सोमवार, 15 जुलाई 2019

👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 3)

यही बात प्रशंसनीय कार्य करने के सम्बन्ध में भी है। सत्कर्म करने वाला अपने वंश, परिवार, क्षेत्र, देश, युग सभी को प्रतिष्ठित करता है। यह सामूहिकता का उत्तरदायित्व जिन दिनों ठीक तरह निबाहा जाता है उन दिनों प्रकृति के अनुग्रह की वर्षा सभी पर होती हैं। और जिन दिनों संकीर्ण स्वार्थपरता का बोलबाला होता है तो दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती है, वातावरण बिगड़ता है और दण्ड उनको भी भुगतना पड़ता है, जो प्रत्यक्षतः तो निर्दोष दिखाई पड़ते हैं, पर समूचे मानव समाज की दुष्प्रवृत्तियों को रोकने और सत्प्रवृत्तियों में संलग्न होने के प्रयास की जिम्मेदारी न निभाने से अनायास ही अपराधी वर्ग में सम्मिलित हो जाते है।

युग परिवर्तन के लिए व्यक्ति और समाज में उत्कृष्टता के तत्वों का अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रबल प्रयत्नों का किया जाना आवश्यक है। व्यक्ति को चरित्रनिष्ठ ही नहीं समाजनिष्ठ भी होना चाहिए। मात्र अपने आपको अच्छा रखना ही पर्याप्त नहीं। अपनापन भी विस्तृत होना चाहिए।

आस्थाओं की पृष्ठभूमि वस्तुतः एक अलग धरातल है। उसका निर्माण मस्तिष्कीय संरचना की तुलना में कहीं अधिक जटिल और कहीं अधिक कठोर है। अंतःकरण की अपनी स्वतन्त्र रचना है। उस पर बुद्धि का थोड़ा बहुत ही प्रभाव पड़ता है। सच तो यह है कि अंतःकरण ही बुद्धि की कठपुतली को अपने इशारे से नचाता है। आन्तरिक आस्थाओं और आकांक्षाओं की जो अभिरुचि होती है उसी को पूरा करने के लिए चतुर राजदरबारी की भूमिका मस्तिष्क को निभानी पड़ती है। उसका अपना अभिमत जो भी हो, उसे करना वही पड़ता है जो अधिपति का निर्देश है। हो सकता है कि मस्तिष्क वस्तुतः भौतिकता का पक्षधर हो, किन्तु व्यवहार में लाते समय वह तब तक समर्थ न हो सकेगा जब तक अन्तःकरण भी अनुकूल न हो जाये। किसी भी नशेबाज से वार्तालाप किया जाय तो वह समझाने वाले से भी अधिक ऐसे तथ्य प्रस्तुत कर देगा जिससे नशा पीने की हानियों का प्रतिपादन होता है। इतनी जानकारी होते हुए भी वह उस लत को छोड़ने के लिए तत्पर न हो सकेगा। उसका कारण एक ही है कि नशे के पक्ष में उसके अन्तःकरण में इतनी गहरी अभिरुचि जम गयी है, जिसे विचारशीलता मात्र के सहारे पलट सकना सम्भव नहीं हो पाता। शराबी आये दिन अपने को धिक्कारता है, शपथे लेता है किन्तु जब अन्दर से लत भड़कती है तो असहाय की तरह शराब खाने की ओर इस प्रकार घिसटता चला जाता है मानों कोई बल पूर्वक उसे अपनी पीठ पर लाद कर लिये जा रहा हो। रास्ते में संकल्प विकल्प भी उठते है। लौटने को मन भी करता है। पर सारे तर्क एक कोने पर रखे रह जाते हैं। आदत अपनी जगह स्थिर रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 13 जुलाई 2019

Do Not Stary | भटकना मत | Hariye Na Himmat Day 20



Title

👉 परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।

एक सन्त के आश्रम में एक शिष्य कहीं से एक तोता ले आया और उसे पिंजरे में रख लिया। सन्त ने कई बार शिष्य से कहा कि “इसे यों कैद न करो। परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।”

किन्तु शिष्य अपने बालसुलभ कौतूहल को न रोक सका और उसे अर्थात् पिंजरे में बन्द किये रहा।

तब सन्त ने सोचा कि “तोता को ही स्वतंत्र होने का पाठ पढ़ाना चाहिए”

उन्होंने पिंजरा अपनी कुटी में मँगवा लिया और तोते को नित्य ही सिखाने लगे- ‘पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।’

कुछ दिन में तोते को वाक्य भली भाँति रट गया। तब एक दिन सफाई करते समय भूल से पिंजरा खुला रह गया। सन्त कुटी में आये तो देखा कि तोता बाहर निकल आया है और बड़े आराम से घूम रहा है साथ ही ऊँचे स्वर में कह भी रहा है- “पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।”

सन्त को आता देख वह पुनः पिंजरे के अन्दर चला गया और अपना पाठ बड़े जोर-जोर से दुहराने लगा। सन्त को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ। साथ ही दुःख भी।

वे सोचते रहे “इसने केवल शब्द को ही याद किया! यदि यह इसका अर्थ भी जानता होता- तो यह इस समय इस पिंजरे से स्वतंत्र हो गया होता!

दोस्तों ठीक इसी तरह - हम सब भी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें सीखते और करते तो हैं किन्तु उनका मर्म नहीं समझ पाते और उचित समय तथा अवसर प्राप्त होने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहाँ के तहाँ रह जाते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 13 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 2)

प्रकृति प्रकोप के रूप में सामूहिक दण्ड व्यवस्था ही चलती है। अति वृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, बाढ़, तूफान, महामारी, भूमि कीटक आदि के रूप में कई प्रकार की विकृतियाँ आये दिन दरवाजे पर लगी रहने की घटनाएँ पाप युग में होती हैं। सतयुग के सम्बन्ध में विवरण मिलता है कि तब मनुष्य दीर्घजीवी होते थे। बाप के सामने बेटा नहीं मरता था। वृक्ष मनचाहे फल देते थे। भूमि से प्रचुर अन्न उपजता था। गौएँ बहुत दूध देती थी। वर्षा उपयुक्त समय पर उपयुक्त मात्रा में होती थी। प्रकृति प्रकोप कभी नहीं होता था। यह प्रकृति की अनुकूलता मनुष्य की सत्प्रवृत्तियों के साथ जुड़ी हुई है। इकॉलाजी विज्ञान के अनुसार प्रकृति की विचारशीलता, सन्तुलन व्यवस्था, दूरदर्शिता एवं न्याय प्रियता का अब क्रमशः अधिकाधिक परिचय मिलता जा रहा है। सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का सामूहिक दण्ड भी उसी व्यवस्था के अन्तर्गत आता है।

व्यक्ति के कर्म का दण्ड व्यक्ति को मिलना चाहिए। यह व्यवस्था तो चलती ही है, पर सामूहिक उत्तरदायित्वों से बँधा रहने के कारण मनुष्य को सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों की रोक थाम करने का भी जिम्मेदार माना है। उसकी उपेक्षा की जाय तो वह भी एक पाप बनता है। स्वयं अच्छा रहना तो उचित ही है, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि जिस समाज में रहा जा रहा है उसे परिष्कृत बनाये रहने की जिम्मेदारी निबाहने में भी उतनी ही तत्परता बरती जाय। अपने आप के हित साधन में लगे रहने वाले, दूसरों की उपेक्षा करने वाले स्वार्थी कहलाते है और निन्दा के पात्र बनते हैं। यद्यपि स्वार्थ साधन कोई प्रत्यक्ष अपराध नहीं है और न उससे किसी मर्यादा का प्रत्यक्षतः उल्लंघन ही होता है। फिर भी व्यक्तिवादी स्वार्थ परायण व्यक्ति निन्दित ठहराये जाते हैं, उसका एक ही कारण है कि मनुष्य के लिए सामाजिक सुव्यवस्था के प्रति उतना ही जागरूक रहना आवश्यक माना गया है जितना कि अपने निर्वाह और सुरक्षा का प्रबन्ध करना।

सरकार कई अपराधों के लिए सामूहिक जुर्माना करती है। समीपवर्तिय क्षेत्र में अपराध होता रहे इसका हमसे सीधा सम्बन्ध नहीं, यह सोचकर उसे रोका न जाय तो इस उपेक्षा को भी मानवी कर्तव्य शास्त्र में दण्डनीय अपराध माना गया है। सामूहिक जुर्माना ऐसे ही अपराधों में किये जाने की दण्ड व्यवस्था है। पड़ौस के गाँव में डकैती पड़ती रहे और जिसके पास बन्दूक का लाइसेन्स है वह डाकुओं का सामना करने न गया, तो उस कायरता को अपराध माना जायेगा और उसकी बन्दूक जब्त कर ली जायेगी। सामूहिक प्रकृति प्रकोप भी ऐसे ही सामूहिक दण्ड विधान के रूप में समूचे मनुष्य जाति पर बरसते है। आवश्यक नहीं कि जिन्हें कष्ट भुगतना पड़ा है मात्र उन्हीं का अपराध हो। मुहल्ले में गन्दगी के ढ़ेर जमा हो तो जमा करने वाले भी और उसे न रोकने वाले भी उस सड़न से हानि उठावेंगे। पड़ोस का छप्पर जलता रहे और अपने घर शान्ति पूर्वक बैठे रहा जाय तो बढ़ती हुई आग अपने को भी लपेटने लगेगी। मुहल्ले में गुन्डा गर्दी बढ़ती रहे तो अनेक सौम्य प्रकृति के बालक भी उस कुचक्र के शिकार किसी न किसी प्रकार बनकर ही रहेंगे। एक व्यक्ति दुष्कर्म करता है बदनामी सारे परिवार या गाँव की होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इन ग्रन्थों में मंत्रों में छिपे पड़े हैं अति गोपनीय प्रयोग (भाग 28)

