बुधवार, 10 जुलाई 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 33)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS

Sometimes, the virtuous samskars accumulated on account of our past karmas also produce unhappy events. Virtuous karmas also act as shields to ward off sinful temptations. The former do not permit the sinful tendencies to dominate and offer stiff resistance. Many a times commitment of sin is foiled by some unforeseen obstacle. If a thief breaks his leg while goings for theft, it should be
taken as a consequence of his past virtuous karmas.

Those who work hard for moral or social upliftment of the society and meticulously follow their course of duty, face stupendous problems, hardships and lack of resources. They also have to face antagonism of people who find such activities detrimental to their vested interests. Besides, they are tormented by unscrupulous in many ways. Persons treading the royal highway of righteousness
have to face hardships at each step. Misfortunes are like goldsmith’s furnace, in which the validity of past virtues and tolerance to hardships undertaken for virtuous deeds are tempered. After going through misfortunes, the character and personality of an upright person becomes all the more lustrous.

Hence while going through misfortunes, do not be under the impression that you are a sinner and a wretched person deserving Divine Wrath. It could be that the distress is a blessing in disguise, with hidden boons, which you are unable to foresee at the moment because of lack of clear vision.

Innocent persons may be found suffering because of unfair ideologies or oppression by others. Any one may become a victim of exploitation, suppression and injustice. The exploiter has to face the consequences of his karmas in due course of time, but the sufferer should not take such trials as outcome of his prarabdha.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 54

👉 Moments of self-expression 10 July 2019

■  दुष्कर्म करना हो तो उसे करते हुए कितनी बार विचारों और उसे आज की अपेक्षा कल-परसों पर छोड़ों, किन्तु यदि कुछ शुभ करना हो तो पहले ही भावना तरंग को कार्यान्वित होने दो। कल वाले काम को आज ही निपटाने का प्रयत्न करो। पाप तो रोज ही अपना जाल लेकर हमारी घात में फिरता रहता है, पर पुण्य का तो कभी-कभी उदय होता है, उसे निराश लौटा दिया तो न जाने फिर कब आवे।

◇ दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं-अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा डाले? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो आत्म-सुधार के लिए, आत्म-निर्माण के लिए और आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

★ पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान् वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ साँप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्ज्वल जीवन का नाश कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

👉 कहाँ छुपी हैं शक्तियां!

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा, न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें। चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर -उधर दौड़ता रहता है, मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं। और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। और ऐसा ही किया गया, मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया, इसलिए कहा जाता है मानव मवन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

दोस्तों इस कहानी का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियां विद्यमान हैं। अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए। हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये। आँखें खोलिए, अपने भीतर झांकिए और अपनी अपार शक्तियों का प्रयोग कर अपना हर एक सपना पूरा कर डालिये।

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 25)

👉 प्रारब्ध का स्वरूप एवं चिकित्सा में स्थान

प्रारब्ध के सुयोग- दुर्योग जीवन में सुखद- दुःखद परिस्थितियों की सृष्टि करते हैं। प्रारब्ध का सुयोग उदय होने से अनायास ही सुख- सौभाग्य एवं स्वास्थ्य की घटाएँ छा जाती है। जबकि कहीं यदि प्रारब्ध का दुर्योग उदय हुआ तो जीवन में दुःख- दुर्भाग्य एवं रोग- शोक की घटाएँ घिरने लगती हैं। मानव जीवन में प्रारब्ध का यह सिद्धान्त भाग्यवादी कायरता नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि की सूक्ष्मता व पारदर्शिता है। यह ऐसा सच है जिसे हर पल- हर क्षण सभी अनुभव करते हैं। सुख- दुःख के हिंडोले में झूलते हुए इनमें से कुछ इस सच्चाई को पारम्परिक रूप से स्वीकारते हैं। जबकि कई अपनी बुद्धिवादी अहमन्यता के कारण इसे सिरे से नकार देते हैं। थोड़े से तपस्वी एवं विवेकी लोगों को आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त होती है, वे इस सूक्ष्म सत्य को साफ- साफ देख पाते हैं। इसे पूरी पारदर्शिता के साथ अनुभव करते हैं।

जिन्हें यह अनुभूति होती है और हो रही है वे इस सम्बन्ध में सभी के सभी तरह के सवालों का जवाब देने में सक्षम हैं। ज्यादातर जनों की जिज्ञासा होती है- प्रारब्ध है क्या? तो इसका सरल समाधान है- प्रारब्ध का अर्थ है- परिपक्व कर्म। हमारे पूर्वकृत कर्मों में जो जब जिस समय परिपक्व हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्ध की संज्ञा मिल जाती है। यह सिलसिला कालक्रम के अनुरूप चलता रहता है। इसमें वर्ष भी लगते हैं और जन्म भी। कई बार क्रिया भाव में और विचारों का इतना तीव्रतम संयोग होता है कि वे तुरन्त, प्रारब्ध कर्म का रूप ले लेते हैं। और अपना फल प्रकट करने में सक्षम सिद्ध होते हैं। ये पंक्तियाँ अपने पाठकों को थोड़ा अचरज में डाल सकती है। किन्तु यह सभी तर्कों से परे अनुभूत सत्य है। आध्यात्मिक चिकित्सा में प्रारब्ध के स्वरूप एवं सिद्धान्त को समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

इस क्रम में सबसे प्रथम बिन्दु यह है कि हमारे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म अविनाशी है। यह अच्छा हो या बुरा समयानुसार परिपक्व होकर प्रारब्ध में बदले बिना नहीं रहेगा। और प्रारब्ध का अर्थ ही है वह कर्म जिसका फल भोगने से हम बच नहीं सकते। इसे सामान्य जीवन क्रम के बैंक और उसके फिक्स डिपॉजिट के उदाहरण से समझा जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि बैंक में अपने धन को निश्चित समय अवधि में जमा करने की प्रथा है। इस प्रक्रिया में अलग- अलग जमा पूंजी एक निश्चित अवधि में डेढ़ गुनी- दो गुनी हो जाती है। इस प्रकार बैंक में हम अपने ढाई हजार रुपये जमा करके पांच साल में पांच हजार पाने के हकदार हो जाते हैं।

बस यही प्रक्रिया कर्मबीजों की है- जो जीवन चेतना की धरती पर अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होकर अपना फल प्रकट करने की स्थिति में आते रहते हैं। कौन कर्म किस समय फल बनकर सामने आएगा? इसमें कई कारक क्रियाशील होते हैं। उदाहरण के लिए सबसे पहले कर्म की तीव्रता क्या है? कितनी है? ध्यान देने की बात यह है कि प्रत्येक क्रिया कर्म नहीं होती। जो हम अनजाने में करते हैं, जिसमें हमारी इच्छा या संकल्प का योग नहीं होता, उसे कर्म नहीं कहा जा सकता। इसका कोई सुफल या कुफल भी नहीं होगा। इसके विपरीत जिस क्रिया में हमारी इच्छा एवं संकल्प का सुयोग जुड़ता है, वह कर्म का रूप धारण करती है। और इसका कोई न कोई फल अवश्य होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 38

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 32)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS

For most of us misfortunes are unwelcome. These are popularly believed to be the result of past sins and displeasure of God. However, this view is only partially correct. It is true that one of the reasons for unhappiness is past sins, but all unhappy events do not necessarily have their roots in past misdeeds. It may appear paradoxical, that at times misfortunes also befall us because of the grace of God and accumulation of past virtues. Unhappiness may also be felt while undergoing hardships in course of virtuous activities. When God shows His condescension towards a highly evolved soul and wills to release that soul from the bondage of sins of materialism, He creates distressful situations in life. Such unhappy events jolt the individual out of his slumber and to realize the futility of attachment to worldly things. The shock of unhappiness in such cases serves as a Divine Wake-Up-Call.

Our addiction to worldly attachments, infatuations and passions is so strong and alluring that we cannot be easily de-addicted by a casual approach. There are fleeting moments of wisdom in life when man thinks that life is extremely valuable and must be used for achieving some lofty objective, but soon thereafter attractions of the world drag him back to the erstwhile lowly routine of animal-like existence. Through misfortunes, God exerts a strong pull to extricate the devotee from the self-created quagmire of ignorance. Mishaps wake us up from our slumber in ignorance and darkness.

Unpleasant, heartbreaking happenings, such as a near fatal accident or disease, death of an intimate friend or relative, sudden financial loss, humiliation, or treachery by a trusted friend, may occur to give a strong shock treatment so that one may correct the course of his life.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 53

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 9 July 2019

■ संसार की सेवा का एक रूप अपनी सेवा भी माना गया है। अपनी सेवा से तात्पर्य अपने शरीर मात्र की सेवा से नहीं है, न भोग-विलास और सुख-साधनों में लगा रहना ही सेवा है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है। अपने सुधार द्वारा हम जितना-जितना अपने को सुधारते चलेंगे, उतनी-उतनी ही समस्त संसार की सेवा होती चलेगी। हम javascript:openFiles()सब इस विराट् विश्व की एक इकाई हैं। इसलिए अपनी सेवा भी संसार की सेवा ही कही जाएगी।

◇ पक्षपात की मात्रा जितनी बढ़ेगी, उतनी ही विग्रह की संभावना बढ़ेगी। उचित-अनुचित का भेद कर सकना, तथ्य को ढूँढना और न्याय की माँग को सुन सकना पक्षपात के आवेश में संभव ही नहीं हो पाता। अपने पक्ष की अच्छाइयाँ ही दीखती हैं और प्रतिपक्षी की बुराइयाँ ही सामने रहती हैं। अपनों की भूलें और विरानों के न्याय-तथ्य भी समझ में नहीं आते। तब एक पक्षीय चिंतन उद्धत बन जाता है। ऐसी दशा में आक्रमण-प्रत्याक्रमण का क्रम चल पड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। यदि तथ्यों को खोज निकालने की दूरदर्शिता अपनाये रहा जाय, कारणभूत तथ्यों को ढूँढ़ निकाला जाय और न्यायोचित समाधान के लिए प्रयास किया जाय, तो तीन-चौथाई लड़ाइयाँ सहज ही निरस्त हो सकती हैं।

