मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

👉 गुरुगीता (भाग 87)

👉 गुरुभक्ति ही साधना, वही है सिद्धि

🔶 गुरुगीता की मंत्रमाला में आध्यात्मिक साधना की प्रक्रियाएँ और तत्त्वज्ञान दोनों पिरोये हैं। जो आध्यात्मिक प्रक्रियाओं को श्रद्धा व समर्पित भाव से सम्पन्न करते हैं, उन्हीं को तत्त्वज्ञान की अनुभूति होती है। जिनमें आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के प्रति रुचि नहीं है, उनके लिए सच्ची अभीप्सा नहीं है, वे तत्त्वज्ञान की अनुभूति नहीं कर पाते। तत्त्वज्ञान के गं्रथ-शब्द उनके लिए बौद्धिक विचार, तर्कजाल व वाणी विलास का विषय बनकर रह जाते हैं। ऐसे लोग शब्दों को तो पढ़ते, कहते व सुनते हैं, पर इनका अर्थ खोजने में असफल रहते हैं। इस खोज के लिए साधना का होना, तप परायण बनना अनिवार्य है। यथार्थ में तत्त्वज्ञान तप साधना का निष्कर्ष है। इसे कठिन साधनाओं को करने वाले लोग ही प्राप्त करते हैं और उन्हीं में इसके  समझने की सही योग्यता विकसित होती है।

🔷 पूर्वोक्त मंत्र में भगवान् सदाशिव ने शिष्यों को सावधान किया है कि कहीं इधर-उधर भटको मत। ‘गुरु’ ये दो अक्षर स्वयं में महामंत्र हैं। यह महामंत्र अन्य सभी मंत्रों से श्रेष्ठतम व सर्वोत्तम है। सभी शास्त्र वचनों का मर्म यही है। अपने प्यारे सद्गुरु की सेवा में लीन शिष्य ही सच्चा संन्यासी है। गुरु से विमुख व्यक्ति को कहीं कोई ठौर नहीं है। परमात्मतत्त्व का बोध केवल सद्गुरु की कृपा से मिलता है। जिस तरह से दीप से दीप जलता है, उसी तरह से सद्गुरु-शिष्य के अन्तःकरण में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं। शिष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपने सद्गुरु की कृपा की छाँव में आत्मतत्त्व का चिंतन करे। ऐसा करते-करते गुरुदेव द्वारा दिखाये मार्ग से स्वतः ही आत्मज्ञान हो जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 132

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 April 2018


सोमवार, 16 अप्रैल 2018

👉 तीसरा चरण संघर्षात्मक

🔷 मित्रो ! तीसरा चरण जो अपना रह जाता है, वह संघर्ष का है। संघर्ष के बिना अवांछनीय तत्त्वों को हटाया नहीं जा सकता है। कुछ निहित स्वार्थ ऐसे होते हैं, उनकी दाढ़ में ऐसा लग जाता है अथवा किसी अपनी बेवकूफी को ऐसा प्रेस्टीज प्वाइंट बना लेते हैं कि उससे पीछे हटना ही नहीं चाहते हैं। अपनी बुद्धिमानी, अपनी अक्लमंदी और अपना अहंकार अपने घमंड को इतना ज्यादा बढ़ा लेते हैं कि अपने साथ जुड़े हुए जो विचार हैं उनका ही समर्थन करते हैं। मान लीजिए कोई बूढ़ा आदमी है, और उसने कोई गलती की, चार धाम की यात्रा करके आया और सारा पैसा फूँक करके घर में आ गया। अब उसकी गलती को बताओ तो कोई मानेगा नहीं और दूसरे गाँव वालों को भी  कहेगा- हम तो मुक्ति ले आए, तुम भी मुक्ति ले आओ। उसे समझाओ तो मानता ही नहीं। कुछ आदमी इस तरह के होते हैं, जिनको जड़ कहते हैं और अपनी गलती को ही प्रेष्टीज प्वांइट बना लेते हैं। ब्याह शादी का मामला है, नाक का प्रश्न बना लेते हैं। कहते हैं कि साहब हमारे बाप- दादे के समय ऐसी शादी होती थी। ठीक है आप जो कहते हैं वो तो सही कहते हैं आपकी बात भी सही है, ठीक माननी चाहिए। पर हम क्या कर सकते हैं? हमारे यहाँ तो ऐसा ही होता रहा है।

🔶 इस तरीके से रूढ़िवादियों से लेकर के जिनके स्वार्थ जुड़े हैं, जागीरदारों से लेकर के ताल्लुकेदारों तक और पण्डे पुजारियों से लेकर के दूसरे अवांछनीय तत्त्वों तक जिनके  दाढ़ में हराम के पैसों का, हराम की आमदानी का, बेकार की बातों का चस्का लग गया है, रिश्वतखोरी का चस्का लग गया, वो सीधे तरीके से मान जाएँगें क्या? नहीं। हम जब समझाएगें, हाँ, हाँ, हाँ करेंगे। कहेंगे कि आपने बिलकुल सही कहा, ऐसा ही होना चाहिए। फिर भ्रष्टाचार विरोधी समिति के प्रेसीडेन्ट बन जाएँगे और करेंगे पूरा भ्रष्टाचार। इस तरीके से इस तरह के लोग ही अधिकांश हैं। उनसे निपटा कैसे जाए? समझाते हैं उनको तो हमसे भी ज्यादा वो दूसरों को समझाते हैं। ऐसे समझाने से क्या असर? समझाने से क्या बात बनेगी? ऐसे जड़ लोग बातों से समझ नहीं सकते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भावी महाभारत

👉 आज का सद्चिंतन 16 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2018

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 12 April 2018


👉 It is the virtues that are of the essence

🔷 (This is about the battles between the demons and the divine beings, the evil and the good throughout the history) Demons’ blatant callousness and their audacity to commit any evil cannot be given credit for their victories against the divine beings.These are the very vices that ultimately caused their annihilation and brought reproach upon themselves. Their victories—even though they may have been just in the initial stages or momentary—were actually the result of their unity, courage and adventurous nature. Besides, they never let any opportunity slip away in laziness or procrastination.

🔶 These divine virtues can be hailed as just a tiny ray or a small fraction of divinity and even that much of tiny divinity made them excel in the battles. The Divine Beings’ divinity and good virtues shouldn’t be blamed for their defeats against the demons. These are the very merits which made them the lords of Heaven, famous, immortal, admired by people and eventually enabled them to be victorious and to regain their lost kingdom. Their earlier defeats should be blamed on their little sloppiness and thoughtlessness which lead them to overlook the need of consolidating mutual unity and cooperation as well as to tackle any undesirable elements beforehand. They had to suffer defeats,repression and humiliation until they didn’t rectify these mistakes.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP & KARYAKRAM -66 (4.63)

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (अन्तिम भाग)

🔷 अपने जीवन की वास्तविकता को समझ सकें, तो ये ज्ञानयोग हो जाएगा। जब अपने फर्ज और ड्यूटी को सब कुछ मान लें, इस बात पर ध्यान नहीं दें कि दूसरा आदमी क्या कहता है और क्या सलाह देता है, तब इसको कर्मयोग कहेंगे। ये तीन बातों का ध्यान रखेंगे, तब आपका व्यक्तित्व निखरता हुआ चला जाएगा। जीवन की साधना के लिए इन बातों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

🔶 हमारा जीवन पारस है, हमारा जीवन कल्पवृक्ष है, हमारा जीवन अमृत है, हमारा जीवन कामधेनु है। आप जो भी चाहें, इस जीवन को बना सकते हैं; लेकिन बनाना तो आपको ही पड़ेगा! आप ही बनाएँगे, तभी बनेगा। अपनी साधना आप कीजिए। अपने आपके विरुद्ध बगावत खड़ी कर दीजिए। अपने जन्म-जन्मान्तरों को तोड़-मरोड़ के फेंक दीजिए और जो अच्छाई आपके भीतर नहीं हैं, जो विशेषताएँ अभी तक पैदा नहीं कर सके हैं, उन गुण, कर्म और स्वभाव के बारे में आप अभी तक अभावग्रस्त हैं, कृपा करके वे ठीक कीजिए, उनको सुधारिए। ये पुरुषार्थ कीजिए।

