बुधवार, 5 जुलाई 2023

👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये। (भाग 2)

यदि आपके पास कीमती फाउन्टेन पेन नहीं है, बढ़िया कागज और फर्नीचर नहीं है, तो क्या आप कुछ न लिखेंगे? यदि उत्तम वस्त्र नहीं हैं, तो क्या उन्नति नहीं करेंगे? यदि घर में बच्चों ने चीजें अस्त-व्यस्त कर दी हैं, या झाडू नहीं लगा है, तो क्या आप क्रोध में अपनी शक्तियों का अपव्यय करेंगे? यदि आपकी पत्नी के पास उत्तम आभूषण नहीं हैं, तो क्या वे असुन्दर कहलायेंगी या घरेलू शान्ति भंग करेंगी? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी न करेंगे? यदि सब्जी, भोजन, दूध इत्यादि ऊंचे स्टैन्डर्ड का नहीं बना है, तो क्या आप बच्चों की तरह आवेश में भर जायेंगे? नहीं, आपको ऐसा कदापि न करना चाहिए।
 
परिस्थितियाँ मनुष्य के अपने हाथ की बात है। मन के सामर्थ्य एवं आन्तरिक स्वावलम्बन द्वारा हम उन्हें विनिर्मित करने वाले हैं। हम जैसा चाहें जब चाहें सदैव कर सकते हैं। कोई भी अड़चन हमारे मार्ग में नहीं आ सकती। मन की आन्तरिक सामर्थ्य के सम्मुख प्रतिकूलता बाधक नहीं हो सकती।

सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह है जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता है। किन्तु यदि वे बदलती नहीं, तो स्वयं अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में उसकी मनः शान्ति और संतुलन स्थिर रहता है। विषम परिस्थितियों के साथ वह अपने आपको फिट करता चलता है।

निराश न होइए यदि आपके पास बढ़िया मकान, उत्तम वस्त्र, टीपटाप, ऐश्वर्य इत्यादि वस्तुएँ नहीं हैं। ये आपकी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। न जाने मन के किस अतल गह्वर में यह अमूल्य सम्पदा लिपटी पड़ी हो किन्तु आप गह्वर में है अवश्य। आत्म-परीक्षा कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।

प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान न होकर उनके अनुकूल बनिये और फिर धीरे-2 उन्हें बदल डालिये।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मई 1949 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/May/v1.17

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 July 2023

युग निर्माण परिवार के सदस्यों की दृष्टि अनौचित्य के प्रति अत्यन्त कड़ी रहनी चाहिए। जहाँ भी वह पनपे, सिर उठाये वहीं उसके असहयोग एवं विरोध प्रदर्शन से लेकर दबाव देने तक की प्रतिक्रिया उठ खड़ी होनी चाहिए। अनौचित्य के प्रति हममें से प्रत्येक में प्रचण्ड रोष एवं आक्रोश भरा रहना चाहिए। इतनी जागरूकता के बिना दुष्प्रवृत्तियाँ रूक नहीं सकेंगी। छिपाने, समझौता कर लेने से सामयिक निन्दा से तो बचा जा सकता है, पर इससे सड़न का विष भीतर ही भीतर पनपता रहेगा और पूरे अंग को गलाकर नष्ट कर देगा।

हमारा युग निर्माण परिवार बढ़ेगा। उसमें अवांछनीय घटनाएँ भी होती रहेंगी, इतने बड़े समुदाय में एक भी अपूर्ण, अपवित्र व्यक्ति न तो पैदा होगा और न प्रवेश कर सकेगा इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर वह दृष्टि जीवन्त रहनी चाहिए कि श्रद्धा के साथ विवेक कायम रखा जाय। औचित्य का समर्थन करते हुए अनौचित्य की संभावना को नजरअंदाज न किया जाय। अति श्रद्धा और अति विश्वास भी इस जमाने में जोखिम भरा है। इसलिए नीति समर्थक और अनीति निरोधक दृष्टि सदा पैनी रखी जाय और सड़न पनपने से पहले  उसकी रोकथाम कर दी जाय।

सैनिकों द्वारा लड़े जाने वाले गोला-बारूद वाले युद्ध को हम रोकना चाहते हैं, पर इस प्रकार के विश्वव्यापी युद्ध के पक्ष में हैं, जो जन-जन द्वारा पग-पग पर अज्ञान और अनाचार के-कुत्साओं और कुंठाओं के विरुद्ध अतीव शौर्य और साहस के साथ लड़ा जाये। हमारा विश्वास है कि यही संसार का अंतिम युद्ध होगा। तब जिओ और जीने दो और सादा जीवन-उच्च विचार जैसे उच्च आदर्शों के अनुरूप नई दुनिया का नवनिर्माण संभव हो सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये। (भाग 1)