आध्यात्मिक चिकित्सा के ग्रन्थ अनगिनत हैं। इनका विस्तार असीम है। प्रत्येक धर्म ने, पंथ ने आध्यात्मिक साधनाओं की खोज की है। अपने देश- काल के अनुरूप ये सभी महत्त्वपूर्ण हैं। इनका मकसद भी एक है- सम्पूर्ण स्वस्थ जीवन एवं समग्र रूप से विकसित व्यक्तित्व। इसी उद्देश्य को लेकर सभी ने गहरे आध्यात्मिक प्रयोग किए हैं- और अपने निष्कर्षों को सूत्रबद्ध, लिपिबद्ध किया है। इन प्रयोगों की शृंखला में कई बार तो ऐसा हुआ कि विशेषज्ञों की भावचेतना अपने शिखर पर पहुँच गयी और वहाँ स्वयं ही सूत्र अवतरित होने लगे। परावाणी में दैवी सन्देश प्रकट हुए। इस्लाम का पवित्र ग्रन्थ कुरआन ऐसे ही दैवी संदेशों का दिव्य संकलन है। बाइबिल की पवित्र कथाएँ भी ऐसी ही भावगंगा में प्रवाहित हुई हैं। प्राचीन पारसी जनों के जेन्द अवेस्ता से लेकर अर्वाचीन सिख गुरुओं के ग्रन्थ साहिब तक सभी ग्रन्थ देश- काल के अनुरूप अपना अहत्व दर्शाते रहे हैं। इनमें से किसी आध्यात्मिक ग्रन्थ को कमतर नहीं कहा जा सकता।

परन्तु जब बात प्राचीनता के साथ परिपूर्णता की हो, इस वैज्ञानिक युग में उसकी सामयिकता और सार्वभौमिकता की हो, तो वेद ही परम सत्य के रूप में सामने नजर आते हैं। वेद सब भाँति अद्भुत एवं अपूर्व हैं। ये समस्त सृष्टि में संव्याप्त आध्यात्मिक दृष्टि, आध्यात्मिक शक्ति एवं आध्यात्मिक प्रयोगों का पवित्र उद्गम हैं। यदि इस कथन को अतिशयोक्ति न माना जाय तो यहाँ यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि समस्त विश्व वसुधा में आध्यात्मिक भाव गंगा कहीं बही है, उसका पवित्र उद्गम वेदों का गोमुख ही है। विश्व के प्रत्येक धर्म, पंथ और मत में जो कुछ भी कहा गया है उसके सार निष्कर्ष को वेद मंत्रों में खोजा और पढ़ा जा सकता है। यदि भविष्य कथन और भविष्य दृष्टि पर किसी का विश्वास जमे तो वे जान सकते हैं कि भावी विश्व की आध्यात्मिकता वेदज्ञान पर ही टिकी होगी।

ऐसा कहने में किसी तरह का पूर्वाग्रह नहीं है। बल्कि गम्भीर व कठिन आध्यात्मिक प्रयोगों के निष्कर्ष के रूप में यह सत्य बताया जा रहा है। हां यह सच है कि वेदमंत्रों को ठीक- ठीक समझना कठिन है। क्योंकि ये बड़ी कूटभाषा में कहे गये हैं। जो लोग अपने को संस्कृत भाषा का महाज्ञानी बताकर इनके शब्दार्थों में सत्य को टटोलने की कोशिश करते हैं, उन्हें केवल भ्रमित होना पड़ता है। वे सदा खाली हाथ रहते हैं और अपने को महा- अज्ञानी सिद्ध करते हैं। वेदमंत्रों के अर्थ शब्दों के उथलेपन में नहीं साधना की गहराई में समाए हैं। सच तो यह है कि प्रत्येक वेदमंत्र की अपनी विशिष्ट साधना विधि है। एक सुनिश्चित अनुशासन है और उसके सार्थक सत्परिणाम भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 42

👉 Profit From Dishonesty - Merely An Illusion

Those who accept dishonesty as dignified, and adopt it to be their ideal, are failing to analyze the situation in a thorough enough manner. They are disillusioned. The truth is that money simply cannot be earned by dishonest means. Even when we do acquire some wealth temporarily, the wealth can not stay permanent and really be ours. True living can only be earned through courage, wisdom, discipline, dexterity, and skillfulness.

Dishonest earnings through inappropriate means lead to results that are not only unstable but that are also eventually painful. There might be temporary escape from direct punishment, but eventually, in the long term, dishonesty invariably leads to public anger, outrage, hate, isolation, and sadness. In practice, deceit and corruption must be sugar coated with a fake layer of honesty for it to work. Conning does require establishing trust and confidence. If any suspicion arises, the person being conned is likely to jump out of the trap. Once proven guilty, the con man loses credibility forever and ends up bearing more eventual losses than profits.

There could be scores of everyday examples where the people who are caught bribing, cheating, evading tax, doing back marketing, and illegally hoarding not only get severely punished by the law but they also loose their social status and prestige. Once their deeds become public, everyone starts hating them.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 14

👉 विचार शक्ति के चमत्कार:-

विचार अपने आप में एक चिकित्सा है। शुभ कामना, सत्परामर्श रूपी विचारों का बीजारोपण यही प्रयोजन सिद्ध करते हैं।  विचार संप्रेषण, विचारों से वातावरण का निर्माण, विचार विभीषिका इसी सूक्ष्म विचार शक्ति के स्थूल परिणाम हैं। महर्षि अरविन्द व रमण ने मौन साधना की व अपनी विचार शक्ति को सूक्ष्म स्तर पर क्रियान्वित किया जिसका परिणाम था कि वातावरण में संव्याप्त विक्षोभ मिटाया जा सका तथा स्वतंत्रता आन्दोलन की लहर फैली। सारी क्रांतियाँ विचारों के स्तर से ही आरम्भ हुई हैं। साम्यवाद-प्रजातन्त्र विचार संयमजन्य सामर्थ्य की देन है। विचारों की आँधी जब आती है तो प्रचण्ड तूफान की तरह सबको अपनी लपेट में ले लेती है। बुद्ध और गांधी के समय भी इसी प्रकार आँधी आयी जिसने सूक्ष्म स्तर पर जन-जन को प्रभावित किया व परिवर्तन ला दिया।

अस्त-व्यस्त विचार-शक्ति व्यक्ति को जल्दबाज बनाते हैं व ऐसे व्यक्ति दूरगामी निर्णय न लेकर ऐसे कदम उठा सकते हैं जिन्हें प्रकारान्तर से विक्षिप्तता ही कहा जा सकता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 27)

ऐसी ही एक घटना यहाँ शब्दों में पिरोयी जा रही है। वर्षों पूर्व घटी इस घटना में एक बच्चे के माता- पिता, परम पूज्य गुरुदेव के पास आए। उनके साथ उनका बच्चा भी था। जो कुछ समय से ज्वर से ग्रसित था। यह ज्वर था कि किसी चिकित्सक की औषधि से ठीक ही नहीं हो रहा था। हां, इसके दुष्प्रभाव हाथ, पांव सहित समूचे शरीर पर पड़ने शुरू हो गए थे। एक तरीके से उसका शरीर लुंज- पुंज हो गया था। बच्चे की दिमागी हालत भी बिगड़ने लगी थी। समूचा स्नायु संस्थान निष्क्रिय पड़ता जा रहा था। माता- पिता ने अपने बच्चे की सारी व्यथा गुरुदेव को कह सुनायी। उन्होंने सारी बातें ध्यान से सुनी और मौन हो गए।

बच्चे के माता- पिता बड़ी आशा भरी नजरों से उनकी ओर देख रहे थे। पर यहाँ गुरुदेव की आँखें छलक उठी थीं। वह उस बच्चे की पीड़ा से, माता- पिता के सन्ताप से विह्वल हो गए थे। थोड़ी देर बाद वह भाव भरे मन से उन लोगों से बोले, बेटा- तुम लोगों ने हमारे पास आने में देर कर दी। इसके प्रारब्ध का दुर्योग अब एकदम पक गया है। ऐसी स्थिति में कुछ भी करना सम्भव नहीं। वैसे भी यह बच्चा है, यदि हम इस पर अपनी विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रयोग करेंगे तो इसका शरीर सह नहीं पाएगा। बहुत सम्भव है कि यह मर ही जाए।

गुरुदेव की इन बातों ने माता- पिता को निस्पन्द कर दिया। वे निराशा से विगलित हो गए। उन्हें इस तरह पीड़ित देखकर गुरुदेव बोले, तुम लोग मेरे पास आए हो, तो इस असम्भव स्थिति में थोड़ा- बहुत तो मैं करूँगा ही। इसमें पहली चीज तो यह कि बच्चे का दिमाग एकदम ठीक हो जाएगा। अपाहिज स्थिति में भी यह प्रतिभावान होगा। अभी जो यह लगभग गूँगा हो गया है, आपसे बातचीत कर सकेगा। शारीरिक अपंगता की यह स्थिति होने के बावजूद इसमें कई तरह के कौशल विकसित होंगे। बस बेटा! इस स्थिति में इसके लिए इससे ज्यादा कुछ भी सम्भव नहीं। गुरुदेव के इन शब्दों ने बच्चे के माता- पिता को जैसे वरदान दे दिया। थोड़े ही महीने के बाद पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रभाव उस बच्चे के जीवन में प्रकट हुए। अपाहिज होते हुए भी वह प्रतिभावान कलाकार बना। उसके प्रारब्ध का अटल दुर्योग टला तो नहीं पर पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चिकित्सा ने उसे रूपान्तरित तो कर ही दिया। इस आश्चर्यजनक प्रक्रिया के संकेत आज भी महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रन्थों में देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 40