🔷 बुराइयों को छोड़ने का पुरुषार्थ, अच्छाइयों को बढ़ाने का पुरुषार्थ। पराक्रम अगर आप करेंगे, तो किस तरीके से? आगे बढ़ने के लिए दो कदम बढ़ाने पड़ते हैं। एक कदम के बाद दूसरा, दूसरे के बाद पहला। ऐसे ही आपको अपनी कमजोरियों और बुराइयों को दूर करने की जद्दोजहद करनी पड़ेगी और अपनी अच्छाइयों को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़ेगा। यह दो काम करते हुए चले जाएँगे, तो आपकी जीवन-साधना पूर्ण हो जाएगी। जीवन-साधना जिस हिसाब से आपकी पूर्ण होगी, आप देखेंगे सारा समाज आपका सहयोग करता है, अन्तरात्मा आपका सहयोग करता है; भगवान आपका सहयोग करते हैं, पात्रता जैसी ही विकसित होती चलेगी।

🔶 इसलिए मैंने कल कहा था—आपके भीतर फूल जैसे खिलना शुरू हो जाएगा, वैसे ही आपके ऊपर भौंरे आने शुरू हो जाएँगे, तितलियाँ आनी शुरू हो जाएँगी; बच्चे आपको ललचाई आँखों से देखने लगेंगे। भगवान अपेक्षा करेंगे कि ये फूल हमारे गले में हैं, सिर पर होता, तो कैसा अच्छा होता? कृपा करके कीजिए, साधना कीजिए। साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है—इस सिद्धान्त को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्प-साधना में आप आए हैं।

हमारी बात समाप्त।
॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 11 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 April 2018

👉 राष्ट निर्माण

🔶 मजबूत राष्ट निर्माण के लिए सर्वप्रथम चरित्रवान नागरिकों  को गढऩे की आवश्यकता है। चरित्रवान नागरिक ही किसी राष्ट की बुनियाद से लेकर गुंबद तक के निर्माण में सहायक होते हैं। इसके लिए उनके अंदर पवित्र प्रेरणा जगानी होगी। प्रेरणाविहीन व्यक्ति मुरदे के समान होता है। शव का शृंगार करने के शरीर स्पंदित नहीं होता। शरीर स्पंदन के लिए प्राणतत्व आवश्यक है। प्राणशक्ति तभी सुरक्षित रह सकती है, जब साधना की जाएगी। इन प्राणशक्तिसंपन्न जीवंत नागरिकों से ही कोई राष्ट शक्तिवान एवं सामर्थ्यवान बन सकता है। जीवनी शक्ति के लिए चाहिए राष्ट माता के प्रति अटूट, अखंड, अविचल, निष्ठा एवं भक्ति। राष्ट सुदृढ तभी होगा, जब ऐसे नागरिकों के मन मिलेंगे और ये मन तभी मिलेंगे, जब किसी निर्दिष्ट लक्ष्य पर केंद्रित होंगे।

🔷 राष्ट के वैभव के लिए भौतिक संपन्नता एवं उपलब्धियाँ आवश्यक हैं, परंतु राष्ट सुदृढ़ एवं मजबूत नहीं रहा तो यह संपदा-संपन्नता संकट और विनाश को न्योता देने लगती हैं। मजबूत राष्ट, विकसित राष्ट की परिकल्पना किसे अच्छी नहीं लगती, पर इस अच्छे लगने मात्र से राष्ट निर्माण नहीं होता है। राष्ट निर्माण के लिए पीढिय़ों को बलिदान करना पड़ता है।

🔶 हमारे राष्ट की स्वतंत्रता इन्हीं बलिदानी परंपराओं का परिणाम है। राष्ट को समग्र रूप से समृद्ध और विकसित करने के लिए इसी बलिदानी मानसिकता तथा आध्यात्मिक तत्त्वों की आवश्यकता है। त्याग, बलिदान, समर्पण, निस्स्वार्थपरता, सेवा, क्षमा, सहिष्णुता, धैर्य, सहानुभूति, भ्रातृत्व, उदारता, दया, करुणा आदि गुणों का विकास करके अपने खोए राष्ट के आत्मसम्मान को हम फिर से प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Empower women, empower the world

🔶 Man and woman are like the two eyes or the two shoulders of our creator. They are identical in their level, value, utility, responsibilities, as well as rights. Generally speaking, industry, endurance, toughness, and a mentality of providing for the family are attributes more predominant in man, signifying intelligence and action. On the flip side, art, humility, compassion, and love are more prominent in woman, signifying creation and emotional intelligence. Both of these characteristics have equal importance and it is their confluence that creates a complete human being.

🔷 The important needs of the time are met by calling upon these manly as well as womanly characteristics. Traditionally, the manly qualities were needed to fight wars, and hence men fought wars. Leadership naturally fell into their hands, rendering women as the followers. Such circumstances created a divide and a hierarchy between the two sexes. Man became the leader, woman became the follower and the worshipper. Whether in the guise of worship and love for the man, or in an environment where she was helpless and explicitly suppressed, woman was exploited; man stayed ahead.

🔶 For the new era, we must develop the new woman, who can manage and mould the emotional landscape of the world with her strong hands. We must develop the woman who can use her innate abilities and demonstrate that it is indeed possible to transform the hell of subhuman existence into a heaven of grand-hearted humanness. To promote the ascent of woman toward a position of power and responsibility is to inch closer and closer to the goal of world peace.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP & KARYAKRAM -66 (4.28)

👉 नारी का वर्चस्व- विश्व का उत्कर्ष

🔶 नर और नारी यों दोनों ही भगवान की दायीं-बायीं ऑंख, दायीं बायीं भुजा के समान हैं । उनका स्तर, मूल्य, उपयोग, कर्त्तव्यत, अधिकार पूर्णत: समान है । फिर भी उनमें भावनात्मक दृष्टि से कुछ भौतिक विशेषताएँ हैं । नर की प्रकृति में परिश्रम, उपार्जन, संघर्ष, कठोरता जैसे गुणों की विशेषता है वह बुद्धि और कर्म प्रधान है । नारी में कला, लज्जा, शालीनता, स्नेह, ममता जैसे सद्गुण हैं वह भाव और सृजन प्रधान है । यह दोनों ही गुण अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हं् । उनका समन्वय ही एक पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है ।

🔷 सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नर और नारी की इन विशेषताओं का उपयोग किया जाता है । युद्ध कौशल में पुरुष की प्रकृति ही उपयुक्त थी सो उसे आगे रहना पड़ा । जो वर्ग आगे रहता है, नेतृत्व भी उसी के हाथ में आ जाता है । जो वर्ग पीछे रहते हैं उन्हें अनुगमन करना पड़ता हैं । परिस्थितियों ने नर-नारी के समान स्तर को छोटा-बड़ा कर दिया, पुरुष को प्रभुता मिली - नारी उसकी अनुचरी बन गई । जहॉं प्रेम सद्भाव की स्थिति थी वहॉं वह उस आधार पर हुआ और जहॉं दबाव और विवश्सता की स्थिति थी वहाँ दमन पूर्वक किया गया । दोनों ही परिस्थितियों में पुरुष आगे रहा और नारी पीछे ।

🔶 नये युग के लिये हमें नई नारी का सृजन करना होगा, जो विश्व के भावनात्मक क्षेत्र को अपने मजबूत हाथों में सम्भायल सके और अपनी स्वाभाविक महत्ता का लाभ समस्त संसार को देकर नारकीय दावानल में जलने वाले कोटि-कोटि नर-पशुओं को नर-नारायण के रूप में परिणत करना सम्भव करके दिखा सकें । नारी के उत्कर्ष - वर्चस्व को बढ़ाकर उसे नेतृत्व का उत्तरदायित्व जैसे-जैसे सौंपा जायेगा वैसे-वैसे विश्व शान्ति की घड़ी निकट आती जायेगी ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (४.२८)

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
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👉 The Service by Dhramraj

🔷 People asked Lord Krishna, "Why do you call Yudhishthira -Dharmaraj?" Krishna told them that during the Mahabharat war, every evening Yudhishthira used to mysteriously disappear somewhere. They found out that he was spending his time serving the wounded in the battlefield. When asked why he was doing this so secretly. Yudhishthira told them that he was serving the wounded in the enemy's camp too. Lord Krishna said, "Dharma (religion) and service are equivalent, hence I call him Dharmaraj".

