सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

👉 धन नहीं धन का संग्रह पाप:-

गोपाल्लव हजार गायों का स्वामी नगर-सेठ। धन की अथाह राशि थी उसके पास। किन्तु तो भी गोपाल्लव के जीवन में कोई रस नहीं था, शान्ति नहीं थी, कभी उसने सन्तोष का अनुभव किया हो ऐसा कभी भी नहीं हुआ। वैभव विलास से परिपूर्ण जीवन का एक क्षण भी तो उसे ऐसा याद नहीं आ रहा था जब उसने निर्द्वंदता प्राप्त की हो।

विषय-भोगी गोपाल्लव को यह सब भली प्रकार सोचने का अवसर तब मिला जब राजयक्ष्मा से पीड़ित होकर वह रोग शैया से जा लगा। गोपाल्लव सोच रहे- 'धन की आसक्ति, विषयों के सुख का आकर्षण कितना प्रबल है कि मनुष्य यह भी नहीं सोच पाता कि इस संसार से परे भी कुछ है क्या ? शरीर कृश और जराजीर्ण हो गया तब कहीं मृत्यु याद आती है और मनुष्य सोचता है कि जीवन व्यर्थ गया,पाया कुछ नहीं, गांठ में था सो भी खो दिया।'

गोपाल्लव पड़े यही सोच रहे थे तभी उसके कर्ण-कुहरों पर टकराई एक ध्वनि-बहुत मीठी, भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत। ऐसा लगा द्वार पर ही बैठा हुआ कोई व्यक्ति भक्ति-गीत गा रहा है। मन को सच्चा सुख भावनाओं में मिलता है। जीवन भर के भूले भटके राही को परमपिता परमात्मा की क्षणिक अनुभूति भी कितना सुख कितना विश्राम देती है यह उस गोपाल्लव को देखता तो सहज ही पता चल जाता। भजन सुनने से ऐसा आराम मिला मानो जलते घावों पर किसी ने शीतल मरहम लगा दिया हो। गोपाल्लव को नींद आ गई आज वे पूर्ण-प्रगाढ़ नींद भर सोये।

नींद टूटी तो वह स्वर-अन्तर्धान हो चुका था। गोपाल्लव ने परिचारक से पूछा- "अभी थोड़ी देर पूर्व बाहर कौन गा रहा था उसे भीतर तो बुलाना, बड़ा ही कर्ण प्रिय स्वर था। उसने मुझे जो शान्ति प्रदान की वह अब तक कभी भी नहीं मिली।"

परिचारक ने हंसकर कहा- "वह कोई संगीतज्ञ नहीं था आर्य! वह तो नगर का मोची है यहीं बैठकर जूते गांठता है और दिन भर के निर्वाह योग्य धन मिलते ही उठकर चला जाता है। सुना है वह अपने ही बनाये पद गाता है, बड़ा ईश्वर भक्त है। तभी तो उसके हर शब्द से रस टपकता है।"

प्रातःकाल वही स्वर फिर सुनाई दिया। गोपाल्लव ने मोची को बुलाकर उसे एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा- "तात! यह लो स्वर्ण मुद्रा तुम्हारे कल के गीत ने मुझे अपूर्व शान्ति प्रदान की।"

स्वर्ण मुद्रा पाकर मोची बड़ा प्रसन्न हुआ। खुशी-खुशी घर लौट आया किन्तु उसके बाद कई दिन तक उसका स्वर सुनाई न दिया। सप्ताहान्त मोची आया और सीधे गोपाल्लव के पास जाकर बोला- ”अर्थ कामेष्वसक्तानाँ धर्म ज्ञानं विधीयते” तात! धन और इंद्रियों के वशवर्ती नहीं है जो वहीं धर्म और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-कल्याण के मार्ग में यह दोनों वस्तुयें बाधक हैं।"

यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्रा लौटा दी। गोपाल्लव ने पूछा- "कई दिन से आये नहीं।"

मोची ने उत्तर दिया- "आर्य! धन की तृष्णा बुरी होती है आपकी दी इस स्वर्ण मुद्रा की रक्षा और उसके उपयोग का चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।"

गोपाल्लव ने अनुभव किया धन का जीवनोपयोगी उपभोग ही पर्याप्त है परिग्रह से कभी शान्ति नहीं मिल सकती अपना धर्म धर्मार्थ व्यय कर उसने भी मोची की तरह परम शान्ति पाई।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1971 पृष्ठ

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 4)

Q.6. What is the necessity of collective-Yagyas?

Ans. Yagyas at a larger scale are required to be performed to purify the subtle environment and destroy pollution permeating the atmosphere. It infuses religious sentiments and enthusiasm in persons who are present and those who participate in it get an opportunity to take a vow to abandon one vice by way of offering Dev-dakshina and adopt one virtue or righteous tendency. In this way big Yagyas help in uplifting the moral and ethical levels of the participants.  

The meaning of the word Yagya is to do sacrifice, to give money in charity and do worship. Its practical meaning is that one ought not to spend his entire earnings on himself and his family, but should also contribute a part of it  for the welfare of others. It also implies that divinity and gentlemanliness should be respected and people should live together in mutual cooperation.


Q.7. Is ‘Agnihotra’ during the nights justified for matrimonial functions?
Ans. In fact scriptures advise performance of marriages and associated Agnihotra (Yagya) during the day only. However, it has become customary in India to perform marriages during the night because of the convenience and leisure of participants. Agnihotra associated with matrimonial functions performed during the night are, therefore, exceptions. Although marriages during the night  have become a norm for this reason, the best period for the ceremony is considered as the dusk time.

Q.8. What type of clothes are recommended during performance of  Yagya?

Ans. During a Yagya, the purifying energy emanating from the Agnihotra stimulates the outer skin and permeates the body through the physical perforations, bringing out sweat and other impurities from within. It is therefore, advisable to wear loose clothes to permit an easy intake of ‘ Pran’- the life-force and excretion of impure elements (Kalmash). For this reason, in ancient times a two-piece wear of Dhoti and Dupatta was recommended which permitted a free circulation of air in and around the body. Course, heavy and tight clothing is not advisable for this very reason, Dhoti and Kurta are cheap and convenient wears, which, besides meeting the above objectives, also serve the purpose of religious and cultural integrity. Dhoti and Kurta are also easily washable. In those regions where Dhoti-Kurta are not traditional wears, clean-washed Pyjama may be used. Socks should never be worn during the Sadhana. These are considered as dirty as shoes. (However, to ward off extreme cold, one may wear clean socks reserved exclusively, for this purpose).

Though traditionally a yellow Dupatta (Angavastra) on shoulders is recommended, it is not mandatory. Ladies may wear yellow Saree  or a loose traditional wear.
  
For Group performance, it is advisable to keep stock of spare clothes for the visiting participants. Continuance of a Yagya in the night is not justifiable.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 67

👉 बोध

बोध का परिणाम है त्याग। जो अन्तस में बोध के घटित हुए बिना त्याग करते हैं, उनका जीवन केवल आडम्बर बन कर रह जाता है। अन्तर्भावों की घुटन, बेचैनी उन्हें निरन्तर सालती रहती है। एक युवक भगवान् तथागत के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर विजय का भाव था। अपने भावों को व्यक्त करते हुए उसने शास्ता से कहा- उसने गृह त्याग करने की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। अब वह भिक्षु बनने के योग्य हो गया है। उस युवक के इस दर्प भरे कथन पर भगवान् हँस दिए।
  
महात्मा बुद्ध की इस हँसी को वहाँ पास बैठे सारिपुत्र ने देखा। युवक के चले जाने के बाद उन्होंने भगवान् से हँसी का रहस्य जानना चाहा। उत्तर में सारिपुत्र की ओर देखते हुए बुद्ध बोले, संसार की तैयारियों की बात तो सुनी थी, पर संन्यास की तैयारियाँ क्या है? यह कथन समझ में नहीं आया। संसार से संन्यास में परिवर्तन, चित्त में बोध क्रान्ति के बिना घटित नहीं हो सकता। त्याग करना, संन्यास लेना, भिक्षु होना, न तो वेष परिवर्तन है, न नाम परिवर्तन और न गृह परिवर्तन है। यह तो विशुद्ध दृष्टि परिवर्तन है।
  
त्याग के लिए तो चित्त का समग्र परिवर्तन होना चाहिए। इस क्रान्ति के लिए बौद्धिक गणितीय जोड़-तोड़, विभाजन गुणन फल के समीकरण काम नहीं देते। संसार में सफल होने की सारणियाँ भी यहाँ काम नहीं आती। सांसारिकता का सम्पूर्ण गणित इस बोध के लिए न केवल व्यर्थ है, बल्कि विघ्न भी है। स्वप्न की नियमावलियाँ, जैसे जागरण में काम नहीं आती हैं, वैसे ही संसार के सत्य संन्यास में काम नहीं आते। आखिर वैराग्य और संन्यास संसार के स्वप्न से जागरण ही तो है।
  
शास्ता के इन शाश्वत वचनों ने सारिपुत्र के अन्तःकरण को छुआ। पर इनसे अछूता वह युवक फिर से एक दिन बुद्ध के पास आया और थोड़ा चिन्तित स्वर में बोला, त्याग की सारी तैयारियों में एक कसर बाकी रह गयी है। अभी चीवर की व्यवस्था जुटानी है। उसके इस कथन पर बुद्ध विहंस कर बोले, युवक सारा सामान छोड़ने के लिए ही कोई भिक्षु होता है, तू उसी को जुटाने के लिए परेशान है। जा अपनी दुनियाँ में लौट जा, तू अभी भिक्षु होने योग्य नहीं है। इसके लिए तो बोध की सम्पदा चाहिए जो विवेक-वैराग्य के बिना नहीं मिलती

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७९

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (अंतिम भाग)

आज के दिन हमने अपने ब्रह्मवर्चस का उद्घाटन कराया था। ब्रह्मवर्चस एक सिद्धान्त है कि मनुष्य के भीतर अनन्त शक्तियों का जखीरा सोया हुआ है जिसे जगाना है। जगाने के लिए तप करना पड़ता है। तप करके हम अपने भीतर सोए हुए स्रोतों को जगा सकते हैं, उभार सकते हैं। तप करने का सिद्धान्त यह है, जिससे खाने-पीने से लेकर ब्रह्मवर्चस के नियम पालने तक के बहिरंग तप आते है और भीतर वाले तप में हम अपनी अन्तरात्मा और चेतना को तपा डालते हैं। तप करने से शक्तियाँ आती हैं, मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए सामान्य जीवन में आस्तिकता अपनानी और बहिरंग जीवन में तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या का अर्थ लोकहित के लिए, सिद्धान्तों के लिए मुसीबतें सहने से है। तप करने की शिक्षा ब्रह्मवर्चस द्वारा सिखाते हैं। यह एक प्रतीक है, सिम्बल है, एक स्थान है। मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण—यही हमारे दो सपने हैं। हमारी कुण्डलिनी और शक्तिपात इन्हीं दो प्रयोजनों में काम आती हैं, तीसरे किसी प्रयोजन में नहीं। तपपरायण और लोकोपयोगी जीवन यही मनुष्य में देवत्व का उदय है।

धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग बैकुण्ठ में ही नहीं वरन् जमीन पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे आदमी, शरीफ आदमी, अच्छी नीयत के आदमी ठीक परम्परा को अपनाकर भले आदमियों के तरीके से रहते हैं वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है। हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा मोहल्ला बना दें, एक ऐसा ग्राम बसा दें, जिसमें त्याग करने वाले, सेवा करने वाले लोग आएँ और वहाँ पर सिद्धान्तों के आधार पर जिएँ, हल्की-फुल्की, हँसती-हँसाती शान्ति की जिन्दगी जिएँ, मोहब्बत की जिन्दगी जिएँ और यह दिखा सकें कि लोकोपयोगी जिन्दगी भी जी जा सकती है क्या? धरती पर इसका एक नमूना बनाने के लिए हमने गायत्री नगर बसाया है। और आपको दावत देते हैं कि आप अपने बच्चे को संस्कारवान नहीं बना सकते तो उसको हमारे सुपुर्द कर दीजिए। आप कौन हैं? हम वाल्मीकि ऋषि हैं और वाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी औरत को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। दोनों संस्थाओं की वसन्त पंचमी के दिन इसीलिए स्थापना की गई है। आस्तिकता के लिए, ज्ञानयज्ञ के लिए, विचार-क्रान्ति के लिए यह एक नमूना है।

तपश्चर्या के सिद्धान्तों को प्राणवान बनाने के लिए, ज्ञान-विज्ञान के लिए, ब्रह्मवर्चस और आस्तिकता को जीवित करने के लिए, धरती पर स्वर्ग पैदा करने के लिए, हिल-मिलकर रहने और त्याग, बलिदान, सेवा की जिन्दगी जीने के लिए गायत्री नगर बसाया गया है। लोग यहाँ हमारा प्यार पाने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान-ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। मेरा भी मन था कि ‘एकदा नैमिषारण्ये’ के तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आएँ और हिल-मिलकर काम करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते हैं, ऐसा नगर बसाना चाहते हैं, जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन, भावी संसार अगर होगा तो स्वर्ग जैसा कैसे बनाया जा सकेगा? स्वर्ग में शान्ति का, परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं? ऐसा हम गायत्री नगर का उद्घाटन करते हैं। चूँकि हमारे गुरु ने यही दिया और उसके लिए वायदा किया कि तेरा ऊँचा उद्देश्य है, तो तेरे लिए कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों तो आपको कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा। मेरी एक ही इच्छा और एक ही कामना रही है कि वसन्त पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतर जो पक्ष है, उस पिटारी को खोलकर दिखाऊँ कि मेरे अन्दर कितना दर्द है? कितनी करुणा है? जीवन को पवित्र बनाने की कितनी संवेदना है? कितना देवत्व है? यही खोलकर आपको दिखाना चाहता था। अगर आपको ये चीजें पसन्द हों तो मैं चाहता हूँ कि आप इन चीजों को देखें, इनको परखें, छुएँ और अगर हिम्मत हो तो इनको खरीद ही ले जाएँ।
ॐ शान्ति।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कर्म फल

एक बार शंकर जी पार्वती जी भ्रमण पर निकले। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्चे तैर रहे थे, लेकिन एक बच्चा उदास मुद्रा में बैठा था। पार्वती जी ने शंकर जी से पूछा, यह बच्चा उदास क्यों है? शंकर जी ने कहा, बच्चे को ध्यान से देखो। पार्वती जी ने देखा, बच्चे के दोनों हाथ नही थे, जिस कारण वो तैर नही पा रहा था। पार्वती जी ने शंकर जी से कहा कि आप शक्ति से इस बच्चे को हाथ दे दो ताकि वो भी तैर सके।

शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार बार विनती की। आखिरकर शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा।

एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया : हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में नही पड़ते है। उसने पिछले जन्मो में हाथों द्वारा यही कार्य किया था इसलिए उसके हाथ नही थे। हाथ देने से पुनः वह दूसरों की हानि करने लगा है।

प्रकृति नियम के अनुसार चलती है, किसी के साथ कोई पक्षपात नही। आत्माएँ जब ऊपर से नीचे आती हैं तो अच्छी ही होती हैं, कर्मो अनुसार कोई अपाहिज है तो कोई भिखारी, तो कोई गरीब तो कोई अमीर लेकिन सब परिवर्तन शील है। अगर महलों में रहकर या पैसे के नशे में आज कोई बुरा काम करता है तो कल उसका भुगतान तो सबको करना ही पड़ेगा।

👉 प्रत्याहार - क्या है ?

प्रत्याहार - (आष्‍टांग योग का पाँचवा अंग)  क्या है ?

ऋषिजन कहते है कि इंद्रियों के व्यर्थ स्खलन को रोकें और उसे उस दिशा में लगाएँ जिससे आपका जीवन सुख और शांतिमय व्यतीत हो।

अष्टांगयोग का पाँचवाँ अंग प्रत्याहार है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार यह पाँच योग के बाहरी अंग हैं अर्थात योग में प्रवेश करने की भूमिका मात्र।

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार इंद्रियों को इन घातक वासनाओं से विमुख कर अपनी आंतरिकता की ओर मोड़ देने का प्रयास करना ही प्रत्याहार है।

क्या है वासनाएँ : काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तो मोटे-मोटे नाम हैं, लेकिन व्यक्ति उन कई बाहरी बातों में रत रहता है जो आज के आधुनिक समाज की उपज हैं जैसे शराबखोरी, सिनेमाई दर्शन और चार्चाएँ, अत्यधिक शोरपूर्ण संगीत, अति भोजन जिसमें माँस भक्षण के प्रति आसक्ति, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और ऐसी अनेक बातें जिससे क‍ि पाँचों इंद्रियों पर अधिक भार पड़ता है और अंतत: वह समयपूर्व निढाल हो बीमारियों की चपेट में आ जाती है।

नुकसान : आँख रूप को, नाक गंध को, जीभ स्वाद को, कान शब्द को और त्वचा स्पर्श को भोगती है। भोगने की इस वृत्ति की जब अति होती है तो इस सबसे मन में विकार की वृद्धि होती है। ये भोग जैसे-जैसे बढ़ते हैं, इंद्रियाँ सक्रिय होकर मन को विक्षिप्त करती रहती हैं। मन ज्यादा व्यग्र तथा व्याकुल होने लगता है, जिससे शक्ति का क्षय होता है।

उपाय : इंद्रियों को भोगों से दूर करने तथा इंद्रियों के रुख को भीतर की ओर मोड़कर स्थिर रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास से इंद्रियाँ स्थिर हो जाती हैं। सभी विषय समाप्त हो जाते हैं। अतः प्राणायाम के अभ्यास से प्रत्याहार की स्थिति अपने आप बनने लगती है। दूसरा उपाय है रोज सुबह और शाम पाँच से तीस मिनट का ध्यान। इस सबके बावजूद अदि आपके भीतर संकल्प है तो आप संकल्प मात्र से ही प्रत्याहार की स्थिति में हो सकते हैं। हालाँकि प्रत्याहार को साधने के हठयोग में कई तरीके बताए गए हैं।

लाभ : यम, नियम, आसन और प्राणायम को साधने से प्रत्याहार स्वत: ही सध जाता है। इसके सधने से व्यक्ति का एनर्जी लेवल बढ़ता है। पवित्रता के कारण ओज में निखार आता है। किसी भी प्रकार के रोग शरीर और मन के पास फटकते तक नहीं हैं। आत्मविश्‍वास और विचार क्षमता बढ़ जाती है, जिससे धारणा सिद्धि में सहयोग मिलता है। खासकर यह अनंत में छलाँग लगाने के लिए स्वयं के तैयार होने की स्थिति है।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

👉 श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता- ऐसा सुमधुर गीत है, जिसे स्वयं भगवान् ने गाया है। धर्मभूमि-कुरुक्षेत्र में खड़े विश्वरूप विश्वगुरु श्रीकृष्ण ने कर्म का यह काव्य कहा है। इसमें सृष्टि की सरगम है- जीवन के बोल हैं। सृष्टि सृजन-स्थिति और विलय का कोई भी ऐसा रहस्य नहीं है- जिसे इस भगवद् गान में गाया न गया हो। इसी तरह जीवन के सभी आयाम- सभी विद्याएँ इसमें बड़े ही अपूर्व ढंग से प्रकट हुई हैं। इस दिव्य गीत के सृष्टि सप्तक (सप्तलोक) को प्रकृति अष्टक (अष्टधा प्रकृति) के साथ स्वयं भगवती चित्शक्ति ने अपनी चैतन्य धाराओं में गूँथा है।
  
श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय स्वयं भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में कहा गया है।
‘‘ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे ........ नाम ..........अध्यायः।’’
ॐकार परमेश्वर का तत्-सत् रूप में स्मरण करते हुए बताया गया है कि यह भगवद् गान उपनिषद् है- यह ब्रह्मविद्या है, यह योगशास्त्र है, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ है। भगवद्गीता के इस परिचय में गहनता और व्यापकता दोनों है। यह भगवद्गीता, उपनिषदों की परम्परा में श्रेष्ठतम उपनिषद् है।
  
इस उपनिषद् के आचार्य श्रीकृष्ण हैं और शिष्य धनुषपाणि अर्जुन हैं। आचार्य श्रीकृष्ण समस्त ज्ञान का आदि हैं और अन्त हैं। वे स्वयं अनन्त हैं। शिष्य अर्जुन-जिज्ञासु हैं, गुरुनिष्ठ हैं और अपने सद्गुरु भगवान् गुरु को पूर्णतया समर्पित हैं। सद्गुरु व सत्शिष्य की इसी स्थिति में ब्रह्मविद्या प्रकट होती है। सृष्टि व जीवन के सभी रहस्य कहे-सुने-समझे व आत्मसात् किए जाते हैं। परन्तु इन रहस्यों का साक्षात् व साकार तभी स्पष्ट होता है- जब शिष्य योग साधक बनकर सद्गुरु द्वारा उपदिष्ट योग साधना का अभ्यास करे। योग की विविध तकनीकों का इसमें प्राकट्य होने से ही गीता योगशास्त्र है।
  
अन्त में यह कहा गया है कि उपनिषद् प्रणीत यह ब्रह्मविद्या- योगशास्त्र तभी समझा जा सकता है, जब कृष्ण-अर्जुन संवाद की स्थिति बने। जो अर्जुन की तरह गुरुनिष्ठ शिष्य नहीं है, उसका तो हमेशा भगवान् गुरु श्रीकृष्ण से विवाद ही रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता तो केवल उनके अन्तस् में अपने स्वरों को झंकृत करती है, जो भगवान् के साथ समस्वरित है। संवाद की यह विशेषता बने तो आज भी पृथ्वीतत्त्व से बनी धर्मभूमि देह में परात्पर चेतना बनकर विद्यमान परमात्मा श्रीकृष्ण- जीवात्मा अर्जुन को निष्काम कर्म का काव्य सुनाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७१

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

👉 मनन

मनन - मन से मन-न होने की आध्यात्मिक यात्रा है। यह ऐसी अनोखी प्रक्रिया है- जिसमें संलग्न होने- समर्पित होने पर मन का सम्पूर्णतया विसर्जन और विलय हो जाता है। इस सच पर कितना ही कोई अचरज क्यों न करे, फिर भी सच तो सच ही है। हालांकि इस अनूठे रहस्य से कम ही लोग परिचित हैं। जबकि मनन शब्द का चलन बहुतायत में होता है। अनेकों-अनेक बार इसका प्रयोग करते हैं। फिर भी इसके आध्यात्मिक रहस्य का स्पर्श विरले ही कर पाते हैं।
  
सामान्य सोच तो एक विचार को बार-बार सोचते रहने को मनन मान लेती है। जबकि आध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि मन में उठती किसी विशेष विचार की गुनगुनाहट-गूँज अथवा ध्वनि-प्रतिध्वनि को मनन कहना ठीक नहीं है। यह तो एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति है- जो किसी सत्यान्वेषी साधक को तब होती है, जब वह किसी पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसी दिव्य छवि को अपने में धारण करता है।
  
यदि पवित्र तत्त्वों-सत्यों को ठीक से धारण कर लिया गया है, तो मन में स्वतः ही धारणा घटित होने लगती है। मन कुछ उसी तरह मौन हो उसकी अनुभूति में डूबता है, जैसे कि कोई स्वाद लोलुप व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन करते समय- मूक और मौन हो स्वाद के अनुभव में खो जाता है। उस समय उसके अन्दर की हल-चल थम जाती है। उसे अपने आस-पास होने वाली उथल-पुथल का भी ध्यान नहीं रहता।
  
कुछ ऐसी ही घटना तब घटित होती है- जब मन-मनन में डूबता है। जैसे-जैसे उसमें धारण किए गए पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि की अनुभूति प्रगाढ़ होती है, वह विलीन होता जाता है। यह विलीनता इस कदर प्रगाढ़ होती है कि मन, उसमें संजोयी सारी संस्कार राशि, कर्म बीजों का ढेर, आदतें, प्रवृत्तियाँ सभी खो जाती हैं। यहाँ तक कि मन-मन-न में परिवर्तित हो जाता है। मन का यह परिवर्तन और रूपान्तरण ही तो मन-न है। जिसके परिणाम में अन्तस् में उज्ज्वल आत्म प्रकाश की धाराएँ फूट पड़ती हैं। यह ऐसा सच है जिसे जो करे - सो जाने।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७०

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 3)

Q.3. Is it necessary to perform Yagya daily?