हमारे एक मित्र की ऐसी आदत है कि जब तक सब कुछ चीजें यथास्थान न हो, सफाई, शान्ति, और उचित वातावरण न हो, तब तक वे कुछ भी नहीं कर पाते। घर पर आते ही चीजों को इधर-उधर यथा स्थान न पाकर वे बिगड़ उठते हैं, उनकी मानसिक शान्ति विचलित हो उठती है।
 
इस प्रकार के आदर्शवादी संसार में कम नहीं हैं। वे चाहते हैं कि संसार में उच्चता, पवित्रता, स्वच्छता, शुद्धता एवं शान्ति प्राप्त हो। इनके अभाव में प्रायः क्रुद्ध हुए रहते हैं। उनका मन क्रोध से भरा रहता है। वे परिस्थितियों को दोष देते हैं। कहते हैं “क्या करें, हमें तो अवकाश ही नहीं मिलता। कार्य करें, तो किस प्रकार करें। कभी कुछ हमें उलझाये ही रहता है।” परिस्थितियों की अनुकूलता की ही प्रतीक्षा में से व्यक्ति दिन सप्ताह और वर्ष बरबाद कर रहे हैं।

परिस्थितियों की अनुकूलता की प्रतिज्ञा करते-2 मूल उद्देश्य दूर पड़ा रह जाता है। हमें जीवन में जो कष्ट है, जो हमारा लक्ष्य है, उसे हम परिस्थिति के प्रपंच में पड़ कर विस्मृत कर रहे हैं।

हमने अपनी मनः स्थिति ऐसी संवेदनशील बना ली है कि सूक्ष्म सी बात से ही हम विचलित हो उठते हैं। आदर्श परिस्थितियाँ इस व्यस्त संसार में दुष्प्राय हैं। कुछ न कुछ कमी, कुछ अड़चन, मामूली बीमारियाँ, मौसम का परिवर्तन, भाग्य की करवटें सदा चलती रहेंगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती जायेंगी। संभव है वे आपके विपक्ष में हों या आपको प्रतीत हो कि महान संकट आने वाला है, फिर भी हमें अपने मूल उद्देश्य को दृष्टि से दूर नहीं करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1949 पृष्ठ 16

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

रविवार, 2 जुलाई 2023

👉 गुरु पूर्णिमा-प्रेरणा

पूर्णिमा पर पूर्ण-गुरु की वंदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥1॥

पूर्ण के प्रतिनिधि ‘गुरु’ हैं, बताती गुरुपूर्णिमा। सृजन पोषण और रक्षण में, निरत तप-साधना

‘गुरु’ ब्रह्मा, विष्णु, शिव हैं अर्चना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥2॥

शिष्य-अनगढ़ को बनाती सुगढ़, उनकी साधना। स्नेह का अमृत पिलाती, भव्य उनकी भावना॥

अमंगल के शत्रु-शिव की साधना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥3॥

काटते अज्ञान-तम को, ज्ञान-गुरुता से सदा-ज्ञान-किरणें प्रस्फुटित हैं, देव-सविता से सदा॥

ज्योति के चिरपुँज की आराधना की लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥4॥

ग्रसित हो अज्ञान-तम से, भटकती है मनुजता। दाँव ऐसे में लगाती है मनुज पर, दनुजता॥

मनुजता की मुक्ति की संवेदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥5॥

प्रज्वलित कर प्राण-दीपक ज्योति को चिरपुँज से। शाँति का संदेश लेकर, शाँति के गुरु-कुँज से॥

अमावस्या को पतन की, पूर्णिमा कर लीजिये॥ ‘पूर्णिमा’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥6॥

ज्ञानमय की ले मशालें, सँवारें उज्ज्वल-भविष्य-लोक मंगल-यज्ञ में गुरुदक्षिणा में दे हविष्य।

गुरुकृपा से ‘स्वर्ग’ की अवतरण कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥7॥

- मंगल विजय ‘विजय वर्गीय’

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शनिवार, 1 जुलाई 2023

👉 तीसरा चरण संघर्ष का है

तीसरा चरण जो अपना रह जाता है, वह संघर्ष का है। संघर्ष के बिना अवांछनीय तत्त्वों को हटाया नहीं जा सकता है। कुछ निहित स्वार्थ ऐसे होते हैं, उनकी दाढ़ में ऐसा कुछ लग जाता है अथवा किसी अपनी बेवकूफी को ऐसा प्रेस्टीज प्वाइंट बना लेते हैं कि उससे पीछे हटना ही नहीं चाहते हैं। अपनी बुद्घिमानी, अपनी अक्लमंदी और अपना अहंकार-अपने घमंड को इतना ज्यादा बढ़ा लेते हैं कि अपने साथ जुड़े हुए जो विचार हैं उनका ही समर्थन करते हैं।