★ संसार में कोई व्यक्ति बुरा नहीं है। सबमें श्रेष्ठताएँ भरी हुर्ह हैं। आवश्यकता एक ऐसे व्यक्ति  की है, जो अच्छाई को लगातार प्रोत्साहन देकर बढ़ाता रहे। कैसे दुःख की बात है कि हम मनुष्य को उसकी त्रुटियों के लिए तो सजा देते हैं, पर उसकी अच्छाई के लिए प्रशंसा में कंजूसी करते हैं। आप विश्वास के साथ दूसरों को अच्छा कहें तो निश्चय ही वह श्रेष्ठ बनेगा। मन को अच्छाई पर जमाइए, सर्वत्र अच्छाई ही बढ़ेगी। आपके तथा दूसरे के मन में बैठे हुए देव जाग्रत् और चैतन्य होंगे तो उनसे देवत्व बढ़ेगा।

■ पुस्तकालय सच्चे देव मंदिर हैं। उनमें महापुरुषों की आत्माएँ पुस्तकों के रूप में प्रतिष्ठित रहती हैं। सत्संग के लिए पुस्तकालयों से बढ़कर विद्वान् और निर्मल चरित्र व्यक्ति दूसरा नहीं मिल सकता। अपने वंशजों के लिए एक उत्कृष्ट पुस्तकालय से मूल्यवान् वस्तु और कुछ हो ही नहीं सकती। उत्तराधिकार में और कुछ छोड़ें अथवा नहीं, पर एक अच्छे प्रेरणाप्रद पुस्तकालय की घर में स्थापना करके उस धरोहर को बच्चों, वंशजों के लिए छोड़ ही जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 8 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 24)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

इस युग के महानतम् आध्यात्मिक चिकित्सक ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव इस प्रक्रिया में सिद्धहस्त थे। उन्होंने असंख्य जनों के पूर्वजन्म को जानकर उनके जीवन को पीड़ा, परेशानी से मुक्त किया। ऐसी ही एक घटना- शिव नारायण कुलकर्णी के जीवन की है। उन दिनों श्री कुलकर्णी की युवावस्था थी। और अभी हाल में ही उन्होंने एम.एस- सी. (भौतिक विज्ञान) में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था। उनके स्वजन उन्हें शोध अध्ययन के लिए अमेरिका भेजना चाहते थे। पासपोर्ट, वीज़ा आदि की सारी तैयारियाँ हो चुकी थी। खर्च का भी इन्तजाम हो गया था। लेकिन तभी उन्हें पागलपन का दौरा पड़ा। स्वजनों ने मेडिकल कॉलेज के साइकिएट्री विभाग में उनका इलाज कराया। पर स्थिति सुधरी नहीं। चिकित्सक एवं चिकित्सालय बदलते गए और स्थिति बिगड़ती गयी।

हारे को हरिनाम, मुसीबत पड़े तो श्रीराम। कहीं से ढूँढ खोजकर वे गुरुदेव के पास आ गए। गुरुदेव ने उनको बड़े ध्यान से देखा और उनकी आँखें छलक आयी। युवक श्री शिवनारायण कुलकर्णी के माता- पिता ने जानना चाहा, कि उनके इस लड़के का क्या होगा। घर- परिवार में सबसे होनहार बालक इतने बुरे पागलपन के चपेट में आ गया है। उन चिन्तित माता- पिता की ओर देखते हुए गुरुदेव बोले- बेटा तुम्हारे पुत्र की समस्या गम्भीर है और इसका ठीक होना लगभग असम्भव है। ऐसा करो कि तुम लोग अभी शान्तिकुञ्ज में ठहरो। और मेरे पास कल आना। तब कुछ समाधान सोचेंगे।

बड़ी से बड़ी आपदाओं को चुटकियों में हलकर देने वाले गुरुदेव ऐसा क्यों कह रहे हैं? यह राज पास बैठे हुए कार्यकर्त्ता को समझ में न आया। उसने जिज्ञासावश पूछा, गुरुदेव इस युवक के जीवन में कोई गम्भीर बात है क्या? इस प्रश्र पर पहले तो गुरुदेव मौन रहे फिर बोले- बेटा! इसने पूर्वजन्म में बहुत ही बड़ा अपराध किया है, उसी का फल इस रूप में प्रकट हो रहा है। इसे कोई भी ठीक नहीं कर सकता। तब क्या होगा? देखेंगे, कहकर वह मौन साध गए।

दूसरे दिन दोपहर में वह युवक और उसके माता- पिता फिर से आए। यह कार्यकर्त्ता भी काम से पूज्यवर के पास पहुँचा था। गुरुदेव ने उसके माता- पिता को सम्बोधित करते हुए कहा, हम तुम्हें निराश नहीं करना चाहते। इस लड़के की आयु भी अभी कम है। हम इसे ठीक तो कर देंगे, पर इसमें समय लगेगा। स्थिति कठिन तो जरूर है, पर हम स्वयं इसके द्वारा पूर्वजन्म के किए गए महापाप का प्रायश्चित्त करेंगे। साथ ही अपनी आध्यात्मिक शक्ति से इसके मन- मस्तिष्क की शल्यचिकित्सा करेंगे। यह प्रक्रिया कई चरणों में चलेगी। और इसमें लगभग दो- ढाई साल लगेंगे।

गुरुदेव की इन बातों ने युवक के माता- पिता को आश्वस्त कर दिया। बीच- बीच में वे गुरुदेव से मिलने शान्तिकुञ्ज आते रहे। उस युवक में समय के साथ परिवर्तन प्रारम्भ हो गए। और समय के साथ वह ठीक भी हो गया। पूज्यवर की आध्यात्मिक चिकित्सा के विज्ञान को उस युवक के साथ उसके माता- पिता ने भी अनुभव किया। साथ ही यह भी जान सके कि पूर्वजन्म में हुए दुष्कर्म और उससे उपजे रोग- शोक का परिमार्जन आध्यात्मिक ढंग से ही सम्भव है। इसी विधि से प्रारब्ध के सुयोग- दुर्योग बदले जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

रविवार, 7 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 23)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

आध्यात्मिक चिकित्सा के इस सिद्धान्त को कई आधुनिक मनोचिकित्सकों ने स्वीकारा है। इन्हीं में से एक डॉ. ब्रायन वीज़ हैं। जो अमेरिका में फ्लोरिडा क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले मियामी शहर में मनोचिकित्सा कर रहे हैं। डॉ. वीज़ ने अपने चिकित्सा कार्य में कई बार पाया कि रोगी के दुःख द्वन्द्व के कारण उसके व्यक्तित्व की अतल गहराइयों में है। पहले तो उन्होंने प्रचलित विधियों का प्रयोग करके तह तक जाने की कोशिश की। पर उन्हें कोई खास सफलता न लगी। हां उन्हें इतना जरूर अहसास हुआ कि अभी ज्यादा गहरे उत्खनन की जरूरत है। और उन्होंने नयी विधियों की खोज करके अपने रोगी के पिछले जीवन में झांकने की कोशिश की। इस कोशिश ने उन्हें न केवल सफल बनाया, बल्कि इस तरह वे पूर्वजन्म की वैज्ञानिकता को जानने में सफल रहे।

डॉ. वीज़ ने अपने इन प्रायोगिक निष्कर्षों को अलग- अलग ढंग से पुस्तकों में प्रकाशित किया। इन पुस्तकों में ‘मैसेजेस फ्राम दि मास्टर्स, मैनी लाइव्स, मैनी मास्टर्स, ओनली लव इज़ रियल एवं थ्रू टाइम इन्टू हीङ्क्षलग’ मुख्य है। उनके इस वैज्ञानिक रचना से संसार में आध्यात्मिक चिकित्सा की हकीकत जानी- समझी एवं पढ़ी जा सकती है। साथ ही यह भी अनुभव किया जा सकता है कि किसी भी रोगी की सफल आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए उसके पूर्वजन्म के ज्ञान का क्या महत्त्व है। डॉ. वीज़ के ये प्रायोगिक निष्कर्ष न केवल सामान्य पाठक को अभिभूत करते हैं, बल्कि इन सत्यों की जानकारी ने उन्हें स्वयं को अभिभूत कर दिया है। इसी का सुखद परिणाम है कि मनोचिकित्सक के रूप में अपने व्यवसाय का प्रारम्भ करने वाले डॉ. ब्रायन वीज़ आज स्वयं को आध्यात्मिक चिकित्सक कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।

डॉ. वीज़ के इस सच को भगवद्भूमि भारत ने युग- युगान्तर से अनुभव किया है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इस सत्य को बताते हुए कहा है-
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वैत्थ परंतप॥

हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।
यह जानना किसी आध्यात्मिक चिकित्सक की योग्यता को प्रामाणित करता है। यदि किसी में यह योग्यता नहीं है तो उसकी आध्यात्मिक चिकित्सा भी उसी की तरह अधूरी एवं अप्रामाणिक रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

Hosh Me Aana, Meditation होश में आना, ध्यान । Shraddhey Dr. Pranav Pandya



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शनिवार, 6 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 22)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

पूर्वजन्म में वर्तमान जीवन के रहस्यों की जड़ें हैं। इन्हें खोदे बिना, इन्हें समझे बिना जिन्दगी की सूक्ष्मताओं का भेद नहीं पाया जा सकता। अचेतन के अविष्कार को आधुनिक मनोविज्ञान अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है। मनोवैज्ञानिक अनुसन्धानों के सारे दरो- दीवार इसी नींव पर टिके हैं। किसी भी पीड़ा- परेशानी का कारण मनोचिकित्सक अचेतन में ढूँढने की कोशिश करते हैं। आज के वैज्ञानिक समुदाय में इस सच को स्वीकारा जाता है कि जिन्दगी की समस्याओं की जड़ें इन्सान के मन में है। अनगिनत शोध प्रयासों ने इस तथ्य को प्रामाणिकता दी है कि रोग शारीरिक हों या मानसिक, इनके बीज इन्सान के अचेतन मन की परतों में छुपे होते हैं। इस सर्वमान्य स्वीकारोक्ति को विशेषज्ञों ने कई तरह से जाँच- परखकर सही पाया है। इसमें न कोई मतभेद है और न मनभेद।

