजा और राजगुरु ने पुरी दास्तान सुनी! और फिर राजगुरु ने एक दल को पारितोषिक दिया और दुसरे दल को पास बुलाकर प्रेम से समझाया की आप जानते हो की आपके दुखों का वास्तविक कारण क्या है तो उन्होने कहा की क्या कारण है देव? तो राजगुरु ने कहा मुफ्त की चाह ही आपके दुखों का और अशान्ति का सबसे बड़ा कारण है!

त्यागो मुफ्त की चाह को और बनो कर्मवीर क्योंकि कर्मवीर ही पहुँचते है लक्ष्य तक वही पाते है सच्चा आनन्द और आत्मशान्ति! भाग्य के भरोसे रहोगे तो जो है वह भी चला जायेगा और कर्मवादी बनोगे तो जो नही है वो भी मिलेगा!

तब उन्होने इस पर गहराई से मनन किया और कहा की हॆ परम आदरणीय राजगुरु आपने हमारी बँद आँखो को खोल दिया है यदि हमने भी कुआँ खोदा होता तो हमारी फसल बच जाती!

यदि हम पुरुषार्थी नही बनेंगे तो हाथ मे आया हुआ भी चला जायेगा! एक नियमित साधना का एक कुआँ खोदो और जीवन रूपी इस फसल को बनाओ और निर्माण करो इस जीवन का ताकि आगे जाकर ये फसल लहरा सके!

जो सतत प्रयासरत्त है पुरुषार्थी है उसकी फसल की रक्षा स्वयं सद्गुरु और स्वयं नारायण करेंगे! और जो केवल भाग्य के भरोसे रहेंगे वो यहाँ तो शायद कुछ पा लेंगे पर आगे वंचित रह जायेंगे इसलिये प्रबल पुरुषार्थी बनो !!

मंगलवार, 15 मार्च 2016

 

इन सबका प्राण तो मैंने सिखाया भी नहीं था। मैं चाहता था कि चलते- चलते इनका प्राण सिखा जाऊँ ,, ताकि आपका अध्यात्म जीवंत हो सके ; ताकि आपकी उपासना जीवंत हो सके और जीवंत उपासना का जो लाभ आपको मिलना चाहिए, वह लाभ आपको मिलने मे समर्थ हो सके और आप अपनी जिंदगी में यह अनुभव कर सकें कि हमको कोई ऐसी चीज बताई गई थी। अगर हमने नहीं की तो ठीक है, लेकिन की तो उसका पूरे का पूरा फायदा उठाया। हम आपको ऐसा ही अध्यात्म सिखाने के इच्छुक हैं। आपको ऐसा अध्यात्म सीखना चाहिए और ऐसा अध्यात्म जानना चाहिए।

मित्रो ! अध्यात्म में आत्मशोधन पहली प्रकिया है। पंचमुखी गायत्री के पाँच मुखों को पाँच दिशाओं, पाँच धाराओं, गायत्री उपासना के पाँच टुकड़ों में बाँट दिया गया है। इसमें तीन चरण हैं, एक पर्व है। इसमें एक ‘ऊँ’ है। गायत्री पाँच हिस्सों में बँटी हुई है, जिसकी हम पाँच हिस्सों में व्याख्या कर सकते हैं। इसको हम पाँच कोशों का जागरण कह सकते हैं। इसके लिए हम आपको पाँच उपासनाएँ सिखा सकते हैं, जिसे आपको समझना चाहिए।

गायत्री माता का पहला वाला खंड वह है, जिसे हम प्रत्येक क्रियाकृत्य के साथ- साथ सबसे पहले सिखाते हैं और कहते हैं कि इसके बिना कोई कृत्य पूरा नहीं हो सकता। वह क्या हो सकता है? वह है- आत्मशोधन की प्रकिया। आत्मशोधन- प्रकिया के कौन- कौन से अंग हैं? आप उसके बिना जप नहीं कर सकते ; उसके बिना हवन नहीं कर सकते। उसके बिना कोई कर्मकांड नहीं कर सकते; यह तो हमारे कर्म का प्रारंभ है और यह हमारे अध्यात्म का प्रारंभ है, जिसको हम आत्मशोधन की प्रकिया कहते हैं।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka.2

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 25)