Ans. Gayatri and Yagya constitute a pair. Gayatri has
been called righteous wisdom and Yagya as righteous act. Coordination of both gives wisdom to solve all problems. Yagya may be performed as and when it is convenient. It can suffice to utter Gayatri Mantra and offer ghee and sugar in fire. If it is sought to be more brief, the purpose of symbolic worship of Agnihotra can also be fulfilled if a Ghrit lamp is lighted, incense- stick is burnt and Gayatri Mantra is uttered. If even this brief ritual cannot be performed daily, it should be done once in a week or on any convenient day at least once in a month. Those who are not acquainted with the procedure, and facilitators and material resources are not available, can write to Shantikunj for performance of Yagya in requisite quantity. Yagya is performed daily in Shantikunj for two hours in three Yagyashala having nine Yagya Kunds each.  

Q.4. How many Kunds are required in a Yagya?

Ans. On a small scale, the members of the family may offer 2400 (cumulative) Ahutis in a Single Kund Yagya. If neighbours, relatives and friends also wish to participate, a five Kundiya Yagya may be organised and five thousand oblations offered.

Q.5. What type of Prasad is recommended during  Poornahuti?

Ans. In the existing circumstances, it is advised to replace Brahmbhoj with Brahmadan, wherein instead of sweets, literature pertaining to Gayatri Sadhana is distributed as Prasad to the deserving participants.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 64

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग ५)

आज के दिन मेरे मन में एक ही विचार आता है कि यहाँ जो भी लोग आते हैं, उनको मेरे कीमती सौभाग्य का एक हिस्सा मिल जाता तो उनका नाम, यश अजर-अमर हो जाता। इतिहास के पन्नों पर उनका नाम रहता। अभी आपको जैसा घिनौना, मुसीबतों से भरा समस्याओं से भरा जीना पड़ता है, तब जीना न पड़े। आप अपनी समस्याओं का समाधान करने के साथ-साथ हजारों की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ बनें। फिर आपको न कहना पड़े कि गुरुजी हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए। फिर क्या करना पड़े? गुरुजी को ही आपके पास आना पड़े और कहना पड़े कि हमारी मुसीबत दूर कर सकते हो तो कर दीजिए। विवेकानन्द के पास रामकृष्ण परमहंस जाते थे और कहते थे कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए और हमारे पास भी हमारा गुरु आया था यह कहने कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए। उन्होंने कहा—हम चाहते हैं कि दुनिया का रूप बदल जाए, नक्शा बदल जाए, दुनिया का कायाकल्प हो जाए। तो आप खुद नहीं कर सकते नहीं, खुद नहीं कर सकते। जीभ माइक का काम नहीं कर सकती और माइक जीभ का काम नहीं कर सकता। जीभ और माइक दोनों के सम्पर्क से कितनी दूर तक आवाज फैलती है? हमारा गुरु जीभ है और हम माइक हैं, उनके विचारों को फैलाते हैं। हम चाहते हैं कि आप भी ‘लायक’ हो जाइए। अगर आपके भीतर ‘लायकी’ पैदा हो जाए तो मजा आ जाए। तब दोनों चीजें शक्तिपात और कुण्डलिनी जो भगवान के दोनों हाथों में रखी हुई हैं, आपको मिल जाएगी। शर्त केवल एक ही है कि अपने आपको ‘लायक’ बना लें, पात्र बना लें। यदि लायक नहीं बने तो मुश्किल पड़ जाएगी। कुण्डलिनी जागरण के लिए पात्रता और श्रद्धा का होना पहली शर्त है।

आज का दिन ऊँचे उद्देश्यों से भरा पड़ा है। हमारे जीवन का इतिहास पढ़ते हुए चले जाइए, हर कदम वसन्त पंचमी के दिन ही उठे हैं। हर वसन्त पंचमी पर हमारे भीतर एक हूक उठती है, एक उमंग उठती है। उस उमंग ने कुछ ऐसा काम नहीं कराया, जिससे हमारा व्यक्तिगत फायदा होता हो। समाज के लिए, लोकमंगल के लिए, धर्म और संस्कृति की सेवा के लिए ही हमने प्रत्येक वसन्त पंचमी पर कदम उठाए हैं। आज फिर इसी पर्व पर तीन कदम उठाते हैं। पहला कदम सारे विश्व में आस्तिकता का वातावरण बनाने का है। आस्तिकता के वातावरण का अर्थ है—नैतिकता, धार्मिकता, कर्तव्यपरायणता के वातावरण का विस्तार। ईश्वर की मान्यता के साथ बहुत सारी समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। ईश्वर एक अंकुश है। उस अंकुश को हम स्वीकार करें, कर्मफल के सिद्धान्त को स्वीकार करें और अनुभव करें कि एक ऐसी सत्ता दुनिया में काम कर रही है जो सुपीरियर है, अच्छी है नेक है, पवित्र है। उसी का अंकुश है और उसी के साथ चलने में भलाई है। यह आस्तिकता का सिद्धान्त है। इसी को अग्रगामी बनाने के लिए हमने गायत्री माता के मन्दिर बनाए हैं। गायत्री माता का अर्थ है—विवेकशीलता, करुणा, पवित्रता, श्रद्धा। इन्हीं सब चीजों का विस्तार करने के लिए आपसे भी कहा गया है कि आप अपने घरों में, पड़ोस के घरों में गायत्री माता का एक चित्र अवश्य रखें। घर-परिवार में आस्तिकता का वातावरण बनाएँ।

यज्ञ और गायत्री की परम्परा को हम जिन्दा रखना चाहते हैं। इसके विस्तार के लिए चल पुस्तकालय चलाने से लेकर ढकेल गाड़ी—ज्ञानरथ चलाने के लिए दो घण्टे का समय प्रत्येक परिजन को निकालना चाहिए। यही दो घण्टे भगवान का भजन है। भगवान के भजन का अर्थ है—भगवान की विचारणा को व्यापक रूप में फैलाना। हमने यही सीखा है और चाहते हैं कि आपका भी कुछ समय गायत्री माता की पूजा में लगे। जैसे हमारे गुरुजी ने हमसे समय माँगा था और हमें निहाल किया था, वही बात आज आपसे भी कही जा रही है कि अपने समय का कुछ अंश आप हमें भी दीजिए आस्तिकता को फैलाने के लिए। पाने के लिए कुछ न कुछ तो देना ही पड़ता है। पाने की उम्मीद करते हैं तो त्याग करना भी सीखना होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 26 जनवरी 2020

👉 साधना की सफलता का मार्ग


👉 सहनशीलता एवं क्षमाशीलता


बुद्ध भगवान एक गाँव में उपदेश दे रहे थे। उन्होंने कहा कि “हर किसी को धरती माता की तरह सहनशील तथा क्षमाशील होना चाहिए। क्रोध ऐसी आग है जिसमें क्रोध करने वाला दूसरों को जलाएगा तथा खुद भी जल जाएगा।”

सभा में सभी शान्ति से बुद्ध की वाणी सुन रहे थे, लेकिन वहाँ स्वभाव से ही अतिक्रोधी एक ऐसा व्यक्ति भी बैठा हुआ था जिसे ये सारी बातें बेतुकी लग रही थी। वह कुछ देर ये सब सुनता रहा फिर अचानक ही आग- बबूला होकर बोलने लगा, “तुम पाखंडी हो। बड़ी-बड़ी बातें करना यही तुम्हारा काम है। तुम लोगों को भ्रमित कर रहे हो, तुम्हारी ये बातें आज के समय में कोई मायने नहीं रखतीं “

ऐसे कई कटु वचनों सुनकर भी बुद्ध शांत रहे। अपनी बातों से ना तो वह दुखी हुए, ना ही कोई प्रतिक्रिया की; यह देखकर वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और उसने बुद्ध के मुंह पर थूक कर वहाँ से चला गया।

अगले दिन जब उस व्यक्ति का क्रोध शांत हुआ तो उसे अपने बुरे व्यवहार के कारण पछतावे की आग में जलने लगा और वह उन्हें ढूंढते हुए उसी स्थान पर पहुंचा, पर बुद्ध कहाँ मिलते वह तो अपने शिष्यों के साथ पास वाले एक अन्य गाँव निकल चुके थे।

व्यक्ति ने बुद्ध के बारे में लोगों से पूछा और ढूंढते- ढूंढते जहाँ बुद्ध प्रवचन दे रहे थे वहाँ पहुँच गया। उन्हें देखते ही वह उनके चरणो में गिर पड़ा और बोला , “मुझे क्षमा कीजिए प्रभु!”

बुद्ध ने पूछा : "कौन हो भाई? तुम्हे क्या हुआ है ? क्यों क्षमा मांग रहे हो?”

उसने कहा : “क्या आप भूल गए। मै वही हूँ जिसने कल आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था। मै शर्मिन्दा हूँ। मैं मेरे दुष्ट आचरण की क्षमा याचना करने आया हूँ।”

भगवान बुद्ध ने प्रेमपूर्वक कहा : “बीता हुआ कल तो मैं वहीं छोड़कर आया और तुम अभी भी वहीँ अटके हुए हो। तुम्हें अपनी ग़लती का आभास हो गया, तुमने पश्चाताप कर लिया; तुम निर्मल हो चुके हो; अब तुम आज में प्रवेश करो। बुरी बातें तथा बुरी घटनाएँ याद करते रहने से वर्तमान और भविष्य दोनों बिगड़ते जाते है। बीते हुए कल के कारण आज को मत बिगाड़ो।”

उस व्यक्ति का सारा बोझ उतर गया। उसने भगवान बुद्ध के चरणों में पड़कर क्रोध त्याग कर तथा क्षमाशीलता का संकल्प लिया; बुद्ध ने उसके मस्तिष्क पर आशीष का हाथ रखा। उस दिन से उसमें परिवर्तन आ गया, और उसके जीवन में सत्य, प्रेम व करुणा की धारा बहने लगी।

मित्रों, बहुत बार हम भूत में की गयी किसी गलती के बारे में सोच कर बार-बार दुखी होते और खुद को कोसते हैं। हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए, गलती का बोध हो जाने पर हमे उसे कभी ना दोहराने का संकल्प लेना चाहिए और एक नयी ऊर्जा के साथ वर्तमान को सुदृढ़ बनाना चाहिए।

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 2)

Q.2. Is it necessary to perform Yagya along with Jap of Gayatri Mantra?

