शनिवार, 5 नवंबर 2022

👉 आस्तिकता की कसौटी

सन्त प्रवर महात्मा तुलसीदास की अनुभूति है-
उमा जे रामचरन रत बिगत काम मद क्रोध। निल प्रभुमय देखहिं जगत कासन करहिं विरोध॥

जो भगवान को मानते हैं, उन पर श्रद्धा करते हैं, उनके अस्तित्व में विश्वास रखते हैं उनके न काम होता है, न मद् होता है और न क्रोध। वे संसार के अणु-अणु में प्रभु का दर्शन करते हैं तब उनका विरोध किसके साथ हो? तुलसीदास जी की आस्तिकता की इस परिभाषा पर किन किन आस्तिकों को आज परखा जा सकता है?

धर्म के नाम पर बड़े बड़े आडंबर करने वालों की आज कमी नहीं है, लेकिन उनके जीवन में प्रभु के दर्शन नहीं होते। ऐसा मालूम होता है जैसे जीवन के अन्य व्यापारों की तरह धर्म का भी वे एक व्यापार कर लेते हैं और सबसे अधिक उसकी कोई कीमत नहीं है।

भगवान पर मेरा विश्वास है ऐसे कहने वाले भी मिलते हैं लेकिन ये शब्द मुँह से निकलते हैं या हृदय से इसका निर्णय करना कठिन है। उनका व्यवहार रागद्वेष पूर्ण देखा जाता है और स्वयं भी उन्हें अपने विश्वास शब्द का विश्वास नहीं होता। प्रभु आज उपेक्षणीय हो गये हैं लेकिन तब भी हम आस्तिक हैं इसे बड़े जोर से चिल्लाकर कहते लोग पाये जाते हैं।

जिसके हृदय में प्रभु का निवास है और जो उसका दर्शन करता है उसका जीवन प्रभुमय होता है। उसके जीवन में समत्व होता है। वह संसार को प्रभु का विग्रह केवल मानता ही नहीं, अनुभव भी करता है। प्रभु उसके आचार में, प्रभु उसके जीवन में समा जाते हैं। वह व्यक्ति प्रभु की अर्चना के लिये किसी समय को अपने कार्यक्रम में अलग नहीं रखता। उसके जीवन का कार्यक्रम ही प्रभुमय होता है। उसका खाना पीना सोना जागना चलना फिरना तथा जगत के समस्त व्यवहारों में प्रभु समाये रहते हैं। ऐसे आस्तिक के लिए सम्प्रदायों के अलग नाम नहीं हैं, उसके लिए प्रत्येक घर प्रभु का मन्दिर है। और प्रत्येक शरीर प्रभु का विग्रह वहाँ भेदभाव की गुँजाइश ही नहीं रहती । वह संसार में भगवान की नित्य लीला का रसास्वादन करना है और स्वयं को भी भगवान की लीला का एक पात्र मात्र समझना है।

आस्तिक की न अपनी कोई कामना होती है, न माँग। वह न किसी से ऊंचा होता है न नीचा, न बड़ा न छोटा, न पवित्र न अपवित्र। उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं सताता ।

आज की दुनिया रागद्वेष से पूर्ण है। ऊंच नीच के भावों से भरी हुई है। यद्यपि मन्दिर मस्जिद और गिरजाघरों की संख्या बराबर बढ़ रही है लेकिन आस्तिकता की सब ओर उपेक्षा की जा रही है। हम कहने को तो आस्तिक बनते हैं लेकिन हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। इस तरह हमारा जीवन आत्म प्रवञ्चना से भरा हुआ है। हम अपने आपको धोखा दे रहे हैं या अपनी समझ को लेकर हम धोखा खा रहें हैं धोखे का यह जीवन आस्तिक जीवन नहीं है इसे भी समझने वालो की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

भारत के जीवन में जब जब आस्तिकता का जमाना रहा है, वह हमेशा खुशहाल रहा है लेकिन जैसे जैसे उसकी उपेक्षा की जाती रही है उसकी खुशहाली हटती गई है। आज कलह और क्लेशों से भरा हुआ भारत हम सब की आस्तिकता का डिमडिम घोष कर रहा है और फिर भी हम अपने आपको आस्तिक समझे बैठे हैं।

आस्तिकता अनन्त शान्ति की जननी है। जहाँ आस्तिकता होगी वहाँ अशांति का कोई चिन्ह दृष्टि गोचर नहीं होना चाहिए। ईश्वर का सच्चा विश्वासी पवित्र अन्तःकरण का होता है तदनुसार उसके व्यवहार तथा कर्म परिपाक भी सुमधुर ही होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-1950 अप्रैल पृष्ठ 10


