शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 3)

🔷 इन जलते राष्ट्रीय सत्यों को भारतीय नौजवान वर्ग नहीं समझ पा रहा और न वह तब तक समझ ही पायेगा जब तक प्रयत्नपूर्वक उसके मस्तिष्क में यह विचार नहीं भरे जायेंगे कि फैशनपरस्ती मानसिक न्यूनता का द्योतक है, आन्तरिक दरिद्रता का विज्ञापन है। उसका यह विचार कि बनाव-शृंगार अथवा प्रदर्शनपूर्ण, वेश-विन्यास से वह अपने व्यक्तित्व को ऊंचा कर रहा है—भ्रमपूर्ण है। बाहरी आडम्बरों से विरचित व्यक्तित्व स्वयं इसका गवाह है कि व्यक्ति व्यक्तित्वहीन है, ओछा और बालवृत्ति वाला है। मनुष्य का व्यक्तित्व आत्मा की उच्चता है जो चेहरे पर आकर्षण बन कर बोलती है वस्त्रों की तड़क-भड़क व्यक्तित्व की छटा नहीं है और न उससे किसी के हीन व्यक्तित्व में महानता का समावेश ही होता है। उसे यह भ्रान्त धारणा हृदय से निकाल देनी चाहिए कि वेशविन्यास की विलक्षणता उसे विलक्षण सिद्ध कर सकेगी।

🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।

🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111

बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

👉 रिक्शे वाला:-

🔶 एक बार एक अमीर आदमी कहीं जा रहा होता है तो उसकी कार ख़राब हो जाती है। उसका कहीं पहुँचना बहुत जरुरी होता है। उसको दूर एक पेड़ के नीचे एक रिक्शा दिखाई देता है। वो उस रिक्शा वाले पास जाता है। वहा जाकर देखता है कि रिक्शा वाले ने अपने पैर हैंडल के ऊपर रखे होते है। पीठ उसकी अपनी सीट पर होती है और सिर जहा सवारी बैठती है उस सीट पर होती है ।

🔷 और वो मज़े से लेट कर गाना गुन-गुना रहा होता है। वो अमीर व्यक्ति रिक्शा वाले को ऐसे बैठे हुए देख कर बहुत हैरान होता है कि एक व्यक्ति ऐसे बेआराम जगह में कैसे रह सकता है, कैसे खुश रह सकता है। कैसे गुन-गुना सकता है।

🔶 वो उसको चलने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला झट से उठता है और उसे 20 रूपए देने के लिए बोलता है। रास्ते में वो रिक्शा वाला वही गाना गुन-गुनाते हुए मज़े से रिक्शा खींचता है। वो अमीर व्यक्ति एक बार फिर हैरान कि एक व्यक्ति 20 रूपए लेकर इतना खुश कैसे हो सकता है। इतने मज़े से कैसे गुन-गुना सकता है। वो थोडा इर्ष्यापूर्ण  हो जाता है और रिक्शा वाले को समझने के लिए उसको अपने बंगले में रात को खाने के लिए बुला लेता है। रिक्शा वाला उसके बुलावे को स्वीकार कर देता है।

🔷 वो अपने हर नौकर को बोल देता है कि इस रिक्शा वाले को सबसे अच्छे खाने की सुविधा दी जाए। अलग अलग तरह के खाने की सेवा हो जाती है। सूप्स, आइस क्रीम, गुलाब जामुन सब्जियां यानि हर चीज वहाँ मौजूद थी।

🔶 वो रिक्शा वाला खाना शुरू कर देता है, कोई प्रतिक्रिया, कोई घबराहट बयान नहीं करता। बस वही गाना गुन-गुनाते हुए मजे से वो खाना खाता है। सभी लोगो को ऐसे लगता है जैसे रिक्शा वाला ऐसा खाना पहली बार नहीं खा रहा है। पहले भी कई बार खा चुका है। वो अमीर आदमी एक बार फिर हैरान एक बार फिर इर्ष्यापूर्ण कि कोई आम आदमी इतने ज्यादा तरह के व्यंजन देख के भी कोई हैरानी वाली प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता और वैसे कैसे गुन-गुना रहा है जैसे रिक्शे में गुन-गुना रहा था।

🔷 यह सब कुछ देखकर अमीर आदमी की इर्ष्या और बढती है। अब वह रिक्शे वाले को अपने बंगले में कुछ दिन रुकने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला हाँ कर देता है।

🔶 उसको बहुत ज्यादा इज्जत दी जाती है। कोई उसको जूते पहना रहा होता है, तो कोई कोट। एक बेल बजाने से तीन-तीन नौकर सामने आ जाते है। एक बड़ी साइज़ की टेलीविज़न स्क्रीन पर उसको प्रोग्राम दिखाए जाते है। और एयर-कंडीशन कमरे में सोने के लिए बोला जाता है।

🔷 अमीर आदमी नोट करता है कि वो रिक्शा वाला इतना कुछ देख कर भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। वो वैसे ही साधारण चल रहा है। जैसे वो रिक्शा में था वैसे ही है। वैसे ही गाना गुन-गुना रहा है जैसे वो रिक्शा में गुन-गुना रहा था।

🔶 अमीर आदमी के इर्ष्या बढ़ती चली जाती है और वह सोचता है कि अब तो हद ही हो गई। इसको तो कोई हैरानी नहीं हो रही, इसको कोई फरक ही नहीं पढ़ रहा। ये वैसे ही खुश है, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे रहा।

🔷 अब अमीर आदमी पूछता है: आप खुश हैं ना? वो रिक्शा वाला कहते है: जी साहेब बिलकुल खुश हूँ। अमीर आदमी फिर पूछता है: आप आराम में  हैं ना? रिक्शा वाला कहता है: जी बिलकुल आरामदायक हूँ।

🔶 अब अमीर आदमी तय करता है कि इसको उसी रिक्शा पर वापस छोड़ दिया जाये। वहाँ जाकर ही इसको इन बेहतरीन चीजो का एहसास होगा। क्योंकि वहाँ जाकर ये इन सब बेहतरीन चीजो को याद करेगा।

🔷 अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी को बोलता है की इसको कह दो कि आपने दिखावे के लिए कह दिया कि आप खुश हो, आप आरामदायक हो। लेकिन साहब समझ गये है कि आप खुश नहीं हो आराम में नहीं हो। इसलिए आपको उसी रिक्शा के पास छोड़ दिया जाएगा।”

🔶 सेक्रेटरी के ऐसा कहने पर रिक्शा वाला कहता है: ठीक है सर, जैसे आप चाहे, जब आप चाहे। उसे वापस उसी जगह पर छोड़ दिया जाता है जहाँ पर उसका रिक्शा था।  अब वो अमीर आदमी अपने गाड़ी के काले शीशे ऊँचे करके उसे देखता है।

🔷 रिक्शे वाले ने अपनी सीट उठाई बैग में से काला सा, गन्दा सा, मेला सा कपड़ा निकाला, रिक्शा को साफ़ किया, मज़े में बैठ गया और वही गाना गुन-गुनाने लगा। अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी से पूछता है: “कि चक्कर क्या है। इसको कोई फरक ही नहीं पड रहा इतनी आरामदायक वाली, इतनी बेहतरीन जिंदगी को ठुकरा के वापस इस कठिन जिंदगी में आना और फिर वैसे ही खुश होना, वैसे ही गुन-गुनाना।”

🔶 फिर वो सेक्रेटरी उस अमीर आदमी को कहता है: “सर यह एक कामियाब इन्सान की पहचान है। एक कामियाब इन्सान वर्तमान में जीता है, उसको मनोरंजन (Enjoy) करता है और बढ़िया जिंदगी की उम्मीद में अपना वर्तमान खराब नहीं करता। अगर उससे भी बढ़िया जिंदगी मिल गई तो उसे भी वेलकम करता है उसको भी मनोरंजन (enjoy) करता है उसे भी भोगता है और उस वर्तमान को भी ख़राब नहीं करता। और अगर जिंदगी में दुबारा कोई बुरा दिन देखना पड़े तो वो भी उस वर्तमान को उतने ही ख़ुशी से, उतने ही आनंद से, उतने ही मज़े से, भोगता है मनोरंजन करता है और उसी में आनंद लेता है।”

🔷 बहनों और भाइयों, कामयाबी आपके ख़ुशी में छुपी है, और अच्छे दिनों की उम्मीद में अपने वर्तमान को ख़राब नहीं करें। और न ही कम अच्छे दिनों में ज्यादा अच्छे दिनों को याद करके अपने वर्तमान को ख़राब करना है।

👉 आज का सद्चिंतन 3 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 19)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि 
 
🔶 युग साहित्य का सृजन इतनी बड़ी मात्रा में बन पड़ा। उसका इतनी भाषाओं में अनुवाद हुआ कि उस सारे संग्रह को किसी एक मनुष्य के शरीर जितना भारी तोला जा सकता है। इसी लेखन की हर पंक्ति ऐसी है जिसके सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि किसी ने भारी खोज, गहन मन्थन एवं व्यक्तिगत अनुभव की छत्रछाया में ही लिखा है। सामान्य बुद्धि यही कह सकती है कि एक व्यक्ति कम से कम पाँच जन्मों में अथवा पाँच शरीर से ही इतना साहित्य-सृजन कर सकता है। इस प्रयास को भी यदि कोई चाहे तो सिद्ध स्तर का गिन सकता है।
  
🔷 दूसरा कार्य है— नव सृजन में कुछ कारगर भूमिका निभा सकने योग्य साथी-सहयोगियों के विशालकाय परिकर का एकत्रीकरण। इन दिनों उन सभी की संख्या जो कुछ समय पूर्व पाँच लाख भर थी, अब बढ़कर पच्चीस लाख हो गई है। यह क्रम एक से पाँच, पाँच से पच्चीस, पच्चीस से एक सौ पच्चीस, वाली गुणन-प्रक्रिया के आधार पर द्रुतगति से आगे बढ़ रहा है और आश्वासन दे रहा है कि प्रगति रुकेगी नहीं, क्षेत्रों और देशों की परिधि लाँघते हुए विश्वभर में सज्जनों के संवर्धन की प्रक्रिया पूरी करेगी।
  
🔶 तीसरी सिद्धि है— दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष की असाधारण रणनीति वाली मोर्चा बन्दी। साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए हजारों प्रज्ञा केन्द्रों की स्थापना और उनकी गतिविधियों में नवसृजन की, सत्प्रवृत्ति संवर्धन की रचनात्मक प्रवृत्तियों की अनवरत अभिवृद्धि।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 22

👉 Lotus flower

🔶 The lotus is the most beautiful flower, whose petals open one by one. But it will only grow in the mud. In order to grow and gain wisdom, first you must have the mud --- the obstacles of life and its suffering. ... The mud speaks of the common ground that humans share, no matter what our stations in life. ... Whether we have it all or we have nothing, we are all faced with the same obstacles: sadness, loss, illness, dying and death. If we are to strive as human beings to gain more wisdom, more kindness and more compassion, we must have the intention to grow as a lot, open each petal one by one.