हां, सवाल इसका जरूर है कि अचेतन मन क्या है? तो मनोवैज्ञानिक इसके उत्तर में कहते हैं कि यह और कुछ नहीं बस हमारा बीता हुआ कल है। बीते हुए कल में हमने जो कुछ किया, सोचा अथवा जो भावानुभूतियाँ पायी उसकी गहरी लकीरें हमारे अचेतन मन में अभी भी बनी हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि हमारे बीते हुए कल की अनुभूतियाँ ही अचेतन का निर्माण करती हैं। यदि इन अनुभूतियों में कटुता, तिक्तता या कसक बाकी रही है, तो वह रोग- शोक के रूप में प्रकट होती है। इसी से अनेकों दुःखद घटनाक्रम जन्म लेते हैं। यदि अचेतन की स्थिति सुधरी- संवरी है, तो जीवन के सुखमय होने के आसार भी बनते हैं।

प्रायः सभी मनोचिकित्सक अचेतन की इस परिभाषा एवं प्रभाव से सहमत हैं। किन्तु आध्यात्मिक चिकित्सक इस सत्य को अपेक्षाकृत व्यापक परिदृश्य में देखते हैं। इनका कहना है कि बीते हुए कल की सीमाएँ केवल वर्तमान के क्षण से लेकर बचपन तक सिमटी नहीं हैं। इसके दायरे काफी बड़े हैं। ये इतने ज्यादा व्यापक हैं कि इसमें हमारे पूर्वजन्म की अनुभूतियाँ भी समायी हुई हैं। पूर्वजीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म, गहनता से सोचे गए विचार एवं प्रगाढ़ता से पोषित हुई भावनाएँ भी अपनी स्थिति के अनुरूप वर्तमान जीवन में सुखद या दुःखद स्थिति को जन्म देती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्...



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तुम दीपक से जलते जाओ



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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

Hey Guruwar Hey Jagjanani Maa | हे गुरुवर हे जग जननी माँ | Pragya Geet



Title

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 4 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 4 July 2019




👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 21)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
इसी दौर में उनके कुछ शुभ संस्कार जगे, कुछ पुण्य बीज अंकुरित हुए और उनकी मुलाकात एक महापुरुष से हुई। ये महापुरुष संन्यासी थे और नाम था स्वामी सोमदेव। इनकी साधना अलौकिक थी। इनका तप बल प्रबल था। वे पं. रामप्रसाद को देखते ही पहचान गए। उन्होंने अपने परिचित जनों से कहा कि यह किशोर एक विशिष्ट आत्मा है। इसका जन्म भारत माता की सेवा के लिए हुआ है। पर विडम्बना यह है कि इसके उच्चकोटि के संस्कार अभी जाग्रत् नहीं हुए। और किसी जन्म के बुरे संस्कारों की जागृति ने इसे भ्रमित कर रखा है। क्या होगा महाराज इसका? इन संन्यासी महात्मा के कुछ शिष्यों ने इनसे पूछा। वे महापुरुष पहले तो मुस्कराए फिर हंस पड़े और बोले- इस बालक की आध्यात्मिक चिकित्सा करनी पड़ेगी। और इसे मैं स्वयं सम्पन्न करूँगा। बस तुम लोग इसे मेरे समीप ले आओ।

ईश्वरीय प्रेरणा से यह सुयोग बना। पं. रामप्रसाद इन महान् योगी के सम्पर्क में आए। इस पवित्र संसर्ग में पं. रामप्रसाद का जीवन बदलता चला गया। वह यूं ही अचानक एवं अनायास नहीं हो गया। दरअसल उन महान् संन्यासी ने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रयोग करके इनके बुरे संस्कारों वाली परत हटानी शुरू की। एक तरह से वह अदृश्य ढंग से अपनी आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति का प्रयोग करते रहे। तो दूसरी ओर दृश्य रूप में उन्होंने रामप्रसाद को गायत्री महामंत्र का उपदेश दिया। उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ के लिए तैयार किया। दिन मास वर्ष के क्रम में युवक रामप्रसाद में नया निखार आया।

उनकी अन्तर्चेना में पवित्र संस्कार जाग्रत् होने लगे। पवित्र संस्कारों ने भावनाओं को पवित्र बनाया, तदानुरूप विचारों का ताना- बाना बुना गया। और एक नये व्यक्तित्व का उदय हुआ। एक भ्रमित- भटके हुए किशोर के अन्तराल में भारत माता के महान् सपूत पं. रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ। इस नव जन्म ने उनके जीवन में सर्वथा नए रंग भर दिए। यह सब चित्त के संस्कारों की आध्यात्मिक चिकित्सा के बलबूते सम्भव हुआ। जिसने पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों को जाग्रत् कर एक नया इतिहास रचा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (अन्तिम भाग)

संन्यास के आदर्श बहुत ऊँचे हैं। उन्हें निबाहना पूरा समय देने वाले शिथिल प्रकृति मनुष्यों के लिए सम्भव नहीं। इसके प्रतिबन्ध बड़े हैं। भिक्षाटन आज की स्थिति के उपयुक्त नहीं रहा। जिस-तिस का जैसा-तैसा अपमान अवज्ञा और उपेक्षा पूर्वक मिला कुधान्य किसी संन्यासी की बुद्धि को सतोगुणी एवं सन्तुलित नहीं रहने देता। ऐसी-ऐसी अनेक कठिनाइयों के कारण आज की परिस्थितियों में संन्यास से प्रति हम असहमति प्रकट करते रहें हैं और यही कहते रहें है कि परमार्थ प्रयोजन के लिए जीवन समर्पण करने वालों के लिए वानप्रस्थ ही उपयुक्त है। उसमें घर परिवार के साथ सम्बन्ध बनाये रहने की सुविधा है। साथ ही प्रतिबन्ध में उतने कड़े नहीं है। हरिजन शब्द की तरह आज संन्यास भी निठल्ले, अकर्मण्य लोगों का पर्यायवाची बन गया है। इसलिए भी हम वानप्रस्थ को ही इन दिनों साधु और ब्राह्मण का सम्मिश्रित स्वरूप मानते रहे हैं और उसी में उत्तरार्द्ध परम्परा के दोनों आश्रमों का समावेश करते रहे है। आज की स्थिति में युग-धर्म के अनुरूप यही हल सर्वोत्तम है।

अपनी योजना के अनुसार ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजनों को थोड़े-थोड़े समय के लिए वानप्रस्थ लेने का साहस करना चाहिए और नियत अवधि पूरी करके अपने घरों को लौट जाना चाहिए। जब-जब उन्हें अवकाश मिले, तब-तब ऐसे कदम बार-बार उठा सकते हैं। नियत समय पर नियत अवधि के लिए पहले से भी ऐसा व्रत ले लिया जाय तो उससे अपने ऊपर एक बन्धन, उत्तरदायित्व बँधता है। इस दृष्टि से वैसा साहस कर गुजरता वैसा ही है-जैसा कि परीक्षा का फार्म भर देने पर पढ़ने की गति एवं चेष्टा में गतिशीलता का आना। यह प्रक्रिया यदि उत्साह पूर्वक अपनाई जा सके तो साधु-संस्था के मरणासन्न होने के कारण विश्व-मानव के सिर पर विनाश की जो काली घटाएँ छा रही हैं, उन्हें सुविधा पूर्वक हटाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.24

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 30)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Take the venerated seat of the mother, who feeds the infant by the extract of her own blood; who suffers in cold but shields the child in her bosom. Like a learned teacher, distribute the wisdom acquired by you amongst the immature, ignorant and way lost people. The glorious path of reformation is not easy to follow. People may make you suffer, insult you, make fun of you. They may even regard you as a crackbrain, may oppose you and create hurdles in your work for no rhyme or reason. Be least apprehensive about such persons. Do not deviate from your path. The number of such habitual faultfinders is always insignificant. Against hundreds of appreciators of your good work, the number of denunciators will be very small. Their antagonism, too, will come to you as a token of Divine Grace. It would provide you opportunities for introspection and corrective action. This will charge you with higher potency energy for speedy progress.

You might have understood that significance of persons, events and objects, which come in our lives in this ever-changing materiel world, is momentary and illusory. Therefore material objects and relationships are not worthy of blind pursuit for their acquisition or attachment thereto. Such detached attitude would in no way discourage us in performance of our duties. On the contrary, only on being detached to the material world, we can pay attention to our progress without worry. It is a great misconception to regard this world as full of misery. World is full of things of beauty and joy. Had it not been so, the free, spotless, illumined blissful soul, which is spark of the Supreme, would not have chosen it as its abode.

Unhappiness is nothing but absence of happiness. Unhappiness means abandoning a highway and wandering waylost through the thicket of thorny bushes. As discussed earlier, mostly the unhappiness, antagonism, enmity, distress and conflict faced by us is illusory and people are not so wicked as we assume them to be. If we clean our minds of prejudices and throw away our coloured glasses, things will appear in their true colours.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 51

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 4 July 2019

■  लोगों की दृष्टि में स्वार्थ बुरा समझा जाता है, परन्तु स्वार्थ बुरा नहीं है। स्वार्थ का तात्पर्य है ‘अपना लाभ-अपना भला-अपना हित करना।’ दूसरे शब्दों में कहें तो यह हो सकता है कि ‘अपना हित करने की भावना से प्रेरित होकर किसी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करना।’ यदि हम शब्दकोष को उठाकर देखें तो हमें विदित होगा कि उसमें भी स्वार्थ अभिप्राय उपरोक्त ही बताया गया है। हम स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, हमारा जीवन सुख-शान्तिमय व्यतीत हो-ऐसा कौन नहीं चाहता? यह भावना हमारे भले की, हित की है और अपना भला या हित करना कोई पाप नहीं है, बल्कि यह कहा जाए कि ‘हमारा धर्म है’ तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इस बात का स्पष्टीकरण कर दिया है-’उद्धरेद त्मनात्मानं नात्मान मवसादयेत्।’ अर्थात् ‘मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार (भला) करे।’