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 विचारों की शक्ति

मित्रो ! मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं, उतनी आसानी से सोना नहीं मिलता। पापों की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों की ओर प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किंतु अगर ऊँचे स्थान पर चढ़ाना हो, तो पंप आदि लगाने का प्रयत्न किया जाता है।

बुरे विचार, तामसी संकल्प ऐसे पदार्थ हैं, जो बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में धँस जाते हैं और साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले जाते हैं। स्वार्थमयी नीच भावनाओं को वैज्ञानिक विश्लेषण करके जाना गया है कि वे काले रंग की छुरियों के समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती हैं। उन्हें जहाँ थोड़ा-सा भी स्थान मिला कि अपने सदृश और भी बहुत-सी सामग्री खींच लेती हैं। विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्त्वों की भाँति खिंचने और खींचने की शक्ति होती है। तदनुसार अपनी भावना को पुष्ट करने वाले उसी जाति के विचार उड़-उड़ कर वहीं एकत्रित होने लगते हैं।

यही बात भले विचारों के संबंध में है। वे भी अपने सजातियों को अपने साथ इकट्ठे करके बहुकुटुंबी बनने में पीछे नहीं रहते। जिन्होंने बहुत समय तक बुरे विचारों को अपने मन में स्थान दिया है, उन्हें चिंता, भय और निराशा का शिकार होना ही पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदले

मित्रों ! अपने को दीन- हीन, दयनीय, दरिद्र, अनगढ़, अभागा, बाधित समझने वालों को वस्तुतः यही अनुभव होता है कि वे दुरूह परिस्थितियों से जकड़े हुए हैं, किन्तु जिनकी मान्यता यह है कि उनमें उठने और महानता की मञ्जिल तक जा पहुँचने की शक्ति है, वे प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल सकने में भी समर्थ होते हैं। उठने में सहायता करने का श्रेय किसी को भी दिया जा सकता है और गिरने में गिराने का दोषारोपण भी किसी पर भी किया जा सकता है, पर वस्तुस्थिति ऐसी है कि यदि अपने ही व्यक्तित्व और कर्तृत्व को ऊँचा उठाने और गिराने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाए, तो यह मान्यता सबसे अधिक सही होगा।

गई- गुजरी स्थिति पर आँसू बहाए जा सकें, तो अनुचित नहीं, उनकी सहायता करना भी मानवोचित कर्तव्य है, पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि जब तक तथाकथित असहाय कहाने वालों का मनोबल न उठाया जाएगा, उनमें पुरुषार्थपूर्वक आगे बढ़ने का संकल्प न उभारा जाएगा,तब तक ऊपर से थोपी गई सहायता कोई चिरस्थाई परिणाम उत्पन्न न कर सकेगी। उत्कण्ठा का चुम्बकत्व अपने आप में इतना शक्तिशाली है कि उसके सहारे निश्चित रूप से प्रगति का पथ- प्रशस्त किया जा सकता है। इस उक्ति को भी ध्यान में रखे ही रहना चाहिए कि ‘‘ईश्वर मात्र उन्ही की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।’’ दीन- दुर्बलों को तो प्रकृति भी अपनी मौत अपने आन मरने के लिए उपेक्षापूर्वक छोड़ती और मुँह मोड़कर अपनी राह चल पड़ती देखी गई है। शास्त्रकारों और आप्तजनों ने इस तथ्य का पग- पग पर प्रतिपादन किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र- पेज 05

👉 अपना दृष्टिकोण बदलो

मित्रो ! सत्य! सत्य!! सत्य!!! अहा, कितना सुन्दर शब्द है। उच्चारण करते ही जिव्ह्य को शांति मिलती है, विचार करते ही मस्तिष्क शीतल हो जाता है, हृदयंगम करने से कलेजा ठंडक अनुभव करता है। झूठ के मायावी प्रपंचों में उलझ कर ईश्वर का राजकुमार-मनुष्य मानवता से पतित होकर पशु बन गया है। सत्य की अवहेलना करने का अभिशाप वह भुगत रहा है।
    
ईश्वर सत्य है, आत्मा सत्य है, प्रभु की त्रिगुणमयी लीला सत्य है, सर्वत्र सत्य ही सत्य व्याप्त हो रहा है। जीवन के कण-कण की एक ही प्यास है-'सत्य'। हमारा जीवन इसलिए है कि अखिल सत्य तत्त्व में विचरण करते हुए अमृत का पान करें। प्रभु ने कृपा करके हमें अपने संसार की सत्यरूपी वाटिका में भ्रमण करके आनंद लाभ करने के लिए भेजा है। परन्तु हाय, हम तो अपने को बिलकुल ही भूले जा रहे हैं। वास्तव में दुनियाँ कुछ नहीं है। अपनी छाया ही संसार के दपर्ण में प्रतिबिंबित हो रही है।