शिष्य संजीवनी का सीधा मतलब है शिष्यत्व का सम्वर्धन। जो शिष्य अपने शिष्यत्व के खरेपन के लिए सजग, सचेष्ट एवं सतर्क नहीं है, उनका मन रह-रहकर डगमगाता है। साधना पथ की दुष्कर परीक्षाएँ उनके साहस को कंपाती रहती हैं। उनका उत्साह एवं उल्लास कभी भी धराशाही हो जाता है। अन्तःकरण में उठने वाली अनेकों छद्म प्रवंचनाएँ उन्हें किन्हीं भी नाजुक क्षणों में बहकाने में समर्थ होती हैं। सन्देह एवं भ्रम के झोंके उनकी आस्थाओं को सूखे पत्तों की भांति कहीं भी किधर भी उड़ा ले जाते हैं।

ये विडम्बनाएँ हमारे अपने जीवन में न घटें इसके लिए एक ही सार्थक समाधान है कि अपना शिष्यत्व हरदम खरा बना रहे। अपने शिष्यत्व के परिपाक एवं निखार के लिए एक ही साधना व समाधान है। शिष्य संजीवनी का नियमित एवं निरन्तर सेवन। जो यह सेवनकर रहे हैं उन्हें इसके गुणों की अनुभूति भी हो रही है।

यह अनुभूति और भी अधिक स्पष्ट हो, अपना शिष्यत्व और भी अधिक प्रमाणिक हो, इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह सातवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है। इसमें कहा गया है- मार्ग की शोध करो। थोड़ा ठहरो और सोचो कि तुम सचमुच ही गुरु भक्ति का मार्ग पाना चाहते हो या फिर तुम्हारे मन में ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिए, आगे बढ़ने और एक भव्य भविष्य निर्माण करने के लिए स्वपन हैं। सावधान! केवल और केवल गुरुभक्ति के लिए ही मार्ग को प्राप्त करना है। ध्यान रहे गुरुभक्ति किसी महत्त्वाकांक्षा पूर्ति का साधन बनकर कलंकित न होने पाए। इसके लिए कहीं बाहर भटकने की बजाय अपने अन्तःकरण में समाहित होकर मार्ग की शोध करो।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/sadg

जीवन अपने लिए एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। जिसके प्रत्येक पृष्ठ से एक से एक बढ़ कर काम शिक्षायें हमें पढ़ने को मिल सकती है।

कल क्या बीती और कल का दिन कैसे गुजरा इन पर गहराई से विचार करे तो उसमें अनेकों शिक्षाप्रद अनुभव ऐसे मिल सकते हैं जो दूसरों के उपदेश सुनने या विद्वानों को पुस्तकें पढ़ने से भी अधिक कारगर सिद्ध हो सकते है?

कल के समय का जिस प्रकार उपयोग किया गया, और उससे जो पाया गया उससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता था? जिन नासमझियों के कारण कल कई झंझटों में फँसना पड़ा क्या उनसे बचा नहीं जा सकता था? कल किस अवसर पर क्या ऐसे अदूरदर्शी कदम उठ गये जो समझदारी का समय रहते उपयोग करने से टल सकते थे और कुछ किया जा सकता था जो अधिक सुखद और श्रेयस्कर होता? इस प्रकार के प्रश्न यदि अपने आप से पूछे तो सहज ही वे उत्तर सामने आयेंगे जो आगे के लिए ध्यान में रखे जाने पर भावी उन्नति का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

जीवन का रसास्वादन वे लोग नहीं कर पाते जो अपने लिए ही जीते हैं। खुदगर्जी के तंग दायरे में जीना एक प्रकार की लानत है जो आदमी पर हर घड़ी आत्म ग्लानि की तरह बरसती रहती है। कई व्यक्ति खुदगर्जी की राह अपना कर अधिक सुख साधन इकट्ठे कर लेते हैं दूसरों की तुलना में ज्यादा मालदार लगते हैं। इतना होने पर भी ऐसे लोगों को एक ऐसे अभाव से दुखी रहना ही पड़ेगा जो सामूहिक और पारमार्थिक गतिविधियाँ अपनाये बिना मिल ही नहीं सकता। अपने लिए ही जीना अपनी सुख सुविधाओं की ही बात सोचना वस्तुतः मनुष्य का मानसिक बौनापन है। ओछे और उपहासास्पद ही गिने जाते रहेंगे जहाँ व्यक्तित्व की परख होगी वहाँ उन्हें फिसड्डी ही ठहराया जायेगा। जिन्दगी को प्यार करने वाले लोग अपनी सुव्यवस्था के साधन जुटाने के साथ-साथ यह भी करते हैं कि उन्हें दूसरों के लिए कुछ सोचने और करने का अवसर भी मिलता रहे।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 34
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1973/January.34