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 9)

🔶 तीन योग हैं न! एक योग का नाम है—ज्ञानयोग। इसका अर्थ है—आप वास्तविकता को समझें। आपने बाहर को समझा है, चीजों को समझा है, खेती-बाड़ी को समझा है, पैसे को समझा है, दुकान को समझा है, मुहल्ले वालों को समझा है, सन्तान को समझा है, फिर अपने आपको क्यों नहीं समझा? अगर आप जीवन को और अपने आपको समझ सकते हों, तो इसका नाम ‘ज्ञान योग’ होगा। अगर आपने अपने फर्ज और कर्तव्यों को समझ रखा हो तब? फर्ज का ज्ञान नहीं, कर्तव्य का ज्ञान नहीं, कोल्हू के बैल के तरीके से सारे दिन मरते रहते हैं, दूसरों की देखा-देखी वासनाओं के दबाव में। मेहनत कम नहीं करते। बहुत मेहनत करते हैं; पर कर्तव्यपालन? कर्तव्यपालन अलग चीज है। हमारे फर्ज और हमारी ड्यूटियाँ कहाँ हैं? ड्यूटियाँ और हमारे फर्ज जहाँ कहीं भी हमको बुलाते हैं, वहाँ हमको जाना चाहिए। इसका नाम कर्मयोग है और भक्ति-भावना?

🔷 भक्ति-भावना मुहब्बत को कहते हैं, प्यार भगवान को किया जाता है। उपासना भगवान की, की जाती है। प्रेम भगवान को किया जाता है; पर भगवान तक सीमित नहीं रखा जाता। अखाड़े में कसरत करते तो हैं; पर अखाड़े तक, उस कसरत की जो शक्ति-संचय है, उसको खर्च थोड़े कर देते हैं। वह तो बाजार में करना पड़ता है, कहीं और करना पड़ता है। भगवान की भक्ति का अभ्यास करते हैं, भगवान से हम प्रेम करते हैं, उपासना करते हैं। अगर उपासना के बाद में हमारी भक्ति का विकास हुआ हो, तब प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को, हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा। प्यार अपने शरीर से कीजिए, ताकि इसको अच्छे तरीके से सुरक्षित रख सकें।

🔶 प्यार अपनी अन्तरात्मा से कीजिए, ताकि इसका कल्याण करने में आप समर्थ हो सकें। प्यार अपने मस्तिष्क के चिन्तन की मशीन से कीजिए, ताकि प्यार द्वारा सही विचार करें और अपने आप को तहस-नहस न होने दें। प्यार अपनी बीबी को कीजिए, ताकि उसका व्यक्तित्व आप निखार सकें। प्यार अपने बच्चों से कीजिए, ताकि उनको संस्कारवान बना सकें। प्यार अपने मुल्क को कीजिए, देश को कीजिए, धर्म और संस्कृति को कीजिए, ताकि उनको इस लायक बना सकें कि वह सम्मानास्पद हों, उनका मजाक नहीं उड़ाया जाए। हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति के बारे में लोग तरह-तरह के लांछन न लगा सकें, ऐसा कीजिए न! भक्ति का अर्थ प्यार होता है। प्यार का अर्थ सेवा होता है। सेवा कीजिए, सेवा! अगर भक्ति को समझ सकते हों, तब फिर ये क्या हो जाएगा? फिर ये भक्तियोग हो जाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 86)

👉 ‘गुरुसेवा’  ही सच्ची साधना
🔶 इस सम्बन्ध में बड़ी प्यारी अनुभूति कथा है। यह कथा एक ऐसे शिष्य की है, जिसके मन में तो उज्ज्वल विचार थे, पर जिसके संस्कार बड़े दूषित थे। जो अनचाहे व अनजाने अनेकों वासनाओं से घिर जाता है। अनेकों प्रयत्नों के बावजूद जिसकी काम वासना शान्त न होती थी। बड़ी दुःखद स्थिति थी उसकी। इस गहरी पीड़ा में उसका कोई साझीदार न था। उसकी कामवासना की परिणति सदा अवसाद में होती है, पर करे भी तो क्या? कोई रास्ता भी तो न था। कामवासना की भीषणता में ध्यान, जप एवं उपवास के सारे प्रयोग निरर्थक चले जाते। अपने आन्तरिक द्वन्द्व व संघर्ष की इसी घड़ी में गुरु ने अपने शिष्य को अपना लिया और शिष्य ने अपने उद्धारक सद्गुरु को पहचान लिया।
  
🔷 विकल वासनाओं से घिरे शिष्य की यही एक चाहत थी कि उसकी वासनाएँ गिरें, उसका चित्त निर्मल हो। गुरुदेव ने उसे आश्वासन भी दिया और कहा कि वह अपने को आश्रम की साफ-सफाई में लगा दें। ऊपर से साधारण दिखने वाले इस काम में शिष्य ने अपने को झोंक दिया। रात-दिन उसका एक ही काम था-जो कहा गया, उसे करना। अपमान तिरस्कारों की झड़ी, शारीरिक व मानसिक परेशानियाँ उसे डिगा न सकीं। गुरुदेव को दिया गया वचन ही उसका जीवन था। ऐसा करते हुए उसकी किशोरावस्था कब प्रौढ़ावस्था में बदल गयी, पता नहीं चला। हालाँकि उसे अपने जीवन के इस तरह बीत जाने का कोई दुःख न था, परन्तु एक पीड़ा अवश्य उसके मन में पलती थी। एक वेदना से अवश्य उसका मन विकल होता था और वह वेदना थी-वासनाओं के आकर्षण की। अभी तक उसका मन पूर्ण निर्मल न हो पाया था।
  
🔶 अपनी इस वेदना को अपने अकेलेपन में जीता हुआ वह गुरु आज्ञा का पालन किये जा रहा था, पर कहीं गहरे छुपे दुःख में वह लिपटा हुआ था। बार-बार उसका आर्त स्वर बाबा सर्वानन्द को पुकार लेता, जो अब अपनी स्थूल देह में नहीं थे। अरे! यह क्या हुआ बाबा? मेरा अन्तस् इतना कलुषित क्यों है? पुकार के स्वर निरन्तर गहरे-घने होते गये। पीड़ा बढ़ती गयी। यह सघन पीड़ा ही उसकी प्रार्थना बन गयी। अपने शिष्य की इस असह्य वेदना को भला कृपालु सद्गुरु कब तक सहन करते। एक दिन वह उसके ध्यान में प्रकट हो गये। बेचारा शिष्य बिलख-बिलख कर रो पड़ा। उसके अन्तस् से यही भाव फूटे-गुरुदेव! आपने जैसा कहा-मैंने वही किया। फिर भी मेरी यह दुर्दशा क्यों है?
  
🔷 उसकी भाव चेतना में उपस्थित बाबा सर्वानन्द की सूक्ष्म चेतना स्पन्दित हुई। वत्स! हम तुम्हारी पीड़ाओं से परिचित हैं। यह सच है कि तुम अभी पूर्ण परिष्कृत नहीं हो पाये हो; परन्तु अपने परिष्कार की राह पर गतिशील हो। तुम्हारे इस वर्तमान जीवन और शरीर की कुछ सीमाएँ हैं। तुम्हें यह जीवन एवं शरीर तुम्हारे विगत दुष्कर्मों के प्रायश्चित के लिए मिला है और वही हो रहा है। प्रत्येक घड़ी-प्रत्येक पल में विभिन्न परिस्थितियों के द्वारा तुम्हारे  चित्त को निर्मल बना रहा हूँ। तुम्हारा सूक्ष्म शरीर भी जाग्रत् होकर परिपक्व होने की दशा में है। इसके सम्पूर्ण विकास के साथ ही तुम्हारी स्थूल देह नष्ट हो जायेगी, क्योंकि इस देह से उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाएँ सम्भव नहीं हैं। ध्यान रहे, जो देह प्रायश्चित के लिए मिलती है, वह अध्यात्म की उच्चतम कक्षा के लिए योग्य नहीं होती। उच्चतम साधनाओं का क्रम तुम अपनी सूक्ष्म चेतना द्वारा पूरा करोगे। अगले जीवन में इसमें और भी विकास होगा। बाबा सर्वानन्द की इन बातों ने शिष्य को यह अनुभव करा दिया कि कृपालु गुरुदेव सदा अपने शिष्य का ध्यान रखते हैं। बस शिष्य उन्हें अपने भावों में अनुभव करता रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 131

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

👉 दानवीर कर्ण

🔷 एक बार भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे, तभी बातों बातों में अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि क्यों कर्ण को दानवीर कहा जाता है और उन्हें नहीं। जबकि दान हम भी बहुत करते हैं।

🔶 यह सुन कर कृष्ण ने दो पर्वतों को सोने में बदल दिया, और अर्जुन से कहा कि वे उनका सारा सोना गाँव वालो के बीच बाट दें ।

🔷 तब अर्जुन गाँव गए और सारे लोगों से कहा कि वे पर्वत के पास जमा हो जाएं क्योंकि वे सोना बांटने जा रहे हैं, यह सुन गाँव वालो ने अर्जुन की जय जयकार करनी शुरू कर दी और अर्जुन छाती चौड़ी कर पर्वत की तरफ चल दिए।