'सत्य' मनुष्यों को प्रेरणा देता है कि अंतर में दृष्टि डालो, अपना दृष्टिकोण बदलो, अपना और दुनियाँ का स्वरूप समझो, अपने को अच्छा बना डालो, बस सारी दुनियाँ तुम्हारे लिए अच्छी बन जाएगी। तुम सत्यनिष्ठ बनो, दुनियाँ तुम्हारे साथ सत्य का आचरण करेगी। श्रुति कहती 'असतो मा सद्गमय' असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर गमन कीजिए। आपका इसी में कल्याण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 नैष्ठिक प्रतिभाओं की प्रतीक्षा

अनुकरण की प्रवृत्ति मनुष्य स्वभाव का महत्त्वपूर्ण अंग बनकर रहती है। हम जैसा देखते हैं, वैसा करते हैं। बच्चा अभिभावकों को, साथियों को जिस शब्दावली का, भाषा का प्रयोग करते सुनता है, उसी को बोलने और समझने लगता है। चरित्र और स्वभाव के संबंध में भी साथियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। वातावरण का प्रभाव पडऩा एक तथ्य है। जिन लोगों के बीच, जिन परिस्थितियों के बीच रहना पड़ता है, वैसी ही आदतें बन जाती हैं। रुचि विचित्रता, आदतों की भिन्नता और प्रकृति की पृथकता न तो जन्मजात होती है और न अनायास उत्पन्न होती है, इसके निर्माण में समीपवर्ती व्यक्तियों और परिस्थितियों का भारी हाथ रहता है।
  
अनाचार समर्थक-अभिरुचि बढ़ जाने से वातावरण में अपराधी प्रवृत्तियों का प्रवाह उत्पन्न होता है। सामान्य मन:स्थिति के लोग उसी की धारा में बहने लगते हैं। हवा के रुख की ओर पत्ते उड़ते हैं। बहुत लोग जो कुछ करते हैं, उसी का अनुकरण करने की, उसी दिशा में चलने की लोकप्रवृत्ति उभरती है।
  
जन-प्रवाह को अवांछनीयता से विरत रहने के लिए उसी प्रकार का वातावरण बनाना आवश्यक है, जिसमें सामान्य लोगों के चल पडऩे की प्रेरणा मिल सके। यह कार्य प्रखर एवं मनस्वी व्यक्तियों के आगे आने से ही संभव होता है। हवा का रुख वे ही बनाते हैं, प्रवाहों को वे ही मोड़ते हैं। वातावरण बनाने का बहुत कुछ श्रेय उन्हीं का होता है।
  
विचार और क्रिया को जिन्होंने मिलाकर अपनी आस्था का परिचय दिया है, वे कुमार्गगामी होते हुए भी प्रतिभावान्ï होते हैं और अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। एक वेश्या अनेकों को व्यभिचार सिखा देती है। नशेबाज, चोर, जुआरी आदि कुमार्गगामी अपनी बुरी लतें अधिकांश  को सिखा देते हैं, जो उनके सम्पर्क में आते हैं। विचार यदि कर्म में उतर सकने जैसा प्रौढ़ हो तो उनसे प्रतिभा उभरती है और उसका प्रभाव पड़ता है।
  
सन्मार्गगामी प्रतिभाएँ अपने समाज एवं समय को प्रभावित कर सकने में पूरी तरह सफल रही हैं। गाँधीजी ने अपने प्रभाव से ऐसा वातावरण बनाया था, जिसने असंख्य लोगों को सत्याग्रही सैनिकों के रूप में कष्टïसाध्य त्याग, बलिदान करने के लिए अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। भगवान्ï बुद्ध की प्रेरणा से लाखों भिक्षु और भिक्षुणी अपनी सुख-सुविधाओं को छोडक़र जन-प्रवाह बदलने के लिए कर्म-क्षेत्र में उतरे थे। लेनिन के अनुयायी साम्यवादी आन्दोलन को समर्थ बनाने में सफल हुए थे। शिवाजी, प्रताप, गुरुगोविन्द सिंह आदि के ऐसे अगणित प्रमाण इतिहास के पृष्ठïों पर भरे पड़े हैं, जिनमें प्रतिभाशाली व्यक्तियों ने अपने प्रभाव से युगांतरकारी वातावरण बनाया और उस प्रवाह से बचने के लिए असंख्यों को प्रोत्साहित किया।
  
समय की पुकार जिस परिवर्तन की है, उसके अनुरूप लोकमानस तैयार किया जाना चाहिए। इसके लिए अग्रिम पंक्ति में उन योद्धाओं को आना पड़ेगा, जो अपनी आस्थाओं को कार्यान्वित करते हुए सर्वसाधारण के सम्मुख अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर सकें।
  
