शुक्रवार, 19 जून 2020

👉 मूर्ख कौन?

किसी गांव में एक सेठ रहता था. उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था. सेठ की बहू एक दिन कुएँ पर पानी भरने गई. घड़ा जब भर गया तो उसे उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी. तभी कहीं से चार राहगीर वहाँ आ पहुँचे. एक राहगीर बोला, "बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ. क्या मुझे पानी पिला दोगी?"

सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई, क्योंकि वह उस समय कम कपड़े पहने हुए थी. उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला देती. इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा.

बहू ने उससे पूछा, "आप कौन हैं?"
राहगीर ने कहा, "मैं एक यात्री हूँ"
बहू बोली, "यात्री तो संसार में केवल दो ही होते हैं, आप उन दोनों में से कौन हैं? अगर आपने मेरे इस सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी. नहीं तो मैं पानी नहीं पिलाऊंगी."
बेचारा राहगीर उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाया.

तभी दूसरे राहगीर ने पानी पिलाने की विनती की.
बहू ने दूसरे राहगीर से पूछा, "अच्छा तो आप बताइए कि आप कौन हैं?"
दूसरा राहगीर तुरंत बोल उठा, "मैं तो एक गरीब आदमी हूँ."
सेठ की बहू बोली, "भइया, गरीब तो केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?"
प्रश्न सुनकर दूसरा राहगीर चकरा गया. उसको कोई जवाब नहीं सूझा तो वह चुपचाप हट गया.

तीसरा राहगीर बोला, "बहन, मुझे बहुत प्यास लगी है. ईश्वर के लिए तुम मुझे पानी पिला दो"
बहू ने पूछा, "अब आप कौन हैं?"
तीसरा राहगीर बोला, "बहन, मैं तो एक अनपढ़ गंवार हूँ."
यह सुनकर बहू बोली, "अरे भई, अनपढ़ गंवार तो इस संसार में बस दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?'
बेचारा तीसरा राहगीर भी कुछ बोल नहीं पाया.

अंत में चौथा राहगीह आगे आया और बोला, "बहन, मेहरबानी करके मुझे पानी पिला दें. प्यासे को पानी पिलाना तो बड़े पुण्य का काम होता है."
सेठ की बहू बड़ी ही चतुर और होशियार थी, उसने चौथे राहगीर से पूछा, "आप कौन हैं?"
वह राहगीर अपनी खीज छिपाते हुए बोला, "मैं तो..बहन बड़ा ही मूर्ख हूँ."
बहू ने कहा, "मूर्ख तो संसार में केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?"
वह बेचारा भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका. चारों पानी पिए बगैर ही वहाँ से जाने लगे तो बहू बोली, "यहाँ से थोड़ी ही दूर पर मेरा घर है. आप लोग कृपया वहीं चलिए. मैं आप लोगों को पानी पिला दूंगी"

चारों राहगीर उसके घर की तरफ चल पड़े. बहू ने इसी बीच पानी का घड़ा उठाया और छोटे रास्ते से अपने घर पहुँच गई. उसने घड़ा रख दिया और अपने कपड़े ठीक तरह से पहन लिए.

इतने में वे चारों राहगीर उसके घर पहुँच गए. बहू ने उन सभी को गुड़ दिया और पानी पिलाया. पानी पीने के बाद वे राहगीर अपनी राह पर चल पड़े. सेठ उस समय घर में एक तरफ बैठा यह सब देख रहा था. उसे बड़ा दुःख हुआ. वह सोचने लगा, इसका पति तो व्यापार करने के लिए परदेस गया है, और यह उसकी गैर हाजिरी में पराए मर्दों को घर बुलाती है. उनके साथ हँसती बोलती है. इसे तो मेरा भी लिहाज नहीं है. यह सब देख अगर मैं चुप रह गया तो आगे से इसकी हिम्मत और बढ़ जाएगी. मेरे सामने इसे किसी से बोलते बतियाते शर्म नहीं आती तो मेरे पीछे न जाने क्या-क्या करती होगी. फिर एक बात यह भी है कि बीमारी कोई अपने आप ठीक नहीं होती. उसके लिए वैद्य के पास जाना पड़ता है. क्यों न इसका फैसला राजा पर ही छोड़ दूं. यही सोचता वह सीधा राजा के पास जा पहुँचा और अपनी परेशानी बताई. सेठ की सारी बातें सुनकर राजा ने उसी वक्त बहू को बुलाने के लिए सिपाही बुलवा भेजे और उनसे कहा, "तुरंत सेठ की बहू को राज सभा में उपस्थित किया जाए."

राजा के सिपाहियों को अपने घर पर आया देख उस सेठ की पत्नी ने अपनी बहू से पूछा, "क्या बात है बहू रानी? क्या तुम्हारी किसी से कहा-सुनी हो गई थी जो उसकी शिकायत पर राजा ने तुम्हें बुलाने के लिए सिपाही भेज दिए?"

बहू ने सास की चिंता को दूर करते हुए कहा, "नहीं सासू मां, मेरी किसी से कोई कहा-सुनी नहीं हुई है. आप जरा भी फिक्र न करें."

सास को आश्वस्त कर वह सिपाहियों से बोली, "तुम पहले अपने राजा से यह पूछकर आओ कि उन्होंने मुझे किस रूप में बुलाया है. बहन, बेटी या फिर बहू के रुप में? किस रूप में में उनकी राजसभा में मैं आऊँ?"

बहू की बात सुन सिपाही वापस चले गए. उन्होंने राजा को सारी बातें बताई. राजा ने तुरंत आदेश दिया कि पालकी लेकर जाओ और कहना कि उसे बहू के रूप में बुलाया गया है.

सिपाहियों ने राजा की आज्ञा के अनुसार जाकर सेठ की बहू से कहा, "राजा ने आपको बहू के रूप में आने के ले पालकी भेजी है." बहू उसी समय पालकी में बैठकर राज सभा में जा पहुँची. राजा ने बहू से पूछा, "तुम दूसरे पुरूषों को घर क्यों बुला लाईं, जबकि तुम्हारा पति घर पर नहीं है?"

बहू बोली, "महाराज, मैंने तो केवल कर्तव्य का पालन किया. प्यासे पथिकों को पानी पिलाना कोई अपराध नहीं है. यह हर गृहिणी का कर्तव्य है. जब मैं कुएँ पर पानी भरने गई थी, तब तन पर मेरे कपड़े अजनबियों के सम्मुख उपस्थित होने के अनुरूप नहीं थे. इसी कारण उन राहगीरों को कुएँ पर पानी नहीं पिलाया. उन्हें बड़ी प्यास लगी थी और मैं उन्हें पानी पिलाना चाहती थी. इसीलिए उनसे मैंने मुश्किल प्रश्न पूछे और जब वे उनका उत्तर नहीं दे पाए तो उन्हें घर बुला लाई. घर पहुँचकर ही उन्हें पानी पिलाना उचित था."
राजा को बहू की बात ठीक लगी. राजा को उन प्रश्नों के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता हुई जो बहू ने चारों राहगीरों से पूछे थे.

राजा ने सेठ की बहू से कहा, "भला मैं भी तो सुनूं कि वे कौन से प्रश्न थे जिनका उत्तर वे लोग नहीं दे पाए?"

बहू ने तब वे सभी प्रश्न दुहरा दिए. बहू के प्रश्न सुन राजा और सभासद चकित रह गए. फिर राजा ने उससे कहा, "तुम खुद ही इन प्रश्नों के उत्तर दो. हम अब तुमसे यह जानना चाहते हैं."

बहू बोली, "महाराज, मेरी दृष्टि में पहले प्रश्न का उत्तर है कि संसार में सिर्फ दो ही यात्री हैं–सूर्य और चंद्रमा. मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि बहू और गाय इस पृथ्वी पर ऐसे दो प्राणी हैं जो गरीब हैं. अब मैं तीसरे प्रश्न का उत्तर सुनाती हूं. महाराज, हर इंसान के साथ हमेशा अनपढ़ गंवारों की तरह जो हमेशा चलते रहते हैं वे हैं–भोजन और पानी. चौथे आदमी ने कहा था कि वह मूर्ख है, और जब मैंने उससे पूछा कि मूर्ख तो दो ही होते हैं, तुम उनमें से कौन से मूर्ख हो तो वह उत्तर नहीं दे पाया." इतना कहकर वह चुप हो गई.

राजा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, "क्या तुम्हारी नजर में इस संसार में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं?"
"हाँ, महाराज, इस घड़ी, इस समय मेरी नजर में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं."
राजा ने कहा, "तुरंत बतलाओ कि वे दो मूर्ख कौन हैं."
इस पर बहू बोली, "महाराज, मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं इसका उत्तर दूं."

राजा को बड़ी उत्सुकता थी यह जानने की कि वे दो मूर्ख कौन हैं. सो, उसने तुरंत बहू से कह दिया, "तुम निःसंकोच होकर कहो. हम वचन देते हैं तुम्हें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी."
बहू बोली, "महाराज, मेरे सामने इस वक्त बस दो ही मूर्ख हैं." फिर अपने ससुर की ओर हाथ जोड़कर कहने लगी, "पहले मूर्ख तो मेरे ससुर जी हैं जो पूरी बात जाने बिना ही अपनी बहू की शिकायत राजदरबार में की. अगर इन्हें शक हुआ ही था तो यह पहले मुझसे पूछ तो लेते, मैं खुद ही इन्हें सारी बातें बता देती. इस तरह घर-परिवार की बेइज्जती तो नहीं होती."

ससुर को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने बहू से माफ़ी मांगी. बहू चुप रही.
राजा ने तब पूछा, "और दूसरा मूर्ख कौन है?"
बहू ने कहा, "दूसरा मूर्ख खुद इस राज्य का राजा है जिसने अपनी बहू की मान-मर्यादा का जरा भी खयाल नहीं किया और सोचे-समझे बिना ही बहू को भरी राजसभा में बुलवा लिया."

बहू की बात सुनकर राजा पहले तो क्रोध से आग बबूला हो गया, परंतु तभी सारी बातें उसकी समझ में आ गईं. समझ में आने पर राजा ने बहू को उसकी समझदारी और चतुराई की सराहना करते हुए उसे ढेर सारे पुरस्कार देकर सम्मान सहित विदा किया.

👉 एकान्त सेवन करो

मनुष्य वास्तव में अकेला है। अकेला ही आया है और अकेला ही जायगा। इच्छा करके वह अकेला बहुत हो जाता है। एकोऽहं बहुस्याम। एकान्त मय इसका जीवन है। जीवन में जो सुख दुख प्राप्त होते हैं वह अकेले को ही होते हैं कोई दूसरा उसमें भागीदार नहीं होता। जिस समय हम रोगी होते हैं किसी पीड़ा से व्यथित होते हैं क्या उस समय का कष्ट कोई बाँट लेता है? कोई प्रेमी बिछुड़ गया है, किसी के द्वारा सताये जा रहे हैं, अपनी वस्तुऐं नष्ट हो गई हैं, परिस्थितियों में उलझ गये हैं उस समय जो घोर मानसिक वेदना होती है उसका अनुभव अपने को ही करना पड़ता है दूसरे लोगों की सहानुभूति और कभी २ सहायता भी मिल जाती है पर वह बाह्य उपचार मात्र है। किसी भौतिक अभाव का कष्ट हुआ और बाहर की मदद मिल गई तब तो दूसरी बात है अन्यथा उन दैवी विपत्तियों में जिनमें मनुष्य का कुछ वश नहीं चलता, मनुष्य को एकांत कष्ट ही भोगना पड़ता है। सुख भी एकान्त ही मिलता है। मैं मिठाई खा रहा हूँ, मैं ऐश्वर्य भोग रहा हूं, मैं सम्पत्तिशाली हूँ, इसमें तुम्हारी क्या  समझ? मैं विद्वान हूँ इसका फल तुम्हें किस प्रकार मिल सकता है? परस्पर सहयोग और दान, त्याग दूसरी बात है। इससे धर्म के अनुसार किसी को भिक्षा दी जा सकती है किन्तु वास्तविक सुख उसी को होता है जिसके पास साधन एकत्रित हैं।