सोमवार, 14 मार्च 2016

 

मित्रो! गायत्री मंत्र कितना सामर्थ्यवान मंत्र है ! मैं चाहता था कि उस सामर्थ्य का लाभ उठाने के लिए मेरे बाद दूसरे आदमी भी रहे होते तो मजा आ जाता। अभी जो लोग रोज गालियाँ दिया करते हैं और कहते हैं कि हमको तीन साल गायत्री मंत्र जप करते हो गये, पर इससे कोई फायदा नहीं हुआ। यदि मैं अपने पीछे ऐसे आदमी छोड़कर मरा होता जो मेरे ही तरीके से गरदन ऊँची करके लोगों से यह कहने में समर्थ रहे होते कि अध्यात्म बड़े काम का है और यह बहुत उपयोगी है, फायदेमंद है और शक्तिशाली है और बड़ा चमत्कारी है। जैसे कि हम हिम्मत के साथ कहते हैं कि आप में से भी ऐसे आदमी होते और हम आपको यह सिखाते कि अध्यात्म क्या हो सकता है?

गायत्री क्या हो सकती है? उपासना क्या हो सकती है और उपासना के आधार क्या हो सकते हैं? बेटे! मैंने इसलिए शिविर में आपको बुलाया था कि गायत्री उपासना के जो पाँच अंग, पाँच कोश- अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनंदमयकोश हैं, इन पाँचों कोशों की उच्चस्तरीय उपासना, जो इसमें जुड़ी हुई है, उसे सामान्य प्रकिया में भी जोड़कर रखा है। यह ऊँचे स्तर की भी है। इसे मैं आपको समझाना चाहता था कि इन पाँचों कोशों का अनावरण कैसे किया जाता है। अभी तक जो ज्ञान आपको दिया गया, वह यह समझकर दिया गया कि अभी आप बालक हैं। समय आएगा तो मैं समझादुँगा, सिखा दूँगा।

मित्रो ! सोचता हूँ, अब शुरूआत तो करूँ, आपको पट्टीपूजन तो कराऊँ, ओलम- बाहरखड़ी तो सिखाऊँ, अक्षरज्ञान तो सिखाऊँ, गिनती गिनना तो सिखाऊँ। फिर पीछे फिजिक्स सिखा दूँगा, केमिस्ट्री सिखा दूँगा, रेखागणित सिखा दूँगा, गणित सिखा दूँगा। ये सब चीजें मैंने छिपाकर रखी थीं। अभी मैंने आपको गिनतियाँ याद कराई थीं और पहाड़े याद कराए थे और आपको जप करना सिखाया, अनुष्ठान करना सिखाया, माला घुमाना सिखाया था, प्राणायाम करना सिखाया था और इनकी विधि सिखाई थी, कर्मकांड सिखाया था।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka.2

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 24)

अन्तरात्मा की इस शुद्ध भावदशा में ही आत्मा की सम्पदा प्रकट होती है। सूर्य की रश्मियों की भाँति ही आत्मा की सम्पत्तियां साधक में प्रकट होती है। यहीं पर शिष्य के जीवन में, साधक के जीवन में सच्चा स्वामित्व विकसित होता है। इसी स्वामित्व की चाहत शिष्य के जीवन में होनी चाहिए। दुनियावी जीवन में हम स्वामित्व की चाहत तो रखते हैं पर यह चाहत होती धन, साधन, भवन-सम्पत्ति का स्वामी बनने की। स्वयं का स्वामी भला कौन होना चाहता है? हालांकि जो स्वयं का स्वामी है, अपना मालिक है वही सच्चे अर्थों में स्वामी है। बाकी सब तो धोखा है। धन, दुकान-मकान का मालिक बनकर हम केवल गुलाम बनते हैं।