त्याग और बलिदान की पुण्य-परंपरा अपनाये बिना यह महान्ï प्रयोजन और किसी भी प्रकार पूरा न हो सकेगा। इसका आरंभ दुर्बल मन:स्थिति के लोगों से नहीं कराया जा सकता। वे पीछे तो चल सकते हैं, पर अग्रिम पंक्ति में खड़े होने का साहसिक शुभारंभ कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। युगपरिवर्तन का शुभारंभ तो त्याग और बलिदान के भावभरे आदर्श प्रस्तुत कर सकने वाले अग्रगामी साहसी शूरवीरों द्वारा ही संभव होगा। युग की माँग और पुकार उन्हीं के उभरने, उठने की प्रतीक्षा कर रही है।

👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें (अन्तिम भाग)

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असम्भव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक संताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मन चाही सफलताएँ किसे मिली है। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो संजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दे और एक-एक तिनका बीन कर बनाये गये उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।

नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी है। हिलोरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1973 पृष्ठ 48


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें

आगत कठिनाइयों को देखकर निठाल हो बैठना और रोते कलपते समय गँवाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पड़ेगा कि जीवन आरोह अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती है और होती ही रहेगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। वट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

सदा दिन ही बना रहे रात कभी आये ही नहीं भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाये जाते रहे, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नहीं जो किसी का सुख सन्तोष फूटी आँखों नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर अनाचार में बाधा पड़ती है वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज़ कहाँ आते हैं और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य साहस इतना विकसित कर लिया जाय कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता के अतिरिक्त आपने साथी सहकारी बढ़ाकर भी आततायी की गति विधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार की शक्ति बढ़ाकर ही आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित अवांछनीय सामने आये ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बात-कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और कोई रास्ता है ही नहीं।

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असम्भव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक संताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मन चाही सफलताएँ किसे मिली है। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो संजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दे और एक-एक तिनका बीन कर बनाये गये उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।

नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी है। हिलोरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1973 पृष्ठ 48


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo


👉 अपनी समस्याएँ आप सुलझायें

शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाश के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरूस्ती पर अधिक ध्यान देते हैं, स्वास्थ्य के नियमों का ठीक तरह पालन करते हैं, वे मजबूत और निरोग बने रहते हैं। यूरोप अमेरिका के निवासियों के शरीर कितने स्वस्थ एवं सुदृढ़ होते हैं। हमारी तरह वे भाग्य का रोना नहीं रोते, वरन्ï आहार-विहार के नियमों का सख्ती के साथ पालन करते हैं, बुद्धि ओर विवेक का उपयोग निरोगता के लिए करते हैं, जिससे वे न तो बहुत जल्द बीमार पड़ते हैं, न दुर्बल होते हैं और न अल्पायु में मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।
  
मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है। किन्तु खेद है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकार-ग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ और आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रहता है। स्थिरता, प्रसन्नता और सदाशयता का कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होता। ईर्ष्या, द्वेष और रोष, क्रोध की नष्टïकारी चिताएँ जलती और जलाती ही रहती हैं। लोग मानसिक विकारों, आवेगो और असद्विचारों से अर्ध विक्षिप्त से बने घूम रहे हैं। यदि इस प्रचंड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मन:शांति का महत्त्व समझने और नि:स्वार्थ निर्लोभ एवं निर्विकारता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते चलें, तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ सकते हैं।
  
भोगवाद की बढ़ती अतृप्त लालसा ने जन मानस को विशृंखलित बना दिया है। विकसित एवं विकासशील देशों में आये दिन होने वाली आत्महत्याओं और विभिन्न अपराधों में वृद्धि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आत्महत्या में अमेरिका व कनाडा का पहला स्थान है जबकि जापान दूसरे नम्बर पर है। विश्लेषण करने वाले कई प्रकार से इसका विवेचन कर सकते हैं, किन्तु यह सुनिश्चित है कि भोगवादी जीवन अध्यात्मवाद से परे होने के कारण कई प्रकार के संत्रास, विक्षोभ, तनाव एवं कष्ट सभी के लिए लाया है। आत्महत्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु विशेष कारणों में निराशा, पारिवारिक कलह, आर्थिक कठिनाई, शराब तथा अनीश्वरवाद की गणना की जाती है।
  