Ans. Gayatri and Yagya form an inseparable pair. One is said to be the mother of Indian culture and the other, the father. They are inter-linked. Gayatri Anusthan cannot be said to be fully accomplished unless it is accompanied by Yagya. In old affluent times Agnihotra used to be performed with number of Ahutis equal to one-tenth of the quantum of Jap, but now, in view of the prevailing circumstances, Ahutis are given in one to hundredth ratio. Those lacking in requisite resources fulfil the requirement of Yagya by performing one-tenth additional Jap.

There is a reference in the scriptures to a famous ancient dialogue between Janak and Yagyavalkya. Janak went on pointing out the difficulties in daily performance of Yagya because of non-availability of required materials whereas Yagyavalkya, while emphasising the essentiality of performing Yagya, said that even if charu and other materials are not available, food grains of daily consumption can be offered in Havan. If they are also not available, mental Yagya can be performed by offering meditation and divine sentiments in the fire of reverence and devotion. It has thus been emphasized that not only in Anusthan, but even in daily Sadhana, Yagya is essential along with Gayatri Jap.   

In emergency, house-wives used to utter Gayatri Mantra and offer five morsels of first chapati in the hearth in the kitchen. The daily routine of food to God before taking meals was known as Balivaishwa (cf.. Saying Grace).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 63

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग ४)

कुण्डलिनी क्या होती है? कुण्डलिनी हम करुणा को कहते हैं, विवेकशीलता को कहते हैं। करुणा उसे कहते हैं जिसमें दूसरों के दुःख-दर्द को देखकर के आदमी रो पड़ता है। विवेक यह कहता है कि फैसला करने के लिए हमको ऊँचा आदमी होना चाहिए जैसे कि जापान का गाँधी कागावा हुआ। उसने अपना सम्पूर्ण जीवन बीमार लोगों, पिछड़े लोगों, दरिद्रों और कोढ़ियों की सेवा में लगा दिया। चौबीसों घण्टे उन्हीं लोगों के बीच वह काम में रहता। कौन कराता था उससे यह सब? करुणा कराती थी। इसी को हम कुण्डलिनी कहते हैं, जो आदमी के भीतर हलचल पैदा कर देती है, रोमांच पैदा कर देती है, एक दर्द पैदा कर देती है, भगवान जब किसी इनसान के भीतर आता है तो एक दर्द के रूप में आता है, करुणा के रूप में आता है।

भगवान मिट्टी का बना हुआ जड़ नहीं है, वह चेतन है और चेतना का कोई रूप नहीं हो सकता, कोई शक्ल नहीं हो सकती। ब्रह्म चेतन है और चेतन केवल संवेदना हो सकती है और संवेदना कैसी होती है? विवेकशीलता के रूप में और करुणा के रूप में। आदर्श हमारे पास हों और वास्तविक हों तो उनके अन्दर एक ऐसा मैग्नेट है जो इनसान की सहानुभूति, जनता का समर्थन और भगवान की सहायता तीनों चीजें खींचकर लाता हुआ चला जाता है। कागावा के साथ यही हुआ। जब उसने दुखियारों की सेवा करनी शुरू कर दी तो उसको यह तीनों चीजें मिलती चली गईं। आदमी के भीतर जब करुणा जाग्रत होती है तो सन्त बन जाता है, ऋषि बन जाता है। हिन्दुस्तान के ऋषियों का इतिहास ठीक ऐसा ही रहा है।

जिस किसी का कुण्डलिनी जागरण जब होता है तो ऋद्धियाँ आती हैं, सिद्धियाँ आती हैं, चमत्कार आते हैं। उससे यह अपना भला करता है और दूसरों का भला करता है। मेरा गुरु आया मेरी कुण्डलिनी जाग्रत करता चला गया। हम जो भी प्राप्त करते हैं, अपनी करुणा को पूरा करने के लिए, विवेकशीलता को पूरा करने के लिए खर्च कर देते हैं और उसके बदले मिलता है असीम सन्तोष, शान्ति और प्रसन्नता। दुःखी और पीड़ित आदमी जब यहाँ आँखों में आँसू भरकर आते हैं तो सांसारिक दृष्टि से उनकी सहायता कर देने पर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। शारीरिक से लेकर मानसिक बीमारों तक, दुखियारों एवं मानसिक दृष्टि से कमजोरों से लेकर गिरे हुए आदमी तक, जो पहले कैसा घिनौना जीवन जीते थे, उनके जीवन में जो हेर-फेर हुए हैं, उनको देखकर बेहद खुशी होती है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह कुण्डलिनी का चमत्कार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परिवर्तन

जीवन में सकारात्मक परिवर्तन सम्भव है। दुःख का सुख में परिवर्तन, शक्तिहीनता का शक्ति सम्पन्नता में परिवर्तन, यहाँ तक कि गुलामी का बादशाहत में परिवर्तन घटित हो सकता है। परन्तु तभी, जब यह कोई स्वयं चाहे। बीते इतिहास के पन्ने कथा सुनाते हैं कि स्वामी रामतीर्थ ने अमेरिका में जाकर घोषणा की- मित्रों! मैं तुम्हारे लिए परिवर्तन का सन्देश लेकर आया हूँ। मैं तुम्हें वह रहस्य बताने आया हूँ, जिसे जानकर तुम अपने दुःख को सुख में, असहायता को शक्ति सम्पन्नता में और दासता को प्रभुता में परिवर्तित कर सकते हो। हाँ तुम भी, तुम सभी भी बन सकते हो सम्राट्।
  
उन्हें सुनने वाले चौंके- भला इस संसार में सभी एक साथ सम्राट कैसे हो सकते हैं? उत्तर में रामतीर्थ ने हँसते हुए कहा- हो सकते हैं। एक ऐसा साम्राज्य भी है, जहाँ सभी सम्राट हो सकते हैं। हालांकि वर्तमान का सच यही है कि अभी हम जिस संसार को जानते हैं, वहाँ सभी गुलाम हैं। बस वे स्वयं को सम्राट समझने के भ्रम में जरूर हैं।
  
महात्मा ईसा ने कहा था, परमात्मा का साम्राज्य तुम्हारे भीतर है और हममेंं से प्रायः हर एक ने इस ओर से मुँह मोड़ रखा है। हम तो बस बाहर की दुनिया में संघर्ष कर रहे हैं। उलझे हैं- बहुत कुछ पा लेने की प्रतियोगिता में। पर क्या यह पता नहीं है कि जिन्होंने बाहर के राज्य को जीता है, उन्होंने स्वयं को खो दिया है। और जिसने स्वयं को खो दिया है, भला सम्राट कैसे हो सकता है? क्योंकि सम्राट होने के लिए कम से कम स्वयं होना तो जरूरी है।
  
बाहर का द्वार दरिद्रता की ओर ले जाता है। वासनाएँ, तृष्णाएँ, कामनाएँ कभी किसी को मुक्त नहीं करतीं, बल्कि वे सूक्ष्म से सूक्ष्म और सख्त से सख्त बन्धनों में बांध लेती हैं। वासना की सांकलों से मजबूत सांकलें न तो अब तक बनायी जा सकीं हैं और न आगे कभी बनायी जा सकेंगी। दरअसल इतना मजबूत फौलाद और कहीं होता भी नहीं है। इन अदृश्य जंजीरों से बंधा हुआ व्यक्ति न तो सुखी हो सकता है और न स्वतंत्र और शक्ति सम्पन्न।
  
यह तो केवल तभी सम्भव है- जब जीवन में परिवर्तन का पवन प्रवाहित हो। बहिर्मुखी वृत्तियाँ अन्तर्मुखी हो, संघर्ष संस्कारों की शुद्धि के लिए हो। प्रतियोगिता स्वयं को पहचानने और पाने के लिए हो। निश्चय ही - जो स्वयं को पहचान सके, पा सके, वे ही अपने दुःख को सुख में, असहायता को शक्ति  सम्पन्नता में और दासता को बादशाहत में परिवर्तित कर सकते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६९

शनिवार, 25 जनवरी 2020

👉 कर्तव्यपालन का अपूर्व उदाहरण


👉 सत्संग

एक शिष्य ने अपने गुरुदेव से पूछा- "गुरुदेव, आपने कहा था कि धर्म से जीवन का रूपान्तरण होता है। लेकिन इतने दीर्घ समय तक आपके चरणों में रहने के बावजूद भी मैं अपने रूपान्तरण को महसूस नहीं कर पा रहा हूँ, तो क्या धर्म से जीवन का रूपान्तरण नहीं होता है?"

गुरुदेव मुस्कुराये और उन्होंने बतलाया- "एक काम करो, थोड़ी सी मदिरा लेकर आओ।" शिष्य चौंक गया पर फिर भी शिष्य उठ कर गया और लोटे में मदिरा लेकर आया।

गुरुदेव ने शिष्य से कहा- "अब इससे कुल्ला करो।" मदिरा को लोटे में भरकर शिष्य कुल्ला करने लगा। कुल्ला करते-करते लोटा खाली हो गया।

गुरुदेव ने पुछा- "बताओ तुम्हें नशा चढ़ा या नहीं?"

शिष्य ने कहा- "गुरुदेव, नशा कैसे चढ़ेगा? मैंने तो सिर्फ कुल्ला ही किया है। मैंने उसको कंठ के नीचे उतारा ही नहीं, तो नशा चढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

इस पर संत ने कहा- "इतने वर्षो से तुम धर्म का कुल्ला करते आ रहे हो। यदि तुम इसको गले से नीचे उतारते तो तुम पर धर्म का असर पड़ता।

जो लोग केवल सतही स्तर पर धर्म का पालन करते हैं। जिनके गले से नीचे धर्म नहीं उतरता, उनकी धार्मिक क्रियायें और जीवन-व्यवहार में बहुत अंतर दिखाई पड़ता है। वे मंदिर में कुछ होते हैं, व्यापार में कुछ और हो जाते है। वे प्रभु के चरणों में कुछ और होते हैं एवं अपने जीवन-व्यवहार में कुछ और, धर्म ऐसा नहीं हैं, जहाँ हम बहुरूपियों की तरह जब चाहे जैसा चाहे वैसा स्वांग रच ले। धर्म स्वांग नहीं है, धर्म अभिनय नहीं है, अपितु धर्म तो जीने की कला है, एक श्रेष्ठ पद्धति है।।"

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 1)

Q.1. What is the significance of Yagya in spirituality?              
Ans. Gayatri has been regarded as the mother and, Yagya as father of Indian spiritual tradition. Yagya finds place in all sacred and auspicious ceremonies in Indian culture. In Gayatri Upasana too, it is essential. The number of oblations in Havan may preferably be one-tenth of the number of  Japs in an Anusthan or Purascharan. However, if it is not found convenient, one-tenth of this number would also suffice.
  
The spiritual birth of a human being who is otherwise born as any other animal, takes place on his initiation by a Guru, whereafter he becomes a Dwij with Yagya and Gayatri as his parents. It, therefore, becomes obligatory for him to serve his spiritual parents.   

