शनिवार, 18 अप्रैल 2020

👉 प्रश्न

प्रश्न मन की लहरों के साथ उपजते हैं। मन की हर हिलोर-प्रत्येक लहर एक नया प्रश्न खड़ा करती है। जीवन की प्रत्येक घटना जो मन को स्पन्दित करती है, अनायास ही नये प्रश्न अथवा नए प्रश्नों को जन्म दे देती है। इसी तरह परिस्थितियाँ व परिवेश की हलचलें जो विचार व भावों में लहरें पैदा करने में समर्थ हैं, स्वाभाविक ही अन्तर्चेतना में प्रश्नों को जन्म देती हैं। यह क्रम न तो रुकता है न थमता है, बस नित्य-निरन्तर-अविराम चलता रहता है।
  
प्रत्येक प्रश्न मन के मौन को तोड़ता है। मन में अशान्ति, बेचैनी व तनाव को जन्म देता है। ये प्रश्न जितने अधिक, जितने गहरे व जितने व्यापक होते हैं, मन की अशान्ति, बेचैनी व तनाव भी उतना ही ज्यादा, गहरा, घना व व्यापक होता जाता है। इसी अशान्ति, बेचैनी व तनाव में मन अपनी ही कोख में उपजे प्रश्न या प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता है। उसे अपने इस प्रयास में सफलता भी मिलती है। उत्तर मिलते भी हैं, पर नए प्रश्नों के साथ। न जाने क्यों, बिना चाहे और बिना जाने हर उत्तर के साथ कोई न कोई प्रश्न चिपक ही जाता है।
  
साथ ही बढ़ जाती है, मन की बेचैनी व अशान्ति। क्योंकि जो भी घटना फिर वह चाहे प्रश्न की हो या उत्तर की मन में लहरें व हिलोरें पैदा करेंगी, मन को तनाव, बेचैनी व अशान्ति से ही भरेगी। इस समस्या का समाधान तभी है, जब मन की लहरें मिटें, हिलोरें हटें। फिर न कोई प्रश्न उभरेंगे और किसी उत्तर की खोज होगी। इसके लिए मन को मौन होना होगा। केवल तभी चेतना प्रश्नों के पार जा पाएगी। तभी यह समझ में आएगा कि पूछने को कुछ नहीं है, उत्तर पाने को कुछ नहीं है। इसी को समाधि कहते हैं। जहाँ सभी प्रश्न स्वाभाविक ही गिर जाते हैं। जहाँ बेचैनी, अशान्ति, तनाव अपने आप ही मिट जाता है। बस बनी रहती है तो केवल प्रश्न विहीन अमिट शान्ति।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१६

👉 आत्म-चिंतन की साधना

रात को सब कार्यों से निवृत होकर जब सोने का समय हो तो सीधे चित्त लेट जाइये। पैर सीधे फैला दीजिए, हाथों को मोड़कर पेट पर रख लीजिए। सिर सीधा रहे। पास में दीपक या लाइट जल ररही हो तो बुझा दीजिए या मंद कर दीजिए। नेत्रों को अधखुला कर रखिए।

अनुभव कीजिए कि आपका आज का एक दिन एक जीवन था। अब जबकि एक दिन समाप्त हो रहा हैं तो एक जीवन की इतिश्री हो रही हैं। निद्रा एक मृत्यु हैं। अब इस घडी में एक दैनिक जीवन को समाप्त करके मृत्यु की गॉद में जा रहा हूँ।

आज के जीवन की आध्यात्मिक द्रष्टि से समलोचना कीजिए। प्रात:काल से लेकर सोते समय तक के कार्यों पर द्रष्टिपात कीजिए। मुझ आत्मा के लिए वह कार्य उचित था या अनुचित? यह उचित था तो उतनी सावधानी एवं शक्ति के साथ उसे करना चाहिए था उसके अनुसार किया या नहीं। बहुमूल्य समय का कितना भाग उचित रीति से व्यतीत क्या? वह दैनिक जीवन सफल रहा या असफल? आत्मिक पूँजी में लाभ हुआ या घाटा? सद्-वृत्तियाँ प्रधान रहीं या असद्-वृत्तियाँ? इस प्रकार के प्रश्नों के साथ दिनभर के कार्यों का भी निरीक्षण कीजिए।

जितना अनुचित हुआ हो उसके लिए आत्म-देव के सम्मुख पश्चाताप हैं। जो उचित हुआ हो उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आगामी जीवन में, उस दिशा में विशेष रूप से अग्रसर करें। इसके पश्चात् शुभ वर्ण आत्म-ज्योति का ध्यान करते हुए निद्रा देवी की गॉद में सुखपूर्वक चले जाइए।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

👉 शरणागति


👉 "आंतरिक सामर्थ्य ही सांथ देगी"

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

"तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी।

भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।"

अखण्ड ज्योति मई, 1969

👉 भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा

इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचण्ड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही बलिष्ठ समझता है। जो जितना सम्पन्न और धूर्त है, वह अपनी शेखी उसी अनुपात से धारता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशों को डराता और फुसलाता भी है। यही क्रम इन दिनों चलता रहा है, किन्तु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा। परिस्थितियां इस प्रकार करवटें लेंगी कि जो पिछले दिनों होता रहा है अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति ही सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैब बल जनसमुदाय को आकर्षित, प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नयी शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। यों प्राचीन काल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।

बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।

समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1987 पृष्ठ 58

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 15 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 15 April 2020


👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 April 2020

अपने माता-पिता गुरुजनों आदि के साथ उन पर एहसान चढ़ाने वाली भाषा न बोलें।

जीवन में अनेक बार व्यक्तियों का आपस में टकराव हो जाता है। माता-पिता के साथ, गुरुजनों के साथ, मित्रों के साथ, पड़ोसियों के साथ, व्यापारियों और ग्राहकों के साथ इत्यादि , अनेक जगह पर टकराव हो जाता है। कभी-कभी यह टकराव, गलतियों के कारण होता है, और कभी-कभी एक दूसरे के व्यवहार को ठीक तरह से न समझने के कारण, भ्रांतियों से भी ऐसा टकराव हो जाता है।

यह टकराव हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, स्वाभाविक है। क्योंकि सभी लोग अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान् हैं। अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान होने के कारण अनेक बार भूल चूक हो जाती है। गलतियां हो जाती हैं। किसी भी व्यक्ति से हो सकती हैं। केवल परमात्मा ही एक ऐसा तत्व है जो कभी गलती नहीं करता. उसे छोड़ कर सभी से कुछ न कुछ छोटी बड़ी गलतियां हो जाती हैं।

जब कभी ऐसी गलतियां हो जाएं, तो आपस में लड़ाई झगड़ा आरोप प्रत्यारोप इत्यादि का व्यवहार नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से अपने माता-पिता और गुरुजनों के साथ तो ऐसा झगड़ा कभी भी नहीं करना चाहिए।

चाहे आप प्रधानमंत्री पद पर भी क्यों न पहुंच जाएं, तब भी आप अपने माता-पिता के सामने तो छोटे ही रहेंगे। क्योंकि आपको उनके ही आशीर्वाद से सेवा से प्रशिक्षण से अनेक प्रकार के सहयोग से ऊंची ऊंची योग्यताएं प्राप्त हुई हैं। इसलिए उनके साथ सदा नम्रता का व्यवहार रखना चाहिए। जैसा कि आजकल हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी अपनी माता जी के चरण स्पर्श करते और उनका आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ रहे हैं। यह बात सबको मालूम है.

जब हम सब अल्पज्ञ हैं, गलतियाँ होनी संभव हैं, तो बड़ी नम्रता से अपनी गलतियाँ स्वीकार कर लेनी चाहिएँ,  और समस्याओं को निपटा देना चाहिए। बड़े बुजुर्गों के साथ असभ्यतापूर्ण या एहसान चढ़ाने वाली भाषा न बोलें, कि मैंने आपके लिए यह काम किया, वह काम किया, और आपने मेरे साथ यह किया, यह ठीक नहीं किया इत्यादि। बड़ों के साथ ऐसा व्यवहार करना असभ्यता है। इस प्रकार की असभ्यता नहीं करनी चाहिए।

इसलिए कभी माता पिता या गुरुजनों के साथ टकराव हो भी जाए, तो उनके उपकारों को याद रखें, और उनके साथ नम्रता पूर्वक ही व्यवहार करें। गलतियाँ हो जाने पर आपस में मिल बैठकर शांति से उन्हें सुलझा लेना चाहिए। यदि आपस में न सुलझे, तो किसी अन्य बुद्धिमान परिवार के अनुभवी बुजुर्ग अथवा किसी विद्वान की सहायता से उस समस्या को सुलझा लेना चाहिए। इससे आपका परिवार संगठित व्यवस्थित सुखी और संपन्न बना रहेगा । अन्यथा आपका परिवार कुछ ही समय में आपसी भ्रांतियों के कारण नष्ट हो जाएगा

👉 पीड़ा और प्रार्थना

पीड़ा और प्रार्थना में गहरा सम्बन्ध है। पीड़ा का अनुभव सकारात्मक हो, दृष्टिकोंण रचनात्मक हो तो पीड़ा स्वतः ही प्रार्थना बन जाती है। ऐसा न हो तो हर पीड़ा- निषेध व नकारात्मक दृष्टिकोंण के जाल में उलझ-फँस कर कभी वैर बनती है तो कभी द्वेष बन जाती है। इतना ही नहीं, ज्यादातर दशाओं में यह वैर-द्वेष के साथ मन को सन्ताप देने वाला विषम-विषाद बन जाती है। जीवन को अवसन्न करने वाला अवसाद बन जाती है।
  
