🔶 यही बात मन के संबंध में भी है समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जल राशि और ऊपर नीले आकाश है। सर्वत्र परम शांति दायिनी नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कहीं कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलय काल का ऐसा चित्र बाज़ार में बिकता भी है। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय ता शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की - उपरोक्त स्थिति भजन साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
🔷 शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता भाव परक ध्यानयोग का यही पूर्वार्ध। आपरेशन करते-इंजेक्शन लगाते समय हिलने-जुलने पर प्रतिबंध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन को समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शांत रहना चाहिए। भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्व शक्तिमान्- सर्व वैभववान्-सर्व उत्कृष्टताओं से संपन्न-सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए- घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापारी दिव्य प्रकाश को सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय।
🔶 जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम-रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1)शरीर के अंग प्रत्यंग में विष संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा-परख तेजस् बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनंद रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/12/1_17.html
🔷 शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता भाव परक ध्यानयोग का यही पूर्वार्ध। आपरेशन करते-इंजेक्शन लगाते समय हिलने-जुलने पर प्रतिबंध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन को समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शांत रहना चाहिए। भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्व शक्तिमान्- सर्व वैभववान्-सर्व उत्कृष्टताओं से संपन्न-सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए- घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापारी दिव्य प्रकाश को सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय।
🔶 जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम-रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1)शरीर के अंग प्रत्यंग में विष संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा-परख तेजस् बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनंद रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/12/1_17.html









