👉 लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

सिंहगढ़ जीतने के लिए मराठों के एक दल ने उस पर चढ़ाई कर दी। प्रसिद्ध तानाजी राव इसके सेनानी थे। अपने सैनिकों के साथ किले की दीवार पर रस्सी टाँगकर चढ़ गये। शत्रुओं के साथ घोर युद्ध होने लगा। तानाजी खेत रहे। इस पर वीर मराठा चंचल हो गये और एकाग्रता भंग होते ही उन्होंने भागना आरम्भ कर दिया, जिस रास्ते आये थे उसी रास्ते से उतरने का प्रयत्न करने लगे। तानाजी के भाई सूर्याजी ने उस रास्ते को बन्द करने के लिए रस्सी को काट दिया और कह दिया कि भागने का रास्ता बन्द हो गया। भागने का रास्ता बन्द हो जाने पर जीत का ही रास्ता खुला मिला, इस लिए जो शक्ति भागने में लग गई थी उसने फिर जीत का बाना पहना। और सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त की।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं। शास्त्रों में इस सफलता को पाने के लिए बाण के समान गतिवाला बनने का आदेश दिया है-
“शर वत् तन्मयो भवेत्”
बाण की तरह तन्मय होना चाहिए।

धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950

👉 आज का सद्चिंतन 11 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 1)

व्यक्तियों की गतिविधियाँ जब श्रेष्ठता से समन्वित रहती है तो उनके श्रम, समय, मनोयोग एवं साधनों का उपयोग सत्प्रयोजनों में होता है, फलतः सुखद परिस्थितियाँ बढ़ती जाती हैं, निरर्थक कार्यों में लगने से पिछड़ेपन की और अनर्थ कार्यों से अधःपतन की परिस्थितियाँ बनती हैं। जब जन प्रवाह पतनोन्मुख होता है तो स्वभावतः अभाव, संकट एवं विद्रोह बढ़ते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया का कुचक्र चलता है और बुरे युग के- पाप युग, नरक युग के समस्त लक्षण सर्वत्र दृष्टिगोचर होते है। सत्प्रयत्नों के सत्परिणाम तो स्पष्ट ही हैं। धर्मराज्य, सतयुग आदि ऐसे ही समय को कहा जाता है। युग कैसा है? कैसा होगा? इन प्रश्नों का उत्तर यह पर्यवेक्षण करके दिया जा सकता है कि लोग क्या कर रहे है और क्या करने की तैयारियों में लग रहे हैं।

कुविचार और कुकर्म बढ़ने लगे तो वातावरण में भावनात्मक विषाक्तता उत्पन्न होनी स्वाभाविक है। उसका प्रतिफल व्यापक रूप से दुखद दुर्घटनाओं के रूप में परिलक्षित होता है। यही कलियुग है। चन्दन वृक्ष सुगन्धित होते है, उन्हें छूकर जो पवन चलता है वह दूर- दूर तक सुवास बिखेरता है। पुष्प वाटिका भी अपने समीपवर्ती क्षेत्र में सुगन्धित और जीवन दायिनी प्राण वायु बिखेरती हैं। सज्जनों को चन्दन वृक्ष और पुष्प पादपों की संज्ञा दी जा सकती है। वे स्वयं तो आन्तरिक प्रसन्नता और साथियों की सद्भावना से सुखी सन्तुष्ट रहते ही हैं, अपनी गरिमा का उपहार सारे वातावरण को प्रदान करते है। कीचड़ और कूड़े से, सड़े नाले से बदबू उठती है, विषाणु बढ़ते हैं, कुरुचिपूर्ण वातावरण बनता है और बीमारियाँ फैलती है मनुष्यों के व्यक्तित्व यदि सड़े नाले और कूड़े के ढ़ेर जैसे बने रहे तो उनकी विकृतियाँ उन अकेले को ही कष्ट नहीं देगी, वरन् समूचे वातावरण में अवांछनीय विक्षोभ उत्पन्न करेंगी। यही कलियुग का- पाप युग का स्वरूप है। युगों के भले- बुरे होने में व्यक्तियों का स्तर ही प्रधान कारण होता है। जन समूह के द्वारा अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियाँ अपनी प्रतिक्रिया से समूचे वातावरण में ऐसी ही विषाक्तता उत्पन्न करती हैं, जो सबके लिए सब प्रकार दुखदायी परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती चली जाय।

विषाक्तता के वायुमण्डल का दूषित होना पदार्थ विज्ञान के आधार पर स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। अध्यात्म विज्ञान के आधार पर यह जानने में भी कठिनाई न होनी चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों के कारण प्रकृति का सूक्ष्म अन्तराल विक्षुब्ध होता है और उसकी प्रतिक्रिया ऐसी व्यापक परिस्थितियों के रूप में बरसती है, जिनसे संसार को संकटों का सामना करना पड़े। प्रकृति प्रकोप की दुर्घटनाएँ ऐसे ही विक्षुब्ध वातावरण की देन है। आवश्यक नहीं कि जहाँ के लोगों की दुष्प्रवृत्तियाँ हों वही बरसे। सूर्य की गर्मी से समुद्र में बादल उत्पन्न होते हैं आवश्यक नहीं कि वे समुद्र में ही बरसे। वे कहीं भी जाकर बरस सकते है। जब सारी धरती और सारा आसमान एक है तो बादलों को कहीं भी बरसने की छूट रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Last Part)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS


A student has to face many hardships in course of his education. A mother suffers while bringing up the child. Ascetics, social reformers and righteous persons undergo unbearable hardships while working for reformation of the society and evolution of the human soul. Such voluntarily undertaken hardships, confrontations and problems faced in course of fulfillment of self-assumed
responsibilities cannot be considered as consequences of past misdeeds.

It would not be proper to regard every “happygo- lucky” person as a virtuous person in his past life or every sufferer as a sinner of his past birth. Such a concept would be unjustified and misleading. There is no reason for someone to have self-pity or feel remorseful on such a false premise. The course from karma to prarabdha follows an occult and mysterious process known only to the Creator.

We have to remain ever vigilant towards our duties and responsibilities and leave the rest to impartial Supreme Justice of God. Let us face the misfortunes and good fortunes of life with equanimity. God has made us responsible only for our duties as human beings. There could be many reasons for successes-failure and happiness unhappiness. Only the Creator knows their purpose in His
Absolute Wisdom. Let us entirely offer ourselves to the Divine to be used for the free and unobstructed flow of His Will through us.

.... The End
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 55

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 July 2019


👉 Moments of self-expression

■  अवांछनीय चिंतन और चरित्र अपनाये रहने पर किसी भी पूजा-पाठ के सहारे किसी को दैवी अनुकम्पा का एक कण भी हस्तगत नहीं होता। जब पात्रता को परखे बिना भिखारियों तक को लोग दुत्कार देते हैं, तो बिना अपनी स्वयं की उत्कृष्टता सिद्ध किये कोई व्यक्ति दैवी शक्तियों को बहका-फुसला सकेगा, इसकी आशा नहीं ही करनी चाहिए।

◇ बातों का जमाना बहुत पीछे रह गया है। अब कार्य से किसी व्यक्ति के झूठे या सच्चे होने की परख की जायेगी। कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्ध करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका अपनाया जाना न केवल सरल है, बल्कि हर दृष्टि से लाभदायक भी।

★ अक्लमंदी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धूर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गर्त में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव बंधन है। इस पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बुद्धिमत्ता में ही है। बुद्धिमत्ता अर्थात् विवेकशीलता-दूरदर्शिता, इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।

◇ अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है वह है-दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्ति यों कभी किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है, जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "A Dull Brain Trained For Sharp Memory

There is no parallel to Mr. W J M Baton of England in building up brain-power and memory capacity. Born in Kent county of England, Mr. Baton was so dull that he could not remember what he read. He was very weak and sick, for what he had to leave his school prematurely at the age of 11. What type of memory and wisdom can be expected from him? But inspired by his father, he developed a hobby of memorizing small events occurring around him and then describe to people with date, time and names of the places, just to impress them.

He gradually increased his memorizing capacity to such an extent that started being considered as a walking encyclopedia! He did this with a firm determination to achieve the goal of sharp memory power. With sincere efforts, he acquired such a memory that he became famous around every place. Once he was interviewed by well-known astrologers, politicians and esteemed persons of England, who asked him some details of events believed to be forgotten for a long time. But he replied with accurate data of place and time in perfect chronology that surprised everybody.

Baton became so famous in his time that after his death, one American health institute purchased his head for 10,000 dollars to study the secrets of his extraordinary brain capacity.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein
(Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 20

बुधवार, 10 जुलाई 2019

👉 मन को जानें:-

फ्रायड ने अपनी जीवन कथा में एक छोटा-सा उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि एक बार वह बगीचे में अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ घूमने गया। देर तक वह पत्नी से बातचीत करता रहा, टहलता रहा। फिर जब सांझ होने लगी और बगीचे के द्वार बंद होने का समय करीब हुआ, तो फ्रायड की पत्नी को खयाल आया कि ‘उसका बेटा न-मालूम कहां छूट गया है? इतने बड़े बगीचे में वह पता नहीं कहां होगा? द्वार बंद होने के करीब हैं, उसे कहां खोजूं?’ फ्रायड की पत्नी चिंतित हो गयी, घबड़ा गयी।

फ्रायड ने कहा, ‘‘घबड़ाओ मत! एक प्रश्र मैं पूछता हूँ तुमने उसे कहीं जाने से मना तो नहीं किया? अगर मना किया है तो सौ में निन्यानबे मौके तुम्हारे बेटे के उसी जगह होने के हैं, जहां जाने से तुमने उसे मना किया है।

”उसकी पत्नी ने कहा, ‘‘मना तो किया था कि फव्वारे पर मत पहुंच जाना।’

फ्रायड ने कहा, ” अगर तुम्हारे बेटे में थोड़ी भी बुद्धि है, तो वह फव्वारे पर ही मिलेगा। वह वहीं होगा। क्योंकि कई बेटे ऐसे भी होते हैं, जिनमें बुद्धि नहीं होती। उनका हिसाब रखना फिजूल है। ” फ्रायड की पत्नी बहुत हैरान हो गयी। वे गये दोनों भागे हुए फव्वारे की ओर। उनका बेटा फव्वारे पर पानी में पैर लटकाए बैठा पानी से खिलवाड़ कर रहा था।