पीड़ा का अनुभव सकारात्मक होने का मतलब है अन्तर्मन में प्रभु प्रेम उपस्थित होना। भगवान् के मंगलमय विधान में गहरी आस्था होना। ऐसा हो तो जीवन की पीड़ाएँ-दर्द का उन्माद जगाने की बजाय प्रार्थना को जन्म देती हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ा जितनी गहरी होती है, प्रार्थना उतनी ही घनीभूत होती जाती है। पीड़ा के क्षणों में मन स्वाभाविक रूप से भगवान् के समीप सरकने लगता है। सच तो यह है कि यदि पीड़ा दर्द है, तो प्रार्थना उसकी दवा है।
  
पीड़ा और प्रार्थना का यही मिलन तप है। तपश्चर्या का अर्थ धूप में खड़ा हो जाना नहीं है, न भूखे रहकर उपवास करना है। तपश्चर्या का सही अर्थ जीवन के पीड़ादायक क्षणों में भगवान् के भाव भरे स्मरण, सर्वस्व समर्पण व उनमें ही लीन होना है। यथार्थ तप है- जीवन के खालीपन की पीड़ा को उसकी समग्रता में अनुभव करना, जीवन की अर्थहीनता को उसकी पूरी त्वरा में अनुभव करना। जीवन की यह बेकार भागदौड़ जिसको अभी बड़ी उपयोगी समझते हैं, यदि अचानक यह निरर्थक लगने लगे तो बड़ी घबराहट होगी। गहरी पीड़ा पनपेगी। इस पीड़ा को झेलने का नाम, इसे भगवान् के प्रेम व स्मरण तथा समर्पण में भीग कर सहने का नाम है तपश्चर्या। पीड़ा व प्रार्थना का अद्भुत मिलन, जिसके भी जीवन में आता है, उसका जीवन स्वाभाविक ही रूपान्तरित हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१५

👉 Darkness to Light

Truth! Truth!! Truth!!! What a force and impact this word carries that even uttering this word seems to sooth the tongue, thought of it itself gives some light to the mind and feeling of it rejuvenates the heart. The transition from falsehood to truth is an ascent from filthy mire to pious skies, a transmutation from beastly instincts, devilish darkness to divine virtues and eternal light.

Truth is absolute, eternal. God is Truth, the Soul is Truth, God’s creation of Nature is Truth; Truth is Omnipresent. It is the ultimate goal of life; truth is the ceaseless perennial quest of the individual self, for which it takes birth, life after life, Age after Age… This life is bestowed upon us as yet another opportunity to realize the ultimate truth and savor the nectar of infinite bliss.

It is pitiable that we remain ignorant of this fact that – what we think of the world around (and die hunting for the mirage of joy in it) is not true; it is nothing but the image of our own perception. Once you understand this fact, you will turn towards truth. You will become a follower of Truth; it will be your ideal; an integral part of your character. “Truth” will then show you the divine radiance of your inner self.

If every word, every deed of yours is truthful, the world will truthfully honor you and you will inspire many others towards its noble path. The Vedic teaching reminds all of us to follows the path of truth – “Asato Ma Sadgamaya”, as this is the only source of auspicious welfare of all…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

👉 मांस का मूल्य

मगध सम्राट् बिंन्दुसार ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा :- देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है...? मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आद तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता.. शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है.....उसने मुस्कुराते हुऐ कहा :- राजन्... सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।

सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री आचार्य चाणक्य चुप रहे। सम्राट ने उससे पुछा : आप चुप क्यों हो? आपका इस बारे में क्या मत है? चाणक्य ने कहा : यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है...., एकदम गलत है, मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूँगा....रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।

चाणक्य ने द्वार खटखटाया....सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा? प्रधानमंत्री ने कहा :-संध्या को महाराज एकाएक बीमार हो गए है उनकी हालत नाजूक है राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते है....आप महाराज के विश्वास पात्र सामन्त है। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहे, ले सकते है। कहे तो लाख स्वर्ण मुद्राऐं दे सकता हूँ.....। यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फिका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राऐं किस काम की?

उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजोरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राऐं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राऐं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामन्तों, सेनाधिकारीयों के द्वार पर पहुँचे और सभी से राजा के लिऐ हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ....सभी ने अपने बचाव के लिऐ प्रधानमंत्री को दस हजार, एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख तक स्वर्ण मुद्राऐं दे दी। इस प्रकार करोडो स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुँच गऐ और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं रख दी....!

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है....? यह मुद्राऐं किसलिऐ है? प्रधानमंत्री चाणक्य ने सारा हाल सुनाया और बोले: दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। अपनी जान बचाने के लिऐ सामन्तों ने ये मुद्राऐं दी है। राजन अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है....??

जीवन अमूल्य है।
हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को प्यारी होती है..! इस धरती पर हर किसी को स्वेछा से जीने का अधिकार है... 🦆 🦐

👉 संयुक्त रहने का लाभ


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 14 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 14 April 2020


👉 विनाश नहीं सृजन होने जा रहा है

वैज्ञानिक, राजनेता, भविष्यवक्ता, अन्वेषक अपने-अपने तर्क और तथ्य आगे रखकर यह प्रमाणित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि महाविनाश में अब उँगलियों पर गिनने जितने समय को देर है किसी सीमा तक उठे हुए कदम अब वापस नहीं लौटेंगे। इन प्रवक्ताओं के कथन अनुमान, विश्लेषण पर कोई आक्षेप न करते हुए हमें यह पूरी हिम्मत के साथ कहने ही छूट मिली है कि आतंक के समय रहते शान्त होने की भविष्यवाणी करें और जन साधारण से कहें कि विकसित होने की अपेक्षा सृजन की बात सोचें। दुनिया यह नहीं रहेगी जो आज है। उसकी मान्यताएं, भावनाएं, विचारणाएं। आकांक्षाएं ही नहीं, गतिविधियाँ भी इस तरह बदलेंगी कि सब कुछ नया-नया प्रतीत होने लगे।

आज से पाँच सौ वर्ष पुराना कोई मनुष्य कहीं जीवित हो और आकर अबकी भौतिक प्रगति के दृश्य देखे तो उसे आश्चर्यचकित होकर रह जाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि यह उसके जानने वाली दुनिया नहीं रही। यह तो भूतो की बस्ती जैसी बन गई है। सचमुच पिछले दिनों बुद्धिवाद और भौतिकवाद की सम्मिलित संरचना हुई भी ऐसी ही है जिसे असाधारण अद्भुत, अनुपम और आश्चर्यजनक परिवर्तन कहा जा सके।

ठीक इसी के समतुल्य दूसरा परिवर्तन होने जा रहा है। उसके लिए पाँच सौ वर्ष प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इस नये परिवर्तन के लिए एक शताब्दी पर्याप्त है। आज की चकाचौंध जैसी परिस्थितियाँ और आसुरी मायाचार जैसी समस्याएँ अब इन दिनों भयावह लगती है और उनके चलते प्रवाह को देखकर लगता है कि सूर्य अस्त हो चला और निविड़ निशा से भरा अंधकार अति समीप आ पहुँचा पर ऐसा होगा नहीं। यह ग्रहण की युति है। बदली की छाया है, जिसे हटा देने वाले प्रचंड आधार विद्यमान भी हैं और गतिशील भी। लंका काण्ड की नृशंसता के उपरान्त रामराज्य का सतयुग वापस आया था। वैसी ही पुनरावृत्ति की हम अपेक्षा कर सकते हैं।

विनाश की सोचते और चेष्टा करते हुए मनुष्य का बुद्धि संसार थक जायेगा और वैभव के साधन स्रोत सूख जायेंगे। उन्हें नये सिरे से नई बातें सोचनी पड़ेगी कि प्रवाह की इस दिशा को उलट दिया जाय और उपलब्ध साधनों को सृजन के लिए लगाया जाय। ऊपर से पड़ने वाले दबाव ऐसी ही उलट फेर संभव करेंगे। उनने उलटे को उलट कर सीधा करने का निश्चय कर लिया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986 पृष्ठ 19-20

👉 Look Introvert for Peace

If you are looking for introvert peace, you must follow the path to spirituality. For this you must turn your extrovert sight inwardly. A bewildered fellow deluded and tired of wandering in the hazy mist of external world, finds immense peace and light in the inner world.

When we understand the illusory nature of the gamut of things and activities in the world around and get introvert, ponder over our inner self, only then we realize that we had lost our way all these days; our cravings, materialistic needs and passions were driving our life and we were running behind the mirage of happiness. But nor we know that nothing can ever satisfy the passions, no one can ever fulfill his ambitions. Attempting to do so is like pouring petrol in fire. Thus, instead of running behind the shadow to catch it, we must turn our back to it. Having a glimpse of the inner treasure detaches us from the perishable pennies for which we had been wasting all our potentials and time. Introvert search takes us near the God and shows the key to infinite joy and peace.

Once we know our real self, grasp the reality of the world, and see the inner light, the nectar-spring of unprecedented peace erupts from within and extinguishes the flames of discontent, desperations and tensions forever. With the rise of the feeling of true fulfillment, there hardly remains any worldly need or desire; every thing in hand or gifted by Nature for survival suffices and every
circumstance becomes a source of expanding you.