मान लीजिए कोई बूढ़ा आदमी है, और उसने कोई गलती की, चार धाम की यात्रा करके आया और सारा पैसा फूँक करके घर में आ गया। अब उसकी गलती को बताओ तो कोई मानेगा नहीं और  दूसरे गाँव वालों को भी कहेगा-हम तो मुक्ति ले आए, तुम भी मुक्ति ले आओ। उसे समझाओ तो मानता ही नहीं। 

कुछ आदमी इस तरह के होते हैं, जिनको जड़ कहते हैं और अपनी गलती को ही प्रेष्टीज प्वांइट बना लेते हैं। ब्याह शादी का मामला है, नाक का प्रश्न बना लेते हैं। कहते हैं कि साहब हमारे बाप-दादे के समय ऐसी शादी होती थी। ठीक है आप जो कहते हैं वो तो सही कहते हैं। आपकी बात भी सही है, ठीक माननी चाहिए। पर हम क्या कर सकते हैं? हमारे यहाँ तो ऐसा ही होता रहा है। 

इस तरीके से रूढ़िवादियों से लेकर के जिनके स्वार्थ जुड़े हैं , जागीरदारों से लेकर के ताल्लुकेदारों तक और पण्डे-पुजारियों से लेकर के दूसरे अवांछनीय तत्त्वों तक जिनके दाढ़ में हराम के पैसों का, हराम की आमदनी का, बेकार की बातों का चस्का लग गया है, रिश्वतखोरी का चस्का लग गया, वो सीधे तरीके से मान जाएँगें क्या? नहीं। हम जब समझाएगें, हाँ, हाँ, हाँ करेंगे। कहेंगे कि आपने बिलकुल सही कहा, ऐसा ही होना चाहिए। फिर भ्रष्टाचार विरोधी समिति के प्रेसीडेन्ट बन जाएँगे और करेंगे पूरा भ्रष्टाचार। इस तरीके से इस तरह के लोग ही अधिकांश हैं। उनसे निपटा कैसे जाए? समझाते हैं उनको तो हमसे भी ज्यादा वो दूसरों को समझाते हैं । ऐसे लोगों को समझाने से क्या बात बनेगी ? ऐसे जड़ लोग बातों से समझ नहीं सकते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (अंतिम भाग)

किन्हीं विगतमान चीजों के प्रति दुःख होने का कारण यह है कि व्यामोह के वशीभूत मनुष्य उससे अपना आत्मभाव स्थापित कर लेता है। सोचने की बात है कि जब यह संसार ही हमारा नहीं है, यह शरीर तक हमारा नहीं है तो यहाँ की किसी चीज के साथ आत्मभाव स्थापित कर लेने में क्या बुद्धिमत्ता है। एक दिन जब मनुष्य खुद ही सब को छोड़कर चला जाता है तो यदि कोई चीज उसे छोड़कर चली जाती है तो इसमें दुःख की क्या बात है? यह संसार और उसकी दृश्यमान अथवा अदृश्यमान सारी चीजें एकमात्र परमानन्द की हैं। उसके सिवाय किसी भी व्यक्ति का यहाँ की किसी चीज पर अधिकार नहीं है। जिसे जो कुछ मिलता है, वह सब परमात्मा का दिया होता है।

मनुष्य की बुद्धिमानी इसी में है कि वह इस सत्य को स्वीकार करे और इस बात के लिये सदैव तैयार रहना चाहिये कि परिवर्तन के नियम के अन्तर्गत उससे कोई भी चीज किसी भी समय ली जा सकती है। इस सत्य में विश्वास रखने वाले को व्यामोह का कोई दोष नहीं लगने पाता और वह सम्पत्ति तथा विपत्ति में सदा समभाव रहता है।

इसी व्यामोह के जाल से बचने के लिए ही गीता में भगवान् ने अनासक्तिपूर्वक जीवन−चक्र चलाने का निर्देश किया है। उत्साहपूर्वक अपना कर्तव्य करते हुए इस बात के लिए सदा तैयार रहना चाहिये कि इस परिवर्तनशील जगत् में कुछ भी अपना नहीं है। सम्पन्नता अथवा विपन्नता जो भी प्राप्त हो रही है, किसी समय भी बदल सकती है। यह अनासक्त भाव मानव−जीवन में सुख−शाँति का बड़ा महत्वपूर्ण विधायक है। मानव−जीवन आनन्द रूप है। दुःखों सन्तापों तथा आवेगों से इसे अशान्त करना अन्याय है। ऊर्ध्व स्थिति से अधोस्थिति में आकर अथवा विपन्नता से सम्पन्नता में पहुँचकर किन्हीं अतिरिक्त अथवा अन्यथा भाव से आन्दोलित नहीं होना चाहिये। सम्पन्नता की स्थिति में अभिभूत रहना और विपन्नता में दुखी होना, दोनों भाव ही जीवन में अशाँति का कारण हैं।