फ्रायड की पत्नी ने कहा, ‘‘बड़ा आश्‍चर्य! तुमने कैसा पता लगा लिया कि हमारा बेटा यहां होगा? फ्रायड ने कहा, "आश्चर्य इसमें कुछ भी नहीं है। मन को जहां जाने से रोका जाये, मन वहीं जाने के लिए आकर्षित होता है। जहां के लिए कहा जाये, मत जाना वहां, एक छिपा हुआ रहस्य शुरू हो जाता है कि मन वहीं जाने को तत्‍पर हो जाता है।

” फ्रायड ने कहा, यह तो आश्‍चर्य नहीं है कि मैंने तुम्हारे बेटे का पता लगा लिया, आश्‍चर्य यह है कि मनुष्य-जाति इस छोटे-से सूत्र का पता अब तक नहीं लगा पायी। और इस छोटे-से सूत्र को बिना जाने जीवन का कोई रहस्य कभी उदघाटित नहीं हो पाता। इस छोटे-से सूत्र का पता न होने के कारण मनुष्य-जाति ने अपना सारा धर्म; सारी नीति, सारे समाज की व्यवस्था सप्रेशन पर, दमन पर खड़ी की हुई है।

👉 आज का सद्चिंतन 10 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 July 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 26)

👉 प्रारब्ध का स्वरूप एवं चिकित्सा में स्थान

हमारे कर्म की तीव्रता का आधार होते हैं भाव एवं विचार। क्योंकि इन्हीं से इच्छा एवं संकल्प की सृष्टि होती है। इच्छा और संकल्प के तीव्र व सबल होने पर कर्म भी प्रबल हो जाते हैं। ऐसे प्रबल कर्म अल्प समयावधि में प्रारब्ध में परिवर्तित होकर अपना फल देने की स्थिति में आ जाते हैं। जबकि सामान्य इच्छा के साथ की जाने वाली क्रियाएँ कर्म तो बनती है, परन्तु प्रारब्ध के रूप में इनका रूपान्तरण काफी लम्बे समय बाद होता है। कभी- कभी तो इनके प्रारब्ध बनने में जन्म एवं जीवन भी लग जाते हैं। यहाँ जो बताया जा रहा है वह सुपरीक्षित सत्य है। इसे बार- बार अनुभव किया गया है।

इस सिद्धान्त के अनुसार आध्यात्मिक कर्म, तप आदि साधनात्मक प्रयोग तीव्रतम कर्म माने गए हैं। क्योंकि इनमें भावों एवं विचारों की तीव्रता अधिकतम होती है। इच्छा और संकल्प प्रबलतम होते हैं। ऐसे कर्मों का जब सविधि अनुष्ठान किया जाता है, तो वे तुरन्त ही प्रारब्ध में परिवर्तित होकर अपने फल को प्रकट कर देते हैं। कोई भी अवरोध इसमें आड़े नहीं आता। जिनके कठिन तप प्रयोगों का अभ्यास है, उनके लिए यह नित्य प्रति का अनुभव है। वे अपने दैनिक जीवन में इस सत्य का साक्षात्कार करते रहते हैं।

प्रारब्ध के सिद्धान्त एवं विज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण सच और भी है। वह यह कि कर्म बीज से प्रारब्ध बनने की प्रक्रिया यदि अभी पूरी नहीं हो सकी है तो उसे किसी विशेष आध्यात्मिक प्रयोग से कम किया जा सकता है अथवा टाला जा सकता है। परन्तु यदि यह प्रक्रिया पूरी हो गयी है और प्रारब्ध ने अपना पूर्ण आकार ले लिया है तो फिर यह अटल और अनिवार्य हो जाता है। फिर इसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन भले कर दिया जाय, परन्तु इसका टल पाना किसी भी तरह सम्भव नहीं हो पाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 39

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 33)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS

Sometimes, the virtuous samskars accumulated on account of our past karmas also produce unhappy events. Virtuous karmas also act as shields to ward off sinful temptations. The former do not permit the sinful tendencies to dominate and offer stiff resistance. Many a times commitment of sin is foiled by some unforeseen obstacle. If a thief breaks his leg while goings for theft, it should be
taken as a consequence of his past virtuous karmas.

Those who work hard for moral or social upliftment of the society and meticulously follow their course of duty, face stupendous problems, hardships and lack of resources. They also have to face antagonism of people who find such activities detrimental to their vested interests. Besides, they are tormented by unscrupulous in many ways. Persons treading the royal highway of righteousness
have to face hardships at each step. Misfortunes are like goldsmith’s furnace, in which the validity of past virtues and tolerance to hardships undertaken for virtuous deeds are tempered. After going through misfortunes, the character and personality of an upright person becomes all the more lustrous.

Hence while going through misfortunes, do not be under the impression that you are a sinner and a wretched person deserving Divine Wrath. It could be that the distress is a blessing in disguise, with hidden boons, which you are unable to foresee at the moment because of lack of clear vision.

Innocent persons may be found suffering because of unfair ideologies or oppression by others. Any one may become a victim of exploitation, suppression and injustice. The exploiter has to face the consequences of his karmas in due course of time, but the sufferer should not take such trials as outcome of his prarabdha.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 54

👉 Moments of self-expression 10 July 2019

■  दुष्कर्म करना हो तो उसे करते हुए कितनी बार विचारों और उसे आज की अपेक्षा कल-परसों पर छोड़ों, किन्तु यदि कुछ शुभ करना हो तो पहले ही भावना तरंग को कार्यान्वित होने दो। कल वाले काम को आज ही निपटाने का प्रयत्न करो। पाप तो रोज ही अपना जाल लेकर हमारी घात में फिरता रहता है, पर पुण्य का तो कभी-कभी उदय होता है, उसे निराश लौटा दिया तो न जाने फिर कब आवे।

◇ दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं-अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा डाले? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो आत्म-सुधार के लिए, आत्म-निर्माण के लिए और आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

★ पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान् वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ साँप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्ज्वल जीवन का नाश कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

👉 कहाँ छुपी हैं शक्तियां!

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा, न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें। चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर -उधर दौड़ता रहता है, मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं। और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। और ऐसा ही किया गया, मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया, इसलिए कहा जाता है मानव मवन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

दोस्तों इस कहानी का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियां विद्यमान हैं। अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए। हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये। आँखें खोलिए, अपने भीतर झांकिए और अपनी अपार शक्तियों का प्रयोग कर अपना हर एक सपना पूरा कर डालिये।

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 25)

👉 प्रारब्ध का स्वरूप एवं चिकित्सा में स्थान

प्रारब्ध के सुयोग- दुर्योग जीवन में सुखद- दुःखद परिस्थितियों की सृष्टि करते हैं। प्रारब्ध का सुयोग उदय होने से अनायास ही सुख- सौभाग्य एवं स्वास्थ्य की घटाएँ छा जाती है। जबकि कहीं यदि प्रारब्ध का दुर्योग उदय हुआ तो जीवन में दुःख- दुर्भाग्य एवं रोग- शोक की घटाएँ घिरने लगती हैं। मानव जीवन में प्रारब्ध का यह सिद्धान्त भाग्यवादी कायरता नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि की सूक्ष्मता व पारदर्शिता है। यह ऐसा सच है जिसे हर पल- हर क्षण सभी अनुभव करते हैं। सुख- दुःख के हिंडोले में झूलते हुए इनमें से कुछ इस सच्चाई को पारम्परिक रूप से स्वीकारते हैं। जबकि कई अपनी बुद्धिवादी अहमन्यता के कारण इसे सिरे से नकार देते हैं। थोड़े से तपस्वी एवं विवेकी लोगों को आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त होती है, वे इस सूक्ष्म सत्य को साफ- साफ देख पाते हैं। इसे पूरी पारदर्शिता के साथ अनुभव करते हैं।

जिन्हें यह अनुभूति होती है और हो रही है वे इस सम्बन्ध में सभी के सभी तरह के सवालों का जवाब देने में सक्षम हैं। ज्यादातर जनों की जिज्ञासा होती है- प्रारब्ध है क्या? तो इसका सरल समाधान है- प्रारब्ध का अर्थ है- परिपक्व कर्म। हमारे पूर्वकृत कर्मों में जो जब जिस समय परिपक्व हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्ध की संज्ञा मिल जाती है। यह सिलसिला कालक्रम के अनुरूप चलता रहता है। इसमें वर्ष भी लगते हैं और जन्म भी। कई बार क्रिया भाव में और विचारों का इतना तीव्रतम संयोग होता है कि वे तुरन्त, प्रारब्ध कर्म का रूप ले लेते हैं। और अपना फल प्रकट करने में सक्षम सिद्ध होते हैं। ये पंक्तियाँ अपने पाठकों को थोड़ा अचरज में डाल सकती है। किन्तु यह सभी तर्कों से परे अनुभूत सत्य है। आध्यात्मिक चिकित्सा में प्रारब्ध के स्वरूप एवं सिद्धान्त को समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

इस क्रम में सबसे प्रथम बिन्दु यह है कि हमारे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म अविनाशी है। यह अच्छा हो या बुरा समयानुसार परिपक्व होकर प्रारब्ध में बदले बिना नहीं रहेगा। और प्रारब्ध का अर्थ ही है वह कर्म जिसका फल भोगने से हम बच नहीं सकते। इसे सामान्य जीवन क्रम के बैंक और उसके फिक्स डिपॉजिट के उदाहरण से समझा जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि बैंक में अपने धन को निश्चित समय अवधि में जमा करने की प्रथा है। इस प्रक्रिया में अलग- अलग जमा पूंजी एक निश्चित अवधि में डेढ़ गुनी- दो गुनी हो जाती है। इस प्रकार बैंक में हम अपने ढाई हजार रुपये जमा करके पांच साल में पांच हजार पाने के हकदार हो जाते हैं।