📖 Akhand Jyoti, March. 1941

👉 शाश्वत नियम

वसन्त आती है, चली जाती है। पतझड़ आती है, चली जाती है। सुख आते हैं, चले जाते हैं। दुःख आते हैं, चले जाते हैं। सुख और दुःख का आना-जाना ठीक वसन्त व पतझड़ के आने व जाने की तरह है। आना और जाना यही इस जगत् का शाश्वत नियम है। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन क्रमशः बन्धनों से मुक्त होने लगता है।
  
एक अँधियारी रात में कोई प्रौढ़ व्यक्ति नदी के तट से कूदकर आत्महत्या करने पर विचार कर रहा था। मूसलाधार बारिश थी, नदी पूरे बाढ़ पर थी। आकाश में घने बादल छाए हुए थे, बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। वह उस क्षेत्र का सबसे धनी व्यक्ति था। लेकिन अचानक घाटे में उसकी सारी सम्पदा चली गयी। इसी वजह से वह आत्महत्या का निश्चय करके यहाँ आया था। लेकिन वह नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के किनारे पहुँचने को हुआ, कि किन्हीं दो वृद्ध, परन्तु मजबूत हाथों ने उसे थाम लिया। तभी बिजली चमकी और उसने देखा कि आचार्य रामानुज उसे पकड़े हुए हैं।
  
उन्होंने उससे इस अवसाद का कारण पूछा और सारी कथा सुनकर वह हँसने लगे और बोले, तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे? वह बोला- हाँ तब मेरे सौभाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था और अब सिवाय अंधियारे के मेरे जीवन में और कुछ भी बाकी नहीं है। यह सुनकर आचार्य रामानुज फिर से हँस पड़े और बोले, दिन के बाद रात्रि और रात्रि के बाद दिन। जब दिन नहीं टिका तो रात्रि कैसे टिकेगी? परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भाँति हो जाता है, जो वर्षा व धूप में समान ही बनी रहती है।

सुख व दुःख को जो समभाव से ले, समझो कि उसने जीवन के शाश्वत नियम को जान लिया। इस शाश्वत नियम की अनुभूति करने वाला, एक दिन स्वयं को भी जान लेता है। क्योंकि समत्व में ठहर जाना ही स्वयं के अस्तित्त्व में प्रतिष्ठित होना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१४

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

👉 मन की तृप्ति

लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई मे लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की माताजी कुछ पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं .. उनकी कमर झुकी हुई थी,. चेहरे की झुर्रियों मे भूख तैर रही थी .. आंखें भीतर को धंसी हुई किन्तु सजल थीं .. उनको देखकर मन मे ना जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया ..

"दादी लस्सी पिहौ का ? "
मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक .. क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 2-4-5 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 35 रुपए की एक है .. इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उन दादी के मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी!

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए .. मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा ..
"ये काहे के लिए ?"
" इनका मिलाई के पियाइ देओ पूत ! "

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था .. रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी !
एकाएक आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा .. उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं ...

अब मुझे वास्तविकता मे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने ही दोस्तों और अन्य कई ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए ना कह सका !

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे .. कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर मे बैठ जाने पर आपत्ति ना हो .. लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी ..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम लोगों के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पड़ोस मे ही जमीन पर बैठ गया।

क्योंकि ये करने के लिए मैं स्वतंत्र था .. इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती .. हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा.. लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बिठाया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा ..
"ऊपर बैठ जाइए साहब! "

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर मुस्कुराहट थी
बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसूं .. होंठों पर मलाई के कुछ अंश और सैकड़ों दुआएं थीं
ना जाने क्यों जब कभी हमें 10-20-50 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कभी कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

दोस्तों.. जब कभी अवसर मिले अच्छे काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ ना दे.. !!

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 13 April 2020


👉 In the Shrine of the Heart

Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs
and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.

The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

📖 Akhand Jyoti, March. 1941

👉 परिवर्तन की घड़ियाँ आ रही है

प्रजातन्त्र के नाम पर चलने वाली धाँधली में कटौती होगी। बोट उपयुक्त व्यक्ति ही दे सकेंगे। अफसरों के स्थान पर पंचायतें शासन सम्भालेंगी और जन सहयोग से ऐसे प्रयास चल पड़ेंगे जिनकी कि इन दिनों सरकार पर ही निर्भरता रहती है। नया नेतृत्व उभरेगा। इन दिनों धर्म क्षेत्र के और राजनीति के लोग ही समाज का नेतृत्व करते हैं। अगले दिनों मनीषियों की एक नई बिरादरी का उदय होगा जो देश, जति, वर्ग आदि के नाम पर विभाजित वर्तमान समुदाय को विश्व नागरिक स्तर की मान्यता अपनाने विश्व परिवार बनाकर रहने के लिए सहमत करेंगे। तब विग्रह नहीं, हर किसी पर सृजन और सहकार सवार होगा।

विश्व परिवार की भावना दिन-दिन जोर पकड़ेगी और एक दिन वह समय आवेगा जब विश्व राष्ट्र, आबद्ध विश्व नागरिक बिना आपस में टकराये प्रेम पूर्वक रहेंगे। मिल-जुलकर आगे बढ़ेंगे और वह परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे जिसे पुरातन सतयुग के समतुल्य कहा जा सके।

इसके लिए नव सृजन का उत्साह उभरेगा। नये लोग नये परिवेश में आगे आयेंगे। ऐसे लोग जिनकी पिछले दिनों कोई चर्चा तक न थी, वे इस तत्परता से बागडोर संभालेंगे मानो वे इसी प्रयोजन के लिए कहीं ऊपर आसमान से उतरे हों या धरती फोड़ कर निकले हों।

यह हमारे स्वप्नों का संसार है। इनके पीछे कल्पनाएँ अटकलें काम नहीं कर रही हैं वरन् अदृश्य जगत में चल रही हलचलों का देखकर इस प्रकार का आभास मिलता है जिसे हम सत्य के अधिकतम निकट देख रहे हैं।

दूसरों को विनाश दीखता है, सो ठीक है, परिस्थितियों का जायजा लेकर निष्कर्ष निकालने वाली बुद्धि को भी झुठलाया नहीं जा सकता। विनाश की भविष्यवाणियों में सत्य भी है और तथ्य भी। पर हम आभास और विश्वास को क्या कहें। जो कहता है कि समय बदलेगा। घटाटोप की तरह घुमड़ने वाले काले मेघ किसी प्रचण्ड तूफान की चपेट से आकर उड़ते हुए कहीं से कहीं चले जायेंगे।

सघन तमिस्रा का अन्त होगा। ऊषाकाल के साथ उभारता हुआ अरुणोदय अपनी प्रखरता का परिचय देगा। जिन्हें तमिस्रा चिरस्थायी लगती हो, वे अपने ढंग से सोचें, पर हमारा दिव्य दर्शन, उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। लगता है इस पुण्य प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियाँ प्राण-पण से जुट गयी हैं। इसी सृजन प्रयास के एक अकिंचन घटक के रूप में हमें भी कुछ कारगर अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। इस सुयोग्य सौभाग्य पर हमें अतीव सन्तोष है और असाधारण आनन्द।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1984 पृष्ठ 18

👉 जीवन साधना

जीवन साधना के सत्य व तत्त्व को जान लेना जरूरी है। यह जानना अनिवार्य है कि जीवन साधना का बीज क्या है और फल क्या है? प्रारम्भ व परिणाम की पहचान हो जाना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है। कारण व कार्य के अन्तर्सम्बन्ध को बिना जाने जो चलता है, वह भूल करता है। केवल चल पड़ना और चलते चले जाना काफी नहीं है। चलने के साथ दिशा का सम्यक् ज्ञान भी होना चाहिए। इसी तरह जीवन साधना करने के साथ साधना विधि का सम्यक् बोध भी आवश्यक है।

    
जीवन साधना में परिधिगत होने के साथ कुछ केन्द्रीय भी है। प्रयास केन्द्र पर हो तो परिधि स्वयं ही सम्हल जाती है। उसे अलग से सम्हालने की कोई जरूरत नहीं है। केन्द्र ही परिधि में प्रकट होता रहता है। इस सन्दर्भ में केन्द्र क्या है? परिधि क्या है? ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इन सवालों का सटीक जवाब यह है कि सद्ज्ञान केन्द्र है सदाचार परिधि है। सद्ज्ञान प्रारम्भ है, सदाचरण परिणाम है। सद्ज्ञान बीज है, सदाचार फल है।
    
ध्यान रहे सदाचरण अज्ञान में पैदा नहीं किया जा सकता। पैदा किया हुआ सदाचार सही सदाचार नहीं है। यह तो बस मिथ्या आवरण है। जिसके तले दुराचार दब जाता है। अँधेरे को दबाना, छिपाना नहीं है, उसे मिटाना है। दुराचार पर सदाचार के कागजी फूल नहीं चिपकाने हैं, उसे हटाना है, मिटाना है। सदाचार नहीं सद्ज्ञान लाना है। सद्ज्ञान स्वयं ही सदाचार बनकर समूचे जीवन पर छा जाता है।

सद्ज्ञान की साधना ही यथार्थ जीवन साधना है। सद्ज्ञान सर्व को प्रकाशित करता है। सद्ज्ञान के उदय से स्वयं ही अज्ञान एवं मोह का अँधेरा मिट जाता है। उससे ही राग व द्वेष नष्ट हो जाते हैं। इसी से जीवन में सचादार के फूल खिलते हैं। जिनकी सुगन्धि का विस्तार व्यक्ति एवं व्यक्तित्व दोनों को प्रकाशित करता है। साथ ही जीवन साधना करने वाला साधक शुद्ध, बुद्ध एवं मुक्त हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१३