~ Goldie Hawn

👉 शबरी की महत्ता

🔶 शबरी यद्यपि जाति की भीलनी थी किन्तु उसके हृदय में भगवान की सच्ची भक्ति भरी हुई थी। बाहर से वह जितनी गन्दी दीख पड़ती थी, अन्दर से उसका अन्तःकरण उतना ही पवित्र और स्वच्छ था। वह जो कुछ करती भगवान के नाम पर करती भगवान् के दर्शनों की उसे बड़ी लालसा थी और उसे विश्वास भी था कि एक दिन उसे भगवान् के दर्शन अवश्य होंगे। शबरी जहाँ रहती थी उस वन में अनेक ऋषियों के आश्रम थे। उसकी उन ऋषियों की सेवा करने और उनसे भगवान की कथा सुनने की बड़ी इच्छा रहती थी। अनेक ऋषियों ने उसे नीच जाति की होने के कारण कथा सुनाना स्वीकार नहीं किया और श्वान की भाँति दुत्कार दिया। किन्तु इससे उसके हृदय में न कोई क्षोभ उत्पन्न हुआ और न निराशा। उसने ऋषियों की सेवा करने की एक युक्ति निकाल ली।

🔷 वह प्रतिदिन ऋषियों के आश्रम से सरिता तक का पथ बुहारकर कुश-कंटकों से रहित कर देती और उनके उपयोग के लिये जंगल से लकड़ियाँ काटकर आश्रम के सामने रख देती। शबरी का यह क्रम महीनों चलता रहा किन्तु किसी ऋषि को यह पता न चला कि उनकी यह परोक्ष सेवा करने वाला है कौन? इस गोपनीयता का कारण यह था कि शबरी आधी रात रहे ही जाकर अपना काम पूरा कर आया करती थी। जब यह कार्यक्रम बहुत समय तक अविरल रूप से चलता रहा तो ऋषियों को अपने परोक्ष सेवक का पता लगाने की अतीव जिज्ञासा हो उठी । निदान उन्होंने एक रात जागकर पता लगा ही लिया कि यह वही भीलनी है जिसे अनेक  बार दुत्कार कर द्वार से भगाया जा चुका था।

🔶 तपस्वियों ने अन्त्यज महिजा की सेवा स्वीकार करने में परम्पराओं पर आघात होते देखा और उसे उनके धर्म-कर्मों में किसी प्रकार भाग न लेने के लिये धमकाने लगे। मातंग ऋषि से यह न देखा गया। वे शबरी को अपनी कुटी के समीप ठहराने के लिये ले गये। भगवान राम जब वनवास गये तो उन्होंने मातंग ऋषि को सर्वोपरि मानकर उन्हें सबसे पहले छाती से लगाया और शबरी के झूठे बेर प्रेमपूर्वक चख-चखकर खाये।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.7

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 2)

🔶 ट्रांजिस्टर रेडियो तो आज के भारतीय नौजवानों का ‘बगल-बच्चा’ बन गया है। जिसे देखो, बैग की तरह लटकाये, झोले की तरह कन्धे पर डाले, पुस्तक की तरह हाथ में लिए अथवा किसी बड़े पूजा-पात्र की तरह दोनों हाथों में संभाले घूम रहा है, जब कि उनके पास उसका कोई उपयोग नहीं है। महज एक फैशन तथा दिखावा भर है। अन्य नागरिकों को तो छोड़ दीजिए न जाने कितने रिक्शे, तांगे वाले, ट्रांजिस्टर सेटों को अपने तांगों तथा रिक्शों में लटकाये दीखते हैं। इस प्रकार के बचकाने फैशन बनाने अथवा प्रदर्शनों में लोग कौन सा सौन्दर्य और कौन-सी विशेषता समझते हैं? उन्हें अपने तथा अपनी इन क्रियाओं के बीच असंगति का भी तो बोध होता नजर नहीं आता। वे यह बात तनिक भी तो अनुभव नहीं कर पाते कि उनका यह मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन उनको उपहासास्पद बना देता है।

🔷 पहनावों तथा कपड़ों का फैशन तो आज पराकाष्ठा से भी आगे निकल गया है। कपड़ों की किस्मों की यदि आज सूची बनाई जाये तो वह एक बड़े पुराण से भी मोटा ग्रन्थ बन जायेगा और इससे भी मोटी वस्त्रों की सिलाई के प्रकारों की सूची बनेगी। आज शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत फूल अथवा फिल्म ऐक्टर-ऐक्ट्रैस हो। इतना ही नहीं साधु-सन्तों के रामनामी दुपट्टों की तरह अभिनेताओं के नामांकित कपड़े पहनने में लोग गौरव अनुभव करते हैं। फिल्मों के दृश्य तक आज नौजवानों के वस्त्रों पर अंकित देखे जा सकते हैं। जहां कभी अधिक से अधिक कपड़ों पर फूल-पत्तियां हंस, मयूरों अथवा पेड़ पौधों की छाप हुआ करती थी और जिनको भी भद्र लोग पसन्द नहीं करते थे, वहां आज अश्लील फिल्मों के अश्लील चित्र छपे दिखलाई देते हैं और नौजवान नागरिक उन्हें शौक से पहनते और शान समझते हैं। न जाने क्या हो गया है इस भारत को—भारत के नौजवान वर्ग को?

🔶 आज का भारतीय नौजवान यह क्यों नहीं सोच पाता कि उसका देश गरीब है, आज उसे उसकी फैशनपरस्ती की आवश्यकता नहीं है, उसे जरूरत है उसकी मेहनत, मशक्कत और परिश्रम-परिश्तिस की! उसे इस बात से आत्मग्लानि क्यों नहीं होती कि आज उसका अर्धनंगा भूखा राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अन्न की भीख मांग रहा है और वह इस प्रकार के फिजूलखर्च फैशन प्रदर्शन में अन्धा बना हुआ है! वह यह जानने समझने की कोशिश क्यों नहीं करता कि वह जिस देश का नागरिक है और जिसके उत्थान पतन का कुछ दायित्व उसके कन्धों पर भी है, उसकी औसत आय पांच-छः आना प्रति-दिन से अधिक नहीं है। आज उसके टूटी सड़कों और फूटे मकानों वाले देश में टेरालीन, डेकरौन और नाइलौन जैसे कपड़ों की क्या शोभा है? धूल उड़ाती गलियों और दुर्गन्धित बस्तियों के बीच उसके इन वस्त्रों की क्या संगति है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 110

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

👉 माँ की ममता

🔷 75 साल की उस बुढ़िया माँ का वजन लगभग 40 किलो होगा! आज जब तबियत बिगड़ने पर वो डॉक्टर को दिखाने गयी!

🔶 डॉक्टर ने कहा ‘ माताजी आप हेल्थ का ख्याल रखिये! आप का वजन जरूरत से ज्यादा कम है! आप खाने में जूस, सलाद, दूध, फल, घी, मेवा और हेल्थी फ़ूड लिजियें! नहीं तो आपकी सेहत दिनों दिन गिरती जायेगी और हालत नाजुक हो जायेंगे! ‘

🔷 उसने भारी मन से डॉक्टर की बात को सुना और बाहर निकल कर सोचने लगी, इतनी महंगाई में ये सब कहाँ से आएगा……??? और पिछले पचास सालों में, फ्रूट, घी, मेवा घर में लाया कौन है….???

🔶 बहुत ही मामूली पेंशन से जो थोडा बहुत पैसा मिलता है उससे घर के जरुरी सामान तो पति ले आतें है, लेकिन फल, जूस, हरी सब्जी, ये सब पति ने कभी ला कर नहीं दिया,….और खुद भी कभी ये सब खरीदने की हिम्मत नहीं कर सकी….क्यूंकि जब भी मन करता कुछ खाने का, खाली पर्स हमेशा मुंह चिढाने लगता….

🔷 शहर में … मामूली सी नौकरी में और जिंदगी की गहमागहमी में सारी जमा पूंजी, पति का PF, घर की सारी अमानत, संपदा, गहने जेवर सब एक बेटे और दो बेटियों की परवरिश, पढाई लिखाई शादी में में सब कुछ खत्म हो गया…

🔶 दूर दिल्ली में रह रहा एक बहुत बड़ी कंपनी में मैनेजर और मोटी तनख्वाह उठा रहा बेटा भी तो खर्चे के नाम पर सिर्फ पांच सौ रुपये देता है…वो भी महीने के….. बेटियों से अपने दुःख माँ ने सदा छुपाये है…उन्हें कभी अपने गमो में शामिल नहीं किया…आखिर ससुराल वाले क्या सोचेंगे…..???