विगत वैभव के प्रति व्यामोह के कारण वर्तमान जीवन तो अशान्त रहता है, साथ ही मलीन चिन्तन के कारण भविष्य भी प्रभावित होता है। अनासक्त भाव से, परिवर्तन में विश्वास रखते हुए उत्साहपूर्वक अपना कर्तव्य करते हुए जो स्थिति प्राप्त हो, उसे मित्र की भाँति स्वीकार करने से जीवन में अशाँति और असुख की सम्भावना नहीं रहती।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 58


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शुक्रवार, 30 जून 2023

👉 संघर्ष की अनेक धाराएँ

आपको अपने पैसे से हर काम करने की छूट नहीं मिली है। सिनेमा वालों के विरुद्ध हमें पिकेटिंग करना पड़ेगा और धरना देना पड़ेगा, उनके कैमरों के सामने लेटना पड़ेगा और उनके काम को विफल करने के  लिए यदि मौका हो तो हमें जो कुछ भी करना पड़ेगा वो हम करेंगे। संगीत, गायक और दूसरे लोग जो इस तरह के गीत गाते हैं जिससे फूहड़पन पैदा होता है उनके विरुद्ध सत्याग्रह पैदा करना पड़ेगा। 
इस तरह के साहित्य लिखने वाले जिन्होंने समाज को जलील किया-बदनाम किया है, उनके दरवाजे पर भूख हड़ताल करके किसी को प्राण भी देना पड़े तो देना ही चाहिए। उनके कृतियों के प्रसंग कि इन्होंने लोगों को क्या क्या कहा और क्या-क्या समझाया, उसके  कोटेशन उद्घृत करके सारे समाज में बाँटने पड़ेंगे और बताना पड़ेगा कि ये लोग ऐसे हैं जिन्होंने पैसे के लिए, अपनी कमाई के लिए-लोभ के लिए समाज को कितनी हानि पहुँचाई और कितने लोगों को खराब किया। इस तरीके से इनके भंडाफोड़ करने वाली बातों के विरुद्घ में हमें खड़ा होना ही चाहिए। 
गुंडातत्व इसलिए जिंदा हैं कि वो समझते हैं कि हमारा कोई मुकाबला करने वाला नहीं है और हम चाहे जो काम कर करते हैं। इन गुंडा तत्वों को जब ये मालूम पड़ेगा कि समाज में से वो तत्व उठकर खड़े हो गये हैं जो हमारा मुकाबला करेंगे और हमारे गलत काम और उच्छृंखलता के विरुद्ध लोहा लेंगे, इस तरह की उनको जब जानकारी होगी तो उनके हौसले पस्त हो जायेंगे। गुंडा गर्दी आजकल इस लिए हावी होती जा रही है कि एक आदमी का नुकसान होता है तो दूसरा आदमी उसके बारे में आवाज नहीं उठाता। ये कहता है कि हम क्यों उस मुसीबत में फँसें, इससे तो और मुसीबतें आयेंगी। 
लेकिन जिन लोगों ने अपना सिर हथेली पर रख लिया है, जिन्होंने मुसीबतों को ही आमंत्रण दिया है, जो मुसीबत के लिए ही उठकर खड़े हो गये हैं और जिन्होंने अपना जीवन और जान को ऐसी चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए ही समर्पित कर दिया है, ऐसी लोकसेना उठकर खड़ी हो जाये तो बात बन जाये। तब वे लोग जो  अपने आप को अकेला अनुभव करते हैं, जो ये ख्याल करते हैं कि हम अकेले क्या कर सकते हैं, हमको कुचल दिया जायेगा और हमारे विरोधी बहुत हो जायेंगे, गुंडे हमको तंग करेंगे इसलिए वे मन मारकर चुप बैठ  जाते हैं; उनके हौसले चौगुने और सौैगुने हो जायेंगे। तब अनीति का मुकाबला करने के लिए न केवल लोकवाहिनी सेना बल्कि असंख्य लोग उनके साथ में उठकर खड़े हो जायेंगे और एक ऐसी क्रांति उत्पन्न होगी जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति के बीच, समाज-समाज के बीच, वर्ग-वर्ग के बीच और अवांछनीय-वांछनीय तत्वों के बीच जो विग्रह की आग सुलग रही है, उस आग को या तो इधर कर दिया जायेगा या उधर कर दिया जायेगा। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 4)