मनुष्य का सारा धर्म कर्म एकान्त मय है। उसे अपनी परिस्थितियों पर स्वयं विचार करना पड़ता है अपने लाभ हानि का निर्णय स्वयं करना पड़ता है अपने उत्थान पतन के साधन स्वयं उपलब्ध करने पड़ते हैं। इस संघर्षमय दुनिया में जो अपने पाँवों पर खड़ा होकर अपने बलबूते पर चलता है वह कुछ चल लेता है बढ़ जाता है और अपना स्थान प्राप्त करता है। किन्तु जो दूसरों के कन्धे पर अवलंबित है, दूसरों की सहायता पर आश्रित है, वह भिक्षुक की तरह कुछ प्राप्त करलें तो सही अन्यथा निर्जीव पुतले या बुद्धि रहित कीड़े मकोड़ों की तरह ज्यों त्यों करके अपनी सांसें पूरी करते हैं, मनुष्य के वास्तविक सुख- दुःख, हानि- लाभ, उन्नति पतन, बन्ध, मोक्ष का जहां तक संबंध है वह सब एकान्त के साथ जुड़ा हुआ है। खेलने की वस्तुओं के साथ मोह बन्धन में बंधकर वह खुद खिलौना बन गया है। वस्त्रों और औजारों पर मोहित होकर उसने अपने की वही समझ लिया है परन्तु वास्तव में वह ऐसा है नहीं।

रुपया, पैसा, जायदाद, स्त्री, कुटुंब आदि हमें अपने दिखाई देते हें पर वास्तव में हैं नहीं। यह सब चीजें शरीर की सुख सामग्री हैं, शरीर छूटते ही इनसे सारा संबंध क्षण मात्र में छूट जाता है फिर कोई किसी का नहीं रहता। हर एक वस्तु का अपना स्थान है और अपने कार्यक्रम के अनुसार व्यावहारित होती रहती है। वह न तो किसी को ग्रहण करती है और न किसी को छोड़ती है। भ्रमवश मनुष्य अपना मान कर उनमें तन्मय होता है। धातुओं के टुकड़े किसी आदमी के पेट में नही धँस सकते और न शरीर में चिपट सकते हैं। वे एक के हाथ में से दूसरे के हाथ में घूमते हैं और अन्त में घिस गल कर इसी भूमि में मिल जाते हैं जिससे उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार ईट, पत्थर लोहा, लकड़ी, पशु, कुटुंबी, मित्र आदि की बात है। सब अपनी निश्चित धुरी पर घूम रहे हैं, अपने कार्यक्रमों को पूरा कर रहे हैं। उनके जीवन का कुछ भाग हमारे जीवन के साथ संबंधित हो जाता है तो हम समझते हैं कि वे हमारे और हम उनके हो गये पर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य की धूप और चन्द्रमा की चाँदनी में बैठकर उन्हें हम अपना बताते हैं। चार खेतों को जोत कर किसान उन पर अपना आधिपत्य जमाता है। दार्शनिक विज्ञानी इन मूर्खों से कहता है। बच्चो तुम भूल रहे हो यह संपूर्ण वस्तुएँ एक महान लाभ पर अवलंबित हैं और अपना जीवन क्रम पूरा कर रही है। तुमसे उनका केवल उतना ही संबंध है जितना कि उनसे संबंध रखते हो। असल में वे सब स्वतंत्र हैं। और तुम स्वतंत्र। हर चीज अकेली है

इसलिये ‘‘तूम भी अकेले, बिल्कुल अकेले हो।’’

पाठक विश्वास करें, कुछ भ्रम हो तो उसे उठा दें, इन पंक्तियों में मैं उन सब तर्कों का समाधान नहीं कर सकता। परन्तु मैं विश्वास दिलाता हूँ कि तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूं। तुम अकेले हो, बिल्कुल अकेले। न तो कोई तुम्हारा है और न तुम किसी के। हाँ, लौकिक धर्म के अनुसार सांसारिक और कर्तव्य कर्म हैं जो तुम्हें शरीर रखने पर पालने पड़ेंगे उनसे छुटकारा नहीं हो सकता। कर्म किये बिना शरीर नहीं रह सकता यह उसका धर्म है। परन्तु है, इके के घोड़े! वह सब वस्तुऐं तेरी नहीं है, जिन्हें तू सारे दिन ढोता है तू अकेला है। वे सवारियां तेरी कोई नहीं हैं जिन्हें अपने ऊपर बिठाकर तू सरपट तेजी से दौड़ रहा था।

उपरोक्त पंक्तियों से कोई भ्रम में पड़े। संन्यास या निवृत्त का वह पाठ हम किसी को नहीं पढ़ा रहे हैं जिसके अनुसार लोग कपड़े फाड़कर भिखारी बन जाते हैं और कायरों की भाँति लड़ाई से डरकर जंगलों में अपनी जान बचाना चाहते हैं। कर्म योग किसी से कम नहीं है। हम अपने कर्तव्यों का ठीक तरह से पालन करते हुए पक्के संन्यासी बने रहे सकते हैं। यहाँ तो हमारा अभिप्राय यह है कि तुम अपनी वास्तविक स्थिति का अनुभव करते रहो। यदि इसे पकड़े रहोगे तो तुम इतने नहीं पाओगे और एक दिन सही रास्ते पर जा पहुंचोगे।

अपने साधकों को हमारी शिक्षा है कि वे नित्य कुछ दिन एकान्त सेवन करें। इसके लिये यह जरूरी नहीं है कि वे किसी जंगल, नदी या पर्वत पर ही जावें। अपने आसपास ही कोई प्रशान्त स्थित चुन लो। कुछ भी सुविधा न हो तो अपने कमरे के सब किवाड़ बन्द करे अकेले बैठो। यह भी न हो सके तो सारे गुल से रहित स्थान में बैठकर आँखें बन्द करली या चारपाई पर लेटकर हलके कपड़े से अपने को ढकलो। और शान्त चित होकर मन ही मन जप करो—मैं अकेला हूँ‘—मैं अकेला हूँ। अपने मन को यह अच्छी तरह अनुभव करने दो कि मैं एक स्वतंत्र, बन्धु और अविनाशी सत्ता हूँ। मेरा कोई नहीं और न में किसी का हूं। आधे घण्टे तक अपना सारा ध्यान इसी क्रिया पर एकत्रित करो। अपने को बिलकुल अकेला अनुभव करो। अभ्यास के कुछ दिनों बाद एकान्त में ऐसी भावना करो ।। ‘मैं मर गया हूँ।’ मेरा शरीर और दूसरी संपूर्ण वस्तुऐं मुझसे दूर पड़ी हुई हैं।

उपरोक्त छोटे से साधन को हमारे प्राणप्रिय अनुयायी आज से ही आरंभ करें। वे यह न पूछे कि इससे क्या लाभ होगा? मैं आज बता भी नहीं रहा हूँ कि इससे किस प्रकार क्या हो जायगा। किन्तु शपथ पूर्वक कहता हूँ कि जो सच्चे आत्मज्ञान की ओर बढ़ जायगा, सांसारिक चोर, पाप, दुष्ट दुष्कर्म, बुरी आदतें, नीच वासनायें, और नरक की ओर घसीट ले जाने वाली कुटिलताओं से उसे छुटकारा मिल जायगा। हम पापमयी पूतनाओं को छोडऩे के लिए साधक अनेक प्रयत्न करते हैं पर वे छाया की भांति पीछे पीछे दौड़ती रहती है पीछा नहीं छोड़तीं। यह साधन उस झूठे ममत्व को ही छुड़ा देगा जिसकी सहचरी में पाप वृत्तियाँ होती हैं।

अपने को अकेला अनुभव करो। नित्य अभ्यास करो। शरीर को निच्चेष्ट पड़ा रहने दो। मन को पूरी योग्यता, तर्क, बुद्धि के साथ यह समझा दो कि मैं अकेला हूँ। केवल बुद्धिमान सोच लेना ही पर्याप्त न होगा किन्तु यह भावना गहरी  गहरी  गहरी  मन के ऊपर अंकित हो जानी चाहिये। अभ्यास इतना बढ जाना चाहिए कि जब अपने बारे में सोचो, तो सोचो कि ‘मैं अकेला हूँ।’ हर घड़ी अपने को संसार की समस्त वस्तुओं से—कमल पत्र ऊपर उठा हुआ समझो।
मैं कहता हूँ कि यह साधन तुम्हें मनुष्य से देवता बना देने में पूरी तरह समर्थ है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति  जून 1940 Page 2

👉 Seed of Accomplished Life Lies in a Kind Heart

The one, whose thinking and emotional core is dry, hard and devoid of love and compassion, will remain deprived of the real joy of life, despite possessing materialistic success and resources of pleasure. Such people waste and defame (kalank) the dignity of human life.

The roots of unalloyed joy lie in the warmth and generosity of heart. God is referred as the absolute source of infinite bliss? Why? Because, as a Vedic hymn conveys – “raso vaisah”: God is eternally unified with pure love pervaded every where, for all. It is said that HE could be realized by selfless love, devotion. God is the ultimate symbol of sainthood, a sublime reflection of – magnanimous love, limitless mercy and motherly care for the poor, helpless and downtrodden brings.

HE is the omnipresent guardian (savior) of the sincere devotees. If you are HIS devotee, your heart should also pulsate with saintly sentiments. Sensitivity, purity and generosity are gracious source of finding God.

Cultivate an attitude and temperament of sensitivity, caring and respecting others, seeing the good that indwells in every thing of the world. Then everything will appear loving to you; you will find a nectar source of pure joy everywhere. This is what amounts to attainment of the essence, the preeminence, the divine feeling of human life.

📖 Akhand Jyoti, June. 1944

👉 आत्म-निर्माण का पुण्य-पथ (भाग २)

सत्संग का अर्थ है सम्भ्रान्त, आदर्श चरित्र, तत्वदर्शी मनीषियों की संगति, सान्निध्य और शिक्षा का अवगाहन। ऐसे मनीषी आज बहुत ही कम हैं। जो हैं वे कार्य व्यस्त रहने के कारण व्यक्तिगत सत्संग के लिए समय नहीं दे पाते। ऐसी दशा में आत्म-निर्माण सम्बन्धी प्रवचनों की जहां व्यवस्था हो वहां पहुंचा जा सकता है। महापुरुषों के ग्रन्थ भी सत्संग का काम दे सकते हैं। वे मनीषी भले ही हमसे दूर हों या स्वर्गवासी हो चुके हों तो भी उनके विचार उनके लिखे ग्रन्थों में सदा प्रस्तुत मिलेंगे और वे हमें सत्संग का लाभ देते रहेंगे। आज सत्संग के नाम पर निराशावादी, भाग्यवादी, पलायनवादी, अतिवादी विचारधारा देने वाले साधु, बाबाजी बहुत हैं, इन विचारों से भ्रम जंजाल ही बढ़ता है, और उसके प्रभाव से व्यक्ति एक प्रकार से निकम्मा ही बन जाता है। इसलिए ऐसे सत्संग को कुसंग मानकर उससे बचते रहना ही उचित है।

चिन्तन और मनन बिना, पुस्तक बिना साथी का स्वाध्याय सत्संग ही है। अपने आप अपनी स्थिति पर, अपनी त्रुटियों और दुर्बलताओं पर विचार करके, बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को बढ़ाने के लिये अकेले में सोच विचार करना चिन्तन है और उत्थान पथ पर अग्रसर करने वाली सत् शिक्षा के महत्व एवं महात्म्य पर विस्तार पूर्वक सोचना एवं उसी ढांचे में अपने को ढालने की योजना बनाना मनन है। चिन्तन और मनन करते रहने वाला व्यक्ति अपनी बौद्धिक, चरित्र एवं लौकिक दुर्बलताओं को आत्म निरीक्षण एवं आत्म आलोचना के आधार पर भली प्रकार जान सकता है और जिस प्रकार रोग का निदान होने पर चिकित्सा सरल हो जाती है उसी प्रकार अपनी त्रुटियों को जानने वाला उन्हें सुधारने का उपाय भी ढूंढ़ ही निकालता है।

रात्रि को सोते समय दिन भर के भले बुरे विचारों और कार्यों का लेखा जोखा लेना चाहिये। जीवन की वास्तविक सम्पत्ति समय ही है। नियमित कार्यक्रम बनाकर अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करने की कला जिसे आ गई उसने सफलता का रहस्य समझ लिया। रात को सोते समय दिन भर के विचारों और कार्यों की भलाई बुराई का विश्लेषण करके यह देखना कि आज दिन का कितना सदुपयोग, अपव्यय एवं दुरुपयोग हुआ। इसी प्रकार प्रातःकाल उठते समय दिन भर का कार्यक्रम बनाना तथा पिछले दिन की बात को स्मरण रखते हुये जीवन के अपव्यय एवं दुर्व्यय को बचाकर अधिकाधिक सदुपयोग की योजना बनाई जाय। नित्य डायरी रखकर भी इस प्रकार आत्म निरीक्षण एवं आत्म निर्माण का आयोजन करते रहा जा सकता है। जो दुर्गुण अपने में हों उन्हें दिन में कई बार ध्यान करके उनकी पुनरावृत्ति न होने देना एक उत्तम अभ्यास है। जिन सद्गुणों को और भी विकसित करना है उनका भी दिन में कई बार स्मरण किया जाना चाहिए और उनको बढ़ाने के लिए जो भी अवसर प्राप्त होते रहे उन्हें हाथ से न जाने देना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961 पृष्ठ 9

गुरुवार, 18 जून 2020

👉 नालायक

देर रात अचानक ही उनकी तबियत बिगड़ गयी। आहट पाते ही नालायक उनके सामने था। माँ ड्राईवर बुलाने की बात हुई, पर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा?? यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे बाऊजी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा।

बाउजी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे "धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए।"

नालायक बोला
"आप ज्यादा बातें ना करें बाउजी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।" अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंप,वो बाहर चहलकदमी करने लगा, बचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था। उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं।

तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे की नालायक फिर से फेल हो गया। नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे। कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा।

शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी। हाँ बस एक माँ ही हैं जिसने उसके असल नाम को अब तक जीवित रखा है, पर आज अगर उसके बाउजी को कुछ हो गया तो शायद वे भी..