◇ स्वार्थ का दुरुपयोग करने से अनेकों प्रकार के रोग मनुष्य को घेरे रहते हैं और मनुष्य जीवन भर बेचैनी का अनुभव करता हुआ दुर्गति को प्राप्त होता है। इतिहास के क्षेत्र में देखिए, सिकन्दर ने स्वार्थ का दुरुपयोग किया और छोटे-बड़े सभी राज्यों को पराजित कर सम्राट बन बैठा। इस स्वार्थ में सिकन्दर को क्या मिला? हत्या, शाप, परपीड़न और पाप! इसी पाप ने अन्त में सन्ताप का रूप धारण कर उसे दुर्गति के हवाले कर दिया और सिकन्दर के हाथ कुछ न आया। उसकी धन-दौलत माल-असबाब और उसकी सेना उसे निर्दयी काल के पंजे से न छुड़ा सकी। इसीलिए कहा है :-
“सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।”

★ यदि हम सचमुच अपना हित साधन करना चाहते हैं तो हमें अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करना होगा, निम्न-कोटि के स्वार्थ से ऊँचे उठकर उच्च कोटि का स्वार्थ अपनाना होगा। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य करते समय हमें यही ध्यान रखना होगा कि हमारा हित, हमारा भला, हमारा स्वार्थ, हमारा सुख, हमारी शान्ति कहाँ निहित है? हमें अपने भीतर से उत्तर-मिलेगा, अन्य का भला करने में! इसलिए हर कार्य हमें अपनी भलाई करने के लिये ही करना चाहिए और प्रत्येक में हमारे स्वार्थ की छाप लगा देना चाहिए। हम जिधर दृष्टि फेरें, बस हमें अपना स्वार्थ ही स्वार्थ नजर आए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Maya - know it to know It

To obtain sense pleasures we spend away our riches, because we value this experience of pleasure more than the possession of material wealth. We are so driven by these desires, running after these sense pleasures that we forget that there exists an entity even greater than our gross body. In reality Atman (soul) is even greater, more special than our body. When compared to the bliss we can experience in our soul all other sense pleasures appear inferior and trivial.

In our day-to-day life we follow the motto of - "give up as little as possible and get as much as possible", but when presented with the ultimate test, we abandon it. We are ready to give up our hard earned wealth when it is for the sake of sense pleasures, but we hesitate to give up our sense pleasures (which are little things) for the bliss of our soul (which is the greatest joy there is) - This is MAYA.

It is a well established fact that any one can obtain wealth, amass material possessions, give the senses some temporary satisfaction by indulging in tyranny, immorality, selfishness, oppression, adultery, theft, violence, deceit, arrogance, hypocrisy, lies, ego, etc. But one can never taste the bliss of self-satisfaction this way.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Dharma Tatwa ka Darshan aur Marm Vangmay 53 Page -3.14

👉 माया क्या है? Maya Kya Hai?

शरीर सुख के लिए अन्य मूल्यवान पदार्थों को खर्च कर देते हैं कारण यही है कि वे मूल्यवान पदार्थ शरीर सुख के मुकाबले में कमतर जँचते हैं। लोग शरीर सुख की आराधना में लगे हुए हैं परन्तु एक बात भूल जाते हैं कि शरीर से भी ऊँची कोई वस्तु है। वस्तुत: आत्मा शरीर से ऊँची है। आत्मा के आनन्द के लिए शरीर या उसे प्राप्त होने वाले सभी सुख तुच्छ हैं। अपने दैनिक जीवन में पग- पग पर मनुष्य 'बहुत के लिये थोड़े का त्याग' की नीति को अपनाता है, परन्तु अन्तिम स्थान पर आकर यह सारी चौकड़ी भूल जाता है। जैसे शरीर सुख के लिए पैसे का त्याग किया जाता है वैसे ही आत्म - सुख के लिए शरीर सुख का त्याग करने में लोग हिचकिचाते हैं, यही माया है।

पाठक इस बात को भली भाँति जानते हैं कि अन्याय, अनीति, स्वार्थ, अत्याचार, व्यभिचार, चोरी, हिंसा, छल, दम्भ, पाखण्ड, असत्य, अहंकार, आदि से कोई व्यक्ति धन इकट्ठा कर सकता है, भोग पदार्थों का संचय कर सकता है, इन्द्रियों को कुछ क्षणों तक गुदगुदा सकता है, परन्तु आत्म-सन्तोष प्राप्त नहीं कर सकता।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ- 3.14

बुधवार, 3 जुलाई 2019

Speak Less, Do More | बोलिए कम, करिए अधिक | Hariye Na Himmat Day 17



Title

Hame Bhakti Do Maa, | हमें भक्ति दो माँ | Pragya Geet



Title

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 4)

पुरे समय के लिए तत्काल भावनात्मक नव−निर्माण को ब्राह्मणोचित परम्परा का निर्वाह करने के लिए हर किसी को नहीं कहा जा सकता। जिनने पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे कर लिये हैं, उन्हें वानप्रस्थ में प्रवेश करने के लिए बहुत दिनों से कहा जा रहा है। जुलाई 73 की अखण्ड−ज्योति में इस संदर्भ में अधिक जोर दिया गया है और जो घर की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके उन्हें परमार्थिक−जीवन में प्रवेश करने के लिए वानप्रस्थ में प्रवेश करने का अनुरोध किया गया है। दूसरे स्तर के क्लिष्ट वानप्रस्थ वे होंगे —जो अभी शेष जीवन पुरी तरह इस महान लक्ष्य के लिए समर्पित करने की स्थिति में तो नहीं है, पर अधिकाधिक साहस इसके लिए जुटाते रहेंगे।

अब इस श्रृंखला में एक नई कड़ी और जोड़ी जा रही है कि जिन्हें जब जितना अवकाश हुआ करे, तब वे उतने समय के लिए परमार्थ प्रयोजनों के लिए अपना समय लगाने का निश्चय करें और उन्हें कहाँ क्या करना है—इसका निर्देश ‘युग−निर्माण योजना’ मथुरा एवं शान्तिकुंज से प्राप्त कर लिया करे। इस प्रकार थोड़ा−थोड़ा समय भी अनेक व्यक्ति देने लगेंगे तो उस सबका सम्मिलित परिणाम बहुत बड़ा हो जायगा। एक लाख व्यक्ति ऐसे थोड़ा−थोड़ा समय देने वाले हों तो उन सबका मिला हुआ कार्य हजारों नियमित एक पूरे जीवन के लिए साधु−संस्था में प्रवेश करने वालों जितना ही हो जायगा। यह प्रक्रिया सरल बैठेगी। इस योजना के अंतर्गत व्यस्त और पारिवारिक बोझ से लदे हुए व्यक्ति भी थोड़ा-बहुत समय देते रहेंगे तो उन्हें यह पश्चाताप न रहेगा कि हम घरेलू झंझटों में उलझे रहने रहने के कारण युग की पुकार को पूरा करने के लिए कुछ भी न कर सके। ऐसे व्यक्ति पूरा न सही—अधूरा सही का थोड़ा-बहुत अवसर पाकर भी आत्म-सन्तोष की एक साँस ले सकते हैं और कह सकते हैं कि मानवता पर छाई हुई विषम-वेला में हम मूक-दर्शक बने रहने वाले अभागों में से नहीं है। जितना कुछ संभव था, उतना तो किया ही।

बँधा रुपया न मिले। एक-एक पैसे वाले सौ सिक्के मिल जायँ तो गिनने, धरने, उठाने का झंझट तो जरूर रहेगा, पर प्रयोजन वही पूरा हो जायगा—जो एक रुपये से सम्भव होता है। पूरे समय के लिए वानप्रस्थ न मिले तो थोड़ा-थोड़ा समय देने वाले अनेकों का सहयोग लेकर भी सामयिक संकट से जूझने का सुयोग बन सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.24

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 20)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
अब यदि क्रमिक रूप में ५- ५ या १०- १० वर्षों के अन्तराल का लेखा- जोखा करें तो हमें विस्मयजनक एवं आश्चर्यचकित करने वाले नए- नए मोड़ अपने जीवन में देखने को मिलेंगे। यह अचरज हमें कितना ही क्यों न चौंकाए, पर यह हमारे जीवन की अनुभूत सच्चाई है। थोड़ा बारीकी से देखें तो इन पंक्तियों के पाठक अनुभव करेंगे कि उनके जीवन में पाँच या दस सालों के अन्तराल में कुछ ऐसा होता गया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। मन की कल्पनाएँ बदली, अरमान, आकांक्षाएँ बदली, चाहत एवं वृत्तियों में परिवर्तन हुए, साथ ही परिस्थितियों में नए- नए घटनाक्रमों का उदय हुआ। कई पराए अपने हुए और कई अपने परायापन जताकर विरोधी हो गए। आॢथक -- सामाजिक पहलुओं में भी नए रंग उभरे।

यह सब संयोग की वजह से नहीं, संस्कारों की वजह से हुआ। नए संस्कारों के जागरण एवं नए कर्म बीजों के अंकुरण के कारण हमारे जीवन के नए- नए शृंगार होते गए। यह अलग बात है कि इन परिवर्तनों में कई परिवर्तन हमारे लिए दुखद साबित हुए तो कई ने हमें सुखद अनुभूतियाँ दी। भरोसा करें, यहाँ जो कहा जा रहा है वह आध्यात्मिक ज्ञान का सच है। कोई भी सुपात्र सत्पात्र इसे अनुभव कर सकता है। यदि आपको इस पर भरोसा हो रहा है तो इस सच्चाई पर भी यकीन करें कि संस्कारों की तह तक पहुँच कर, इनका उत्खनन करके दुःखद संस्कारों से छुटकारा पाया जा सकता है। और सुखद संस्कारों को प्रबल बनाया जा सकता है। यानि कि आध्यात्मिक प्रयोगों की सहायता से बुरी मनःस्थिति एवं परिस्थिति से छुटकारा पाया जा सकता है।

विश्वास करें यह एक प्रायोगिक सच है। अनेकों ने अनेक तरह से इसे अपने जीवन में खरा पाया है। बस इसके लिए आपको किसी आध्यात्मिक चिकित्सक का संग- साथ चाहिए। उसकी सहायता से जीवन में नए रंग भरे जा सकते हैं। ऐसा होने की अनुभूति तो अनेकों की है, पर हम यहाँ केवल एक का उल्लेख करना चाहेंगे। जिसकी वजह से एक भटकता हुआ आवारा किशोर महान् क्रान्तिकारी इतिहास पुरुष बन गया। हाँ यह सच्चाई पं. रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन की है। ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’- का प्रेरक स्वर देने वाले बिस्मिल किशोर वय में कुसंग एवं कुटेव के कुचक्र में फंस गए थे। गलत लोगों के गलत साथ ने उनमें अनेकों गलत आदतें डाल दी। स्थिति कुछ ऐसी बिगड़ी कि जैसा उनका व्यक्तित्व ही मुरझा गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 29)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

What should be our course of action in this world to eliminate evil? The Sun sets an example worth emulating. Its light dispels the darkness. Its heat forms the clouds; clouds bring down rain and cool the heat. When we take food, hunger goes by itself and when we follow laws of health, weakness is removed without much effort. In order to remove ignorance, try to acquire knowledge. For making the world free of evil, we should work for proliferation of virtues. The proper way for eradication of disease is to educate the masses about the significance of laws of hygiene and health. The sick do need the medicines, but hospitals cannot cure the entire society. Law enforcement machinery works like a hospital for the wicked- the morally sick. It takes care of only contingencies. Law cannot remove the root causes of societal ills.