इस प्रकार जिस प्रकार का विश्वास और जिस प्रकार के विचार लेकर मनुष्य अपने भविष्य के प्रति उपासना करता है, उसी प्रकार के तत्त्व उसकी जीवन परिधि में सजग और सक्रिय हो उठते हैं। अतएव मनुष्य को सदैव ही कल्याणकारी चिन्तन ही करना चाहिए। निराशापूर्ण चिन्तन जीवन के उत्थान और विश्वास के लिए अच्छा नहीं होता।

दुःख मनाने से दुःख के कारणों का निवारण नहीं हो सकता। दुःख के कारण उद्विग्न और मलीन रहने के कारण मन की शक्तियाँ नष्ट होती हैं। अधोगत व्यक्ति के भौतिक साधन प्रायः नगण्य हो जाते हैं। उस स्थिति में उसके पास मनोबल के सिवाय अन्य कोई साधन नहीं रह जाता। मनोबल का साधन कुछ कम बड़ा साधन नहीं होता। मनोबल के बने रहने पर मनुष्य में प्रसन्नता, विश्वास और उत्साह बना रहता है। इन गुणों को साथ लेकर जब किसी स्थान पर व्यवहार किया जाता है तो दूसरों पर उसके धैर्य सहिष्णुता और साहस का प्रभाव पड़ता है। लोग उसे एक असामान्य व्यक्ति मानने लगते हैं। उन्हें विश्वास रहता है कि इसको दिया हुआ सहयोग सार्थक होगा। यह परिस्थितियों से हार न मानने वाला दृढ़ पुरुष है। इस प्रतिक्रिया से लोग उस व्यक्ति की ओर स्वतः आकर्षित हो उठते हैं—ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार उपासक की ओर परमात्मा की करुणा आकर्षित हो उठती है।

विगत वैभव का सोच करना किसी प्रकार भी उचित नहीं। क्योंकि अतीत का चिन्तन न तो वर्तमान में कोई सहायता करता है और न भविष्य का निर्माण। बल्कि वह उस व्यामोह को और भी सघन तथा दृढ़ बना देता है, जिसके अधीन मनुष्य विगत वैभव का सोच किया करते हैं। उत्थान अथवा अवनति के माया जाल से बचने के लिए आवश्यक है कि उनके प्रति व्यामोह के अंधकार से बचे रहा जाय। इस सत्य में तर्क की जरा भी गुँजाइश नहीं है कि संसार परिवर्तन के चक्र से बँधा हुआ घूम रहा है। यहाँ पर कोई भी सदैव एक जैसी स्थिति के प्रति आश्वस्त रहने का अधिकार नहीं रखता। उसे परिवर्तन का अटूट नियम सहन ही करना पड़ेगा। यह सोचकर इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा कि पहले गरीब थे, फिर अमीरी आई और अब उसी चक्र के अनुसार पुनः गरीबी आ गई है। पुनरपि यह निश्चित है कि यदि पूर्ववत पुरुषार्थ का प्रमाण दिया जाए तो संपन्नता निश्चित है। इस सहज संयोग में रहते हुए सम्पन्नता, विपन्नता से विचलित होना किसी प्रकार भी बुद्धिसंगत नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 57


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

गुरुवार, 29 जून 2023

👉 हमारी गलती क्या है?