Scriptures prescribe daily ritual of Balivaishwa which means initially offering a small morsel of everyday food as an oblation to fire. (Saying a prayer at the dining table too is a variant of this ritual)  Poornahuti and Brahmabhoj are essential at the end of the Yagya. If one is not able to participate in a Yagya on account of some contingency, a coconut may be offered as oblation as Poornahuti somewhere else, where a large Yagya is being performed.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 63

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग ३)

शक्तिपात कैसे कर दिया? शक्तिपात क्या होता है? शक्तिपात को मामूली तौर पर समझते हैं कि गुरु की आँखों में से, शरीर में से बिजली का करेन्ट आता है और चेले में बिजली छू जाती है और चेला काँप जाता है। वस्तुतः यह कोई शक्तिपात नहीं है और शारीरिक शक्तिपात से कोई बनता भी नहीं। शक्तिपात कहते हैं चेतना का शक्तिपात, चेतना में शक्ति उत्पन्न करने वाला। चेतना की शक्ति भावनाओं के रूप में, संवेदनाओं के रूप में दिखाई पड़ती है, शरीर में झटके नहीं मारती। इसका सम्बन्ध चेतना से है, हिम्मत से है। चेतना की उस शक्ति का ही नाम हिम्मत है, जो सिद्धान्तों को, आदर्शों को पकड़ने के लिए जीवन में काम आती है। इसके लिए ऐसी ताकत चाहिए जैसी कि मछली में होती है। मछली पानी की धारा को चीरती हुई, लहरों को फाड़ती हुई उलटी दिशा में छलछलाती हुई बढ़ती जाती है।

यही चेतना की शक्ति है, यही ताकत है। आदर्शों को जीवन में उतारने में इतनी कमजोरियाँ आड़े आती हैं, जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता। लोभ की कमजोरी, मोह की कमजोरी, वातावरण की कमजोरी, पड़ोसी की कमजोरी, मित्रों की कमजोरी—इतनी लाखों कमजोरियों को मछली के तरीके से चीरता हुआ जो आदमी आगे बढ़ सकता है, उसे मैं अध्यात्म दृष्टि से शक्तिवान कह सकता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे इसी तरीके से शक्तिवान बनाया। बीस वर्ष की उम्र में तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद मैं घर से निकल गया और काँग्रेस में भर्ती हो गया। थोड़े दिनों तक उसी का काम करता रहा फिर जेल चला गया। इसे कहते हैं हिम्मत और जुर्रत, जो सिद्धान्तों के लिए, आदर्शों के लिए आदमी के अन्दर एक जुनून पैदा करती है, समर्थ पैदा करती है कि हम आदर्शवादी होकर जियेंगे। इसी का नाम शक्तिपात है।

शक्तिपात कैसे होता है, इसका एक उदाहरण मीरा का है। वह घर में बैठी रोती रहती थी। घर वाले कहा करते थे कि तुम्हें हमारे खानदान की बात माननी पड़ेगी और तुम घर से बाहर नहीं जा सकती। मीरा ने गोस्वामी तुलसीदास को एक चिट्ठी लिखी कि इन परिस्थितियों में हम क्या कर सकते हैं? गोस्वामी जी ने कहा—परिस्थितियाँ तो ऐसी ही रहती हैं। दुनिया में परिस्थितियाँ किसी की नहीं बदलतीं। आदमी की मनःस्थिति बदल दें तो परिस्थितियाँ बदल जाएँगी। चिट्ठी तो क्या उन्होंने एक कविता लिखी मीरा को—
‘जाके प्रिय न राम वैदेही।
तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।।’

यह कविता नहीं शक्तिपात था। शक्तिपात के सिद्धान्तों को पक्का करने के लिए यह मुझे बहुत पसन्द आती है और जब तब मेरा मन होता है, उसे याद करता रहता हूँ और हिम्मत से, ताकत से भर जाता हूँ। मुझमें असीम शक्ति भरी हुई है। सिद्धान्तों को पालने के लिए, हमने सामने वाले विरोधियों, शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरों और अपने नजदीक वाले मित्रों—सभी का मुकाबला किया है। सोने की जंजीरों से टक्कर मारी है। जीवनपर्यन्त अपने लिए, आपके लिए, समाज के लिए, सारे विश्व के लिए, महिलाओं के लिए, अधिकारों के लिए मैं अकेला ही टक्कर मारता चला गया। अनीति से संघर्ष करने के लिए युग-निर्माण का, विचार-क्रान्ति का सूत्रपात किया। इस मामले में हम राजपूत हैं। हमारे भीतर परशुराम के तरीके से रोम-रोम में शौर्य और साहस भर दिया गया है। हम महामानव हैं। कौन-कौन हैं? बता नहीं सकते हम कौन हैं? ये सारी की सारी चीजें वहाँ से हुईं, जो मुझे गुरु ने शक्तिपात के रूप में दी, हिम्मत के रूप में दीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमात्मा की प्रतीति

परमात्मा की प्रतीति प्रेम में होती है। यही उसकी सत्ता का सत्य है। इसी में उसकी शक्ति समाहित है। परमात्मा की अभिव्यक्ति का द्वार प्रेम के सिवा और कुछ भी नहीं है। जहाँ जितने अंशों में प्रेम है, समझो वहाँ उतने ही अंशों में परमात्मा है। आखिरकार यही तो परमात्मा की उपस्थिति का प्रकाश है।
  
याद रहे, जब कभी हमारा हृदय प्रेम से रोता रहता है, तब हम परमात्मा से विमुख होते हैं। यही कारण है कि जब भी हमारा मन क्रोध से भरता है, घृणा से भरता है, तभी हम स्वयं को अशक्त अनुभव करते हैं। क्योंकि उन क्षणों में परमात्मा से हमारे सम्बन्ध क्षीण हो जाते हैं। इसीलिए तो क्रोध में, घृणा में, द्वेष में दुःख और संताप पैदा होते हैं। संताप की मनोदशा केवल सर्व की सत्ता से पृथक् होने से होती है।
  
जबकि प्रेम हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को आनन्द से भर देता है। एक ऐसी भावदशा जन्मती है, जहाँ शान्ति का संगीत और करुणा की सुगन्धि हिलोरें लेती है। ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि प्रेम पूर्ण हृदय स्वाभाविक ही प्रभु के निकट होता है। क्योंकि प्रेम पूर्ण हृदय अपने आप ही परमात्मा के हृदय में स्थान पा लेता है और हम नहीं रह जाते, बल्कि प्रभु ही हमसे प्रकट होने लगते हैं।
  
इस सम्बन्ध में बड़ी मीठी कथा है। बंगाल के संत विजयकृष्ण गोस्वामी अपने शिष्य कुलदानन्द के साथ वृन्दावन में विचरण कर रहे थे। तभी राह में एक व्यक्ति ने आकर कुलदानन्द को रोक लिया और उनका अपमान करने लगा। पहले तो कुलदानन्द ने बड़ी शान्ति से उसके दुर्वचन सुने। उनकी आँखों में प्रेम और प्रार्थना बनी रही। लेकिन यह स्थिति देर तक न रह सकी। अंततः कुलदानन्द का धैर्य चुक गया और उनकी आँखों में घृणा और प्रतिशोध का ज्वार उमड़ने लगा। उनकी वाणी से भी दहकते अंगारे बरसने लगे।
  
संत विजयकृष्ण गोस्वामी अब तक यह सब शान्ति से बैठे देख रहे थे। अचानक वह उठे और एक ओर चल दिये। कुलदानन्द को उनके इस तरह चले जाने पर अचरज हुआ। बाद में उन्होंने अपने गुरु से इसका उलाहना दिया। अपने शिष्य के इस उलाहने पर संत विजयकृष्ण गोस्वामी ने गम्भीर होकर कहा-उस व्यक्ति के बुरे व्यवहार के प्रत्युत्तर में जब तक तुम शान्ति एवं प्रेम से भरे थे, तब तक प्रभु के पार्षद तुम्हारी रक्षा कर रहे थे। परन्तु ज्यों ही तुमने प्रेम व शान्ति का परित्याग कर क्रोध व घृणा का सहारा लिया, वे प्रभु पार्षद तुम्हें छोड़कर चले गये। और जब परमात्मा ने ही तुम्हारा साथ छोड़ दिया, तब भला मैं तुम्हारे साथ कैसे रह सकता था।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६८

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

👉 "जीवन चलने का नाम"

सरला नाम की एक महिला थी। रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे। दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की ‘डेडलाइन’ से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था। बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी-कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था। पत्नी सरला भी एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी। वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी। ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है। खाना बनाती है। शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों नाकारा होने के लिए डाँटते थे पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है। घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।

थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा है। बच्चे विद्रोही हो चले हैं। एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में देर कर दी। पूछने पर बताया कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया, ड्रिल मशीन खराब हो गई, जेब से पर्स गिर गया...। इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।

काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई और वह उसे गाड़ी में छोड़ने चली गई। प्लंबर ने उसे बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया। प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया। घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया, मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा।

सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया - यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ। चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता। सुबह जब थैला उतारता हूं तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है- मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं। प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है, तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ। उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था...!

यह घर-घर की हकीकत है। गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है। क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ लें ताकि घर की दहलीज पार करने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ।

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग २)

शंकराचार्य ने फैसला कर लिया कि मम्मी का कहना नहीं मानना है। एक दिन वह पानी में घुस गया और चिल्लाने लगा—मम्मी क्या करूँ, अब मेरे मरने का समय आ गया। मुझे शंकर भगवान दिखाई पड़ते हैं और कहते हैं कि अगर इस बच्चे को मेरे सुपुर्द कर दोगी तो हम मगर से इसे बचा सकते हैं। मम्मी चिल्लाई—अच्छा बेटे जिन्दा तो रहेगा, मुझे मंजूर है और मैंने तुझे भगवान को दे दिया। बस शंकराचार्य ने उछाल मारी और किनारे आ गए। वे बोले देखो मगर ने छोड़ दिया, अब मैं शंकर भगवान् का हूँ।

बहुत-सी शृंखला मैंने देखी हैं। उसी शृंखला में एक और कड़ी शामिल हो जाती है वसन्त पंचमी की। यही दिन थे, पचपन वर्ष पहले एक आया? कौन आया? मेरा सौभाग्य आया। वसन्त पंचमी के दिन हर एक का सौभाग्य आता है, एक उमंग आती है, एक तरंग आती है। मेरे ऊपर भी एक तरंग आई सौभाग्य के दिन मेरे गुरु के रूप में, मास्टर के रूप में। मेरा गुरु प्रकाश के रूप में आया। जब कोई महापुरुष आता है तो कुछ लेकर के आता है। कोई महाशक्ति आती है तो कुछ लेकर के आती है, बिना लिए नहीं आती। मेरा भी गुरु, मेरा भी बॉस, मेरा भी मास्टर और भी सौभाग्य की धारा और लहर मेरे पास आई थी, काश! आपके पास भी आ जाती तो आप धन्य हो जाते।

जब आती है हूक, जब आती है उमंग तो फिर क्या हो जाता है? रोकना मुश्किल हो जाता है और जो आग उठती है, ऐसी तेजी से उठती है कि इन्तजार नहीं करना पड़ता। जब वक्त आता है तो आँधी-तूफान के तरीके से आता है। मेरी जिन्दगी में भी आँधी-तूफान के तरीके से वक्त आया। मेरे गुरु आए और आकर के उन्होंने आत्म-साक्षात्कार कराया, पूर्वजन्मों का हाल दिखाया और जाते वक्त कहा कि हम दो चीजें देकर जाते हैं। दोनों चीजें जिनको हम शक्तिपात और कुण्डलिनी जागरण कहते हैं, दोनों की दोनों सेकण्डों में पूरी हो गई और मैं कुछ से कुछ हो गया। मेरी आँखों में कुछ और चीज दिखाई पड़ने लगी। नशा पीकर आदमी को कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। ऐसे ही मुझे दुनिया किसी और तरीके से दिखाई पड़ने लगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 8)

Q.17. What are the restrictions on Upasana during the inauspicious days (birth or death in family etc.)?

Ans. On such occasions, although regular chanting of Mantra with rosary and standard rituals are forbidden, mental Jap and meditation may be done. The objective is two-fold. On the one hand, it protects the devotee from mental and physical exertion, On the other, a quarantine (Sootak) has to follow this rule. Members of such families should avoid touching the idols of the deity, rosary, implements of Sadhana etc. and do only mental recitations of the Mantra. 

