🔷 श्रावस्ती नगरी में एक बार भारी अकाल पड़ा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। लोग भूखों मरने लगे। भगवान बुद्ध उधर से निकले तो वहाँ की स्थिति देख कर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उनने वहाँ के धनीमानी नागरिकों की एक सभा बुलाई कि भूखे मरने वाले लोगों को सुखी प्रदेश तक पहुँचाने के लिए मार्ग में खाने को कुछ अन्न की सहायता की जाय ताकि वे अन्यत्र जाकर अपनी प्राण रक्षा कर सकें।
🔶 सब श्रीमंत चुप थे। वे अपनी कोठी और तिजोरी खाली नहीं करना चाहते थे। चारों ओर सन्नाटा था, एक एक करके सब लोग खिसकने लगे। कोई सहयोग देने को तैयार न था। इस सन्नाटे को चीरती हुई एक लड़की खड़ी हुई उसने कहा- ‘मैं सब भूखों को भोजन देने का जिम्मा अपने ऊपर लेती हूँ।’ उसकी बात सुनकर सब लोग अवाक् रह गये। जिस जिम्मेदारी को बड़े-बड़े लक्षाधीश अपने कंधे पर उठाने को तैयार नहीं, उसे यह लड़की कहाँ से पूरा करेगी? लड़की ने कहा मैं कल से घर-घर जाकर भीख मागूँगी और उससे जो मिलेगा उसे ही भूखों को बाटूँगी।
🔷 उसने वैसा ही किया उसे प्रचुर अन्न मिलने लगा और उससे अगणित दुर्भिक्ष पीड़ित लोगों की प्राण रक्षा हुई।
🔶 अपने पास साधन न होने पर भी मनोबल के आधार पर मनस्वी लोग जन सहयोग के आधार पर प्रचुर साधन जुटा सकते है और उससे संसार का भला कर सकते हैं।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1961
🔶 सब श्रीमंत चुप थे। वे अपनी कोठी और तिजोरी खाली नहीं करना चाहते थे। चारों ओर सन्नाटा था, एक एक करके सब लोग खिसकने लगे। कोई सहयोग देने को तैयार न था। इस सन्नाटे को चीरती हुई एक लड़की खड़ी हुई उसने कहा- ‘मैं सब भूखों को भोजन देने का जिम्मा अपने ऊपर लेती हूँ।’ उसकी बात सुनकर सब लोग अवाक् रह गये। जिस जिम्मेदारी को बड़े-बड़े लक्षाधीश अपने कंधे पर उठाने को तैयार नहीं, उसे यह लड़की कहाँ से पूरा करेगी? लड़की ने कहा मैं कल से घर-घर जाकर भीख मागूँगी और उससे जो मिलेगा उसे ही भूखों को बाटूँगी।
🔷 उसने वैसा ही किया उसे प्रचुर अन्न मिलने लगा और उससे अगणित दुर्भिक्ष पीड़ित लोगों की प्राण रक्षा हुई।
🔶 अपने पास साधन न होने पर भी मनोबल के आधार पर मनस्वी लोग जन सहयोग के आधार पर प्रचुर साधन जुटा सकते है और उससे संसार का भला कर सकते हैं।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

















