इस ख़याल के आते ही उसकी आँखे छलक गयी और वो उनके लिये हॉस्पिटल में बने एक मंदिर में प्रार्थना में डूब गया। प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूली, डाक्टरों ने सुबह सुबह ही बाऊजी को घर जाने की अनुमति दे दी।

घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये बाऊजी एक बार फिर चीखें, "छोड़ नालायक ! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं।"

उदास वो उस कमरे से निकला, तो माँ से अब रहा नहीं गया, "इतना सब तो करता है, बावजूद इसके आपके लिये वो नालायक ही है ???

विवेक और विशाल दोनो अभी तक सोये हुए हैं उन्हें तो अंदाजा तक नही हैं की रात को क्या हुआ होगा .....बहुओं ने भी शायद उन्हें बताना उचित नही समझा होगा ।

यह बिना आवाज दिये आ गया और किसी को भी परेशान नही किया भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो ?????

और आप हैं की ????

उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नही छोड़ते।

कहते कहते माँ रोने लगी थी

इस बार बाऊजी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची करली माँ रोते रोते बोल रही थी अरे, क्या कमी है हमारे बेटे में ?????

हाँ मानती हूँ पढाई में थोङा कमजोर था ....
तो क्या ????
क्या सभी होशियार ही होते हैं ??

वो अपना परिवार, हम दोनों को, घर-मकान, पुश्तैनी कारोबार, रिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है जबकि बाकी दोनों जिन्हें आप लायक समझते हैं वो बेटे सिर्फ अपने बीबी और बच्चों के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपने ससुराल का ध्यान रखते हैं ।

कभी पुछा आपसे की आपकी तबियत कैसी हैं ??????

और आप हैं की ....

बाऊजी बोले सरला तुम भी मेरी भावना नही समझ पाई ????

मेरे शब्द ही पकङे न ??

क्या तुझे भी यहीं लगता हैं की इतना सब के होने बाद भी इसे बेटा कह के नहीं बुला पाने का, गले से नहीं लगा पाने का दुःख तो मुझे नही हैं ?? क्या मेरा दिल पत्थर का हैं ??
हाँ सरला सच कहूँ दुःख तो मुझे भी होता ही है, पर उससे भी अधिक डर लगता है कि कहीं ये भी उनकी ही तरह लायक ना बन जाये।

इसलिए मैं इसे इसकी पूर्णताः का अहसास इसे अपने जीते जी तो कभी नही होने दूगाँ ....

माँ चौंक गई .....

ये क्या कह रहे हैं आप ???

हाँ सरला ...यहीं सच हैं

अब तुम चाहो तो इसे मेरा स्वार्थ ही कह लो। "कहते हुये उन्होंने रोते हुए नजरे नीची किये हुए अपने हाथ माँ की तरफ जोड़ दिये जिसे माँ ने झट से अपनी हथेलियों में भर लिया।

और कहा अरे ...अरे ये आप क्या कर रहे हैं
मुझे क्यो पाप का भागी बना रहे हैं ।
मेरी ही गलती हैं मैं आपको इतने वर्षों में भी पूरी तरह नही समझ पाई ......

और दूसरी ओर दरवाज़े पर वह नालायक खड़ा खङा यह सारी बातचीत सुन रहा था वो भी आंसुओं में तरबतर हो गया था।

उसके मन में आया की दौड़ कर अपने बाऊजी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके बाऊजी झेंप जाते, यह सोच कर वो अपने कमरे की ओर दौड़ गया।

कमरे तक पहुँचा भी नही था की बाऊजी की आवाज कानों में पङी..

अरे नालायक .....वो दवाईयाँ कहा रख दी
गाड़ी में ही छोड़ दी क्या ??????

कितना भी समझा दो इससे एक काम भी ठीक से नही होता ....

नालायक झट पट आँसू पौछते हुये गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर बाऊजी के कमरे की तरफ दौङ गया।

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (अंतिम भाग)

काम का अर्थ विनोद, उल्लास और आनन्द है। मैथुन को ही काम नहीं कहते। काम क्षेत्र की परिधि में वह भी एक बहुत ही छोटा और नगण्य सा माध्यम हो सकता है, पर वह कोई निरन्तर की वस्तु तो है नहीं। यदा- कदा ही उसकी उपयोगिता होती है। इसलिए मैथुन को एक कोने पर रखकर उपेक्षणीय मानकर भी काम लाभ किया जाता है। स्नेह, सद्भाव, विनोद, उल्लास की उच्च स्तरीय अभिव्यक्तियाँ जिस परिधि में आती हैं उसे आध्यात्मिक काम कह सकते हैं।
 
नर- नारी के बीच व्यापक सद्भाव सहयोग की, सम्पर्क की स्थिति में ही व्यक्ति और समाज का विकास सम्भव है। उससे हानि रत्ती भर भी नहीं। स्मरण रखा जाय पाप या व्यभिचार का सृजन सम्पर्क से नहीं दुर्बुद्धि से होता है। पुरुष डाक्टर नारी के प्रजनन अवयवों तक का आवश्यकतानुसार आपरेशन करते है। उसमें न पाप है, न अश्लील, न अनर्थ। रेलगाड़ी की भीड़ में नर- नारियों के शरीर चिपके रहते हैं। जहाँ पाप वृत्ति न हो वहाँ शरीर का स्पर्श दूषित कैसे होगा? हम अपनी युवा पुत्री के शिर और पीठ पर स्नेह का हाथ फिराते है तो पाप कहाँ लगता है। सान्निध्य पाप नहीं है। पाप तो एक अलग ही छूत की बीमारी है जो तस्वीरें देखकर भी चित्त को उद्विग्न कर सकने में समर्थ है। इलाज इस बीमारी का किया जाना चाहिए। हमारी कुत्सा का दण्ड बेचारी नारी को भुगतना पड़े, यह सरासर अन्याय है। इस अनीति को जब तक बरता जाता रहेगा, नारी की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी और इस पाप का फल व्यक्ति और समाज को असंख्य अभिशापों के रूप में बराबर भुगतना पड़ेगा।
 
भगवान वह शुभ दिन जल्दी ही लाये जब नर- नारी स्नेह सहयोग की तरह, मित्र और सखा की तरह एक दूसरे के पूरक बनकर सरल स्वाभाविक नागरिकता का आनन्द लेते हुए जीवनयापन कर सकने की मनःस्थिति प्राप्त कर लें। हम विकारों को रोके, सान्निध्य को नहीं। सान्निध्य रोककर विकारों पर नियन्त्रण पा सकना सम्भव नहीं है। इसलिए हमें उन स्रोतों को बन्द करना पड़ेगा, जो विकारों और व्यभिचार को भड़काने में उत्तरदायी हैं। अग्नि और सोम, प्राण और रयि, ऋण और धन विद्युत प्रवाहों का समन्वय इस सृष्टि के संचरण और उल्लास को अग्रगामी बनाता चला आ रहा है। नर- नारी का सौम्य सम्पर्क बढ़ाकर हमें खोना कुछ नहीं पाना अपार है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 A Simple Sadhana of Gyana Yoga

Good name and fame, power, prosperity, high qualification, talents, reputed status, are regarded as measures of achievements in worldly life. These are all fruits of the tree of knowledge. You can’t earn worldly success or excel without knowledge – be that in the form of awareness, information, education, skilled training, sane experience, or inner Light. Dissemination of knowledge for the enlightened welfare of others is the highest kind of donation. Feeding a needy with few meals would serve only temporary help; the lasting help would be to give him the light, show the path that will lead to his self-dependence and respectful future.

A disease might be treated by a medicine prescribed by a doctor. But one can’t survive on medicine or tonics all the time for vigorous health. If you want to sustain good health, you will have to have and use the knowledge of preventive care and maintaining stamina etc. Only the spark of knowledge could uproot avarice, desperation, tension, apprehension, sorrow, and other mental weaknesses and psychological complaints, which make our lives burdensome.

All the prosperity and might of the world together cannot control these 10 complexities; rather they tend to augment the vices and worries in the absence of proper knowledge. True knowledge alone is the key to peace and happiness in this life and the life beyond. This alone enables evolution of an ordinary mortal being into great personalities. There is no better alms, no better gift then knowledge.

📖 Akhand Jyoti, May. 1944

👉 आत्म-निर्माण का पुण्य-पथ (भाग १)

आज साधना का अर्थ केवल भजन-पूजन समझा जाता है और किसी देवी देवता से कुछ सिद्धि वरदान प्राप्त करना या परलोक में स्वर्ग मुक्ति का अधिकारी बनना उसका उद्देश्य माना जाता है। साधना के अन्तर्गत यह बात भी आती है, पर उसका क्षेत्र इतना ही नहीं— इससे कहीं अधिक विस्तृत है। भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों की उन्नति एवं सुव्यवस्था का साधना से सीधा सम्बन्ध है। मनुष्य का शारीरिक पुरुषार्थ पशुओं के पुरुषार्थ से भी घटिया दर्जे का है। उसकी विशेषता तो बौद्धिक एवं आध्यात्मिक ही है। इसी बल के आधार पर वह सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बन सका है। इसी के उत्कर्ष एवं पतन पर उसका वर्तमान एवं भविष्य निर्भर रहता है।

साधना से हमारे अन्तःप्रदेश का ऐसा शोधन, परिष्कार एवं अभिवर्धन होता है जिसके फलस्वरूप सर्वतोमुखी उन्नति का द्वार खुले और जो विघ्न बाधाएं प्रगति का मार्ग रोकते हैं उन्हें हटाया जा सके? पिछले पृष्ठों पर लौकिक समस्याओं के सुलझाने में साधना किस प्रकार सहायक होती है इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाला गया है।

स्वाध्याय और सत्संग, चिन्तन और मनन यह चारों उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियां अपनाने के हैं। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्य कर्म होना चाहिये। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं और वे देश काल पात्र के अनुरूप जन शिक्षण करते हैं। आज के युग में गांधी, विनोवा, दयानन्द, विवेकानन्द, रामकृष्ण, परमहंस, तुकाराम, कबीर आदि सन्तों का साहित्य जीवन निर्माण की दिशा में बहुत सहायक हो सकता है। आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास का जो विवेचनात्मक सत्साहित्य मिल सके, हमें नित्य नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए। स्वाध्याय की दैनिक आदत इतनी आवश्यक है कि उसकी उपेक्षा करने से आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रायः अवरोध ही पैदा हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/August/v1.9

बुधवार, 17 जून 2020

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (भाग ४)

इसी प्रकार अध्यात्मवाद के नाम पर नारी तिरस्कार और बहिष्कार की बेवक्त शहनाई बन्द कर देनी चाहिए। जिन भगवान की हम उपासना करते है और जिनसे स्वर्ग मुक्ति सिद्धि माँगते हैं वे स्वयं सपत्नीक हैं। एकाकी भगवान एक भी नहीं। राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि किसी भी देवता को लें सभी विवाहित हैं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली जैसी देवियों तक को दाम्पत्य जीवन स्वीकार रहा है। हर भगवान और हर देवता के साथ उनकी पत्नियाँ विराजमान है फिर उनके मनों को अपने इष्ट देवों से भी आगे निकल जाने की बात क्यों सोचनी चाहिए?
 