बस यही प्रक्रिया कर्मबीजों की है- जो जीवन चेतना की धरती पर अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होकर अपना फल प्रकट करने की स्थिति में आते रहते हैं। कौन कर्म किस समय फल बनकर सामने आएगा? इसमें कई कारक क्रियाशील होते हैं। उदाहरण के लिए सबसे पहले कर्म की तीव्रता क्या है? कितनी है? ध्यान देने की बात यह है कि प्रत्येक क्रिया कर्म नहीं होती। जो हम अनजाने में करते हैं, जिसमें हमारी इच्छा या संकल्प का योग नहीं होता, उसे कर्म नहीं कहा जा सकता। इसका कोई सुफल या कुफल भी नहीं होगा। इसके विपरीत जिस क्रिया में हमारी इच्छा एवं संकल्प का सुयोग जुड़ता है, वह कर्म का रूप धारण करती है। और इसका कोई न कोई फल अवश्य होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 38

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 32)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS

For most of us misfortunes are unwelcome. These are popularly believed to be the result of past sins and displeasure of God. However, this view is only partially correct. It is true that one of the reasons for unhappiness is past sins, but all unhappy events do not necessarily have their roots in past misdeeds. It may appear paradoxical, that at times misfortunes also befall us because of the grace of God and accumulation of past virtues. Unhappiness may also be felt while undergoing hardships in course of virtuous activities. When God shows His condescension towards a highly evolved soul and wills to release that soul from the bondage of sins of materialism, He creates distressful situations in life. Such unhappy events jolt the individual out of his slumber and to realize the futility of attachment to worldly things. The shock of unhappiness in such cases serves as a Divine Wake-Up-Call.

Our addiction to worldly attachments, infatuations and passions is so strong and alluring that we cannot be easily de-addicted by a casual approach. There are fleeting moments of wisdom in life when man thinks that life is extremely valuable and must be used for achieving some lofty objective, but soon thereafter attractions of the world drag him back to the erstwhile lowly routine of animal-like existence. Through misfortunes, God exerts a strong pull to extricate the devotee from the self-created quagmire of ignorance. Mishaps wake us up from our slumber in ignorance and darkness.

Unpleasant, heartbreaking happenings, such as a near fatal accident or disease, death of an intimate friend or relative, sudden financial loss, humiliation, or treachery by a trusted friend, may occur to give a strong shock treatment so that one may correct the course of his life.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 53

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 9 July 2019

■ संसार की सेवा का एक रूप अपनी सेवा भी माना गया है। अपनी सेवा से तात्पर्य अपने शरीर मात्र की सेवा से नहीं है, न भोग-विलास और सुख-साधनों में लगा रहना ही सेवा है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है। अपने सुधार द्वारा हम जितना-जितना अपने को सुधारते चलेंगे, उतनी-उतनी ही समस्त संसार की सेवा होती चलेगी। हम javascript:openFiles()सब इस विराट् विश्व की एक इकाई हैं। इसलिए अपनी सेवा भी संसार की सेवा ही कही जाएगी।

◇ पक्षपात की मात्रा जितनी बढ़ेगी, उतनी ही विग्रह की संभावना बढ़ेगी। उचित-अनुचित का भेद कर सकना, तथ्य को ढूँढना और न्याय की माँग को सुन सकना पक्षपात के आवेश में संभव ही नहीं हो पाता। अपने पक्ष की अच्छाइयाँ ही दीखती हैं और प्रतिपक्षी की बुराइयाँ ही सामने रहती हैं। अपनों की भूलें और विरानों के न्याय-तथ्य भी समझ में नहीं आते। तब एक पक्षीय चिंतन उद्धत बन जाता है। ऐसी दशा में आक्रमण-प्रत्याक्रमण का क्रम चल पड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। यदि तथ्यों को खोज निकालने की दूरदर्शिता अपनाये रहा जाय, कारणभूत तथ्यों को ढूँढ़ निकाला जाय और न्यायोचित समाधान के लिए प्रयास किया जाय, तो तीन-चौथाई लड़ाइयाँ सहज ही निरस्त हो सकती हैं।

★ संसार में कोई व्यक्ति बुरा नहीं है। सबमें श्रेष्ठताएँ भरी हुर्ह हैं। आवश्यकता एक ऐसे व्यक्ति  की है, जो अच्छाई को लगातार प्रोत्साहन देकर बढ़ाता रहे। कैसे दुःख की बात है कि हम मनुष्य को उसकी त्रुटियों के लिए तो सजा देते हैं, पर उसकी अच्छाई के लिए प्रशंसा में कंजूसी करते हैं। आप विश्वास के साथ दूसरों को अच्छा कहें तो निश्चय ही वह श्रेष्ठ बनेगा। मन को अच्छाई पर जमाइए, सर्वत्र अच्छाई ही बढ़ेगी। आपके तथा दूसरे के मन में बैठे हुए देव जाग्रत् और चैतन्य होंगे तो उनसे देवत्व बढ़ेगा।

■ पुस्तकालय सच्चे देव मंदिर हैं। उनमें महापुरुषों की आत्माएँ पुस्तकों के रूप में प्रतिष्ठित रहती हैं। सत्संग के लिए पुस्तकालयों से बढ़कर विद्वान् और निर्मल चरित्र व्यक्ति दूसरा नहीं मिल सकता। अपने वंशजों के लिए एक उत्कृष्ट पुस्तकालय से मूल्यवान् वस्तु और कुछ हो ही नहीं सकती। उत्तराधिकार में और कुछ छोड़ें अथवा नहीं, पर एक अच्छे प्रेरणाप्रद पुस्तकालय की घर में स्थापना करके उस धरोहर को बच्चों, वंशजों के लिए छोड़ ही जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 8 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 24)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

इस युग के महानतम् आध्यात्मिक चिकित्सक ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव इस प्रक्रिया में सिद्धहस्त थे। उन्होंने असंख्य जनों के पूर्वजन्म को जानकर उनके जीवन को पीड़ा, परेशानी से मुक्त किया। ऐसी ही एक घटना- शिव नारायण कुलकर्णी के जीवन की है। उन दिनों श्री कुलकर्णी की युवावस्था थी। और अभी हाल में ही उन्होंने एम.एस- सी. (भौतिक विज्ञान) में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था। उनके स्वजन उन्हें शोध अध्ययन के लिए अमेरिका भेजना चाहते थे। पासपोर्ट, वीज़ा आदि की सारी तैयारियाँ हो चुकी थी। खर्च का भी इन्तजाम हो गया था। लेकिन तभी उन्हें पागलपन का दौरा पड़ा। स्वजनों ने मेडिकल कॉलेज के साइकिएट्री विभाग में उनका इलाज कराया। पर स्थिति सुधरी नहीं। चिकित्सक एवं चिकित्सालय बदलते गए और स्थिति बिगड़ती गयी।

हारे को हरिनाम, मुसीबत पड़े तो श्रीराम। कहीं से ढूँढ खोजकर वे गुरुदेव के पास आ गए। गुरुदेव ने उनको बड़े ध्यान से देखा और उनकी आँखें छलक आयी। युवक श्री शिवनारायण कुलकर्णी के माता- पिता ने जानना चाहा, कि उनके इस लड़के का क्या होगा। घर- परिवार में सबसे होनहार बालक इतने बुरे पागलपन के चपेट में आ गया है। उन चिन्तित माता- पिता की ओर देखते हुए गुरुदेव बोले- बेटा तुम्हारे पुत्र की समस्या गम्भीर है और इसका ठीक होना लगभग असम्भव है। ऐसा करो कि तुम लोग अभी शान्तिकुञ्ज में ठहरो। और मेरे पास कल आना। तब कुछ समाधान सोचेंगे।

बड़ी से बड़ी आपदाओं को चुटकियों में हलकर देने वाले गुरुदेव ऐसा क्यों कह रहे हैं? यह राज पास बैठे हुए कार्यकर्त्ता को समझ में न आया। उसने जिज्ञासावश पूछा, गुरुदेव इस युवक के जीवन में कोई गम्भीर बात है क्या? इस प्रश्र पर पहले तो गुरुदेव मौन रहे फिर बोले- बेटा! इसने पूर्वजन्म में बहुत ही बड़ा अपराध किया है, उसी का फल इस रूप में प्रकट हो रहा है। इसे कोई भी ठीक नहीं कर सकता। तब क्या होगा? देखेंगे, कहकर वह मौन साध गए।

दूसरे दिन दोपहर में वह युवक और उसके माता- पिता फिर से आए। यह कार्यकर्त्ता भी काम से पूज्यवर के पास पहुँचा था। गुरुदेव ने उसके माता- पिता को सम्बोधित करते हुए कहा, हम तुम्हें निराश नहीं करना चाहते। इस लड़के की आयु भी अभी कम है। हम इसे ठीक तो कर देंगे, पर इसमें समय लगेगा। स्थिति कठिन तो जरूर है, पर हम स्वयं इसके द्वारा पूर्वजन्म के किए गए महापाप का प्रायश्चित्त करेंगे। साथ ही अपनी आध्यात्मिक शक्ति से इसके मन- मस्तिष्क की शल्यचिकित्सा करेंगे। यह प्रक्रिया कई चरणों में चलेगी। और इसमें लगभग दो- ढाई साल लगेंगे।

गुरुदेव की इन बातों ने युवक के माता- पिता को आश्वस्त कर दिया। बीच- बीच में वे गुरुदेव से मिलने शान्तिकुञ्ज आते रहे। उस युवक में समय के साथ परिवर्तन प्रारम्भ हो गए। और समय के साथ वह ठीक भी हो गया। पूज्यवर की आध्यात्मिक चिकित्सा के विज्ञान को उस युवक के साथ उसके माता- पिता ने भी अनुभव किया। साथ ही यह भी जान सके कि पूर्वजन्म में हुए दुष्कर्म और उससे उपजे रोग- शोक का परिमार्जन आध्यात्मिक ढंग से ही सम्भव है। इसी विधि से प्रारब्ध के सुयोग- दुर्योग बदले जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