🔷 अब बेटे के भेजे इन पांच सौं रुपये में बूढ़े माँ बाप तन ढके या मन की करें ????? उसने सोचा चलो एक बार बेटे को डॉक्टर की रिपोर्ट बता दी जाए..

🔶 उसने बेटे को फ़ोन किया और कहा – बेटा डॉक्टर ने बताया है की विटामिन, खून की की कमी, कमजोरी से से चक्कर आये थे….इसी लिए खाने में सलाद, जूस, फ्रूट, दूध, फल, घी, मेवा लेना शुरू करो!

🔷 बेटा – “माँ आप को जो खाना है खाओ, डॉक्टर की बात ना मानों….!” माँ ने कहा – बेटा, थोड़े पैसे अगर भेज देता तो ठीक रहता…..!

🔶 बेटा – ” माँ इस माह मेरा बहुत खर्चा हो रहा है, कल ही तेरी पोती को मैंने फिटनेस जिम जोईन कराया है, तुझे तो पता ही है, वो कितनी मोटी हो रही है, इसी लिए जिम जोईन कराया है…….उसके महीने के सात हजार रुपये लगेंगे…………..जिसमे उसका वजन, चार किलो हर माह कम कराया जाएगा….. और कम से कम पांच माह तो उसे भेजना ही होगा…….पैंतीस हजार का ये खर्चा बैठे बिठाये आ गया….अब जरुरी भी तो है ये खर्चा…!!

🔷 आखिर दो तीन साल में इसकी शादी करनी है और आज कल मोटी लड़कियां, पसंद कोई करता नहीं…..!! ”

🔶 माँ ने कहा – ” हाँ बेटा ये तो जरुरी था…..कोई बात नहीं वैसे भी डॉक्टर लोग तो ऐसे ही कुछ भी कहतें रहते है…..चक्कर तो गर्मी की वजह से आ गयें होंगे, वरना इतने सालों में तो कभी ऐसा नहीं हुआ…..खाना तो हमेशा से यही खा रही हूँ मैं…!!!”

🔷 बेटा – “हाँ माँ…..अच्छा माँ अभी मैं फोन रखता हूँ ….बेटी के लिए डाइट चार्ट ले जाना है और कुछ जूस, फ्रूट और डायट फ़ूड भी ….आप अपना ख्याल रखना!”
फोन कट गया….

🔶 माँ ने एक ग्लास पानी पिया… और साडी पर फोल लगाने मे लग गयी…. एक साड़ी में फोल लगाने के माँ को पन्द्रह रुपये मिलेंगे….....

🔷 माँ के पास आज साड़ी में फोल लगाने के तीन आर्डर है…माँ ने मन ही मन श्री गणेश का शुक्रिया अदा किया क्यूंकि आज वो आधा किलो लड्डू खरीद ही लेंगी गणेश जी की पूजा के लिए इन पैसो से…और मन ही मन अपने बेटे की सुखी और समृद्ध जिंदगी के लिए प्रभु श्री गणेश से प्रार्थना भी की!!

👉 आज का सद्चिंतन 2 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 18)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि 
 
🔷 इस प्रयोग के अन्तर्गत अपना आहार-विहार वस्त्र-विन्यास रहन-सहन व्यवहार, अभ्यास ऐसा रखा गया जो न्यूनतम था। आहार इतना सस्ता जितना कि देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को मिलता है। वस्त्र ऐसे जैसे कि श्रमिक स्तर के लोग पहनते हैं। महत्त्वाकांक्षा न्यूनतम। आत्म प्रदर्शन ऐसा जिसमें किसी सम्मान, प्रदर्शन और अखबारों में नाम छपने जैसी ललक के लिए कोई गुंजायश न रहे। व्यवहार ऐसा जैसा बालकों का होता है। यह पृष्ठभूमि बना लेने के उपरान्त शारीरिक और मानसिक श्रम इतना जितना कि कोई पुरुषार्थ परायण कर सकता है, इसे पूजा उपासना तो नहीं पर जीवन साधना अवश्य कहा जा सकता है।    
  
🔶 इसके उपरान्त उपासना की निर्धारित पद्धति की बारी आई। उसमें श्रद्धा-विश्वास का गहरा पुट रहा और ध्यान रहा कि किसी भी अधिक आवश्यक काम के बहाने उसे किसी भी प्रकार चुकाए जाने का अवसर न मिलने पाए। चिन्तन निजी लाभ का नहीं, परमार्थ सम्पादन का ही रहा। यही कारण है कि अपने पास निजी कहे जाने योग्य एक कानी-कौड़ी की भी कोई संचित सम्पदा नहीं है। पैतृक सम्पदा बड़ी थी पर उसका भी एक-एक पैसा उपयोगी परमार्थिक इमारतों में लगा दिया। यह सारा जंजाल सिर पर से उतर जाने के उपरान्त व्यामोह से विरक्त मन इतना खाली हो गया जिसका ‘‘वैक्यूम’’ एक सशक्त चुम्बक की तरह ईश्वरीय अनुकम्पा की अजस्र वर्षा करने लगा। सामर्थ्य भी इतनी आ धमकी जिसके लिए अपनी ओर से नगण्य जितना ही प्रयत्न बन पड़ा।
  
🔷 अध्यात्म सिद्धियों के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। क्या वे हमें हस्तगत हुईं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है ‘‘हाँ’’। उनमें से यहाँ कुछ ऐसे प्रसंगों की ही चर्चा की जा सकती है जो सर्वविदित हैं, जिनके लिए हर किसी को अपनी आँखें और अपनी निज की जानकारी ही साक्षी रूप में पर्याप्त हो सकती है। उसके लिए किसी प्रकार की खोजबीन करने की कदाचित ही किसी को आवश्यकता पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 21

👉 Life will give you back....

A son and his father were walking on the mountains.
Suddenly, his son falls, hurts himself and screams.
To his surprise, he hears the voice repeating,
somewhere in the mountain.
Curious, he yells: ‘‘Who are you?’’
He receives the answer: ‘‘Who are you?’’
And then he screams to the mountain: ‘‘I admire you!’’
The voice answers: ‘‘I admire you!’’
Angered at the response, he screams: ‘‘Coward!’’
He receives the answer: ‘‘Coward!’’
He looks to his father and asks: ‘‘What’s going on?’’
The father smiles and says: ‘‘My son, pay attention.’’
Again the man screams: ‘‘You are a champion!’’
The voice answers: ‘‘You are a champion!’’
The boy is surprised, but does not understand.
Then the father explains: ‘‘People call this ECHO, but really this is LIFE.
It gives you back everything you say or do.
Our life is simply a reflection of our actions.
If you want more love in the world, create more love in your heart.
If you want more competence in your team, improve your competence.
This relationship applies to everything, in all aspects of life;
Life will give you back everything you have given to it.

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 1)

🔷 यह बात सही है कि कोई भी मनुष्य नहीं चाहता है कि वह किसी दूसरे की दृष्टि में भद्दा, कुरूप अथवा अनाकर्षक लगे। प्रत्येक व्यक्ति की यही इच्छा रहती है कि वह देखने वालों की नजरों में समाये। लोग उसे देख कर अनुभव करें कि यह कायदे-करीने का विशेष व्यक्ति है। यथा-शक्य दर्शनीय बनने का लोग प्रयत्न भी करते हैं।

🔶 आकर्षक दिखाई देने की इच्छा अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। हर प्रबुद्ध प्राणी सौन्दर्य-प्रेमी होता है। जब हम या आप ऐसी वेश-भूषा में दीखते हैं जो आकर्षक हो तो एक प्रकार से लोगों की सौन्दर्य दृष्टि को सन्तुष्ट करते हैं, उन्हें प्रसन्न करते हैं, जिससे सद्भाव एवं सौहार्द का वातावरण उत्पन्न होता है। समाज में स्वच्छता, सुन्दरता और समीचीनता की प्रवृत्तियां बढ़ती हैं। इसलिए भली प्रकार का रहन-सहन किसी प्रकार से आलोचना का विषय नहीं माना जाता।

🔷 किन्तु जब यही अच्छी बात अपनी अपेक्षित सीमा के बाहर चली जाती है, तब बुराई की संज्ञा पाकर आक्षेप का विषय बन जाती है।

🔶 आज ढंग से रहने-सहने का अर्थ फैशन मान लिया गया है। अधिक से अधिक प्रदर्शन के साथ सजे बजे रहने में ही सुन्दरता, सुरूपता तथा आकर्षण का निवास समझना आज की एक विशेष अल्पज्ञता है। अंग्रेजी का ज्ञान तो दूर—भाषा का भी एक अक्षर न जानने वाले निरक्षर व्यक्ति तक कोट-पैंट, टाई और हैट-बूट में देखे जाते हैं। जाने कितने लोग बेजरूरत सैर-सपाटे और दिखावे के ही लिए मोटरें, बघ्घियां, हाथी, घोड़े आदि सवारियों को रखा करते हैं। अनेक बड़े आदमी अपनी मोटरकारों में रेडियो, ट्रांजिस्टर लगाये हुये शहर की सड़कों पर बजाते हुए चले जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 109
 

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

👉 एहसान

🔶 एक बहेलिया था। एक बार जंगल में उसने चिड़िया फंसाने के लिए अपना जाल फैलाया। थोड़ी देर बाद ही एक उकाब उसके जाल में फंस गया। वह उसे घर लाया और उसके पंख काट दिए। अब उकाब उड़ नहीं सकता था, बस उछल उछलकर घर के आस-पास ही घूमता रहता।

🔷 उस बहेलिए के घर के पास ही एक शिकारी रहता था। उकाब की यह हालत देखकर उससे सहन नहीं हुआ। वह बहेलिए के पास गया और कहा- ”मित्र, जहां तक मुझे मालूम है, तुम्हारे पास एक उकाब है, जिसके तुमने पंख काट दिए हैं। उकाब तो शिकारी पक्षी है। छोटे-छोटे जानवर खा कर अपना भरण-पोषण करता है। इसके लिए उसका उड़ना जरूरी है। मगर उसके पंख काटकर तुमने उसे अपंग बना दिया है। फिर भी क्या तुम उसे मुझे बेच दोगे?