सप्त ऋषियों में सातों के सातों विवाहित थे और उनके साधना काल की तपश्चर्या अवधि में भी पत्नियाँ उनके साथ रही। इससे उनके कार्य में बाधा रत्ती भर नहीं पहुँची, वरन् सहायता ही मिली। प्राचीन काल में जब विवेकपूर्ण आध्यात्म जीवित था तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि आत्मिक प्रगति में नारी के कारण कोई बाधा उत्पन्न होगी।
 
रामकृष्ण परमहंस को विवाह की आवश्यकता अनुभव हुई और उनने उस व्यवस्था को तब जुटाया जब वे आत्मिक प्रगति के ऊँचे स्तर पर पहुँच चुके थे। काम सेवन और नारी सान्निध्य एक बात नहीं है। इसके अन्तर को भली- भाँति समझा जाना चाहिए। योगी अरविन्द घोष की साधना का स्तर कितना ऊँचा था, उसमें सन्देह करने की कोई गुंजायश नहीं है। उनके एकाकी जीवन की पूरी- पूरी साज सँभाल माताजी करती रही। इस सम्पर्क से दोनों की आत्मिक महत्ता बढ़ी ही घटी नहीं। प्रातः स्मरणीय माताजी ने अरविन्द के सम्पर्क से भारी प्रकाश पाया और योगिराज को यह सान्निध्य गंगा के समान पुण्य फलदायक सिद्ध हुआ। प्राचीन काल का ऋषि इतिहास तो आदि से अन्त तक इस सरल स्वाभाविक की सिद्धि करता चला आया है। तपस्वी ऋषि सपत्नीक स्थिति में रहते थे। जब जरूरत पड़ती प्रजनन की व्यवस्था बनाते अन्यथा आजीवन ब्रह्मचारी रहकर भी नारी सान्निध्य की व्यवस्था बनाये रखते। यह उनके विवेक पर निर्भर रहता था, प्रतिबन्ध जैसा कुछ नहीं था। यह स्थिति आज भी उपयोगी रह सकती है। सन्त लोग अपना व्यक्तिगत जीवन विवाहित या अविवाहित जैसा भी चाहें बिताये पर कम से कम उन्हें इस अतिवाद का ढिंढोरा पीटना तो बन्द ही कर देना चाहिए, जिसके अनुसार नारी को नरक की खान कहा जाता है। यदि ऐसा वस्तुतः होता तो गाँधी जी जैसे सन्त नारी त्याग की बात सोचते। कोई अधिक सेवा सुविधा की दृष्टि से या उत्तरदायित्व हलके रखने की दृष्टि से अविवाहित रहे, तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ये भी कोई प्रतिबन्ध हो सकता है या होना चाहिए। सच तो यह है कि सन्त लोग यदि सपत्नीक सेवा कार्य में जुटें, तो वे अपना आदर्श लोगों के सामने प्रस्तुत करके उच्च स्तरीय गृहस्थ जीवन की सम्भावना प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रस्तुत कर सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 16 जून 2020

👉 सकारात्मक सोच:--

पुराने समय की बात है, एक गाँव में दो किसान रहते थे। दोनों ही बहुत गरीब थे, दोनों के पास थोड़ी थोड़ी ज़मीन थी, दोनों उसमें ही मेहनत करके अपना और अपने परिवार का गुजारा चलाते थे।

अकस्मात कुछ समय पश्चात दोनों की एक ही दिन एक ही समय पे मृत्यु हो गयी। यमराज दोनों को एक साथ भगवान के पास ले गए। उन दोनों को भगवान के पास लाया गया। भगवान ने उन्हें देख के उनसे पूछा, ” अब तुम्हे क्या चाहिये, तुम्हारे इस जीवन में क्या कमी थी, अब तुम्हें क्या बना के मैं पुनः संसार में भेजूं।”

भगवान की बात सुनकर उनमे से एक किसान बड़े गुस्से से बोला, ” हे भगवान! आपने इस जन्म में मुझे बहुत घटिया ज़िन्दगी दी थी। आपने कुछ भी नहीं दिया था मुझे। पूरी ज़िन्दगी मैंने बैल की तरह खेतो में काम किया है, जो कुछ भी कमाया वह बस पेट भरने में लगा दिया, ना ही मैं कभी अच्छे कपड़े पहन पाया और ना ही कभी अपने परिवार को अच्छा खाना खिला पाया। जो भी पैसे कमाता था, कोई आकर के मुझसे लेकर चला जाता था और मेरे हाथ में कुछ भी नहीं आया। देखो कैसी जानवरों जैसी ज़िन्दगी जी है मैंने।”

उसकी बात सुनकर भगवान कुछ समय मौन रहे और पुनः उस किसान से पूछा, ” तो अब क्या चाहते हो तुम, इस जन्म में मैं तुम्हे क्या बनाऊँ।”

भगवान का प्रश्न सुनकर वह किसान पुनः बोला, ” भगवन आप कुछ ऐसा कर दीजिये, कि मुझे कभी किसी को कुछ भी देना ना पड़े। मुझे तो केवल चारो तरफ से पैसा ही पैसा मिले।”

अपनी बात कहकर वह किसान चुप हो गया। भगवान से उसकी बात सुनी और कहा, ” तथास्तु, तुम अब जा सकते हो मैं तुम्हे ऐसा ही जीवन दूँगा जैसा तुमने मुझसे माँगा है।”

उसके जाने पर भगवान ने पुनः दूसरे किसान से पूछा, ” तुम बताओ तुम्हे क्या बनना है, तुम्हारे जीवन में क्या कमी थी, तुम क्या चाहते हो?”

उस किसान ने भगवान के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ” हे भगवन। आपने मुझे सबकुछ दिया, मैं आपसे क्या मांगू। आपने मुझे एक अच्छा परिवार दिया, मुझे कुछ जमीन दी जिसपे मेहनत से काम करके मैंने अपना परिवार को एक अच्छा जीवन दिया। खाने के लिए आपने मुझे और मेरे परिवार को भरपेट खाना दिया। मैं और मेरा परिवार कभी भूखे पेट नहीं सोया। बस एक ही कमी थी मेरे जीवन में, जिसका मुझे अपनी पूरी ज़िन्दगी अफ़सोस रहा और आज भी हैं। मेरे दरवाजे पे कभी कुछ भूखे और प्यासे लोग आते थे। भोजन माँगने के लिए, परन्तु कभी कभी मैं भोजन न होने के कारण उन्हें खाना नहीं दे पाता था, और वो मेरे द्वार से भूखे ही लौट जाते थे। ऐसा कहकर वह चुप हो गया।”

भगवान ने उसकी बात सुनकर उससे पूछा, ” तो अब क्या चाहते हो तुम, इस जन्म में मैं तुम्हें क्या बनाऊँ।” किसान भगवान से हाथ जोड़ते हुए विनती की, ” हे प्रभु! आप कुछ ऐसा कर दो कि मेरे द्वार से कभी कोई भूखा प्यासा ना जाये।” भगवान ने कहा, “तथास्तु, तुम जाओ तुम्हारे द्वार से कभी कोई भूखा प्यासा नहीं जायेगा।”

अब दोनों का पुनः उसी गाँव में एक साथ जन्म हुआ। दोनों बड़े हुए।

पहला व्यक्ति जिसने भगवान से कहा था, कि उसे चारो तरफ से केवल धन मिले और मुझे कभी किसी को कुछ देना ना पड़े, वह व्यक्ति उस गाँव का सबसे बड़ा भिखारी बना। अब उसे किसी को कुछ देना नहीं पड़ता था, और जो कोई भी आता उसकी झोली में पैसे डालके ही जाता था।

और दूसरा व्यक्ति जिसने भगवान से कहा था कि उसे कुछ नहीं चाहिए, केवल इतना हो जाये की उसके द्वार से कभी कोई भूखा प्यासा ना जाये, वह उस गाँव का सबसे अमीर आदमी बना। उसके यहां से कोई खाली हाथ नहीं जाता था ।
   
                                                 
दोस्तों ईश्वर ने जो दिया है उसी में संतुष्ट होना बहुत जरुरी है। अक्सर देखा जाता है कि सभी लोगों को हमेशा दूसरे की चीज़ें ज्यादा पसंद आती हैं और इसके चक्कर में वो अपना जीवन भी अच्छे से नहीं जी पाते। मित्रों हर बात के दो पहलू होते हैं –

सकारात्मक और नकारात्मक, अब ये आपकी सोच पर निर्भर करता है कि आप चीज़ों को नकारत्मक रूप से देखते हैं या सकारात्मक रूप से। अच्छा जीवन जीना है तो अपनी सोच को अच्छा बनाइये, चीज़ों में कमियाँ मत निकालिये बल्कि जो भगवान ने दिया है उसका आनंद लीजिये और हमेशा दूसरों के प्रति सेवा भाव रखिये !!   

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (भाग ३)

आध्यात्मिक काम विज्ञान का प्रतिपादन यह है कि अतिवाद की भारी दीवारें गिरा दी जाय और नारी को नर की ही भाँति सामान्य और स्वाभाविक स्थिति में रहने दिया जाय। इससे एक बड़ी अनीति का अन्त हो जायेगा। अतिवाद के दोनों ही पक्ष नारी के वर्चस्व पर भारी चोट पहुँचाते हैं और उसे दुर्बल, जर्जर एवं अनुपयोगी बनाते हैं। इसलिए इन जाल- जंजालों से उसे मुक्त करने के लिए उग्र और समर्थ प्रयत्न किये जाय।
 
प्रयत्न होना चाहिए कि नारी की माँसलता की अवांछनीय अभिव्यक्तियाँ उभारने वालों से अनुरोध किया जाय, कि वे अपने विष बुझे तीर कृपाकर तरकस में बन्द कर लें। फिल्म वाले इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गये हैं। उनने बन्दर के हाथ तलवार लगने जैसी कुचेष्टा की आशंका की, वैसी ही करतूतें आरम्भ कर दी हैं। आग लगा देना सरल है बुझाना कठिन। मनुष्य की पशु प्रवृत्तियों को, यौन उद्वेग और काम विकारों को भड़का देना सरल है पर उस उभार से जो सर्वनाश हो सकता है, उससे बचाव की तरकीब ढूँढ़ना कठिन है। नासमझ लड़के- लड़कियों पर आज का सिनेमा क्या प्रभाव डाल रहा है और उनकी मनोदशा को किधर घसीटे लिये जा रहा है, इस पर बारीकी से दृष्टि डालने वाला दुखी हुए बिना न रहेगा। कला के अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले विभूतिवानों से करबद्ध प्रार्थना की जाय कि वे नारी को पददलित करने के पाप पूर्ण अभियान में जितना कुछ कर चुके, उतना ही पर्याप्त मान लें आगे की ओर निशाने न साधें। कवि लोग ऐसे गीत न लिखें, जिनसे विकारोत्तेजक प्रवृत्तियाँ भड़के। साहित्यकार, उपन्यासकार कलम से नारी के गोपनीय सन्दर्भों पर भड़काने वाली चर्चा छोड़कर सरस्वती की साधना को अगणित धाराओं में प्रयुक्त कर अपनी प्रतिभा का परिचय दें। गायक विकारोत्तेजना और शृंगार रस को कुछ दिन तक विश्राम कर लेने दें। सामन्तवादी अन्धकार युग के दिनों उसे ही तो एक छत्र राज्य मिला है। गायन का अर्थ ही पिछले दिनों कामेन्द्रिय रहा है। राज्य दरबारों से लेकर मनचले आवारा हिप्पियों तक उसी को माँगा जाता रहा है। अब कुछ दिनों से गान विश्राम ले लें और दूसरे रसों को भी जीवित रहने का अवसर मिल जाय तो क्या हर्ज है? कुछ दिन तक घुँघरू न बजें, पायल न खनकें तो भी कला जीवित रहेगी। चित्रकार नव यौवना की शालीनता पर पर्दा पड़ा रहने दें, पतित दुःशासन द्वारा द्रौपदी को नंगा करने की कुचेष्टा न करें, तो भी उनकी चित्रकारिता सराही जा सकती है। चित्रकला के दूसरे पक्ष भी हैं, क्यों न कुशल चित्रकार सुरुचि उत्पन्न करने वाले चित्र बनायें। मूर्तिकार क्यों न मानवीय अन्तर्वेदना को उभारने वाली प्रतिमायें बनायें।
 