रविवार, 7 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 23)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

आध्यात्मिक चिकित्सा के इस सिद्धान्त को कई आधुनिक मनोचिकित्सकों ने स्वीकारा है। इन्हीं में से एक डॉ. ब्रायन वीज़ हैं। जो अमेरिका में फ्लोरिडा क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले मियामी शहर में मनोचिकित्सा कर रहे हैं। डॉ. वीज़ ने अपने चिकित्सा कार्य में कई बार पाया कि रोगी के दुःख द्वन्द्व के कारण उसके व्यक्तित्व की अतल गहराइयों में है। पहले तो उन्होंने प्रचलित विधियों का प्रयोग करके तह तक जाने की कोशिश की। पर उन्हें कोई खास सफलता न लगी। हां उन्हें इतना जरूर अहसास हुआ कि अभी ज्यादा गहरे उत्खनन की जरूरत है। और उन्होंने नयी विधियों की खोज करके अपने रोगी के पिछले जीवन में झांकने की कोशिश की। इस कोशिश ने उन्हें न केवल सफल बनाया, बल्कि इस तरह वे पूर्वजन्म की वैज्ञानिकता को जानने में सफल रहे।

डॉ. वीज़ ने अपने इन प्रायोगिक निष्कर्षों को अलग- अलग ढंग से पुस्तकों में प्रकाशित किया। इन पुस्तकों में ‘मैसेजेस फ्राम दि मास्टर्स, मैनी लाइव्स, मैनी मास्टर्स, ओनली लव इज़ रियल एवं थ्रू टाइम इन्टू हीङ्क्षलग’ मुख्य है। उनके इस वैज्ञानिक रचना से संसार में आध्यात्मिक चिकित्सा की हकीकत जानी- समझी एवं पढ़ी जा सकती है। साथ ही यह भी अनुभव किया जा सकता है कि किसी भी रोगी की सफल आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए उसके पूर्वजन्म के ज्ञान का क्या महत्त्व है। डॉ. वीज़ के ये प्रायोगिक निष्कर्ष न केवल सामान्य पाठक को अभिभूत करते हैं, बल्कि इन सत्यों की जानकारी ने उन्हें स्वयं को अभिभूत कर दिया है। इसी का सुखद परिणाम है कि मनोचिकित्सक के रूप में अपने व्यवसाय का प्रारम्भ करने वाले डॉ. ब्रायन वीज़ आज स्वयं को आध्यात्मिक चिकित्सक कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।

डॉ. वीज़ के इस सच को भगवद्भूमि भारत ने युग- युगान्तर से अनुभव किया है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इस सत्य को बताते हुए कहा है-
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वैत्थ परंतप॥

हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।
यह जानना किसी आध्यात्मिक चिकित्सक की योग्यता को प्रामाणित करता है। यदि किसी में यह योग्यता नहीं है तो उसकी आध्यात्मिक चिकित्सा भी उसी की तरह अधूरी एवं अप्रामाणिक रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

Hosh Me Aana, Meditation होश में आना, ध्यान । Shraddhey Dr. Pranav Pandya



Title

शनिवार, 6 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 22)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

पूर्वजन्म में वर्तमान जीवन के रहस्यों की जड़ें हैं। इन्हें खोदे बिना, इन्हें समझे बिना जिन्दगी की सूक्ष्मताओं का भेद नहीं पाया जा सकता। अचेतन के अविष्कार को आधुनिक मनोविज्ञान अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है। मनोवैज्ञानिक अनुसन्धानों के सारे दरो- दीवार इसी नींव पर टिके हैं। किसी भी पीड़ा- परेशानी का कारण मनोचिकित्सक अचेतन में ढूँढने की कोशिश करते हैं। आज के वैज्ञानिक समुदाय में इस सच को स्वीकारा जाता है कि जिन्दगी की समस्याओं की जड़ें इन्सान के मन में है। अनगिनत शोध प्रयासों ने इस तथ्य को प्रामाणिकता दी है कि रोग शारीरिक हों या मानसिक, इनके बीज इन्सान के अचेतन मन की परतों में छुपे होते हैं। इस सर्वमान्य स्वीकारोक्ति को विशेषज्ञों ने कई तरह से जाँच- परखकर सही पाया है। इसमें न कोई मतभेद है और न मनभेद।

हां, सवाल इसका जरूर है कि अचेतन मन क्या है? तो मनोवैज्ञानिक इसके उत्तर में कहते हैं कि यह और कुछ नहीं बस हमारा बीता हुआ कल है। बीते हुए कल में हमने जो कुछ किया, सोचा अथवा जो भावानुभूतियाँ पायी उसकी गहरी लकीरें हमारे अचेतन मन में अभी भी बनी हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि हमारे बीते हुए कल की अनुभूतियाँ ही अचेतन का निर्माण करती हैं। यदि इन अनुभूतियों में कटुता, तिक्तता या कसक बाकी रही है, तो वह रोग- शोक के रूप में प्रकट होती है। इसी से अनेकों दुःखद घटनाक्रम जन्म लेते हैं। यदि अचेतन की स्थिति सुधरी- संवरी है, तो जीवन के सुखमय होने के आसार भी बनते हैं।

प्रायः सभी मनोचिकित्सक अचेतन की इस परिभाषा एवं प्रभाव से सहमत हैं। किन्तु आध्यात्मिक चिकित्सक इस सत्य को अपेक्षाकृत व्यापक परिदृश्य में देखते हैं। इनका कहना है कि बीते हुए कल की सीमाएँ केवल वर्तमान के क्षण से लेकर बचपन तक सिमटी नहीं हैं। इसके दायरे काफी बड़े हैं। ये इतने ज्यादा व्यापक हैं कि इसमें हमारे पूर्वजन्म की अनुभूतियाँ भी समायी हुई हैं। पूर्वजीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म, गहनता से सोचे गए विचार एवं प्रगाढ़ता से पोषित हुई भावनाएँ भी अपनी स्थिति के अनुरूप वर्तमान जीवन में सुखद या दुःखद स्थिति को जन्म देती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्...



Title

तुम दीपक से जलते जाओ



Title

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

Hey Guruwar Hey Jagjanani Maa | हे गुरुवर हे जग जननी माँ | Pragya Geet



Title

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 4 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 4 July 2019




👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 21)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
इसी दौर में उनके कुछ शुभ संस्कार जगे, कुछ पुण्य बीज अंकुरित हुए और उनकी मुलाकात एक महापुरुष से हुई। ये महापुरुष संन्यासी थे और नाम था स्वामी सोमदेव। इनकी साधना अलौकिक थी। इनका तप बल प्रबल था। वे पं. रामप्रसाद को देखते ही पहचान गए। उन्होंने अपने परिचित जनों से कहा कि यह किशोर एक विशिष्ट आत्मा है। इसका जन्म भारत माता की सेवा के लिए हुआ है। पर विडम्बना यह है कि इसके उच्चकोटि के संस्कार अभी जाग्रत् नहीं हुए। और किसी जन्म के बुरे संस्कारों की जागृति ने इसे भ्रमित कर रखा है। क्या होगा महाराज इसका? इन संन्यासी महात्मा के कुछ शिष्यों ने इनसे पूछा। वे महापुरुष पहले तो मुस्कराए फिर हंस पड़े और बोले- इस बालक की आध्यात्मिक चिकित्सा करनी पड़ेगी। और इसे मैं स्वयं सम्पन्न करूँगा। बस तुम लोग इसे मेरे समीप ले आओ।

ईश्वरीय प्रेरणा से यह सुयोग बना। पं. रामप्रसाद इन महान् योगी के सम्पर्क में आए। इस पवित्र संसर्ग में पं. रामप्रसाद का जीवन बदलता चला गया। वह यूं ही अचानक एवं अनायास नहीं हो गया। दरअसल उन महान् संन्यासी ने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रयोग करके इनके बुरे संस्कारों वाली परत हटानी शुरू की। एक तरह से वह अदृश्य ढंग से अपनी आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति का प्रयोग करते रहे। तो दूसरी ओर दृश्य रूप में उन्होंने रामप्रसाद को गायत्री महामंत्र का उपदेश दिया। उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ के लिए तैयार किया। दिन मास वर्ष के क्रम में युवक रामप्रसाद में नया निखार आया।

उनकी अन्तर्चेना में पवित्र संस्कार जाग्रत् होने लगे। पवित्र संस्कारों ने भावनाओं को पवित्र बनाया, तदानुरूप विचारों का ताना- बाना बुना गया। और एक नये व्यक्तित्व का उदय हुआ। एक भ्रमित- भटके हुए किशोर के अन्तराल में भारत माता के महान् सपूत पं. रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ। इस नव जन्म ने उनके जीवन में सर्वथा नए रंग भर दिए। यह सब चित्त के संस्कारों की आध्यात्मिक चिकित्सा के बलबूते सम्भव हुआ। जिसने पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों को जाग्रत् कर एक नया इतिहास रचा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (अन्तिम भाग)