🔶 बहेलिए के लिए उकाब कोई काम का पक्षी तो था नहीं, अतः उसने उस शिकारी की बात मान ली और कुछ पैसों के बदले उकाब उसे दे दिया। शिकारी उकाब को अपने घर ले आया और उसकी दवा-दारू करने लगा। दो माह में उकाब के नए पंख निकल आए। वे पहले जैसे ही बड़े थे। अब वह उड़ सकता था।

🔷 जब शिकारी को यह बात समझ में आ गई तो उसने उकाब को खुले आकाश में छोड़ दिया। उकाब ऊंचे आकाश में उड़ गया। शिकारी यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उकाब भी बहुत प्रसन्न था और शिकारी का बहुत कृतज्ञ था।

🔶 अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उकाब एक खरगोश मारकर शिकारी के पास लाया। एक लोमड़ी, जो यह सब देख रही थी, उकाब से बोली- ”मित्र! जो तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकता उसे प्रसन्न करने से क्या लाभ?“

🔷 इसके उत्तर में उकाब ने कहा- ”व्यक्ति को हर उस व्यक्ति का एहसान मानना चाहिए, जिसने उसकी सहायता की हो और ऐेसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो हानि पहुंचा सकते हों।“

🔶 निष्कर्ष- व्यक्ति को सदा सहायता करने वाले का कृतज्ञ रहना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 1 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 17)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि   
 
🔶 उपासना का अपना प्रयोगक्रम चला और उसे अनेकानेक परीक्षणों की कसौटियों पर कसे जाने के उपरान्त सही एवं सशक्त पाया गया। इसी आधार पर अब यह सोचने, कहने और करने की व्यवस्था बन गई है कि संसार को एक नया सन्देश दिया जा सके कि उपेक्षित, तिरस्कृत, विडम्बनाग्रस्त अध्यात्म को यदि पुनर्जीवित किया जा सके तो विश्व चेतना के साथ एक उच्चस्तरीय माहौल जुड़ सकता है। तब भौतिक विज्ञान के लिए भी यह न सोचना पड़ेगा कि वह लाभ देने की तुलना में हानि, विनाश के सरंजाम अधिक जुटाता है। इसलिए उसके उपयोग को आशंका एवं भयानकता के साथ जुड़ा हुआ सोचा जाए। वस्तुत: बढ़े हुए विज्ञान के चरणों को आध्यात्मिक प्रगति के साथ जोड़ा जा सके तो हम भूतकाल के सतयुग की अपेक्षा और भी अच्छी स्थिति में पहुँच सकते हैं। यों जिस तरह नया आधार सँजोया गया है, उसे देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि हम और भी अधिक ऊँचे स्तर का ‘‘महासतयुग’’ अगले दिनों अपनी इसी धरती पर उतारकर रहेंगे।
  
🔷 अपने समय का मनुष्य बहुत बौना है। इस बौनेपन को संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में भी लिया जा सकता है, होता यही रहा कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को भी संकीर्ण-स्वार्थों के लिए तथाकथित समर्थ लोगों ने प्रयुक्त किया और असंख्य समस्याएँ उत्पन्न कीं। ठीक इसी प्रकार प्रपंचों से बचकर जो अध्यात्म किसी लँगड़े-लूले रूप में शेष रह गया था उसे भी अपने अथवा अपनों की सम्पन्नता, यशलिप्सा, असाधारण सफलता आदि के लिए ही प्रयुक्त किया जाता रहा। तथाकथित सिद्ध पुरुष भी अपने को वरिष्ठ सिद्ध करने और जिन कुपात्रों ने उन्हें जिस तिस प्रकार प्रसन्न कर लिया, उन्हें उस अध्यात्म द्वारा अधिकाधिक सम्पन्न बनाने में लगे रहे। उस अनुदान का उपयोग निजी विलासिता एवं महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के अतिरिक्त किसी लोकोपयोगी काम में न हो पाया।
  
🔶 अपने प्रयोग में आरम्भ से ही यह व्रतशीलता धारण की गई कि परम सत्ता के अनुग्रह से जो भी मिलेगा उसे उसी के विश्व उद्यान को अधिक श्रेष्ठ, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए ही खर्च किया जाता रहेगा। अपना निजी जीवन मात्र ब्राह्मणोचित निर्वाह भर से काम चला लेगा। औसत नागरिक स्तर से बढ़कर अधिक सुविधा, प्रतिष्ठा आदि की किसी ललक को पास में न फटकने दिया जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 20

👉 The Paradoxical Commandments

🔶 People are illogical, unreasonable, and self-centered. Love them anyway. If you do good, people will accuse you of selfish ulterior motives. Do good anyway. If you are successful, you will win false friends and true enemies. Succeed anyway. The good you do today will be forgotten tomorrow. Do good anyway. Honesty and frankness make you vulnerable. Be honest and frank anyway.

🔷 The biggest men and women with the biggest ideas can be shot down by the smallest men and women with the smallest minds. Think big anyway. What you spend years building may be destroyed overnight. Build anyway. People really need help but may attack you if you do help them. Help people anyway. Give the world the best you have and you’ll get kicked in the teeth. Give the world the best you have anyway.

📖 Kent M. Keith

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 4)

🔶 बहुत से धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इसी श्रेणी में आते हैं। सीता-राम, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु आदि युगल देवों के चित्र बहुधा बड़े ही अश्लील रूप में, अर्धनग्न या गन्दे हाव भावों के साथ मिलते हैं। चित्रकार एवं प्रकाशक का इनके पीछे क्या उद्देश्य रहता है इसकी हम चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन साफ रूप से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अन्य भद्दे चित्रों की तरह ये चित्र भी मनुष्य को भद्दी प्रेरणा देते हैं। बहुत से मन्दिर में देव मूर्तियां भी अश्लील स्थिति में बनी रहती हैं, वे भी इसी श्रेणी में आती हैं।

🔷 कोई भी चित्र, दृश्य चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक कलाकृति हो या किसी चलचित्र का अंश यदि वह अश्लील, भद्दा और फूहड़ है तो उससे बचने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इनसे मनुष्य में पाशविक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता, जागृत होती हैं। दूषित कामनायें भड़क उठती हैं, गन्दी प्रेरणायें मिलती हैं जो मनुष्य के चरित्र-आचरण, स्वभाव, प्रकृति को दूषित बना देते हैं।

🔶 अपने निवास स्थान, अध्ययन कक्ष, दुकान कहीं के भी लिए आदर्श चित्रों का चुनाव करें। जिन पर उठते बैठते, चलते फिरते हर समय आपकी नजर पड़ती रहे। इनसे आप को उत्कृष्ट प्रेरणा मिलेगी। अच्छे चित्र, अच्छी पुस्तक का प्रभाव तो उसे पढ़ने उस पर मनन चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गांधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आंख मीच लें और अच्छाई को देखें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 139

शनिवार, 29 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 16)

👉 लेखक का निजी अनुभव  
 
🔷 साधारण स्तर के नर वानर कोल्हू के बैल की तरह पिसते और पीसते रहकर जिन्दगी के दिन गुजार देते हैं। पर जब भीतर से उत्कृष्टता का पक्षधर उल्लास उभरता है तो अन्तराल में बीज रूप में विद्यमान दैवी क्षमताएँ, जागृत, सक्रिय होकर अपनी महत्ता का ऐसा परिचय देने लगती हैं जिसे अध्यात्म का वह चमत्कार कहा जा सकता है, जो भौतिक शक्तियों की तुलना में कहीं अधिक समर्थ है।
  
🔶 उपासना प्रकरण में श्रद्धा-विश्वास की शक्ति ही प्रधान है। वही उस स्तर की बन्दूक है जिस पर किसी भी फैक्टरी में विनिर्मित कारतूस चलाए जा सकते हैं। उस दृष्टि से मात्र गायत्री मंत्र ही नहीं, साधक की आस्था के अनुरूप अन्यान्य मंत्र एवं उपासना विधान भी अपनी सामर्थ्य का वैसा ही परिचय दे सकते हैं। श्रद्धा और विश्वास के अभाव में उपेक्षापूर्वक अस्त-व्यस्त मन से कोई भी उपासना क्रम अपनाया जाए, असफलता ही हाथ लगेगी।
  
🔷 परीक्षण के लिए प्रयोगशाला की तथा उसके लिए आवश्यक यन्त्र उपकरणों की जरूरत पड़ती है। इस सन्दर्भ में अच्छाई एक ही है कि मानव शरीर में विद्यमान चेतना ही उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर देती है, जो अत्यन्त सशक्त प्रयोग परीक्षणों के लिए भौतिक विज्ञानियों को मूल्यवान यन्त्र उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशाला को जुटाने पर सम्भव होते हैं।
  