इस अटपटे वचन को समझने के लिए सूफी सन्त फरीद के जीवन की एक घटना को समझ लेना ठीक रहेगा। बाबा फरीद अपने शिष्यों के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे। वहीं रास्ते में एक आदमी अपनी गाय को रस्सी से बांधे लिए जा रहा था। फरीद ने उस आदमी से थोड़ी देर रुकने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर वह रुक गया। अब बाबा फरीद ने अपने शिष्यों से पूछा- इन दोनों में मालिक कौन है- गाय या आदमी। शिष्यों ने कहा- यह भी कोई बात हुई, जाहिर है, आदमी गाय का मालिक है।

फरीद ने फिर कहा- यदि गाय के गले की रस्सी काट दी जाय तो कौन किसके पीछे दौड़ेगा- गाय आदमी के पीछे या फिर आदमी गाय के पीछे। शिष्यों ने कहा- जाहिर है आदमी गाय के पीछे भागेगा। तो फिर मालिक कौन हुआ? फरीद ने शिष्यों से कहा, यह जो रस्सी तुम्हें दिखाई पड़ती है गाय के गले में, यह दरअसल आदमी के गले में है। आत्मा की सम्पत्ति को छोड़कर बाकी हर सम्पत्ति हमारे गले का फंदा बन जाती है। यथार्थ में आत्म सम्पदा ही सच्ची सम्पदा है। सच्चे शिष्य ही इसे पाने में समर्थ होते हैं। शिष्यत्व की यह सामर्थ्य किस तरह बढ़े- इसका विवरण अगले पृष्ठों में अनावृत्त होगा।


क्रमशः जारी 
डॉ. प्रणव पण्डया 
देखा जब उस वृद्ध को तो जिन्दगी बदल गई


एक सेठ के एक इकलौता पुत्र था पर छोटी सी उम्र मे ही गलत संगत के कारण राह भटक गया! परेशान सेठ को कुछ नही सूझ रहा था तो वो ईश्वर के मन्दिर मे गया और ईश दर्शन के बाद पुजारी को अपनी समस्या बताई !

पुजारी जी ने कहा की आप कुछ दिन मन्दिर मे भेजना कोशिश पुरी करेंगे की आपकी समस्या का समाधान हो आगे जैसी सद्गुरु देव और श्री हरि की ईच्छा !

सेठ ने पुत्र से कहा की तुम्हे कुछ दिनो तक मन्दिर जाना है नही तो तुम्हे सम्पति से बेदखल कर दिया जायेगा, घर से मन्दिर की दूरी ज्यादा थी और सेठ उसे किराये के गिनती के पैसे देते थे! अब वो एक तरह से बंदिश मे आ गया!

मंदिर के वहाँ एक वृद्ध बैठा रहता था और एक अजीब सा दर्द उसके चेहरे पर था और रोज वो बालक उस वृद्ध को देखता और एक दिन मन्दिर के वहाँ बैठे उस वृद्ध को देखा तो उसे मस्ती सूझी और वो वृद्ध के पास जाकर हँसने लगा और उसने वृद्ध से पुछा हॆ वृद्ध पुरुष तुम यहाँ ऐसे क्यों बैठे रहते हो लगता है बहुत दर्द भरी दास्तान है तुम्हारी और व्यंग्यात्मक तरीके से कहा शायद बड़ी भूलें की है जिंदगी मे?

उस वृद्ध ने जो कहा उसके बाद उस बालक का पूरा जीवन बदल गया! उस वृद्ध ने कहा हाँ बेटा हँस लो आज तुम्हारा समय है पर याद रखना की जब समय बदलेगा तो एक दिन कोई ऐसे ही तुम पर हँसेगा! सुनो बेटा मैं भी खुब दौड़ा मेरे चार चार बेटे है और उन्हे जिंदगी मे इस लायक बनाया की आज वो बहुत ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर है वो की आज मैं उन्हे दिखाई नही देता हुं! और मेरी सबसे बड़ी भुल ये रही की मैंने अपने बारे मे कुछ भी न सोचा! अपने इन अंतिम दिनो के लिये कुछ धन अपने लिये बचाकर न रखा इसलिये आज मैं एक पराधीनता का जीवन जी रहा हुं! पर मुझे तो अब इस मुरलीधर ने सम्भाल लिया की यहाँ तो पराधीन हुआ हुं कही आगे जाकर पराधीन न हो जाऊँ!