नारी के प्रति हमारा चिन्तन सखा, सहचर और मित्र जैसा सरल स्वाभाविक होना चाहिए। उसे सामान्य मनुष्य से न अधिक माना जाय न कम। पुरुष और पुरुष, स्त्रियाँ और स्त्रियाँ जब मिलते है तो उनके असंख्य प्रयोजन होते हैं, काम सेवन जैसी बात वे सोचते भी नहीं। ऐसे ही नर- नारी का मिलन भी स्वाभाविक सरल और सौम्य बनाया जाना चाहिए। यह स्थिति निश्चित रूप से आ सकती है, क्योंकि वही प्राकृतिक है। इसी प्रकार रूढ़िवादियों से कहा जाना चाहिए कि प्रतिबन्धों से व्यभिचार रुकेगा नहीं बढ़ेगा। जिस स्त्री का मुँह ढँका होता है उसे देखने को मन चलेगा पर मुँह खोले सड़क पर हजारों लाखों स्त्रियों में से किसी की ओर नजर गड़ाने की इच्छा नहीं होती चाहे वे रूपवान हो या कुरूप।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Proper Use of Life

Most part of human life is largely spent in – eating, sleeping and being engaged in sensual passions and pleasures, or worrying, fearing or fighting etc. Almost all the time and efforts are centered round the body and the activities and people associated with it. But is that all the purpose for which the human life is bestowed? If the domain of life is confined to activities related with the body,  its protection, fulfillment of its instinctive desires, then what is the difference between humans and animals?

Humans are the most evolved and intelligent beings. Greater responsibilities are also entrusted along with this superior status among all living beings. Those among us, who do not bear the responsibilities of human life, are not worthy of the dignity of being called humans.

Eradication of evils, vices, wrongs, sufferings and agonies, and establishment of the righteous, expansion of the enlightened values of humanity is the main purpose of human life. All the great talents, skills, abilities and powers which Nature has endowed us with are for the betterment of the world, for the welfare of all. So you must try your level best to help others, elevate them. No doubt,  you should take cure of your health, excelling of your own potentials, your near and dear ones, but your duties should not end there. Whatever time and resources you have must also be shared for altruistic service of the needy around you; the society should also benefit by your talents and powers. The greater your altruistic contributions, the better would the use and brighter would be the glory of your life…

📖 Akhand Jyoti, Apr. 1944

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 16 June 2020

□ महानता कोई सुख नहीं है जैसा कि लोग समझते हैं। यह मनुष्य की जीवनकालीन सेवाओं, लोकमंगल की कामनाओं, प्रयत्नों, कष्टों, बलिदानों और ध्येयधीरता का प्रमाण पत्र है, जो प्रायः उसके दिवंगत हो जाने के बाद संसार द्वारा घोषित किया जाता है। जीवनकाल में ही सफलता का हठ लेकर चलने वालों के लिए यही उपयुक्त है कि वे या तो अपना कदम पीछे हटा लें अथवा अपनी मनोवृत्ति में सुधार कर लें।

■ गंदगी मनुष्य की आत्मा का ही नहीं, व्यक्तित्व का भी पतन कर देती है। गंदगी से बचना, उसे छोड़ना और हर स्थान से उसे दूर करना, मनुष्य का सहज धर्म है। उसे अपने इस धर्म की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक, किसी प्रकार का भी विकास करने के लिए जिन गुणों की आवश्यकता है, स्वच्छता उनमें सर्वोपरि है।

□ यों तो भाग्य में लिखा हुआ नहीं मिटता, पर भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर भाग्य सोया रहता है और हिम्मत बाँधकर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है। आलसियों का भाग्य असफल बना रहता है और कर्मवीरों का भाग्य उन्हें निरन्तर सफलता का पुरस्कार प्रदान किया करता है।

◆ कोई व्यक्ति न तो पूर्णतया बुरा है और न अच्छा। हर किसी में कुछ दोष पाये जाते हैं और कुछ गुण रहते हैं। जागरूकता का तकाजा यह है कि दोषों से बचते हुए उसके गुणों से ही लाभ उठाया जाय। किसी व्यक्ति को न तो पूरा देवता मान लेना चाहिए और न असुर। दोनों स्थितियों के समन्वय से जो कुछ बनता है, उसी का नाम मनुष्य है। इसलिए उस पर न तो पूरी तरह अविश्वास किया जा सकता है और न विश्वास।

◇ सुख-दुःख का क्रमिक आवागमन संसार का शाश्वत विधान है। ऐसी दशा में केवल अपने मनोनुकूल परिस्थितियों का आग्रह न केवल स्वार्थ अपितु ईश्वरीय विधान के प्रति अस्वीकृति है, जो एक प्रकार से नास्तिकता, ईश्वर द्रोह एवं भयंकर पाप है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 14 जून 2020

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (भाग २)

इस अमानवीय प्रतिबन्ध की प्रतिक्रिया बुरी हुई। नारी शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत पिछड़ गई। भारत में नर की अपेक्षा नारी की मृत्यु दर बहुत अधिक है। मानसिक दृष्टि से वह आत्महीनता की ग्रन्थियों में जकड़ी पड़ी है। सहमी, झिझकी, डरी, घबराई, दीन- हीन अपराधिन की तरह वह यहाँ- वहाँ लुकती छिपती देखी जा सकती है अन्याय अत्याचार और अपमान पग- पग पर सहते- सहते क्रमशः अपनी सभी मौलिक विशेषताएँ खोती चली गई। आज औसत नारी उस नीबू की तरह है, जिसका रस निचोड़ कर उसे कूड़े में फेंक दिया जाता है। नव यौवन के दो चार वर्ष ही उसकी उपयोगिता प्रेमी पतिदेव की आँखों में रहती है। अनाचार की वेदी पर जैसे ही उस सौन्दर्य की बलि चढ़ी कि वह दासी मात्र रह जाती है। आकर्षण की तलाश में भौंरे फिर नये- नये फूलों की खोज में निकलते और इधर- उधर मँडराते दीखते हैं। जीवन की लाश का भार ढोती हुई, गोदी के बच्चों के लिए वह किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करती है। जो था वह दो चार वर्ष में लुट गया, अब बेचारी को कठोर परिश्रम के बदले पेट भरने के लिए रोटी और पहनने को कपड़े भर पाने का अधिकार है। बन्दिनी का अन्तःकरण इस स्थिति के विरुद्ध भीतर ही भीतर कितना ही विद्रोही बना बैठा रहे, प्रत्यक्षतः वह कुछ न कर सकने की परिस्थितियों में ही जकड़ी होती है, सो गम खाने और आँसू पीने के अतिरिक्त उसके पास कुछ चारा नहीं रह जाता।
 
तीसरा एक और अतिवाद पनपा। अध्यात्म के सन्दर्भ से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष- दुर्गुणों की, पाप- पतन की जड़ है। इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग- मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। इस सनक के प्रतिपादन में न जाने क्या- क्या मनगढ़न्त गढ़कर खड़ी कर दी गई। लोग घर छोड़कर भागने में, स्त्री, बच्चों को बिलखता छोड़कर भीख माँगने और दर- दर भटकने के लिए निकल पड़े। समझा गया इसी तरह योग साधना होती होगी इसी तरह स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि मिलती होगी। पर देखा ठीक उलटा गया। आन्तरिक अतृप्ति ने उनकी मनोभूमि को सर्वथा विकृत कर दिया और वे तथाकथित सन्त महात्मा सामान्य नागरिकों की अपेक्षा भी गई गुजरी मनःस्थिति के दलदल में फँस गये। विरक्ति का जितना ही ढोंग उनने बनाया अनुरक्ति की प्रतिक्रिया उतनी ही उग्र होती चली गई। उनका अन्तरंग यदि कोई पढ़ सकता हो, तो प्रतीत होगा कि मनोविकारों ने उन्हें कितना जर्जर कर रखा है। स्वाभाविक की उपेक्षा करके अस्वाभाविक के जाल- जंजाल में बुरी तरह जकड़ गये हैं। ऐसे कम ही विरक्त मिलेंगे जिनने बाह्य जीवन में जैसे नारी के प्रति घृणा व्यक्त की है, वैसे ही अन्तरंग में भी उसे विस्मृत करने में सफल हो पाये हो। सच्चाई यह है कि विरक्ति का दम्भ अनुरक्ति को हजार गुना बढ़ा देता है। बन्दर का चिन्तन न करेंगे ऐसी प्रतिज्ञा करते ही बरबस बन्दर स्मृति पटल पर आकर उछलकूद मचाने लगता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 13 जून 2020

👉 "संकल्प"

बात नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बचपन की है जब वे स्कूल में पढ़ा करते थे। बचपन से ही वे बहुत होशियार थे और सारे विषयो में उनके अच्छे अंक आते थे, लेकिन वे बंगाली में कुछ कमजोर थे। बाकि विषयों की अपेक्षा बंगाली मे उनके अंक कम आते थे।

एक दिन अध्यापक ने सभी छात्रों को बंगाली में निबंध लिखने को कहा। सभी छात्रों ने बंगाली में निबंध लिखा। मगर सुभाष के निबंध में बाकि छात्रों की तुलना में अधिक कमियाँ निकली।

अध्यापक ने जब इन कमियों का जिक्र कक्षा में किया तो सभी छात्र उनका मजाक उड़ाने लगे।

उनकी कक्षा का ही एक विद्यार्थी सुभाषचंद्र बोस से बोला- “वैसे तो तुम बड़े देशभक्त बने फिरते हो मगर अपनी ही भाषा पर तुम्हारी पकड़ इतनी कमजोर क्यों है।”

यह बात सुभाषचन्द्र बोस को बहुत बुरी और यह बात उन्हें अन्दर तक चुभ गई। सुभाषचंद्र बोस ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह अपनी भाषा बंगाली सही तरीके से जरुर सीखेंगे।

चूँकि उन्होंने संकल्प कर लिया था इसलिये तभी से उन्होंने बंगाली का बारीकी से अध्ययन शुरू कर दिया। उन्होंने बंगाली के व्याकरण को पढ़ना शुरू कर दिया, उन्होंने दृढ निश्चय किया कि वे बंगाली में केवल पास ही नहीं होंगे बल्कि सबसे ज्यादा अंक लायेंगे।

सुभाष ने बंगाली पढ़ने में अपना ध्यान केन्द्रित किया और कुछ ही समय में उसमे महारथ हासिल कर ली। धीरे धीरे वार्षिक परीक्षाये निकट आ गई।

सुभाष की कक्षा के विद्यार्थी सुभाष से कहते – भले ही तुम कक्षा में प्रथम आते हो मगर जब तक बंगाली में तुम्हारे अंक अच्छे नहीं आते, तब तक तुम सर्वप्रथम नहीं कहलाओगे।

वार्षिक परीक्षाएं ख़त्म हो गई। सुभाष सिर्फ कक्षा में ही प्रथम नहीं आये बल्कि बंगाली में भी उन्होंने सबसे अधिक अंक प्राप्त किये। यह देखकर विद्यार्थी और शिक्षक सभी दंग रहे गये।

उन्होंने सुभाष से पूछा – यह कैसे संभव हुआ ?