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

👉 कौन थी शबरी

शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है। वह भीलराज की अकेली पुत्री थी। जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी। विवाह मैं उनके होने वाले पति ने अनेक जानवरों को मारने के लिए मंगवाया। इससे दुखी होकर उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया। फिर वह अपने पिता का घर त्यागकर जंगल मैं चली गई और वहाँ ऋषि मतंग के आश्रम मैं शरण ली। ऋषि मतंग ने उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार कर लिया। इसका भारी विरोध हुआ। दूसरे ऋषि इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि किसी निम्न जाति की स्त्री को कोई ऋषि अपनी शिष्या बनाये। ऋषि मतंग ने इस विरोध की परवाह नहीं की।

ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें। उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे।

ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन मैं लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं। लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती। उनकी आंखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं। और एक दिन प्रभु राम उनके दरवाजे पर आ गए।

शबरी धन्य हो गयीं। उनका ध्यान और विश्वास उनके इष्टदेव को उनके द्वार तक खींच लाया। भगवान् भक्त के वश मैं हैं यह उन्होंने साबित कर दिखाया। उन्होंने प्रभु राम को अपने झूठे फल खिलाये और दयामय प्रभु ने उन्हें स्वाद लेकर खाया। फ़िर वह प्रभु के आदेशानुसार प्रभुधाम को चली गयीं।

शबरी की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? आइये इस पर विचार करें।
कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता। व्यक्ति के कर्म उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं। हम किस परिवार मैं जन्म लेंगे इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं हैं पर हम क्या कर्म करें इस पर हमारा पूरा अधिकार है। जिस काम पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं हैं वह हमारी जाति का कारण कैसे हो सकता है। व्यक्ति की जाति उसके कर्म से ही तय होती है, ऐसा भगवान् ख़ुद कहते हैं।

कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता।

प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया। भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है। प्रभु राम ने कहा की हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ। तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तम्हारे द्वार पर लेकर आया है।

👉 परिवर्तन जो होकर रहेगा

सर्वनाश से पूर्व ही मनुष्य संभल जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर इसके अगणित प्रमाण विद्यमान है। इस बार भी ऐसा ही होना है। अणुयुद्ध, प्रदूषण, प्रजनन, विस्फोट, पूँजी का एकत्रीकरण, अपराधों का अभिवर्धन, प्रमाद और विलास का विस्तार जैसी अनेकों समस्याऐं औद्योगिक क्रान्ति की देन है। इसे इस रूप में नहीं चलना है जैसे अब तक चलती रही है। कटु अनुभव को बार-बार दुहराते नहीं रहा जा सकता।

अगले दिनों महान परिवर्तन की प्रक्रिया प्रचण्ड होगी। उसे दैवी निर्धारण, साँस्कृतिक पुनरुत्थान, विचार क्रान्ति आदि भी कहा जा सकता है, पर वह होगी वस्तुतः समाजक्रान्ति ही। समाज, जन समुदाय को एक सूत्र में बाँधे रहने वाली व्यवस्था को कहते हैं। यह व्यवस्था बदलेगी तो प्रचलन और स्वभावों में समान रूप से एक साथ परिवर्तन प्रस्तुत होंगे।

व्यक्ति सादगी सीखेगा। सरल बनेगा और सन्तोषी रहेगा। श्रमशीलता गौरवास्पद बनेगी। हिल−मिलकर रहने की सहकारिता और मिल बाँटकर खाने की उदारता बदले हुए स्वभाव की विशेषता होगी। महत्त्वाकाँक्षाएँ उद्विग्न न करेंगी। उद्धत प्रदर्शन का अहंकार तब बड़प्पन का नहीं पिछड़ेपन का चिन्ह समझा जायेगा। विलासी और संग्रही भी अपराधियों की पंक्ति में खड़े किये जायेंगे और उन्हें सराहा नहीं दबाया जाएगा।  कुटिलता अपनाने की गुंजाइश जागृत एवं परिवर्तित समाज में रहेगी ही नहीं। छद्म आवरणों को उघाड़ने में ऐसा ही उत्साह उभरेगा जैसा कि इन दिनों विनोद मंचों के निमित्त पाया जाता है।

इन दिनों अधिक कमाने, अधिक उड़ाने और ठाट-बाट दिखाने की जिस दुष्प्रवृत्ति का बोलबाला है उसे भविष्य में अमान्य ही नहीं, हेय भी ठहरा दिया जायेगा। थोड़े में निर्वाह होने से कम समय में उपार्जन के साधन जुट जायेंगे। बचा हुआ समय तब आलस्य-प्रमाद में नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा करेगा। सार्वजनिक सुव्यवस्था और मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले तब ऐसे अनेकानेक कार्य सामने होंगे जिनमें व्यस्त रहते हुए व्यक्ति हर घड़ी प्रसन्नता, प्रगति और सुसम्पन्नता का अनुभव करता रहें।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1984 पृष्ठ 59

👉 Watch Your Attitude

To most of us the hardships, adversities and challenges of life seem to be intractable like gigantic mountains, dreadful like wild giants, and frightening like impenetrable darkness. But this is all subject to how we take them. In reality nothing is so hard or to tackle; it is mostly our delusion that regards it so and suffers the pains and fears.

Just change your attitude and you will find hope, courage and enthusiasm in all circumstances. Don’t lose your morale that you failed in your repeated attempts. Don’t worry. There are many other avenues. Look at them. There is no dead-end to trying harder again with better preparation. Move ahead. You just have to try your level best in transacting your duties. Every sincere effort is a step towards the goal; if not today, tomorrow you will succeed. This is the law of Nature.

There is always certain consequence, some result of every action. Don’t feel helpless. Don’t count upon other’s support. No one really would have the capacity to help you if you can’t help yourself. Never blame anyone for anything wrong or harmful happening to you. Because no one can rule over you and make you suffer. You alone are the friend and the enemy of yourself. The circumstances around you are in fact your own creation. They are neither supportive nor obstructive in reality; this all depends upon your own attitude, how you accept and make use of them.

Refine your attitude, your thinking and your aspirations and let virtuous instincts awaken in yourself. It is the accumulation of the inscriptions of positive thinking and good actions over several lives that awaken devotion in the human self.

📖 Akhand Jyoti, March 1941

👉 ज्ञान

ज्ञान प्रकाश है, जबकि अज्ञान अँधियारा है। जीवन का पथ इस अज्ञान के अँधियारे से पूरी तरह आपूरित है। इस पर सफलतापूर्वक चलने के लिए ज्ञान के प्रकाश की जरूरत है। लेकिन याद रहे कि इस अँधियारे में औरों का प्रकाश काम नहीं आता, प्रकाश अपना ही हो तो भरोसेमन्द साथी है। जो किसी भी कारण दूसरों के प्रकाश पर भरोसा कर लेते हैं, वे हमेशा धोखा खाते हैं।
  
सूफियों में बाबा फरीद के कथा प्रसंग में एक कथा आती है, उन्होंने अपने शिष्य से कहा- ज्ञान को उपलब्ध करो। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। यह सुनने पर वह शिष्य नम्र भाव से बोला; बाबा, रोगी तो हमेशा वैद्य के पास ही जाता है, स्वयं चिकित्साशास्त्र का ज्ञान अर्जित करने के फेर में नहीं पड़ता। आप मेरे मार्गदर्शक हैं, गुरु हैं। यह मैं जानता हूँ कि आप मेरा उद्धार करेंगे। तब फिर स्वयं के ज्ञान की क्या आवश्यकता है।
  
यह सुनकर बाबा फरीद ने बड़ी गम्भीरतापूर्वक एक कथा सुनायी। वह बोले, एक गाँव में एक वृद्ध रहता था। वह अंधा हो गया, तो उसके बेटों ने उसकी आँखों की चिकित्सा करवानी चाही। लेकिन वृद्ध ने अस्वीकार कर दिया। वह बोला; भला मुझे आँखों की क्या जरूरत है। तुम आठ मेरे पुत्र हो, आठ पुत्र वधुएँ हैं, तुम्हारी माँ है। ऐसे चौंतीस आँखें तो मुझे मिली हैं। मेरी दो नहीं हुई तो क्या हुआ? पिता ने पुत्रों की बात न मानी। स्थिति जस की तस बनी रही। कुछ दिनों के बाद अचानक एक रात घर में आग लग गयी। सभी अपनी जान बचाने के लिए भागे, वृद्ध की याद किसी को न रही। वह उस आग में भस्म हो गया।
  
यह कथा सुनाने के बाद शेख फरीद ने अपने शिष्य से कहा, बेटा! अज्ञान का आग्रह मत करो। ज्ञान स्वयं की आँखें हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। सत्य न तो शास्त्रों से मिलता है, न शास्ताओं से। इसे तो स्वयं से ही पाना होता है। स्वयं का ज्ञान ही असहाय मनुष्य का एक मात्र सहारा है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१२

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

👉 हमारी सुनिश्चित भविष्यवाणी

भगवान् की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है। इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिये सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। अगले दिनों में पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है। धन एवं सम्पत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है। हर व्यक्ति अपनी रोटी मेहनत करके कमायेगा और खायेगा। कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है। अगले दिनों इस तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध करेंगे। इसलिये वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे पूँजी बढ़ाने, बेटे पोतों के लिये जायदादें इकट्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें। राजा और जमींदारों को मिटते हमने अपनी आँखों देख लिया अब इन्हीं आँखों को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए।

भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि किसी प्रकार गुजारे की बात सोची जाए। परिवार के भरण-पोषण भर के साधन जुटाये जायें और जो जमा पूँजी पास है उसे लोकोपयोगी कार्य में लगा दिया जाए। जिनके पास नहीं है वे इस तरह की निरर्थक मूर्खता में अपनी शक्ति नष्ट न करें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक साधन मौजूद हैं, जो उसी पूँजी के बल पर अपने वर्तमान परिवार को जीवित रख सकते हैं वे वैसी व्यवस्था बना कर निश्चित हो जायें और अपना मस्तिष्क तथा समय उस कार्य में लगायें, जिसमें संलग्न होना परमात्मा को सबसे अधिक प्रिय लग सकता है।

जो जितना समय बचा सकता है वह उसका अधिकाधिक भाग नव-निर्माण जैसे इस समय के सर्वोपरि पुण्य परमार्थ में लगाने के लिये तैयार हो जाए। समय ही मनुष्य की व्यक्तिगत पूँजी है, श्रम ही उसका सच्चा धर्म है। इसी धन को परमार्थ में लगाने से मनुष्य के अन्तःकरण में उत्कृष्टता के संस्कार परिपक्व होते हैं। धन वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की सम्पत्ति है। उसे व्यक्तिगत समझना एक पाप एवं अपराध है। जमा पूँजी में से जितना अधिक दान किया जाए वह तो प्रायश्चित मात्र है। सौ रुपये की चोरी करके कोई पाँच रुपये दान कर दें तो वह तो एक हल्का सा प्रायश्चित ही हुआ। मनुष्य को अपरिग्रही होना चाहिए। इधर कमाता और उधर अच्छे कर्मों में खर्च करता रहे यही भलमनसाहत का तरीका है। जिसने जमा कर लिया उसने बच्चों को दुर्गुणी बनाने का पथ प्रशस्त किया और अपने को लोभ-मोह के माया बंधनों में बाँधा। इस भूल का जो जितना प्रायश्चित कर ले, जमा पूँजी को सत्कार्य में लगा दे उतना उत्तम है। प्रायश्चित से पाप का कुछ तो भार हल्का होता ही है। पुण्य परमार्थ तो निजी पूँजी से होता है। वह निजी पूँजी है- समय और श्रम। जिसका व्यक्तिगत श्रम और समय परमार्थ कार्यों में लगा समझना चाहिए कि उसने उतना ही अपना अन्तरात्मा निर्मल एवं सशक्त बनाने का लाभ ले लिया।

युग-निर्माण योजना की क्रिया पद्धति इसी धुरी पर घूमती है। हमने अपने प्रत्येक परिजन को गंभीर चेतावनी और प्रबल प्रेरणा के साथ इस दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है कि यह युग बदलने का अनुपम अवसर है। हममें से हर प्रबुद्ध आत्मा का कुछ विशेष कर्त्तव्य एवं कुछ विशेष उत्तर दायित्व है। भगवान का प्रयोजन पूरा करने में सहयोगी होना वर्तमान युग के जीवित अध्यात्मवादियों के लिये विवेक की सबसे बड़ी चुनौती है। इसे समझा और स्वीकारा जाए।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1967 पृष्ठ 36

👉 Transacting the Duties

That which is unambiguously permitted by your conscience is righteous, worth doing. That which is prevented or is doubted by your inner self should not be done. This is how duties and the ‘faux pas’ could be defined in simplest terms for those whose hearts are pure and minds are enlightened enough to grasp the impulse of the inner self.

One who is sincere in transacting his duties is worthy of God’s grace. He will never be helpless or sorry in any circumstance. He is a beloved disciple of God who bears the responsibilities selflessly as per thy will. Such morally refined, virtuous persons might be found lacking in wealth or in worldly (materialistic) possessions, but this would be only in the gross terms. In reality, such devoteespossess immense spiritual power. How could they have any worry or scarcity? Austerity of life is their choice… Indeed the greatest treasure of the world lies with such saintly people only. This limitless treasure never empties; rather, it expands more and more with spending…

A vicious man always has a threat of being counter-attacked by the enemies; his own evils and negativity ruin all the peace and joy from his life. But the whole world is benevolent for a moral, duty-bond altruistic fellow. No one is his enemy; neither he has any attachment with anybody. Everything, everyone, is alike for him. His heart is full of love for everyone.

A thought of morality and saintly virtues itself inspires a unique feeling of peace, hope and enlightenment in the inner self. God wants each one of us to experience it and follow it towards sublime evolution of our lives…

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1941

👉 भविष्यवाणियाँ जो पूरी होकर रहेगी

धर्म अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होगा। उस के प्रसार प्रतिपादन का ठेका किसी वेश या वंश विशेष पर न रह जायेगा। सम्प्रदाय वादियों के डेरे उखड़ जायेंगे, उन्हें मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा छिनती दीखेगी तो कोई उपयोगी धंधा अपना कर भले मानसों की तरह आजीविका उपार्जित करेंगे। तब उत्कृष्ट चरित्र, परिष्कृत ज्ञान एवं लोक मंगल के लिए प्रस्तुत किया गया अनुदान ही किसी सम्मानित या श्रद्धास्पद बना सकेगा पाखण्ड पूजा के बल पर जीने वाले उलूक उस दिवा प्रकाश से भौंचक होकर देखेंगे और किसी कोंटर में बैठे दिन गुजारेंगे। अज्ञानान्धकार में जो पौ बारह रहती थी उन अतीत की स्मृतियों को वे ललचाई दृष्टि से सोचते चाहते तो रहेंगे पर फिर समय लौटकर कभी आ न सकेगा।

अगले दिनों ज्ञानतंत्र ही धर्म तंत्र होगा। चरित्र निर्माण और लोक मंगल की गति विधियाँ धार्मिक कर्म काण्डों का स्थान ग्रहण करेंगी। तब लोग प्रतिमा पूजक देव मन्दिर बनाने की तुलना में पुस्तकालय विद्यालय जैसे ज्ञान मंदिर बनाने को महत्व देंगे तीर्थ-यात्राओं और ब्रह्मभोजों में लगने वाला धन लोक शिक्षण की भाव भरी सत्प्रवृत्तियों के लिए अर्पित किया जायगा। कथा पुराणों की कहानियाँ तब उतनी आवश्यक न मानी जाएंगी जितनी जीवन समस्याओं को सुलझाने वाली प्रेरणाप्रद अभिव्यंजनाएं। धर्म अपने असली स्वरूप में निखर कर आयेगा और उसके ऊपर चढ़ी हुई सड़ी गली केंचुली उतर कर कूड़े करकट के ढेर में जा गिरेगी।

ज्ञान तन्त्र वाणी और लेखनी तक ही सीमित न रहेगा वरन् उसे प्रचारात्मक रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों के साथ बौद्धिक नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए प्रयुक्त किया जायगा। साहित्य, संगीत, कला के विभिन्न पक्ष विविध प्रकार से लोक शिक्षण का उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा करेंगे। जिनके पास प्रतिभा है जिनके पास सम्पदा है वे उससे स्वयं लाभान्वित होने के स्थान पर समस्त समाज को समुन्नत करने के लिए समर्पित करेंगे।
(1) एकता (2) समता (3) ममता और (4) शुचिता नव निर्माण के चार भावनात्मक आधार होंगे।

एक विश्व, एक राष्ट्र एक भाषा, एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति के आधार पर समस्त मानव प्राणी एकता के रूप में बँधेंगे। विश्व बन्धुत्व की भावना उभरेगी और वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श सामने रहेगा। तब देश, धर्म भाषा वर्ण आदि के नाम पर मनुष्य मनुष्य के बीच दीवारें खड़ी न की जा सकेंगी। अपने वर्ग के लिए नहीं समस्त विश्व के हित साधन की दृष्टि से ही समस्याओं पर विचार किया जायगा।

जाति या लिंग के कारण किसी को ऊँचा या किसी को नीचा न ठहरा सकेंगे छूत अछूत का प्रश्न न रहेगा। गोरी चमड़ी वाले काले लोगों से श्रेष्ठ होने का दावा न करेंगे और ब्राह्मण हरिजन से ऊँचा न कहलायेगा। गुण कर्म स्वभाव सेवा एवं बलिदान ही किसी के सम्मानित होने के आधार बनेंगे जाति या वंश नहीं। इसी प्रकार नारी से नर श्रेष्ठ है उसे अधिक अधिकार प्राप्त है ऐसी मान्यता हट जायगी। दोनों के कर्तव्य और अधिकार एक होंगे। प्रति बन्ध या मर्यादायें दोनों पर समान स्तर की लागू होंगी। प्राकृतिक सम्पदाओं पर सब का अधिकार होगा। पूँजी समाज की होगी। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसमें से प्राप्त करेंगे और सामर्थ्यानुसार काम करेंगे। न कोई धनपति होगा न निर्धन। मृतक उत्तराधिकार में केवल परिवार के असमर्थ सदस्य ही गुजारा प्राप्त कर सकेंगे। हट्टे-कट्टे और कमाऊ बेटे बाप के उपार्जन के दावेदार न बन सकेंगे, वह बचत राष्ट्र की सम्पदा होगी इस प्रकार धनी और निर्धन के बीच का भेद समाप्त करने वाली समाज वादी व्यवस्था समस्त विश्व में लागू होगी। हराम खोरी करते रहने पर भी गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा किसी को न मिलेगी। व्यापार सहकारी समितियों के हाथ में होगा, ममता केवल कुटुम्ब तक सीमित न रहेगी वरन् वह मानव मात्र की परिधि लाँघते हुए प्राणिमात्र तक विकसित होगी। अपना और दूसरों का दुख सुख एक जैसा अनुभव होगा। तब न तो माँसाहार की छूट रहेगी और न पशु−पक्षियों के साथ निर्दयता बरतने की। ममता और आत्मीयता के बन्धनों में बँधे हुए सब लोग एक दूसरे को प्यार और सहयोग प्रदान करेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 35

