👉 गुरुभक्ति ही साधना, वही है सिद्धि
🔶 गुरुगीता की मंत्रमाला में आध्यात्मिक साधना की प्रक्रियाएँ और तत्त्वज्ञान दोनों पिरोये हैं। जो आध्यात्मिक प्रक्रियाओं को श्रद्धा व समर्पित भाव से सम्पन्न करते हैं, उन्हीं को तत्त्वज्ञान की अनुभूति होती है। जिनमें आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के प्रति रुचि नहीं है, उनके लिए सच्ची अभीप्सा नहीं है, वे तत्त्वज्ञान की अनुभूति नहीं कर पाते। तत्त्वज्ञान के गं्रथ-शब्द उनके लिए बौद्धिक विचार, तर्कजाल व वाणी विलास का विषय बनकर रह जाते हैं। ऐसे लोग शब्दों को तो पढ़ते, कहते व सुनते हैं, पर इनका अर्थ खोजने में असफल रहते हैं। इस खोज के लिए साधना का होना, तप परायण बनना अनिवार्य है। यथार्थ में तत्त्वज्ञान तप साधना का निष्कर्ष है। इसे कठिन साधनाओं को करने वाले लोग ही प्राप्त करते हैं और उन्हीं में इसके समझने की सही योग्यता विकसित होती है।
🔷 पूर्वोक्त मंत्र में भगवान् सदाशिव ने शिष्यों को सावधान किया है कि कहीं इधर-उधर भटको मत। ‘गुरु’ ये दो अक्षर स्वयं में महामंत्र हैं। यह महामंत्र अन्य सभी मंत्रों से श्रेष्ठतम व सर्वोत्तम है। सभी शास्त्र वचनों का मर्म यही है। अपने प्यारे सद्गुरु की सेवा में लीन शिष्य ही सच्चा संन्यासी है। गुरु से विमुख व्यक्ति को कहीं कोई ठौर नहीं है। परमात्मतत्त्व का बोध केवल सद्गुरु की कृपा से मिलता है। जिस तरह से दीप से दीप जलता है, उसी तरह से सद्गुरु-शिष्य के अन्तःकरण में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं। शिष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु की कृपा की छाँव में आत्मतत्त्व का चिंतन करे। ऐसा करते-करते गुरुदेव द्वारा दिखाये मार्ग से स्वतः ही आत्मज्ञान हो जायेगा।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 132
🔶 गुरुगीता की मंत्रमाला में आध्यात्मिक साधना की प्रक्रियाएँ और तत्त्वज्ञान दोनों पिरोये हैं। जो आध्यात्मिक प्रक्रियाओं को श्रद्धा व समर्पित भाव से सम्पन्न करते हैं, उन्हीं को तत्त्वज्ञान की अनुभूति होती है। जिनमें आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के प्रति रुचि नहीं है, उनके लिए सच्ची अभीप्सा नहीं है, वे तत्त्वज्ञान की अनुभूति नहीं कर पाते। तत्त्वज्ञान के गं्रथ-शब्द उनके लिए बौद्धिक विचार, तर्कजाल व वाणी विलास का विषय बनकर रह जाते हैं। ऐसे लोग शब्दों को तो पढ़ते, कहते व सुनते हैं, पर इनका अर्थ खोजने में असफल रहते हैं। इस खोज के लिए साधना का होना, तप परायण बनना अनिवार्य है। यथार्थ में तत्त्वज्ञान तप साधना का निष्कर्ष है। इसे कठिन साधनाओं को करने वाले लोग ही प्राप्त करते हैं और उन्हीं में इसके समझने की सही योग्यता विकसित होती है।
🔷 पूर्वोक्त मंत्र में भगवान् सदाशिव ने शिष्यों को सावधान किया है कि कहीं इधर-उधर भटको मत। ‘गुरु’ ये दो अक्षर स्वयं में महामंत्र हैं। यह महामंत्र अन्य सभी मंत्रों से श्रेष्ठतम व सर्वोत्तम है। सभी शास्त्र वचनों का मर्म यही है। अपने प्यारे सद्गुरु की सेवा में लीन शिष्य ही सच्चा संन्यासी है। गुरु से विमुख व्यक्ति को कहीं कोई ठौर नहीं है। परमात्मतत्त्व का बोध केवल सद्गुरु की कृपा से मिलता है। जिस तरह से दीप से दीप जलता है, उसी तरह से सद्गुरु-शिष्य के अन्तःकरण में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं। शिष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु की कृपा की छाँव में आत्मतत्त्व का चिंतन करे। ऐसा करते-करते गुरुदेव द्वारा दिखाये मार्ग से स्वतः ही आत्मज्ञान हो जायेगा।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 132

















