It is not possible to eradicate evil by violence. Violent opposition would only incite a stronger counter reaction. A surgeon does not act like a butcher. He makes a precise incision. Instead of direct confrontation, blabbing, showing resentment, expressing helplessness, follow the positive path of forgiveness, reformation and love. According to a philosopher, “A word of love creates much greater impact than a blow on the head”. Everyone has more or less goodness in him. Make an effort to identify your own virtues and make them more effective in life. Also find out the virtues in the other person and try to encourage him to more and more cultivate these virtues. Do not fight your battle in the darkness of ignorance. Make your battlefield illuminated. Do not be disheartened by the spread of immorality. Counter it by promoting morality.

The only way to remove evil from this world is to encourage goodness. Remove the air from the bottle by filling it with water. Do not associate with evil. Why should you like to collect the garbage (evil)? Let others do this dirty job. Your work is to disinfect the rot. Why should you do skinning of dead animals (finding faults of the evildoers)? Assume the more dignified role of a teacher. Remember! In this world quite a few persons have a faultfinding attitude. Perhaps there are more persons inclined to punish the guilty than are necessary. When a child teases another one, quite a few of his companions slap him on the cheek. But how many in this world are prepared to give free food and clothes to a needy child? Let the evildoers suffer the consequences of their misdeeds.
face of all provocations.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 50

👉 साधुओं का कर्तव्य Sadhuon Ka Kartvya


अपनी क्षुधा निवारण करने के उपरान्त बची हुई रसोई दूसरों को बाँट देनी चाहिये। इस प्रकार पहले अपने को ज्ञानवान बनाकर तब उस ज्ञान का वितरण दूसरे लोगों में करना चाहिए। तैरने वालों को चाहिए कि यदि कोई पानी में डूब रहा हो तो उसे डूबने न दें। उत्तम गुणों को अपने अन्दर धारण करने के उपरान्त उन्हें दूसरे लोगों में फैलाना कर्तव्य है। शरीर का सर्वश्रेष्ठ उपयोग परोपकार है वह देह धन्य है जो पराये काम आती है और जिससे किसी का अनिष्ट नहीं होता।

दूसरों के दुख में दुखी होना, दूसरों के सुख में प्रसन्न होना पराये को अपना लेना, मधुर वचन बोलना, दुखी जनों को ढूँढ़ ढूँढ़ कर उनकी सेवा सहायता के लिये प्रस्तुत रहना यह साधुजनों का काम है। आलस्य को त्यागकर कर्तव्य परायण होना, थोड़ा और विवेकयुक्त बोलना क्रोध और मन्सर को त्यागकर विनति भाव से रहना यह सत्पुरुषों का स्वभाव है। वे साधु धन्य हैं जो अपने सद्व्यवहार से दुर्जनों को सुपथ पर आरुढ़ करते हैं स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का उपकार करते हैं आपत्ति काल में धैर्य धारण करते हैं और आलोचकों को देखकर विचलित नहीं होते। उन्हीं का भजन सच्चा है और परमात्मा को तृप्त करने वाला है।

जो बोया जाता है वही उगता है इसलिए कर्कश वचन और कठोर व्यवहार के विष बीजों को नहीं बोना चाहिए। इस दुनिया में उत्तम गुण वाले सज्जनों की बड़ी आवश्यकता है ऐसे पुरुषों को मनुष्य जाति सदैव खोजती रहती है। श्रेष्ठ जनों को समूह बनाना चाहिये, संगठन करना चाहिए। अकेला आदमी क्या कर सकता है। इसलिए विवेकवान धर्मप्रचारक को चाहिये कि शिक्षित साथियों की सहायता से कल्याण के कार्य को बढ़ावे।

अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 8

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/April/v1.8

सोमवार, 1 जुलाई 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 1 July 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 19)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
चित्त के संस्कार कर्मबीज हैं। इन्हीं के अनुरूप व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति का निर्माण होता है। जन्म और जीवन के अनगिन रहस्य इन संस्कारों में ही समाए हैं। जिस क्रम में संस्कार जाग्रत् होते हैं, कर्म बीज अंकुरित होते हैं, उसी क्रम में मनःस्थिति परिवर्तित होती है, परिस्थितियों में नए मोड़ आते हैं। जन्म के समय की परिस्थितियाँ, माता- पिता का चयन, गरीबी- अमीरी की स्थिति जीवात्मा के संस्कारों के अनुरूप बनती है। कालक्रम में इनकी नयी- नयी परतें खुलती हैं। अपनी परिपक्वता के क्रम में कर्मबीजों का अंकुरण होता है और जीवन में परिवर्तन आते रहते हैं। किसी भी आध्यात्मिक चिकित्सक के लिए इन संस्कारों के विज्ञान को जानना निहायत जरूरी है। यह इतना आवश्यक है कि इसके बिना किसी की आध्यात्मिक चिकित्सा सम्भव ही नहीं हो सकती।

किसी भी व्यक्ति का परिचय उसके व्यवहार से मिलता है। इसी आधार पर उसके गुण- दोष देखे- जाने और आँके जाते हैं। हालाँकि व्यवहार के प्रेरक विचार होते हैं और विचारों की प्रेरक भावनाएँ होती हैं। और इन विचारों और भावनाओं का स्वरूप व्यक्ति के संस्कार तय करते हैं। इस गहराई तक कम ही लोगों का ध्यान जाता है। सामान्य जन तो क्या विशेषज्ञों से भी यह चूक हो जाती है। किसी के जीवन का ऑकलन करते समय प्रायः व्यवहार एवं विचारों तक ही अपने को समेट लिया जाता है। मनोवैज्ञानिकों की सीमाएँ यहीं समाप्त हो जाती हैं। परन्तु अध्यात्म विज्ञानी अपने ऑकलन संस्कारों के आधार पर करते हैं। क्योंकि आध्यात्मिक चिकित्सा के आधारभूत ढाँचे का आधार यही है।

ध्यान रहे, व्यक्ति की इन अतल गहराइयों तक प्रवेश भी वही कर पाते हैं, जिनके पास आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति है। आध्यात्मिक ऊर्जा की प्रबलता के बिना यह सब सम्भव नहीं हो पाता। कैसे अनुभव करें चित्त के संस्कारों एवं इनसे होने वाले परिवर्तन को? तो इसका उत्तर अपने निजी जीवन की परिधि एवं परिदृश्य में खोजा जा सकता है। विचार करें कि अपने बचपन की चाहतें और रूचियाँ क्या थीं? आकांक्षाएँ और अरमान क्या थे? परिस्थितियाँ क्या थीं? इन सवालों की गहराई में उतरेंगे तो यह पाएँगे कि परिस्थितियों का ताना- बाना प्रायः मनःस्थिति के अनुरूप ही बुना हुआ था। मन की मूलवृत्तियों के अनुरूप ही परिस्थितियों का शृंगार हुआ था। और ये मूल वृत्तियाँ हमारे अपने संस्कारों के अनुरूप ही थीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 30

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 3)

साधु−संस्था को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं, जिसके सहारे आपत्ति ग्रस्त मानवता की प्राणरक्षा की जा सके। समस्याओं के काल−पाश में गर्दन फंसाये हुए इस सुन्दर विश्व को मरण से केवल साधु ही बचा सकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक दूसरे का मुँह न ताका जाय, वरन् इस आपत्ति−काल से जूझने के लिए अपना ही कदम बढ़ाया जाय।

अखण्ड−ज्योति परिवार की मणिमाला से एक से एक बढ़कर रत्न मौजूद है। समय आने पर उनके मूल्यवान् अस्तित्व का परिचय हर किसी को मिल सकता हे। अब उसी का समय आ पहुँचा। हमें समय की पुकार पूरी करने के लिए स्वयं ही आगे आना चाहिए।

यो साधु और ब्राह्मण का एक समान जीवन−क्रम होता है और उसी विधि से पूरी जिन्दगी की रूपरेखा बनाने की प्रथा है। पर आपत्ति धर्म के अनुसार सीमित समय के लिए उस क्षेत्र में प्रवेश करने और फिर वापिस अपने समय स्थान पर लौट आने की पद्धति अपनानी पड़ेगी। या तो पूरा या कुछ नहीं की, बात पर अड़ने की आवश्यकता सदा नहीं होती। मध्यम मार्ग पर चलने से कुछ तो लाभ होना ही है। पूरी न मिले तो अधूरी से काम चलाने की नीति है। युद्धकाल में प्रत्येक वयस्क नागरिक को बाधित रूप से सेना में भर्ती होने का आदेश दिया जा सकता है। जब तक संकट−काल रहता है तब तक वे सामान्य नागरिक सेना में भर्ती रहते है। स्थिति सुधरते ही वे सेना छोड़कर घर वापिस आ जाते है और अपने साधारण कार्यों में लग जाते है। साधु−संकट के इस महान् दुर्भिक्ष में भी हम सामान्य नागरिकों को थोड़े−थोड़े समय के लिए उन उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के लिए आगे आना चाहिए। एक−एक घण्टा श्रमदान करके जब बड़े−बड़े सार्वजनिक प्रयोजन पूरे किये जा सकते है तो कोई कारण नहीं कि हम सब स्वल्प−कालीन व्रत धारण करके साधु−संस्था पर छाये हुए दुर्लभ संकट का निवारण करने के लिए कुछ न सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.23

शनिवार, 29 जून 2019

👉 मजदूर के जूते Labor shoes

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था।

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा,  गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा!!