🔶 दो दिन और दो रातों तक अर्जुन ने सोने के पर्वतों को खोदा और सोना गाँव वालो में बांटा। पर पर्वत पर कोई असर नहीं हुआ।

🔷 इसी बीच बहुत से गाँव वाले फिर से कतार में खड़े होकर अपनी बारी आने का इंतज़ार करने लगे। अर्जुन अब थक चुके थे लेकिन अपने अहंकार को नहीं छोड़ रहे थे।

🔶 उन्होंने कृष्ण से कहा कि अब वे थोड़ा आराम करना चाहते हैं और इसके बिना वे खुदाई नहीं कर सकेंगे ।

🔷 तब कृष्ण ने कर्ण को बुलाया और कहा कि सोने के पर्वतों को इन गाँव वालों के बीच में बाट दें।

🔶 कर्ण ने सारे गाँव वालों को बुलाया और कहा कि ये दोनों सोने के पर्वत उनके ही हैं और वे आ कर सोना प्राप्त कर लें। आैर एेसा कहकर वह वहां से चले गए।

🔷 अर्जुन भौंचक्के रह गए और सोचने लगे कि यह ख्याल उनके दिमाग में क्यों नहीं आया।

🔶 तब कृष्ण मुस्कुराये और अर्जुन से बोले कि तुम्हें सोने से मोह हो गया था

🔷 और तुम गाँव वालो को उतना ही सोना दे रहे थे जितना तुम्हें लगता था कि उन्हें जरुरत है। इसलिए सोने को दान में कितना देना है इसका आकार तुम तय कर रहे थे।

🔶 लेकिन कर्ण ने इस तरह से नहीं सोचा और दान देने के बाद कर्ण वहां से दूर चले गए। वे नहीं चाहते थे कि कोई उनकी प्रशंसा करे और ना ही उन्हें इस बात से कोई फर्क पड़ता था कि कोई उनके पीछे उनके बारे में क्या बोलता है।

🔷 यह उस व्यक्ति की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हासिल हो चुका है। दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना उपहार नहीं सौदा कहलाता है।
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🔶 अत: यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमें ऐसा बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए ताकि यह हमारा सत्कर्म हो ना कि हमारा अहंकार

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 April 2018

👉 The Criterion for Self-evaluation

🔷 An individual’s goodness should be judged on the basis of the extent to which he/she has been able to live up to eminent human values and has fostered their development. Talents and abilities are just means or tools. A cane and a knife, on their own, are neither praiseworthy nor blameworthy. They can be commended or condemned, depending on whether they were used for defending oneself or to hurt someone.

🔶 Likewise, the talents and capabilities of man are the means only. It is his thoughts and actions which decide and thus, hint at how and where his talents and abilities are being utilized. If his thoughts and actions are honorable, his talents and capabilities would also be honorable. However, if his thoughts and actions are wicked, his talents and abilities would also be wicked.

🔷 Individual’s dignity and honor should not be associated with having such material means (like talents, capabilities, achievements, status, riches, etc.) but with the noble thoughts and noble activities which actually nurture and guide those means. This should be the only criterion for giving or receiving honor.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (5.13)

👉 श्रेष्ठ जीवन

🔷 मित्रो ! भगवान के दो हाथ हैं। एक हाथ से वह पीडि़त होकर के माँगता है, पतित होकर के माँगता है। आप पतितों की सहायता कीजिए, पीडि़तों की सहायता कीजिए। पीडि़तों की और पतितों की आप सहायता न करें तब? तब बेटे ! मुश्किल है। तब आपको भगवान मिल पाएगा? भगवान का अनुग्रह आपको मिल जाएगा? मैं सोचता हूँ कि तब भगवान आपको नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि आपके अंदर न करुणा है, न आपके भीतर सदाशयता है।

🔶 आपके भीतर तो केवल हवस काम करती है और इस हवस की आग में आप उन्हें भी जलाना चाहतें हैं, जिसमें आप जल गए; आपका परलोक जल गया; आप का ध्यान जल गया; आपका कुटुंब जल गया। अब कौन रह गया है? अब संतोषी माता और रह गई है और जो कोई भी रह गया है, उसे भी इसी नरक में जला डालिए अभागो! जिसमें कि आप जल रहे हैं। हवसों की आग, ख्वाहिशों की आग, वासनाओं की आग, तृष्णाओं की आग में संतोषी माता को भी भून डालिए।

🔷 अरे अभागो! अपने आप को भूनिए, परंतु उनको तो अपनी जगह पर रहने दीजिए। क्या कीजिए? उदात्त जीवन, श्रेष्ठ जीवन, परोपकारी जीवन, शानदार जीवन, दूसरों के दु:खों में सम्मिलित होने वाला जीवन, संसार में सत्प्रवृत्तियों का संवद्र्धन करने वाला जीवन जिएँ। यही अध्यात्म है। यदि आपको यह सब आ गया तो आप निहाल हो जाएँगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Saint Eknath's Offering to a Donkey

🔷 Once upon a time a group of saints were carrying the pious water of the river Ganga from Prayag in north India, to offer to Lord Shiva at Rameshwaram in the South. It was a long and arduous journey. Saint Eknath was with them. When they were crossing a vast desert, they saw a donkey dying of thirst. Saint Eknath immediately offered his water to the donkey and saved his life.

🔶 The other saints in the group were furious, and considered it an insult to the Lord Shiva, since the water meant for offering to the God had been wasted on a donkey. Saint Eknath explained his act very calmly, "O wise men, you have read again and again in the holy books that God is everywhere. Then, why are you so upset? Any thing that is not utilized at the right moment is useless. The water that this dying donkey drank has reached straight to Lord Shiva in Rameshwaram!"

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 8)

🔷 भगवान क्या है? बताइए आप। एक भगवान तो वह है, जो सारे विश्व में छाया हुआ है, सारे नियमों की व्यवस्था बनाता है। वे एक तरह के नियम हैं, कायदा और कानून हैं, जिसको हम परब्रह्म कहते हैं। एक और भी ब्रह्म है? अँग्रेजी में इसको सुपरकान्शस (सुपर चेतन) कहते हैं। वेदान्त की भाषा में इसको ‘स्व’ कहा गया है, आत्मा कहा गया है। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यातिसव्यः। अरे लोगो! अपने आप को जानो, अपने आपको समझो, अपने आपको सुधारो, अपने आपको ठीक करो। यह कैसे हो सकता है? अपने आप। अपने आपसे क्या मतलब? अपने आपसे मतलब है—सुपर चेतना से, जो हमारे भीतर है, जिसके बारे में शुरू में बताया गया है। भीतर के अन्तःकरण में व्यक्तित्व है, जिसमें कि गुण, कर्म और स्वभाव भरे पड़े हैं, जिसमें विश्वास और मान्यताएँ भरी पड़ी हैं; जिसमें आदतें भरी पड़ी हैं।

🔶 आदतों को आपको ठीक करना है। अपनी मान्यताओं में, जिसमें घिनौनेपन घुसे बैठे हैं, उनमें आपको सुधार करना है, शुरू से लेकर अन्त तक देख−भाल करनी है, उनको ठीक करना है। आपको आत्मदेव की उपासना करनी है। उपासना के बारे में जो हम कल कह रहे थे, वास्तव में वह आपका आत्मदेव है। अपने आपकी उपासना किया कीजिए। अपने आपकी उपासना जो कर लेते हैं, वह अपने आप ही, अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया और एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था।

🔷 अपने आपका, व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना—ये बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए? चौबीसों घण्टे आपको ध्यान रखना चाहिए। क्या ध्यान रखना चाहिए? कि हमारा जीवन किस तरीके से ठीक बन सकता है? आपको अपने कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए। आपको अपने ज्ञान को परिष्कृत करना चाहिए और अपनी भक्ति-भावना का विकास करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 85)

👉 ‘गुरुसेवा’  ही सच्ची साधना

🔷 भगवान् महेश्वर इस कथा के अगले प्रकरण में कहते हैं-

मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम्। स्मृतिवेदार्थवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदम्॥ १०७॥  
श्रुतिस्मृती अविज्ञाय केवलं गुरुसेवकाः। ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः॥ १०८॥

नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत् परम्। सर्व ब्रह्म निराभासं दीपो दीपान्तरं यथा॥ १०९॥
गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामं निरीक्षयेत्। अनेन गुरुमार्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्त्तते॥ ११०॥