कहना न होगा कि यह सब कारण भौतिक भोगवाद की ही देन हैं। इतने कारोबारी तथा शक्ति संपन्न देश में निराशा का क्या कारण? क्या कारण है कि इन्हीं देशों में आत्महत्या करने के एक सौ पचास उपाय बातने वाली  ‘फाइनल एक्जीट’ नामक पुस्तक सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तक है। स्पष्ट है कि भोगवाद का अंत निराश में ही होता है। भोगवादी शीघ्र ही मिथ्या एवं नश्वर सुखों में अपनी सारी शक्तियाँ नष्ट कर डाला करते हैं, जिससे अकाल ही में खोखले होकर निर्जीव हो जाते हैं। ऐसी दशा में न तो उनके लिए किसी वस्तु में रस रहता है और न जीवन में अभिरुचि। स्वाभाविक है उन्हें एक ऐसी भयानक निराशा आ घेरे जिसके बीच जी सकना मृत्यु से भी कष्टकर हो जाये। पर मुसीबत यह कि उनके आसपास का भोगपूर्ण वातावरण उन्हें अधिकाधिक इष्र्यालु, चिंतित तथा उपेक्षित बनाकर जीने योग्य ही नहीं रखता और वे अनीश्वरवादी होने से, आत्मा-परमात्मा को भूले हुए कोई आधार न पाकर आत्महत्या के जघन्य पाप का ही सहारा लेते हैं।
  
भोगवाद, पूँजीवाद व साम्यवाद की मृगमरीचिका के टूटने के बाद अब अध्यात्मवाद ही एक मात्र मार्ग रह गया है, जो जन-जन के मनों को शांति दे सकता है। अध्यात्मवाद जीवन जीना सिखाता है। भोग करते हुए कैसे त्याग वाला जीवन जियें, इसके सूत्र हमें देता है। अच्छा हो हम समय रहते सँभलें, पाश्चात्य सभ्यता के आक्रमण से स्वयं को बचायें व अपनी संस्कृति के मूल तत्त्व अध्यात्म को जीवंत बनाए रखें।
  
आज की सारी समस्याओं का एक सामान्य हल है अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये, तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें

क्रियाशीलता का अपना महत्व है। श्रम और पुरुषार्थ की महिमा सर्वविदित है। आलस्य और निष्क्रियता की सर्वत्र निन्दा की गई है। इतने पर भी यह सोचना शेष ही रह जाता है कि हमारी क्रियाशीलता निरर्थक अथवा विकृत न हो। सुनियोजित और सुव्यवस्थित श्रम ही सत्परिणाम उत्पन्न करता है। निरर्थक और उद्देश्य रहित चेष्टाएँ न केवल उपहासास्पद होती हैं वरन् अपने व्यक्तित्व का वजन घटाती है।

कुछ लोगों को शरीर के विभिन्न अंगों से विभिन्न प्रकार की निरर्थक क्रिया करने की आदत होती है। इसे मानसिक अस्त-व्यस्तता ही कहना चाहिए। बिना विचारे काम करने की ऐसी निष्प्रयोजन क्रियाएँ जिनके करने की कोई आवश्यकता या उपयोगिता नहीं है लगातार या बार-बार करना यह सिद्ध करता है कि मस्तिष्क के साथ शारीरिक क्रिया-कलाप का सम्बन्ध टूट गया। काम करने से पूर्व उसके प्रयोजन को ध्यान में रखने की व्यवस्था असम्बद्ध हो गई। यह बड़ी उपहासास्पद और दयनीय स्थिति है।

कुर्ते या कोट के सामने वाले बटन मरोड़ना, उंगलियां चटकाना, जमाइयाँ लेते रहना, आँखें मिचकाना, बैठे-बैठे पैर हिलाना, हाथ में कोई चीज लेकर उसे मरोड़ना, खटखटाना, पेन्सिल को मुँह में डालना, पिन से कान या दाँत कुरेदना, मूँछें ऐंठते रहना, नाक में उँगलियाँ डालते रहना, दाँत से नाखून कुतरना, किसी के घर जाकर उसकी पुस्तकें तथा वस्तुएँ उलटना-पलटना, किसी के शरीर को धक्के दे देकर बात करना आदि ऐसी हरकतें हैं जो आदत से सम्मिलित हो जाने के बाद अपने को तो बुरा नहीं लगता, पर दूसरे लोग इन्हें बहुत ही बचकाना मानते हैं।

उपरोक्त हाथ पैरों की हरकतों की तरह मुँह से भी कितने ही लोग ऐसे ही बेतुके कार्य करते रहते हैं। बात-बात में गालियाँ देना, असम्मान सूचक भाषा का प्रयोग करना, अकारण निन्दा चुगली करना, तम्बाकू पान के कारण अथवा ऐसे ही जहाँ-तहाँ थूकते रहना, जोर-जोर से बोलना, जल्दी-जल्दी अथवा अस्पष्ट भाषा में बोलना, इस तरह बोलना कि मुँह से थूक उड़े, होठों की अगल-बगल में थूक जमा लेना अथवा दाँतों से थूक के तार उठाना, खाते समय मुँह खुला रखना और चप-चप की आवाज करना, घूमते-फिरते खाना, जब-तब गाने लगना, अपनी शेखी बघारते रहना, बात को अतिशयोक्तिपूर्ण करके कहना, जैसी बुरी आदतें अशिष्टता की गणना में आती हैं और ऐसे व्यक्ति को असंस्कृत माना जाता है।