बालक को उन शब्दो ने झकझोर कर रख दिया! बालक - मैंने जो अपराध किया है उसके लिये मुझे क्षमा करना हॆ देव! पर हॆ देव आपने कहा की आगे जाकर पराधीन न रहूँ ये मेरी कुछ समझ मे न आया?

वृद्ध - हॆ वत्स यदि तुम्हारी जानने की ईच्छा है तो बिल्कुल सावधान होकर सुनना अनन्त यात्रा का एक पड़ाव मात्र है ये मानवदेह और पराधीनता से बड़ा कोई अभिशाप नही है और आत्मनिर्भरता से बड़ा कोई वरदान नही है! अभिशाप की जिन्दगी से मुप्ति पाने के लिये कुछ न कुछ जरूर कुछ करते रहना! धन शरीर के लिये तो तपोधन आत्मा के लिये बहुत जरूरी है!

नियमित साधना से तपोधन जोडिये आगे की यात्रा मे बड़ा काम आयेगा! क्योंकि जब तुम्हारा अंतिम समय आयेगा यदि देह का अंतिम समय है तो धन बड़ा सहायक होगा और देह समाप्त हो जायेगी तो फिर आगे की यात्रा शुरू हो जायेगी और वहाँ तपोधन बड़ा काम आयेगा!

और हाँ एक बात अच्छी तरह से याद रखना की धन तो केवल यहाँ काम आयेगा पर तपोधन यहाँ भी काम आयेगा और वहाँ भी काम आयेगा! और यदि तुम पराधीन हो गये तो तुम्हारा साथ देने वाला कोई न होगा!
उसके बाद उस बालक का पुरा जीवन बदल गया!
इसलिये नियमित साधना से तपोधन इकठ्ठा करो!

शनिवार, 12 मार्च 2016

खिलौनों ने अध्यात्म का सत्यानाश कर दिया (भाग 3)

मित्रों! ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति, चमत्कारों की देवी, ज्ञान की देवी, विज्ञान की देवी, सामर्थ्य की देवी गायत्री माता, जिसका कि हम इन शिविरों में अनुष्ठान करने के लिए बुलाएँ, पर क्या करें आप तो हमें कई तरह से परेशान कर देते हैं, हैरान कर देते हैं। हमारा मानसिक संतुलन खराब कर देते हैं। आप तो शांतिकुञ्ज को धर्मशाला बना देते हैं।

आप तो इसको अन्नक्षेत्र बना देते हैं और बेटे! उन लोगों को लेकर चले आते हैं, जिनका कि इस अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है; उपासना से कोई संबंध नहीं है; अनुष्ठान से कोई संबंध नहीं है; आप भीड़ लाकर खड़ी कर देते हैं और हमारा अनुशासन बिगाड़ देते हैं। भीड़ पग- पग पर हमको हैरान करती है और पग- पग पर अवज्ञा करती है। एक के स्थान पर पाँच लोग आ जाते हैं।

कल एक व्यक्ति आया और बोला- साहब! हम अनुष्ठान नहीं कर सकते। हम तो अपनी औरत की वजह से यहाँ आए हैं, जो यह कहती है कि हमारे बाल- बच्चे नहीं होते हैं। हम तो इसी कारण से आए हैं, अन्यथा किसी अनुष्ठान से हमारा कोई ताल्लुक नहीं है और हम कोई अनुष्ठान नहीं करेंगे। नहीं करेंगे, बेटे! ऐसा कर कि तेरी औरत के अगर बच्चा होने वाला होगा तो वहाँ धर्मशाला में ही हो जाएगा और अगर न होना होगा तो यहाँ भी नहीं हो सकता। तू कल ले जा। कल मैंने उसे भगा दिया।

मित्रो! मैं चाहता था कि संस्था का स्तर अच्छा बना रहता और अनुष्ठानों का स्तर अच्छा गना रहता, पर मैं क्या कर सकता हूँ। मैंने आपको निमंत्रणपत्र इसलिए भेजे थे कि आप क्वालिटी के आदमी कहीं न कहीं से ढूँढ़कर लाएँगे, जिनकी मुझे बहुत जरूरत है। लोग फार्म भर करके मंजूरी मँगा लेते हैं, लेकिन उससे क्वालिटी के आदमी नीं आ पाते। क्वालिटी के आदमी न आने से मुझे बड़ा क्लेश होता है। मैं किसे समझाऊँ, क्यों समझाऊँ और क्या समझाऊँ?