शिक्षक गंभीरता से बोले, किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है!!

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा फिर उसने इधर -उधर देखने लगा, दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए अब उसने दूसरा जूता उठाया, उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – हे भगवान्, समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद, उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी।

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं शिक्षक ने शिष्य से कहा –  क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली?

शिष्य बोला, आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है देने का आनंद असीम है देना देवत्त है।

👉 आज का सद्चिंतन Today's Thought 29 June 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 29 June 2019



👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 18)

👉 कर्मफल के सिद्धान्त को समझना भी अनिवार्य
इस सम्बन्ध में एक बड़ी मार्मिक घटना है। महाराष्ट्र का कोई व्यक्ति उनसे मिलने आया। उसकी आयु यही कोई ३०- ३५ वर्ष रही होगी। पर जिन्दगी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। रुखे- उलझे सफेद बाल, हल्की पीली सी धंसी आँखें। चेहरे पर विषाद की घनी छाया। दुबली- पतली कद- काठी, सांवला रंग- रूप। बड़ी आशा और उम्मीद लेकर वह गुरुदेव के पास आया था। आते ही उसने प्रणाम करते हुए अपना नाम बताया उदयवीर घोरपड़े। साथ ही यह कहा कि वह महाराष्ट्र के जलगांव के पास के किसी गांव का रहने वाला है। इतना सा परिचय देने के बाद वह फफक- फफक कर रो पड़ा। और रोते हुए उसने अपनी विपद् कथा कह सुनायी।

सचमुच ही उसकी कहानी करुणा से भरी थी। लम्बी बीमारी से पत्नी की मृत्यु, डकैती में घर की सारी सम्पत्ति का लुट जाना और साथ ही सभी स्वजनों की नृशंस हत्या। वह स्वयं तो इसलिए बच गया क्योंकि कहीं काम से बाहर गया था। अब निर्धनता और प्रियजनों के विछोह ने उसे अर्ध विक्षिप्त बना दिया था। जीवन उसके लिए अर्थहीन था और मौत ने उसे अस्वीकार कर दिया था। अपनी कहानी सुनाते हुए उसने एक रट लगा रखी थी कि गुरुजी! मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ। मैंने तो किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ा था। भगवान ऐसा अन्यायी क्यों है? पूज्य गुरुदेव ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- बेटा! अभी तेरा मन ठीक नहीं है। मैं तुझे कुछ बताऊँगा भी तो तुझे समझ नहीं आएगा। 

अभी तो मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। यह कहानी उस समय जन्मी जब भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर कौरव सभा में गए थे। और वहाँ उन्होंने उद्दण्ड दुर्योधन को डपटते हुए अपना विराट् रूप दिखाया। इस दिव्य रूप को भीष्म, विदुर जैसे भक्तों ने देखा। ऐसे में धृतराष्ट्र ने भी कुछ समय के लिए आँखों का वरदान माँगा, ताकि वह भी भगवान् की दिव्य छवि निहार सके। कृपालु प्रभु ने धृतराष्ट्र की प्रार्थना स्वीकार की। तभी धृतराष्ट्र ने कहा- भगवन् आप कर्मफल सिद्धान्त को जीवन की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। सर्वेश्वर मैं यह जानना चाहता हूँ, किन कर्मों के परिणाम स्वरूप मैं अन्धा हूँ।

भगवान ने धृतराष्ट्र की बात सुनकर कहा, धृतराष्ट्र इस सच्चाई को जानने के लिए मुझे तुम्हारे पिछले जन्मों को देखना पड़ेगा। भगवान के इन वचनों को सुनकर धृतराष्ट्र विगलित स्वर में बोले- कृपा करें प्रभु, आपके लिए भला क्या असम्भव है। कुरु सम्राट के इस कथन के साथ भगवान योगस्थ हो गए। और कहने लगे- धृतराष्ट्र मैं देख रहा हूँ कि पिछले तीन जन्मों में तुमने ऐसा कोई पाप नहीं किया है, जिसकी वजह से तुम्हें अन्धा होना पड़े? श्रीकृष्ण के इस कथन को सुनकर धृतराष्ट्र बोले- तब तो कर्मफल विधान मिथ्या सिद्ध हुआ प्रभु! नहीं धृतराष्ट्र अभी इतना शीघ्र किसी निष्कर्ष पर न पहुँचो और भगवान् धृतराष्ट्र के विगत जन्मों का हाल बताने लगे। एक- एक करके पैंतीस जन्म बीत गए।

सुनने वाले चकित थे। धृतराष्ट्र का समाधान नहीं हो पा रहा था। तभी प्रभु बोले- धृतराष्ट्र मैं इस समय तुम्हारे १०८ वें जन्म को देख रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ- एक युवक खेल- खेल में पेड़ पर लगे चिड़ियों के घोंसले उठा रहा है। और देखते- देखते उसने चिड़ियों के सभी बच्चों की आँखें फोड़ दीं। ध्यान से सुनो धृतराष्ट्र, यह युवक और कोई नहीं तुम ही हो। विगत जन्मों में तुम्हारे पुण्य कर्मों की अधिकता के कारण यह पाप उदय न हो सका। इस बार पुण्य क्षीण होने के कारण इस अशुभ कर्म का उदय हुआ है।

इस कथा को सुनाते हुए परम पूज्य गुरुदेव ने उस युवक के माथे पर भौहों के बीच हल्का सा दबाव दिया। और वह निस्पन्द होकर किसी अदृश्य लोक में प्रविष्ट हो गया। कुछ मिनटों में उसने पता नहीं क्या देख लिया। जब वापस उसकी चेतना लौटी तो वह शान्त था। गुरुदेव उससे बोले- समझ गए न बेटा। वह बोला- हाँ गुरुजी मेरे ही कर्म हैं। यह सब मेरे ही दुष्कर्मों का फल है। कोई बात नहीं बेटा, जब जागो तभी सबेरा। अब से तुम अपने जीवन को संवारों। मैं तुम्हारा साथ दूँगा। क्या करना होगा, उस युवक ने पूछा। चित्त के संस्कारों को जानो और इनका परिष्कार करो। गुरुदेव के इस कथन ने उसके जीवन में नयी राह खोल दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 2)

वर्तमान साधु−ब्राह्मणों का दरवाजा खटखटाते हमें एक युग बीत गया। उन्हें नीच−ऊँच समझाने में जितना श्रम किया और समय लगाया, उसे सर्वथा व्यर्थ चला गया ही समझना चाहिए। निराश होकर ही हमें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा है कि सड़ी वस्तु को पुनः स्वस्थ स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा। हमें नई पौध लगाने और नई हरियाली उगाने के लिए अभिनव प्रयत्न करने होंगे। उसी का आरम्भ कर भी रहे हैं।

विश्वास किया जाना चाहिए कि आदर्शवादिता अभी पूरी तरह अपंग नहीं हो गई हैं। महामानव स्तर की भावनायें सर्वथा को विलिप्त नहीं हो गई हैं। लोभ और मोह ने मनुष्य को जकड़ा तो जरूर है, पर वह ग्रहण पूरा खग्रास नहीं है। सूर्य का एक ऐसा कोना अभी भी खाली है और उतने से भी काम चलाऊ प्रकाश किरणें विस्तृत होती रह सकती है। ऋषि−रक्त की प्रखरता उसकी सन्तानों की नसों में एक बूँद भी शेष रही हो—ऐसी बात नहीं है। दम्भ का कलेवर आकाश छू रहा है—सो ठीक है,पर सत्य न अभी भी मरण स्वीकार नहीं किया है। अपराधी में हर व्यक्ति अन्धा हो रहा हैं पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि परमार्थ की परम्परा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

देश,धर्म, समाज और संस्कृति की बात सोचने के लिए किसी के भी मस्तिष्क में गुंजाइश नहीं रहीं ही, अभी ऐसा अन्धकार नहीं छाया है। अब किसी के भी मन में दूसरों के लिए दर्द ने रह गया हों, दूसरों के सुख में अपना सुख देखने वाले हृदय सर्वथा उजड़−उखड़ गये हों, ऐसी बात नहीं है। धर्म के बीच नष्ट तो कभी भी नहीं हुए हैं। आत्म−सत्ता की वरिष्ठता का आत्यन्तिक मरण हो गया हो— ऐसी स्थिति अभी नहीं आई है। मनुष्य ने पाप और पतन के हाथों अपने को बेच दिया हो और देवत्व से उसका कोई वास्ता न रह गया हो— ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मानवी महानता अभी कहीं न कहीं, किसी न किसी अंश में जीवित जरूर मिल जायगी। हम उसी को ढूंढ़ेंगे। जहाँ थोड़ी−सी साँस मिलेगी,यहाँ आशा के चीवर ढुलाऐंगे और कहेंगे—पशुता से ऊँचे उठकर देवत्व की परिधि में प्रवेश करने का प्रयत्न करो।

मरणोन्मुख मनुष्यता तुम्हारी बाट जोहती है। चलो,उसे निराश न करों। हमें आशा है कि कहीं न कहीं से ऐसी आत्मा ढूंढ़ ही निकाली जा सकेगी, जिनमें मानवी महानता जीवित बच रही हो। उन्हें युग की दर्द भरी पुकार सुनने के लिए अनुरोध करेंगे और कहेंगे—मनुष्य जाति को सामूहिक आत्महत्या करने से रोकने का अभी भी समय बाकी है। कुछ तो अभी किया जा सकता है, सो करना चाहिए। अपने को खोकर यदि संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है तो इस सौदे को पक्का कर ही लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1974/January/v1.22

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 28)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

On many occasions, I have succeeded in reconciling the differences between bitter adversaries by making them understand the triviality of the root cause, which had made a mountain out of a molehill. Such situations arise because of gap in communication. With mutual understanding, sharing of feelings and objective analysis of each other’s expectations, behaviour and psychological background, ninety percent of estrangements can be amicably resolved. In fact the factors responsible for such estrangements are very minor. We may compare their incidence with the quantity of salt in our food. Salt and pepper themselves are distasteful, but a small quantity of these makes food palatable. Occasional cooling off of warmth in close relationships is required to break the monotony of life. Given mutual trust, we bounce back into the relationship with deeper understanding and warmth. It has already been discussed that on human birth, the soul brings with it many imperfections and traits of its past lives including its embodiments in sub-human species.