Q.18.  Should women discontinue Upasana during  menstrual periods?           
Ans. While undergoing menstrual cycles, women are both mentally and physically under exertion. Besides, they are unable to maintain the required degree of physical cleanliness. As such, they are recommended to do mental Jap only. This rule is also applicable to other states of cleanliness (when there are discharges through sweat, nose, eyes, boils etc.). Proper cleanliness is a pre-requisite for any spiritual exercise.

Q.19. What is the posture recommended for turning the rosary (Mala) during Jap?

Ans. 1. For Jap, select a secluded, noiseless place beneath a tree, in a temple, or at the bank of a river.

2. Be seated in an upright position with crossed-legs (Sukhasan) or on a raised platform if there is some discomfort on sitting on ground. For sitting use a cotton or woollen spread.  Animal hides are prohibited. Let the spine be straight and relaxed. Now keep the left hand on the palm turned upwards on the right lap.

3. Hold the rosary in the right hand so that it hangs like a garland across the bridge formed by joining the thumb and ring finger.

4. Keeping the elbow of the right hand on the palm of the left hand and the arm in a vertical position, turn the beads of the rosary inwards (towards yourself) with the help of middle finger-beginning from the main knot (Brahma Granthi). (Use of little finger and index finger is forbidden).

5. On completion of each cycle of rosary, turn it backwards so that the main knot is not crossed, i.e. the Jap in the rosary is “unidirectional”. It can be done with the help of same fingers which are used for turning the rosary. Keep the body still. There is no harm in changing position if discomfort is felt after some time.

6. Pronounce the Mantra in whispers, so that it is audible to you only.

7. If there is difficulty in using a rosary, fixed time for Jap may be maintained with the help of a clock.
As far as practicable, uniformity of fixed time, duration and place should be maintained. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 62

👉 राष्ट्रीय कर्त्तव्य

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आँखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परन्तु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाये थे कि भारत माँ की एक आँख में खुशी के आँसू छलक रहे थे, जबकि उसकी दूसरी आँख दुःख के आँसुओं से डबडबायी हुई थी। खुशी स्वाधीनता की थी और दुःख विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी सम्भवतः समझदार हो जायेंगे और अपनी माँ को अब यह दर्द न देंगे।
  
परन्तु दुर्देव और दुर्भाग्य-स्वाधीनता प्राप्ति के वर्ष पर वर्ष बीतते गये और विभाजन के नये-नये रूप सामने आते गये। भूमि तो नहीं बँटी पर भावनाएँ बँटती गयीं। भूगोल तो वही रहा, परन्तु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीरें मिटती गयीं। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनों के कितने ही रूप सामने आते गये। विभाजन धर्म के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के, विभाजन साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीयता के। अब तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि इन्हें ठीक से गिन पाना भी मुश्किल है।
  
स्वाधीनता की हर वर्षगाँठ पर भारत माता की आँखें छलकती तो जरूर हैं, परन्तु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आँखों में खुशी के आँसू नहीं दुःख के आँसू डबडबा रहे हैं। इस वर्ष की स्थिति तो और बदतर है। आज स्वाधीनता दिवस पर भारत माता की आँखें फिर से आँसुओं से भरी हुई हैं। लेकिन ये आँसू खून के आँसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है। अब उससे सही नहीं जा रही इन नित-नये विभाजनों की पीड़ा।
  
पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने माँ की इस पीड़ा की अनुभूति कर पायेंगे? क्योंकि यह अनुभूति तो राष्ट्रीयता की अनुभूति से जुड़ी हुई है। जबकि आज के इस दौर में यह पवित्र अनुभूति न तो सरकारें कर पा रही हैं और न ही राजनीतिक दल। हालाँकि यह अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्त्तर्व्य है। उसे अपनी इसी कर्त्तव्य निष्ठा में अपने धर्म, जाति एवं क्षेत्रीयता को विलीन कर देना चाहिए।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६९

बुधवार, 22 जनवरी 2020

👉 आदर्श चरित्र बल


👉 उत्तराधिकार

एक राजा के तीन योग्य पुत्र थे, सभी परीक्षा में एक समान नम्बर लाते थे, एक से बढ़कर एक साधक थे, एक से बढ़कर एक योद्धा थे, एक से बढ़कर एक राजनीतिज्ञ थे। लेकिन राज्य किसके हाथ मे सौंपा जाय, यह तो अनुभव और जीवन जीने की कला पर निर्णय होना था। राजा ने सबसे सलाह ली, जिनमें एक बुद्धिमान किसान की युक्ति राजा को पसन्द आयी।

तीनो राजकुमार को बुलाकर एक एक बोरा गेहूँ का दाना दिया। बोला मैं तीर्थ यात्रा में जा रहा हूँ कुछ वर्षों में लौटूंगा। मुझे मेरे गेहूँ तुमसे वापस चाहिए होगा।

पहले राजकुमार ने पिता की अमानत तिज़ोरी में बन्द कर दी, पहरेदार सैनिक लगवा दिए।

दूसरे ने सैनिक बुलाये और बोरी को  खाली जमीन में फिकवा दिया, और भगवान से प्रार्थना कि हे भगवान जैसे आप प्रत्येक जीव का ख्याल रखते हो, इन बीजों का भी रखना। मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ इसलिए तुम इन बीजों को पौधे बना देना और खाद-पानी दे देना। न जमीन के खर-पतवार हटाये और न ही स्वयं खाद पानी दिया, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़के साधना में लग गया।

तीसरा राजकुमार किसानों को बुलवाया, उनसे खेती के गुण धर्म समझा। उचित भूमि का चयन किया, स्वयं किसान-मज़दूरों के साथ लगकर जमीन तैयार की, गेहूं बोया और नियमित खाद पानी दिया। रोज यज्ञ गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र से खेत पर करता, बची हुई राख खेत मे छिड़कर भगवान से प्रार्थना करता भगवान मेरे खेत की रक्षा करना और पिता के गेंहू मैं लौटा सकूँ इस योग्य बनाना। फ़सल अच्छी हुई और गेहूं अन्य किसानों से उत्तम क़्वालिटी का निकला। अन्य किसानों ने बीज मांगा तो उसने सहर्ष भेंट कर दिए, साथ में बीजो में प्राण भरे इस हेतु साधना और यज्ञ सिखा दिया। सभी किसानों की खेती अच्छी हुई तो आसपास के समस्त गांवों में भी खेती के गुण, साधना-स्वाध्याय के गुण, यज्ञ इत्यादि सिखा दिया। खेतों में अनाज के साथ साथ लोगों के हृदय में अध्यात्म की खेती लहलहा उठी। सर्वत्र राजकुमार की जय हो उठी।
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पांच वर्ष बाद राजा लौटा, बड़े पुत्र को बुलाया और गेहूं मांगा तो तिज़ोरी खोली गयी। घुन ने गेंहू को राख कर दिया था। राजा बोला जिसने जीवित सम्भवनाओ के बीज को मृत कर दिया। वो इस राज्य को भी मृत कर देगा। तुम अयोग्य उत्तराधिकारी साबित हुए।

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दूसरे को बुलाया, तो भगवान को कोसने लगा। बोला गुरुजी झूठे है, भगवान पक्षपाती है। गुरुजी ने कहा था भगवान भक्त की रक्षा करता है, लेकिन भगवान ने मेरे गेंहू के बीजो की रक्षा नहीं की और न हीं उन्हें पौधा बनाया। जो प्रकृति का निर्माता है उसने मेरे बीजों के साथ पक्षपात किया। राजा पिता ने कहा, तूने तो जीवन की शिक्षा पाई ही नहीं केवल पुस्तको का कोरा ज्ञान अर्जित किया। कर्मप्रधान सृष्टि को समझा ही नहीं, ईश्वर उसकी मदद करता है जो अपनी मदद स्वयं करता हैं। उपासना के साथ साधना और आराधना भी करनी होती है ये समझा ही नहीं। उपासना रूपी सम्भावना को साधना -आत्मशोधन/मिट्टी की परख/निराई-गुणाई की ही नहीं। तू अयोग्य है। तू मेरा राज्य भी भगवान भरोसे चलाएगा। तूने तो धर्म का मर्म ही नहीं समझा, तू अयोग्य साबित हुआ।

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तीसरे पुत्र को बुलाया, लेकिन यह क्या कई सारे ग्रामवासी बैलगाड़ियों में गेहूँ लिए आये चले जा रहे हैं। राजकुमार और राजा जी की जय बोलते हुए। राजा ने कहा, बेटा मुझे केवल मेरा गेहूँ वापस चाहिए गांव वालों से नहीं।

राजुकमार ने मुस्कुरा के पिता को प्रणाम करके कहा- पिताजी आपके द्वारा दिये सम्भवनाओ के बीज अत्यंत उच्च कोटि के थे, हम सबने मेहनत करके उसको विस्तारित कर दिया। ये इतनी सारी बोरियां उसी सम्भवनाओ/गेंहू के बीज से उपजी है। यह सब आपकी ही है, इन्होंने ने लाखों लोगों की क्षुधा भी शांत की। धन्यवाद पिताश्री आपने मुझे सेवा का सौभाग्य दिया।

पिता पुत्र पर गौरान्वित हुआ, हृदय से लगा लिया और अपने राज्य का उत्तराधिकार सहर्ष सौंप दिया।

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 7)

Q. 14. What is the purpose of self-control in Abhiyan Sadhana?  

Ans. Tap is meant for conservation of life-force and utilising it for elevation of soul to higher levels of consciousness. The three outlets through which about 80% of this vital force continues to leak out of human body are: indulgence in delicious food, intemperate utterances and sexual distractions and actions. The moment these are controlled, the doors to progress open.

Self-control, however, does not simply mean control on sensory organs and the thought process. The field of self-control encompasses control on misuse of all types of resources. For instance, one is advised to utilize each and every moment of life judiciously right from leaving the bed in the morning till one falls asleep. Other self-controls are maintenance of balance in physical labour, honest earnings i.e. taking a livelihood based on just and lawful means of production and expenditure of earnings for noble purposes. Amongst all these, control on sensory organs is of prime importance.

Q.15. What are the rules of Akhand (unbroken) Jap?

Ans. Akhand Jap  is performed on special auspicious occasions like Gayatri Jayanti, Guru Poornima, Vasant Panchami etc. There are two ways of doing it. It may be performed either for twenty-four hours or between sunrise and sun-set. During the visibility of the sun (day-time) a vocal mass chanting  with rosary may be performed.

The time of beginning and end of an  Akhand Jap should be the same in the forenoon and afternoon. When it is meant for twenty-four hours, the period involved includes a day and night in equal proportion. Traditions permit a vocal chanting during the day and mental Jap in the night. Wherever this procedure can be conveniently adhered to, it may be adopted. Otherwise, mental Jap  is generally more convenient for the sake of uniformity. Dhoop-Deep should be kept continuously burning during the period of Jap.

Q.16. What to do if there are disruptions during Jap?