तब सुभाष विद्यार्थियों से बोले – यदि मन ,लगन ,उत्साह और एकग्रता हो तो, इन्सान कुछ भी हाँसिल कर सकता है।

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (भाग १)

कुछ समय से नर- नारी के सान्निध्य का प्रश्न अतिवाद के दो अन्तिम सिरों के साथ जोड़ दिया गया है। एक ओर तो नारी को इतनी आकर्षक चित्रित किया गया कि उसकी माँसलता को ही सृष्टि की सबसे बड़ी विभूति सिद्ध कर दिया गया। कला ने नारी के अंग- प्रत्यंग की सुडौलता को इतना सराहा कि सामान्य भावुक व्यक्ति यह सोचने के लिए विवश हो गया कि ऐसी सुन्दरता को काम तृप्ति के लिए प्राप्त कर लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। गीत, काव्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र, मूर्ति आदि कला के समस्त अंग जब नारी की माँसलता और कामुकता को ही आकाश तक पहुँचाने में जुट जाये, तो बेचारी लोकवृत्ति को उधर मुड़ना ही पड़ेगा। इस कुचेष्टा का घातक दुष्परिणाम सामने आया। यौन प्रवृत्तियाँ भड़की, नर- नारी के बीच का सौजन्य चला गया और एक दूसरे के लिए अहितकर बन गये। यौन रोगों की बाढ़ आई, शरीर और मन जर्जर हो गया, पीढ़ियाँ दुर्बल से दुर्बलतर होती चली गई, मनःस्थिति उस कुचेष्टा के चिन्तन में तल्लीन होने के कारण कुछ महत्त्वपूर्ण चिन्तन कर सकने में असमर्थ हो गयी। तेज, ओज, व्यक्तित्व, प्रतिभा, मेधा, शौर्य और वर्चस्व जो कुछ महान था, वह सब कुछ इसी कुचेष्टा की वेदी पर बलि हो गया। दुर्बल काया और मनःस्थिति को लेकर दीन- हीन और पतित- पापी ही बन सकता था, सो बनता चला गया। नारी को रमणी सिद्ध करके तुच्छ सा मनोरंजन भले पाया हो, पर उससे जो हानि हुई उसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। जिनने भी मानवीय प्रवृत्तियों को इस पतनोन्मुख दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है वस्तुतः एक दिन वे मानवीय विवेक और ईश्वरीय न्याय की अदालत में अपराधियों की तरह खड़े किये जायेंगे।
 
अतिवाद का एक सिरा यह है कि कामिनी, रमणी, वैश्या आदि बना कर उसे आकर्षण का केन्द्र बनाया गया। अतिवाद का दूसरा सिरा है कि उसे पर्दे, घूँघट की कठोर जंजीरों में जकड़ कर अपंग सदृश्य बना दिया गया, उस पर इतने प्रतिबन्ध लगाये गये जितने बन्दी और पशु भी सहन नहीं कर सकते। जेल के कैदियों को थोड़ा घूमने- फिरने की, हँसने- बोलने की आजादी रहती है। पर घर की छोटी सी कोठरी में कैद नववधू के लिए परिवार के छोटी आयु वालों के सामने ही बोलने की छूट है। बड़ी आयु वालों से तो उसे पर्दा ही करना होता है। न उनके सामने मुँह खोला जा सकता है और न उनसे बात की जा सकती है। पर्दा सो पर्दा, प्रथा सो प्रथा, प्रतिबन्ध सो प्रतिबन्ध। इससे न्याय, औचित्य और विवेक के लिए क्यों गुंजायश छोड़ी जाय। पशु को मुँह पर नकाब लगाकर नहीं रहना पड़ता। वे दूसरों के चेहरे देख सकते हैं और अपने दिखा सकते है। जब मर्जी हो चाहे जिसके सामने अपनी टूटी- फूटी वाणी बोल सकते हैं। पर नारी को इतने अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Where is God?

Many of us feel an inner urge to find God. We also make several attempts, but find no clues. He is said to be Omnipresent, so He should be everywhere? Then why, despite our devoted efforts, we can’t find him anywhere? Some people spend lot of wealth and all their time in religious rituals and activities aimed at HIS search but remain in the void. Some get frustrated and lose faith in HIS existence. Who is right? What is the truth?

Well, the universal fact is – God is Eternal, Omnipresent. The flaw is in your approach. You can’t find him by worldly attempts or by any ascetic means either. It is only a pure heart full of love that can feel and find God. Learn to love the soul, love every one, every thing around you. You don’t have to renounce the world and go to the forests or high mountaintops, or spend time and resources in any sacrament to experiences HIS light. HE is everywhere, so rest assured, HE is also near you, within you. Where? Within your soul. Have you ever bothered to listen to the voice of your soul? No! This is why you are not able to experience God.

Just think, who governs your life force, who inspires auspicious sentiments or motivate you for noble deeds? Whose voice is that which warns you against doing something wrong or harming someone? You may ignore that inner voice. But that is the voice of God indwelling in your inner self. It is only in the deeper depths of your own self that you can find HIM.

📖 Akhand Jyoti, Apr 1944

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 13 June 2020

■ सुख और दुःख किन्हीं परिस्थितियों का नाम नहीं, वरन् मन की दशाओं का नाम है। संतोष और असंतोष वस्तुओं में नहीं, वरन् भावनाओं और मान्यताओं से होता है। इसलिए उचित यही है कि सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ ढूँढते-फिरते रहने की अपेक्षा अपने दृष्टिकोण को ही परिमार्जित करने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न में हम जितने ही सफल होंगे अंतःशक्ति के उतने ही निकट पहुँच जायेंगे।

□ अपने प्रति उच्च भावना रखिए। छोटे से छोटे काम को भी महान् भावना से करिये। बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी निराश न होइए। आत्म विश्वास एवं आशा का प्रकाश लेकर आगे बढ़िए। जीवन के प्रति अखण्ड निष्ठा रखिए और फिर देखिए कि आप एक स्वस्थ, सुंदर, सफल एवं दीर्घजीवन के अधिकारी बनते हैं या नहीं।

◆ आनंद के लिए किन्हीं वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं और न उसके लिए किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है। वह अपनी भीतरी उपज है। परिणाम में संतोष और कार्य में उत्कृष्टता का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिमाण में  पाया जा सकता है।

◇ सच्ची लगन से काम करने वाले किसी बाह्य वातावरण अथवा परिस्थिति को काम में विघ्न डालने वाला बताकर कार्य से मुख मोड़ने का बहाना नहीं निकालते, बल्कि घोरतम विपरीत परिस्थितियों में भी अंगद के चरण की तरह अपने कर्त्तव्य पर अटल रहते हैं। उन्हें छोटी-मोटी परिस्थितियाँ काम से उखाड़ नहीं पातीं।

□ अनेक लोग पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनंद लेते हैं। समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस द्विविध नीति को समझ नहीं सकता। वे इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े ही शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं। अपने को इस प्रकार बुद्धिमान् समझना बहुत बड़ी मूर्खता है। एक तो दूसरे को प्रवंचित करना स्वयं ही आत्म-प्रवंचना है, फिर बैर प्रीति की तरह वास्तविकता तथा कृत्रिमता छिपी नहीं रह सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 12 जून 2020

👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (अंतिम भाग)

इस तथ्य से सभी अवगत है कि खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। धूमधाम, देन दहेज की शादियों का वर्तमान प्रचलन देखने में हर्षोत्सव की साज सज्जा जैसा भले ही प्रतीत होता हो किन्तु वस्तुतः उसकी भयंकरता उतनी हलकी है नहीं। इस कारण नर और नारी के बीच भयंकर खाई खड़ी हुई है, कन्या और पुत्र का अन्तर बढ़ा है, कन्या शिक्षा में कटौती हुई है, हत्याओं और आत्म हत्याओं का सिलसिला चला है, सगे सम्बन्धियों के बीच डकैती जैसी दुष्टता की जड़ जमी है, दाम्पत्य जीवन की उत्कृष्टता को भयानक चोट लगी है, देश की आर्थिक कमर टूटी है, समाज का ढाँचा बेतरह लड़खड़ाया है। और भी न जाने क्या क्या अनर्थ इस कारण हुआ है। समय की माँग और दूरदर्शिता का संकेत यह है कि सर्व प्रथम धूमधाम और देन दहेज की शादियों के विरुद्ध व्यापक मोर्चा खड़ा किया जाय, और प्रचण्ड संघर्ष छोड़ जाय। इसमें कुछेक मदोन्मत्तों को छोड़कर सर्व साधारण का समर्थन पूरी तरह मिलने की संभावना है।

इस संदर्भ में प्रथम उपाय प्रतिज्ञा पत्र अभियान के रूप में आरम्भ किया जाय। अभिभावक प्रतिज्ञा करे हम अपने बालकों के विवाह में धूमधाम एवं देन दहेज स्वीकार न करेंगे। विवाह योग्य लड़की लड़के प्रतिज्ञा करें कि वे नितान्त सादगी और बिना मोल भाव का विवाह ही करेंगे, भले ही वैसा सुयोग न बनने पर आजीवन कुँआरा ही क्यों न रहना पड़े। प्रभावशाली लोग अपने सम्पर्क क्षेत्र में सादगी प्रधान विवाहों को प्रोत्साहन दें, और खर्चीली शादियों का डट कर विरोध करें।

यहाँ सर्व साधारण द्वारा अपनाया जाने योग्य सरल सत्याग्रह यह है कि खर्चीली शादियों में सम्मिलित होने से स्पष्ट इन्कार कर दें भले ही वे अपने सम्बन्धियों कुटुम्बियों या मित्रों के ही यहाँ क्यों न हो रही हो। कुछ समय पूर्व यह असहयोग आनदोलन प्रज्ञा अभियान के अन्तर्गत मृतक भोज न खाने के सम्बन्ध में चलाया गया और पूरी तरह सफल रहा और अब खर्चीले विवाहों को भी इसी असहयोग आन्दोलन का अगला चरण माना जाय और एक एक करके प्रचलित अवांछनीयताओं के विरुद्ध असहयोग प्रतिरोध संघर्ष कड़ा करते चला जाय।

हम बदलेंगे युग बदलेगा का उद्घोष इन्ही दिनों विज्ञ जनों को सच्चे मन से अपनाना और तत्काल चरितार्थ करना चाहिए। इसके तीन सिद्धान्त सूत्रों को बिनाएक क्षण गंवाये अपनाया जाय।

१. औसत नागरिक स्तर का निर्वाह-चतुर्विधि संयम अनुशासन २. समय दान अंश दान ३. दहेज की धूमधाम वाली शादियों का विरोध, असहयोग। यह तीन आधार ऐसे है जिन्हें नवयुग के भव्य निर्माण में अनिवार्य रूप से अपनाया जाना चाहिए। इन आदर्शों को अपनाते हुये सृजन प्रयोगों को अधिकाधिक प्रखर विस्तृत करते चलना चाहिए। यही है सतयुग की वापिसी का भागीरथी प्रयास, जिसकी सफलता पर मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण सुनिश्चित रूप से संभव हो सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 11 जून 2020

👉 समय की आवश्यकता "संघ शक्ति": -

कई मोर्चे खुले पर सब जगह हार देवताओं की हुई! असुर उनके एक-एक कर सभी दुर्ग जीतते चले गये, देवताओं का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया! पराजित देवता प्रजापति ब्रह्मा के पास पहुँचे! पराजय के कारण और उनसे असुरों पर विजय का उपाय पूछा! पराजय के कारण और विजय की नई योजनाओं पर कुछ देर तक विचार करने के बाद ब्रह्मा जी बोले-

देवताओं! तुम सभी दिव्य गुणों वाले हो, त्यागी और तपस्वी भी कम नहीं हो, शक्ति और साहस का तुम में अभाव भी नहीं है किन्तु एक बहुत बड़ी कमी तुम में भी है संगठन का अभाव! तुम्हारी शक्तियाँ बिखरी होने के कारण अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पातीं जब कि पापी और दुर्गुणी होकर भी केवल संगठित होने के कारण थोड़े से असुरों की शक्ति में वह बल आ जाता है कि वे तुम सब को जब चाहते परास्त करके रख देते हैं!

फिर ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं से शक्ति का थोड़ा अंश लेकर दुर्गा का अवतरण किया।

यह इस रहस्य का उद्घाटन करता है की देवताओं ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश देकर एक संघ शक्ति का निर्माण किया, दुर्गा उस संस्था एवं संगठन  का प्रतीक है जिसमें श्रेष्ठ व्यक्तियों की शक्तियाँ संघ-बद्ध होकर काम करती हैं!

यह संघ शक्ति अवतरित हुई, उसने सिंह को अपना वाहन बनाया! सिंह साहस और स्फूर्ति का प्रतीक है उसका भावार्थ यह होता है कि देवताओं ने अपनी संगठित शक्ति का तेजी से साहसपूर्वक प्रयोग किया, उसका फल यह हुआ कि बड़े-बड़े दुर्दान्त और दिग्गज राक्षस आये पर दुर्गा उन सब को मारती-काटती चली गयी! वह अपने वाहन सहित राक्षसों पर टूट पड़ी, राक्षसों में अब उनका सामना करने की हिम्मत नहीं रही!