संन्यास के आदर्श बहुत ऊँचे हैं। उन्हें निबाहना पूरा समय देने वाले शिथिल प्रकृति मनुष्यों के लिए सम्भव नहीं। इसके प्रतिबन्ध बड़े हैं। भिक्षाटन आज की स्थिति के उपयुक्त नहीं रहा। जिस-तिस का जैसा-तैसा अपमान अवज्ञा और उपेक्षा पूर्वक मिला कुधान्य किसी संन्यासी की बुद्धि को सतोगुणी एवं सन्तुलित नहीं रहने देता। ऐसी-ऐसी अनेक कठिनाइयों के कारण आज की परिस्थितियों में संन्यास से प्रति हम असहमति प्रकट करते रहें हैं और यही कहते रहें है कि परमार्थ प्रयोजन के लिए जीवन समर्पण करने वालों के लिए वानप्रस्थ ही उपयुक्त है। उसमें घर परिवार के साथ सम्बन्ध बनाये रहने की सुविधा है। साथ ही प्रतिबन्ध में उतने कड़े नहीं है। हरिजन शब्द की तरह आज संन्यास भी निठल्ले, अकर्मण्य लोगों का पर्यायवाची बन गया है। इसलिए भी हम वानप्रस्थ को ही इन दिनों साधु और ब्राह्मण का सम्मिश्रित स्वरूप मानते रहे हैं और उसी में उत्तरार्द्ध परम्परा के दोनों आश्रमों का समावेश करते रहे है। आज की स्थिति में युग-धर्म के अनुरूप यही हल सर्वोत्तम है।

अपनी योजना के अनुसार ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजनों को थोड़े-थोड़े समय के लिए वानप्रस्थ लेने का साहस करना चाहिए और नियत अवधि पूरी करके अपने घरों को लौट जाना चाहिए। जब-जब उन्हें अवकाश मिले, तब-तब ऐसे कदम बार-बार उठा सकते हैं। नियत समय पर नियत अवधि के लिए पहले से भी ऐसा व्रत ले लिया जाय तो उससे अपने ऊपर एक बन्धन, उत्तरदायित्व बँधता है। इस दृष्टि से वैसा साहस कर गुजरता वैसा ही है-जैसा कि परीक्षा का फार्म भर देने पर पढ़ने की गति एवं चेष्टा में गतिशीलता का आना। यह प्रक्रिया यदि उत्साह पूर्वक अपनाई जा सके तो साधु-संस्था के मरणासन्न होने के कारण विश्व-मानव के सिर पर विनाश की जो काली घटाएँ छा रही हैं, उन्हें सुविधा पूर्वक हटाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.24

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 30)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Take the venerated seat of the mother, who feeds the infant by the extract of her own blood; who suffers in cold but shields the child in her bosom. Like a learned teacher, distribute the wisdom acquired by you amongst the immature, ignorant and way lost people. The glorious path of reformation is not easy to follow. People may make you suffer, insult you, make fun of you. They may even regard you as a crackbrain, may oppose you and create hurdles in your work for no rhyme or reason. Be least apprehensive about such persons. Do not deviate from your path. The number of such habitual faultfinders is always insignificant. Against hundreds of appreciators of your good work, the number of denunciators will be very small. Their antagonism, too, will come to you as a token of Divine Grace. It would provide you opportunities for introspection and corrective action. This will charge you with higher potency energy for speedy progress.

You might have understood that significance of persons, events and objects, which come in our lives in this ever-changing materiel world, is momentary and illusory. Therefore material objects and relationships are not worthy of blind pursuit for their acquisition or attachment thereto. Such detached attitude would in no way discourage us in performance of our duties. On the contrary, only on being detached to the material world, we can pay attention to our progress without worry. It is a great misconception to regard this world as full of misery. World is full of things of beauty and joy. Had it not been so, the free, spotless, illumined blissful soul, which is spark of the Supreme, would not have chosen it as its abode.

Unhappiness is nothing but absence of happiness. Unhappiness means abandoning a highway and wandering waylost through the thicket of thorny bushes. As discussed earlier, mostly the unhappiness, antagonism, enmity, distress and conflict faced by us is illusory and people are not so wicked as we assume them to be. If we clean our minds of prejudices and throw away our coloured glasses, things will appear in their true colours.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 51

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 4 July 2019

■  लोगों की दृष्टि में स्वार्थ बुरा समझा जाता है, परन्तु स्वार्थ बुरा नहीं है। स्वार्थ का तात्पर्य है ‘अपना लाभ-अपना भला-अपना हित करना।’ दूसरे शब्दों में कहें तो यह हो सकता है कि ‘अपना हित करने की भावना से प्रेरित होकर किसी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करना।’ यदि हम शब्दकोष को उठाकर देखें तो हमें विदित होगा कि उसमें भी स्वार्थ अभिप्राय उपरोक्त ही बताया गया है। हम स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, हमारा जीवन सुख-शान्तिमय व्यतीत हो-ऐसा कौन नहीं चाहता? यह भावना हमारे भले की, हित की है और अपना भला या हित करना कोई पाप नहीं है, बल्कि यह कहा जाए कि ‘हमारा धर्म है’ तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इस बात का स्पष्टीकरण कर दिया है-’उद्धरेद त्मनात्मानं नात्मान मवसादयेत्।’ अर्थात् ‘मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार (भला) करे।’

◇ स्वार्थ का दुरुपयोग करने से अनेकों प्रकार के रोग मनुष्य को घेरे रहते हैं और मनुष्य जीवन भर बेचैनी का अनुभव करता हुआ दुर्गति को प्राप्त होता है। इतिहास के क्षेत्र में देखिए, सिकन्दर ने स्वार्थ का दुरुपयोग किया और छोटे-बड़े सभी राज्यों को पराजित कर सम्राट बन बैठा। इस स्वार्थ में सिकन्दर को क्या मिला? हत्या, शाप, परपीड़न और पाप! इसी पाप ने अन्त में सन्ताप का रूप धारण कर उसे दुर्गति के हवाले कर दिया और सिकन्दर के हाथ कुछ न आया। उसकी धन-दौलत माल-असबाब और उसकी सेना उसे निर्दयी काल के पंजे से न छुड़ा सकी। इसीलिए कहा है :-
“सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।”

★ यदि हम सचमुच अपना हित साधन करना चाहते हैं तो हमें अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करना होगा, निम्न-कोटि के स्वार्थ से ऊँचे उठकर उच्च कोटि का स्वार्थ अपनाना होगा। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य करते समय हमें यही ध्यान रखना होगा कि हमारा हित, हमारा भला, हमारा स्वार्थ, हमारा सुख, हमारी शान्ति कहाँ निहित है? हमें अपने भीतर से उत्तर-मिलेगा, अन्य का भला करने में! इसलिए हर कार्य हमें अपनी भलाई करने के लिये ही करना चाहिए और प्रत्येक में हमारे स्वार्थ की छाप लगा देना चाहिए। हम जिधर दृष्टि फेरें, बस हमें अपना स्वार्थ ही स्वार्थ नजर आए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Maya - know it to know It

To obtain sense pleasures we spend away our riches, because we value this experience of pleasure more than the possession of material wealth. We are so driven by these desires, running after these sense pleasures that we forget that there exists an entity even greater than our gross body. In reality Atman (soul) is even greater, more special than our body. When compared to the bliss we can experience in our soul all other sense pleasures appear inferior and trivial.

In our day-to-day life we follow the motto of - "give up as little as possible and get as much as possible", but when presented with the ultimate test, we abandon it. We are ready to give up our hard earned wealth when it is for the sake of sense pleasures, but we hesitate to give up our sense pleasures (which are little things) for the bliss of our soul (which is the greatest joy there is) - This is MAYA.

It is a well established fact that any one can obtain wealth, amass material possessions, give the senses some temporary satisfaction by indulging in tyranny, immorality, selfishness, oppression, adultery, theft, violence, deceit, arrogance, hypocrisy, lies, ego, etc. But one can never taste the bliss of self-satisfaction this way.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Dharma Tatwa ka Darshan aur Marm Vangmay 53 Page -3.14

👉 माया क्या है? Maya Kya Hai?

शरीर सुख के लिए अन्य मूल्यवान पदार्थों को खर्च कर देते हैं कारण यही है कि वे मूल्यवान पदार्थ शरीर सुख के मुकाबले में कमतर जँचते हैं। लोग शरीर सुख की आराधना में लगे हुए हैं परन्तु एक बात भूल जाते हैं कि शरीर से भी ऊँची कोई वस्तु है। वस्तुत: आत्मा शरीर से ऊँची है। आत्मा के आनन्द के लिए शरीर या उसे प्राप्त होने वाले सभी सुख तुच्छ हैं। अपने दैनिक जीवन में पग- पग पर मनुष्य 'बहुत के लिये थोड़े का त्याग' की नीति को अपनाता है, परन्तु अन्तिम स्थान पर आकर यह सारी चौकड़ी भूल जाता है। जैसे शरीर सुख के लिए पैसे का त्याग किया जाता है वैसे ही आत्म - सुख के लिए शरीर सुख का त्याग करने में लोग हिचकिचाते हैं, यही माया है।

पाठक इस बात को भली भाँति जानते हैं कि अन्याय, अनीति, स्वार्थ, अत्याचार, व्यभिचार, चोरी, हिंसा, छल, दम्भ, पाखण्ड, असत्य, अहंकार, आदि से कोई व्यक्ति धन इकट्ठा कर सकता है, भोग पदार्थों का संचय कर सकता है, इन्द्रियों को कुछ क्षणों तक गुदगुदा सकता है, परन्तु आत्म-सन्तोष प्राप्त नहीं कर सकता।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ- 3.14

बुधवार, 3 जुलाई 2019

Speak Less, Do More | बोलिए कम, करिए अधिक | Hariye Na Himmat Day 17



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Hame Bhakti Do Maa, | हमें भक्ति दो माँ | Pragya Geet



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👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 4)

पुरे समय के लिए तत्काल भावनात्मक नव−निर्माण को ब्राह्मणोचित परम्परा का निर्वाह करने के लिए हर किसी को नहीं कहा जा सकता। जिनने पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे कर लिये हैं, उन्हें वानप्रस्थ में प्रवेश करने के लिए बहुत दिनों से कहा जा रहा है। जुलाई 73 की अखण्ड−ज्योति में इस संदर्भ में अधिक जोर दिया गया है और जो घर की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके उन्हें परमार्थिक−जीवन में प्रवेश करने के लिए वानप्रस्थ में प्रवेश करने का अनुरोध किया गया है। दूसरे स्तर के क्लिष्ट वानप्रस्थ वे होंगे —जो अभी शेष जीवन पुरी तरह इस महान लक्ष्य के लिए समर्पित करने की स्थिति में तो नहीं है, पर अधिकाधिक साहस इसके लिए जुटाते रहेंगे।