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 23)

स्वयं का स्वामी ही सच्चा स्वामी

शक्ति के साथ शान्ति की चाहत भी शिष्यत्व की एक कसौटी है। और इस तरह का मेल भी बड़ा विरल है। क्योंकि दुनियादारी से भरे जीवन में शक्ति अशान्ति का पर्याय बनकर ही आती है। जितनी ज्यादा शक्ति, जितना ज्यादा रूतबा-मर्तबा उतनी ही ज्यादा अशान्ति। इसका कारण एक ही है कि दुनियादारी में शक्ति के मायने अहंता के पोषण के सिवा और कुछ नहीं। और अहंता का पोषण अशान्ति से ज्यादा और कुछ भी नहीं दे सकता।

अहंता-जितनी बढ़ेगी अशान्ति भी उतनी ही बढ़ेगी। परन्तु शिष्यत्व की साधना में ये सारे समीकरण एकदम उलट जाते हैं। शिष्य की शक्ति तो समर्पण की शक्ति की है। अहंता के विसर्जन और विलीनता की शक्ति है। यह शक्ति ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-त्यों शान्ति भी बढ़ती है। क्रमिक रूप में यह सघन और प्रगाढ़ होती जाती है।

इस शक्ति और शान्ति के प्रसार के साथ साधक का अन्तर्मन एवं अन्तःकरण पवित्र एवं निर्मल होता जाता है। शिष्य के जीवन में पवित्रता की बाढ़ आती है। भक्ति का समुद्र उमड़ता है। निर्मल भावनाओं का तूफान उठता है। अन्तःकरण के ऐसे वातावरण में शिष्य की आत्मा उत्तरोत्तर विकसित होती है। उसमें सद्गुरु कृपा का सहज अवतरण होता है।

गुरुकृपा की अनुभूति की सहज अवस्था यही है। इस अवस्था को पाए बिना गुरुकृपा का रहस्य कभी भी अनुभव नहीं हो पाता। यह दुर्लभ अनुभूति जिन्हें हुई है अथवा जिन्हें हो रही है वही हां केवल वही इस सत्य को समझ सकते हैं। बाकी के पल्ले तो केवल बौद्धिक तर्क-वितर्क का संजाल ही पड़ता है।


क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/i

वह प्रकाश तब तक अन्तर में बना रहेगा जब तक ऐसी गुदगुदी बनी रहेगी जो मनोरथ पूरा न होने पर भी उस उपलब्धि जैसा ही उल्लास बनाये रहे। यह उज्ज्वल सपनों का आनन्द जब अभ्यास में आता है तब इतना मधुर होता है कि उसे बनाये रखने के लिये कठिन से कठिन कर गुजरने की हिम्मत की जा सके।

मुसीबतें और असफलताएं सिर्फ यह जानने के लिये आती हैं कि व्यक्ति किस हद तक साहस सँजोये रह सकता है। जिन्होंने हर कठिनाई को एक चुनौती माना उसके लिए इस संसार में कोई अवरोध नहीं, छात्रों को आये दिन अध्यापक के पूछे प्रश्नों को हल करना पड़ता है। तभी उसे उत्तीर्ण होने की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अवरोध एक प्रकार का अध्यापक है जो प्रतिभा को विकसित करने के लिये उत्तेजना प्रदान करता है और चिर स्मरणीय सफलता वरण कर सकने की क्षमता से सुसम्पन्न बनाता है। जो कठिनाई के दिनों में आशावादी रह सका, समझना चाहिए पुरुषार्थी महामानवों की पंक्ति में उसी का अभिषेक किया जाने वाला है।

बड़ी सफलताएं इस बात की अपेक्षा करती हैं कि व्यक्ति में धैर्यपूर्वक देर तक कठिन परिश्रम करते रहने की क्षमता हो। ऐसी मनः स्थिति उसी की हो सकती है जिसने आशावाद को अपने स्वभाव का अंग बना लिया हो। छुई-मुई की तरह जरा-सी कठिनाई आने पर जो मुरझा जाते हैं, अवरोधों को राई न मानकर जो पर्वत समझते हैं, उनके लिये अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रहना ही एक समस्या है, अपने आपको सँभाल सकना ही जिनके लिए भार बना हुआ है, उनके लिये सफलता के लिये जितनी शक्ति आवश्यक है उतनी जुटा सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा और वे हर काम में हर बार असफल ही होते रहेंगे। आशा रहित जीवन एक प्रकार से निर्जीव ही कहा जा सकता है।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 52
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1972/October.52