बुरी आदतें तब पड़ती हैं जब आवेश ही प्रधान बन जाता है और निरीक्षण नियंत्रण को ध्यान में रखने की बात भुला दी जाती है। साधारण बुद्धि के लोग भी अपने कार्य व्यवसायों में निरीक्षण और नियन्त्रण की आवश्यकता समझते हैं, पर न जाने क्यों लोग अपनी आदतों और हरकतों के बारे में असावधानी बरतते हैं और आवेश में अंग संचालन का जो उत्साह आता है उसे मर्यादित रखने की बात भुला देते हैं फलतः उन्हें उपहासास्पद और छिछोरा बनना पड़ता है। अपनी शक्ति नष्ट होती है और दूसरे उसे असामाजिकता मानकर नाक भौं सिकोड़ते हैं इस असम्मान के कारण उन्हें अव्यवस्थित, असावधान एवं अप्रमाणिक तक मान लिया जाता है। दूसरे लोग उनके हाथ कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते या सहयोग देते हुए झिझकते हैं और सोचते हैं जो अपनी आदतों का निरीक्षण नियन्त्रण नहीं कर सकता वह किसी बड़े कार्य को पूरा करने में या दिये हुए सहयोग का सदुपयोग करने में कैसे समर्थ हो सकेगा?

किसी भी क्षेत्र में प्रगति का मूल आधार व्यवस्था बुद्धि होती है। जीवन जीना भी एक बड़ा कार्य क्षेत्र है इसमें व्यवस्था बुद्धि का उपयोग इस दिशा में भी सतर्कतापूर्वक किया जाना चाहिए कि अपनी आदतें बिगड़ने न पायें। निरर्थक और अनर्थ उत्पन्न करने वाली बुरी आदतें असावधानी के कारण हमारे स्वभाव का अंग बन जाती हैं और परिपक्व होने पर जड़ें इतने गहरी जमा लेती हैं कि उन्हें हटाना बहुत ही कठिन एवं प्रयत्न साध्य होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 पृष्ठ 31

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1975/January/v1.31


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo



बुधवार, 26 अक्टूबर 2022

👉 ईमानदारी का व्यवहार

ईमानदार जीवन हजार मनकों में अलग चमकता हीरा होता है। ईमानदारी यश, धन, समृद्धि का आधार होती है। इसके बावजूद लोग कहते सुने जाते हैं कि व्यापार में बेईमानी बिना काम नहीं चलता, ईमानदारी से रहने में गुजारा नहीं हो सकता, वास्तव में यह गलत है।
  
वस्तुत: जो समझते हैं कि हमने बेईमानी से पैसा कमाया है। वे गलत समझते हैं, असल में उन्होंने ईमानदारी की ओट लेकर ही अनुचित लाभ उठाया होता है। कोई व्यक्ति साफ-साफ यह घोषणा कर दे कि ‘मैं बेईमान हूँ और धोखेबाजी का कारोबार करता हूँ,’ तब फिर अपने व्यापार में लाभ करके दिखावे तो यह समझा जा सकता है कि हाँ, बेईमानी की आड़ लेना कोई लाभदायक नीति है। जिस दिन उसका पर्दाफाश हो जाएगा कि भलमनसाहत की आड़ में बदमाशी हो रही है उस दिन ‘कालनेमी माया’ का अंत ही समझिये।
  
आप धोखेबाज मत बनिए, ओछे मत बनिये, गलत मत बनिए अपने लिए प्रतिष्ठा की भावनाएँ फैलने दीजिए। यह सब होना ईमानदारी पर निर्भर है। छोटा काम, कम पूँजी का, कम लाभ का, अधिक परिश्रम का इत्यादि जो भी काम आपके हाथ में है, उसी में अपना गौरव प्रकट होने दीजिए। यदि आप दुकानदार हैं, तो पूरा तौलिए, नियत कीमत रखिए, जो चीजें जैसी है, उसे वैसी ही कह कर बेचिए। इन तीन नियमों पर अपने काम को अवलम्बित कर दीजिए। मत डरिए कि ऐसा करने से हानि होगी। कम तोलकर या कीमत ठहराने में अपना और ग्राहक का बहुत सा समय बर्बाद करके जो लाभ कमाया जाता है, असल में वह हानि के बराबर है।

दुकानदार के प्रति ग्राहक के मन में सन्देह उत्पन्न हुआ, तो समझ लीजिए कि उसके दुबारा आने की तीन चौथाई आशा चली गयी। इसी प्रकार मोलभाव करने में यदि बहुत मगज पच्ची की गयी है, पहिली बार माँगे गये दामों को घटाया गया है, तो उस समय भले ही वह ग्राहक पट जाय पर मन में यही धकपक करता रहेगा कि कहीं इसमें भी अधिक दाम तो नहीं चले गये हैं। ऐसे संकल्प-विकल्प शंका-संदेह लेकर जो ग्राहक गया है, उसके दुबारा आने की आशा कौन कर सकता है? जिस दुकानदार के स्थायी और विश्वासी ग्राहक नहीं भला उसका काम कितने दिन चल सकता है?
  