🔶 गुरु ये दो अक्षर अपने में महामंत्र है। यह महामंत्र सभी मंत्रों का राजा है। सभी स्मृतियों एवं वेदवाक्यों का मर्म यही है कि गुरु ही स्वयं परमपद है॥ १०७॥  जो शिष्य अपने गुरुदेव की सेवा में तल्लीन है, वे भले ही श्रुतियों व स्मृतियों को न जानते हों, पर वे हैं सच्चे संन्यासी। इसके विपरीत जो गुरुसेवा से विमुख हैं, वे भले ही संन्यासी का वेष धारण किये हों, पर केवल निरवेषधारी हैं। उनमें कोई आध्यात्मिक तत्त्व नहीं हैं॥ १०८॥ नित्य निराकार, निर्गुण ब्रह्म का बोध केवल गुरु कृपा से मिलता है। जिस तरह दीप से दीप जलता है, उसी तरह से गुरुदेव शिष्य के अन्तस् में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं॥ १०९॥ शिष्य को चाहिए कि वह अपनी सद्गुरु कृपा की छाँव में आत्मतत्त्व का चिंतन करे। ऐसा करते रहने पर गुरुदेव के द्वारा दिखाए मार्ग से स्वतः आत्मज्ञान हो जायेगा॥ ११०॥
  
🔷 भगवान् शूलपाणि के इन बोध वचनों में ऐसा अलौकिक प्रकाश है, जो शिष्यों के आध्यात्मिक पथ को प्रशस्त कर देता है। शिष्य के लिए गुरुसेवा ‘साधना’ है। गुरु सेवा का अर्थ है—गुरुदेव जो भी कहें, जैसा भी काम सौपें—वैसा ही करना। कई बार गुरुदेव द्वारा कहे गये कार्य को बड़ी सांसारिक, लौकिक एवं सामाजिक रीति से आँकते हैं और ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि गुरुदेव तो संसार की सभी बातों से परे हैं, फिर भला वे सांसारिक कैसे हो सकते हैं?

🔶 वे यदि शिष्य को काँटों भरी डगर से गुजारते हैं, तो केवल इसलिए कि इससे उसका कल्याण होगा। उनके द्वारा दिये गये प्रत्येक कष्ट में भविष्य के अनेकों सुखद् अहसास समाये होते हैं। पर इसे केवल वही समझ पाता, जिसका हृदय भक्ति की भावनाओं से भरा है। ऐसी भावनाएँ जिसकी चेतना में अंकुरित हैं-वह जानता है, गुरुदेव तो केवल अपनी ज्ञान ज्योति से शिष्य में ब्रह्मज्ञान की परम ज्योति जला रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 130

रविवार, 8 अप्रैल 2018

👉 रामकृष्ण परमहंस और माँ काली

🔶 रामकृष्ण भी मरते वक्त कैंसर से मरे। गले का कैंसर था। पानी भी भीतर जाना मुश्किल हो गया, भोजन भी जाना मुश्किल हो गया। तो विवेकानंद ने एक दिन रामकृष्ण को कहा कि आप, आप कह क्यों नहीं देते काली को, मां को? एक क्षण की बात है, आप कह दें, और गला ठीक हो जाएगा! तो रामकृष्ण हंसते, कुछ बोलते नहीं।

🔷 एक दिन बहुत आग्रह किया तो रामकृष्ण ने कहा, तू समझता नहीं। जो अपना किया है, उसका निपटारा कर लेना जरूरी है। नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर आना पड़ेगा। तो जो हो रहा है, उसे हो जाने देना उचित है। उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है।

🔶 विवेकानंद ने कहा कि न इतना कहें, इतना ही कह दें कम से कम कि गला इस योग्य तो रहे जीते जी कि पानी जा सके, भोजन जा सके! हमें बड़ा असह्य कष्ट होता है। तो रामकृष्ण ने कहा, आज मैं कहूंगा।

🔷 सुबह जब वे उठे, तो बहुत हंसने लगे और उन्होंने कहा, बड़ी मजाक रही। मैंने मां को कहा, तो मां ने कहा कि इसी गले से कोई ठेका है? दूसरों के गलों से भोजन करने में तुझे क्या तकलीफ है? तो रामकृष्ण ने कहा कि तेरी बात में आकर मुझे तक बुद्ध बनना पड़ा है! नाहक तू मेरे पीछे पड़ा था। और यह बात सच है, जाहिर है, इसी गले का क्या ठेका है? तो आज से जब तू भोजन करे, समझना कि मैं तेरे गले से भोजन कर रहा हूँ।

🔶 फिर रामकृष्ण बहुत हंसते थे उस दिन, दिन भर। डाक्टर आए और उन्होंने कहा, आप हंस रहे हैं? और शरीर की अवस्था ऐसी है कि इससे ज्यादा पीड़ा की स्थिति नहीं हो सकती! रामकृष्ण ने कहा, हंस रहा हूं इससे कि मेरी बुद्धि को क्या हो गया कि मुझे खुद खयाल न आया कि सभी गले अपने हैं। सभी गलों से अब मैं भोजन करूंगा! अब इस एक गले की क्या जिद करनी है।

👉 Importance of daily worship

🔶 It isn’t right to completely omit or give up the daily routine of prayer to God. Even if one finds it uninteresting, he/she should make determined and relentless efforts to include worship in their daily routine.

🔷 Whenever someone has been able to attain spiritual power or inner powers, their faith and worship have always been contributory factors in one way or another.  We should remember and contemplate on the Supreme Being who is omnipresent, impartial, just and the one who gets
pleased or displeased depending only on the qualities of person’s thoughts and actions.

🔶 The daily worship of that Supreme Being must be done in one form or another, even if it may be only a fifteen-minute slot on waking up or just before going to bed. This is a matter of having interest in it rather than having a spare time to be able to do it.

🔷 As soon as one gets interested in daily worship, they will start to enjoy it and what is more, they will also find some spare time to do it however busy their life may be!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (5.9)

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 April 2018

👉 आज का सद्चिंतन 9 April 2018


👉 King JanaShruti and Saint Raikya

🔶 King Janashruti had obtained the ability to understand bird's language. One morning he heard a pair of swans talking to each other. One of them said, "I consider Saint Raikya to be even greater than King Janashruti, since the saint is always engaged in helping out others." Hearing this, the King felt offended. The next day he called for saint Raikya, who used to drive a chariot for a living. The King offered many gifts to the saint and said, "I have heard great praise about you.

🔷 Will you please teach me the spiritual science?" The saint's reply was very simple, "O King, if you truly wish to learn spirituality, make yourself pious from the inside. Suppress your ego and be meek and you shall attain true wisdom." The King realized his folly. He corrected himself and instead of boasting about his achievements he tried to develop true greatness from within.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 7)

🔶 रामू के बारे में सुना है न आपने। रामू नाम का एक लड़का था। आगरा जिले के भेड़ियों की माँद में पाया गया इनसान का बच्चा था। भेड़िये उठा के ले गए; पर खाया नहीं, पाल लिया उन्होंने। शिकारियों ने भेड़ियों को मार करके उस रामू मनुष्य के बच्चे को पकड़ लिया। फिर क्या हुआ? वह जंगली जानवरों के तरीके से रहता था। बोलता भी वैसे ही था, चलता भी वैसे ही था। कच्चा माँस खाता था। कुछ भी नहीं आया। उसको लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कर दिया गया। चौदह वर्ष की उम्र तक जिया; लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी कुछ नहीं आया, कुछ बन नहीं सका। क्यों? क्योंकि छोटी उम्र में संस्कार नहीं डाले गये थे।

🔷 संस्कार डालना आदमी के लिए बेहद जरूरी है। संस्कार के बिना आदमी स्वभाव का कैसा हो सकता है? फूहड़ है, अनगढ़ है, बेहूदा है। इसलिए आपको, अपने आपको संस्कारवान स्वयं बनाना चाहिए। कौन बनाएगा? दूसरा कहाँ तक बनाएगा? बचपन में तो होता भी है। गुरुकुलों में ऋषि लोग छोटे बच्चों को महापुरुष बनाने की शिक्षा देते थे। आरण्यकों में वानप्रस्थों को भरती करने के बाद में शिक्षण देने की बात भी चलती है; पर सामान्य जीवन कैसे चले? बताइए आप।

🔶 सामान्य जीवन में कौन पीछे लगेगा आपके? एक-एक गलती, एक-एक विचारधारा, एक-एक भूल के बारे में कौन सुधार करे? इसलिए ये काम आप को स्वयं ही करना पड़ेगा। आप ही अपने गुरु हैं, आप ही अपने शिक्षक हैं और आप ही अपने साधक हैं, आप ही अपने मार्गदर्शक हैं। अगर आप यह समझ लें, तो आपके जिम्मे एक ही काम रह जाता है कि आप अपने आपको सुधारिए, आप अपने आप को सँभालिए, आप अपने आप को ठीक कीजिए और अपने भगवान के नजदीक जाइए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 84)