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

खिलौनों ने अध्यात्म का सत्यानाश कर दिया

मित्रो! ऐसे समय में आप लोगों को यहाँ आना पड़ा। गायत्री उपासना, जिसके लिए हमारा सारे का सारा जीवन समर्पित हो गया। गायत्री उपासना, जो हमारे जीवन का प्राण है। जिसके लिए हम जिएँगे और उसी के लिए मरेंगे। जिसके लिए हमने अपनी भरी जवानी निछावर कर दी। दूसरे आदमी भरी जवानी में तरह- तरह की कामनाएँ करते हैं। उस जमाने में हमने छह घंटे रोज के हिसाब से चौबीस साल तक, पंद्रह वर्ष की उम्र से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक हम जमीन पर सोए। छाछ और जौ की दो रोटियों के अलावा हमने तीसरी चीज ही नही देखी। नमक कैसा होता है, चौबीस वर्ष तक हमने कभी छुआ ही नहीं।

शक्कर कैसी होती है, चौबीस वर्ष तक हमारी निगाह में ही नहीं आई। शाक- दाल किसे कहते हैं, हमने जाना भी नहीं। केवल गायत्री उपासना के लिए। सारी दुनिया हमको पागल कहती रही। बेवकूफ और बेहूदा बताती रही। पैसा हम कमा नहीं सके। जमीन पर पड़े रहे। खाने का जायका हम ले नहीं सके। इंद्रियों का जायका उठा नहीं सके। यश प्राप्त न कर सके। सम्मान प्राप्त न कर सके। जिस गायत्री मंत्र के लिए, जिस गायत्री की महत्ता के लिए बेटे! हम निछावर हैं और हमारा जीवन जिसके लिए समर्पित है, वह ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति है, जिसका आधार इतना बड़ा है कि मनुष्य के भीतर वह देवत्व का उदय कर सकती है और मनुष्य अपने इसी जीवन में स्वर्ग जैसा आनंद लेने में समर्थ हो सकता है।

मित्रों! ऐसी महत्त्वपूर्ण शक्ति, चमत्कारों की देवी, ज्ञान की देवी, विज्ञान की देवी, सामर्थ्य की देवी गायत्री माता, जिसका कि हम इन शिविरों में अनुष्ठान करने के लिए बुलाएँ, पर क्या करें आप त;ो हमें कई तरह से परेशान कर देते हैं, हैरान कर देते हैं। हमारा मानसिक संतुलन खराब कर देते हैं। आप तो शंातिकुंज को धर्मशाला बना देते हैं। आप तो इसको अन्नक्षेत्र बना देते हैं और बेटे! उन लोगों को लेकर चले आते हैं, जिनका कि इस अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है; उपासना से कोई संबंध नहीं है; अनुष्ठान से कोई संबंध नहीं है; आप भीड़ लाकर खड़ी कर देते हैं और हमारा अनुशासन बिगाड़ देते हैं।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/kihloneneaadhiyatmka

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 22)

स्वयं का स्वामी ही सच्चा स्वामी

शिष्य संजीवनी के इस सूत्र में श्रुतियों का सार है, सन्त वचनों की पवित्रता है, सिद्ध परम्परा का रहस्य है। बड़े ही गुह्य एवं अटपटे भाव हैं इस सूत्र के। सूत्र की पहली बात में ही बड़ी उलटबांसी है। सामान्य जीवन की रीति यही है कि शक्ति की अभीप्सा इसलिए की जाती है कि लोगों की नजर में, जन समुदाय के बीच में अपने अहंकार को प्रतिष्ठित किया जा सके।

अहंता की प्रतिष्ठा जितनी ज्यादा होती है, लोगों की नजर में व्यक्ति का रूतबा, दबदबा, मर्तबा उतना ही ज्यादा होता है। उसकी बड़ी धाक होती है सबकी दृष्टि में। सभी उससे डरते, दबते या घबराते हैं। जितना ज्यादा मान उतनी ही ज्यादा शक्ति। यही सोच है जमाने की। यही चलन है दुनिया की। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि मान पाने के लिए, मर्तबा पाने के लिए लोग शक्ति की चाहत रखते हैं।