कुछ बताकर कुछ चीज देना एक गलत बात है, जिससे सारी प्रतिष्ठा धूलि में मिल जाती है। दूध में पानी, घी में वेजीटेबिल, अनाज में कंकड, आटे में मिट्टी मिलाकर देना, आज कल खूब चला है। असली कहकर नकली और खराब चीजें बेची जाती हैं। खाद्य पदार्थों और औषधियों तक की प्रामाणिकता नष्ट हो गयी है। मनमाने दाम वसूल करना और नकली चीजें देना यह बहुत बड़ी धोखाधड़ी है। यदि यह प्रामाणित किया जा सके कि वस्तु असली है, तो ग्राहक उसको कुछ अधिक पैसे देकर भी खरीद सकता है। सदियों का पराधीनता ने हमारे चरित्र बल को नष्ट कर डाला है। तदनुसार हमारे कारोबार झूठे,नकल, दगाफरेव से भरे हुए होने लगे हैं। गलत बात से न तो बड़े पैमाने पर लाभ ही उठाया जा सकता और न प्रतिष्ठा ही प्राप्त की जा सकती है। व्यापार में धोखेबाजी की नीति बहुत ही बुरी नीति है। इस क्षेत्र में कायरों और गलत स्वभाव के लोगों के घुस पडऩे के कारण भारतीय उद्योग धन्धे, व्यापार नष्ट हो गये।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 कर भला हो भला

अच्छा काम करने पर स्वर्ग आदि का फल मिलने की बात कहीं जाती है यह कहाँ तक सच है। यह तो प्राणियों को श्रेय मार्ग पर ले जाने के लिए कहीं जाती है। जैसे बच्चों को दवा पिलाने के लिए कह देते हैं बेटा! प्रेम से पीलो तो तुम्हें खिलौने मिलेंगे। बच्चा आराम का महत्त्व नहीं समझता, खिलौनों का महत्त्व समझता है, उस बहाने से अपने हित का काम स्वीकार कर लेता है।

सामान्य मनुष्य भी श्रेष्ठ जीवन क्रम के लाभ नहीं समझता - उसे विषयों के सुख मालूम होते हैं। स्वर्ग में विषय सुख मिलने की बात से अपने लाभ का अन्दाज लग जाता है और वह उस मार्ग पर चल पड़ता है। ऐसा कहना झूठ भी नहीं है - क्योंकि जो कहा जाता है उससे अधिक ही लाभ उस मार्ग पर चलने वाले को प्राप्त होता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 संस्कृति- संजीवनी श्रीमदभागवत एवं गीता - वांग्मय 31 पृष्ठ 5.18

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

👉 सज्जनता का सौन्दर्य

चेहरे के सौन्दर्य को देखकर अनेक लोग प्रभावित होते हैं। पर नम्रता भी सौन्दर्य से किसी प्रकार कम आकर्षक और प्रभावोत्पादक नहीं है। नम्रता और सज्जनता के गुण जिसमें हैं, जो सदा मुस्कराता रहता है वह जहाँ कहीं जायेगा अपने लिए स्थान बना लेगा। इस चिन्ता और परेशानी से भरी हुई दुनियाँ में ऐसे लोगों की हर जगह माँग है जो अपने उत्तम स्वभाव के कारण दूसरों की व्यथा में थोड़ी कमी कर सकें, उन्हें अपनी प्रसन्नता और सज्जनता से कुछ मानसिक शान्ति प्रदान कर सकें।

कुरूपता कोई दोष नहीं है। नम्र और हँसमुख रहने से कुरूपता का दोष दूर किया जा सकता है। घमंडी चिड़चिड़ा स्वार्थी और कटुवादी कोई स्त्री या पुरुष चाहे कितना ही सुन्दर क्यों न हो कुछ ही देर में घृणास्पद बन जायेगा-चाहे वह कितना ही सुन्दर क्यों न दिखता हो। इसके विपरीत कुरूप व्यक्ति में भी यदि सौजन्य की समुचित मात्रा मौजूद है तो वह अपने लिए आदर और बड़प्पन प्राप्त करके रहेगा। कहते हैं कि द्रौपदी स्याह काली थी। इसी से उसे ‘कृष्ण’ भी कहते थे जिसका अर्थ है-कलूटी फिर भी उसके गुणों पर मुग्ध होकर पाण्डव उसका भारी आदर करते थे और राजमहल की बहुत सी व्यवस्था वही संभालती थी।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आत्मोपदेश सरल है