रविवार, 5 अप्रैल 2020

👉 सन्तोष का फल मधुर है

किसी कसाई के यहाँ एक बकरा और कुत्ता था, बकरे को वह अच्छे स्थान पर बाँध कर नित्य हरी-हरी घास खिलाता, उसके रहने का स्थान साफ किया करता था। कुत्ते को सूखे रूखे टुकड़े दे दिया करता था। धूप, वर्षा, शीत का कष्ट सहन करते हुए, सूखे टुकड़े पाकर अपने मालिक की सेवा करता हुआ कुत्ता अपने मन में विचार करने लगा, मैं इतना कष्ट सहन कर मालिक की सेवा करता हूँ और बकरा जो कुछ भी सेवा नहीं करता उसे सुस्वाद भोजन मिला करते है। इस प्रकार के विचारों से ईश्वर के अस्तित्व अथवा उसके न्याय पर शंका होने लगी।

बकरा दिन-दिन मोटा होने लगा, जिससे कुत्ते की ईर्ष्या भी बढ़ने लगी। जब बकरा खूब तैयार हो गया तो कुत्ते ने देखा कि कसाई ने अपनी छुरी उसकी गर्दन पर फेर दी और माँस विक्रय कर जितना उस बकरे के लिए व्यय किया था, उससे कई गुना लाभ कमाया।

कुत्ते ने यह देखकर नास्तिक भाव से घृणा कर यह विश्वास किया कि ईश्वर न्यायी हैं, हराम की कमाई किसी दिन इसी प्रकार जान पर संकट लाती है। रूखी सूखी खाकर सन्तोष से जीवन व्यतीत करने का फल मीठा होता है।

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 5 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2020


👉 हमारी चेतावनी को अनदेखा न करें

अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे हैं। उनमें ऐसी घटनायें घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें पर नये संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक हैं। हमें इस भविष्यता का स्वागत करने के लिए-उसके अनुरूप ढलने के लिए-तैयार होना चाहिये। यह तैयारी जितनी अधिक रहे उतना ही भावी कठिन समय अपने लिये सरल सिद्ध होगा।

भावी नर संहार में आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को अधिक पिसना पड़ेगा। क्योंकि महाकाल का कुठाराघात सीधा उन्हीं पर होना है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायश्च दुष्कृताम्” की प्रतिज्ञानुसार भगवान को युग-परिवर्तन के अवसर पर दुष्कृतों का ही संहार करना पड़ता है। हमें दुष्ट दुष्कृतियों की मरणासन्न कौरवी सेना में नहीं, धर्म-राज की धर्म संस्थापना सेना में सम्मिलित रहना चाहिये। अपनी स्वार्थपरता, तृष्णा और वासना को तीव्र गति से घटाना चाहिए और उस रीति-नीति को अपनाना चाहिये जो विवेकशील परमार्थी एवं उदारचेता सज्जनों को अपनानी चाहिये।

संकीर्णताओं और रूढ़ियों की अन्य कोठरी से हमें बाहर निकलना चाहिए। अगले दिनों विश्व-संस्कृति, विश्व-धर्म, विश्व-भाषा, विश्व-राष्ट्र का जो भावी मानव समाज बनेगा उसमें अपनी-अपनी महिमा गाने वालों और अपनी ढपली अपना राग गाने वालों के लिये कोई स्थान न रहेगा। पृथकतावादी सभी दीवारें टूट जायेंगी और समस्त मानव समाज को न्याय एवं समता के आधार पर एक परिवार का सदस्य बन कर रहना होगा। जाति लिंग या सम्पन्नता के आधार पर किसी को वर्चस्व नहीं मिलेगा। इस समता के अनुरूप हमें अभी से ढलना आरम्भ कर देना चाहिये।

धन-संचय और अभिवर्धन की मूर्खता हमें छोड़ देना ही उचित है, बेटे पोतों के लिए लम्बे चौड़े उत्तराधिकार छोड़ने की उपहासास्पद प्रवृत्ति को तिलाँजलि देनी चाहिये क्योंकि अगले दिनों धन का स्वामित्व व्यक्ति के हाथ से निकल कर समाज, सरकार के हाथ चला जायगा। केवल शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार एवं सद्गुणों की सम्पत्ति ही उत्तराधिकार में दे सकने योग्य रह जायगी। इसलिए जिनके पास आर्थिक सुविधायें हैं वे उन्हें लोकोपयोगी कार्यों में समय रहते खर्च करदें ताकि उन्हें यश एवं आत्म-संतोष का लाभ मिल सके। अन्यथा वह संकीर्णता मधुमक्खी के छत्ते पर पड़ी डकैती की तरह उनके लिये बहुत ही कष्ट-कारक सिद्ध होगी।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1967 पृष्ठ 54

👉 The Water Bearer

A water bearer in India had two large pots, each hung on each end of a pole which he carried across his neck. One of the pots had a crack in it, and while the other pot was perfect and always delivered a full portion of water at the end of the long walk from the stream to the master’s house, the cracked pot arrived only half full.

For a full two years, this went on daily, with the bearer delivering only one and a half pots full of water in his master’s house. Of course, the perfect pot was proud of its accomplishments, perfect to the end for which it was made. But the poor cracked pot was ashamed of its own imperfection and miserable that it was able to accomplish only half of what it had been made to do.

After two years of what it perceived to be a bitter failure, it spoke to the water bearer one day by the stream. “I am ashamed of myself, and I want to apologize to you. “Why?” asked the bearer. “What are you ashamed of?” “I have been able, for these past two years, to deliver only half my load because this crack in my side causes water to leak out all the way back to your master’s house. Because of my flaws, you have to do all of this work, and you don’t get full value from your efforts,” the pot said.

The water bearer felt sorry for the old cracked pot, and in his compassion, he said, “As we return to the master’s house, I want you to notice the beautiful flowers along the path.” Indeed, as they went up the hill, the old cracked pot took notice of the sun warming the beautiful wild flowers on the side of the path, and this cheered it somewhat. But at the end of the trail, it still felt bad because it had leaked out half its load, and so again it apologized to the bearer for its failure.

The bearer said to the pot, “Did you notice that there were flowers only on your side of your path, but not on the other pot’s side? That’s because I have always known about your flaw, and I took advantage of it. I planted flower seeds on your side of the path, and every day while we walk back from the stream, you’ve watered them. For two years I have been able to pick these beautiful flowers to decorate my master’s table. Without you being just the way you are, he would not have this beauty to grace his house.”

Moral: Each of us has our own unique flaws. We’re all cracked pots. In this world, nothing goes to waste. You may think like the cracked pot that you are inefficient or useless in certain areas of your life, but somehow these flaws can turn out to be a blessing in disguise.

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (अंतिम भाग)

यदि लोगों के हृदय कपट, पाखंड, द्वेष, छल आदि दुर्भावों से भरे रहें तो उससे अदृश्य लोक एक प्रकार की आध्यात्मिक दुर्गन्ध से भर जाते हैं जैसे वायु के दूषित, दुर्गन्धित होने से हैजा आदि बीमारियाँ फैलती हैं वैसे ही पाप वृत्तियों के कारण सूक्ष्म लोकों का वातावरण गंदा हो जाने से युद्ध, महामारी, दारिद्र, अर्थ संकट, दैवी प्रकोप आदि उपद्रवों का आविर्भाव होता है। संसार की सुख शान्ति इस बात के ऊपर निर्भर है कि प्रेम, दया, सहानुभूति, उदारता और न्याय का व्यवहार अन्य लोगों के साथ किया जावे, जब इस प्रकार के विचार और व्यवहार की अधिकता होती है तो संसार में ईश्वरीय कृपा के सुन्दर आनन्ददायक परिणाम दिखाई पड़ते हैं सब लोग सुख शान्ति के साथ प्रफुल्लता मय जीवन बिताते हैं, किन्तु जब स्वार्थ लिप्सा में अन्धे होकर मनुष्य एक दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयत्न करते हैं तो उसके दुर्गन्धित धुँए से सबका दम घुटने लगता हैं विपत्ति, आपदा और कष्टों के पहाड़ चारों ओर से टूटने लगते हैं। दुख दारिद्र का नंगा नाच होने लगता है।

वर्तमान समय की चतुर्मुखी दुर्दशा का एक ही कारण “नैतिकता का पतन हो जाना है”। मन की वृत्तियों का स्वार्थ प्रधान हो जाना ही पाप है। यह पाप पिछली एक शताब्दी से तो बहुत अधिक मात्रा में बढ़ गया है। सच्चे धर्म का, हृदय की विशालता का, लोप हो रहा है उसके स्थान पर ‘मजहबी कर्म काण्डों’ को धर्म कहा जाने लगा है। नदी नालों में गोता लगाकर, तस्वीर खिलौनों के दर्शन करके, किसी पुस्तक के पन्ने रट देने, तिलक छाप लगा लेने, शिर मुड़ा लेने, दाढ़ी रखा लेने, खड़ाऊ पहनने, सात बार आचमन कर लेने, तेरह बार हाथ माँज लेने या ऐसे ही किसी अन्य कर्मकाण्ड को करने वाले लोग धर्मध्वजी समझे जाते हैं, चाहे उनके आचरण और विचार कैसे ही क्यों न हों।