पुराणों की दुर्गा-अवतरण की कथा में संघ शक्ति का अलंकारिक चित्रण है, उसका उपयोग प्रकरान्तर से प्रत्येक युग में होता आया है, रावण जैसे शक्तिशाली असुर के सामने रीछ वानरों की कोई औकात नहीं थी पर यह उनकी संगठित शक्ति का परिणाम था कि एक लाख पुत्र, सवा लाख नातियों के कुनवे वाला मायावी रावण भी धराशायी कर दिया गया! इन्द्र के कोप का सामना करना कठिन हो जाता यदि यादवों ने कृष्ण के इशारे पर संगठित होकर गोवर्धन को नहीं उठा लिया होता! भगवान् बुद्ध को तो "बुद्धं शरणं गच्छामि" के साथ "संघं शरण गच्छामि" का भी नारा लगाना पड़ा था! तब कहीं उस युग में व्याप्त धर्म के नाम पर आडम्बर, अज्ञान, अनाचार और मत-मतान्तरों का अँधड़ रोका जा सका था!

अभी कुछ दिन पुर्व ही यही प्रयोग स्वतंत्रता सेनानियों ने किया! देशभक्तों के रूप में दुर्गा शक्ति ने अवतार लिया था तभी अंग्रेजी हुकूमत जैसी शक्तिशाली सत्ता पर भारतियों को विजय मिल सकी थी!

आज समाज में अच्छे लोगों का अभाव नहीं! लोग आस्तिक हैं, पूजा उपासना करते हैं, दान पुण्य करते हैं, उनमें नेक आदमियों के सब लक्षण है तो भी असुरता चाहे वह मनुष्यों के रूप में हो या दुष्प्रवृत्तियों के रूप में जीतती चली जाती है, अच्छे लोग आये दिन संकट में पड़ते, कष्ट भोगते रहते हैं यह सब उनमें संगठन शक्ति के आभाव के कारण है!

यदि आज भी लोग संगठित हो जायें तो इस युग की असुरता, पाप और अत्याचार को उसी प्रकार भगाया जा सकता है जिस प्रकार दुर्गा को जन्म देकर देवताओं ने असुरों को मार भगाया!!

👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ५)

स्पष्ट है कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण जनुपात अंशदान के रूप सृजन कृत्यों के लिए नियोजित करने की आवश्यकता पड़ेगी। इतना ही नहीं श्रम, समय भी इसके साथ ही देना पड़ेगा। अस्तु न केवल आजीविका का एक अंश वरन समय का श्रमदान भी इस निमित्त नियमित रूप से नियोजित करते रहने की आवश्यकता पड़ेगी। आरम्भ में महीने में एक दिन की आजीविका और हर दिन दो घण्टे का श्रम इस हेतु उन सभी को लगाना होगा जो प्रस्तुत विश्व संकट से उबरने की बात सोचते और इस निमित्त कुछ करने का साहस करते हैं।

योजनाएँ कैसी भी क्यों न हों बुद्धिबल, श्रम तथा धन की माँग करती है। युग परिवर्तन अभियान भी इसका अपवाद नहीं है। जो कहे सो पानी को जाय वाली उक्ति के अनुसार प्रतिपादन कर्त्ताओं को कथनी को करनी में प्रयुक्त करके दिखाना पड़ता है। विशेषतया आदर्शवादी प्रचलनों के सम्बन्ध में तो इसके बिना काम ही नहीं चलता।

तीसरा चरण अवांछनीयता उन्मूलन का है। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्तियाँ सम्पन्न करने के लिए प्रज्ञा अभियान की लाल मशाल इसी निमित्त जलाई गई है। प्रश्न यह है कि दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष का श्रीगणेश कहाँ से किया जाय। गाँधी जी ने सुगम उपाय नमक सत्याग्रह सोचा था और फिर सत्याग्रह आन्दोलन को करो या मरो स्तर तक पहुँचाया था। उसी रणनीति का अनुसरण हमें भी संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध अपनाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Quintessence of Religion

The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others. Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and cooperation should be cultivated and enhanced consistently.

The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 11 June 2020

■ उन्नति की आकाँक्षा करने से पहले मनुष्य को अपने को परखकर देख लेना चाहिए कि ऊँचे चढ़ने के लिए जिस श्रम की आवश्यकता होती है, उसकी जीवन वृत्ति उसमें है भी या नहीं। यदि है तो उसकी आकाँक्षा अवश्य पूर्ण होगी अन्यथा इसी में कल्याण है कि मनुष्य उन्नति की आकाँक्षा का त्याग कर दे, नहीं तो उसकी आकाँक्षा स्वयं उसके लिए एक कंटक बन जायेगी।

□ हममें से अधिकांश लोग किसी कार्य की शुरुआत इसलिए नहीं करते, क्योंकि आने वाले खतरों को उठाने का साहस हममें नहीं होता। हम दूसरों की आलोचना, विरोध से डरते हैं। असफलता या लोकनिन्दा का भय हमें कार्य की शुरुआत में ही निस्तेज कर देता है, इसी कारणवश हम दीन-हीन जीवन व्यतीत करते हैं। संसार की जो जातियाँ साहस पर ही जीती हैं, वे ही सबकी अगुवा भी बन जाती हैं।

◆ किसी कार्य को केवल विचार पर ही नहीं छोड़ देना चाहिए। कार्य रूप में परिणत हुए बिना योजनाएँ चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हों, लाभ नहीं दे सकतीं।  विचार की आवश्यकता वैसी ही है जैसी रेलगाड़ी को स्टेशन पार करने के लिए सिग्नल की आवश्यकता होती है। सिग्नल का उद्देश्य केवल यह है कि ड्राइवर यह समझले कि रास्ता साफ है अथवा आगे कुछ खतरा है? विचारों द्वारा भी ऐसे ही संकेत मिलते हैं कि वह कार्य उचित और उपयुक्त है या अनुचित और अनुपयुक्त?

◇ मनुष्य के साध्य, सुख और शान्ति का निवास कामनाओं, उपादानों अथवा भोग-विलास में नहीं है। वह कम से कम कामनाओं, अधिक से अधिक त्याग और विषय-वासनाओं के विष से बचने में ही पाया जा सकता है। जो निःस्वार्थी, निष्काम, पुरुषार्थी, परोपकारी, संतोषी तथा परमार्थी हैं, सच्ची सुख-शान्ति के अधिकारी वही हैं। सांसारिक स्वार्थों एवं लिप्साओं के बंदी मनुष्य को सुख-शान्ति की कामना नहीं करनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 10 जून 2020

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ४)

भटकाव से भ्रमित और कुत्साओं से ग्रसित व्यक्ति ऐससी ललक लिप्साओं में संलग्न रहता है जिन्हें दूरदर्शिता की कसौटी पर कसने से व्यर्थ निरर्थक एवं अनर्थ की ही संज्ञा दी जा सकती है। पेट प्रजनन इतना कठिन नहीं है जिनकी उचित आवश्यकताएँ थोड़ा सा समय श्रम लगाकर जुटाकर जुटाई न जा सके। सामथ्यों और साधनों की बर्बादी तो मूर्खता एवं धूर्तता जैसे प्रयोजनों में ही नष्ट भ्रष्ट होती रहती है। इसे जो जितनी बचा सकेगा उसे अपने पास सत्प्रयोजनों में लगा सकने योग्य भण्डार उतनी ही मात्रा में भरा पूरा दृष्टिगोचर होने लगेगा। बर्बादी से बचने और प्रगति पथ पर चढ़ दौड़ने की सुविधा प्राप्त करने का एक ही उपाय है-संयम। सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श अपनाने पर ही व्यक्तित्व के अभ्युदय का शुभारम्भ होता है।

इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम के चतुर्विध आत्मानुशासन को अध्यात्म की भाषा में तप साधना कहा गया है और साधना से सिद्धि का तत्वदर्शन समझाते हुए कहा गया है कि संयमी के पास ही श्रेय खरीदने के लिए पूँजी जुटती है। जिनकी तृष्णाएँ, महत्वाकांक्षाएँ ही आकाश चूमती हैं, जो संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति में ही चित्तवृत्तियों को केन्द्रित किए हुए हैं उन्हें विलास वैभव जुटाने की बात ही सोचते हुए जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। परमार्थ की बात तो वे आत्म प्रवंचना एवं लोक विडम्बना के लिए करते रहते हैं। वस्तुतः उनसे उस सन्दर्भ में कोई कारगर कदम उठाते बन नहीं पड़ता। यही कारण है कि महानता और संयम साधना को पर्यायवाची पूरक माना जाता है। औसत नागरिक का स्तर अपनाना, महत्वाकांक्षाएँ उसी परिधि में सीमित कर लेना ऐसा निर्धारण है जिसे अपनाते ही हर स्तर और हर परिस्थिति का व्यक्ति महान प्रयोजनों के लिए नियोजित कर सकने योग्य शारीरिक, मानसिक ही नहीं आर्थिक अनुदान की भी बचत कर सकता है।

अगले दिनों नव सृजन के लिए इतने अधिक प्रकार के इतनी अधिक संख्या में कार्यक्रम अपनाने पड़ेंगे जो वर्तमान कुप्रचलनों का स्थान ग्रहण कर सकें। वर्तमान प्रयोजनों में असीम श्रम और धन लगा हुआ है। नशा एवं मांस व्यवसाय, कुत्सित साहित्य कामुकता भड़काने वाले फिल्म, जुआ, लाटरी जैसे कृत्यों में न जाने कितनी बुद्धि, मेहनत और दौलज लगाई गई है। इसे हटाना तभी संभव है जब समानान्तर सत्प्रवृत्तियों में उस उत्साह को नियोजित किया जा सके। इसके लिए पूँजी भी उतनी ही चाहिए और श्रम भी उतना ही। यह कहाँ से जुटे? स्पष्ट है कि इसकी पूँजी जागृत आत्माओं द्वारा की गई बचत कटौती से ही बन पड़ेगी। शिक्षा, साहित्य, कला, स्वास्थ्य, कुटीर उद्योग, बाल विकाश जैसे कार्यों को इतने विशाल परिमाण में खड़ा करना होगा कि ५०० करोड़ मनुष्यों की इस दुनिया को पुराना छोड़ने के साथ ही नया अपनाने के लिए ढाँचा खड़ा और सरंजाम जुटा दीखे। स्पष्ट है कि इसके लिए समय, श्रम और धन की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ेगी। उसे असमंजस की बेला में सर्व साधारण से उपलब्ध न किया जा सकेगा। उसकी आरम्भिक पूर्ति युग चेतना के अग्रदूतों को ही करनी होगी, अनुकरण का प्रचलन तो बाद में बनेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ऐसी हो गुरु में निष्ठा:-

प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।

वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहाः "हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो?" शिष्य पहले तो कहा करते थेः ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाय मेरे प्रभु!ʹअब सब चुप हो गये।

उनमें संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु सेवापरायण, गुरुभक्त था। उसने कहाः "गुरुदेव! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।" गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।" संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।"

वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ।

वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ, करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता। गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते किंतु संदीपक की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।

काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपक के समक्ष प्रकट हो गये और बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है।

बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोलाः."शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।" गुरु ने डाँटाः "वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे! अरे मूर्ख! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।" संदीपक ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया।.शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है!

शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने प्रकटे। संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ नहीं  चाहिए। "भगवान ने आग्रह किया तो बोलाः "आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे।

गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे,.गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे। "भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया। संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन!

शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा ! पुत्र ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।" गुरु के संतोष से संदीपक गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।

अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो,उऩ महापुरुषों का नाम सदगुरु है।

सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाये।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।

👉 The Only Source of Inner Joy

God has set a marvelous interdependence within and between the conscious and the inanimate components of Nature in order to maintain the eternal beauty and harmonious functioning of His grand creation. The uncountable numbers of stars and planets revolving in the limitless Universe are mutually connected by natural forces of attraction. Any break in this connectivity would disturb the maintained equilibrium and stability and result in gigantic collision and devastation of the universal system. The same is true of the mutual affinity of the living beings. Just imagine! If a mother does not have a feeling of love or affection for her child, or there is no binding of love between husband and wife, brother and brother, and other family members, then what will be the state of family institution? Lack of the feelings of affectionate caring, amity, cooperation, etc would ruin the entire social system as the letter is founded on these sentiments and consequent unity of its members. Dry-hearts and cruelty would destroy the sense of beauty from Nature…

A sublime spring of pure love is flowing deep within every heart. If we like to be happy, and prosper in an ambience of peace, we will have to awaken the feeling of love in our heart; this should not be an emotional excitement, rather, a feeling of compassion, generosity, honesty, humility, sensitivity, care and respect for others. Those who adopted this divine attitude on every front of their life are truly religious and followers of God. The world reciprocates to them accordingly.