Ans. If one is required to go to toilet in between a sessions, the Jap can be resumed after cleaning of hands and feet. Taking bath after each such disruption is not necessary. On sneezing, passing of wind, yawning etc., purification is achieved by taking three Aachmans.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 59

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग १)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूभुर्वः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!
वसन्त पंचमी उमंगों का दिन है, प्रेरणा का दिन है, प्रकाश का दिन है। वसन्त के दिनों में उमंग आती है, उछाल आता है। समर्थ गुरु रामदास के जीवन में इन्हीं दिनों एक उछाल आया—क्या हम अपनी जिन्दगी का बेहतरीन इस्तेमाल नहीं कर सकते? क्या हमारी जिन्दगी अच्छी तरह से खर्च नहीं हो सकती? एक तरफ उनके विवाह की तैयारियाँ चल रही थीं। समर्थ गुरु रामदास को शक्ल दिखाई पड़ी, औरत, औरत के बच्चे, बच्चे के बच्चे, शादियाँ, ब्याह आदि की बड़ी लम्बी शृंखला दिखाई पड़ी। दूसरी तरफ आत्मा ने संकेत दिया, परमात्मा ने संकेत दिया और कहा—अगर आपको जिन्दगी इतनी कम कीमत की नहीं जान पड़ती है, अगर आपको महँगी मालूम पड़ती है तो आइए दूसरा वाला रास्ता आपके लिए खुला पड़ा है। महानता का रास्ता खुला हुआ पड़ा है। समर्थ गुरु ने विचार किया। उछाल आया, उमंग आई और ऐसी उमंग आई कि रोकने वालों से रुकी नहीं। वह उछलते ही चले गए। मुकुट को फेंका अलग और कंगन को तोड़ा अलग। ये गया, वो गया, लड़का भाग गया। दूल्हा कौन हो गया? समर्थ गुरु रामदास हो गया। कौन? मामूली-सा आदमी छोटा-सा लड़का छलाँग मारता चला गया और समर्थ गुरु रामदास होता चला गया।

यहाँ मैं उमंग की बात कह रहा था। उमंग जब भीतर से आती है तो रुकती नहीं है। उमंग जब आती है वसन्त के दिनों में। इन्हीं दिनों का किस्सा है बुद्ध भगवान का। उनका ऐसा ही किस्सा हुआ था। सारे संसार में फैले हुए हाहाकार ने पुकार और कहा कि आप समझदार आदमी हैं। आप विचारशील आदमी हैं और आप जबरदस्त आदमी हैं। क्या आप दो लोगों के लिए जियेंगे? औरत और बच्चे के लिए जियेंगे? यह काम तो कोई भी कर सकता है। बुद्ध भगवान के भीतर किसी ने पुकारा और वे छलाँग मारते हुए, उछलते हुए कहीं के मारे कहीं चले गए। बुद्ध भगवान हो गये।

शंकराचार्य की उमंग भी इन्हीं दिनों की है। शंकराचार्य की मम्मी कहती थीं कि मेरा बेटा बड़ा होगा, पढ़-लिखकर गजेटेड ऑफिसर बनेगा। बेटे की बहू आएगी, गोद में बच्चा खिलाऊँगी। मम्मी बार-बार यही कहतीं कि मेरा कहना नहीं मानेगा तो नरक में जाएगा। शंकर कहता—अच्छा मम्मी कहना नहीं मानूँगा तो नरक जाऊँगा। हमको जाना है तो अवश्य जाएँगे महानरक में अच्छे काम के लिए। मेरे संकल्प में रुकावट लगाती हो तो आत्मा और परमात्मा का कहना न मानकर तुम कहाँ जाओगी? विचार करता रहा, कौन? शंकराचार्य।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्गुरु की खोज

सद्गुरु की खोज कठिन है। साधक के प्राणों की पीर जब पुकार बनती है, तभी वह इस डगर पर पहला कदम रख पाता है। इसके लिए उसे अपने अस्तित्व को गला कर, प्राणों को पिघलाकर स्वयं को एक नये रूप में ढालना पड़ता है। और यह नया रूप होता है-शिष्य का। जो साहस, संकल्प एवं समर्पण की त्रिधातु से ढाला जाता है। जो स्वयं को शिष्य के रूप में रूपान्तरित नहीं कर पाते, वे कभी भी सद्गुरु की खोज में सफल नहीं होते।
    
सद्गुरु सदा ही केवल शिष्य को मिलते हैं। जो स्वयं को शिष्य के रूप में नहीं गढ़ पाया, उसे वे मिलकर भी नहीं मिलते। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से उस युग के सभी जन सुपरिचित थे, लेकिन किसी के वे सखा थे, तो किसी के भ्राता, तो कोई उन्हें भगवान् के रूप में पूजता था। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, निषादराज गुह, परम अनुरागिनी शबरी सभी के प्राणों में वह बसे थे। महामति विभीषण तो उन्हें पाने के लिए अपने प्रियजनों व कुटुम्बियों को भी छोड़ आये थे। वानरराज सुग्रीव एवं युवराज अंगद भी उनके लिए रण-समर में प्राणोत्सर्ग करने के लिए दौड़ आये थे।
    
लेकिन इन सभी अनुरागियों में कुछ निजता का अंश शेष था। सभी को प्रभु प्रिय थे, तो सब प्रभु को प्रिय। प्रभु ने अपने इन प्रियजनों को, इनकी निजता को कृतार्थ भी किया। पर हनुमान इन सभी में एक होते हुए भी इन सबसे भिन्न थे। उनमें निजता का लेश भी शेष न था। उनकी बज्रांग मूर्ति साहस, संकल्प एवं समर्पण की त्रिधातु से ही बनी थी। उनकी न तो कोई चाहत थी और न ही उनमें अपने किसी कर्तृत्व का अभिमान था। सच तो यह कि वे कभी भी अपने प्रभु से विलग ही नहीं थे। उन्होंने सहज ही अपना अतीत, वर्तमान एवं भविष्य प्रभु अर्पित कर दिया था।
    
वह न तो मोक्ष के अभिलाषी थे और न तत्त्वज्ञान के। उनके लिए तो प्रभु स्मरण एवं प्रभु समर्पण ही जीवन का सार-सर्वस्व था। उन्हें तो प्रभु के प्रत्यक्ष सान्निध्य का भी कोई लोभ न था। लेकिन जीवन की जिस डगर पर वह चले थे, उसने उन्हें सहज ही शिष्य के रूप में रूपान्तरित कर दिया। अध्यात्म रामायण की कथा कहती है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम उन्हें और केवल उन्हें ही सद्गुरु के रूप में मिले। माता सीता की खोज के साथ वह सद्गुरु की खोज में भी सफल हुए। श्रीराम ने उन्हें तत्त्वज्ञान प्रदाता एवं मोक्षदाता बनाया। उनके शिष्यत्व में सद्गुरु की खोज के सभी सूत्र निहित हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६६

सोमवार, 20 जनवरी 2020

👉 "पांच प्रेत"

नगर अभी दूर था। वन हिंसक जन्तुओं से भरा पड़ा था। सो विशाल वटवृक्ष, सरोवर और शिव मंदिर देखकर आचार्य महीधर वहीं रुक गये। शेष यात्रा अगले दिन पूरी करने का निश्चय कर थके हुए आचार्य महीधर शीघ्र ही निद्रा देवी की गोद में चले गये।

आधा रात, सघन अन्धकार, जीव-जन्तुओं की रह-रहकर आ रहीं भयंकर आवाजें- आचार्य प्रवर की नींद टूट गई। मन किसी बात पर विचार करे इससे पूर्व ही उन्हें कुछ सिसकियाँ सुनाई दीं उन्हें लगा पास में कोई अन्ध-कूप है उनमें कोई पड़ा हुआ रुदन कर रहा है अब तक सप्तमी का चन्द्रमा आकाश में ऊपर आ गया था, हल्का-हल्का प्रकाश फैल रहा था, आचार्य महीधर कूप के पास आये और झाँककर देखा तो उसमें पाँच प्रेत किलबिला रहे थे।

यों दुःखी अवस्था में पड़े प्रेतों को देखकर महीधर को दया आ गई उन्होंने पूछा-तात! आप लोग कौन हैं यह दुर्दशा आप लोग क्यों भुगत रहे हैं ? इस पर सबसे बड़े प्रेत ने बताया हम लोग प्रेत है मनुष्य शरीर में किये गये पापों के दुष्परिणाम भुगत रहे हैं आप संसार में जाइये और लोगों को बताइये जो पाप कर हम लोग प्रेत योनि में आ पड़े है वह पाप और कोई न करें। आचार्य ने पूछा- आप लोग यह भी तो बताइये कौन कौन से पाप आप सबने किये हैं तभी तो लोगों को उससे बचने के लिए कहा जा सकता है।

“मेरा नाम पर्युषित है आर्य” पहले प्रेत ने बताना प्रारम्भ किया- मैं पूर्व जन्म में ब्राह्मण था, विद्या भी खूब पढ़ी थी किन्तु अपनी योग्यता का लाभ समाज को देने की बात को तो छुपा लिया हाँ अपने पाँडित्य से लोगों में अन्ध-श्रद्धा, अन्धविश्वास जितना फैला सकता था फैलाया और हर उचित अनुचित तरीके से केवल यजमानों से द्रव्य-दोहन किया उसी का प्रतिफल आज इस रूप में भुगत रहा हूँ ब्राह्मण होकर भी जो ब्रह्म नहीं रखता, समाज को धोखा देता है वह मेरी ही तरह प्रेत होता है।

“मैं क्षत्रिय था पूर्व जन्म में” अब सूचीमुख नामक दूसरे प्रेत ने आत्म कथा कहनी प्रारम्भ की। मेरे शरीर में शक्ति की कमी नहीं थी मुझे लोगों की रक्षा के लिये नियुक्त किया गया। रक्षा करना तो दूर प्रमोद वश मैं प्रजा का भक्षक ही बन बैठा। चाहे किसी को दण्ड देना, चाहे जिसको लूट लेना ही मेरा काम था एक दिन मैंने एक अबला को देखा जो जंगल में अपने बेटे के साथ जा रही थी मैंने उसे भी नहीं छोड़ा उसका सारा धन छीन लिया, यहाँ तक उनका पानी तक लेकर पी लिया। दोनों प्यास से तड़प कर वहीं मय गये उसी पाप का प्रतिफल प्रेतयोनि में पड़ा भुगत रहा हूँ।

तीसरे शीघ्राग ने बताया- मैं था वैश्य। मिलावट, कम तौल, ऊँचे भाव तक ही सीमित रहता तब भी कोई बात थी, व्यापार में अपने साझीदारों तक का गला काटा। एक बार दूर देश वाणिज्य के लिए अपने एक मित्र के साथ गया। वहाँ से प्रचुर धन लेकर लौट रहा था रास्ते में लालच आ गया मैंने अपने मित्र की हत्या करदी और उसकी स्त्री, बच्चों को भी धोखा दिया व झूठ बोला उसकी स्त्री ने इसी दुःख में अपने प्राण त्याग दिये उस समय तो किसी की पकड़ में नहीं आ सका पर मृत्यु से आखिर कौन बचा है तात ! मेरे पाप ज्यों ज्यों मरणकाल समीप आता गया मुझे संताप की भट्टी में झोंकते गये और आज जो मेरी स्थिति है वह आप देख ही रहे है। पाप का प्रतिफल ही है जो इस प्रेतयोनि में पड़ा मल-मूत्र पर जीवन निर्वाह करने को विवश हूँ अंग-अंग से व्रण फूट रहे हैं दुःखों का कहीं अन्त नहीं दिखाई दे रहा।

अब चौथे की बारी थी- उसने अपने घावों पर बैठी मक्खियों को हाँकते और सिसकते हुये कहा- तात! मैं पूर्व जन्म में “रोधक” नाम का शूद्र था। तरुणाई में मैंने व्याद्द किया कामुकता मेरे मस्तिष्क पर बुरी तरह सवार हुई। पत्नी मेरे लिये भगवान् हो गई उसकी हर सुख सुविधा का ध्यान दिया पर अपने पिता-माता, भाई बहनों का कुछ भी ध्यान नहीं दिया। ध्यान देना तो दूर उन्हें श्रद्धा और सम्मान भी नहीं दिया। अपने बड़ों के कभी पैर छुये हों मुझे ऐसा एक भी क्षण स्मरण नहीं। आदर करना तो दूर जब तब उन्हें धमकाया और मारा-पिटा भी। माता-पिता बड़े दुःख और असह्यपूर्ण स्थिति में मरे। एक स्त्री से तृप्ति नहीं हुई तो और विवाह किये। पहली पत्नियों को सताया घर से बाहर निकाला। उन्हीं सब कर्मों का प्रतिफल भुगत रहा हूँ मेरे तात् और अब छुटकारे का कोई मार्ग दीख नहीं रहा।