गलती हमारी ये होती है कि जब हम ये देखते हैं कि ये आदमी आतंकित कर सकता है और हमारा नुकसान कर सकता है तो हम उसकी हाँ में हाँ मिला देते हैं। खु्ल्लमखुल्ला विरोध की शक्ति नहीं रखते। उससे असहयोग कर नहीं सकते बल्कि उसके सहयोगी बन जाते हैं।  मनुष्य की यह कायरता ही गुंड्डागर्दी और पापों को बढ़ाने में समर्थ होती है। मनुष्य अगर सीना तानकर खड़ा हो जाए और ये कहे कि हम आपकी गलत काम में सहायता नहीं कर सकते और हम आपके साथ नहीं हैं और हम आपका समर्थन नहीं कर सकते। ऐसा करने से दुष्टों  की हिम्मत पचास फीसदी कम हो जाती है। 
बहादुरी हममें लड़ने की न हो, तो कोई बात नहीं, पर कहने की तो हो। वोट माँगने के लिए आया, तो कहे कि साहब आपका चाल-चलन ऐसा नहीं है और आप इस लायक नहीं हैं  कि हम आपको एसेम्बली में भेजें और हम आपको चुनाव में वोट नहीं देंगे। तो आदमी की आधी हिम्मत कम हो जाती है। हममें से बहुत से लोगों को इस बात का माद्दा ग्रहण करना ही चाहिए कि जो आदमी सही काम नहीं कर सकते हैं और जो गलत रास्ते पर जा रहे हैं, उनके साथ में हर आदमी राजी नामा न करें, समझौता न करें, समर्थक न बनें। उसकी हाँ में हाँ न मिलाएँ। 
ठीक है, अगर विरोध करने की शक्ति अपने अन्दर नहीं है और लड़ने की शक्ति नहीं है तो कुछ देर के लिए चुप भी बैठ सकते हैं और उस लड़ाई के वक्त का इन्तजार भी कर सकते हैं। लेकिन समर्थन तो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए और सहयोग तो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। उसका मित्र बनकर तो किसी भी हालत में नहीं रहना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि हम अनैतिकता का पोषण करते हैं, अनैतिकता का समर्थन करते हैं। 
संघर्ष यहाँ से शुरू होता है।  संघर्ष की पहली प्रक्रिया वह है कि हम किसी बुरे आदमी का सहयोग न करें। कोई  जुआरी हमसे उधार माँगने आये कि हम  ब्याज से  पैसे दे देंगे, कहें कि हम पैसे नहीं दे सकते।  ये असहयोग हुआ। जो आदमी बुरा है उसे बुरा कहना, अच्छा है उसे अच्छा कहना । नम्र शब्दों में हम कहें, ठीक है। इज्जत खराब न करें, ये भी ठीक है। लेकिन हमको जो बात है-जो फैक्ट है उसको खोल ही देना चाहिए। खोल देने से अच्छाई रहेगी। 
यदि कोई बुरा आदमी सज्जनता की बाना पहने हैं, एक सियार-शेर का चमड़ा ओढ़कर रहता है और उसके बारे में लोगों की आँखें खुल जाएगी, तो क्या हर्ज की बात है? हमको सही कहना, अच्छे को अच्छा कहना, बुरे को बुरा कहना सीखना चाहिए और हमको गलत आदमियों का असहयोग करना सीखना चाहिए। उनके साथ में हम सहयोग न करें। 
यहाँ से लड़ाई शुरू होती है और लड़ाई में दोनो तरफ के लोग घायल होते हैं। सामने वाला ही घायल हो जाये और अपने को चोट नहीं आयेगी ये कै से हो सकता है? अपने आपको भी चोट आ सकती है, ये मानकर लड़ाई के मैदान में आना चाहिए। संघर्ष के मोर्चे पर सिर्फ उसी को आना चाहिए, जो इस बात के लिए तैयार हो कि मैं एक ऐसा काम करने जा रहा हूँ, जिसमें मुझे लड़ाई-झगड़ा करना पड़ेगा। लड़ाई-झगड़ा करने में सामने वाला ही मारा जाता हो, सामने वाला ही घायल होता हो, सामने वाले को ही हरा दिया जाता हो, ऐसी बात तो नहीं है न। जो आदमी लड़ाई लड़ता है वो भी इस चपेट में आता है, वह भी घायल होता है, जख्म होता है। तो हमारे विरोध करने की कीमत पर अगर दूसरे लोग हमारे ऊपर हमला करेंगे, हमें नुकसान पहुँचाएँगे तो उसको भी देखेंगे। उसको भी समझेंगे, उसके लिए भी तैयार हैं। ये हिम्मत आदमी के भीतर उत्पन्न होनी चाहिए। इतनी हिम्मत अगर उत्पन्न हो जाए और आदमी के  असहयोग करने का माद्दा विकसित हो जाए, बुरे को बुरा कहने का माद्दा विकसित हो जाये तो समझना चाहिए कि पाप, अनीति और अनाचार के विरूद्घ संघर्ष करने का पचास फीसदी मोर्चा फतह कर लिया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 3)

अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करने से क्या लाभ। अतीत काल की वह स्थिति जो वैभवपूर्ण थी, आज लौट कर नहीं आ सकती। हाँ उसकी तरह की स्थिति वर्तमान में बनाई अवश्य जा सकती है। किन्तु यह सम्भव तभी होगा, जब अतीत का रोना छोड़कर वर्तमान के अनुरूप साधनों का सहारा लेकर परिश्रम और पुरुषार्थ किया जाये। केवल अतीत को याद कर−करके दुःखी होने से कोई काम न बनेगा।