👉 ‘गुरुसेवा’  ही सच्ची साधना

🔶 गुरुगीता शिष्यों के लिए आध्यात्मिक कल्पतरु है, जो शिष्य इसके मंत्रों के मर्म को जान लेते हैं, उन्हें जीवन की सभी आध्यात्मिक सफलताएँ मिलती हैं। इस सत्य को वे सभी अपनी अनुभूति बना सकते हैं, जिनके अन्तस् में शिष्यत्व की सजल संवेदना प्रवाहित है। शिष्यत्व उर्वर कृषि भूमि है और आध्यात्मिकता बीज। जिसे कृपालु सद्गुरु न केवल अपने शिष्यों के अन्तःकरण में बोते हैं, बल्कि इसके अंकुरण के लिए उपयोगी खाद-पानी भी जुटाते हैं। सद्गुरु तो सदा होते ही हैं—भाव संवेदनाओं की साकार मूर्ति। उन्हें तो हमेशा कृपा करना आता है। पर इसके लिए सत्पात्र भी तो हो। सुशिष्य ही सत्पात्र होते हैं। उनकी अन्तर्भूमि ही आध्यात्मिक बीजों के लिए उर्वर व उपयोगी होती है। यह उपयोगिता व उत्कृष्टता तब और सघन हो जाती है, जब उन्हें गुरुगीता की सघन आध्यात्मिक छाँव प्राप्त हो।
  
🔷 पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् भोलेनाथ ने शिष्यों को चेताया है कि वे कभी भी किसी भी अवस्था में सद्गुरु की अवहेलना न करें। परिस्थितियाँ कुछ भी हों, पर वे अपने सद्गुरु के प्रति न केवल शिष्ट, शालीन व विनम्र रहें, बल्कि भक्तिपूर्ण भी हों। गुरुदेव के हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है। फिर यह कार्य ऊपरी तौर पर देखने से कितना ही निरर्थक क्यों न लग रहा हो। गुरु की अवहेलना करने वाला बुद्धिमान होने पर भी ब्रह्म राक्षस की तरह अभिशप्त हो जाता है। विश्व की सभी आध्यात्मिक शक्तियों के रुष्ट होने पर सद्गुरु त्राण कर लेते हैं, परन्तु गुरुदेव के रुष्ट होने पर कोई त्राणदाता नहीं मिलता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 128

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 April 2018

👉 आज का सद्चिंतन 8 April 2018


शनिवार, 7 अप्रैल 2018

👉 आनन्द की खोज

🔷 मित्रो! आनन्द की खोज में भटकता हुआ इन्सान, दरवाजे-दरवाजे पर टकराता फिरता है। बहुत-सा रुपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, सुस्वाद भोजन करें, सुन्दर वस्त्र पहनें, बढिय़ा मकान और सवारियाँ हों, नौकर-चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, बंधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हो, समाज में  प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो। ये चीजें आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें ये चीजें उपलब्ध नहीं होती, वे प्राप्त करने की कोशिश करते है। जिनके पास हैं, वे उससे अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं।

🔶 इन सब तस्वीरों में आनन्द खोज करते-करते चिरकाल बीत गया, पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती! उसकी तो खोज ही नहीं की, मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया, लम्बी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी। मन ने कहा-जरा इसे और देख लूँ। आँखों से न दीख पडऩे वाले मानसरोवर में मोती मिल ही जाएँगे, इसकी क्या गारंटी है। फिर ओस चाटी और फडफ़ड़ाया, फिर यही पहिया चलता रहता है। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं, वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ी और धूल में समा गईं।
  
🔷 यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है, फिर भी नाशवान चीजों का नाश होता ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 7 April 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 April 2018

👉 Family Balance

🔷 Not all members of the family have the same nature. Each one of them carries their own nature and habits. No matter how much we may want to, we simply cannot mold everyone to our liking. The intelligent thing is to be close to people with whom behavioral harmony is possible, with whom we can stay mutually bound with the soft yet strong strands of love and compassion.

🔶 A compromising yet idealistic middle path is what we need in order to infuse love, harmony, and progressive energy into the small community that is the family. Those who practice this crucial balance do not lack in familial happiness, even if there may be plenty of room for growth and improvement in their personality

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:3.35

👉 Lost Confidence Led to Karna's Defeat

🔷 In the epic war of Mahabharat, the great warrior Karna was on Duryodhan's side. He had a very clever charioteer, Shalya. Since, Duryodhan was fighting for an evil cause, Lord Krishna secretly told Shalya, "Although you have given your word to support Duryoudhan by becoming Karna's charioteer, you can still help the righteous cause by constantly, discouraging and demoralizing Karna during the battle."

🔶 Although, Karna was a great warrior, he ultimately lost the battle with Arjuna, just because he lost his confidence, due to constant demoralizing and discouragement by Shalya. Success can not be achieved if one looses his confidence. Self-confidence guarantees success provided the objective is morally correct.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 6)

🔷 आध्यात्मिकता के रास्ते पर, जहाँ भगवान का पल्ला पकड़ना पड़ता है, वहाँ दूसरा वाला कदम ये उठाना पड़ता है कि हमारी जीवन की साधना क्रमबद्ध है कि नहीं, हमने अपने को साध लिया है कि नहीं। साध लेने से आदमी का मूल्य बढ़ जाता है। आप जानते हैं न! साँप को मदारी लोग पाल लेते हैं और सिखा लेते हैं। वो साँप जो आमतौर से हर आदमी को काट खाता है, वही साँप मदारी के बाल-बच्चों के गुजारे का माध्यम बन जाता है। बन्दर के बारे में आप जानते हैं न। बन्दर कितना वाहियात! किसी के कपड़े उठा के भाग जाता है, किसी को काट खाता है, किसी को क्या करता है; लेकिन वही बन्दर पाल लिया जाता है, सिखा लिया जाता है, साध लिया जाता है, तो मदारी के बाल-बच्चों का गुजारा करने के लिए वही सबसे बड़ा स्त्रोत हो जाता है।

🔶 रीछ जानते हैं, कैसा खौफनाक होता है। लेकिन रीछ जब पाल लिये जाते हैं, साध लिये जाते हैं, तब रीछ ही अपने पालने वाले का गुजारा कर देता है। सर्कस के बारे में आप जानते हैं न। शेर कितना भयंकर और दूसरे जानवर कितने भयंकर! लेकिन रिंगमास्टर के द्वारा जब साध लिए जाते हैं, तो सर्कस के मालिक को एक-एक दिन में हजारों रुपये कमा करके देते हैं। शेर, जो किसी को भी मार डाल सकते हैं, मालिक को दो-दो हजार रुपया रोज कमा करके देते हैं। ये कैसे हो सका? साधना के द्वारा। साधना जैसे जंगली जानवरों की, की जा सकती है। साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है।

🔷 डारविन ने कहा था कि इनसान बन्दर की औलाद है; बन्दर नहीं है, वह बन्दर का भाई-बन्धु है। वनमानुष होते हैं, जंगलों में रहते हैं, देखे हैं न आपने? न इनको कपड़ा पहनना आता है, न इनकी कोई सभ्यता है, न इनकी कोई बातचीत है। ऐसे किसी तरीके से जैसे बन्दर पाल लिये जाते हैं, ऐसे एक वनमानुष के तरीके से वे लोग भी गुजारा कर लेते हैं, जिनको लोग जंगली कहते हैं। जंगली लोग को नर-पशुओं में गिना जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 83)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति
🔷 विद्यार्थी जीवन में उसका परिचय एक अघोर साधक से हुआ। यह अघोर साधक जिसे सभी अघोरी कहते थे, कई आश्चर्यजनक सिद्धियों-शक्तियों का स्वामी था। एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में बदल देना उसके लिए साधारण कौतुक भर था। मिठाई को विष्ठा बना देना और सड़े मांस को सुगन्धित, सुरभित मिष्टान्न में परिवर्तित कर देना उसके लिए पलक झपकाने भर का काम था। पंचभूतों के अणु-परमाणु को अपने संकल्प बल से एकत्रित करके किसी भी वस्तु को साकार कर देना भी उसके लिए सामान्य सी बात थी और भी अनेकों आश्चर्यजनक सिद्धियाँ उसके पास थीं। अपनी इन सारी शक्तियों के बावजूद यह अघोर साधक बड़ा व्यथित, पीड़ित रहा करता था। यहाँ तक कि कभी-कभी शून्य में तकते हुए उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकलती।
  