वेशभूषा और साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के आधार पर धर्म की विवेचना होना इस बात का द्योतक है कि सच्चे धर्म की तो जानकारी भी लोगों को नहीं रही, धर्म के स्थान पर पाखंड विराजमान हो गया, ईश्वर के स्थान पर शैतान की पूजा होने लगी। आज जो मनुष्य जितना धर्मात्मा बनने का ढोंग रचता है परीक्षा करने पर उसका हृदय उतनी ही मात्रा में अनुदारता, निर्दयता, कपट, असत्य, घमंड और स्वार्थ रूपी पापों से भरा पूरा मिलता है। ढोंग के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहते दिखाई देते हैं पर सच्चे धर्म के लिए कोई कौड़ियाँ भी लगाने को तत्पर नहीं होता। यह सब परिस्थितियाँ बताती हैं कि मानव जाति से धर्म का लोप बहुत बड़ी मात्रा में हो गया है। पाखंड की आड़ में अधर्म का साम्राज्य छाया हुआ है ऐसी दशा में पाप की दुर्गन्ध से अदृश्य लोकों का गंदा होना और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इन कष्ट क्लेशों का आना कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 4 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 4 April 2020


👉 धर्म जीतेगा और अधर्म हारेगा

चारों ओर फैले हुए पाप पाखंड को नष्ट करने के लिए वर्तमान समय में जो ईश्वरीय अवतारी प्रेरणा अदृश्य लोक में उत्पन्न हुई है, उसका प्रभाव जागृत आत्माओं पर विशेष रूप से पड़ रहा है। जिसका अन्तःकरण जितना ही पवित्र है, जिसकी आत्मा जितनी ही निर्मल है वह उतना ही स्पष्ट रूप से ईश्वर की आकाशवाणी को, समय की पुकार को, सुन रहा है और अवतार के महान कार्य में सहायता देने के लिए तत्पर हो रहा है। समय की समस्याओं को वह ध्यान पूर्वक अनुभव कर रहा है और सुधार कार्य में क्रियात्मक सहयोग प्रदान कर रहा है। जिन लोगों की आत्माएं कलुषित है, पाप, अनीति और घोर अन्धकार ने जिनके अन्तःकरण को ढ़क रखा है, वे उल्लू और चमगादड़ की तरह प्रकाश देखकर चिढ़ रहे हैं। वे कुछ काल से फैली हुई अनीति को सनातन बताकर पकड़े रहना चाहते है। सड़े गले कुविचारों का समर्थन करने के लिए पोथी पत्र ढूंढ़ते हैं। किसी पुराने व्यक्ति की लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ यदि उन सड़े गले विचारों के समर्थन में मिल जाती हैं तो ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो यह पंक्तियाँ साक्षात् ईश्वर ने ही लिखी हों। परिस्थितियाँ रोज बदलती हैं और उनका रोज नया हल ढूँढ़ना पड़ता है। इस सच्चाई को वे अज्ञान ग्रस्त मनुष्य समझ न सकेंगे और ‘जो कुछ पुराना सब अच्छा जो नया सो सब बुरे’ कहकर अपने अज्ञान और स्वार्थ का समर्थन करेंगे।

दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता हे तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, पाप भी अपने अन्तिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता। युग परिवर्तन की संध्या में पाप का इतना प्रचंड, उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जायगी, एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुन्द भी बज गई और धर्म बेचारा दुम दबा कर भाग गया, किन्तु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं, यह अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी। रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नये उग आते थे फिर भी अन्ततः रावण मर ही गया। संवत् दो हजार के आसपास अधर्म नष्ट हो हो कर फिर जीवित होता हुआ प्रतीत होगा उसकी मृत्यु में बहुत देर लगेगी, पर अन्त में वह मर ही जायेगा।

तीस वर्ष से कम आयु के मनुष्य अवतार की वाणी से अधिक प्रभावित होंगे वे नवयुग का निर्माण करने में अवतार का उद्देश्य पूरा करने में विशेष सहायता देंगे। अपने प्राणों की भी परवा न करके अनीति के विरुद्ध वे धर्म युद्ध करेंगे और नाना प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर हो जावेंगे। तीस वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिकाँश की आत्मा भारी होगी और वे सत्य के पथ पर कदम बढ़ाते हुए झिझकेंगे। उन्हें पुरानी वस्तुओं से ऐसा मोह होगा कि सड़े गले कूड़े कचरे को हटाना भी उन्हें पसंद न पड़ेगा। यह लोग चिरकाल तक नारकीय बदबू में सड़ेंगे, दूसरों को भी उसी पाप पंक में खींचने का प्रयत्न करेंगे, अवतार के उद्देश्य में, नवयुग के निर्माण में, हर प्रकार से यह लोग विघ्न बाधाएं उपस्थित करेंगे। इस पर भी इनके सारे प्रयत्न विफल जायेंगे, इनकी आवाज को कोई न सुनेगा, चारों ओर से इन मार्ग कंटकों पर धिक्कार बरसेंगी, किन्तु अवतार के सहायक उत्साही पुरुष पुँगब त्याग और तपस्या से अपने जीवन को उज्ज्वल बनाते हुए सत्य के विजय पथ पर निर्भयता पूर्वक आगे बढ़ते जावेंगे।

अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, अनीति से नीति का, अन्धकार से प्रकाश का, दुर्गन्ध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। इस धर्म युद्ध में ईश्वरीय सहायता न्यायी पक्ष को मिलेगी। पाँडवों की थोड़ी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा सा वानर दल विशाल असुर सेना के मुकाबले में, विजयी हुआ था, अधर्म अनीति की विश्व व्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा सा मालूम पड़ेगा, परन्तु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में सारे पाप प्रपंच ईश्वरीय कोप की अग्नि में जल-जल कर भस्म हो जायेंगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजय पताका फहरा वेगी।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग ३)

यह एक तथ्य है कि किसी व्यक्ति द्वारा किये हुए भले या बुरे कर्म का कुछ भाग उस परिवार के अन्य व्यक्तियों को भी मिलता है। घर का एक व्यक्ति कोई भला काम करे तो उस परिवार के सब लोग अभिमान अनुभव करते हैं और आदर पाते हैं। यदि घर का एक व्यक्ति बुरा काम करता है तो सारे कुटुम्ब को लज्जित होना पड़ता है। एक समय ब्राह्मण लोगों ने बड़े उत्तम ज्ञान का प्रसार करके जनता की सेवा की थी। उनकी सैंकड़ों पीढ़ी के बाद भी आज ब्राह्मणों के गुणों से हीन होने पर भी उनका आदर होता है और वे अभिमानपूर्वक ऋषि मुनियों की संतान कह कर अपना गौरव प्रकट करते हैं। ऋषियों का शरीर छूटे हजारों वर्ष हो गये तो भी उनकी संतान उन पूर्वजों के पुण्य का फल, दान दक्षिणा के रूप में अब तक भोग रही हैं। बुरे कर्म करने वालों के कुटुम्बियों और वंशजों को भी इसी प्रकार लज्जित होना पड़ता है। भारत में कुछ कौमें “जरायम पेशा” लिखी जाती हैं। इन कौमों के लोग चोरी आदि अपराध करते हैं। उनमें से जो अपराध नहीं करते वे भी ‘जरायम पेशा” समझे जाते हैं और पुलिस की निगरानी उन पर भी रहती है। सम्मिलित रहने वालों की सम्मिलित जिम्मेदारी भी होती है। वे आपस में एक दूसरे के पाप पुण्य के भागीदार भी होते हैं।

आजकल समस्त संसार पर जो चतुर्मुखी आपत्तियाँ आई हुई हैं उसका कारण भी यही सम्मिलित जिम्मेदारी है। पूर्वकाल में परिवारों के दायरे छोटे थे इसलिए वहाँ विपत्तियाँ भी थोड़े ही पैमाने पर आती थी। अब सारी दुनिया एक सूत्र में बँधी है तो उसका यह कर्तव्य भी बढ़ गया है कि समस्त देशों में धर्म की वृद्धि और अधर्म का निवारण करने का प्रयत्न करें।

भारतीय शास्त्र चिल्ला चिल्ला कर बताते हैं कि आपत्तियों का कारण अधर्म है। हम देखते हैं कि पिछली शताब्दियों में नैतिकता का स्तर जितना नीचा घटा है उतना सृष्टि के आदि से लेकर पहले कभी नहीं घटा था। इन दिनों बुद्धिबल से, यान्त्रिक शक्ति से, छल प्रबन्ध से, स्वार्थ साधना का ही विशेष ध्यान रखा गया। लूट खसोट की प्रधानता रही। पहले शत्रु के लिए भी उसके चरित्र को नष्ट करने के षड़यंत्र नहीं रचे जाते थे पर इस युग में निर्बल शक्ति वालों को नैतिकता से भी गिरा देने का बुद्धिमान लोगों ने प्रयत्न किया, ताकि वे लोग असत् आचरण के कारण द्वेष, कलह, अशान्ति एवं कुविचारों में उलझे रहें और हमें लूट खसोट का अच्छा अवसर हाथ लगता रहे। जब मनुष्यों के मन में सद्वृत्तियाँ रहती हैं तो उनकी सुगंध से दिव्यलोक भरापूरा रहता है और जैसे यज्ञ की सुगंधि से अच्छी वर्षा, अच्छी अन्नोत्पत्ति होती है वैसे ही जनता की सत् भावनाओं के फलस्वरूप ईश्वरी कृपा की- सुख शान्ति की वर्षा होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (अंतिम भाग)