The newly born human child is very little qualified to live amongst human beings. It falls asleep anytime during the day, keeps awake during nights, soils the clothes and makes loud hues and cries for its biological needs of fondling, food and water. Nevertheless, neither these babytantrums disturb the household, nor does addition of one more member make the house unlivable. On the contrary, the innocent and immature child becomes a means of entertainment for the family. The morally less evolved persons of the society should be treated in the same way.

For evolutionary soul growth, it is the duty of each enlightened soul to work for the progress of other persons, who are at lower stages of soul-growth and encourage them, to work for their own upliftment. Wickedness will always be there in this world. There is no reason to be afraid of it. Whosoever is desirous of self-enlightenment should learn to face and overcome the disturbances caused by the wicked. It is necessary to restrain the evil and prevent the beastly traits from polluting humane values. Flies have to be kept away from sweets. The efficiency of one’s karmas is demonstrated in preventing spread of sinful traits in the society. A great deal of caution is required in this endeavour. It is like walking on the razor’s edge. This truly is yog-the skill in works- equanimity in the face of all provocations.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 49

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 29 June 2019

■ अपने भाग्य को स्वयं बन जाने की राह देखना भूल ही नहीं, मूर्खता भी है। यह संसार इतना व्यस्त है कि लोगों को अपनी परवाह से ही फुरसत नहीं। यदि कोई थोड़ा सा सहारा देकर आगे बढ़ा भी दे और उतनी  योग्यता न हो तो फिर पश्चाताप, अपमान और अवनति का ही मुख देखना पड़ता है। स्वयं ही मौलिक सूझबूझ और परिश्रम से बनाये हुए भाग्य में इस तरह की कोई आशंका नहीं रहती, क्योंकि वैसी स्थिति में अयोग्य सिद्ध होने का कोई कारण नहीं होता।

◇ विश्वास बड़ा मूल्यवान् भाव है। जिस विषय में समझ-बूझकर विश्वास बना लिया जाय, उसका दृढ़तापूर्वक निर्वाह भी किया जाना चाहिए। आज विश्वास बनाया और कल तोड़ दिया, विश्वास का यह सस्तापन न तो योग्य है और न ही वांछनीय।

★ जिस प्रकार कमाना, खाना, सोना, नहाना जीवन के आवश्यक नित्य कर्म होते हैं, उसी प्रकार परमार्थ भी मानव जीवन का एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है। इसकी उपेक्षा करते रहने से आध्यात्मिक पूँजी घटती है, आत्मबल नष्ट होता है और अंतःभूमिका दिन-दिन निम्न स्तर की बनती चली जाती है। यही तो पतन है।

□ सत्कर्मों की पुण्य प्रवृत्ति कभी-कभी ही पैदा होती है। ऐसा उत्साह भगवान् की प्रेरणा और पूर्व संचित शुभ कर्मों का उदय होने पर ही जाग्रत् होता है, अन्यथा मनुष्य स्वार्थ और पाप की बातें सोचने में ही दिन गुजारता रहता है। इसलिए परमार्थ की पुण्य प्रवृत्तियाँ जब कभी उत्पन्न हों, तब कार्यान्वित करने के लिए साहस का प्रयोग ही कर डालना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Moments of self-expression 29 June 2019

◇ A wandering monk once visited the city of Mithila, ruled by the Sage King Janaka. “Who is the best teacher around here?” He asked We have to create strength where it does not exist; we have to change our natures, and become new men with new hearts, to be born again… We need a nucleus of men in whom the Shakti is developed to its uttermost extent, in whom it fills every corner of the personality and overflows to fertilize the earth. These, having the fire of Bhawani in their hearts and brains, will go forth and carry the flame to every nook and cranny of our land.
Sri Aurobindo

★ A student asked his teacher: "Who are the two angels who nurture life?" "Heart and tongue", was the reply. The next question was: “Who are the two demons who destroy life?" "Heart and tongue", was the reply again. The cruelty or tenderness of heart and tongue makes a person mean or great respectively.

■ It is already becoming clearer that a chapter which has a western beginning will have to have an Indian ending if it is not to end in the self-destruction of human race…. At this supremely dangerous moment in history, the only way of salvation for mankind is the Indian way.
Arnold Toynbee

□ By simplifying our lives, we rediscover our child-like stalk of innocents that reconnects us with the central resin of our innate humanity that knows truth and goodness. To see the world through a lens of youthful rapture is to see life for what it can be and to see for ourselves what we wish to become. In this beam of newly discovered ecstasy for life, we realize the splendor of love, life, and the unbounded beauty of the natural world.
Kilroy J. Oldste

शुक्रवार, 28 जून 2019

👉 10% का हक

एक बहुत अमीर आदमी ने रोड के किनारे एक भिखारी से पूछा.. "तुम भीख क्यूँ मांग रहे हो जबकि तुम तन्दुरुस्त  हो...??"

भिखारी ने जवाब दिया... "मेरे पास महीनों से कोई काम नहीं है...
अगर आप मुझे कोई नौकरी दें तो मैं अभी  से भीख मांगना छोड़ दूँ"

अमीर मुस्कुराया और कहा.. "मैं तुम्हें कोई नौकरी तो नहीं दे सकता ..
लेकिन मेरे पास इससे भी अच्छा कुछ है...
क्यूँ नहीं तुम मेरे बिज़नस पार्टनर बन जाओ..."

भिखारी को उसके कहे पर यकीन नहीं हुआ...
"ये आप क्या कह रहे हैं क्या ऐसा मुमकिन है...?"

"हाँ मेरे पास एक चावल का प्लांट है.. तुम चावल बाज़ार में सप्लाई करो और जो भी मुनाफ़ा होगा उसे हम महीने के अंत में आपस में बाँट लेंगे.."

भिखारी के आँखों से ख़ुशी के आंसू निकल पड़े...
" आप मेरे लिए जन्नत के फ़रिश्ते बन कर आये हैं मैं किस कदर आपका शुक्रिया अदा करूँ.."

फिर अचानक वो चुप हुआ और कहा.. "हम मुनाफे को कैसे बांटेंगे..?
क्या मैं 20% और आप 80% लेंगे ..या मैं 10% और आप 90% लेंगे..
जो भी हो ...मैं तैयार हूँ और बहुत खुश हूँ..."

अमीर आदमी ने बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ रखा ..
"मुझे मुनाफे का केवल 10% चाहिए बाकी 90% तुम्हारा ..ताकि तुम तरक्की कर सको.."

भिखारी अपने घुटने के बल गिर पड़ा.. और रोते हुए बोला...
"आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगा... मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूँ ...।

और अगले दिन से भिखारी ने काम शुरू कर दिया ..उम्दा चावल और बाज़ार से सस्ते... और दिन रात की मेहनत से..बहुत जल्द ही उसकी बिक्री काफी बढ़ गई... रोज ब रोज तरक्की होने लगी....

और फिर वो दिन भी आया जब मुनाफा बांटना था.

और वो 10% भी अब उसे बहुत ज्यादा लग रहा  था... उतना उस भिखारी ने कभी सोचा भी नहीं था... अचानक एक शैतानी ख्याल उसके दिमाग में आया...

"दिन रात मेहनत मैंने की है...और उस अमीर आदमी ने कोई भी काम नहीं किया.. सिवाय मुझे अवसर देने की..मैं उसे ये 10% क्यूँ दूँ ...वो इसका
हकदार बिलकुल भी नहीं है..।

और फिर वो अमीर आदमी अपने नियत समय पर मुनाफे में अपना हिस्सा 10% वसूलने आया और भिखारी ने जवाब दिया
" अभी कुछ हिसाब बाक़ी है, मुझे यहाँ नुकसान हुआ है, लोगों से कर्ज की अदायगी बाक़ी है, ऐसे शक्लें बनाकर उस अमीर आदमी को हिस्सा देने को टालने लगा."

अमीर आदमी ने कहा के "मुझे पता है तुम्हे कितना मुनाफा हुआ है फिर कयुं तुम मेरा हिस्सा देनेसे टाल रहे हो ?"

उस भिखारी ने तुरंत जवाब दिया "तुम इस मुनाफे के हकदार नहीं हो ..क्योंकि सारी मेहनत मैंने की है..."

अब सोचिये...
अगर वो अमीर हम होते और भिखारी से ऐसा जवाब सुनते ..
तो ...हम क्या करते ?

ठीक इसी तरह.........
भगवान  ने हमें जिंदगी दी..हाथ- पैर..आँख-कान.. दिमाग दिया..
समझबूझ  दी...बोलने को जुबान दी...जज्बात दिए..."

हमें याद रखना चाहिए कि दिन के 24 घंटों में  10% भगवान का हक है....
हमें इसे राज़ी ख़ुशी भगवान के नाम सिमरन में अदा करना चाहिए.
अपनी Income से 10%  निकाल कर अछे कामो मे लगाना चाहिए और... भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिसने हमें  जिंदगी दी सुख दिए ....