🔶 एक दिन इस विद्यार्थी ने उससे पूछा- बाबा! आप बीच-बीच में इतने दुःखी क्यों हो जाते हैं? आपके पास तो इतनी सिद्धियाँ हैं, फिर भी आप रोने लगते हैं? जवाब में उसने लगभग बिलखते हुए कहा- बेटा! तू शायद अभी समझेगा नहीं। पर चल तुझे बताकर अपना मन हलका कर लेता हूँ। तू पूछता है तो सुन ले- मेरा भगवान् मुझसे रूठ गया है। मेरा गुरु मुझसे नाराज है। उसने मुझे एक हजार साल तक भटकते रहने का शाप दिया है। बाबा की ये अटपटी बातें इस विद्यार्थी के पल्ले नहीं पड़ीं। उसने बस यूँ ही पूछा- तब कितने साल हो गए आपको भटकते हुए। ७५० साल, उसने बड़े इत्मिनान से जवाब दिया।
  
🔷 इस जवाब ने पूछने वाले को गहरी हैरानी में डाल दिया। उसने कहा—पर आप तो केवल ५०-६० साल के लगते हैं। यह बात सुनकर वह जोर से हँसा और बोला- अरे, मैं शरीर की बात थोड़े ही करता हूँ। इस शरीर की तो यही उम्र होगी। मैं तो अपनी बात करता हूँ। शरीर तो  जब भी पुराना हो जाता है, मैं उसे छोड़कर किसी युवा मृत शरीर में प्रवेश कर जाता हूँ। साँप काटे हुए व्यक्ति को प्रायः लोग बहा देते हैं। ऐसे ही किसी शरीर को मैं अपना बना लेता हूँ।
  
🔶 पर आपके गुरु नाराज क्यों हुए? गुरु तो बड़े कृपालु होते हैं। सिद्धियों के घमण्ड से? अरे बेटा! मुझे अपनी साधना और सिद्धियों का भारी घमण्ड हो गया था। इस घमण्ड के कारण मैं किसी को कुछ नहीं समझता था। यहाँ तक कि लोगों के बहकावे में आकर मैं स्वयं को भगवान् मानने लगा था। इसी अहं के कारण एक दिन मैंने अपने गुरु को भी खरी-खोटी सुना दी। इस पर गुरुदेव ने कहा- तू क्या समझता है सिद्धियों से कोई भगवान् हो जाता है। जा तू अब १००० साल तक भटक और सिद्धियों के दंश को झेल। बस, बेटा तब से मैं नए-नए शरीरों में रहते हुए सिद्धियों के शाप को झेल रहा हूँ।
  
🔷 अपनी बात कहते हुए उसने पूछने वाले के सिर पर प्यार से हाथ रखा और बोला- बेटा! आगे कुछ सालों के बाद तुझे तेरे गुरु मिलेंगे। तू कभी भी उनकी बात की अवहेलना न करना। उनकी सब बातें मानना और सिद्धियों के जाल में मत उलझना। सबसे सच्ची सिद्धि तो गुरुभक्ति है। जिसे यह मिल गई, उसे समझो सब कुछ मिल गया। इस सिद्धि का उपाय क्या है? यह अगले मंत्र में स्पष्ट किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 127

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

👉 छोटी सी गलती, इतनी बड़ी सजा?

🔶 एक बार की बात है। एक राजा था। स्वभाव से वह बहुत क्रूर इंसान था। जिससे नाराज हो जाता, उसके प्राण लेने में देर नहीं लगाता। राजा के एक विश्वासपात्र अनुभवी मंत्री से एक छोटी सी गलती हो गयी। गलती तो जरा सी थी, पर राजा आख‍िर राजा ठहरा। यही कारण था कि वह मंत्री की उस छोटी सी भी गलती को भी बर्दाश्त न कर सका। उसने क्रोधित होकर मंत्री को शिकारी कुत्तों के आगे फिंकवाने का हुक्म दे दिया।

🔷 राजमहल के नियम के अनुसार मंत्री को कुत्तों के आगे फेंकने से पहले उसकी अंति‍म इच्छा पूछी गयी। मंत्री हाथ जोड़कर बोला- “महाराज! मैंने आपका नमक खाया है।''

🔶 कहते हुए मंत्री ने एक लम्बी सी सांस ली और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई, ''एक आज्ञाकारी सेवक के रूप में आपकी 10 सालों से सेवा करता आ रहा हूं।''

🔷 ''तुम सही कह रहे हो,'' राजा ने कोबरा नाग की तरह फुंफकारते हुए जवाब दिया, ''लेकिन यह याद दिला कर तुम इस सजा से नहीं बच सकते।''

🔶 ''नहीं महाराज, मैं सजा से बचना नहीं चाहता,'' मंत्री ने अपने हाथ पुन: जोड़ दिये, ''बस आपसे एक छोटा सा निवेदन है। अगर, मेरी स्वामीभक्ति को देखते हुए मुझे 10 दिनों की मोहलत जाती, तो आपका बड़ा एहसान होता। मैं अपने कुछ अधूरे कार्य...।”

🔷 कहते हुए मंत्री ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और राजा की ओर देखा। राजा ने दयालुता दिखाते हुए मंत्री की सजा दस दिनों के लिए मुल्तवी कर दी और दस दिनों के लिए दरबार भंग कर दिया।

🔶 दस दिनों के बाद राजा का दरबार पुन: लगा। सैनिकों ने मंत्री को राजा के सामने प्रस्तुत किया। राजा ने एक बार मंत्री की ओर देखा और फिर मंत्री को दरबार हाल के बगल में मौजूद खूंख्वार कुत्तों के बाड़े में फेंकने का इशारा कर दिया। सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन किया। मंत्री को खूंख्वार जंगली कुत्तों के बाड़े में फेंक दिया गया।

🔷 परंतु यह क्या? कुत्ते मंत्री पर टूट पड़ने की बजाए अपनी पूँछ हिला-हिला कर उसके आगे-पीछे घूमने लगे। यह देखकर राजा भौंचक्का रह गया। वह दहाड़ते हुए बोलो, ''ये क्या हो रहा है? ये खूंख्वार कुत्ते इस तरह का व्यवहार क्याें कर रहे हैं?”

🔶 यह सुनकर मंत्री बोला, ''राजन! मैंने आपसे जो 10 दिनों की मोहलत मांगी थी, उसका एक-एक क्षण इन बेजुबानों की सेवा में लगाया है। मैं रोज इन कुत्तों को खिलाता-पिलाता था और इनकी सेवा करता था। यही कारण है कि ये कुत्ते खूंख्वार और जंगली होकर भी मेरी दस दिनों की सेवा नहीं भुला पा रहे हैं। परन्तु खेद है कि आप मेरी एक छोटी सी गल्ती पर मेरी 10 वर्षों की स्वामी भक्ति को भूल गए और मुझे मौत की सजा सुना दी!”

🔷 यह सुनकर राजा को भारी पश्चाताप हुआ। उसने तत्काल मंत्री को आज़ाद करने का हुक्म दिया और आगे से ऐसी गलती ना करने की सौगंध ली।

🔶 दोस्तों, वह राजा तो पश्चाताप करके अपनी भूल को सुधार गया। हमें भी उसी तरह क्षमाशील होना चाहिये।

🔷 हम भी प्रण करें कि हम भी किसी की हज़ार अच्छाइयों को उसकी एक बुराई के सामने छोटा नहीं होने देंगे और किसी की एक छोटी सी गलती के लिए उसे उस राजा की तरह इतनी बड़ी सजा नहीं देंगे!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 April 2018


👉 From one to many: its desirable and its necessary

🔶 The need as well as the desire to multiply and to go from being one to being many is what created this world. The creator thought that there was no joy nor meaning in being alone and that the universe must grow and expand. This wish turned into a resolution which manifested into the creation. Man is born with this innate tradition of procreation. This is the fire that burns in his heart - to grow and to expand. This is what subtly and subconsciously propels us humans toward socializing with friends, seeking large gatherings such as fairs and festivals, living in communities, wanting to grow into a family, and wanting to lead. The plant life follows this tradition as well. The tendency to multiply has given plant life a chance to prosper. This divine tradition of procreation is what is behind physical yearning, reproduction, marriage, relationships, and familial love. There is no escaping this tradition.

🔷 Nature has tied us beings with this material attraction so we may always strive to grow and expand. This is why mothers have such grand and deep love. This is why we accept the commitment and bonding of marriage. We enjoy these bonds despite the additional complexity and despite the additional responsibilities. We enjoy them because they provide a medium for us to satisfy our deep rooted internal desire of going "from one to many".