Every moment, every circumstance is auspicious for them.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1944

👉 विचारक्रान्ति की आवश्यकता एवं उसका स्वरूप

आज की सुविधा, संपन्नता की प्राचीनकाल से तुलना की जाए और मनुष्य के सुख-संतोष को भी दृष्टिगत रखा जाए तो पिछले जमाने की असुविधा भरी परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति अधिक सुखी और संतुष्ट जान पड़ॆंगे। इन पंक्तियों में भौतिक प्रगति तथा साधन-सुविधाओं की अभिवृद्धि को व्यर्थ नहीं बताया जा रहा है, न उनकी निन्दा की जा रही है। कहने का आशय इतना भर है कि परिस्थितियाँ कितनी भी अच्छी और अनुकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के आन्तरिक स्तर में कोई भी सुधार नहीं हुआ है तो सुख-शांति किसी भी उपाय से प्राप्त नहीं की जा सकती है।

सर्वतोमुखी पतन और पराभव के इस संकट का निराकरण करने के लिए एक ही उपाय कारगर हो सकता है। वह है – व्यक्ति और समाज का भावनात्मक परिष्कार। भावना स्तर में अवांछनीयताओं के घुस पड़ने से ही तमाम समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, इन समस्याओं का यदि समाधान करना है तो सुधार की प्रक्रिया भी वहीं से प्रारम्भ करनी पड़ेगी, जहाँ से ये विभीषिकाएं उत्पन्न हुई हैं। अमुक-अमुक समाधान-सामयिक उपचार तो हो सकता है, पर चिरस्थाई समाधान के लिए आधार को ही ठीक करना पड़ता है।

अधर्म का आचरण करने वाले असंयमी, पापी, स्वार्थी, कपटी, धूर्त और दुराचारी लोग शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य एवं धन-संपत्ति, यश-वैभव आदि सब कुछ खो बैठते हैं। उन्हें बाह्य जगत में घृणा और तिरस्कार तथा अंतरात्मा में धिक्कार ही उपलब्ध होते हैं। ऐसे लोग भले ही उपभोग के कुछ साधन इकट्ठे कर लें, पर अनीति का मार्ग अपनाने के कारण उनका रोम-रोम अशांत तथा आत्म-प्रताड़ना की आग में झुलसता रहता है। चारों ओर घृणा, तिरस्कार एवं असहयोग ही मिलता है। आतंक के बल पर यदि वे कुछ पा भी लेते हैं तो उपभोग के पश्चात् उनके लिए विषतुल्य-दुखदायक ही सिद्ध होता है। आत्मशान्ति पाने,  सुसंयमित जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य को धर्ममय जीवनक्रम अपनाने के लिए तत्पर होना पड़ता है। नैतिकता, मानवता एवं कर्तव्यपरायणता को ही अपने जीवन में समाविष्ट करना होता है। इस प्रवृत्ति का व्यापक प्रसार करने के लिए किए गए प्रयत्नों को नैतिक क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है। बुद्ध धर्म के प्रथम मंत्र 'धम्मं शरणं गच्छामि' में इसी नैतिक क्रान्ति की चिनगारी निहित है, इस मंत्र को लोकव्यापी बनाने के लिए जो प्रयत्न बौद्ध धर्मावलम्बियों ने किया था, उसे विशुद्ध नैतिक क्रान्ति ही कहा जएगा।

आज की परिस्थितियां लगभग बुद्धकाल जैसी ही हैं। अनीति, अनाचार, अविवेक आदि दुर्गुण व्यापक जन-मानस में जड़ जमाए बैठे हैं। ऐसी ही विषम बेला में महाकाल की प्रेरणा जाग्रत आत्माओं को झकझोरती है, विशिष्ट आत्माएं ऐसी ही विपन्न परिस्थितियों में अवतरित होकर, लोकव्यापी संगठन खड़ा कर समाधान करने में जुट पड़ती देखी जाती हैं। महाकाल की प्रबल प्रेरणा से जागृत आत्माओं को नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति में संलग्न देखा और समझा जा सकता है। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन की गति विधियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं। समझ लेना चाहिए कि नैतिक क्रान्ति का चक्र तेजी से गतिशील हो गया है और युग परिवर्तन सन्निकट ही है। जनमानस में संव्याप्त निकृष्ट चिन्तन एवं भ्रष्ट आचरण का अब अंत ही समझना चाहिए। मानवी पुरुषार्थ जब संतुलन बनाए रहने में असफल होता है तो व्यवस्था को भगवान स्वयं संभालते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 9 जून 2020

👉 शुभ कर्मों से प्रीति

एक गांव था ! वह ऐसी जगह बसा था... जहाँ आने जाने के लिए एक मात्र साधन नाव थी .... क्योंकि बीच में नदी पड़ती थी और कोई रास्ता भी नहीं था।

एक बार उस गाँव  में महामारी फैल गई और बहुत सी मौते हो गयी... लगभग सभी लोग वहाँ से जा चुके थे...

अब कुछ ही गिने चुने लोग बचें थे और वो नाविक गाँव में बोल कर आ गया था कि मैं इसके बाद नहीं आऊँगा जिसको चलना है वो आ जाये.... सबसे पहले एक भिखारी आ गया और बोला मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है.... मुझे अपने साथ ले चलो... ईश्वर आपका भला करेगा! नाविक सज्जन पुरुष था.... उसने कहा कि यही रुको यदि जगह बचेगी तो तुम्हें मैं ले जाऊँगा....

धीरे -धीरे करके पूरी नाव भर गई सिर्फ एक ही जगह बची ! नाविक भिखारी को बोलने ही वाला था कि एक आवाज आयी रुको मैं भी आ रहा हूँ ....
यह आवाज जमीदार की थी.... जिसका धन-दौलत से लोभ और मोह देख कर उसका परिवार भी उसे छोड़कर जा चुका था.... अब सवाल यह था कि किसे लिया जाए.....

जमीदार ने नाविक से कहा - मेरे पास सोना चांदी है .... मैं तुम्हें दे दूँगा और भिखारी ने हाथ जोड़कर कहा कि भगवान के लिए मुझे ले चलो... नाविक समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ तो उसने फैसला नाव में बैठे सभी लोगों पर छोड़ दिया और वो सब आपस में चर्चा करने लगे.... इधर जमीदार सबको अपने धन का प्रलोभन देता रहा और उसने उस भिखारी को बोला ये सबकुछ तू ले ले.... मैं तेरे हाथ पैर जोड़ता हूँ....मुझे जाने दे !  तो भिखारी ने कहा:- मुझे भी अपनी जान बहुत प्यारी है  अगर मेरी जिंदगी ही नहीं रहेगी   तो मैं इस धन दौलत का क्या करूँगा..? जीवन है तो जहान है!

तो सभी ने मिलकर... ये फैसला किया कि ये जमीदार ने आज तक हमसे लुटा ही है ब्याज पर ब्याज लगाकर हमारी जमीन अपने नाम कर ली.....और माना की ये भिखारी हमसे हमेशा माँगता रहा पर उसके बदले में इसने हमें खूब दुआएं दी और इस तरह भिखारी को साथ में ले लिया गया...!
बस यही फैसला है...  ईश्वर भी वही हमारे साथ  न्याय करता है... जब अंत समय आता हैं ... वो सारे कर्मों का लेखा- जोखा हमारे सामने रख देता हैं और फैसले उसी हिसाब से होते हैं ... फिर रोना गिड़गिगिड़ाना काम नहीं आता !  शुभ कर्म ही साथ  होते है...

इसलिए अभी भी वक्त है- हमारे पास सम्भलने का....और शुभ कर्म करने का..... बाद में कुछ नहीं होगा...  शायद इसलिए कहा गया है.. अब पछताय क्या जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत....

👉 ‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ सूत्र का शुभारम्भ (भाग ३)

युग परिवर्तन या व्यक्ति परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत दृष्टिकोण और समाजगत प्रवाह प्रचलन को बदलने की बात कही जाती है। उसे समन्वित रूप से एक शब्द में कहा जाय तो प्रवृत्तियों का परिवर्तन भी कह सकते हैं। लोग आज जिस तरह सोचते, चाहते, मानते और करते है उसके उद्गम केन्द्र में ऐसे हेरफेर की आवश्यकता है जिससे सड़े गले ढर्रें का परित्याग और शालीनता का अवलम्बन संभव हो सके। इसके लिए क्या करना होगा? उसे भी संक्षेप में कहा जा सकता है। इसके लिए तीन सिद्धान्त सूत्रों को समझने अपनाने भर से काम चल जायेगा।

एक यह कि निर्वाह में संयम सादगी का इतना समावेश किया जाय जिसे औसत नागरिक स्तर का और शरीर यात्रा के लिए अनिवार्य कहा जा सके।

दूसरा यह कि सादगी अपनाने के उपरान्त जो क्षमता सम्पदा बचती है उसे सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए, नव निर्माण के लिए समयदान, अंशदान के रूप में अधिकाधिक उदार उत्साह के साथ समर्पित किया जाय।

तीसरा यह कि अन्तरंग और बहिरंग दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ फेंकने के लिए साहसिक शौर्य पराक्रम के साथ संघर्ष  किया जाय।

इन तीनों सत्प्रवृत्तियों को प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों का स्थानापन्न बनाया जा सके तो समझना चाहिए कि निकृष्टता के दलदल से उबरने और उज्ज्वल भविष्य का नव सृजन कर सकने वाला राजमार्ग हस्तगत हो गया। इतने भर हेरफेर से युग परिवर्तन का सुनिश्चित आधार बन सकता है और हम नरक से उबर कर स्वर्ग में अपने ही पुरुषार्थ से प्रवेश करने में सफल हो सकते हैें।

इन दिनों विलास, संग्रह और अहंता की ललक लिप्सा हर किसी पर उन्मादी आवेश की तरह छाई हुई है। वासना, तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ किसी को सूझता नहीं। संकीर्ण स्वार्थ परता और अहमन्यता के लिए कोई कुछ भी करने को तैयार है। लगता है मानों औचित्य और विवेक को तिलाञ्जलि दे दी गई हो। यह ढर्रा जब तक चिन्तन और व्यवहार में इसी प्रकार घुसा रहेगा तब तक सर्वत्र हुई विपन्नता से छुटकारा पाना कठिन है। परिवर्तन अन्तरंग में हो सका तो बहिरंग परिस्थितियों के बदलने में संदेह की गुंजायश ही न रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 You are standing in the Middle

You are standing in the middle of the cosmic layer of God’s creation. At the higher realms are the great saints, Siddhas, angels and incarnations of divine powers. Beneath your level of existence are the animals, birds, insects and lower organisms. Those above are enjoying in the divine paradise and those below are suffering in various forms. You, the human being are the only one allowed to share both the joys and the pains. You are also the only one privileged with the freedom of action to transform your fate accordingly. It’s up to you whether you want to move your life-course downwards or upwards and destine its devolution to the lower, beastly forms or evolution to beatified, illumined states…

If you chose to decline then don’t care for anything. Just eat, rest and live for sensual joys. Earn these joys by whatever means – ethical or unethical. It’s really easy to fall down. You can spend all your stock of good omen for petty pleasures or drain it out by adopting heinous actions. But then there will be nothing but repenting and darkness…

If you want to rise high on the celestial scale of evolution of your life, you will have to distinguish between the right and the wrong, truth and false, fair and unfair, and choose the righteous path of wisdom and ideals. Climbing up on the higher mountains is harder, but then, your endeavors will lead to greater achievements in the end. If you bear hardships for adoption of high ideals, you are indeed elevating your life towards brighter ends.

You are the architect of your future destiny. Life is momentary. So don’t miss any instant of this precious opportunity. You are in the middle. You can see both ways upwards and downwards and select the future course of your life prudently.

📖 Akhand Jyoti, Nov. 1943
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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