🔶 इन दिनों विज्ञान के प्रतिपादन पत्थर की लकीर बनकर जन-जन की मान्यताओं को अपने प्रभाव क्षेत्र में समेट चुके हैं। आज की मान्यताएँ और गतिविधियाँ उसी से आच्छादित हैं और तदनुरूप प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर रही हैं। अध्यात्म का स्वरूप विडम्बना स्तर का बनकर रह गया है, फलस्वरूप उसका न किसी साधनारत पर प्रभाव पड़ता है और न वातावरण को उच्चस्तरीय बनाने में कोई सहायता ही मिल पाती है। इस दुर्गति के दिनों से यही उपयुक्त लगा है कि यदि विज्ञान के प्रत्यक्षवाद को, यथार्थता को जिस प्रकार अनुभव कर लिया गया है, उसी प्रकार अध्यात्म को भी यदि सशक्त एवं प्रत्यक्ष फल देने वाला माना जा सकने का सुयोग बन सके तो समझना चाहिए कि सोना और सुगन्ध के मिल जाने जैसा सुयोग बन गया। विज्ञान शरीर और अध्यात्म प्राणचेतना मिलकर काम कर सकें तो समझना चाहिए कि सब कुछ जीवन्त हो गया। एक प्राणवान दुनियाँ समग्र शक्ति के साथ नए सिरे से नए कलेवर में उद्भूत हो गई। न विज्ञान झगड़ालू रहा और अध्यात्म के साथ जो कुरूपता जुड़ गई है, उसके लिए कोई गुंजाइश ही शेष रह गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 19

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 3)

🔷 चित्र दर्शन की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझकर ही हमारे पूर्वजों ने नित्य मन्दिरों में भगवान की मूर्ति के दर्शन, साधु महात्माओं के दर्शनों का विधान बनाया होगा। एक भारतीय नागरिक का धर्म कर्तव्य है कि वह प्रातः सायं भगवान् तथा गुरुजनों के दर्शन करें उन्हें प्रणाम करें। सोने पूर्व, उठने पर शुभ दर्शन एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे धार्मिक चित्र बहुत समय से हमें उच्च आदर्शों, सामाजिक मर्यादाओं त्याग, वैराग्य, संयम, बल, पौरुष, कर्तव्य आदि की उत्कृष्ट प्रेरणा देकर आत्म-विकास की ओर अग्रसर करते रहे हैं।

🔶 खेद है आज कला के नाम पर, चलचित्रों के माध्यम से, धन के लोभ के लिये समाज में बहुत ही भद्दे अश्लील चित्रों की बाढ़ सी आ गई है। यत्र-तत्र बाजार में इस तरह के चित्र अधिक मिलते हैं जिनमें दूषित हाव-भाव, भड़कीले पोशाक शारीरिक अंगों का फूहड़ प्रदर्शन मुख्य होते हैं। सिनेमा में तो अभिनेता और अभिनेत्रियों के अर्धनग्न शरीर उनकी अश्लील मुद्रायें भड़काने वाले तथा कथित ‘ऐक्टिंग‘ दर्शक पर कैसा प्रभाव डालता होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। समाज में बढ़ती हुई अश्लीलता, फूहड़पन, फैशनपरस्ती का एक कारण सिनेमा में दिखाये जाने वाले भद्दे चित्र भी हैं।

🔷 बाजार में खुले आम इस तरह की पत्र-पत्रिकायें बिकती देखी जा सकती हैं जिनमें बहुत ही गन्दे उत्तेजित चित्र होते हैं। भोले-भाले, अनुभवहीन यौवन में पैर रखने वाले युवक इनसे बहुत जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं। पैसा खर्च करके खरीदते हैं लेकिन ये गन्दे चित्र उनमें कामोत्तेजना भड़काने, कई दुर्गुण पैदा करने का बहुत बड़ा काम करते हैं। एक बुराई से अनेकों बुराइयां पैदा होती हैं और पतन का पथ प्रशस्त बन जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 138

👉 आज का सद्चिंतन 29 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 September 2018


गुरुवार, 27 सितंबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 September 2018


👉 उपहास व आलोचना

🔶 एक दिन स्कूल टीचर ने बोर्ड पर लिखा :
9×1=7
9×2=18
9×3=27
9×4=36
9×5=45
9×6=54
9×7=63
9×8=72
9×9=81
9×10=90

🔷 जब उन्होने पूरा लिख लिया, उन्होने विद्यार्थियों की तरफ देखा और पाया कि सभी विद्यार्थी उन पर हँस रहे हैं, क्योंकि प्रथम गुणांक गलत था!

🔶 फिर टीचर ने कहा कि,

🔷 "मैने पहला वाला जान बूझ कर गलत लिखा, क्योंकि मै चाहती थी कि आप आज बहुत महत्वूर्ण बात सीखें।

🔶 मैं चाहती थी कि आप जानें कि संसार में आप के साथ कैसा व्यवहार होगा आपने देखा, कि मैने नौ बार सही लिखा, पर किसी ने मुझे इसके लिये बधाई नही दी; अपितु मेरी एक गलती पर आप सभी हँसे, और मेरा उपहास किया. यही सीख है...:

🔷 यह संसार आपकी हजार बार अच्छाई की तारीफ नही करेगा, परन्तु आपके द्वरा की गयी गलती की आलोचना (उपहास) अवश्य करेगा...

🔶 परन्तु इससे आपको हताश व निराश होने की आवश्यकता नही है, सदैव उपहास व आलोचना से ऊपर उठें मजबूत बनें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 September 2018


👉 दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन (अन्तिम भाग)

🔶 इस समस्या का हल करने के लिए यह आवश्यक प्रतीत हुआ है कि विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन के साथ-साथ एक छोटा सहायक आन्दोलन और भी चालू रखा जाय। जिससे जो लोग आदर्श विवाहों की पद्धति अपनाने के लिए तैयार न हो सकें उन्हें उस सहायक आन्दोलन के किसी अंश के साथ सहमत करने का प्रयत्न किया जाय। किसी न किसी बात पर यदि व्यक्ति को सहमत कर लिया जाय तो विदाई के समय मधुरता बनी रहती है और आगे के प्रेम सम्बन्धों में अन्तर नहीं आता। आज की थोड़ी सहमति आगे चलकर बड़ी सहमतियों के रूप में परिणत हो सकती है। अतएव एक सरल आन्दोलन भी साथ-साथ चलते रहने की आवश्यकता अनुभव की गई है।

🔷 इस सहायक आन्दोलन का नाम है—"दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन" यों इसकी उपयोगिता, आवश्यकता एवं महत्ता भी किसी प्रकार कम नहीं। समाज निर्माण एवं सुधार के लिए दूसरा सहायक आन्दोलन के अंतर्गत आने वाले काम भी कम महत्व के नहीं हैं। चरित्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण एवं समाज निर्माण में इनका भी भारी योगदान रहेगा। पर सहायक आन्दोलन उसे इसलिए कहा गया है कि उसमें बताये हुये दस कार्यों में से किसी न किसी के लिये कोई भी व्यक्ति आसानी से सहमत किया जा सकता है और बिना अधिक कठिनाई के आन्दोलन में सम्मिलित होने वाला, कोई एक प्रतिज्ञा लेने वाला बन सकता है।
दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन के अंतर्गत दस कार्यक्रम रखे गये हैं—

माँसाहार— माँस, मछली, अण्डे एवं काटे हुए पशुओं के चमड़े का उपयोग।
नशेबाजी— तम्बाकू, भाँग, गाँजा, अफीम, शराब आदि नशों का सेवन।
पशुबलि— देवी देवताओं के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की हत्या।
मृत्यु भोज— मृतक के नाम पर धूमधाम भरी दावतों का अपव्यय।
ऊँच-नीच— गुणों की अपेक्षा पद, वंश, जाति के कारण किसी को ऊँचा या नीच मानना।
नारी तिरस्कार— पुरुष की तुलना में नारी का गौरव, महत्व, सम्मान या अधिकार कम मानना।
बेईमानी— चोरी, छल, जुआ, समर्थ होते हुए भी अपने लिये भिक्षा याचना अनीति एवं बिना परिश्रम की कमाई।
अपव्यय— फैशन, जेवर, आडम्बर, विलासिता एवं व्यसनों की फिजूलखर्ची।
अन्ध विश्वास— भूत-पलीत, टोना, टोटके शकुन-अपशकुन जैसी मूढ़ मान्यतायें।
असभ्यता— गाली-गलौज, गन्दगी, आलस-अशिष्टता, कृतघ्नता, आवेश जैसे दुर्गुण।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 47

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1965/July/v1.47

👉 Living The Simple Life (Last Part)

🔶 After a wonderful sojourn in the wilderness, I remember walking along the streets of a city which had been my home for a while. It was 1 p.m. Hundreds of neatly dressed human beings with pale or painted faces hurried in rather orderly lines to and from their places of employment. I, in my faded shirt and well-worn slacks, walked among them. The rubber soles of my soft canvas shoes moved noiselessly along beside the clatter of trim, tight shoes with stilt-like heels. In the poorer section I was tolerated. In the wealthier section some glances seemed a bit startled and some were disdainful.

🔷 On both sides of us as we walked were displayed the things we can buy if we are willing to stay in the orderly lines day after day, year after year. Some of the things are more or less useful, many are utter trash. Some have a claim to beauty, many are garishly ugly. Thousands of things are displayed - and yet, my friends, the most valuable are missing.
Freedom is not displayed, nor health, nor happiness, nor peace of mind. To obtain these things, my friends, you too may need to escape from the orderly lines and risk being looked upon disdainfully.

🔶 To the world I may seem very poor, walking penniless and wearing or carrying in my pockets my only material possessions, but I am really very rich in blessings which no amount of money could buy - health and happiness and inner peace.