चार प्रेत अपनी बात कह चुके किन्तु पांचवां प्रेत तो आचार्य महीधर की ओर मुख भी नहीं कर रहा था पूछने पर अन्य प्रेतों ने बताया-यह तो हम लोगों को भी मुँह नहीं दिखाते-बोलते बातचीत तो करते हैं पर अपना मुँह इन्होंने आज तक नहीं दिखाया।

“आप भी तो कुछ बताइये”- आचार्य प्रवर ने प्रश्न किया-इस पर घिंघियाते स्वर में मुँह पीछे ही फेरे-फेरे पांचों प्रेत ने बताया-मेरा नाम “कलाकार” है मैं पूर्व जन्म में एक अच्छा लेखक था पर मेरी कलम से कभी नीति, धर्म और सदाचार नहीं लिखा गया। कामुकता, अश्लीलता और फूहड़पन बढ़ाने वाला साहित्य ही लिखा मैंने, ऐसे ही संगीत, नृत्य और अभिनय का सृजन किया जो फूहड़ से फूहड़ और कुत्सायें जगाने वाला रहा हो। मैं मूर्तियाँ और चित्र एक से एक भावपूर्ण बना सकता था, किन्तु उनमें भी कुरुचि वर्द्धक वासनायें और अश्लीलतायें गढ़ी। सारे समाज को भ्रष्ट करने का अपराध लगाकर मुझे यमराज ने प्रेत बना दिया। किन्तु मैं यहाँ भी इतना लज्जित हूँ कि अपना मुंह इन प्रेत भाइयों को भी नहीं दिखा सकता।

आचार्य महीधर ने अनुमान लगाया अपने अपने कर्त्तव्यों से गिरे हुये यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और कलाकार कुल पाँच ही थे इन्हें प्रेतयोनि का कष्ट भुगतना पड़ रहा है और आज जबकि सृष्टि का हर ब्राह्मण, हर क्षत्रिय, वैश्य और प्रत्येक शूद्र कर्त्तव्यच्युत हो रहा है, हर कलाकार अपनी कलम और तूलिका से हित-अनहित की परवाह किये बिना वासना की गन्दी कीचड़ उछाल रहा है तब आने वाले कल में प्रेतों की संख्या कितनी भयंकर होगी। कुल मिलाकर सारी धरती नरक में ही बदल जायेगी। सो लोगों को कर्त्तव्य जागृत करना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अब तक प्रातःकाल हो चुका था आचार्य महीधर यह संकल्प लेकर चल पड़े पाँचों प्रेतों की कहानी सुनकर मार्ग भ्रष्ट लोगों को सही पथ प्रदर्शन करने लगे।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1971

👉 वीरता का सम्मान


👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग ३)

हमें अपने एक उत्पातकारी विद्यार्थी की स्मृति आज भी हरी है। वह कालेज आते हुए बाग के पेड़ और फल तोड़ता, मालियों को परेशान करता, छोटे विद्यार्थियों को पीटता था। सभी उससे तंग थे। पढ़ने में उसका किंचित भी मन न था। उसे फौज में जाने की सलाह दी गई। वही पेशा उसके कठोर भावों के अनुकूल पड़ता था। विद्यार्थी ने राय मान ली। आज वही उत्पातकारी विद्यार्थी अच्छा जनरल है। फौजी जीवन की कठोरताओं में भी सफलता प्राप्त करता जा रहा है। जब तक उसे अपनी रुचि, प्रकृति, स्वभाव, संस्कारों के अनुकूल क्षेत्र नहीं मिला, तभी तक वह शरारती रहा। अपना क्षेत्र मिलते ही, वह द्रुतगति से आगे बढ़ने लगा। अभी सफलता तो तभी मिली हुई समझिये जब मनुष्य अपने मनोनुकूल क्षेत्र पा ले।

जीविका उपार्जन के बाद किसी दूसरे प्रिय आनन्ददायक, प्रेरणाप्रद, मनोरंजक कार्य में तन्मय हो जाने से अवरुद्ध मनोग्रन्थियों को खुलने और बचपन तक की भावात्मक शक्ति को बाहर निकलने का स्वस्थ अवसर मिलता है।

अपने से पूछिए क्या मैं अपने भावों को ठीक तरह पहचानता हूँ? जब मैं क्रोधित हो उठता हूँ तो क्या उसमें दूसरे का कसूर होता है या यह स्वयं मेरी भावात्मक कमजोरी है? मेरे व्यक्तित्व में वह छिपा हुआ भाव कौन सा है, जो प्रायः मुझे परेशान किया करता है? क्या मैं उसे किसी उत्पादक शुभ कार्य की ओर मोड़ सकता हूँ?

निश्चय जानिये, आपको अपनी भावना के उदात्तीकरण का कोई न कोई स्वस्थ मार्ग अवश्य मिल जायगा। यह मनुष्य के स्वयं अपने आपको अध्ययन करने, स्व परीक्षा द्वारा अपनी गुप्त रुचि का ज्ञान प्राप्त करने तथा मन की नाना क्रियाओं को देखने से सम्बन्ध रखता है। आप खुद ही अपनी मनोवृत्तियों की दिशा तथा प्रवाह को पहचान सकते हैं। भावनाओं के प्रवाह में केवल यह ध्यान रखिए कि वह दिशा स्वस्थ, सुन्दर और समाज के लिए कल्याणकारी हो, जन हितकारी हो। आपका भी लाभ हो तथा अधिक जनता का हित साधन हो। विषय वासना की कलुषितता तथा दुर्गन्धि से उसका सम्बन्ध तनिक भी न हो। आपका चुना हुआ मार्ग नैतिक हो और आपके अन्दर के देवता को जगाने वाला हो। उसके प्रति आपका उत्साह सदा ही बना रहे और उससे आपकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ सतत जागृत और विकसित होती रहें।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 22

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 6)

Q.13 What are the rules of Abhiyan Sadhana?

Ans. The basic rules of Abhiyan Sadhana are given hereunder:-
       
(a) The time of commencement:  All days are considered auspicious for initiating  a good work. However, for this purpose a Parva (religious auspicious period) would be the best choice. Amongst the auspicious festivals, one may choose days like Basant Panchami, Guru Poornima, Gayatri Jayanti etc. As regards of  “Tithis”, Panchami, Ekadashi and Poornima are considered auspicious and amongst the days, Ravivar, (Sunday) Guruvar (Thursday) are the best suited.

(b) Self control (Samyam): Involvement in Upasana should be a gradual process. In the beginning one attempts to adopt regularity in practice by doing a minimum number of Malas each day at a fixed convenient time. The same is true about other restrictions of self- control. In the beginning one may follow these on Thursdays. Later, if it is possible to adopt these self-controls  for longer periods, greater benefits accrue. The basic rules of the Sadhana are the same as for any other Anusthan. Fasting (Half or full day), abstention from sex, self service, Titikcha (Tolerance of heat and cold of natural weather cycles with minimum necessities) are adopted at least on Thursdays. During any form of fasting, mentioned earlier, refraining from unnecessary chattering and abstention from sex are must.   

(c) Fasting : For food, liquid diets like milk, buttermilk, fruit juices etc. are the best. Otherwise, one may depend on vegetables. Even if this much is not possible only one meal may be taken each day. It should, however, be free of salt and sugar (Aswad vrat).   

(d) Keeping silent : One aspect of control on tongue is through the control on taste. The other is by balanced and cultured speech. To adopt it, one has to get rid of the old habits of intemperate utterances. Maintenance of silence creates the ground for the change in speech habits. For a working man, it is difficult to keep quiet throughout the day. Nevertheless, it should not be difficult to find out two hours in the morning or at any other convenient time during the day for keeping silent. During the duration of silence, one should do an introspection (Manan) to identify one’s weaknesses, vices and bad habits and think of ways to get rid of them. The void thus created should be planned to be filled with good constructive habits (Chintan).  

Thus, refraining from speech does not simply mean keeping quiet anywhere. Seclusion is also necessary, where no communication is needed even through signs and gestures.    (e) Chastity : Amongst all physical activities of entertainment, overindulgence in sex has the most disastrous consequences. One has to pay heavily for the sexual acts during which vital life force is drained out of the human body, making one progressively weaker spiritually. On Thursdays, therefore, it is advised not only to refrain from sex but also avoid thoughts and actions arousing sexual impulse.

The above five principles are adopted on Thursdays only symbolically. The objective is to train oneself in self-control in day to day living so that one may ultimately persevere to follow them throughout life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 58

👉 युगशक्ति की युग प्रत्यावर्तन लीला

युगशक्ति युग प्रत्यावर्तन के लिए हर युग में धरा पर अवतरित होती है। यह अपने युग की समस्याओं का निराकरण-निवारण अपनी रहस्यमयी-दैवी लीला से करती है। इसकी अपराजेय और दुर्जय सामर्थ्य से ही समस्याओं से जर्जरित और खण्डहर हो चुके युग से नवयुग प्रकट होता है। समस्याओं के विविध रूपों के अनुसार इसके भी बहुरूप प्रकट होते हैं। कभी तो यह वेदमाता ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की चेतना में अवतरित हो-मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को महाकाल की पुकार सुनाती है, तो कभी वामन से विराट् बनकर देवत्व को आश्वस्त करती है। श्रीकृष्ण के विश्वरूप में इन्हीं आदिमाता की युगलीला के दर्शन होते हैं। इन्हीं त्रिगुणात्मिकता महामाया की उपासना के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं। और फिर इन्हीं की युग प्रत्यावर्तन लीला का निमित्त बनने के लिए गाण्डीवधारी को निर्देश देते हैं-तस्मात् युद्धस्व भारत!
  
युग-युग में अवतरित होने वाली वही युगशक्ति इस युग संक्रान्ति में युगऋषि हमारे आराध्य परम पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना में अवतरित हुई। हिमालय की दिव्य ऋषिसत्ता ने उनके अंतर्भावों में जो ब्रह्मबीज बोया था, उसी से वेदजननी इस युग में अपने अनगिन रूपों में प्रकट हो रही है। आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में घटने वाली घटनाएँ-हो रहीं विविध हलचलें उनकी रहस्यमयी लीला के सिवा और भला क्या हैं? हो रहे विनाश और किये जा रहे नवसृजन से युगशक्ति माता गायत्री केवल खण्डहर हो चुके पुराने युग से नये युग को प्रकट करने में लगी हैं।
  
उनकी इस युग प्रत्यावर्तन लीला के दृश्य रूप अनगिन हैं और अदृश्य रूप अनेक। दृश्य में यदि यह प्रक्रिया तीव्र है तो अदृश्य में तीव्रतम। हम सबके आराध्य युग देवता बनकर उन्हीं जगन्माता की दैवी लीला का संदेश सुनाने ही तो हमारे पास आये थे। उन महान गुरु के स्वरों में हममें से प्रत्येक के लिए महाकाल का आह्वान मंत्र गूँजा था। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री मंत्र में उनकी अवतार लीला की चौबीस कलाएँ प्रकट हुई थीं। माता के अवतरण दिवस पर-गायत्री जयन्ती के पुण्य क्षणों में वह वेदमाता की पुकार सुन, युगशक्ति की सूक्ष्म लीला के सूत्रधार बनकर चले गये। परन्तु अभी भी युगशक्ति की युग प्रत्यावर्तन लीला शेष है, जिसमें हम सबको भागीदार होना है। निमित्त बनना है, नये युग के सृजन का-श्रेय और सौभाग्य प्राप्ति का।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६५

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...