दूसरों को उपदेश देने के लिए बहुत ज्ञान की, विद्या की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु आत्मोपदेश के लिए थोड़े से ज्ञान से भी काम चल सकता है। दूसरों के मारने के लिए तीर तलवारों को जमा करने और उनका चलाना सीखने की आवश्यकता होती है, पर आत्महत्या के लिए एक छोटी सी रस्सी से गले में फाँसी लग सकती है जरा से चाकू से नस काटकर प्राण गँवाया जा सकता है। आत्म-कल्याण का मार्ग इतना सीधा और सरल है कि उस पर चलने के लिए साधारण बुद्धि भी पर्याप्त है। यहाँ तक कि अशिक्षित व्यक्ति भी उस पर उसी तरह चल सकते हैं जैसे राजकीय सड़क पर हर कोई बिना किसी योग्यता या प्रमाण-पत्र के भी प्रसन्नता पूर्वक चल सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

👉 मानसिक विकास का अटल नियम

जिस प्रकार के विचार हम नित्य किया करते हैं, उन्हीं विचारों के अणुओं का मस्तिष्क में संग्रह होता रहता है। मस्तिष्क का उपयोग उचित और सत्कार्यों में करने से, उसे आलसी निकम्मा न छोड़ने से, मानसिक शक्ति का विकास होता है।

मस्तिष्क को उत्तम या निकृष्ट बनाना तुम्हारे हाथ में ही है। सोचो, विचारो तथा मनन करो। क्रोध करने से क्रोध वाले अणुओं की संख्या में वृद्धि होती है। चिंता, शोक, भय व खेद करने से इन्हीं कुविचारों के अणुओं का तुम पोषण करते हो और मस्तिष्क को निर्बल बनाते हो। भूतकाल की दुर्घटनाओं या दु:खद प्रसंग को स्मरण कर, खेद या शोक के वशीभूत होकर मस्तिष्क को निर्बल मत बनाओ। शरीर में बल होते हुए भी उसका उपयोग न करने से बल क्षीण होता है।

इसी प्रकार बिना विचार के मस्तिष्क भी क्षीण होता है। नवीन विचारों का मन में स्वागत करने से मस्तिष्क का मानस-व्यापार व्यापक होता है तथा मन प्रफुल्लित हो जाता है, जीवन व बल की वृद्धि होती है, मन व बुद्धि तेजस्वी बनते हैं। जो विचार हमारे मस्तिष्क में हैं, वे ही हमारे जीवन को बनाने वाले हैं। जिस कला के विचार तथा अभ्यास करोगे, उसी में निपुणता मिलेगी। मस्तिष्क के जिस भाग का उपयोग करोगे, उसी की शक्तियों का विकास होगा।

📖 अखण्ड ज्योति-जुलाई 1946 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/July/v1.10

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 जीने योग्य जीवन जियो

धिक्कार है उस जिंदगी पर, जो मक्खियों की तरह पापों की विष्ठा के ऊपर भिनभिनाने में और कुत्ते की तरह विषय भोगों की जूठन चाटने में व्यतीत होती है। उस बड़प्पन पर धिक्कार है, जो खुद खजूर की तरह बढ़ते हैं, पर उनकी छाया में एक प्राणी भी आश्रय नहीं पा सकता। सर्प की तरह धन के खजाने पर बैठकर चौकीदारी करने वाले लालची किस प्रकार सराहनीय कहे जा सकते हैं?

जिनका जीवन तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने की उधेड़बुन में निकल गया, हाय! वे कितने अभागे हैं। सुरदुर्लभ देह रूपी बहुमूल्य रत्न, इन दुर्बुद्धियों ने काँच और कंकड़ के टुकड़ों के बदले बेच दिया। किस मुख से वे कहेंगे कि हमने जीवन का सद्व्यय किया। इन कुबुद्धियों को तो अंत में पश्चाताप ही प्राप्त होगा। एक दिन उन्हें अपनी भूल प्रतीत होगी, पर उस समय अवसर हाथ से चला गया होगा और सिर धुन-धुन कर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा।

मनुष्यों! जियो और जीने योग्य जीवन जियो। ऐसी जिंदगी बनाओ जिसे आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। विश्व में अपने ऐसे पदचिह्न जोड़ जाओ, जिन्हें देखकर आगामी संतति अपना मार्ग ढूँढ़ सके। आप का जीवन सत्य से, प्रेम से, न्याय से, भरा हुआ होना चाहिए। दया, सहानुभूति, आत्मनिष्ठा, संयम, दृढ़ता, उदारता, आप के जीवन के अंग होने चाहिए। हमारा जीवन मनुष्यता के महान् गौरव के अनुरूप ही होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1946 पृष्ठ 1


All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Twitter

Official Instagram

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...