The simplified life is a sanctified life,
Much more calm, much less strife.
Oh, what wondrous truths are unveiled -
Projects succeed which had previously failed.
Oh, how beautiful life can be, Beautiful simplicity.

***END***

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 15)

👉 लेखक का निजी अनुभव
 
🔶 मन्त्र विज्ञान के सम्बन्ध में जितना कुछ पढ़ा, सुना और गुना था, उसके आधार पर प्रारम्भिक दिनों में ही यह विश्वास जम गया था कि आदि शक्ति के नाम से जानी जाने वाली गायत्री की श्रेष्ठता-वरिष्ठता असंदिग्ध है। संचित संस्कार और संबद्ध वातावरण भी इसी की पुष्टि करते रहे। उपासना क्रम सरल भी लगा और उत्साहवर्धक भी। गाड़ी चली सो अपनी पटरी पर आगे बढ़ती और लुढ़कती ही चली गई। तब से अब तक न उसमें विराम लिया और न कोई अवरोध ही आड़े आया। अस्सी वर्ष की आयु होने तक वह मान्यता, भावना-श्रद्धा आगे ही आगे बढ़ती चली आई है।
  
🔷 मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन यापन कैसे किया जा सकता है? उसके साथ जुड़ी हुई मर्यादाओं का परिपूर्ण निर्वाह कैसे हो सकता है और वर्जनाओं से कैसे बचा जा सकता है? यह समझ अन्तराल की गहराई से निरन्तर उठती रही और उसका परिपालन भी स्वभाव का अंग बन जाने पर बिना किसी कठिनाई के होता रहा। गुण, कर्म, स्वभाव, चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में जो तथ्य गहराई तक उतरकर परिपक्व हो जाते हैं, वे छोटे-मोटे आघातों से डगमगाते नहीं। देखा गया कि सघन संकल्प के साथ जुड़ी हुई व्रतशीलता अनायास ही निभती रहती है। सो सचमुच बिना किसी दाग-धब्बे के निभ भी गई।
  
🔶 ईश्वर के प्रति सुनिश्चित आत्मीयता की अनुभूति उपासना, जीवन में शालीनता की अविच्छिन्नता अर्थात् ‘‘साधना’’ तथा करुणा और उदारता से ओतप्रोत अन्तराल में निरन्तर निर्झर की तरह उद्भूत होती रहने वाली ‘‘आराधना’’, यही है वह त्रिवेणी जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है। उस संगम तक पहुँचने पर कल्मष कषायों, दोष-दुर्गुणों के प्रवेश कर सकने जितनी गुंजायश भी शेष नहीं रहती। त्रिपदा कही जाने वाली गायत्री, प्रज्ञा, मेधा, और श्रद्धा बनकर इस स्तर तक आत्मसात हो गई कि लगने लगा कि सचमुच ही वैसा मनुष्य जीवन उपलब्ध हुआ है। जिसे सुर दुर्लभ कहा और देवत्व के अवतरण जैसे शब्दों से जिसका परिचय दिया जाता रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 18

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 2)

🔶 शान्त गम्भीर मुद्रा में महान् तत्व के चिंतन में लीन किसी महापुरुष का चित्र देखकर उससे मनुष्य को गम्भीरता शान्ति की प्रेरणा मिलती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देख कर हृदय में शौर्य और साहस के भाव उत्पन्न होते हैं। किसी जनसेवी, परमार्थ परायण शहीद की प्रतिमा देख कर समाज के लिए मर मिटने की भावना जागृत होती है। किसी देवी-देवता या अवतार की प्रतिमा देखकर, किसी मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर में जाने पर, परमात्मा और उसके दिव्य गुणों का स्मरण होता है। ठीक इसी तरह भद्दे अश्लील कहे जाने वाले, अर्द्धनग्न, असामाजिक, हाव भाव मुद्रा तथा शारीरिक अंगों के भड़कीले प्रदर्शन वाले चित्र मनुष्य में कई नैतिक बुराइयां पैदा करते हैं। उसकी पाशविक वृत्तियों को जगाकर बुराइयों की ओर प्रेरित करते हैं। कोई भी गन्दा या अश्लील चित्र-दृश्य देखने पर मनुष्य के मन में भी गन्दगी, अश्लीलता भड़क उठती है।

🔷 किसी भी चित्र को बार-बार देखने पर उसमें निहित विचार, आदर्शों की छाप मनुष्य में गहरी होती जाती है। ऐसी स्थिति में कोई दृश्य विशेष उसके सामने न हो तब भी उसकी कल्पना मानस पटल पर पूरा चित्र अंकित कर लेती है, पूर्व स्मृति के आधार पर और वैसी ही प्रेरणा मनुष्य को देती है, जब भी मनुष्य का मन विश्राम में होता है तो पूर्व में देखे गए चित्रों, दृश्यों की कल्पना जागृत होकर उस समय उन्हें प्रत्यक्ष देखने जैसी अनुभूति होती है। इसलिए चित्रों को देख लेने से ही बात समाप्त हो जाती हो ऐसा नहीं है। वे धीरे-धीरे मानव प्रकृति के अंग बन जाते हैं और उसे समय-समय पर वैसी ही प्रेरणा देते रहते हैं। अन्तर में छिपी पड़ी इन प्रेरणाओं के अनुसार बहुधा मनुष्य काम भी करने लगता है।

🔶 इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम जो कुछ भी देखते हैं उसका हमारी प्रकृति, व्यवहार-आचरण आदि पर भारी प्रभाव पड़ता है। अच्छे चित्र देखने पर जीवन में अच्छाइयां पैदा होती हैं। बुरे चित्र देखने पर बुराइयां। आवश्यकता इस बात की है कि बुरे चित्र, बुरे दृश्य देखने के बजाय उधर से आंख मींच लेना, बुराइयों को न देखना ही श्रेयस्कर होता है। गांधीजी के आंख मीचने वाले बन्दर से हमें यही प्रेरणा मिलती है।

🔷 अच्छे या बुरे चित्रों का चुनाव करना हमारी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। यदि हमें अपने जीवन में अच्छे आदर्श, उच्च प्रेरणा, दिव्य गुणों को प्रतिष्ठापित करना हो तो इस सम्बन्ध में अच्छे चित्रों का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। महापुरुषों के, शहीदों के, तपस्वी त्यागी सन्त महात्माओं के चित्र ढूंढ़ने पर सफलता से मिल जाते हैं। इसी तरह की कोई उत्कृष्ट ऐतिहासिक घटनाओं, त्याग बलिदान का दृश्य जिनमें अंकित हों ऐसे चित्र भी मिल जाते हैं। प्रेरणा-प्रद आदर्श वाक्यों का चुनाव भी अच्छे चित्रों का काम दे सकता है। इस तरह हम उत्कृष्ट चित्रों का संग्रह करके अपनी जीवन शिक्षा की महत्वपूर्ण सामग्री जुटा सकते हैं इनसे हमें उठते-बैठते सोते जागते उत्कृष्ट प्रेरणा, महान शिक्षा मिल सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 137

बुधवार, 26 सितंबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 26 September 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 September 2018

👉 भगवान की कृपा या अकृपा

🔶 एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा- ”मैंने हनुमान जी की मनौती मानी थी कि यदि मुकदमा जीत जाऊँ तो रोज उनके आगे दिया जलाया करूंगा। मैं जीत गया और तभी से यह दिया जलाने का कम चल रहा है।

🔷 मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।

🔶 मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।

🔷 मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?

✍🏻 बिनोवा
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1964 पृष्ठ 1

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

👉 हरि कीर्तन

🔶 ‘कीर्तन’ शब्द को यदि उलटा कर दिया जाय तो वह शब्द ‘नर्तकी’ बन जाता है। इस जमाने में हर जगह उलटा चलने ही अधिक देखा जाता है। कीर्तन का वास्तविक तात्पर्य न समझ कर लोग उसका उलटा अर्थ करते हैं और नर्तकी की तरह नाच कूद कर अपनी उचंग पूरी करते हैं। ईश्वर कोई मनचला नवाब नहीं है, जिसे नाच रंग में मस्त रहने की सनक हो। वह अपने प्रिय पुत्रों को नर्तक नहीं, धर्म प्रवर्तक बनाना चाहता है।

🔷 कीर्तन का तात्पर्य उन कर्मों के करने से है, जिससे प्रभु की कारीगरी की कीर्ति फलती है, प्रशंसा होती है। हम किसी सुन्दर खिलौने को देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं, वास्तव में वह प्रशंसा जड़ खिलौने की नहीं वरन् उस कुम्हार की है जिसने उसे बनाया है। विद्वान्, धर्मात्मा, तपस्वी, उद्धारक, धर्म प्रवर्तक, अक्सर अवतार कहे जाते हैं, उनमें ईश्वरीय अंश बताया जाता है।

🔴 वैसे तो हर मनुष्य में ईश्वरीय अंश है और आत्मा-परमात्मा का अवतार है। पर किसी विशेष व्यक्ति को अवतारी पुरुष करने का तात्पर्य उसके सद्गुणों के निमित्त कर्ता की प्रशंसा करना है। किसी भले आदमी को देखकर उसे अनायास ही ‘ईश्वर का प्यारा’, ‘ईश्वर की पुण्य कृति’, ‘ईश्वर का कृपा भाजन’ आदि शब्द कहते हैं। इन शब्दों का मर्म अर्थ ईश्वर की प्रशंसा करना, उसकी कीर्ति बढ़ाना है।