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2019


👉 आज का सद्चिंतन 28 June 2019


👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 1)

क्रिया या कलेवर एक जैसे होने पर भी व्यक्तियों की वास्तविकता एक जैसी नहीं हो सकती। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की फिल्म बनाने वाले सुरत का आदमी ढूँढ़ निकालते हैं और उससे ऐक्टिंग भी वैसा ही करा लेते हैं। इतने पर भी वह नर वैसा नहीं हो सकता, जैसा कि वह मृत व्यक्ति था। सूर, कबीर, मीरा, तुलसी, चैतन्य,विवेकानन्द, ज्ञानेश्वर आदि पर फिल्में बन चुकी हैं। जिनने पाठ किये है, वे देखने वाले को असली या नकली के भ्रम में डाल देते हैं। ’बहुरूपिये’ कई−कई तरह के वेष बदल कर दर्शकों को चक्कर में डाल देते हैं और अपनी कला का पुरस्कार पाते है। इतने पर भी वे उस असली के स्थान पर नहीं पहुँच सकते, जिसकी कि नकल बनाई गई थी।

आज साधु−ब्राह्मणों की नकल बनाने वाले बहुरूपियों की—ऐक्टरों की भरमार है। जटा, कमण्डल, धूनी, चिमटा, दाढ़ी, कोपीन सब ऐसी मानों महर्षि वेदव्यास अभी सीधे ही हिमालय से चले आ रहे हैं। ब्राह्मणों के तिलक−छाप, पगड़ी,दुपट्टा,कथा,मंत्रोच्चार ठीक वैसा ही गुरु−वशिष्ठ का आगमन अभी−अभी हो रहा है। बाहरी दृष्टि से सब कुछ ऐसा बन जाता है कि ‘टू कापी’ कहने में किसी को झिझकना पड़े। किन्तु आचार और विचार में जमीन−आसमान जितना अन्तर होने से उस नकल से कुछ प्रयोजन साधता नहीं—कुछ बात बनती नहीं।

अवाँछनीय लाभ उठाते रहने वाले वर्गों को कष्टसाध्य आदर्शवादी मार्ग पर चलने के लिए तैयार करना प्रायः असम्भव हो जाता है। राजा लोग समय रहते बदल सकते थे। ऐसा करके वे अपना प्रभाव और वर्चस्व भी बनाये रह सकते थे, जनता का हित कर सकते थे और दुर्गति से बच सकते थे, पर उनसे वैसा साहस करते बन नहीं पड़ा। जमींदार,रईस, सामन्त मिटते गये,पर बदले नहीं। जिन्हें मुफ्त में प्रचूर धन वैभव मिल रहा है। बिना तप, त्याग के पूजा−सम्मान पा रहे हैं, उनकी आत्मा इतनी बलिष्ठ न हों सकती कि आदर्शवादी जीवनचर्या अपना सकें, अहंकार को त्याग सकें और कष्टसाध्य सेवा साधना में आने को संलग्न कर सकें। यह इसलिए और भी अधिक कठिन है कि उन्हें आरम्भिक प्रेरणा व्यक्तिवादी स्वार्थपरता की पूर्ति से मिली है। उनका मन, मस्तिष्क इसी लाभ ने आकर्षित किया है। लोक में धन, सम्मान,परलोक में स्वर्ग−मुक्ति का लाभ तनिक −सा वेष बदलने भर से मिल सकता है। यही आकर्षण उन्हें इस राह पर खींच कर लाया है।

दूसरों का शोषण अपनी स्वार्थ −सिद्धि जिन्हें उपयुक्त जंची है, उन्हीं ने इस मार्ग पर छलाँग लगाई है। यदि उन्हें आरम्भ में ही तप, त्याग,संयम,सेवा की बात कही जाती तो कदाचित वे साधु बनने के लिए कदापि तैयार न होते। इस आन्तरिक दुर्बलता का लगातार पोषण ही होता रहा है, समर्थन ही मिलता रहा है। अब वे अपनी मूल मान्यताएँ बदलें तभी उन्हें सेवा−साधना की बात जँच−रुच। यह इतना कठिन है, जिसे लगभग असम्भव भी कहा जा सकता है। जो लोग संसार को माया कहते हैं, सेवा का शूद्रों का कार्य बताते रहे हैं, जिन्हें” तोहि बिरानी क्या पड़ी, तू अपनी निरबेर “ की बात आदि से अन्त तक सुनने को मिलती रही हैं, वे परम गहन सेवा−धर्म स्वीकार करने का, प्रभू समर्पित जीवन जीने का साहस कर सकेंगे,ऐसी आशा नहीं ही की जानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1974/January/v1.22

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 17)

👉 कर्मफल के सिद्धान्त को समझना भी अनिवार्य

कर्मसु कौशलम् -- यानि कि कर्मों में कुशलता की सीख जरूरी है। और यह तभी सम्भव है, जब कर्मफल सिद्धान्त को समझा जाय। इसे समझे बिना आध्यात्मिक चिकित्सा सम्भव नहीं। जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि उपयुक्त कारण के बिना कोई कार्य हो नहीं सकता। यदि जिन्दगी में कुछ घटित हो रहा है- तो इसके पीछे किन्हीं कारणों का होना आवश्यक है। फिर ये रोग- शोक पैदा करने वाली घटनाएँ हो अथवा हर्ष- उल्लास के उत्प्रेरक घटनाक्रम। जीवन की किसी घटना को संयोग कहकर टालने की कोशिश करना पूरी तरह से अवैज्ञानिक है। सच तो यह है कि प्रकृति के सम्पूर्ण परिदृश्य में कभी भी- कहीं भी संयोग घटित नहीं होते। प्रत्येक घटना उपयुक्त कारणों के गर्भ से जन्म लेती है। प्रत्येक फल बीज के समुचित विकास का परिणाम होता है।

कई बार ऐसा होता है कि हम किसी घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार उपयुक्त कारणों को ढूँढने में असफल रहते हैं। और अपनी इस असफलता को संयोगों के मत्थे मढ़कर छुट्टी पा लेते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया सिरे से गलत है। इसे गैर जिम्मेदारी के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक वर्तमान का अतीत होता है, और इसका भविष्य भी। अतीत के गर्भ के बिना कोई वर्तमान अपना अस्तित्त्व नहीं पा सकता। इसी तरह वर्तमान के कार्यों की परिणति भविष्य में अपना सुफल अथवा कुफल प्रकट किए बिना नहीं रहेगी। घटना छोटी हो या बड़ी- प्रत्येक के साथ यही नियम विधान काम करता है। इसे अस्वीकारने अथवा झुठलाने की कोशिश अज्ञान जनित मूढ़ता के सिवा और कुछ नहीं।

कर्मफल विधान की यही सच्चाई हमारी अपनी जिन्दगी के साथ जुड़ी हुई है। हमारा यह जीवन- यह मनुष्य जन्म किन्हीं संयोगों के कारण नहीं उपजा या पनपा है। इसके पीछे हमारे ही द्वारा किए गए कुछ सुनिश्चित कर्म हैं। हमारी बचपन की किलकारियाँ, किशोरवय की कुहेलिकाएँ, यौवन का पौरूष, बुढ़ापे की लाचारी के जिम्मेदार हमारे अपने सिवा और कोई नहीं। परमात्मा कभी किसी के प्रति भेद- भाव नहीं करते। उनकी कृपा या कोप के पीछे हमारे अपने ही सत्कर्म या दुष्कर्म जिम्मेदार होते हैं। जिन्दगी में सुख आएँ अथवा दुःख उनके कारण केवल हम होते हैं। हमारी जिन्दगी की छोटी या बड़ी, सुखद अथवा दुःखद परिस्थितियों के लिए हमारे सिवा कोई भी दूसरा जिम्मेदार नहीं।

जो जीवन की, प्रकृति की, कर्मफल के नियम की, परमेश्वर के समर्थ विधान की इस सच्चाई को जानते हैं, उन्हीं को विवेकवान कहा जा सकता है। अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वीकारने वाले ऐसे कुशल व्यक्ति ही इसे संवारने का सच्चा प्रयत्न कर पाते हैं। अन्यथा और लोग तो अपने गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण अपनी विपन्नताओं का दोष दूसरों के माथे थोपते रहते हैं। इनकी विषम परिस्थितियों के लिए कभी तो भगवान् जिम्मेदार होता है, तो कभी भाग्य, कभी कोई मित्र तो कभी कोई शत्रु। हां जब कोई सुखद परिस्थितियाँ इनके जीवन में आती हैं, तो इनकी अहंता का पारा यकायक चढ़ जाता है। और इसका श्रेय लेने में ये किसी भी तरह से नहीं चूकते। ऐसे लोगों का जीवन हमेशा ही विडम्बना भरी कहानी बना रहता है।

जिन्हें जिन्दगी की आध्यात्मिक चिकित्सा में रुचि या रस है, उनसे समझदारी की अपेक्षा है। इसके लिए वे पूरी ईमानदारी से अपनी जिन्दगी की जिम्मेदारी को स्वीकारें और बहादुरी से इसे निभाएँ। इस रीति को निभाए बगैर महानतम आध्यात्मिक चिकित्सक भी हमारी कारगर चिकित्सा न कर पाएगा। युगऋषि गुरुदेव का कहना था कि कर्मफल विधान आध्यात्मिक चिकित्सा का सर्वमान्य सिद्धान्त है। इसे समझे और स्वीकारे बिना किसी की कोई भी मदद सम्भव नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 27)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Each individual has his own personal perspective of people, places, things and events. On account of the confusion of perspective, one finds the world bad, whereas the other sees only goodness in it. Throw away the cobwebs of your old biased perspectives. Use your third eye of wisdom to see through the illusions of your old world. Let your present wicked world (Kaliyug) destroy itself and in its place create your own Golden Age (Satyug) in your inner psyche. Stop being deluded by the darkness of the world (Tamogun) and focus your vision at the brightness (Satogun). You will find the world changing into heaven.

When you change your field of vision, you will find your disobedient son/ daughter changing into an obedient one. Your worst enemies, quarrelsome wife and hypocritic neighbours will appear totally different. Actually, the factor of negativity in the character or behaviour of a person is usually very small.

Antagonism in the mind of the observer magnifies it manifold. Suppose your husband or wife does not behave as per your expectations because of preoccupation or some other valid reason; when you are not aware of it, you are likely to take it as an affront and become resentful or angry. With the anger, the evil traits lying dormant in the inner recesses of your mind become activated and produce negative mental image of the subject. Darkness makes out a monster out of a bush. Similarly, anger, due to distortion caused by inner turbulence, produces a defiant, disobedient, disrespectful picture of an otherwise simple, innocent person who receives a harsh punishment for a small lapse. On the other hand, this unjust reaction also infuriates the recipient of the undeserved treatment. The counter-reacting angry person too begins to see wickedness, foolishness, cruelty and many other negative traits in the other person. On repetition of such trivial incidents, the two imaginary ghost personalities continue to grow and their confrontations convert two simple – hearted warmly related persons into bitter antagonists.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 48

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...