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (3.26)

👉 महान कैसे बनें?

🔶 मित्रो ! तुम्हें ऐसे व्यक्तियों का प्रेमपात्र बनने का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए जो कष्ट पडऩे पर तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और बुराइयों से बचाने की एवं निराशा में आशा का संचार करने की क्षमता रख्रते हैं।
  
🔷 खुशामदी और चापलूसों से घिर जाना आसान है। मतलबी दोस्त तो पल भर में इक्कठे हो सकते हैं, पर ऐसे व्यक्तियों का मिलना कठिन है, जो कड़वी समालोचना कर सकें, जो खरी सलाह दे सकें,फटकार सकें और खतरों से सावधान कर सकें । राजा और साहूकारों की मित्रता मूल्यवान् समझी जाती है, पर सबसे उत्तम मित्रता उन धार्मिक पुरूषों की है, जिनकी आत्मा महान् है। जिसके पास पूँजी नहीं है, वह कैसा व्यापारी? जिसके पास सच्चे मित्र नहीं हैं, वह कैसा बुद्धिमान? उन्नति के साधनों में इस बात का बड़ा मूल्य है, कि मनुष्य को श्रेष्ठ मित्रों का सहयोग प्राप्त हो। बहुत से शत्रु उत्पन्न कर लेना मूर्खता है, पर उससे भी बढ़कर मूर्खता है, यह है कि भले व्यक्तियों की मित्रता को छोड़ दिया जाए।
  
🔶 निर्मल बुद्धि और श्रम में श्रद्धा, यही दो वस्तुएँ तो किसी मनुष्य को महान् बनाने वाली हैं। उत्तम गुणों को अपनाने से नीच व्यक्ति उच्च बन सकते हैं और दुर्गुणों के द्वारा बड़े व्यक्ति छोटे हो जाते हैं। निरंतर लगन, सावधानी, समय का सदुपयोग छोटे को बड़ा बना सकते हैं, हीन मनुष्यों को कुलीन बना सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Laxman's Self-Confidence

🔶 During the epic Ram-Ravana war, the demon Meghnath used a spiritual weapon called Shakti and Laxman fell down unconscious. Hanumanji had to arrange the Sanjeevni medication to revive him. The second time when he faced Meghnath in the battle, Laxman easily overpowered the demon and killed him. Why couldn't he achieve this feat in the first attempt?

🔷 The difference was that Laxman lacked self-confidence. When his elder brother Ram reminded him of his immense potential and limitless powers, the energy of self-confidence aroused in him and he was successful.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 5)

🔶 हमारा जीवन अनगढ़ है; चौरासी लाख योनियाँ घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा हैं और वे कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार के तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हमको आगे नहीं बढ़ने देंगे और ये हथकड़ियों और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे; न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे। इसलिए कुसंस्कारों के विरुद्ध जद्दोजहद करना—ये हमारा काम है। साधना इसी का नाम है। साधना करने से आपने देखा है न, कितनी घटिया-घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या-से बन जाती हैं! आदमी पेड़ों को काटता है, छाँटता है, कलम लगाता है। जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाये हुए पेड़ उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं! रंग-बिरंगे फूल आते हैं।

🔷 ये माली के हाथ की करामात है। क्यों? उन्हीं गुलाबों को जो जंगल में रहते हैं, खुशबू भी नहीं आती, बहुत छोटे-छोटे फूल होते हैं, उन्हीं गुलाबों को ऐसा बना देता है। इसका नाम क्या है? इसका नाम कलम लगाना कहिये, सुसंस्कारिता कहिये अथवा माली की साधना पौधे के साथ और आपकी जीवात्मा की साधना अपने जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना लें, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा लें, फिर मजा आ जाएगा। फिर देखिये आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब से आपको कीमत मिलनी शुरू हो जाएगी। आप एम.ए. तक पढ़े हैं, तो ज्यादा पैसा मिलेगा—मैट्रिक तक पढ़े हैं, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी हैं, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा।

🔶 पात्रता बढ़ाइये न, कीमत बढ़ाइये न अपनी और जो चाहते हैं पाइये। कीमत आप बढ़ाना नहीं चाहते, माँग करके लेना चाहते हैं। प्रार्थना करेंगे—माँगेंगे, माँगेंगे, माँगेंगे। अरे बाबा! माँगने से तो पाँच पैसे भी नहीं मिलते; उसमें भी पात्रता की जरूरत होती है। अन्धा, कोढ़ी होगा, तो शाम तक उसकी भीख में दो रुपये आ जाएँगे; हट्टा-कट्टा होगा, तो देगा नहीं, गालियाँ और सुनाएगा तुझे शर्म नहीं आती बेशर्म! भीख माँगने चला आया। काम, मेहनत, मजदूरी क्यों नहीं करता? पात्रता तो भिखारी को भी चाहिए, फिर सामान्य लोगों का तो पात्रता के बिना दुनिया में कुछ नहीं चलता। इसलिए पात्रता के लिए अपने गुण, अपने कर्म, अपने स्वभाव इन तीनों चीजों को परिष्कृत करना हर आदमी के लिए बेहद जरूरी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 82)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति

🔶 भगवान् सदाशिव गुरुगीता के अगले प्रकरण में कहते हैं कि यदि भूल से, प्रभाव से अथवा अहंकारवश यदि कोई शिष्य गुरुवचनों की अवहेलना करता है, तो उसका अध्यात्म मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। माँ भवानी से इस प्रकरण को स्पष्ट करते हुए भोले बाबा कहते हैं-

एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दां करोति यः। स याति नरकं घोरं यावच् चन्द्रदिवाकरौ॥ १०१॥
यावत्कल्पांतको देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्। गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत्॥ १०२॥

हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञैः शिष्यैः कथञ्चन। गुरोरग्रे न वक्तव्यम् असत्यं च कदाचन॥ १०३॥
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुंनिर्जित्य वादतः। अरण्ये निर्जले देशे स भवेद् ब्रह्मराक्षसः॥ १०४॥

मुनिभिः पन्नगैर्वाऽपि सुरैर्वा शापितो यदि। कालमृत्युभयाद्वापि गुरूरक्षति पार्वति॥ १०५॥
अशक्ता हि सुराद्याश्च अशक्ता मुनयस्तथा। गुरुशापेन ते शीघ्रं क्षयं यान्ति न संशयः॥ १०६॥

🔷 गुरु की जो महिमा मैंने पहले बतायी, उसे जानकर, सुनकर भी यदि कोई गुरुनिन्दा करता है, वह जब तक चन्द्र, सूर्य है, तब तक घोर नरक में पड़ा रहता है॥ १०१॥ इसलिए जब तक देह है, तब तक यहाँ तक कि कल्पान्त तक भी गुरुदेव का स्मरण करते रहना चाहिए। शिष्य को चाहिए कि मुक्त होने पर भी वह गुरु स्मरण का लोप न होने दे॥ १०२॥ जो शिष्य प्रज्ञावान व विवेकी हैं, वे कभी भी अपने गुरु के सामने हुंकारपूर्वक (तेज स्वर में) बात नहीं करते। इतना ही नहीं, वे गुरु के सामने कभी भी असत्य नहीं बोलते॥ १०३॥ और जो गुरु के पास तू करके, हुं करके बाते करते हैं, वे किसी निर्जन अरण्य प्रदेश में ब्रह्मराक्षस का जीवन जीने के लिए विवश होते हैं॥ १०४॥ भगवान् शिव कहते हैं—हे पार्वती! मुनि, नाग, देवों के शाप से, काल और मृत्यु के भय से केवल गुरुदेव ही शिष्य का रक्षण करने में समर्थ हैं॥ १०५॥ लेकिन जो गुरु के शाप से ग्रस्त हैं, उनकी रक्षा कोई भी देवता अथवा मुनि नहीं कर पाते। ऐसे शिष्य शीघ्र ही नष्ट  होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १०६॥
  
🔶 देवाधिदेव भगवान् महादेव के इन वचनों में बड़ी गहरी अनुभूति समायी है। जो तार्किक हैं, वे तो इस सच को शायद ही छू पाएँ ; लेकिन जो तप करते हैं, जिन्होंने अपनी अन्तर्यात्रा में गुरु-महिमा को जाना है, वे इस अनुभूति कथा को पल-पल पीते हैं। इस अनुभव को साकार करने वाली बड़ी मर्मस्पर्शी घटना है, जो एक शिष्य के जीवन में तब हुई, जब उसका अपने आराध्य गुरुदेव से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं हुआ था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 124

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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