🔶 हमें अपना आचरण, विचार, कर्म, व्यवहार एवं स्वभाव इस प्रकार का बनाना चाहिए, जिससे सर्वत्र हमारी प्रशंसा हो। हमारी भलमनसाहत, नेकी, ईमानदारी, सेवा वृत्ति, नम्रता, परमार्थ प्रियता, त्याग भावना की सुगन्ध चारों ओर उड़ती फिरे। वह कीर्ति असल में हमारे जड़ शरीर की नहीं वरन् उसके कर्ता आत्मा की, परमात्मा की है। यही सच्चा कीर्तन है। इस उलटे जमाने में ‘नर्तकी’ बनने वाले बहुत हैं पर ‘कीर्तन’ करने वाले विरले ही दिखाई पड़ते हैं।

✍🏻 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/February/v1.15

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

👉 दूसरे की गलती से सीखें

🔷 किसी जंगल में एक सिंह, एक गधा और एक लोमड़ी रहते थे। तीनों में गहरी मित्रता थी। तीनों मिलकर जंगल में घूमते और शिकार करते। एक दिन वे तीनों शिकार पर निकले। उन तीनों में पहले से ही यह समझौता था कि मारे गए शिकार के तीन भाग किए जाएंगे।

🔶 अचानक उन्होंने एक बारहसिंगा देखा। वह खतरे से बेखबर घास चर रहा था। तीनों ने मिलकर उसकी पीछा किया और अंत में सिंह ने उसे मार गिराया।

🔷 तब सिंह ने गधे से कहा कि वह मरे हुए शिकार के तीन भाग करें। गधे ने शिकार के तीन भाग किए और सिंह से अपना एक भाग ले लेने के लिए कहा। यह देखकर सिंह क्रोधित हो गया। उसने गधे पर हमला कर दिया और अपने नुकीले दातों और पंजों से गधे को चीर-फाड़ दिया।

🔶 उसके बाद उसने लोमड़ी से कहा कि वह अपना हिस्सा ले ले। लोमड़ी बहुत चालाक और बुद्धिमान थी। उसने बारहसिंगे का तीन चौथाई से अधिक भाग सिंह की सेवा में अर्पित कर दिया और अपने लिए केवल एक चौथाई से भी कम भाग रखा। यह देखकर सिंह बहुत प्रसन्न हुआ और बोला- ”तुमने मेरे भोजन की सही मात्रा निकाली है। सच बताओ, कहां से यह चतुराई सीखी?“

🔷 चालाक लोमड़ी बोली- ”महाराज! मरे हुए गधे को देखकर मैं सब समझ गई। उसकी मूर्खता से ही मैंने सीखा है।“

शिक्षा – दूसरे की गलती से सीखें, दूसरों की गलतियों से सीख हासिल करनी चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 21 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 14)

👉 लेखक का निजी अनुभव
 
🔷 अध्ययन, अनुभव, प्रयोग और विशेषज्ञों की पूछताछ से पता चला है कि आत्मिकी का प्रथम पक्ष है— साधक का परिष्कृत व्यक्तित्व और दूसरा पक्ष है— साधना-उपासना स्तर का उपक्रम। जीवन साधना को स्वास्थ्य और कर्मकाण्डपरक उपचारों को श्रृंगार स्तर का कहा जा सकता है। पर इन दिनों किसी भटकाव ने लोगों को ऐसा कुछ बता दिया है कि जीवन साधना की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। मात्र पूजापरक कर्मकाण्डों के ही बलबूते उस सारी महत्ता को हस्तगत किया जा सकता है जिसको कि शास्त्रकारों ने अपने अनुभव में और आप्तजनों ने अपने जीवनक्रम में समाविष्ठ करके वस्तुस्थिति की यथार्थता का पूरी तरह रहस्योद्घाटन किया है।
  
🔶 समस्त विश्व के, विशेषतया मानव समुदाय के भाग्य और भविष्य का भला-बुरा निर्धारण करने वाले इस प्रसंग पर अत्यन्त गहराई तक शोध करने के लिए आकुल-व्याकुल उत्कण्ठा से द्रवित होकर किसी दिव्य मार्गदर्शक ने संकेत किया कि— ‘‘इस तथ्य को प्रारम्भ से ही समझ लेना चाहिए।’’ अध्यात्म को अंकुरित, पल्लवित एवं पुष्पित होने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि इस प्रयोजन में प्रवेश करने वाले का व्यक्तित्व उत्कृष्टता से सुसम्पन्न हो। इसके पश्चात ही उपासनापरक कर्मकाण्डों की कुछ उपयोगी प्रतिक्रिया उपलब्ध होती है। यदि मनोभूमि और जीवनचर्या गन्दगी से भरी हो तो समझना चाहिए कि मन्त्र की, पूजा उपचार की प्रक्रिया प्राय: निरर्थक ही सिद्ध होगी। समय, श्रम और साधन सामग्री निरर्थक गँवाने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा। अध्यात्म दिव्य शक्ति के आधारभूत पुंज स्त्रोत हैं। विज्ञान जो सज्जा भर का प्रदर्शन करता है, उसमें आकर्षण और प्रलोभन के द्वारा बालबुद्धि को फुसलाने के लिए खिलौने जैसी चमक-दमक के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।
  
🔷 इस संकेत से मार्गदर्शन मिला। विश्वास जमा। फिर भी भ्रान्तियों के जाल-जंजाल से निकलने के लिए आवश्यक समझा गया कि क्यों न अपनी काया की प्रयोगशाला में तथ्य का निरीक्षण-परीक्षण करके देखा जाए? इसमें हानि ही क्या है? अपने प्रयोग यदि खरे उतरते हैं तो उससे श्रद्धा विश्वास की अभिवृद्धि ही होती है। यदि मिथ्या सिद्ध होते हैं तो हानि मात्र इतनी ही है कि जैसे असंख्य अधकचरी स्थिति में सन्देेह भरी स्थिति में रह रहे हैं, उन्हीं में एक की और वृद्धि हो जाएगी। फिर विश्वास और साहसपूर्वक अपनी मान्यता बनाने या दूसरों से साहसपूर्वक कुछ कहने की स्थिति तो समाप्त हो जाएगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 17

👉 Living The Simple Life (Part 4)

🔷 The first few years I used a blue scarf and a blue sweater during chilly weather, but I eventually discarded them as not really essential. I am now so adjustable to changes in temperature that I wear the same clothes summer and winter, indoors and out. Like the birds, I migrate north in the summer and south in the winter. If you wish to talk to people out-of-doors, you must be where the weather is pleasant or people will not be out.

🔶 When the temperature gets high and the sun gets hot there is nothing so welcome as shade. There is a special coolness about the shade of a tree, but unless it is a big tree some shifting is required to stay in the shade. Clouds provide shade as they drift across the sun. A rock provides what I call deep shade; so does a bank early in the morning or late in the afternoon. Sometimes even the shade of a bush is appreciated, or that of a haystack. Man-made things provide shade too. Buildings, of course, and even signs which disfigure the landscape do provide shade.

🔷 So do bridges, providing shelter from the rain as well. Of course, one can wear a hat or carry an umbrella. I do neither. Once when a reporter asked if by chance I had a folding umbrella in my pockets I replied, ‘‘I won’t melt. My skin is waterproof. I don’t worry about little discomforts.’’ But I’ve sometimes used a piece of cardboard for a sun shade. Water is something you think of in hot weather, but I have discovered that if I eat nothing but fruit until my day’s walk is over I do not get thirsty. Our physical needs are so simple.

To be continued...

👉 दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन (भाग 1)

🔷 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन आज के हिन्दू समाज की सबसे बड़ी एवं सबसे प्रमुख आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए हमें अगले दिनों बहुत कुछ करना होगा। हमारा यह प्रयत्न निश्चित रूप में सफल होगा। अगले दिनों हवा बदलेगी और आज की खर्चीली वैवाहिक कुरीतियाँ पीढ़ी वालों के लिए एक कौतूहल की बात रह जायगी। कुछ वर्षों बाद भावी सन्तान को यह खोज करनी पड़ेगी कि हमारे पूर्वज थे तो बुद्धिमान पर ऐसी मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाज के जंजाल में फँसकर इतना कमर तोड़ अपव्यय आखिर करते क्यों थे?

🔶 वह दिन निश्चित रूप में आने हैं। समय की माँग, युग की पुकार इतनी प्रबल होती है कि उसके द्वारा बड़े-बड़े प्रवाह मोड़ दिये जाते हैं। इस परिवर्तन का लाभ अगली पीढ़ी को मिलेगा, हमें तो इसके लिए भागीरथ तप ही करना है और प्रतिरोध करते हुए गोली न हो तो कम से कम गाली तो खाते ही रहना है। अन्ध मान्यताओं की भी नशेबाजी जैसी लत होती है, वह मुश्किल से छूटती है। इसलिए काम बहुत कठिन है। पर कठिन काम भी मनुष्य ही करते हैं। हम कठिनाइयों को चीरते हुए आगे बढ़ेंगे और समय को बदल डालने की प्रतिज्ञा पूरी करके रहेंगे।

🔷 विवाहोन्माद की जड़े काफी गहरी हैं। उन्माद रोगग्रस्त व्यक्ति के गले कोई बात उतारना काफी कठिन होता है। रूढ़ियों की चुड़ैल जिनकी गर्दन पर सवार है उनके लिए समझ की बात मानना अपनाना काफी कठिन होगा। यह प्रचार करते हुए जहाँ जाया जाय वहाँ प्रथम बार में ही सफलता मिल जाय, इसकी आशा कम ही होगी। कितनी ही बार प्रचारक को निराश और तिरस्कृत होकर लौटना पड़ेगा। ऐसी दशा में मानव मनोविज्ञान के अनुसार यह हो सकता है कि तिरस्कृत करने वाले और तिरस्कार सहने वाले के बीच मनोमालिन्य का अंकुर उत्पन्न हो जाय और उसके कारण आगे मिलने-जुलने या मधुर सम्बन्ध बनाये रहने में बाधा उत्पन्न होने लगे। यदि ऐसा हुआ तो उससे अपने मिशन को नुकसान ही पहुँचेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 46