अखण्ड-ज्योति के पाठकों से हम विशेष रूप से अनुरोध करते हैं कि वे सच्चे धर्म को फैलाने में पूरी शक्ति के साथ प्रयत्न करें। सबसे पहला काम हम में से हर एक को यह करना चाहिए, कि अपना आत्म-शोधन करें अपने अन्दर जो स्वार्थ, असत्य, अन्याय की दुर्भावनायें घुसी बैठी हों उन्हें बारीकी के साथ तलाश करें और जिस प्रकार मरे हुए कुत्ते की लाश को निकाल कर घर से बाहर फेंक देते हैं, वैसे ही अपनी कुभावना, अनीति और स्वार्थपरता को दूर फेंक देने का यथासम्भव उद्योग करें। अमुक मन्त्र की माला जपने, अमुक पुस्तक का पाठ करने अमुक देवता के भगत बनने, अमुक नदी नाले में नहाने के महजबी कर्म काण्डों को करने न करने के सम्बन्ध में हमें कुछ नहीं कहना, यह सब व्यक्तिगत रुचि और श्रद्धा की वस्तुएं हैं, हमें तो जोरदार शब्दों में यह कहना कि आप सत्य आचरण करने के लिए तत्पर हो जाइये दूसरों से निस्वार्थ प्रेम कीजिए, अन्य लोगों की भलाई में अपनी भलाई समझिए। ज्ञान, बल, धन, वैभव प्राप्त कीजिए, किन्तु उसको अपने भोगों का साधन मत बनाइये। अपने से अल्प शक्ति रखने वालों की सहायता में आपकी सम्पूर्ण शक्तियों का अधिक से अधिक व्यय होना चाहिए। मैं किसकी क्या भलाई कर सकता हूँ, यह सोचते रहा कीजिए और परोपकार के सेवा, सहायता के अवसर आवें उन्हें बिना चूकें कर्तव्य परायण हुआ कीजिए। आपका शारीरिक मानसिक और भौतिक बल अधिक से अधिक मात्रा में लोक कल्याण के निमित्त, सत्प्रवृत्तियों की उन्नति के निमित्त, पाप कर्मों को नाश करने के निमित्त, व्यय होना चाहिए। आपका जीवन कर्म योग में परिपूर्ण यज्ञमय बन जाना चाहिए, जिसका प्रत्येक क्षण विशुद्ध कर्तव्य पालन में, धर्म और ईश्वर की उपासना में व्यय होने लगे। यह कार्य कठिन दिखाई पड़ता है, परन्तु यदि आप प्रतिज्ञा करलें, कि मुझे अपना जीवन सत्यमय बनाना है तो विश्वास रखिए, आप से ही आपके कदम उस दिशा को बढ़ाने लगेंगे फिर कुछ ही दिनों में बड़ी भारी सफलता दृष्टिगत होने लगेगी।

दूसरा कार्य जो उपरोक्त आत्म सुधार कार्य कुछ ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है यह है कि जिन लोगों तक आपकी पहुँच हो सकती है, उनको धर्म मार्ग पर चलने के लिए, सत्य का आचरण करने के लिए प्रेरित करते रहा करें। जो लोग आपके संपर्क में आवें, जिनसे बात करने का अवसर मिले, जिनसे पत्रालय हो उन्हें सदुपदेश दिया कीजिए, सत्य के, प्रेम के, न्याय के मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित किया कीजिए। अपने मुख को एक प्रकार का जीवित धर्म शास्त्र बना डालिए, जिसमें से सदैव धर्म शिक्षा का प्रसार होता रहे। अपने कुटुम्बियों, मित्रों, सहयोगियों, सम्बन्धियों, परिचितों, अपरिचितों को सच्चाई और ईमानदारी के ढांचे में ढालने का उद्योग किया कीजिए, जिससे उनकी जीवन दिशा सुधरे और आपका अपना आत्म-सुधार का अभ्यास मजबूत होता रहे। यह बेल बढ़ेगी।

मान लीजिए आप दस आदमियों को धर्ममय विचारों का बना देते हैं, वे दस और दस-दस को सुधारते हैं, तो सौ हो गये। ऐसा ही सौ करें तो दस हजार हो जायेंगे, यही बेल आगे बढ़े तो दसवें व्यक्ति पर जाकर वह संख्या इतनी हो सकती है जितने मनुष्य इस सारी पृथ्वी पर नहीं हैं यदि सौ दृढ़ प्रतिज्ञा सुयोग्य व्यक्ति धर्म भावनाओं का प्रचार करने के लिये सच्चे हृदय से तत्पर हो जावें तो संसार की काया पलट कर सकते है युद्ध का जरा मूल से अन्त कर सकते हैं, कुछ ही समय में इस पृथ्वी को सुर-पुरी बना सकते हैं। भागीरथ की तपस्या की पतित पावनी भगवती गंगाजी स्वर्ग से भूमण्डल पर उतर आई थी। आज ऐसे ही भागीरथों की आवश्यकता है, जो स्वयं घोर तप करके सतयुगी गंगा को पृथ्वी पर लावें और जलते हुए संसार पर अमृत की वर्षा करके इसे नन्दन वन के समान हरा-भरा करदें।

वर्तमान दारुण परिस्थितियों में हम अपने हर एक पाठक से आग्रह पूर्वक अनुरोध करते हैं, कि अपने निजी जीवन को पवित्र, पुण्यमय परमार्थी बनावें और दूसरों को भी इस मार्ग पर प्रवृत्त करें। इस धर्म प्रचार यज्ञ से संसार पर आई हुई आपत्तियों को हटाने में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी, ऐसा हमारा सुदृढ़ विश्वास हैं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

👉 हे महाकाल!

हे महाकाल! तुम्हारी यह कैसी लीला है? आज लाखों आदमी निर्दयता से मारे जा रहे है, करोड़ों आदमी भूखों मर रहे हैं, उन्हें रात में सोने को भी जगह नहीं हैं, जीवनोपयोगी पदार्थों का ध्वंस हो रहा है मनुष्य मनुष्य को खाये जा रहा है, यह सब क्या है! तुम्हारी संहार लीला असमय में ही ऐसा प्रलयंकर रूप क्यों धारण कर रही है?

क्या कहते हो? यह मनुष्य के पापों का ही फल है? मनुष्य दल बाँधकर जब दूसरे मनुष्यों को देशों और वर्गों को चूस डालना चाहता है तब उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।

हे भयंकर! आदमियत पढ़ाने का तुम्हारा यह तरीका बड़ा निर्दय है पर क्या तुम समझते हो कि आदमी में इस प्रकार शैतानियत बढ़ाकर नंगा चित्र खींचकर तुम उसे दूर कर सकोगे? अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ, शैतानियत बढ़ती ही जा रही है।

क्या कहते हो? जब तक आँच से लोहा गलेगा नहीं तब तक ढाला न जायगा! क्या इसीलिये मनुष्य जाति को इस प्रकार भट्टी में झोंके जाते हो। क्या मनुष्य जाति के भाग्य में और भी भयंकर विपदाएं वदी हैं? पर करोड़ों आदमी इतने में भी घबरा उठे है- उन्हें अभी भी यह सब असह्य है!

क्या कहते हो? जब वेदना असह्य होगी तब सब गल जायेंगे? क्या तभी अक्ल आयेगी? पर बहुतों को अक्ल आ चुकी है-वे गल भी गये हैं। अब तो थोड़े के पीछे बहुतों को गलना पड़ा रहा है।

ऐ! क्या कहते हो! बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है? तो क्या जब तक थोड़े न गलेंगे तब तक बहुतों को भी गलना पड़ेगा! हे न्याय मूर्ति! बात तो सच कहते हो। संसार पर शैतानियत का ताँडव करने वाले मुट्ठीभर लोग ही है, पर उनको उन लोगों का भी पीठ बल है जो उनकी शैतानियत से पिस रहे हैं। इन लड़ाकू स्वभाव के लोगों के पीछे उन मजबूरों, गरीबों तक का बल है जो खुद पूँजीवाद से कराह रहे हैं! पर दूसरे देशों के गरीबों को सताने में अपने नेताओं का साथ दे रहे हैं। तब तुम्हारा कहना ठीक ही है कि भस्म होकर भी बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है। पर हे शिव, ऐसे भी तो लोग हैं देश हैं जिनके न थोड़े न बहुत, किसी को पीसना नहीं चाहते है वे तो गले हुए हैं उन्हें भट्टी में क्यों डाल रक्खा है?

क्या कहा? वे कच्चा लोहा हैं? उनमें बहुत-सा भाग ऐसा है जिसे जलाकर नष्ट कर देना है। तो क्या उन्हें भी बहुत देर तक भट्टी में रहना पड़ेगा? हे शंकर यह क्या कहते हो? वे तो बहुत निर्बल हैं, दीन हैं, न्याय चाहते हैं। उन्हें यह दण्ड क्यों?

क्या कहते हो! निर्बलता का नाम या संयम नहीं है! ओह! तुम बड़े कठोर हो। पर मैं मानता हूँ कि तुम्हारे कहने में जरा भी झूठ नहीं है। निर्बल निर्बल नरों को चूसते हैं वहाँ हैवानियत है-संयम नहीं है। जब तक हैवानियत भस्म न हो जायेगी तब तक तुम उन्हें भी भट्टी में झोंके रहोगे। हे महादेव! तुम्हीं सत्य हो। जैसा समझो करो। तुम महाकाल हो, अनन्त हो। हम चार दिन के कीड़े तुम्हारी अनन्त गम्भीर, अनन्त उन्नति और अनन्त व्यापक नीति को क्या समझें! -संगम

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 10

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2020


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...