जब मनुष्य अपने वैभवपूर्ण अतीत का चिन्तन करके इस प्रकार सोचता रहता है तो उसके हृदय में एक हूक उठती रहती है—एक समय ऐसा था कि हमारा कारोबार जोरों से चलता था। लाखों रुपयों की आय थी। हजारों आदमी अधीनता में काम करते थे। बड़ी−सी कोठी और कई हवेलियाँ थीं। मोटर कार पर चलते थे। मन−माने ढँग से रहते और व्यय करते थे। लेकिन आज यह हाल है कि कारोबार बन्द हो गया है। आय का मार्ग नहीं रह गया। दूसरों की मातहती की नौबत आ गई है। कोठियाँ और हवेलियाँ बिक गईं। मोटर कार चली गई। हम एक गरीब आदमी बन गए। अब तो यह जीवन ही बेकार है। इस प्रकार का चिन्तन करना अपने जीवन में निराशा और दुःख को पाल लेना है।

यदि अतीत का चिन्तन ही करना है तो इस प्रकार करना चाहिए। हमने इस−इस प्रकार से अमुक−अमुक काम किए थे। जिससे इस−इस तरह की उन्नति हुई थी। उन्नति के इस मार्ग में इस−इस तरह के विघ्न आए थे। जिनको हमने इस नीति द्वारा दूर किया था। इस प्रकार का चिन्तन करने से मनुष्य का सफल स्वरूप ही सामने आता है और वह आगे उन्नति करने के लिए प्रेरणा पाता है। विचारों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बड़ा गहरा पड़ता है। जो व्यक्ति अपनी अवनति और अनिश्चित भविष्य के विषय में ही सोचता रहता है, उसका जीवन चक्र प्रायः उसी प्रकार से घूमने लगता है। इसके विपरीत जो अपनी उन्नति और विकास का चिन्तन किया करता है, उसका भविष्य उज्ज्वल और भाग्य अनुकूलतापूर्वक निर्मित होता है।

मनुष्य की चिन्तन क्रिया बड़ी महत्वपूर्ण होती है। चिन्तन को यदि उपासना की संज्ञा दे दी जाए, तब भी अनुचित न होगा। जो लोग उपासना करते हैं, उन्हें अनुभव होगा कि जब वे अपना ध्यान परमात्मा में लगाते हैं तो अपने अन्दर एक विशेष प्रकार का प्रकाश और पुलक पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानो परमात्मा की करुणा उनकी ओर आकर्षित हो रही है। यह कल्याणकारी अनुभव उस उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 57


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


👉 अनीति का प्रतिरोध जरूरी

फिर किस तरीके से क्या किया जाए? रचनात्मक कार्य करने में लोगों का श्रम करने की, रचना करने की और सेवा करने की वृत्ति का विकास तो होता है, इस दृष्टि से तो बहुत अच्छा है, जो कार्य नहीं होते हैं, वो होने लगेंगे। कुछ भाग नहीं हो रहा है, होने लगेगा। जो विकास नहीं हुआ है, होने लगेगा। लेकिन जो निहित स्वार्थ रोड़े की तरह खड़े हुए हैं, उनका क्या किया जाए? इसके लिए और कोई तरीका नहीं है। एक ही तरीका है कि उनका संघर्ष किया जाए, उनको धमकाया जाए, उनको हटाया, उनका मुकाबला किया जाए और मोर्चा लिया जाए।

अब समय ऐसा भी आ गया है जब संघर्ष, एक घनघोर संघर्ष करना पड़ेगा अवांछनीय तत्त्वों के साथ। और ये सहज में निपटने वाले नहीं हैं। शिक्षा से मानने वाले नहीं हैं। ऐसा सन्त कहाँ से आए जो सबको ठीक कर दे? ऋषियों ने बहुतों को समझाया, परन्तु उनमें से कुछ ही समझ सके। बाकी दुष्टों-दुराचारियों को तो उनके हिसाब से ही लगाना पड़ता है। उस हिसाब से लगाने के लिए संघर्ष की बहुत जरूरत पड़ेगी। 

वर्तमान समय में संघर्ष करने के लिए मनुष्य और मनुष्य में टक्कर खाने की जरूरत नहीं है, लेकिन विचार और विचारों में घनघोर टक्कर होने ही वाली है। ये संघर्ष जिसका मैं वर्णन करता रहा हूँ और ये कहता रहा कि युग परिवर्तन के साथ-साथ एक बहुत भारी महाभारत की संभावना जुड़ी हुई है; वो महाभारत के लड़ाई- झगड़े के बारे में मैं नहीं कहता, तोप- तलवारों के बारे में नहीं कहता। तोप-तलवार वाले जो युद्घ होते हैं उससे कोई समस्या का हल नहीं होता बल्कि नयी-नयी समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। कभी भी लड़ाई हुई उससे नयी समस्याएँ पैदा हो गयीं जिससे समाज का ढाँचा लड़खड़ा गया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