अब इस श्रृंखला में एक नई कड़ी और जोड़ी जा रही है कि जिन्हें जब जितना अवकाश हुआ करे, तब वे उतने समय के लिए परमार्थ प्रयोजनों के लिए अपना समय लगाने का निश्चय करें और उन्हें कहाँ क्या करना है—इसका निर्देश ‘युग−निर्माण योजना’ मथुरा एवं शान्तिकुंज से प्राप्त कर लिया करे। इस प्रकार थोड़ा−थोड़ा समय भी अनेक व्यक्ति देने लगेंगे तो उस सबका सम्मिलित परिणाम बहुत बड़ा हो जायगा। एक लाख व्यक्ति ऐसे थोड़ा−थोड़ा समय देने वाले हों तो उन सबका मिला हुआ कार्य हजारों नियमित एक पूरे जीवन के लिए साधु−संस्था में प्रवेश करने वालों जितना ही हो जायगा। यह प्रक्रिया सरल बैठेगी। इस योजना के अंतर्गत व्यस्त और पारिवारिक बोझ से लदे हुए व्यक्ति भी थोड़ा-बहुत समय देते रहेंगे तो उन्हें यह पश्चाताप न रहेगा कि हम घरेलू झंझटों में उलझे रहने रहने के कारण युग की पुकार को पूरा करने के लिए कुछ भी न कर सके। ऐसे व्यक्ति पूरा न सही—अधूरा सही का थोड़ा-बहुत अवसर पाकर भी आत्म-सन्तोष की एक साँस ले सकते हैं और कह सकते हैं कि मानवता पर छाई हुई विषम-वेला में हम मूक-दर्शक बने रहने वाले अभागों में से नहीं है। जितना कुछ संभव था, उतना तो किया ही।

बँधा रुपया न मिले। एक-एक पैसे वाले सौ सिक्के मिल जायँ तो गिनने, धरने, उठाने का झंझट तो जरूर रहेगा, पर प्रयोजन वही पूरा हो जायगा—जो एक रुपये से सम्भव होता है। पूरे समय के लिए वानप्रस्थ न मिले तो थोड़ा-थोड़ा समय देने वाले अनेकों का सहयोग लेकर भी सामयिक संकट से जूझने का सुयोग बन सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.24

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 20)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
अब यदि क्रमिक रूप में ५- ५ या १०- १० वर्षों के अन्तराल का लेखा- जोखा करें तो हमें विस्मयजनक एवं आश्चर्यचकित करने वाले नए- नए मोड़ अपने जीवन में देखने को मिलेंगे। यह अचरज हमें कितना ही क्यों न चौंकाए, पर यह हमारे जीवन की अनुभूत सच्चाई है। थोड़ा बारीकी से देखें तो इन पंक्तियों के पाठक अनुभव करेंगे कि उनके जीवन में पाँच या दस सालों के अन्तराल में कुछ ऐसा होता गया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। मन की कल्पनाएँ बदली, अरमान, आकांक्षाएँ बदली, चाहत एवं वृत्तियों में परिवर्तन हुए, साथ ही परिस्थितियों में नए- नए घटनाक्रमों का उदय हुआ। कई पराए अपने हुए और कई अपने परायापन जताकर विरोधी हो गए। आॢथक -- सामाजिक पहलुओं में भी नए रंग उभरे।

यह सब संयोग की वजह से नहीं, संस्कारों की वजह से हुआ। नए संस्कारों के जागरण एवं नए कर्म बीजों के अंकुरण के कारण हमारे जीवन के नए- नए शृंगार होते गए। यह अलग बात है कि इन परिवर्तनों में कई परिवर्तन हमारे लिए दुखद साबित हुए तो कई ने हमें सुखद अनुभूतियाँ दी। भरोसा करें, यहाँ जो कहा जा रहा है वह आध्यात्मिक ज्ञान का सच है। कोई भी सुपात्र सत्पात्र इसे अनुभव कर सकता है। यदि आपको इस पर भरोसा हो रहा है तो इस सच्चाई पर भी यकीन करें कि संस्कारों की तह तक पहुँच कर, इनका उत्खनन करके दुःखद संस्कारों से छुटकारा पाया जा सकता है। और सुखद संस्कारों को प्रबल बनाया जा सकता है। यानि कि आध्यात्मिक प्रयोगों की सहायता से बुरी मनःस्थिति एवं परिस्थिति से छुटकारा पाया जा सकता है।

विश्वास करें यह एक प्रायोगिक सच है। अनेकों ने अनेक तरह से इसे अपने जीवन में खरा पाया है। बस इसके लिए आपको किसी आध्यात्मिक चिकित्सक का संग- साथ चाहिए। उसकी सहायता से जीवन में नए रंग भरे जा सकते हैं। ऐसा होने की अनुभूति तो अनेकों की है, पर हम यहाँ केवल एक का उल्लेख करना चाहेंगे। जिसकी वजह से एक भटकता हुआ आवारा किशोर महान् क्रान्तिकारी इतिहास पुरुष बन गया। हाँ यह सच्चाई पं. रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन की है। ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’- का प्रेरक स्वर देने वाले बिस्मिल किशोर वय में कुसंग एवं कुटेव के कुचक्र में फंस गए थे। गलत लोगों के गलत साथ ने उनमें अनेकों गलत आदतें डाल दी। स्थिति कुछ ऐसी बिगड़ी कि जैसा उनका व्यक्तित्व ही मुरझा गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 29)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

What should be our course of action in this world to eliminate evil? The Sun sets an example worth emulating. Its light dispels the darkness. Its heat forms the clouds; clouds bring down rain and cool the heat. When we take food, hunger goes by itself and when we follow laws of health, weakness is removed without much effort. In order to remove ignorance, try to acquire knowledge. For making the world free of evil, we should work for proliferation of virtues. The proper way for eradication of disease is to educate the masses about the significance of laws of hygiene and health. The sick do need the medicines, but hospitals cannot cure the entire society. Law enforcement machinery works like a hospital for the wicked- the morally sick. It takes care of only contingencies. Law cannot remove the root causes of societal ills.

It is not possible to eradicate evil by violence. Violent opposition would only incite a stronger counter reaction. A surgeon does not act like a butcher. He makes a precise incision. Instead of direct confrontation, blabbing, showing resentment, expressing helplessness, follow the positive path of forgiveness, reformation and love. According to a philosopher, “A word of love creates much greater impact than a blow on the head”. Everyone has more or less goodness in him. Make an effort to identify your own virtues and make them more effective in life. Also find out the virtues in the other person and try to encourage him to more and more cultivate these virtues. Do not fight your battle in the darkness of ignorance. Make your battlefield illuminated. Do not be disheartened by the spread of immorality. Counter it by promoting morality.

The only way to remove evil from this world is to encourage goodness. Remove the air from the bottle by filling it with water. Do not associate with evil. Why should you like to collect the garbage (evil)? Let others do this dirty job. Your work is to disinfect the rot. Why should you do skinning of dead animals (finding faults of the evildoers)? Assume the more dignified role of a teacher. Remember! In this world quite a few persons have a faultfinding attitude. Perhaps there are more persons inclined to punish the guilty than are necessary. When a child teases another one, quite a few of his companions slap him on the cheek. But how many in this world are prepared to give free food and clothes to a needy child? Let the evildoers suffer the consequences of their misdeeds.
face of all provocations.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 50

👉 साधुओं का कर्तव्य Sadhuon Ka Kartvya


अपनी क्षुधा निवारण करने के उपरान्त बची हुई रसोई दूसरों को बाँट देनी चाहिये। इस प्रकार पहले अपने को ज्ञानवान बनाकर तब उस ज्ञान का वितरण दूसरे लोगों में करना चाहिए। तैरने वालों को चाहिए कि यदि कोई पानी में डूब रहा हो तो उसे डूबने न दें। उत्तम गुणों को अपने अन्दर धारण करने के उपरान्त उन्हें दूसरे लोगों में फैलाना कर्तव्य है। शरीर का सर्वश्रेष्ठ उपयोग परोपकार है वह देह धन्य है जो पराये काम आती है और जिससे किसी का अनिष्ट नहीं होता।

दूसरों के दुख में दुखी होना, दूसरों के सुख में प्रसन्न होना पराये को अपना लेना, मधुर वचन बोलना, दुखी जनों को ढूँढ़ ढूँढ़ कर उनकी सेवा सहायता के लिये प्रस्तुत रहना यह साधुजनों का काम है। आलस्य को त्यागकर कर्तव्य परायण होना, थोड़ा और विवेकयुक्त बोलना क्रोध और मन्सर को त्यागकर विनति भाव से रहना यह सत्पुरुषों का स्वभाव है। वे साधु धन्य हैं जो अपने सद्व्यवहार से दुर्जनों को सुपथ पर आरुढ़ करते हैं स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का उपकार करते हैं आपत्ति काल में धैर्य धारण करते हैं और आलोचकों को देखकर विचलित नहीं होते। उन्हीं का भजन सच्चा है और परमात्मा को तृप्त करने वाला है।

जो बोया जाता है वही उगता है इसलिए कर्कश वचन और कठोर व्यवहार के विष बीजों को नहीं बोना चाहिए। इस दुनिया में उत्तम गुण वाले सज्जनों की बड़ी आवश्यकता है ऐसे पुरुषों को मनुष्य जाति सदैव खोजती रहती है। श्रेष्ठ जनों को समूह बनाना चाहिये, संगठन करना चाहिए। अकेला आदमी क्या कर सकता है। इसलिए विवेकवान धर्मप्रचारक को चाहिये कि शिक्षित साथियों की सहायता से कल्याण के कार्य को बढ़ावे।

अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 8

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/April/v1.8

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...