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1965/July/v1.46

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 1)

🔷 आपने कहीं न कहीं महात्मा गांधी के साथ या अलग से उन तीन बन्दरों का चित्र अवश्य देखा होगा जिसमें एक बन्दर दोनों हाथों से अपनी आंख बन्द किए है। जिसका तात्पर्य है ‘‘बुरी बात मत देखो’’ ‘‘बुराई की तरफ से अपनी आंखें बन्द करलो’’। किसी चित्र या दृश्य को देख कर उससे संबंधित अच्छाई या बुराई का प्रभाव अवश्य पड़ता है। बुरे चित्र देखने पर बुराइयां और अच्छे दृश्य देखने पर अच्छाइयां पनपती हैं।

🔶 वस्तुतः जो कुछ भी हम देखते हैं उसका सीधा प्रभाव हमारे मन में और मस्तिष्क पर पड़ता है। किसी चित्र या दृश्य विशेष को बार बार देखने पर उसका सूक्ष्म प्रभाव हमारे अन्तर मन पर अंकित होने लगता है। और जितनी बार उसे देखा जाता है उतना ही वह स्थाई और परिपक्व बनता जाता है। हमारा अव्यक्त मन कैमरे की प्लेट के समान है जिस पर नेत्रों के लेन्स से जो छाया गुजरती है वही उस पर अंकित हो जाती है! हम अच्छा या बुरा जो कुछ भी देखते हैं। उसका सीधा प्रभाव हमारे अन्तरमन पर, सूक्ष्म चेतना पर होता है।

🔷 प्रत्येक चित्र का अस्तित्व केवल उसके आकार प्रकार तथा रंग रूप तक ही सीमित नहीं रहता वरन् उसके पीछे कुछ आदर्श होते हैं कुछ विचार, धारणायें और मान्यतायें होती हैं। ये अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी किन्तु होती अवश्य हैं। वस्तुतः चित्र की अपनी एक भाषा होती है जिसके माध्यम से चित्रकार समाज में अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। प्रत्येक चित्र में उससे हाव, भाव, भंगिमा, पोशाक, अंग प्रत्यंग, मुख, मुद्रा आदि में कुछ संकेत भरे होते हैं। चित्र या दृश्य देखने के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित अच्छी बुरी धारणा, संकेत भी मनुष्य के मन पर अंकित हो जाते हैं। हमारा मन इन आदर्शों, संकेतों को चुपचाप ग्रहण करता रहता है। चित्र दर्शन के साथ-साथ उसमें निहित अच्छाई भी मानस पटल पर अंकित हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 136

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

👉 बोया और काटा का सिद्धान्त

🔶 एक बार एक आदमी रेगिस्तान में कहीं भटक गया। उसके पास खाने-पीने की जो थोड़ी-बहुत चीजें थीं वो जल्द ही ख़त्म हो गयीं और पिछले दो दिनों से वो पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा था।

🔷 वह मन ही मन जान चुका था कि अगले कुछ घंटों में अगर उसे कहीं से पानी नहीं मिला तो उसकी मौत पक्की है पर कहीं न कहें उसे ईश्वर पर यकीन था कि कुछ चमत्कार होगा और उसे पानी मिल जाएगा तभी उसे एक झोपड़ी दिखाई दी! उसे अपनी आँखों यकीन नहीं हुआ पहले भी वह मृगतृष्णा और भ्रम के कारण धोखा खा चुका था पर बेचारे के पास यकीन करने के आलावा को चारा भी तो न था आखिर ये उसकी आखिरी उम्मीद जो थी।

🔶 वह अपनी बची-खुची ताकत से झोपडी की तरफ रेंगने लगा जैसे-जैसे करीब पहुँचता उसकी उम्मीद बढती जाती और इस बार भाग्य भी उसके साथ था, सचमुच वहां एक झोपड़ी थी! पर ये क्या? झोपडी तो वीरान पड़ी थी! मानो सालों से कोई वहां भटका न हो। फिर भी पानी की उम्मीद में आदमी झोपड़ी के अन्दर घुसा अन्दर का नजारा देख उसे अपनी आँखों पे यकीन नहीं हुआ…

🔷 वहां एक हैण्ड पंप लगा था, आदमी एक नयी उर्जा से भर गया पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता वह तेजी से हैण्ड पंप चलाने लगा। लेकिंग हैण्ड पंप तो कब का सूख चुका था आदमी निराश हो गया उसे लगा कि अब उसे मरने से कोई नहीं बचा सकता…वह निढाल हो कर गिर पड़ा!

🔶 तभी उसे झोपड़ी के छत से बंधी पानी से भरी एक बोतल दिखी! वह किसी तरह उसकी तरफ लपका! वह उसे खोल कर पीने ही वाला था कि तभी उसे बोतल से चिपका एक कागज़ दिखा उस पर लिखा था- इस पानी का प्रयोग हैण्ड पंप चलाने के लिए करो और वापस बोतल भर कर रखना नहीं भूलना।

🔷 ये एक अजीब सी स्थिति थी, आदमी को समझ नहीं आ रहा था कि वो पानी पिए या उसे हैण्ड पंप में डालकर उसे चालू करे!

🔶 उसके मन में तमाम सवाल उठने लगे अगर पानी डालने पे भी पंप नहीं चला अगर यहाँ लिखी बात झूठी हुई और क्या पता जमीन के नीचे का पानी भी सूख चुका हो लेकिन क्या पता पंप चल ही पड़े क्या पता यहाँ लिखी बात सच हो वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे!
फिर कुछ सोचने के बाद उसने बोतल खोली और कांपते हाथों से पानी पंप में डालने लगा। पानी डालकर उसने भगवान् से प्रार्थना की और पंप चलाने लगा एक-दो-तीन और हैण्ड पंप से ठंडा-ठंडा पानी निकलने लगा!

🔷 वो पानी किसी अमृत से कम नहीं था… आदमी ने जी भर के पानी पिया, उसकी जान में जान आ गयी, दिमाग काम करने लगा। उसने बोतल में फिर से पानी भर दिया और उसे छत से बांध दिया। जब वो ऐसा कर रहा था तभी उसे अपने सामने एक और शीशे की बोतल दिखी। खोला तो उसमे एक पेंसिल और एक नक्शा पड़ा हुआ था जिसमे रेगिस्तान से निकलने का रास्ता था।

🔶 आदमी ने रास्ता याद कर लिया और नक़्शे वाली बोतल को वापस वहीँ रख दया। इसके बाद वो अपनी बोतलों में पानी भर कर वहां से जाने लगा कुछ आगे बढ़ कर उसने एक बार पीछे मुड़ कर देखा फिर कुछ सोच कर वापस उस झोपडी में गया और पानी से भरी बोतल पे चिपके कागज़ को उतार कर उस पर कुछ लिखने लगा। उसने लिखा-
मेरा यकीन करिए ये काम करता है!

🔷 दोस्तों, ये कहानी संपूर्ण जीवन के बारे में है। ये हमे सिखाती है कि बुरी से बुरी स्थिति में भी अपनी उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए और इस कहानी से ये भी शिक्षा मिलती है कि कुछ बहुत बड़ा पाने से पहले हमें अपनी ओर से भी कुछ देना होता है। जैसे उस आदमी ने नल चलाने के लिए मौजूद पूरा पानी उसमे डाल दिया।

🔶 देखा जाए तो इस कहानी में पानी जीवन में मौजूद अच्छी चीजों को दर्शाता है, कुछ ऐसी चीजें जिसकी हमारी नजर में value है। किसी के लिए ये ज्ञान हो सकता है तो किसी के लिए प्रेम तो किसी और के लिए पैसा! ये जो कुछ भी है उसे पाने के लिए पहले हमें अपनी तरफ से उसे कर्म रुपी हैण्ड पंप में डालना होता है और फिर बदले में आप अपने योगदान से कहीं अधिक मात्रा में उसे वापस पाते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 20 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 September 2018


बुधवार, 19 सितंबर 2018

👉 त्याग का अर्थ

🔷 “इच्छाओं के त्याग का अर्थ संसार को त्याग देना नहीं है। जीवन का ऐसा किसी प्रकार का निषेध मनुष्य को मनुष्यत्वशून्य बनाता है। ईश्वरत्व, मनुष्यत्व से रहित नहीं है। आध्यात्मिक का परमावश्यक कर्तव्य मनुष्य को अधिक मनुष्यत्व युक्त बनाना है। मनुष्य में जो सौंदर्य है, महानता तथा सात्विकता है, उन्हें मुक्त तथा व्यक्त करने का नाम आध्यात्मिक है। वाह्य-जगत में जो कुछ भी भव्य तथा सुन्दर है, उसे भी वह विकसित रहती है।

🔶 साँसारिक कार्यों में बाह्य त्याग तथा कर्तव्य और उत्तरदायित्व की उपेक्षा को वह आवश्यक नहीं मानती। वह केवल यही कहती है कि व्यक्ति के जो कार्य और उत्तरदायित्व है, उनका सम्पादन करते समय, उसकी आत्मा इच्छाओं के बोझ से मुक्त रहे। द्वैत के बन्धनों से मुक्त रहना ही पूर्णता है। बन्धनों के भय से जीवन से दूर भागने से यह मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। बन्धनों से बचने के प्रयत्न का अर्थ है जीवन से भयभीत होना। किंतु आध्यात्मिकता का अर्थ है ‘परस्पर विरोधों के वशीभूत हुए बिना जीवन का ठीक और पूर्ण ढंग से सामना करना।”

~ मेहरबाबा

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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