बुधवार, 28 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 28 June 2023

किसी को हमारा स्मारक बनाना हो तो वह वृक्षा लगाकर बनाया जा सकता है। वृक्षा जैसा उदार, सहिष्णु और शान्त जीवन जीने की शिक्षा हमने पाई। उन्हीं जैसा जीवनक्रम लोग अपना सकें तो बहुत है। हमारी प्रवृत्ति, जीवन विद्या और मनोभूमि का परिचय वृक्षों से अधिक और कोई नहीं दे सकता। अतएव वे ही हमोर स्मारक हो सकते हैं।

गायत्री परिवार में बुद्धिमानों की, भावनाशीलों की, प्रतिभावनों की, साधना संपन्नों की कमी नहीं, पर देखते हैं कि उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है, उसे वे जुटा नहीं पाते। सोचते बहुत हैं, पर करने का समय आता है तो बगलें झाँकने लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो अब तक अपने ही परिवार में से इतनी प्रतिभाएँ निकल पड़तीं जो कम से कम भारत भूमि को नर-रत्नों की खदान होने का श्रेय पुनः दिला देतीं।

स्मरण रखा जाय हम चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा का आन्दोलन करने चले हैं। यह लेखनी या वाणी से नहीं, उपदेशकों की व्यक्तिगत चरित्र निष्ठा में से ही संभव होगा। उसमें कमी पड़ी तो बकझक, विडम्बना भले ही होती रहे, लक्ष्य की दिशा में एक कदम भी बढ़ सकना संभव न होगा। हममें से अग्रिम पंक्ति में जो भी खड़े हों, उन्हें अपने तथा अपने साथियों के संबंध में अत्यन्त पैनी दृष्टि रखनी चाहिए कि आदर्शवादी चरित्र निष्ठा में कहीं कोई कमी तो नहीं आ रही है। यदि आ रही हो तो उसका तत्काल पूरे साहस के साथ उन्मूलन करना चाहिए और यही हमारी स्पष्ट नीति रहनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 2)

अयोग्य विद्यार्थी का न तो कोई वर्तमान होता है और न भविष्य। वह निकम्मा, चाहे दुःख हो, चाहे प्रसन्न कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस प्रकार पतन द्वारा पाई असफलता तो दुःख का हेतु है, किन्तु पुरुषार्थ से अलंकृत प्रयत्न की असफलता दुःख खेद का नहीं, चिन्तन−मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।

प्रायः आर्थिक उतार लोगों को बहुत दुःखी बना देता है। जिसका लंबा−चौड़ा व्यापार चलता हो। लाखों रुपये वर्ष की आमदनी होती हो, सहसा उसका रोजगार ठप हो जाए, कोई लंबा घाटा पड़ जाए, हैसियत, बिगड़ जाए और वह असाधारण से साधारण स्थिति में आ गिरे तो वह अवश्य ही दुःखी और शोक−ग्रस्त रहने लगेगा। फिर भी इस आर्थिक उतार का शोक करना उचित नहीं। क्योंकि शोक करने से स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। यदि शोक करने और दुःखी रहने से स्थिति में सुधार की आशा हो तो एक बार शोक करना और दुःखी रहना उस स्थिति में किसी हद तक उचित कहा जा सकता है। किन्तु यह सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि विपन्नता का उपचार दुःखी रहना नहीं, बल्कि उत्साहपूर्वक पुरुषार्थ करना ही है। तथापि लोग उल्टा आचरण करते हैं। यह कम खेद की बात नहीं है।

सम्पन्नता से विपन्नता में आ जाने पर लोग क्यों दुःखी रहते हैं? इसके अनेक कारण होते हैं। इसका एक कारण तो है अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करना। दूसरा कारण है दूसरों की संपन्न स्थिति को सामने रखकर अपनी स्थिति देखना। तीसरा कारण है, सामाजिक अप्रतिष्ठा की आशंका करना चौथा कारण है लज्जा और आत्म−हीनता का भाव रखना। और पाँचवाँ कारण है, विगत वैभव का व्यामोह। यह और इसी प्रकार के अन्य कारणोंवश लोग अपने आर्थिक उतार पर दुःखी और शोकग्रस्त रहा करते हैं। किन्तु यदि इन कारणों पर गहराई से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि इन कारणों को सामने रखकर अपनी विपन्नता पर शोक करना बड़ी हल्की और निरर्थक बात है। इनमें से कोई कारण तो ऐसा नहीं, जिसे शोक का उचित सम्पादक माना जा सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 56
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.56


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...