लेकिन शिष्य के जीवन में तो इसका अर्थ ही उल्टा है। शिष्य तो शक्ति इसलिए चाहता है कि वह स्वयं को पूरी तरह से अपने सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर सके। अपने अस्तित्त्व को गुरुदेव के अस्तित्त्व को विलीन कर सके। समर्पण की साधना के लिए विसर्जन की भावदशा के लए, विलीनता की अनुभूति के लिए गहन शक्ति की आवश्यकता है। यह काम थोड़ी-बहुत शक्ति से नहीं हो सकता। अपने बिखरे हुए अस्तित्त्व को समेटना, एकजुट करना और फिर उसे गुरुदेव के अस्तित्त्व में मिला देना बड़े साहस का काम है।

इसके लिए महान् शक्ति चाहिए। अपने को बनाने, बड़ा सिद्ध करने के लिए तो सभी प्रयासरत रहते हैं। परन्तु स्वयं को मिटाने, विसॢजत करने के लिए विरले ही तैयार होते हैं। शिष्य को यही विरल काम करना होता है। उसे अपने शिष्यत्व का खरापन साबित करने के लिए स्वयं को पूरी तरह मिटा देना होता है। उसे लोगों की नजर में नहीं भगवान् और अपने सद्गुरु की नजर में खुद को प्रमाणित करना होता है। जो ऐसा करने में समर्थ होता है वही खरा शिष्य बन पाता है।


क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/i
निराशाग्रस्त-निर्जीव और निरर्थक जीवन (भाग 1)

निराशा का दूसरा नाम है भय, बेचैनी और अशाँति। भविष्य को अन्धकार में देखना और प्रस्तुत विपत्ति को अगले दिनों और अधिक बढ़ती हुई सोचना एक ऐसा स्वविनिर्मित संकट है जिसके रहते, सुखद परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकना कदाचित ही सम्भव हो सके। सोचने का एक तरीका यह है कि अपना गिलास आधा खाली है और अभावग्रस्त स्थिति सामने खड़ी है। सोचने का दूसरा तरीका यह है कि अपना आधा गिलास भरा है जबकि सहस्रों पात्र बिना एक बूँद पानी के खाली पड़े हैं। अभावों को, कठिनाइयों को सोचते रहना एक प्रकार की मानसिक दरिद्रता है।

जो रात्रि के अन्धकार को ही शाश्वत मान बैठा और जिसे यह विश्वास नहीं कि कुछ समय बाद अरुणोदय भी हो सकता है उसे बौद्धिक क्षेत्र का नास्तिक कहना चाहिए। दार्शनिक नास्तिक वे हैं जो सृष्टि की अव्यवस्थाओं को तलाश करके यह सोचते हैं कि दुनिया बिना किसी योजना व्यवस्था या सत्ता के बनी है। उन्हें सूर्य और चन्द्रमा का उदय अस्त-बीज और वृक्ष का अनवरत सम्बन्ध जैसे पग-पग पर प्रस्तुत व्यवस्था क्रम सूझते ही नहीं। ईश्वर का अस्तित्व और कर्तव्य उनकी दृष्टि से ओझल ही रहता है। ठीक इसी प्रकार की बौद्धिक नास्तिकता वह है जिसमें जीवन के ऊपर विपत्तियों और असफलताओं की काली घटाएं ही छाई दीखती हैं। उज्ज्वल भविष्य के अरुणोदय पर जिन्हें विश्वास ही नहीं जमता।

जीवन का पौधा आशा के जल से सींचे जाने पर ही बढ़ता और फलता-फूलता है। निराशा के तुषार से उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते रहने वाला आशावादी ही उनके लिये ताना-बाना बुनता है। प्रयत्न करता है-साधन जुटाता है और अन्ततः सफल होता है। यह सही है कि कई बाद आशावादी स्वप्न टूटते भी हैं और गलत भी साबित होते हैं पर साथ ही यह भी सत्य है कि उजले सपनों का आनन्द कभी झूठा नहीं होता।

क्रमशः जारी

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...